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Wednesday, May 19, 2010

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं.. मेहदी साहब के सुपुत्र ने कुछ इस तरह उभारा फ़राज़ की ख्वाहिशों को

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८४

पाकिस्तान से खबर है कि अस्वस्थ होने के बावजूद मेहदी हसन एक बार फिर अपनी जन्मभूमि पर आना चाहते हैं। राजस्थान के शेखावटी अंचल में झुंझुनूं जिले के लूणा गांव की हवा में आज भी मेहदी हसन की खुशबू तैरती है। देश विभाजन के बाद लगभग २० वर्ष की उम्र में वे लूणा गांव से उखड़ कर पाकिस्तान चले गये थे, लेकिन इस गांव की यादें आज तक उनका पीछा करती हैं। वक्त के साथ उनके ज्यादातर संगी-साथी भी अब इस दुनिया को छोड़कर जा चुके हैं, लेकिन गांव के दरख्तों, कुओं की मुंडेरों और खेतों में उनकी महक आज भी महसूस की जा सकती है।

छूटी हुई जन्मस्थली की मिट्टी से किसी इंसान को कितना प्यार हो सकता है, इसे १९७७ के उन दिनों में झांक कर देखा जा सकता है, जब मेहदी हसन पाकिस्तान जाने के बाद पहली बार लूणा आये और यहां की मिट्टी में लोट-पोट हो कर रोने लगे। उस समय जयपुर में गजलों के एक कार्यक्रम के लिए वे सरकारी मेहमान बन कर जयपुर आये थे और उनकी इच्छा पर उन्हें लूणा गांव ले जाया गया था। कारों का काफिला जब गांव की ओर बढ़ रहा था, तो रास्ते में उन्होंने अपनी गाड़ी रुकवा दी। काफिला थम गया। सड़क किनारे एक टीले पर छोटा-सा मंदिर था, जहां रेत में लोटपोट हो कर वे पलटियां खाने लगे और रोना शुरू कर दिया। कोई सोच नहीं सकता था कि धरती माता से ऐसे मिला जा सकता है। ऐसा लग रहा था, जैसे वे मां की गोद में लिपट कर रो रहे हों।इस दृश्य के गवाह रहे कवि कृष्ण कल्पित बताते हैं, ‘वह भावुक कर देने वाला अदभुत दृश्य था। मेहदी हसन का बेटा भी उस समय उनके साथ था। वह घबरा गया कि वालिद साहब को यह क्या हो गया? हमने उनसे कहा कि धैर्य रखें, कुछ नहीं होगा। धीरे-धीरे वह शांत हो गये। बाद में उन्होंने बताया कि यहां बैठ कर वे भजन गया करते थे।’ मेहदी हसन ने तब यह भी बताया था कि पाकिस्तान में अब भी उनके परिवार में सब लोग शेखावटी में बोलते हैं। शेखावटी की धरती उन्हें अपनी ओर खींचती है।

मेहदी हसन के साथ इस यात्रा में आये उनके बेटे आसिफ मेहदी भी अब पाकिस्तान में गजल गाते हैं और बाप-बेटे का एक साझा अलबम भी है – “दिल जो रोता है’।


उपरोक्त पंक्तियाँ हमने "ईश मधु तलवार" से उधार ली हैं। ऐसा करने के हमारे पास दो कारण थे। पहला यह कि उम्र के जिस पड़ाव पर मेहदी साहब आज खड़े हैं, वहाँ से वापस लौटना या फिर पीछे मुड़कर देखना अब नामुमकिन-सा दिख पड़ता है, इसलिए हमारा कर्त्तव्य बनता है कि किसी भी बहाने मेहदी साहब को याद किया जाए और याद रखा जाए। रही बात दूसरे कारण की तो हमारी आज की महफ़िल जिस गज़ल के सहारे बन-संवरकर तैयार हुई है, उसे अपनी आवाज़ से तरोताज़ा करने वाले और कोई नहीं इन्हीं मेहदी साहब के सुपुत्र आसिफ मेहदी हैं(इनका ज़िक्र ऊपर भी आया है)। मुझे पक्का यकीन है कि आसिफ मेहदी के बारे में बहुत हीं कम लोगों को जानकारी होगी। तो हम हीं कुछ बताए देते हैं। आसिफ ने अपने अब्बाजान और अपने एक रिश्तेदार ग़ुलाम क़ादिर की देखरेख में महज १३ साल की उम्र में गाने की शुरूआत कर दी थी। इन्होंने अपना पहला कार्यक्रम १९८३ में लास एंजिल्स में दिया था, जहाँ पर इनके साथ मेहदी साहब भी थे। कहते हैं कि मेहदी साहब ने इन्हें बीच में हीं रोककर गाने से मना कर दिया था और कहा था कि इनकी आवाज़ औरतों जैसी जान पड़ रही है, इसलिए जब तक ये मर्दाना आवाज़ में नहीं गाते, तब तक इन्हें सर-ए-महफ़िल गाना नहीं चाहिए। अब्बाजान की डाँट का आसिफ की गायिकी पर क्या असर हुआ, यह कहने की कोई ज़रूरत नहीं। १९९९ में मिला "निगार अवार्ड" उनकी प्रतिभा का जीता-जागता नमूना है। पाकिस्तान की ६० से भी ज्यादा फिल्मों में गा चुके आसिफ अब हिन्दुस्तानी फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं। साथ हीं साथ आसिफ आजकल के युवाओं के बीच गज़लों की घटती लोकप्रियता से भी खासे चिंतित प्रतीत होते हैं। इन दोनों मुद्दों पर उनके विचार कुछ इस प्रकार हैं:

पाकिस्तानी गजल गायक आसिफ मेहदी कहते हैं कि युवा श्रोताओं के गजलों से दूर होने के लिए मीडिया जिम्मेदार है। प्रख्यात गजल गायक मेहदी हसन के बेटे मेहदी ने एस साक्षात्कार में आईएएनएस से कहा, "मीडिया जोर-शोर से पॉप संगीत को प्रोत्साहित कर रही है और इसे वह कुछ ऐसे रूप में प्रस्तुत कर रही है कि युवा इसे सुनने के अलावा और कुछ महसूस ही न कर सकें।" मेहदी ने कहा, "मैं अपनी ओर से गजलों को उनके शुद्ध रूप में प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रहा हूं। मैं गजल समारोहों में युवा श्रोताओं की संख्या बढ़ाने के लिए पाकिस्तान और भारत में विभिन्न मंचों पर बात कर रहा हूं। 'रूट्स 2 रूट्स'(एक प्रकार का गज़ल समारोह) के साथ मेरा सहयोग महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने मेरे वालिद (मेहदी हसन) और उनके प्रसिद्ध साथियों गुलाम अली, फरीदा खानम और इकबाल बानो जैसे गजल गायकों के अमर संगीत को प्रोत्साहित करने में मेरी मदद की है।" अपने पिता जैसी ही आवाज के मालिक मेहदी अब बॉलीवुड में अपनी शुरुआत करने को तैयार हैं। मेहदी कहते हैं कि उनके पास बॉलीवुड की कई फिल्मों में गाने के प्रस्ताव हैं। वह कहते हैं कि वह लंबे समय से हिंदी फिल्मों में गाना चाहते थे। उन्हें उम्मीद है कि वह जल्दी ही यह शुरुआत कर सकेंगे।

हम दुआ करते हैं कि हिन्दुस्तानी फिल्में जल्द हीं आसिफ साहब की आवाज़ से नवाजी जाएँ। यह तो हुई गायक की बात, अब बारी है इस गज़ल के गज़लगो की, तो यह गज़ल जिनकी लेखनी की उपज है, उनके बारे में कुछ भी कहना पहाड़ को जर्रा कहने के जैसा होगा। इसलिए खुद कुछ न कहके प्रख्यात लेखक "शैलेश जैदी" को हम यह काम सौंपते हैं।

