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Thursday, April 25, 2013

कारवाँ सिने-संगीत का : 1933 की दो उल्लेखनीय फिल्में



भारतीय सिनेमा के सौ साल – 42

कारवाँ सिने-संगीत का

वाडिया मूवीटोन की फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ और हिमांशु राय की ‘कर्म’



भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। आज के अंक में सुजॉय जी 1933 में ‘वाडिया मूवीटोन’ के गठन और इसी संस्था द्वारा निर्मित फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ का ज़िक्र कर रहे हैं। इसके साथ ही देविका रानी और हिमांशु राय अभिनीत पहली ‘ऐंग्लो-इण्डियन’ को-प्रोडक्शन फ़िल्म ‘कर्म’ की चर्चा भी कर रहे हैं।

1933 की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही ‘वाडिया मूवीटोन’ का गठन। वाडिया भाइयों, जे. बी. एच. वाडिया और होमी वाडिया, ने इस कंपनी के ज़रिए स्टण्ट और ऐक्शन फ़िल्मों का दौर शुरु किया। दरअसल वाडिया भाइयों ने मूक फ़िल्मों के जौनर में ‘तूफ़ान मेल’ शीर्षक से एक लो-बजट थ्रिलर फ़िल्म बनाई थी, जिसे ख़ूब लोकप्रियता मिली थी। इसी सफलता से प्रेरित होकर इन दो भाइयों ने ‘वाडिया मूवीटोन’ का गठन किया और इस बैनर तले पहली सवाक फ़िल्म ‘लाल-ए-यमन’ 1933 में प्रदर्शित की। ऐक्शन फ़िल्मों में ज़्यादा गीतों की गुंजाइश नहीं होती है और इसी वजह से ‘वाडिया’ की फ़िल्मों में गीत-संगीत का पक्ष अन्य फ़िल्मों के मुक़ाबले कमज़ोर हुआ करता था। ज़बरदस्ती गीत डालने से थ्रिलर फ़िल्मों की रोचकता में कमी आती है, इस बात का वाडिया भाइयों को पूरा अहसास था, इसीलिए इस कंपनी ने बाद के वर्षों में संगीत-प्रधान लघु फ़िल्मों का अलग से निर्माण किया।
फिरोज दस्तूर 

इन लघु फ़िल्मों के ज़रिए कई संगीतज्ञों ने लोकप्रियता भी हासिल की, जिनमें शामिल थे अहमद जान थिरकवा, सखावत हुसैन ख़ान, हबीब ख़ान, मलिका पुखराज, बाल गंधर्व, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और फ़िरोज़ दस्तूर। दस्तूर ने पहली बार ‘लाल-ए-यमन’ में संगीतकार जोसेफ़ डेविड के निर्देशन में गीत गाये जिनमें शामिल थे “अब नहीं धरत धीर”, “जाओ सिधारो फ़तेह पाओ”, “खालिक तोरी नजरिया”, “मशहूर थे जहाँ में जो”, “तसवीर-ए-ग़म बना हूँ” और “तोरी हरदम परवर आस” आदि। फ़िल्म के संगीतकार मास्टर मोहम्मद ने इस फ़िल्म में एक सूफ़ी फ़कीर की भूमिका निभाने के अतिरिक्त “गाफ़िल बंदे कुछ सोच ज़रा” गीत भी गाया। अब हम आपको फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ से फिरोज दस्तूर का गाया गीत- ‘मशहूर थे जहाँ में...’ सुनवाते हैं।


