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Sunday, January 17, 2016

राग कामोद : SWARGOSHTHI – 253 : RAG KAMOD





स्वरगोष्ठी – 253 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 1 : राग कामोद

‘ए री जाने न दूँगी...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर नये वर्ष की पहली श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की आज से शुरुआत हो रही है। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा करेंगे, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला के पहले अंक में आज हम राग कामोद के स्वरूप की चर्चा कर रहे हैं। राग कामोद में पहले हम पण्डित राजन और साजन मिश्र के युगल स्वरों में एक बन्दिश प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद इसी बन्दिश के फिल्मी प्रयोग का एक उदाहरण लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनवाएँगे।


कल्याणहिं के थाट में दोनों मध्यम लाय,
प-रि वादी-संवादि कर, तब कामोद सुहाय।

राजन और साजन मिश्र
संगीत के विद्यार्थियों को राग के ढाँचे का परिचय देने के उद्देश्य से उपरोक्त दोहे का प्रयोग किया जाता है। इसके साथ ही राग के स्वरों की जानकारी ‘लक्षण गीत’ के माध्यम से भी दी जाती है। इस श्रृंखला और आज के अंक में हम आपसे दोनों मध्यम स्वरों से युक्त राग कामोद पर चर्चा करेंगे। कल्याण थाट और कल्याण अंग से संचालित होने वाले इस राग को कुछ गायक प्राचीन ग्रन्थकारों के आधार पर बिलावल थाट के अन्तर्गत भी मानते हैं। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। तीव्र मध्यम का अल्प प्रयोग केवल आरोह में पंचम के साथ और शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग कामोद के आरोह के स्वर हैं- सा रे प म(तीव्र) प ध प नि ध सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां नि ध प म(तीव्र) प ध प ग म(शुद्ध) रे सा। राग वर्गीकरण के प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग कामोद को राग दीपक की पत्नी माना जाता है। इस राग का गायन-वादन पाँचवें प्रहर अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर में किया जाता है। राग हमीर के समान कामोद राग के वादी और संवादी स्वर रागों के समय सिद्धान्त की दृष्टि से खरा नहीं उतरता। रागों के समय सिद्धान्त के अनुसार जो राग दिन के पूर्व अंग में उपयोग किये जाते हैं, उनका वादी स्वर सप्तक के पूर्व अंग में होना चाहिए। कामोद राग को इस नियम का अपवाद माना गया है, क्योंकि यह रात्रि के प्रथम प्रहर गाया जाता है और इसका वादी स्वर पंचम है। यह स्वर सप्तक के उत्तरांग का एक स्वर है। अब आपको इस राग की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध युगल गायक पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। राग कामोद की यह अत्यन्त प्रचलित परम्परागत रचना है, जिसके बोल हैं- ‘एरी जाने न दूँगी...’। इस प्रस्तुति में तबला संगति सुधीर पाण्डेय ने और हारमोनियम संगति महमूद धौलपुरी ने की है।


राग कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र 



सी. रामचन्द्र के साथ रोशन और लता
श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए कामोद आदर्श राग है। इस राग में ऋषभ-पंचम स्वरों की संगति अधिक होती है। ऋषभ से पंचम को जाते समय सर्वप्रथम मध्यम से मींड़युक्त झटके के साथ ऋषभ स्वर पर आते हैं और फिर पंचम को जाते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि इस प्रक्रिया में पंचम के साथ ऋषभ की संगति कभी न हो। राग हमीर और केदार के समान राग कामोद में भी कभी-कभी कोमल निषाद का प्रयोग अवरोह में राग की रंजकता बढ़ाने के लिए किया जाता है। राग कामोद में गान्धार का प्रयोग कभी भी सपाट नहीं बल्कि वक्र प्रयोग होता है। राग हमीर और केदार इसके समप्रकृति राग हैं। इन रागो की चर्चा हम इसी श्रृंखला के आगामी अंकों में करेंगे। ऊपर आपने राग कामोद की जो बन्दिश सुनी है, उस बन्दिश का उपयोग फिल्म में भी हुआ है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के चर्चित कथानक ‘चित्रलेखा’ पर आधारित 1964 में इसी नाम से फिल्म बनी थी, जिसमें यह बन्दिश शामिल की गई थी। फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी हैं, जिन्होने राग कामोद की मूल पारम्परिक बन्दिश की स्थायी के शब्दों को यथावत रखते हुए अन्तरों में परिवर्तन किया है। फिल्म में यह गीत लता मंगेशकर ने रोशन के संगीत निर्देशन में गाया था। संगीतकार रोशन ने भी साहिर का यह गीत राग कामोद के स्वरों में संगीतबद्ध किया है। अब आप लता मंगेशकर की आवाज़ में राग कामोद की इस खयाल रचना का फिल्मी रूप सुनिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – चित्रलेखा