नौशेरा में जन्मे अहमद फ़राज़ जो पैदाइश से हिन्दुस्तानी और विभाजन की त्रासदी से पाकिस्तानी थे उर्दू के उन कवियों में थे जिन्हें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के बाद सब से अधिक लोकप्रियता मिली।पेशावर विश्वविद्यालय से उर्दू तथा फ़ारसी में एम0ए0 करने के बाद पाकिस्तान रेडियो से लेकर पाकिस्तान नैशनल सेन्टर के डाइरेक्टर,पाकिस्तान नैशनल बुक फ़ाउन्डेशन के चेयरमैन और फ़ोक हेरिटेज आफ़ पाकिस्तान तथा अकादमी आफ़ लेटर्स के भी चेयरमैन रहे।भारतीय जनमानस ने उन्हें अपूर्व सम्मान दिया,पलकों पर बिठाया और उनकी ग़ज़लों के जादुई प्रभाव से झूम-झूम उठा। मेरे स्वर्गीय मित्र मख़मूर सईदी ने, जो स्वयं भी एक प्रख्यात शायर थे,अपने एक लेख में लिखा था -"मेरे एक मित्र सैय्यद मुअज़्ज़म अली का फ़ोन आया कि उदयपूर की पहाड़ियों पर मुरारी बापू अपने आश्रम में एक मुशायरा करना चाहते हैं और उनकी इच्छा है कि उसमें अहमद फ़राज़ शरीक हों।मैं ने अहमद फ़राज़ को पाकिस्तान फ़ोन किया और उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दे दी।शान्दार मुशायरा हुआ और सुबह चर बजे तक चला। मुरारी बापू श्रोताओं की प्रथम पक्ति में बैठे उसका आनन्द लेते रहे।"

"फ़िराक़", "फ़ैज़" और "फ़राज़" लोक मानस में भी और साहित्य के पार्खियों के बीच भी अपनी गहरी साख रखते हैं।इश्क़ और इन्क़लाब का शायद एक दूसरे से गहरा रिश्ता है। इसलिए इन शायरों के यहां यह रिश्ता संगम की तरह पवित्र और अक्षयवट की तरह शाख़-दर-शाख़ फैला हुआ है। रघुपति सहाय फ़िराक़ ने अहमद फ़राज़ के लिए कहा था-"अहमद फ़राज़ की शायरी में उनकी आवाज़ एक नयी दिशा की पहचान है जिसमें सौन्दर्यबोध और आह्लाद की दिलकश सरसराहटें महसूस की जा सकती हैं" फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को फ़राज़ की रचनाओं में विचार और भावनाओं की घुलनशीलता से निर्मित सुरों की गूंज का एहसास हुआ और लगा कि फ़राज़ ने इश्क़ और म'आशरे को एक दूसरे के साथ पेवस्त कर दिया है।और मजरूह सुल्तानपूरी ने तो फ़राज़ को एक अलग हि कोण से पहचाना । उनका ख़याल है कि "फ़राज़ अपनी मतृभूमि के पीड़ितों के साथी हैं।उन्ही की तरह तड़पते हैं मगर रोते नहीं।बल्कि उन ज़ंजीरों को तोड़ने में सक्रिय दिखायी देते हैं जो उनके समाज के शरीर को जकड़े हुए हैं।"फ़राज़ ने स्वय भी कहा था -

मेरा क़लम तो अमानत है मेरे लोगों की।
मेरा क़लम तो ज़मानत मेरे ज़मीर की है॥

देशभक्त की भावना से ओत-प्रोत इस शेर को सुनने के बाद लाज़िमी हो जाता है कि हम एक प्यार-भरा शेर देख लें क्योंकि आज की की गज़ल बड़ी हीं रूमानी है और रूमानियत को रौ में लाने के लिए माहौल में मिसरी तो घोलनी हीं पड़ेगी:

जिस सिम्त भी देखूँ नज़र आता है के तुम हो
ऐ जान-ए-जहाँ ये कोई तुम सा है के तुम हो


और अब वह समय आ गया है, जिसका हमें बेसब्री से इंतज़ार था। तो ज़रा भी देर न करते हुए हम सुनते हैं फिल्म "जन्नत की तलाश" से ज़ुल्फ़िकार अली के द्वारा संगीतबद्ध की गई यह गज़ल:

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को ____ ठहर के देखते हैं

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं

सुना है उसके बदन की तराश ऐसी है
के फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "बूटा" और शेर कुछ यूँ था-

इस दुनिया के बाग में
शूली जैसा हर बूटा है।

इस शब्द के साथ महफ़िल में हाज़िर हुए "रोमेंद्र" जी। हुजूर, आपने इस शब्द को पहचाना तो ज़रूर, लेकिन हमें आपसे शेर की भी दरकार थी। खैर कोई बात नहीं.. पहली मर्तबा था, इसलिए हम आपको माफ़ करते हैं ;) अगली बार से इस बात का भी ध्यान रखिएगा।

अवनींद्र जी, कमाल है..... इस बार आप शेर से हटकर नज़्म पर आ गए। वैसे रचना है बड़ी प्यारी:

अपने मंदिर की खातिर
नौचती रही
तुम मेरे
बाग़ का हर बूटा
और मैं
परेशां रहा
कि भूले से
कोई शूल
तेरे हाथो न चुभ जाये

शरद जी, सच कहूँ तो मैंने इसी शेर के कारण बूटा शब्द को गायब किया था। और वाह! आपने मेरे दिल की बात जान ली:

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग तो सारा जाने है। (आपने यहाँ तू लिखा है.. यानि कि सही शब्द को हीं गुल कर दिया :) )

शन्नो जी, मंजु जी और नीलम जी, आपने "बूटा" को साड़ी पर जड़े "बूटे" की तरह लिया है, जबकि इस नज़्म में बूटा का अर्थ था फूल.. इसलिए मैं आप लोगों के शेर यहाँ पेश नहीं कर रहा। इस बार मुझे माफ़ कीजिएगा। और अगली बार से यह ध्यान दीजिएगा कि कौन-सा शब्द किस अर्थ में इस्तेमाल हुआ है। या फिर फूल की तरह, मुझे समझ नहीं आ रहा। फिर भी मैं आप तीनों के शेर यहाँ रख रहा हूँ। अब महफ़िल के सुधि श्रोतागण हीं इन शेरों का फ़ैसला करेंगे:

स्याह चादर पे चाँद संग आ मुस्कुराते हैं
खामोश आलम में झांक कर टिमटिमाते हैं
आसमा में टंके सितारे लगते हैं जैसे बूटा
रात के अलविदा कहते ही गुम हो जाते हैं. (शन्नो जी)

जब लाल साड़ी पर उकेरा था बूटा,
दिलवर !तब हर साँस ने तेरा नाम जपा . (मंजु जी)

बूटा बूटा जो नोचा उस जालिम ने आसमानों से
लहू लहू वो हुआ उस कातिल के अरमानों से. (नीलम जी)

सीमा जी, आपने बूटा पर कई सारे शेर पेश किए। मुझे उन सारे शेरों में से यह शेर (पंक्तियाँ) सबसे ज्यादा पसंद आया:

मेरी मुहब्बत का ख़्वाब, चमेली का बूटा
जिसके नीचे हकीकत का 'काला नाग' रहता है। (कमल )

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, October 20, 2009

हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है....गुलाम अली के मार्फ़त जता रहे हैं "हसरत मोहानी" साहब

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५५

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं सीमा जी की पसंद की तीसरी गज़ल लेकर। गज़लों की इस फ़ेहरिश्त को देखकर लगता है कि सीमा जी सच्ची और अच्छी गज़लों में यकीन रखती है। जैसे कि आज की हीं गज़ल को देख लीजिए, इस गज़ल की खासियत यह है कि गज़ल-विधा को न के बराबर जानने वाला एक शख्स भी इसे बखूबी जानता है और बस जानता हीं नहीं बल्कि इसे गुनगुनाता भी है। ताज्जुब तो तब होता है जब यह मालूम चले कि ऐसी रूमानी गज़ल को लिखने वाला गज़लगो हिन्दुस्तानी स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण सिपाही था। जी हाँ, हम "हसरत मोहानी" साहब की बात कर रहे हैं, जिन्हें "इन्कलाब ज़िंदाबाद" शब्द-युग्म के ईजाद का श्रेय दिया जाता है। इस गज़ल के बारे में इसके फ़नकार "गुलाम अली" साहब कहते है: यह गजल मेरी पहचान बन चुकी है, इसीलिए मेरे लिए बहुत खास है। मेरे स्टेज पर पहुंचते ही लोग इस गजल की फरमाइश शुरू कर देते हैं। दरअसल इस गजल के बोल और इसकी कंपोजिशन इतनी खास है कि हर दौर के लोगों को यह पसंद आती है। मैंने सबसे पहले रेडियो पाकिस्तान पर यह गजल गाई थी और जहां तक मेरा ख्याल है, उसके बाद से मेरी ऐसी कोई परफॉर्मेन्स नहीं रही, जब मैंने यह गजल न गाई हो। हमने आज से पहले एक कड़ी में गुलाम अली साहब की तो एक कड़ी में हसरत मोहानी साहब की बातें की थीं। इस क्रम को ध्यान में रखा जाए तो आज गुलाम अली साहब की बारी है। तो चलिए आज की कड़ी को हम उन्हीं के हवाले कर देते हैं और उन्हीं के शब्दों में उनकी आपबीती का आनंद लेते हैं।(साभार: नवभारत टाईम्स)