फिल्म लाल-ए-यमन : ‘मशहूर थे जहाँ में...’ : फिरोज दस्तूर



अभिनेत्री सरदार अख़्तर अभिनीत पहली फ़िल्म 1933 में बनी, ‘ईद का चांद’ शीर्षक से ‘सरोज मूवीटोन’ के बैनर तले। पिछले वर्ष की तरह सुंदर दास भाटिया का संगीत ‘सरोज’ की फ़िल्मों में सुनने को मिला। संवाद व गीतकार के रूप में अब्बास अली और एम. एस. शम्स ने इस फ़िल्म में काम किया था। हरिश्चन्द्र बाली, जो ख़ुद एक संगीतकार थे, सरदार अख़्तर के साथ फ़िल्म ‘नक्श-ए-सुलेमानी’ में अभिनय किया। सुंदर दास के ही संगीत में ‘सरोज’ की एक और उल्लेखनीय फ़िल्में रही ‘रूप बसंत’ जिसके गीतकार थे मुन्शी ‘शम्स’। इन सभी फ़िल्मों में गुजराती नाट्य जगत से आये गायक अशरफ़ ख़ान ने कई गीत गाये जो लोगों को ख़ूब भाये।

देविका रानी और हिमांशु रॉय 
‘कर्म’ पहली भारतीय बोलती फ़िल्म थी जिसका प्रदर्शन इंग्लैण्ड में हुआ था। इसके अंग्रेज़ी संस्करण का शीर्षक था ‘फ़ेट’। देविका रानी और हिमांशु राय अभिनीत यह फ़िल्म एक ‘ऐंग्लो-इण्डियन’ को-प्रोडक्शन फ़िल्म थी जिसका प्रीमियर लंदन में 1933 के मई के महीने में हुआ था। इसका हिन्दी संस्करण 27 जनवरी, 1934 को बम्बई में रिलीज़ हुआ था। ‘कर्म’ के संगीतकार थे अर्नेस्ट ब्रॉदहर्स्ट, जिन्होंने देविका रानी से एक अंग्रेज़ी गीत “now the moon her light has shed” भी गवाया था। टैगोर ख़ानदान से ताल्लुक रखने वाली देविका रानी, जिन्हें ‘फ़र्स्ट लेडी ऑफ़ इण्डियन स्क्रीन’ की उपाधि दी जाती है, लंदन के ‘रॉयल अकादमी ऑफ़ आर्ट ऐण्ड म्युज़िक’ गई थीं पढ़ाई के सिलसिले में। वहाँ उनकी मुलाक़ात हिमांशु राय से हुई और उनसे शादी कर ली। 1929 की मूक फ़िल्म ‘प्रपांच पाश’ में देविका रानी एक ‘फ़ैशन डिज़ाइनर’ के रूप में काम किया, जिसके लिए दुनिया भर में उनके काम को सराहा गया। ‘प्रपांच पाश’ और ‘कर्म’ के बाद देविका और हिमांशु भारत चले आये और 1934 में गठन किया ‘बॉम्बे टॉकीज़’ का। इस बैनर तले बहुत सारी कामयाब फ़िल्मों का निर्माण हुआ, बहुत से कलाकारों (जिनमें अभिनेता, निर्देशक, गीतकार, संगीतकार शामिल हैं) को ब्रेक दिया जो आगे चलकर भारतीय सिनेमा के स्तंभ कलाकार बने। फ़िल्म-संगीत को भी एक नया आयाम देने का श्रेय ‘बॉम्बे टॉकीज़’ को दिया जा सकता है। ‘बॉम्बे टॉकीज़’ को पहली भारतीय ‘पब्लिक लिमिटेड “फ़िल्म” कंपनी’ होने का गौरव प्राप्त है। लीजिए, अब आप फिल्म ‘कर्म’ का एक दुर्लभ गीत सुनिए।


फिल्म कर्म : ‘मेरे हाथ में तेरा हाथ रहे...’ : संगीतकार - अर्नेस्ट ब्रॉदहर्स्ट




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की इसी शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें। 


शोध व आलेख सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Tuesday, March 15, 2011

उडी हवा में जाती है गाती चिड़िया....देविका रानी के अभिनय और स्वर की कहानी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 613/2010/313

