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Monday, June 8, 2009

रोज़-ए-अव्वल ही से आवारा हूँ, आवारा रहूंगा...गुलज़ार साहब का ऐलान उस्ताद अमजद अली खान के संगीत में.

बात एक एल्बम की (9)
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - वादा
फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - उस्ताद अमजद अली खान, गुलज़ार, रूप कुमार राठोड, साधना सरगम.


एल्बम "वादा" से अब तक आप तीन रचनायें सुन चुके हैं. आज आपको सुनवाते हैं दो और नायाब गीत इसी एल्बम से. गुलज़ार साहब पर हम आवाज़ पर पहले भी काफी विस्तार से चर्चा कर चुके हैं- मैं इस जमीन पर भटकता रहा हूँ सदियों तक और गुलज़ार - एक परिचय जैसे आलेखों में. महफ़िल-ए-ग़ज़ल में जब भी उनका जिक्र छिड़ा, तख्लीक-ए-गुलज़ार और परवाज़-ए-गुलज़ार से फिजा गुलज़ार नुमा हो गयी. फिल्मों में उनके लिखे ढेरों गीत हमेशा हमेशा संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज़ करेंगें पर ये भी एक सच है कि उन्होंने ढेरों गैर फिल्म संगीत एल्बम को अपनी कलम से प्रेरणा दी. उनके साथ काम कर चुके ढेरों कलाकारों ने जब भी कभी फिल्मों से इतर अपनी कला का मुजाहरा करने का मन बनाया गुलज़ार साहब की कविताओं/ ग़ज़लों ने उन्हें अपने प्रेम पाश में बाँध लिया. फिर चाहे वो भूपेंद्र सिंह हो, सुरेश वाडेकर, भूपेन हजारिका, विशाल भारद्वाज हो या फिर जगजीत सिंह, कोई भी उनकी कविताओं के नर्मो-नाज़ुक जादू से बच नहीं पाया. गुलज़ार साहब खुद जिन फनकारों के मुरीद रहे उनके काम को जन जन तक पहुंचाने में भी उनकी अहम् भूमिका रही. मिर्जा ग़ालिब और अमृता प्रीतम के नाम इनमें प्रमुख हैं. अमृता प्रीतम की कविताओं को जिस एल्बम के माध्यम से गुलज़ार ने नयी सांसें दी उस एल्बम का भी हम आवाज़ पर ज़िक्र कर चुके हैं.

अब इसे दुर्भाग्य ही कहिये कि उनके बहुत से उन्दा काम पर्याप्त प्रचार और स्टार वेल्यू के अभाव में उतनी कमियाबी को नहीं पा सके जिसके कि वो हक़दार थे. "बूढे पहाडों पर" और "वादा" उनकी ऐसी ही कुछ अल्बम्स हैं. हाँ पर उनके दीवानों की कहीं कोई कमी नहीं है, जो हर उस एल्बम को अपने संग्रह का हिस्सा बनाते हैं जिनसे उनका नाम जुड़ जाता है. अक्सर उनकी कवितायें गहरे भाव और सरल शब्दों में गुंथी होने के कारण संगीतकारों को उन्हें स्वरबद्ध करने के लिए प्रेरित करती ही है. विशाल ने उनकी कविता "यार जुलाहे" को बहुत खूबसूरत रूप से स्वरबद्ध किया था. ऐसे में उस्ताद अमजद अली खान साहब भी कहाँ पीछे रहते भला. वादा एल्बम में भी गुलज़ार साहब के लिखे कुछ बेहद गहरे उतरते शब्दों को खान साहब ने बहुत प्यार से सुरों में पिरो कर पेश किया है.

"रोजे-अव्वल ही से आवारा हूँ आवारा रहूँगा..." कहानी है एक अनजाने अजनबी खला में भटकते यायावर की. गीत से पहले और बीच बीच में गुलज़ार साहब की आवाज़ में कुछ पंक्तियाँ है, संगीत ऐसा है कि यदि ऑंखें बंद सुनेंगें तो आप खुद को इतना हल्का महसूस करेंगे कि कहीं अन्तरिक्ष की खलाओं में भ्रमण करते हुए पायेंगें, जहाँ गुलज़ार साहब आपको चेताते मिलेंगें -"उल्काओं से बच के गुजरना, कॉमेट हो तो पंख पकड़ना..." तो चलिए हमारे साथ आज इस सफ़र में सुनिए ये गीत एल्बम "वादा" से.



अब सुनिए एक और डूबता गीत, जो पहले गीत से बिलकुल अलग रंग का है. रूप कुमार राठोड के गाये बहतरीन गीतों में इसका शुमार है. सुनिए इसी एल्बम से -"डूब रहे हो और बहते हो..." जहाँ गुलज़ार साहब लिखते हैं - "याद आते हैं वादे जिनके, तेज़ हवा में सूखे तिनके, उनकी बातें क्यों कहते हो....."