हिन्दुस्तान में आकर परफॉर्म करना मेरे लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के हर कलाकार के लिए खास महत्व रखता है। यहां सुननेवालों से हर कलाकार को जैसी मुहब्बत और इज्जत मिलती है, वैसी दुनिया में और कहीं नहीं मिलती। यहां के लोगों का प्यार ही है, जो हर बार मुझे यहां खींच लाता है। यहां मेरे हर कार्यक्रम में जिस तरह भीड़ उमड़ती है, उसे देखकर अहसास होता है कि वाकई मैंने यहां के लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाई है। यह मेरे लिए बड़े फख्र और खुशी की बात है। यह सही है कि वक्त के साथ काफी कुछ बदला। चीजें काफी कॉमर्शलाइज्ड हो गई हैं। लोगों के पास अब वक्त भी कम है लेकिन जहां तक मेरी बात है तो मैं मानता हूं कि हर कलाकार की अपनी अलग शैली होती है। यह सच है कि समय के साथ-साथ गजल में कई तरह के बदलाव आए हैं, लेकिन मुझे लगता है कि ट्रडिशनल तरीके से गजल गाना अब मेरी पहचान बन चुकी है। लोग शायद इसीलिए आज भी मुझे और मेरी गायकी को पसंद करते हैं। ऐसा नहीं है कि मैं गजलों में नए प्रयोग करने के खिलाफ हूं, लेकिन प्रयोग के नाम पर गजल की रूह के साथ छेड़छाड़ करना मुझे पसंद नहीं है। मैं कभी अपना क्लासिकल बेस नहीं छोड़ता। हिंदुस्तानियों के दिलों में भी गजल का उतना ही खास मुकाम है, जितना पाकिस्तानियों के दिलों में है। यही वजह है कि यहां आज भी गजल की रवायत मौजूद है। तलत अजीज, हरिहरन, पंकज उधास और पीनाज मसानी जैसे कई फनकारों ने इसे सजाया, संवारा और संभाला है। जगजीत सिंह का तो इसमें सबसे खास योगदान रहा है। पाकिस्तान में भी लोग उन्हें चाहते हैं। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच पल रहे इस वैमनस्य से वे काफ़ी चिंतित दिखते हैं। फिर भी उनका मानना है कि: हमें यह समझना चाहिए कि अगर हम आपस में एक हो जाएं, आपसी समझदारी बढ़ाएं तो फिर दुनिया की कोई ताकत हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। मुझे लगता है कि दोनों मुल्कों के बीच आपसी समझदारी बढ़ रही है, रिश्ते सुधर रहें हैं। मैं अल्लाह ताला से गुजारिश करता हूं कि इन दोनों मुल्कों में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अमन-चैन कायम रहे। अभी पिछले दिनों जो कुछ मुंबई में हुआ हमें वह सख्त नापसंद है। ऐसा लगता है मानो हमारे ही साथ हुआ हो। एक फनकार होने के नाते मेरे सुर पर इसका असर पड़ा है और तबाही का वह मंजर मेरी आँखों के सामने घूम रहा है। ऐसे में कोई कैसे गा सकता है। हम चाहते हैं कि सब लोग सुर में आ जाएँ क्योंकि सुर में प्रेम है। हम फनकारों का काम तो प्यार बाँटना ही है। कलाकार तो वैसे भी किसी सरहद के बँधे नहीं होते। लताजी को पाकिस्तान में उतना ही प्यार मिलता है जितना मुझे हिन्दुस्तान में। सोलह आने सच बात कही है आपने!

गुलाम अली साहब के बारे में कहने को ऐसे तो बहुत कुछ है,लेकिन आज बस इतना हीं। वो क्या है कि कभी-कभी डायटिंग भी कर लेनी चाहिए...मतलब कि हर बार हम जो सामग्री पेश करते हैं वो अमूमन हद से ज्यादा होता है यानि ओवरडोज....तो हमने सोचा कि क्यों न आज हल्के-फ़ुल्के में हीं काम निपटा लिया जाए और वैसे भी कभी-कभी जानकारियों के बोझ तले उस दिन की गज़ल/नज़्म दम तोड़ देती है। इसका अर्थ यह हुआ कि सब कुछ संतुलन में होना चाहिए....क्या कहते हैं आप? तो चलिए हम बढते हैं आज की गज़ल की ओर। उससे पहले हर बार की तरह आज के गज़लगो का लिखा एक शेर पेश-ए-खिदमत है:

देखो तो हुस्न-ए-यार की जादू निगाहियाँ
बेहोश इक नज़र में हुई अंजुमन तमाम...


वल्लाह!!!!

और अब पेश है वह गज़ल जिसके लिए आज की महफ़िल सजी है। सुनिए और खुद अंदाजा लगाईये कि लिखने वाले के दिल पर क्या बीती है..... रही बात गाने वाले की तो उसे तो खुदा की नेमत नसीब है, उसके बारे में क्या कहना:

चुपके चुपके रात-दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

खींच लेना वो मेरा पर्दे का कोना दफ़-अ-तन
और दुपट्टे में वो तेरा मुँह छुपाना याद है

बेरुखी के साथ सुनना दर्द-ए-दिल की दास्तां
वो कलाई में तेरा कंगन घुमाना याद है

वक़्त-ए-रुख्सत अलविदा का लफ़्ज़ कहने के लिये
वो तेरे सूखे लबों का थर-थराना याद है

चोरी चोरी हम से तुम आकर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिये
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है

तुझसे मिलते ही वो बेबाक़ हो जाना मेरा
और तेरा दाँतों में वो उंगली दबाना याद है

तुझ को जब तन्हा कभी पाना तो अज़ राहे-लिहाज़
हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है

आ गया अगर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक़्र-ए-फ़िराक़
वो तेरा रो-रो के भी मुझको रुलाना याद है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

आखिरी ___ तेरे ज़ानों पे आये,
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ ....


आपके विकल्प हैं -
a) ग़ज़ल, b) हिचकी, c) सांस, d) अशार

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "लिबास" और शेर कुछ यूं था -

यहाँ लिबास की कीमत है आदमी की नहीं,
मुझे गिलास बड़ा दे, शराब कम दे...

बशीर बद्र साहब के इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना एक साथ दो लोगों ने(हम सेकंड के अंतर को नहीं गिनते)। सीमा जी के साथ हमें एक और साहब मिले जो उद्गार नाम से टिप्पणी करते हैं(असली नाम यही है या नहीं, कहा नहीं जा सकता)। तो इन जनाब ने सही शब्द तो बता दिया लेकिन उस पर शेर कहना भूल गए। इसलिए हम यहाँ बस सीमा जी के शेरों को पेश कर रहे हैं:

कोई किसी से खुश हो और वो भी बारहा हो
यह बात तो गलत है
रिश्ता लिबास बन कर मैला नहीं हुआ हो
यह बात तो गलत है (निदा फ़ाज़ली)

ये हमीं थे जिन के लिबास पर सर-ए-राह सियाही लिखी गई
यही दाग़ थे जो सजा के हम सर-ए-बज़्म-ए-यार चले गये (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)

इनके बाद महफ़िल में हाज़िरी लगाई दिशा जी और शरद जी ने। जहाँ शरद जी ने स्वरचित शेर कहे, वहीं दिशा जी ने जानेमाने शेर से महफ़िल की रौनक बढाई। ये रहे आप दोनों के शेर (क्रम से):

कौन कहता है कि दुनिया से जा रहा है ’शरद’
वो है मौज़ूद यहाँ , बस लिबास बदला है (एक बार फिर से जबरदस्त, हम धीरे-धीरे आपके फ़ैन बनते जा रहे हैं)

कोइ कैसे पहचान पायेगा असलियत उनकी
लिबास की तरह बदलना है फितरत जिनकी

सुमित जी महफ़िल में आए, फिर लौटकर आने का वादा करके निकल लिए..लेकिन लौटे नहीं...गलत बात!!
मंजु जी अपने चिरपरिचित अंदाज़ में महफ़िल का हिस्सा बनीं। यह रहा आपका स्वरचित शेर:

लिबास उनका पहन कर आईना हैरान हुआ ,
उनकी जुदाई का लम्हा करीब आ गया..