हिंदी फ़िल्मों के शुरुआती दौर में हमारी समाज व्यवस्था कुछ इस तरह की थी कि अच्छे घरों के महिलाओं का इस क्षेत्र में आना असम्भव वाली बात थी। इस पुरुष शासित समाज में औरतों पर लगाये जाने वाले प्रतिबंधों में यह भी एक शामिल था। बावजूद इसके कुछ सशक्त और साहसी महिलाओं ने इस परम्परा के ख़िलाफ़ जाते हुए फ़िल्म जगत में क़दम रखा, अपना करीयर संवारा, और दूसरी महिलाओं के लिए इस राह पर चलना आसान बनाया। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इन दिनों चल रही लघु शृंखला 'कोमल है कमज़ोर नहीं' की आज तीसरी कड़ी में बातें एक ऐसी अदाकारा व निर्मात्री की जिन्हें First Lady of the Indian Screen कहा जाता है। कर्नल चौधरी की बेटी और कविगुरु रबीन्द्रनाथ ठाकुर की पर-भाँजी (grand niece) देविका रानी को समर्पित है आज का यह अंक। ३० और ४० के दशकों में देविका रानी ने अपनी अदाकारी और फ़िल्म निर्माण से पूरे हिंदुस्तान के लोगों का दिल जीत लिया। उनका जन्म आंध्र प्रदेश के वाल्टियर में ३० मार्च १९०७ में हुआ था। १९२० के दशक में वो लंदन चली गयीं जहाँ उन्होंने रॊयल अकादमी ऒफ़ आर्ट्स ऐण्ड म्युज़िक से आर्किटेक्चर की डिग्री प्राप्त की। वहीं उनकी मुलाक़ात हुई हिमांशु राय से जिनसे उन्होंने २२ वर्ष की आयु में विवाह कर लिया। देविका रानी की फ़िल्मों में एण्ट्री हुई सन् १९२९ में 'प्रपांच पाश' नामक फ़िल्म में, लेकिन बतौर अभिनेत्री नहीं बल्कि बतौर फ़ैशन डिज़ाइनर। इस फ़िल्म का पोस्ट-प्रोडक्शन जर्मनी में हुआ था। बतौर अभिनेत्री देविका रानी की पहली फ़िल्म थी १९३३ में बनीं 'कर्म', जिसके नायक थे ख़ुद हिमांशु राय। यह फ़िल्म अंग्रेज़ी में भी बनी। हिमांशु राय के साथ मिलकर देविका रानी ने स्थापना की 'बॊम्बे टाकीज़' की, जिसकी पहली फ़िल्म आयी 'जवानी की हवा', साल १९३५ में, जो एक मर्डर मिस्ट्री थी। फिर १९३६ में बनीं 'अछूत कन्या', जिसमें उनके साथ नायक के रूप में अभिनय किया अशोक कुमार ने। फ़िल्म बेहद कामयाब रही और देविका रानी - अशोक कुमार की 'ऒन-स्क्रीन' जोड़ी तैयार हो गई। इसी फ़िल्म का मशहूर गीत "मैं बन की चिड़िया" हम आपको 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा चुके हैं। 'अछूत कन्या' की कामयाबी के बाद इस जोड़ी द्वारा अभिनीत दो और कामयाब फ़िल्में आईं - 'जीवन नैया' और 'जन्मभूमि'