(जारी....)



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की.यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.

Wednesday, June 3, 2009

"ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नहीं था..."- उस्ताद अमजद अली खान के संगीत का सतरंगी वादा

बात एक एल्बम की (८)
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - वादा
फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - उस्ताद अमजद अली खान, गुलज़ार, रूप कुमार राठोड, साधना सरगम.

"बात एक एल्बम की" का एक नया महीना है और हम हाज़िर हैं एक नयी एल्बम के साथ. इस माह की एल्बम में हैं चार दिग्गज फनकार, जो सभी के सभी अपने अपने क्षेत्र में महारत रखते हैं. जहाँ संगीतकार हों उस्ताद अमजद अली खान जैसे, गीतकार हों गुलज़ार साहब जैसे, गायक हों रूप कुमार राठोड और गायिका हों साधना सरगम जैसी तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एल्बम किस स्तर की होगी. जी हाँ ये एल्बम है -"वादा". सच्चे और अच्छे संगीत का वादा ही तो है ये नायाब एल्बम जिसका एक एक गीत हमारा दावा है, आपके अन्तर्मन में कुछ यूं उतर जायेगा कि उसका खुमार उम्र भर नहीं उतरेगा.

दरअसल इस पूरी टीम में जो नाम सबसे ज्यादा चौंकाता है वो निसंदेह उस्ताद अमजद अली खान साहब का ही है. अपने सरोद वादन से लगभग ४० सालों से भी अधिक समय से दुनिया भर के संगीत के कद्रदानों को मंत्रमुग्ध करने वाला ये महान फनकार एक व्यावसायिक एल्बम का हिस्सा बने, जरा विचित्र लगता है. पर खान साहब के क्या कहने, इतने मधुर संगीत से सजाया है पूरी एल्बम को जैसे मोती चुन लाये हो अपने सुरों के अद्भुत लोक से. खुद उन्हीं के शब्दों में -"कोई मूलभूत फर्क नहीं है शास्त्रीय और लोकप्रिय संगीत में. संगीत संगीत है. मेरा मकसद अपने श्रोताओं से जुड़ना है...". ग्वालियर के हाफिज़ अली खान के शिष्य रहे खान साहब ने ६ साल की उम्र में पहली बार मंच पर सरोद वादन किया था, कितने लोगों को उस वक़्त ये ख़्याल आया होगा कि ये बालक एक दिन सरोद को हिमालय सी ऊँच्चाईयों पर पहुंचा देगा. देश विदेश में जाने कितने कंसर्ट, जाने कितने सम्मान (जिसमें पद्म विभूषण भी शामिल है), ढेरों नए प्रयोग, इस बात पे शायद ही कोई शक होगा कि खान साहब ने अफगान के घोडों के व्यापारी मोहम्मद हाशमी खान बंगेश द्वारा हिंदुस्तान लाये गए इस वाध्य को जन जन तक पहुँचाने में अहम् भूमिका निभाई है, जिस परंपरा को उनको दोनों सुपत्र बहुत खूबी से आगे ले जा रहे हैं.

उस्ताद पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है, पर फिलहाल हमारा मकसद है उनके सगीत से सजे इस एल्बम से कुछ गीत आपको सुनवाना. तो चलिए शुरुआत करते हैं इस शीर्षक गीत से. गुलज़ार साहब के शब्दों को स्वर दिया है रूप कुमार राठोड ने. "ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नहीं था...तेरे बिना जीने का इरादा तो नहीं था....". आनंद लीजिये इतना सार्थक आरंभिक संगीत(prelude) बहुत कम गीतों में सुनने को मिलता है-



दूसरी आवाज़ है इस एल्बम में साधना सरगम की. उनकी आवाज़ में सुनिए एक बेहद खूबसूरत सा गीत इस लाजवाब एल्बम से. जहाँ पहले गीत में दर्द और तन्हाईयों की असीम गहराईयाँ थी वहीँ इस गीत एक मीठा सा चुलबुलापन है, साधना की आवाज़ में ये गीत बार बार सुनने जाने लायक है. "दिल का रसिया और कहाँ होगा..."



और अब सुनिए इन दोनों गीतों को खान साहब के सरोद पर. स्वरों की मधुर स्वरलहरियों में गोते खाईये और डूब जाईये उस्ताद के बेमिसाल सरोद वादन के सुर सागर में -



(जारी....)



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Tuesday, May 5, 2009

आफ़रीन आफ़रीन...कौन न कह उठे नुसरत साहब की आवाज़ और जावेद साहब को बोलों को सुन...