अंत में शामिख जी अपने शेरों के कारवां के साथ महफ़िल में तशरीफ़ लाए। ये रहे उस कारवां के कुछ मुसाफ़िर:

वरक पे रोशनी जो मैं गिरता हूँ
लिबास अल्फाज़ को सोचों के उढाता हूँ. (स्वरचित)

कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़िर नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
के हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं तेरी जबीन-ए-नियाज़ में (इक़बाल)

अब आग के लिबास को ज्यादा न दाबिए,
सुलगी हुई कपास को ज्यादा न दाबिए।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, August 11, 2009

खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला.....गुलाम अली की मार्फ़त पूछ रहे हैं आनंद बख्शी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३७

दिशा जी की पसंद की दूसरी गज़ल लेकर आज हाज़िर हैं हम। आज के अंक में जो गज़ल हम आप सबको सुनवाने जा रहे हैं वह वास्तव में तो एक फिल्म से ली हुई है लेकिन हमारे आज के फ़नकार ने इस गज़ल को मंच से इतनी बार पेश किया है कि लोग अब इसे गैर-फ़िल्मी गज़ल मानने लगे हैं। इस गज़ल की गुत्थी इतनी उलझी हुई है कि एकबारगी तो हमें भरोसा हीं नहीं हुआ कि इसे माननीय अनु मलिक साहब ने संगीतबद्ध किया होगा। फिर हमने अंतर्जाल की खाक छान दी ताकि हमें वास्तविक संगीतकार की जानकारी मिल जाए। ज्यादातर जगहों पर अनु मलिक का हीं नाम था ,लेकिन कुछ लोग अब भी यह दावा करते हैं कि इसे गुलाम अली(हमारे आज के फ़नकार) ने खुद हीं संगीतबद्ध किया है। वैसे हमारी खोज को तब विराम मिला जब गुलाम अली साहब का एक साक्षात्कार हमारे हाथ लगा। उन्होंने उस साक्षात्कार में स्वीकार किया है कि इस गज़ल में संगीत अनु मलिक का हीं है। स्क्रीन इंडिया के एक इंटरव्यू में उनसे जब यह पूछा गया कि अनु मलिक का कहना है कि महेश भट्ट की फ़िल्म "आवारगी" की एक गज़ल "चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना बैठा" को उन्होंने हीं कम्पोज़ किया है। क्या आप भी यह मानते हैं? तो इस पर गुलाम अली साहब ने दो टूक शब्दों में यह जवाब दिया कि "हाँ यह उनकी हीं ओरिजिनल कम्पोजिशन थी। मैने बस उनके लिए हीं नहीं बल्कि नदीम-श्रवण के लिए भी बेवफ़ा फ़िल्म की एक गज़ल को अपनी आवाज़ दी है। ये उनकी अपनी धुने हैं। दिल मानता तो नहीं, लेकिन जब गुलाम अली साहब ने खुद हीं ऐसा कहा है तो सारी अटकलें यहीं समाप्त हो जाती हैं। तो आप सब अब तक यह समझ हीं गए होंगे कि हमारी आज की गज़ल कौन-सी है और इसे किसने अपनी आवाज़ से सजाया है। इस गज़ल के साथ एक और शख्स का नाम जुड़ा है। वैसे तो हिंदी फ़िल्मों में इनसे बड़ा गीतकार आज तक कोई नहीं हुआ लेकिन गज़लों के मामले में इनका हाथ कुछ तंग है। इस हाल में अगर आपको यह पता चले कि आज की गज़ल इन्हीं की लिखी हुई है तो एक सुखद आश्चर्य होता है। तो चलिए जानकारियों का सफ़र शुरू करते हैं गुलाम अली के साथ।

यह तो सबको पता है कि गुलाम अली साहब ने अपने शुरूआती दिनों में रेडियो लाहौर में गायकी की थी। उन्हीं पुराने दिनों को याद करते हुए बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम "एक मुलाकात" में गुलाम अली साहब कहते हैं: असल में वही दिन थे, जिन्होंने मुझे यहाँ तक पहुँचाया. अब से तकरीबन 50 साल पहले की बात थी, तब मैं 14 साल का था. मैं रेडियो में ऑडीशन देने गया था. वहाँ निदेशक आगा बशीर साहब थे और उनके बगल में अय्यूब रमानी साहब थे. ऑडीशन के दौरान जब लाल बत्ती जली तो मैं घबरा सा गया था. हालाँकि रियाज़ करते रहने के कारण गाने में मुझे झिझक नहीं थी. मैने आ..आ.. ही कहा था उन्होंने कहा कि बस, बस......मुझे बहुत दुख हुआ कि मैं तो इन्हें सुनाने आया था और इन्होंने सुना ही नहीं. बाद में अय्यूब साहब ने मुझसे पूछा कि तुम उदास क्यों हो. मैंने कहा कि आपने तो मुझे सुना ही नहीं. उन्होंने क़ाग़ज दिखाते हुए कहा कि घबराते क्यों हो, बशीर साहब ने 'गुड' नहीं 'एक्सीलेंट' लिखा है. पाँच महीने में ही मेरा नाम लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया. पाकिस्तान में ही नहीं हिंदुस्तान में भी मुझे लोग सुनते थे. इसके अलावा उनसे जब पूछा गया कि क्या बड़े गुलाम अली खां साहब ने भी यह कहा था कि तुम मेरा नाम रौशन करोगे तो उनका जवाब कुछ यूँ था: जब मेरे वालिद ने बड़े ग़ुलाम अली साहब से मुझे सिखाने की गुजारिश की तो उन्होंने कहा कि मेरी शागिर्दी क्यों करते हो, मैं तो यहाँ रहता नहीं. फिर मेरे वालिद ने बड़े ग़ुलाम अली के दोस्तों बग़ैरह से सिफ़ारिशें करवाईं और जोर देकर कहा कि आप ही इसे सिखाएं. उन्होंने मुझे कुछ सुनाने के लिए कहा. मैने उन्हीं की ठुमरी 'सैंया बोलो तनिक मुँह से रहियो न जाए....' वो हंसने लगे. उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और प्यार किया और कहा कि कल आपकी शागिर्दी होगी. सच्ची बात ये है कि ऐसे उस्ताद की शागिर्दी होना मुक़द्दर की बात है. गुलाम अली साहब के अनुसार उनके जीवन और गाने में कोई फ़र्क नहीं है। वे अपने जीवन को अपनी गायकी से अलग करके नहीं देख सकते। उन्हीं के शब्दों में: मेरा तो जीवन और गाना एक ही है. यानी गाना जीवन है और जीवन गाना. मेरे लिए ये आपस में जुड़े हैं. मैं ख़ाली भी होता हूँ तो दिमाग़ में हर समय संगीत ही चलता रहता है. बस मेरा ज़ोर क्लासिकल पर रहता है. जिसे शास्त्रीय संगीत की जानकारी नहीं होगी वो आगे नहीं बढ़ सकता. मेरा तो ये कहना है कि जब भी गाया जाए कुछ हटकर गाया जाए. बस इसी तरह लफ़्जों को सोचते रहते हैं. गुलाम अली से जुड़ी और भी कई सारी मज़ेदार बातें हैं,लेकिन वे सब फिर कभी। अभी आनंद बख्शी साहब (जी हाँ यह गज़ल उन्हीं की लिखी हुई है...चौंक गए ना!) की ओर रूख करते हैं।

