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Sunday, May 25, 2014

तालवाद्य घटम् पर एक चर्चा


स्वरगोष्ठी – 169 में आज

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 7

एक सामान्य मिट्टी का घड़ा, जो लोक मंच के साथ ही शास्त्रीय मंच पर भी सुशोभित हुआ 



 
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की सातवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, अपने साथी स्तम्भकार सुमित चक्रवर्ती के साथ सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे संगीत वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में शास्त्रीय या लोकमंचों पर प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का भी उल्लेख कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे एक ऐसे लोकवाद्य पर चर्चा करेंगे जो अवनद्ध वर्ग का वाद्य है और संगीत में ताल देने के लिए उपयोग किया जाता है। एक सामान्य मिट्टी का घड़ा पहले लोकवाद्य के रूप में ही प्रयोग किया जाता था, किन्तु कुछ कलासाधकों की साधना के बल पर आज ‘घटम्’ के रूप में शास्त्रीय मंचों पर प्रतिष्ठित है। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हमारे साथी सुमित चक्रवर्ती इस अनूठे तालवाद्य पर चर्चा कर रहे हैं। 
 



भारतीय संगीत में ताल की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। ताल किसी भी तालवाद्य से निकलने वाली ध्वनि का वह समयबद्ध चक्र है जो किसी भी गीत अथवा राग को गाते समय गायक को सुर लगाने के सही समय का बोध कराता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में जहाँ कुछ ताल बहुत सहज हैं वहीं कुछ ताल बहुत ही जटिल भी हैं। तालों के लिए कई प्रकार के वाद्‍यों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें तबला, ढोलक, पखावज, मृदंगम्, घटम्, आदि कुछ सर्वाधिक प्रचलित नाम हम सब जानते हैं।
घटम् मूलतः दक्षिण भारत के कर्नाटक संगीत में प्रयोग किया जाने वाला तालवाद्य है। राजस्थान के लोक संगीत में इसी के दो अनुरूप मड्गा तथा सुराही के नामों से प्रचलित हैं। यह एक मिट्टी का बरतन है जिसे वादक अपनी उँगलियो, अँगूठे, हथेलियों व हाथ के किनारों से घड़े के बाहरी सतह पर प्रहार कर बजाते हैं। इसके मुख पर खुले हाथों से प्रहार कर गूँज की ध्वनि उत्पन्न की जाती है जिसे 'गुमकी' कहते हैं। कभी-कभी वादक कलाकार घड़े के मुख को अपने नग्न पेट दबाकर एक गहरी गुमकी की ध्वनि भी उत्पन्न करते हैं। घटम् के अलग-अलग हिस्सों पर प्रहार करने पर भिन्न-भिन्न ध्वनियाँ उत्पन्न की जाती हैं। वर्तमान में देश के सबसे लोकप्रिय घटम वादक टी.एच. विक्कु विनायकराम हैं। इनके व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा से पहले आइए, इनका घटम् वादन सुनते हैं। इस प्रस्तुति में विक्कु जी तालमाला का वादन कर रहे हैं।


घटम् वादन : तालमाला : वादक - टी.एच. विक्कु विनायकराम




वर्तमान में सबसे प्रसिद्ध घटम् वादकों में सबसे पहला नाम आता है, श्री थेटकुड़ी हरिहर विनायकराम का, जिन्हें संगीतप्रेमी प्यार से विक्कु विनायकराम कह कर सम्बोधित करते हैं। इस अनोखे तालवाद्य की कला को बचाने, शिखर तक पहुँचाने तथा इसे विश्वप्रसिद्ध करने में इनका योगदान उल्लेखनीय है। विक्कु जी का जन्म सन् 1942 में तत्कालीन मद्रास में हुआ था। उनके पिता श्री कलईमणि टी.आर. हरिहर शर्मा प्रसिद्ध संगीतज्ञ तथा संगीत के प्राध्यापक थे। विक्कु जी ने सात वर्ष की अल्पायु में ही घटम् वादन का प्रशिक्षण प्रारम्भ कर दिया था। 1955 में रामनवमी उत्सव के दौरान मात्र 13 वर्ष की आयु में उन्होने अपना आरंगेत्रम (प्रथम सार्वजनिक प्रस्तुति) दिया था। इस आरंगेत्रम से सम्बन्धित एक रोचक घटना भी जुड़ी है, वह यह कि जब विक्कु अपना अरंगेत्रम देने मंच पर जा रहे थे, तब गणेश नामक एक बच्चे ने उनका घटम् तोड़ दिया। इस घटना को वे आज भी अपने करियर के लिए शुभ मानते हैं। उन्होंने स्वयं को इतनी कम उम्र में इस प्रकार सिद्ध कर दिया कि शीघ्र ही वे एम. बालमुरलीकृष्ण, जी.एन. बालासुब्रह्मणियम, मदुरई मणि अय्यर और एम.एस. शुभलक्ष्मी जैसे कर्नाटक संगीत के दिग्गजों के साथ वादन करने लगे। विक्कु जी का अन्तर्राष्ट्रीय सफ़र शुरु हुआ 70 के दशक में कोलम्बिया (अमेरिका) से, जहाँ 'शक्ति' नामक बैण्ड से जुड़े जिसमें मुख्य सदस्य थे जॉन मक्लॉफ़्लिन तथा उस्ताद ज़ाकिर हुसैन। इसके बाद उनकी ख्याति में और वृद्धि हुई वर्ष 1992 में जब उन्हें 'प्लैनेट ड्रम' नामक एक अन्तर्राष्ट्रीय संगीत अल्बम के लिए विश्व के सर्वाधिक प्रतिष्ठित 'ग्रेमी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।
 