बात एक एल्बम की # 05

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - "संगम" - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर



उन दिनों मैं राजस्थान की यात्रा पर था, जहाँ एक बस में मैंने उसके घटिया ऑडियो सिस्टम में खड़खड़ के बीच, "आफरीन-आफरीन.." सुना था. ज़्यादा समझ में नहीं आया पर धुन कहीं अन्दर जाकर समां गई- वहीँ गूँजती रही. फिर जब उदयपुर की एक म्यूजिक शाप पर फिर उसी धुन को सुना जो अबकी बार कहीं ज़्यादा बेहतर थी तो एक नशा-सा छा गया. यह आवाज़ थी जनाब नुसरत फतह अली भुट्टो साहब की. क्या शख्सियत, आवाज़ में क्या रवानगी, क्या खनकपन, क्या लहरिया, क्या सुरूर और क्या अंदाज़ गायकी का, जैसे खुदा खुद ज़मी पर उतर आया हो.

मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जब नुसरत साहब गाते होगें, खुदा भी वहीँ-कहीं आस-पास ही रहता होगा, उन्हें सुनता हुआ मदहोश-सा. धन्य हैं वो लोग, जो उस समय वहां मौजूद रहें होगें. उनकी आवाज़-उनका अंदाज़, उनका वो हाथों को हिलाना, चेहरे पर संजीदगी, संगीत का उम्दा प्रयोग, यह सब जैसे आध्यात्म की नुमाइंदगी करते मालूम देते हैं. दुनिया ने उन्हें देर से पहचाना, पर जब पहचाना तो दुनिया भर में उनके दीवानों की कमी भी नहीं रहीं. १९९३ में शिकागो के विंटर फेस्टिवल में वो शाम आज भी लोगो को याद हैं जहाँ नुसरत जी ने पहली बार राक-कंसर्ट के बीच अपनी क़व्वाली का जो रंग जमाया,लोग झूम उठे-नाच उठे, उस 20 मिनिट की प्रस्तुति का जादू ता-उम्र के लिए अमेरिका में छा गया. वहीं उन्होंने पीटर ग्रेबियल के साथ उनकी फिल्म्स को अपनी आवाज़ दी और उनके साथ अपना अल्बम "शहंशाह" भी निकाला. नुसरत साहब की विशेषता थी पूर्व और पश्चिम के संगीत का संगम करके उसे सूफियाना अंदाज़ में पेश करना. क़व्वाली को उन्होंने एक नया मुकाम दिया. संगीत की सभी शैलियों को आजमाते हुए भी उन्होंने सूफियाना अंदाज़ नहीं छोडा और न ही कोई छेड़-छाड़ की खुद से. दुनिया यूँ ही उनकी दीवानी नहीं है. क़व्वाली के तो वे बे-ताज बादशाह थे.

कव्वालों के घराने में 13 अक्तूबर 1948 को पंजाब के फैसलाबाद में जन्मे नुसरत फतह अली को उनके पिता उस्ताद फतह अली खां साहब जो स्वयं बहुत मशहूर और मार्रुफ़ कव्वाल थे, ने अपने बेटे को इस क्षेत्र में आने से रोका था और खानदान की 600 सालों से चली आ रही परम्परा को तोड़ना चाहा था पर खुदा को कुछ और ही मंजूर था, लगता था जैसे खुदा ने इस खानदान पर 600 सालों की मेहरबानियों का सिला दिया हो, पिता को मानना पड़ा कि नुसरत की आवाज़ उस परवरदिगार का दिया तोहफा ही है और वो फिर नुसरत को रोक नहीं पाए और आज इतिहास हमारे सामने है.