आनंद बख्शी साहब एक ऐसे शख्स हैं, जिनके गीतों को सुनकर न जाने कितनी पीढियाँ (हमारी पीढी और हमसे एक सोपान पहले की पीढी तो निस्संदेह)जवान हुई हैं। भले हीं इस दौरान हम में से कई लोगों ने उन्हें भुला दिया हो लेकिन उनके गीतों को भुलाना आसान नहीं। हम जैसे भूले-भटकों को राह दिखाने के लिए हीं "विनय प्रजापति" जी आनंद बख्शी साहब पर एक ब्लाग चला रहे हैं। मौका मिले तो एक बार आप भी चक्कर लगा के आ जाईयेगा। वैसे आनंद बख्शी के जीवन के बारे में कई लोगों ने बहुत कुछ लिखा है, लेकिन चूँकि हमें कुछ अलग करने की आदत है, इसलिए हम उनके सुपुत्र "राकेश आनंद बख्शी" की कही कुछ बातें लेकर यहाँ हाज़िर हुए हैं। ये बातें उन्होंने "सुपर मैग्जीन" के साथ इंटरव्यू में कहीं थी। मेरे पिताजी ने १९५७ से २००२ के बीच ८०० से भी ज्यादा फिल्मों के लिए ३५०० से भी ज्यादा गाने लिखे हैं। इतना होने के बावजूद जब भी वो कोई नया गाना लिखने बैठते तो उन्हें हर बार यह लगता था कि कहीं इस बार वे असफ़ल न हो जाएँ। इस डर के बावजूद वे सफ़ल हुए और इसका एकमात्र कारण यह था कि हर बार वे ग्राउंड ज़ीरो से शुरूआत करते थे। उन्हें अपनी सफ़लता पर तनिक भी दंभ न था। उन्होंने मुझे सिखाया कि "खुद पर संदेह होना या फिर आत्म-विश्वास की कमी आम चीजें हैं। इनसे कभी भी विचलित नहीं होना चाहिए, बल्कि ये सारी चीजें हीं हमें ताकत देती हैं।" उनका मानना था कि "हिट फ़िल्म बनाना या हिट स्क्रिप्ट लिखना बड़ी बात नहीं है। हिट और फ्लाप तो आते जाते रहते हैं, हमें इन पर ज्यादा सोच-विचार नहीं करना चाहिए। जो चीज मायने रखती है वह यह है कि इनके बाद या इनके दौरान आपका औरों के साथ कैसा बर्ताव रहा है, आप खुद किस तरह के इंसान बन गए हैं या बन रहे हैं और आपने कैसे दोस्त बनाए हैं।" मेरे पिताजी ने अपने डर पर काबू पाने के लिए कुछ पंक्तियाँ लिखीं थीं जिनका इस्तेमाल सुभाष घई साहब ने अपनी एक फ़िल्म में भी किया है। उस कविता या कहिए उस गीत का मुखड़ा इस तरह था:

मैं कोई बर्फ़ नहीं जो पिघल जाऊँगा,
मैं कोई हर्फ़ नहीं जो बदल जाऊँगा,
मैं तो जादू हूँ, मैं जादू हूँ, चल जाऊँगा।


कहते हैं कि आनंद बख्शी ने जब "आपकी कसम" के लिए "ज़िंदगी के सफ़र में गुजर जाते हैं जो मकाम वो फिर नहीं आते" लिखा था तो जावेद अख्तर साहब उनके घर तक चले गए थे और उनसे उनकी कलम की माँग कर दी थी। आनंद बख्शी साहब ने कहा कि आपको अपनी कलम देकर यूँ तो मैं बहुत खुश होऊँगा लेकिन क्या करूँ मुझे यह कलम किशोर कुमार ने गिफ़्ट में दी है। आनंद बख्शी साहब नए फ़नकारों को बहुत प्रोत्साहित करते थे। सुखविंदर सिंह उन्हें याद करते हुए कहते हैं कि "चूँकि मैं खुद एक संगीतकार हूँ इसलिए जब मैं दूसरों के लिए गाता हूँ तो अपना इनपुट दिए बिना रहा नहीं जाता और इसलिए गाना दिल से नहीं कर पाता। बख्शी साहब ने एक बार मुझे कहा था कि जब तुम स्टुडियो में एक गायक की हैसियत से आओ तो अपने अंदर बैठे संगीतकार को घर छोड़कर हीं आना और तब से मैं उनकी इस बात को फौलो कर रहा हूँ। और अब मुझे कोई दिक्कत नहीं आती।" तो ऐसे गुणी थे हमारे आनंद बख्शी साहब। उन्हें याद करते हुए चलिए हम अब सुनते हैं आज की गज़ल। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला

बड़ा दिलकश बड़ा रंगीन है ये शहर कहते हैं
यहाँ पर हैं हजारों घर घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला

चमकते चाँद को…

मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ
न मुझसे बन सका छोटा सा घर दिन रात रोता हूँ
ख़ुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला

चमकते चाँद को…

मेरे मालिक मेरा दिल क्यों तड़पता है सुलगता है
तेरी मर्ज़ी तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल किसी को तूने अंगारा बना डाला

चमकते चाँद को…

यही आग़ाज़ था मेरा यही अंजाम होना था
मुझे बरबाद होना था मुझे नाकाम होना था
मुझे तक़दीर ने तक़दीर का मारा बना डाला




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मुद्दत के बाद उस ने जो की ___ की निगाह,
जी खुश तो हो गया मगर आंसू निकल पड़े..


आपके विकल्प हैं -
a) करम, b) लुत्फ़, c) मेहर, d) ख़ुशी

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "ज़ब्त" और शेर कुछ यूं था -

ज़ब्त लाजिम है मगर दुःख है क़यामत का फ़राज़,
जालिम अब के भी न रोयेगा तू तो मर जायेगा...

फ़राज़ साहब के इस शेर को सबसे पहले पकड़ा कुलदीप जी ने। उन्होंने इस शब्द पर दो शेर भी पेश किए जिनके शायर के बारे में उन्हें जानकारी नही थी। ये रहे दो शेर:

मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था सरे बज्म ये क्या हुआ
मेरी आंख कैसे छलक गयी मुझे रंज है ये बुरा हुआ

जनून को ज़ब्त सीखा लूं तो फिर चले जाना
में अपनेआप को संभाल लूं तो फिर चले जाना

इन दो शेरों के साथ-साथ उन्होंने परवीन शाकिर, हफ़िज जौनपुरी, मोहसिन नकवी,शकील बदायूंनी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, शेरो भोपाली, शहजाद अहमद और इब्राहीम जौक़ के भी शेर पेश किए। अब चूँकि सारे शेर यहाँ हाज़िर नहीं किए जा सकते, इसलिए ज़ौक साहब के इस शेर के साथ कुलदीप जी की टिप्पणियों को इज़्ज़त बख्शते हैं। वैसे भी कुलदीप जी ने इस बार वही शेर पेश किए जिसमें "ज़ब्त" शब्द की आमद थी। बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार की शोभा बढाने वाले ज़ौक साहब का शेर कुछ यूँ है:

ना करता ज़ब्त मैं गिरिया तो ऐ "जौक" इक घडी भर में
कटोरे की तरह घड़ियाल के गर्क आसमान होता

शामिख साहब कोई बात नहीं...देर आयद दुरूस्त आयद। जनाब असदुल्लाह खान ग़ालिब के इस शेर के साथ आपने जबरदस्त वापसी की है:

ऐ दिले-ना-आकिबतअंदेश ज़ब्त-ए-शौक़ कर
कौन ला सकता है ताबे-जल्वा-ए-दीदार-ए-दोस्त

फ़िराक़ साहब की पूरी गज़ल वैसे तो हमें खूब भायी लेकिन क्या करें पूरी गज़ल यहाँ पेश नहीं कर सकते इसलिए इसी शेर के साथ काम चला लेते हैं:

ख़बर है तुझको ऐ ज़ब्त-ए-मुहब्बत
तेरे हाथों में लुटता जा रहा हूँ

रचना जी, यह क्या, क्या कह रही हैं आप। हमारी इस महफ़िल में आने वाला कोई भी शख्स बड़ा या छोटा नहीं है। हम सब तो गज़लों के मुरीद हैं और इस नाते गज़ल-भाई या गज़ल-बहन हुए। तो फिर भाई-बहनों में क्या ऊँच-नीच। आप इसी तरह अपने शेरों के साथ हमारी महफ़िल की शोभा बढाते रहिए:

सारे गम जब्त करलूं एक सहारा तो दिया होता
चल पड़ता तेरी रह में एक इशारा तो दिया होता

दर्पण जी, अब क्या कहें हम.....चूँकि आप गुलज़ार साहब के बहुत बड़े फ़ैन हैं इसलिए इस नाते तो हमारे दोस्त हुए। फिर आपको चैलेंज क्यों देना। हम तो यह चाहेंगे कि आप गुलज़ार साहब के बारे में अपना कुछ अनुभव लिख कर आवाज़ को hindyugm@gmail.com पर मेल कर दें। वह क्या है कि इस रविवार को हम गुलज़ार साहब पर एक आलेख पेश करने वाले हैं, उनका जन्मदिन जो आ रहा है। आशा करते हैं कि आपकी इंट्री ज़रूर आएगी।

मनु जी, यह क्या.. आप आएँ और दर्पण जी को पहचान कर चल दिए। आपके शेर कहाँ गए?