तालवाद्य के रूप में घड़े अथवा घटम् का प्रयोग 40 और 50 के दशक की एकाध फिल्मों में किया गया था। फिल्मी गीतों में घड़े का सम्भवतः सबसे पहला प्रयोग संगीतकार नौशाद ने 1942 में प्रदर्शित ए.आर. कारदार की फिल्म 'शारदा' के एक गीत- 'पंछी जा पीछे रहा है बचपन मेरा...' में किया था। यह गीत सुरैया ने गाया था। आगे चल कर अभिनेत्री और पार्श्वगायिका बेबी सुरैया का पदार्पण 1942 में कारदार की बनाई दो फिल्मों से हुआ था। इनमें पहली फिल्म 'नई दुनिया' और दूसरी 'शारदा' थी। इसी प्रकार 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘बारादरी’ के एक गीत में ताल के लिए घड़े का अत्यन्त प्रभावी उपयोग किया गया था। संगीतकार नाशाद का संगीतबद्ध यह लोकप्रिय गीत तलत महमूद की आवाज़ में है। गीत के बोल हैं- 'तस्वीर बनाता हूँ तस्वीर नहीं बनती...’। राग पहाड़ी का स्पर्श लिये इस गीत में घड़े के माध्यम से कहरवा ताल का अनूठा सृजन किया गया है। आप इस गीत का आनन्द लीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने अनुमति दीजिए।



फिल्म – बारादरी : ‘तस्वीर बनाता हूँ, तस्वीर नहीं बनती...’ : तलत महमूद : संगीत – नाशाद 





आज की पहेली


 ‘स्वरगोष्ठी’ के 169वें अंक की संगीत पहेली में आज आपको लोक संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 170वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर इस स्वरवाद्य को पहचानिए और हमें उसका नाम लिख भेजिए।

2 – यह किस प्रदेश का लोक संगीत है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 171वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 167वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म 'नागिन' के एक बेहद लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- बीन अथवा पुंगी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- फिल्म नागिन। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी और चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’के मंच पर जारी श्रृंखला ‘संगीत वाद्य परिचय’ के अन्तर्गत आज हमने आपका परिचय एक अनूठे तालवाद्य ‘घटम्’ से कराया। अगले अंक में हम आपसे एक और लोकवाद्य पर चर्चा करेंगे। आप भी यदि ऐसे किसी संगीत वाद्य की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको / श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित / प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।  



आलेख : सुमित चक्रवर्ती 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, April 24, 2011

सुर संगम में आज - लोकप्रिय तालवाद्य घटम की चर्चा

सुर संगम - 17 - घटम
जब विक्कु अपना अरंगेत्रम् देने मंच पर जा रहे थे, तब 'गणेश' नामक एक बच्चे ने उनका घटम तोड़ दिया। इसे घटना को वे आज भी अपने करियर के लिए शुभ मानते हैं।

सुप्रभात! सुर-संगम के आज के अंक में मैं, सुमित चक्रवर्ती आपका स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत में ताल की भूमिका सबसे महत्त्व्पूर्ण मानी गयी है। ताल किसी भी तालवाद्य से निकलने वाली ध्वनि का वह तालबद्ध चक्र है जो किसी भी गीत अथवा राग को गाते समय गायक को सुर लगाने के सही समय का बोध कराता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में जहाँ कुछ ताल बहुत रसद हैं वहीं कुछ ताल बहुत ही जटिल व जटिल भी हैं। तालों के लिए कई वाद्‍यों का प्रयोग किया जाता है जिनमें तबला, ढोलक, ढोल, मृदंगम, घटम आदि कुछ नाम हम सब जानते हैं। आज के इस अंक में हम चर्चा करेंगे एक बहुत ही लोकप्रिय तालवाद्य - घटम के बारे में।