देविका रानी की संवेदनशील अभिनय और उनकी ख़ूबसूरती ने उनकी एक अलग पहचान बनाई फ़िल्म जगत में। उन्होंने १९३५ से लेकर १९४३ तक अभिनय किया। देविका रानी की अभिनय से सजी प्रचलित फ़िल्में हैं - कर्म, जवानी की हवा, जीवन नैय्या, अछूत कन्या, इज़्ज़त, सावित्री, जीवन प्रभात, निर्मला, वचन, और अंजान। १९४० में हिमांशु राय की मृत्यु हो जाने से 'बॊम्बे टाकीज़' की देख-रेख का सारा ज़िम्मा आ गया देविका रानी पर। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और एक से एक म्युज़िकल फ़िल्में बनाती चलीं जैसे कि 'बंधन', 'क़िस्मत', और 'झूला'। देविका रानी ने कई नये कलाकारों को भी खोज निकाला। उन्होंने ही मोहम्मद यूसुफ़ ख़ान को नैनिताल से बम्बई ला कर बना डाला दिलीप कुमार अपनी फ़िल्म 'ज्वार भाटा' में बतौर नायक ब्रेक देकर। १९४० से १९४५ तक 'बॊम्बे टाकीज़' का भार सम्भालने के बाद देविका रानी ने रशियन पेण्टर स्वेतोस्लाव रीरिच से शादी कर ली और बैंगलोर जाकर अपना घर बसा लिया, और फ़िल्मों को हमेशा के लिए कह दिया अलविदा। जीवन के अंतिम दिनों तक वो बैंगलोर में ही रहीं और ९ मार्च १९९४ को निकल पड़ीं अपनी अनंत महायात्रा पर। फ़िल्मों में महत्वपूर्ण योगदान के लिए देविका रानी को १९५८ में पद्मश्री और १९७० में दादा साहब फाल्के पुरस्कारों से भारत सरकार ने सम्मानित किया। आइए आज उनको सलाम करते हुए सुने फ़िल्म 'अछूत कन्या' का ही एक और गीत "उड़ी हवा में जाती है गाती चिड़िया ये राम"। आवाज़ देविका रानी की और संगीत सरस्वती देवी का। सरस्वती देवी का नाम भी प्रथम महिला संगीतकार के रूप में मशहूर है और उन्हीं को समर्पित होगा हमारा कल का अंक। तो लीजिए यह गीत सुनिए, और चलते चलते हम यही कहना चाहेंगे कि देविका रानी ने महिलाओं के लिए फ़िल्मों का द्वार खोल दिया, इससे उनकी प्रगतिशील विचारधारा का पता चलता है। उनका योगदान हमेशा सुनहरे अक्षरों में हमारी फ़िल्म इतिहास में लिखा रहेगा। 'आवाज़' की तरफ़ से देविका रानी को सलाम!!!



क्या आप जानते हैं...
कि १९३३-३४ में हिमांशु राय ने देविका रानी को संगीत सिखाने के लिए सरस्वती देवी को नियुक्त किया था, जिन्हें वो खोज लाये थे लखनऊ में आयोजित एक संगीत समारोह से।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 04/शृंखला 12
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - आज की पहेली आज के और अगले गीत की संगीतकारा सरस्वती देवी के नाम है, देखते हैं इनके बारे में आप कितनी जानकारी रखते हैं.

सवाल १ - संगीतकारा सरस्वती देवी का असली नाम क्या था - ३ अंक
सवाल २ - उनकी बतौर संगीतकारा पहली फिल्म कौन सी थी - १ अंक
सवाल ३ - सरस्वती देवी ने फिल्मों में पहली बार प्ले बैक किया था, किस अभिनेत्री के लिए था ये - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर से टाई है मामला...शरद जी भी हैं मैदान में अब...शरद जी शक है इस गीत को लेकर, पर लगता है कि आप ठीक हैं, गीतकार हसरत ही हैं

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, December 19, 2010

मैं बन की चिड़िया बन के.....ये गीत है उन दिनों का जब भारतीय रुपहले पर्दे पर प्रेम ने पहली करवट ली थी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 551/2010/251