मंजु जी, आपकी पंक्तियाँ भी खूबसूरत हैं:

दिल की बज्म में तेरी वफा का राज था .
जब्त कर लिया राज तूने
दिया बेवफा का साथ था

सुमित जी, आप देर हो गए, कोई बात नहीं, आए तो सही। यह रहा आपका शेर:

कमाल ऐ जब्त ऐ मोहब्बत इसी को कहते है,
तमाम उम्र जबान पर न उनका नाम आये।

हमारे कुछ उस्ताद महफ़िल में दिखे हीं नहीं जैसे अदा जी, दिशा जी, पूजा जी, नीलम जी। वहीं शरद जी आए तो लेकिन उन्होंने कोई शेर पेश नहीं किया। आखिर ऐसी नाराज़गी क्यों। उम्मीद करते हैं कि इस बार आप सब टिप्पणी करने में कोई कोताही नहीं बरतेंगे।

चलिए इतनी सारी बातों के बाद आप लोगों को अलविदा कहने का वक्त आ गया है। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, July 17, 2009

तेरी आवाज़ आ रही है अभी.... महफ़िल-ए-शाइर और "नासिर"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३०

"महफ़िल-ए-गज़ल" के २५वें वसंत (यूँ तो वसंत साल में एक बार हीं आता है, लेकिन हम ने उसे हफ़्ते में दो बार आने को विवश कर दिया है) पर हमने कुछ नया करने का सोचा, सोचा कि क्यों ना अपनी और अपने पाठकों की याद्दाश्त की मालिश की जाए। गौरतलब है कि हम हर बार एक ऐसी गज़ल या गैर फिल्मी नज़्म लेकर हाज़िर होते हैं, जिसे जमाना भुला चुका है या फिर भुलाता जा रहा है। आज कल नए-नए वाद्ययंत्रों की बाढ-सी आ गई है और उस बाढ में सच्चे और अच्छे शब्द गुम होते जा रहे हैं। इन्हीं शब्दों, इन्हीं लफ़्ज़ों को हमें संभाल कर रखना है। तो फिर गज़लों से बढिया खजाना कहाँ मिलेगा, जहाँ शुद्ध संगीत भी है, पाक गायन भी है तो बेमिसाल लफ़्ज़ भी हैं। इसलिए हमारा यह फ़र्ज़ बनता है कि ऐसी गज़लों, ऐसी नज़्मों को न सिर्फ़ एक बार सुने बल्कि बार-बार सुनते रहें। फिर जिन फ़नकारों ने इन गज़लों की रचना की है,उनके बारें में जानना भी तो ज़रूरी है और बस जानना हीं नहीं उन्हें याद रखना भी। अब हम तो एक कड़ी में एक फ़नकार के बारे में बता देते हैं और फिर आगे बढ जाते हैं। अगर हमें उन फ़नकारों को याद रखना है तो कुछ अंतराल पर हमें पीछे भी मुड़ना होगा और बीती कड़ियों की सैर करनी होगी। यही एक वज़ह थी कि हमने २५वें एपिसोड से पिछले एपिसोड तक प्रश्नों की श्रृंखला चलाई थी और यकीन मानिए, उन प्रश्नों का हमें बहुत फ़ायदा हुआ..यकीनन आप सबको भी असर तो दिखा हीं होगा। तो इन पाँच कड़ियों के बीत जाने के बाद हमें अपना विजेता भी मिल गया है। हमने तो यह सोचा था कि विजेता एक होगा, जिससे हम तीन गज़लों की माँग करेंगे और उन गज़लों को ३१वें एपिसोड से ३५वें एपिसोड के बीच में सुनवाएँगे। लेकिन यहाँ तो दो-दो लोग जीत गए हैं। इसलिए हम अपनी पुरानी बात पर अडिग तो नहीं रह सकते,लेकिन वादा भी तो नहीं तोड़ा जा सकता। सारी स्थिति को देखते हुए, हमने यह निर्णय लिया है कि "शरद" जी और "दिशा" जी हमें अपनी पसंद की पाँच-पाँच गज़लों का नाम(हो सके तो एलबम का नाम या फिर फ़नकार का नाम भी) भेज दें, हाँ ध्यान यह रखें कि उन गज़लों में कुछ न कुछ भिन्नता जरूर हो ताकि हर एपिसोड में हमें एक हीं बात न लिखनी पड़े(आखिर उन गज़लों के बारे में हमें जानकारी भी तो देनी है) , फिर उन ५-५ गज़लों में से हम ३-३ उन गज़लों का चुनाव करेंगे जो आसानी से हमें उपलब्ध हो जाएँ और इस तरह जमा हुए इन ६ गज़लों को ३२वें से ४०वें एपिसोड के बीच महफ़िल-ए-गज़ल में पेश करेंगे। तो हम अपने दोनों विजेताओं से यह दरख्वास्त करते हैं कि वे गज़लों (या कोई भी गैर फ़िल्मी नज़्म) की फ़ेहरिश्त hindyugm@gmail.com पर जितनी जल्दी हो सके, मेल कर दें। गज़लें किस क्रम में पोस्ट की जाएँगी, इसका निर्णय पूर्णत: हमारा होगा, ताकि कुछ न कुछ तो सरप्राइज एलिमेंट बचा रहे।

चलिए अब हम अपने पुराने रंग में वापस आते हैं और एक नई गज़ल से अपनी इस महफ़िल को सजाते हैं। आज की गज़ल को हमने जिस एलबम से लिया है उसका नाम है "चंद गज़लें, चंद गीत"। इस एलबम में एक से बढकर एक गज़लें हैं,लेकिन हमने उस गज़ल का चुनाव किया है जो औरों-सी होकर भी औरों से अलग है। ऐसा क्यों है, वह आप खुद समझ जाएँगे। आज की गज़ल को अगर आप गुनगुनाएँगे तो आपको कुछ सालों पहले रीलिज हुई एक हिंदी फ़िल्म "दिल का रिश्ता" के शीर्षक गाने की याद आ जाएगी- "दिल का रिश्ता बड़ा ही प्यारा है,कितना पागल ये दिल हमारा है।" ना ना- हम अर्थ में समानता की बात नहीं कर रहे, बल्कि इस गाने की धुन उस गज़ल से हू-ब-हू मिलती है, आखिर मिले भी क्यों ना, जब उसी से उठाई हुई है। नदीम-श्रवण साहबान पाकिस्तानी गीतों और गज़लों के जबर्दस्त प्रशंसक रहे हैं और इसका प्रमाण उनके कई सारे गानों की धुनों में छुपा है। मसलन "मुसर्रत नज़ीर" के "चले तो कट हीं जाएगा सफ़र" को इन दोनों ने बना दिया "तुम्हें अपना बनाने की कसम खाई है", "नुसरत" साहब के "सानु एक पल चैन न आए", "किस्सेन दा यार न विछड़े" और "किन्ना सोणा" को इन दोनों फ़नकारों ने क्रमश: "मुझे एक पल चैन न आए", "किसी का यार न बिछड़े" और "कितना प्यारा तुझे रब ने बनाया" का रूप दे दिया। गज़लों से तो इन दोनों का खासा लगाव रहा है। मल्लिका-ए-तरन्नुम "नूरजहां" के "वो मेरा हो न सका", "बेगम अख्तर" के "ऐ मोहब्बत तेरे अंज़ाम पर रोना आया" और "मेहदी हसन" साहब के "ना कोई गिला" को नए रूप में जब ढाला गया तो ये बन गए क्रमश: "दिल मेरा तोड़ दिया उसने" , "कितना प्यारा है ये चेहरा जिसपे हम मरते हैं" और "गा रहा हूँ इस महफ़िल में" । इतनी बेदर्दी से इन गज़लों का दोहन किया गया है कि सुन कर शर्म आती है, लेकिन क्या कीजिएगा पैसों की इस दुनिया में ईमानदारी का क्या मोल। और पहले तो छुप-छुपकर चोरियाँ होती थीं, लेकिन आज तो संगीतकार खुले-आम कहते हैं कि हम नहीं चाहते थे कि किसी अंग्रेजी गाने से धुन की नकल करें,क्योंकि लोगों ने वह गाना सुना होता है, इसलिए हमने यह धुन तुर्की से उठाई है तो यह धुन स्पेन से। वैसे हम भी कहाँ उलझ गए, आज की गज़ल की बात करते-करते न जाने किस भावावेश में बह निकले। जिस गज़ल को लेकर हम प्रस्तुत हुए हैं उसे अपनी आवाज़ से मक़बूल किया है "गुलाम अली" साहब ने। शायद संगीत भी उन्हीं का है। वैसे "गुलाम अली" साहब पर एक कड़ी लेकर हम पहले हीं हाज़िर हो चुके हैं, इसलिए आज की कड़ी को गज़लगो के सुपूर्द करते हैं।