घटम मूलतः दक्षिण भारत के कार्नाटिक संगीत में प्रयोग किया जाने वाला तालवाद्य है। राजस्थान में इसी के दो अनुरूप मड्गा तथा सुराही के नामों से प्रचलित हैं। यह एक मिट्टी का बरतन है जिसे वादक अपनी उँगलियो, अंगूठे, हथेलियों व हाथ की एड़ी से इसके बाहरी सतह पर मार कर बजाते हैं। इसके मुख खुले हाथों से एक हवादर व कम आवाज़ ध्वनि उत्पन्न की जाती है जिसे 'गुमकी' कहते हैं। कभी-कभी कलाकार इसके मुख को अपने नग्न पेट से दबाकर एक गहरी गुमकी की ध्वनि भी उत्पन्न करते हैं। घटम के भिन्न भागों को बजाकर भिन्न - भिन्न ध्वनियाँ उत्पादित की जा सकती हैं। आइये इसी का एक उदाहरण देखें इस वीडियो द्वारा जिसमें इस वाद्य को बजा रहें हैं वर्तमान भारत के सबसे लोकप्रिय घटम वादक 'विक्कु विनायकराम'।



वर्तमान काल के सबसे प्रसिद्ध घटम वादकों में सबसे पहला नाम आता है 'श्री थेटकुड़ी हरिहर विनायकराम' का, जिन्हें प्यार से 'विक्कु विनायकराम' भी कहा जाता है। इस अनोखे तालवाद्य कि कला को बचाने तथा इसे विश्व प्रसिद्ध करने में इनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। विक्कु जई का जन्म सन् १९४२ में मद्रास में हुआ। उनके पिता श्री कलईमणि टि. आर. हरिहर शर्मा स्वयं एक प्रतिभावान संगीतज्ञ तथा संगीत के प्राध्यापक थे। विक्कु जी ने ७ वर्ष की अल्पायु में ही इस वाद्य कला का प्रशिक्षण प्रारंभ कर दिया था तथा उन्होंने अपनी अरंगेत्रम्‍ (प्रथम सार्वजनिक प्रस्तुति) दी मात्र १३ वर्ष कई आयु में, वर्ष १९५५ में श्री राम नवमि उत्सव के दौरान। इससे सम्बन्धित एक रोचक घटना भी है, वह यह कि जब विक्कु अपना अरंगेत्रम् देने मंच पर जा रहे थे, तब 'गणेश' नामक एक बच्चे ने उनका घटम तोड़ दिया। इसे घटना को वे आज भी अपने करियर के लिए शुभ मानते हैं। उन्होंने स्वयं को इतनी कम उम्र में इस प्रकार सिद्ध कर दिया कि शीघ्र ही वे 'मंगलमपल्लि बालमुरलीकृष्ण', 'जी. एन. बालासुब्रमणियम', 'मदुरई मणि अय्यर' और 'एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी' जैसे कार्नाटिक संगीत के दिग्गजों के साथ कार्यक्रम करने लगे। विक्कु जी का अन्तर्राष्ट्रीय सफ़र शुरु हुआ ७० के दशक में कोलम्बिया(अमरीका) 'शक्ति' नामक बैण्ड से जुड़े जिसमें मुख्य सदस्य थे जॉन मक्लॉफ़्लिन तथा उस्ताद ज़ाकिर हुसैन। इसके बाद उनकी ख्याति में और वृद्धि हुई वर्ष १९९२ में जब उन्हें 'प्लैनेट ड्रम' नामक एक अन्तर्राष्ट्रिय संगीत ऎल्बम के लिए विश्व के सबसे बड़े पुरस्कार - 'ग्रैमी' पुरस्कार से सम्मनित किया गया। तो लीजिए ये तो रही कुछ जानकारी विक्कु विनायकराम जी के बारे मे। इस कड़ी को समाप्त करते हुए आपको ले चलते हैं उनके द्वारा एक विशेष प्रस्तुति के वीडियो की ओर। आप सोच रहे होंगे कि आज मैं आपको केवल वीडियो ही क्यों दिखा रहा हूँ? अजी विक्कु जी का घटम वादन का अंदाज़ ही इतना रोचक व अनूठा है कि केवल सुनने से मज़ा नहीं आएगा। आप इस वीडियो में देख सकेंगे कि किस प्रकार उनके अनोखे अन्दाज़ ने उस्ताद ज़किर हुसैन साहब का मन भी मोह लिया और वे उनकी वाह- वाही ही करते रहे।



और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

हमने सोचा कि क्यों न आज की पहेली को थोड़ा सा कठिन बनाया जाए। इस लिए आज कोई भी राग अथवा धुन का हिस्सा नहीं सुनाएँगे।

पहेली: पाश्चात्य संगीत का हवायन गिटार इस तन्त्र वाद्य का वैकल्पिक रूप है।

पिछ्ली पहेली का परिणाम: एक बार पुन: इंदौर की श्रीमति क्षिति तिवारी जी बाज़ी ले गईं हैं। इन्हें मिलते हैं ५ अंक, हार्दिक बधाई!

तो यह था आज का सुर-संगम, कार्नाटिक शास्त्रीय संगीत के एक बहुत ही सरलदर्शि परन्तु अनुपम वाद्य घटम पर आधारित। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। आगामी रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी लेकर, तब तक के लिए अपने साथी सुमित चक्रवर्ती को आज्ञा दीजिए| और हाँ! शाम ६:३० बजे हमारे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के प्यारे साथी सुजॉय चटर्जी के साथ पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

खोज व आलेख- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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