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 253वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्म संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग की अनुभूति हो रही है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 23 जनवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 255वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 251वें अंक में हमने संगीत पहेली को विराम दिया था, अतः इस अंक का कोई भी परिणाम और विजेता नहीं है। 252वें अंक की पहेली का परिणाम और विजेताओं की सूची हम अगले अंक में प्रकाशित करेंगे।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आज से आरम्भ श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का यह पहला अंक था, जिसमें आप राग कामोद की चर्चा के सहभागी थे। इससे पहले 251 और 252वें अंकों में आप बीते वर्ष के सिंहावलोकन अंकों के साक्षी बने। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारी एक नियमित पाठक और श्रोता तथा वर्ष 2015 की पहेली की एक महाविजेता, पेंसिलवेनिया, अमेरिका की श्रीमती विजया राजकोटिया ने निम्नलिखित विचार व्यक्त किया है – 
‘I want to take this opportunity to express my gratitude to you and all those who worked with you for making "Swargoshthi" a wonderful base for all music lovers, classical, light or film music where they can listen to music, read about the life-sketch of different artists, expand their awareness of music to be able to appreciate and enjoy the divinity felt as a result. I am also very impressed by the Shrunkhala and Paheli which I look forward to every week and try and participate as much as possible.Today, it gives me such joy to win the music quiz and I am speechless to describe how it touches my heart. I think this is very important to make our thinking and feelings so engrossed in music which will enable us to increase our knowledge. With regards, Vijaya Rajkotia.
आप भी अपने विचार, सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Sunday, February 10, 2013

पाँचवें प्रहर के कुछ आकर्षक राग



स्वरगोष्ठी – 107 में आज
राग और प्रहर – 5

शाम के अन्धकार को प्रकाशित करते राग


‘स्वरगोष्ठी’ के 107वें अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का इस मंच पर हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, पिछले रविवार को इस स्तम्भ का अगला अंक मैं अपनी पारिवारिक व्यस्तता के कारण प्रस्तुत नहीं कर सका था। आज के अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं, पाँचवें प्रहर के कुछ मधुर रागों में चुनी हुई रचनाएँ। तीन-तीन घण्टों की अवधि में विभाजित दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहरों के रूप में पहचाना जाता है। इनमें पाँचवाँ प्रहर अर्थात रात्रि का पहला प्रहर, सूर्यास्त के बाद से लेकर रात्रि लगभग नौ बजे तक की अवधि को माना जाता है। इस प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले राग गहराते अन्धकार में प्रकाश के विस्तार की अनुभूति कराते हैं। आज के अंक में हम ऐसे ही कुछ रागों पर आपसे चर्चा करेंगे।

पाँचवें प्रहर के रागों में आज हम सबसे पहले राग कामोद पर चर्चा करेंगे। कल्याण थाट और कल्याण अंग से संचालित होने वाले इस राग को कुछ विद्वान काफी थाट के अंतर्गत भी मानते हैं। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। अवरोह में दोनों मध्यम का और शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। राग वर्गीकरण के प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग कामोद को राग दीपक की पत्नी माना जाता है। अब आपको इस राग पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। सुप्रसिद्ध उपन्यासकार भगवतीचरण वर्मा की कालजयी कृति ‘चित्रलेखा’ पर 1964 में इसी नाम से फिल्म का निर्माण हुआ था। फिल्म के संगीतकार रोशन थे। उन्होने फिल्म का एक गीत- ‘ए री जाने ना दूँगी...’ राग कामोद पर आधारित स्वरबद्ध किया था। सितारखानी ताल में निबद्ध यह गीत लता मंगेशकर के स्वरों में श्रृंगार रस की सार्थक अनुभूति कराता है। लीजिए, आप यह मोहक गीत सुनिए।