८ दिसम्बर १९२५ को अंबाला में जन्मे "सैय्यद नासिर रज़ा काज़मी" छोटी बहर की गज़लों के बेताज़ बादशाह माने जाते हैं। १९४० में इन्होंने जनाब "अख्तर शेरानी" के अंदाज़ में रूमानी कविताएँ और नज़्मों की रचना शुरू की। आगे चलकर जनाब "हाफ़िज़ होशियारपुरी"(इनकी बात हमने महफ़िल-ए-गज़ल की १८वीं कड़ी में की थी, जब हमने इक़बाल बानो की आवाज़ में "मोहब्बत करने वाले कम न होंगे" सुनवाया था) की शागिर्दगी में इन्होंने गज़ल-लेखन शुरू किया। "मीर तक़ी मीर" की गज़लों का इन पर गहरा असर था, इसलिए इनकी गज़लों में "अहसास-ए-महरूमी" को आसानी से महसूस किया जा सकता है। "हाफ़िज़" साहब का प्रकृति प्रेम इनकी लेखनी में भी उतर गया था। "याद के बे-निशां जज़ीरों से, तेरी आवाज़ आ रही है अभी"- इस पंक्ति में "जज़ीरों" का प्रयोग देखते हीं बनता है। "नासिर काज़मी" के बारे में कहा जाता है कि ये गज़लों को न सिर्फ़ कलम और कागज़ देते थे, बल्कि अपनी ज़िंदगी का एक हिस्सा भी उनके साथ पिन कर देते थे। इन्होंने ज़िन्दगी की छोटी-छोटी अनुभूतियों को ग़ज़ल का विषय बनाया और अपनी अनुभव सम्पदा से उसे समृद्ध करते हुए एक ऐसे नये रास्ते का निर्माण किया, जिस पर आज एक बड़ा काफ़िला रवाँ-दवाँ है। इनके जीवन काल में इनका सिर्फ़ एक ही ग़ज़ल संग्रह ‘बर्ग-ए-नै’ सन् १९५२ में प्रकाशित हो सका, जिसकी ग़ज़लों ने सभी का ध्यान आकृष्ट किया। इनका दूसरा और महत्वपूर्ण संग्रह ‘दीवान’ इनके निधन के कुछ महीनों बाद प्रकाशित हुआ, जिसकी ग़ज़लों ने उर्दू जगत में धूम मचा दी। एक ही जमीन में कही गयी इनकी पच्चीस ग़ज़लों का संग्रह ‘पहली बारिश’ भी इनकी मृत्यु के बाद ही सामने आया। इन्होंने न सिर्फ़ गज़लें लिखीं बल्कि एक ऐसा दौर भी आया, जब गज़लों से इन्हें हल्की विरक्ति-सी हो गई । उस दौरान इन्होंने "सुर की छाया" नामक एक नाटिका की रचना की, जो पूरी की पूरी छंद में थी। गज़लों और नाटिकाओं के अलावा इन्हें दूसरी भाषाओं की पुस्तकों का तर्ज़ुमा करना भी पसंद था। "वाल्ट विटमैन" के "क्रासिंग ब्रुकलिन फ़ेरि" का अनुवाद "ब्रुकलिन घाट के पार" उर्दू भाषा की एक मास्टरपिश मानी जाती है। इनके बारे में बातें करने को और भी बहुत कुछ है, लेकिन आज बस इतना हीं। चलिए आगे बढने से पहले, इन्हीं का लिखा एक शेर देख लेते हैं, जिन्हें कितनों ने "गुलाम अली" साहब की आवाज़ में कई बार सुना होगा:

अपनी धुन में रहता हूँ
मैं भी तेरे जैसा हूँ।


गुलाम अली साहब की आवाज़ की मिठास को ज्यादा देर तक थामे रखना संभव न होगा। इसलिए ज़रा भी देर किए बिना आज की गज़ल से मुखातिब होते हैं। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

दिल में इक लहर-सी उठी है अभी,
कोई ताज़ा हवा चली है अभी।

शोर बरपा है खाना-ए-दिल में,
कोई दीवार-सी गिरी है अभी।

कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी,
और ये चोट भी नई है अभी।

याद के बे-निशां जज़ीरों से,
तेरी आवाज़ आ रही है अभी।

शहर की बे-चराग़ गलियों में,
ज़िंदगी तुझको ढूँढती है अभी।


कुछ शेर जो इस गज़ल में नहीं हैं:

सो गए लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी

भरी दुनिया में दिल नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमीं है अभी

वक़्त अच्छा भी आयेगा 'नासिर'
ग़म न कर ज़िंदगी पड़ी है अभी




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

कहीं नहीं कोई ___, धुंआ धुंआ है फिज़ा,
खुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो...

आपके विकल्प हैं -
a) दीपक, b) चाँद, c) सूरज, d) रोशनी

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "वहशत" औए शेर कुछ यूं था -

तामीर के रोशन चेहरे पर तखरीब का बादल फैल गया
हर गाँव में वहशत नाच उठी, हर शहर में जंगल फैल गया...

सबसे पहले सही जवाब दिया दिशा जी ने, बधाई हो. दिशा जी ने कुछ शेर भी फरमाए -

वहशत इस कदर इंसा पर छायी है
कि जर्रे जर्रे में दहशत समायी है
कहाँ से लाऊँ अब मैं अमन का पानी
ये मुसीबत खुद ही तो बुलायी है...

बहुत खूब दिशा जी...
शरद जी ज़रा से देरी से आये पर इस शेर को सुनकर समां बाँध दिया आपने -

ग़म मुझे, हसरत मुझे, वहशत मुझे, सौदा मुझे,
एक दिल देके खुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे ।

वाह...
शमिख जी आपने बिलकुल सही पहचाना, साहिर साहब को सलाम...वाह क्या ग़ज़ल याद दिलाई आपने ख़ास कर ये शेर तो लाजवाब है -

फौजों के भयानक बैंड तले चर्खों की सदायें डूब गईं
जीपों की सुलगती धूल तले फूलों की क़बायें डूब गईं

मंजू जी ने अपने शेर में महफिल-ए-ग़ज़ल की ही तारीफ कर डाली, शुक्रिया आपका...और अंत में हम आपको छोड़ते हैं वहशत शब्द पर कहे मनु जी के बड़े अंकल और हम सबके चाचा ग़ालिब के इस सदाबहार शेर के साथ...

इश्क मुझको नहीं 'वहशत' ही सही
मेरी 'वहशत' तेरी शोहरत ही सही...