मस्कार दोस्तों! स्वागत है बहुत बहुत आप सभी का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस सुरीली महफ़िल में। पिछली कड़ी के साथ ही पिछले बीस अंकों से चली आ रही लघु शृंखला 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' सम्पन्न हो गई, और आज से एक नई लघु शृंखला का आग़ाज़ हम कर रहे हैं। और यहाँ पर आपको इस बात की याद दिला दूँ कि यह साल २०१० की आख़िरी लघु शृंखला होगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। जी हाँ, देखते ही देखते यह साल भी अब विदाई के मूड में आ गया है। तो कहिए साल के आख़िरी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' लघु शृंखला को कैसे यादगार बनाया जाए? क्योंकि साल के इन आख़िरी कुछ दिनों में हम सभी छुट्टी के मूड में होते हैं, हमारा मिज़ाज हल्का फुल्का होता है, मौसम भी बड़ा ख़ुशरंग होता है, इसलिए हमने सोचा कि इस लघु शृंखला को कुछ बेहद सुरीले प्यार भरे युगल गीतों से सजायी जाये। जब से फ़िल्म संगीत की शुरुआत हुई है, तभी से प्यार भरे युगल गीतों का भी रिवाज़ चला आ रहा है, और उस ज़माने से लेकर आज तक ये प्रेम गीत ना केवल फ़िल्मों की शान हैं, बल्कि फ़िल्म के बाहर भी सुनें तो एक अलग ही अनुभूति प्रदान करते हैं। और जो लोग प्यार करते हैं, उनके लिए तो जैसे दिल के तराने बन जाया करते हैं ऐसे गीत। तो आइए आज से अगले दस अंकों में हम सुनें ३० के दशक से लेकर ८० के दशक तक में बनने वाली कुछ बेहद लोकप्रिय फ़िल्मी युगल रचनाएँ, जिन्हें हमने आज तक अपने सीने से लगाये रखा है। वैसे तो इनके अलावा भी बेशुमार सुमधुर युगल गीत हैं, बस युं समझ लीजिए कि आँखें बंद करके समुंदर से एक मुट्ठी मोतियाँ हम निकाल लाये हैं, और आँखें खोलने पर ही देखा कि ये मोती कौन कौन से हैं। पेश-ए-ख़िदमत है साल २०१० के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की अंतिम लघु शृंखला 'एक मैं और एक तू'। जैसा कि हमने कहा कि हम युगल गीतों का यह सफ़र ३० के दशक से शुरु करेंगे, तो फिर ऐसे में फ़िल्म 'अछूत कन्या' के उस यादगार गीत से ही क्यों ना शुभारम्भ की जाए! "मैं बन की चिड़िया बनके बन बन बोलूँ रे, मैं बन का पंछी बनके संग संग डोलूँ रे"। अशोक कुमार और देविका रानी के गाये इस गीत का उल्लेख आज भी कई जगहों पर चल पड़ता है। और इस गीत को सुनते ही आज भी पेड़ की टहनी पर बैठीं देविका रानी और उनके पीछे खड़े दादामुनि अशोक कुमार का वह दृष्य जैसे आँखों के सामने आ जाता है।