राग कामोद : फिल्म चित्रलेखा : ‘ए री जाने ना दूँगी...’ : लता मंगेशकर 



पाँचवें प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले रागों में एक सदाबहार राग है- ‘पूरिया धनाश्री’। यह राग पूर्वी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वरों के इस राग में तीव्र मध्यम, कोमल ऋषभ और कोमल धैवत सहित शेष शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। राग पूरिया धनाश्री में लगने वाले स्वर राग श्री में भी प्रयोग किए जाते हैं, किन्तु इसका चलन भिन्न होता है। आपको राग पूरिया धनाश्री का आकर्षक उदाहरण सुनवाने के लिए आज हमने सरोद वाद्य चुना है। भरपूर गमक से युक्त इस वाद्य पर राग पूरिया धनाश्री में तीनताल की एक मोहक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं, विश्वविख्यात सरोद-वादक उस्ताद अमजद अली खाँ। यह रचना उनके पिता और गुरु उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ की है।


राग पूरिया धनाश्री : सरोद पर मध्य लय तीनताल की गत : उस्ताद अमजद अली खाँ



एक अत्यन्त प्रचलित राग है भूपाली, जिसे राग भूप भी कहा जाता है। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हम पाँचवें प्रहर के कुछ रागों पर चर्चा कर रहे हैं। भूपाली इस प्रहर का एक प्रमुख राग है। यह राग कर्नाटक संगीत के राग मोहनम् के समतुल्य है। कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग औड़व-औड़व जाति का होता है। इसमें मध्यम और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग भूपाली का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। राग देशकार में भी इन्हीं स्वरों का प्रयोग होता है, किन्तु उत्तरांग प्रधान होने के कारण यह भूपाली से अलग हो जाता है। आज हम आपको राग भूपाली में सितार वादन सुनवाते हैं। जाने-माने सितारनवाज उस्ताद शाहिद परवेज़ राग भूपाली में सितार पर तीनताल की गत और झाला प्रस्तुत कर रहे हैं। तबला संगति वाराणसी के रामकुमार मिश्र ने की है।


राग भूपाली : सितार पर तीनताल की गत और झाला : उस्ताद शाहिद परवेज़ 



आज के इस अंक में हम पाँचवें प्रहर अर्थात रात्रि के पहले प्रहर के कुछ रागों की चर्चा कर रहे हैं। आजकल संगीत की अधिकतर सभाओं के आयोजन का यही समय होता है। इसी कारण इस प्रहर के राग संगीत-प्रेमियों के बीच अधिक लोकप्रिय हैं। ऐसा ही एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है, यमन। प्राचीन संगीत के ग्रन्थों में इस राग का नाम कल्याण कहा गया है। इसका यमन नाम मुगल शासनकाल में प्रचलित हुआ। कर्नाटक संगीत का राग कल्याणी इसके समतुल्य है। इसे कल्याण थाट का आश्रय राग माना गया है। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के इस राग में मध्यम स्वर तीव्र और शेष सभी स्वर शुद्ध लगते हैं। इस राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के अवरोह में यदि दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाए तो यह राग यमन कल्याण कहलाता है। यदि आरोह-अवरोह में तीव्र मध्यम के स्थान पर शुद्ध मध्यम का प्रयोग का दिया जाए तो यह राग बिलावल तथा यदि शुद्ध निषाद के स्थान पर कोमल निषाद का प्रयोग कर दिया जाए तो यह राग वाचस्पति की अनुभूति कराने लगता है। आज इस राग में हम आपको एक अत्यन्त आकर्षक तराना सुनवाते हैं, जिस प्रस्तुत कर रही हैं, विदुषी मालिनी राजुरकर। यह तराना द्रुत एकताल में निबद्ध है। आप यह तराना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


राग यमन : द्रुत एकताल का तराना : विदुषी मालिनी राजुरकर



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 107वीं संगीत पहेली में हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 109वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 105वें अंक में हमने आपको फिल्म ‘हमदर्द’ से राग गौड़ सारंग पर आधारित एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग गौड़ सारंग और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तीनताल। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, बैंगलुरु के पंकज मुकेश, जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी और मिनिसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों ‘राग और प्रहर’ शीर्षक से लघु श्रृंखला जारी है। श्रृंखला के आगामी अंक में हम आपके लिए दिन के छठें प्रहर अर्थात रात्रि के दूसरे प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले कुछ आकर्षक रागों की प्रस्तुतियाँ लेकर उपस्थित होंगे। आप हमारे आगामी अंकों के लिए आठवें प्रहर तक के प्रचलित रागों और इन रागों में निबद्ध अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे। 

कृष्णमोहन मिश्र 


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