वाह....मनु जी आप बीच का एक एपिसोड भूल गए...अरे जनाब कहाँ रहता है आपका ध्यान आजकल.....चलिए अब आनंद लीजिये आज की महफिल का, और हमें दीजिये इजाज़त अगले मंगलवार तक.खुदा हाफिज़.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Monday, April 13, 2009

महफ़िल-ए-गज़ल एक नए अंदाज़ में ....संग है गुलाम अली की आवाज़

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०४

न् ८३ में पैशन्स(passions) नाम की गज़लों की एक एलबम आई थी। उस एलबम में एक से बढकर एक नौ गज़लें थी। मज़े की बात है कि इन नौ गज़लों के लिए आठ अलग-अलग गज़लगो थे:  प्रेम वरबरतनी, एस एम सादिक, अहमौम फ़राज़, हसन रिज़वी, मोहसिन नक़्वी, चौधरी बशीर, जावेद कुरैशी और मुस्तफा ज़ैदी। और इन सारे गज़लगो की गज़लों को जिस फ़नकार या कहिए गुलूकार ने अपनी आवाज़ और साज़ से सजाया था  आज यह महफिल उन्हीं को नज़र है।  उम्मीद है कि आप समझ गए होंगे। जी हाँ, हम आज पटियाला घराना के मशहूर पाकिस्तानी फ़नकार "गुलाम अली" की बात कर रहे हैं।

गुलाम अली साहब, जो कि बड़े गुलाम अली साहब के शागिर्द हैं और जिनके नाम पर इनका नामकरण हुआ है, गज़लों में रागों का बड़ा हीं बढिया प्रयोग करते हैं। बेशक हीं ये घराना-गायकी से संबंध रखते हैं,लेकिन घरानाओं (विशेषकर पटियाला घराना) की गायकी को किस तरह गज़लों में पिरोया जाए, इन्हें बखूबी आता है। गुलाम अली साहब की आवाज़ में वो मीठापन और वो पुरकशिश ताजगी है, जो किसी को भी अपना दीवाना बना दे। अपनी इसी बात की मिसाल रखने के लिए हम आपको पैसन्स एलबम से एक गज़ल सुनाते हैं, जिसे लिखा है "जावेद कुरैशी" ने। हाँ, सुनते-सुनते आप मचल न पड़े तो कहिएगा।

अच्छा रूकिये, सुनने से पहले थोड़ा माहौल बनाना भी तो जरूरी है। अरे भाई, गज़ल ऎसी चीज है जो इश्क के बिना अधूरी है और इश्क एक ऎसा शय है जो अगर आँखों से न झलके तो कितने भी लफ़्ज क्यों न कुर्बान किए जाए, सामने वाले पर कोई असर नहीं होता। इसलिए आशिकी में लफ़्ज परोसने से पहले जरूरी है कि बाकी सारी कवायदें पूरी कर ली जाएँ। और अगर आशिक आँखों की भाषा न समझे तो सारी आशिकी फिजूल है। मज़ा तो तब आता है जब आपका हबीब लबों से तबस्सुम छिरके और आँखों से सारा वाक्या कह दे। इसी बात पर मुझे अपना एक पुरा्ना शेर याद आ रहा है:

दबे लब से मोहब्बत की गुजारिश हो जो महफिल में,
न होंगे कमगुमां हम ही, न होंगे वो हीं मुश्किल में।


यह तो हुआ मेरा शेर, अब हम उस गज़ल की ओर बढते हैं जिसके लिए यह महफ़िल सजी है। वह गज़ल और उसके बोल आप सबके सामने पेशे-खिदमत है:

निगाहों से हमें समझा रहे हैं
नवाज़िश है करम फ़रमा रहे हैं

मैं जितना पास आना चाहता हूँ
वो उतना दूर होते जा रहे हैं

मैं क्या कहता किसी से बीती बातें
वो ख़ुद ही दास्ताँ दोहरा रहे हैं

फ़साना शौक़ का ऐसे सुना है
तबस्सुम ज़ेर-ए-लब फ़रमा रहे हैं




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक ख़ास शब्द होगा जो मोटे अक्षर में छपा होगा. वही शब्द आपका सूत्र है. आपने याद करके बताना है हमें वो सभी शेर जो आपको याद आते हैं जिसके दो मिसरों में कहीं न कहीं वही शब्द आता हो. आप अपना खुद का लिखा हुआ कोई शेर भी पेश कर सकते हैं जिसमें आपने उस ख़ास शब्द का प्रयोग क्या हो. तो खंगालिए अपने जेहन को और अपने संग्रह में रखी शायरी की किताबों को. आज के लिए आपका शेर है - गौर से पढिये -

नाखुदा को खुदा कहा है अगर,
डूब जाओ खुदा खुदा न करो...

इरशाद ....


पिछली महफ़िल के साथी-

इन्तजार का मज़ा बेताब होकर ही तो आता है
जुनून हद से निकल जाए तो कहर आ जाता है.
वाह शन्नो जी...बहुत बढ़िया...

जो रहा बेताब वो आगे बढ़ा है।
जो नहीं बेताब वो पीछे खड़ा है।
आचार्य जी किसकी तरफ है इशारा :)

बहुत बेताब देखा 'बे-तखल्लुस' आज फिर हमने,
के जैसे खुद से हो बेजार ढूंढें फासला कोई.
मनु जी बहुत खूब... बेताबियाँ बनाये रखिये...

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -'शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, September 17, 2008

गए दिनों का सुराग लेकर...आशा जी और गुलाम अली

पूरे कायनात की मौसिकी यहां इस परिवार में बसती है...

चूँकि इस पूरे माह हम बात कर रहे हैं मंगेशकर बहनों की, जिनकी दिव्य आवाजों ने हिन्दी फ़िल्म संगीत का आकाश सजाया है. इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आज आवाज़ पर, दिलीप कवठेकर आयें हैं, आशा जी के गुलाम अली साहब के साथ बनी एल्बम "मेराज़-ए-ग़ज़ल" की रिकॉर्डिंग के समय का एक संस्मरण लेकर, पढ़ें और आनंद लें इस बेमिसाल सी ग़ज़ल का.

मेरा बचपन का मित्र है, दीपक भोरपकर.इन्दौर में बचपन में साथ साथ गाना बजाना करते थे. वह तबला बजाता था, मै गाना.

बडे दिनों बाद लगभग २५ वर्षों बाद पुनर्मिलन हुआ तो पता चला की जनाब मुंबई में है, और हृदयनाथ मंगेशकर के साथ कार्यक्रम में बजाते भी है. यह भी पता चला की वो लताजी और आशा जी को तबले पर रियाज़ भी करवाता है.वे दोनो लगभग रोज़ रियाज़ करती थी उन दिनों में भी.

उन दिनों आशा जी का गुलाम अली साहब के साथ जो एलबम निकल रहा था उस के लिए रियाज़ चल रहा था. दीपक उसी में बहुत व्यस्त था. दुर्भाग्यवश ,संभव होते हुए भी मेरा वहां जाने का संयोग नही बन पाया. लेकिन बातों बातों में उन दिनों का यह ताज़ा संस्मरण उसने सुनाया जो आप के लिये प्रस्तुत है.

"गये दिनों का सुराग लेकर, किधर से आया, किधर गया वो..."

इस गज़ल की बंदिश गुलाम अली जी नें आशा जी को पहली बार सुनाई. इसमें सुर संयोजन बडा ही क्लिष्ट है, हरकतें और मुरकीयां भी काफ़ी उतार चढाव में. गुलाम अली जी नें पहले थोडी सादी ही धुन दी यह सोच कि आशाजी को कठिनाई होगी गाने में. बाद में जमा तो थोडी हरकतें बढा देंगे. तो आशाजी नें बडे विनय से कहा कि आपकी जो भी बंदिश होगी मुझे गाने में कोई तकलीफ़ नही होगी. वैसे भी मेरे भाई भी इस तरह की ही धुनें बनाया करते है. मै मेहनत करूंगी ,आप मुझे एक दिन दें बस.


दूसरे दिन जब गुलाम अली वापिस आये तो पाया की आशाजी नें उनकी धुन में ना सिर्फ़ प्रवीणता हासिल कर ली थी, मगर अपनी तरफ़ से कुछ और खास 'चीज़ें' डाल दी, जिससे ग़ज़ल में और जान आ गयी थी. गुलाम अली साहब बेहद खुश हुए. वो भी इस महान गायिका की गायन प्रतिभा के कायल हुए बिना नही रह सके.

उसके बाद जब गुलाम अली जी नें हृदयनाथ मंगेशकर से मिल कर उनसे उनकी कुछ खास धुनें सुनी तो वे उनके भी कायल हो गये.कहने लगे, कि पूरे कायनात की मौसिकी यहां इस परिवार में बसती है!!

गुलाम अली साहब ग़लत नही थे, इस बात की एक बार फ़िर पुष्टि करती है ये ग़ज़ल आशा जी की सुरीली आवाज़ में. आप भी सुनें -



प्रस्तुति- दिलीप कवठेकर

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