'अछूत कन्या' १९३६ की फ़िल्म थी जो बनी थी 'बॊम्बे टॊकीज़' के बैनर तले। संगीतकार थीं सरस्वती देवी। यह वह दौर था जब गांधीजी ने अस्पृश्यता को दूर करने के लिए एक मिशन चला रखी थी। निरंजन पाल की लिखी कहानी पर आधारित इस फ़िल्म में भी अछूतप्रथा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाया गया था। पंडित नेहरु और सरोजिनी नायडू 'बॊम्बे टॊकीज़' में जाकर यह फ़िल्म देखी थी। 'अछूत कन्या' पहली बोलती फ़िल्म है जिसके गानें सर्वसाधारण में बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हुए। सिर्फ़ हमारे देश में ही नहीं, बल्कि इसके गीतों के ग्रामोफ़ोन रेकॊर्ड्स इंगलैण्ड तक भेजे गये। कहा जाता है कि सरस्वती देवी घण्टों तक अशोक कुमार और देविका रानी को गाना सिखाती थीं, ठीक वैसे जैसे कोई स्कूल टीचर बच्चों को नर्सरी राइम सिखाती है। उस ज़मानें में प्लेबैक का चलन शुरु नहीं हुआ था, इसलिए अभिनेता अशोक कुमार और देविका रानी को अपने गानें ख़ुद ही गाने थे। ऐसे में संगीतकार के लिए बहुत मुश्किल हुआ करता था कम्पोज़ करना और जहाँ तक हो सके वो धुनें ऐसी बनाते थे जो अभिनेता आसानी से गा सके। इसलिए बहुत ज़्यादा उन्नत कम्पोज़िशन करना सम्भव नहीं होता था। फिर भी आज का प्रस्तुत गीत उस ज़माने में ऐसी लोकप्रियता हासिल की कि उससे पहले किसी फ़िल्मी गीत ने नहीं की थी। उस समय के प्रचलित नाट्य संगीत और शास्त्रीय संगीत के बंधनों से बाहर निकलकर सरस्वती देवी ने हल्के फुल्के अंदाज़ में इस फ़िल्म के गानें बनाये जो बहुत सराहे गये। इस फ़िल्म के संगीत की एक और महत्वपूर्ण बात आपको बताना चाहूँगा। फ़िल्म में एक गीत है "कित गये हो खेवनहार"। कहा जाता है कि इस गीत को सरस्वती देवी की बहन चन्द्रप्रभा द्वारा गाया जाना था जो उस फ़िल्म में अभिनय कर रही थीं। लेकिन जिस दिन इस गाने की शूटिंग् थी, उस दिन उनका गला ख़राब हो गया और गाने की हालत में नहीं थीं। ऐसे में सरस्वती देवी ने पर्दे के पीछे खड़े होकर ख़ुद गीत को गाया जब कि चन्द्रप्रभा ने केवल होंठ हिलाये। इस तरह से सरस्वती देवी ने प्लेबैक की नींव रखी। वैसे पहले प्लेबैक का श्रेय न्यु थिएटर्स के आर. सी. बोराल को जाता है जिन्होंने १९३५ की फ़िल्म 'धूप-छाँव' में इसकी शुरुआत की थी, लेकिन उस फ़िल्म में उस अभिनेता ने अपने लिए ही प्लेबैक किया। "प्योर प्लेबैक" की बात करे तो सरस्वती देवी ने अपनी बहन चन्द्रप्रभा के लिए प्लेबैक कर 'प्लेबैक' के असली अर्थ को साकार किया। तो लीजिए दोस्तों, आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर प्रस्तुत है हिंदी सिने संगीत का ना केवल पहला मशहूर युगल गीत, बल्कि यु कहें कि पहला मशहूर गीत। अशोक कुमार और देविका रानी के साथ साथ सरस्वती देवी को भी 'आवाज़' का सलाम।



क्या आप जानते हैं...
कि सरस्वती देवी का असली नाम था ख़ुरशीद मंचशेर मिनोचा होमजी (Khursheed Manchersher Minocher Homji)। उस समय पारसी महिलाओं को फ़िल्म और संगीत में जाने की अनुमति नहीं थी। इसलिए उन्हें अपना नाम बदल कर इस क्षेत्र में उतरना पड़ा।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 2/शृंखला 06
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -इस युगल गीत की गायिका हैं नूरजहाँ.

सवाल १ - गायक बताएं - १ अंक
सवाल २ - एक अमर प्रेम कहानी पर आधारित थी फिल्म, नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - किस संगीतकार की अंतिम फिल्म थी ये - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर पहले सवाल के साथ शरद जी ने बढ़त बनाई है, पर क्या वो पिछली बार की तरह इस बार भी श्याम जी से पिछड़ जायेगें आगे चल कर या वो और अमित जी मिलकर ४ बार के विजेता श्याम जी को पछाड पायेंगें, देखना दिलचस्प होगा, बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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