जब नुसरत जी गुरु नानक की वाणी,"कोई कहे राम-राम,कोई खुदाए...."को अपनी आवाज़ देते हैं तो तो सुनने वाला मदहोशी में डूब जाता है. ऐसा निराला अंदाज़, दुनिया भर में जो लोग पंजाबी-उर्दू और क़व्वाली नहीं भी समझ पाते थें, पर उनकी आवाज़ और अंदाज़ के दीवानें थें. उन्हीं दीवानों में से एक -"गुडी", जो स्वयं एक मशहूर कम्पोजर और निर्माता रहे हैं, ने नुसरत जी को समझने के लिए अनुवादक का सहारा लिया और इस गायक को समझा. फिर दोनों दीवानों ने मिलकर एक अल्बम."डब क़व्वाली" के नाम से भी निकाला. गुडी ने नुसरत साहब के काम को दुनिया भर में फैलाया.गुडी बड़ी विनम्रता से कहते हैं,"यह उनके लिए बड़े भावनात्मक पल रहे हैं." इसी अल्बम में "बैठे-बैठे,कैसे-कैसे...." सुनिए,शुरुआती ३० सेकेण्ड ही काफी हैं, नशे में डूब जाने के लिए. पूर्व और पश्चिम में के आलौकिक फ्यूजन में भी उन्होंने अपना पंजाबीपन और सूफियाना अंदाज़ नहीं छोडा और फ्यूजन को एक नई परिभाषा दी. उन्होंने सभी सीमाओं से परे जाकर गायन किया. खाने के बेहद शौकीन नुसरत जी ने सिर्फ इस मामले में अपने डाक्टरों की कभी नहीं सुनी. जी भरकर गाया और जी भरकर खाया. महान सूफी संत और कवि रूमी की कविता को नुसरतनुमा अंदाज़ में क़व्वाली की शक्ल में सुनना, दावे से कहता हूँ कि बयां को लफ्ज़ नहीं मिलेगें. जिबरिश करने को जी चाहेगा. नुसरत और रूमी, मानो दो रूह मिलकर एक हो गई हों. बस आप सुनते चले जाएँ और कहीं खोते चले जाए.

मैं लिखता चला जाऊं और आप इस गायक को सुनते चले जाएँ और सब सुध-बुध खो बैठे, ऐसा हो सकता है.सुनिए,"मेरा पिया घर आया....","पिया रे-पिया रे.....","सानु एक पल चैन...","तेरे बिन.....","प्यार नहीं करना...." "साया भी जब साथ छोड़ जाये....","साँसों की माला पे...."और न जाने ऐसे कितने गीत हैं, ग़ज़ल हैं, कव्वालियाँ है, दुनिया भर का संगीत खुद में समेटे हुए, इस गायक को यदि नहीं सुना हो सुनने निकलिए, हिंदी फिल्मों से, पंजाबी संगीत से, सूफी संगीत से, फ्यूजन से कहीं भी चले जाइए, यह गायक, नुसरत फतह अली भुट्टो, आपको मिल जायेगा, आपको मदहोश करने के लिए-आपको अध्यात्मिक शांति दिलाने के लिए.....हर जगह -हर रूप में मौजूद है नुसरत साहब. इन्हें आप किसी भी नामी म्यूजिक -शाप में "वर्ल्ड-म्यूजिक" की श्रेणी में ही पायेगें. 16 अगस्त १९९७ को जब नुसरत साहब ने दुनिया-ए-फानी को अलविदा कहा, विश्व-संगीत में एक गहरा शोक छा गया. पश्चिम ने शोक में डूबकर कहा, पाकिस्तान ने दुनिया को जो अनमोल रत्न दिया था, आज हम उसे खो बैठे हैं और उनके पूर्व वालों की जैसे सिसकियाँ ही नहीं टूट रहीं हो, उन्हें लगा जैसे उनके बीच से खुदा की आवाज़ ही चली गई है.

नुसरत साहब पर और बातें होंगीं पर फिलहाल बढ़ते हैं इस माह के फीचर्ड अल्बम की तरफ. अपने पाकिस्तानी अल्बम्स से भारत में धूम मचाने के बाद नुसरत साहब को जब बॉलीवुड में फिल्म का न्योता मिला तो उन्होंने शायर के मामले में अपनी पसंद साफ़ कर दी कि वो काम करेंगें तो सिर्फ जावेद अख्तर साहब के साथ. इसी जोड़ी ने एक बहतरीन अल्बम में भी एक साथ काम किया, जिसे शीर्षक दिया गया - "संगम", दो मुल्कों के दो बड़े फनकारों का संगम और क्या आश्चर्य जो इस अल्बम का एक एक गीत अपने आप में एक मिसाल बन जाये तो...

तो चलिए शुरुआत करते हैं "संगम" के सबसे हिट गीत "अफरीन अफरीन" से. क्या बोल लिखे हैं जावेद साहब ने और अपनी धुन और गायिकी से नुसरत साहब ने इस गीत को ऐसी रवानगी दी है कि गीत ख़तम होने का बाद भी इसका नशा नहीं टूटता. "आफरीन-आफरीन" सूफी कलाम में एक बड़ा मुकाम रखती है. इसे ऑडियो में सुनना एक आध्यात्मिक अनुभव से गुजरना होता है तो विजुअल में देखना एक आलौकिक अनुभव से गुजरना होता है. एक ही तर्ज़ के दो अनुभव, लिखने को शब्द नहीं मिलते हैं, कहने को कुछ बचता नहीं है. तो बस सुनते हैं हमारी फीचर्ड एल्बम संगम से ये पहला तराना -



साप्ताहिक आलेख - नीरज गुरु "बादल"



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार नीरज गुरु. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


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