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Saturday, June 25, 2016

BAATON BAATON MEIN - 20: INTERVIEW OF SHAMSHAD BEGUM (PART-3)

बातों बातों में - 20

पार्श्वगायिका शमशाद बेगम से गजेन्द्र खन्ना की बातचीत
भाग-3


"मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि अल्लाह ने मुझे मौक़ा दिया कि दूसरों की मदद करूँ, बिना किसी फ़ायदे के "  




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज इस स्तंभ में हम आपके लिए लेकर आए हैं फ़िल्म जगत की सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम से गजेन्द्र खन्ना की बातचीत। गजेन्द्र खन्ना के वेबसाइट www.shamshadbegum.com पर यह साक्षात्कार अंग्रेज़ी में पोस्ट हुआ था जनवरी 2012 में। गजेन्द्र जी की अनुमति से इस साक्षात्कार को हिन्दी में अनुवाद कर हम ’रेडियो प्लेबैक इन्डिया’ पर प्रस्तुत कर रहे हैं। पिछले महीने हमने पेश किए थे इस साक्षात्कार का दूसरा भाग; आज प्रस्तुत है इसका तीसरा और अन्तिम भाग।

    


दोस्तों, पिछली कड़ी में शमशाद जी ने अपनी शुरुआती फ़िल्म - ’तक़दीर’ और ’पन्ना’ के बारे में विस्तार से हमें बताया। साथ ही उमराओ ज़िआ बेगम और ज़ोहराबाई अम्बालेवाली से अपनी दोस्ती की बातें बताईं। और फिर कुछ ऐसे संगीतकारों को याद किया जो आज लगभग भूला दिए गए हैं जैसे कि पंडित गोबिन्दराम, पंडित अमरनाथ, हुस्नलाल-भगतराम, बुलो सी. रानी, ग़ुलाम मोहम्मद, फ़िरोज़ निज़ामी, उस्ताद झंडे ख़ाँ, विनोद, ज्ञान दत्त, ख़ुर्शीद अनवर और ख़ान मस्ताना। आइए अब बातचीत का सिलसिला वहीं से आगे बढ़ाते हैं।


शमशाद जी, आपने नौशाद साहब के लिए भी बहुत सारे गाने गाए हैं।

जी हाँ, ’शाहजहाँ’ के गाने हिट होने के बाद मैं उनकी मेन सिंगर बन गई थी।

उनके साथ बहुत से रेकॉर्डिंग् आपने किए हैं, कोई ख़ास वाकिया याद है उनसे जुड़ा?

जी हाँ, एक बताती हूँ। तलत (महमूद) उस वक़्त बम्बई में नए नए आए थे। वो कुछ म्युज़िक डिरेक्टरों के लिए गा चुके थे पर अभी तक टॉप पर नहीं पहुँचे थे। नौशाद साहब ने उन्हें बुलाया मेरे साथ "मिलते ही आँखें दिल हुआ दीवाना किसी का" गाने के लिए। रिहर्सलें हुईं। तलत की आवाज़ बहुत नर्म थी और उनकी एक काँपती हुई आवाज़ थी जो उनकी गायिकी की ख़ासियत थी। फ़ाइनल टेक देते वक़्त तलत नर्वस हो गए। उस वक़्त नौशाद टॉप कम्पोज़र थे और मैं टॉप सिंगर। शायद यही बात उनके दिमाग़ में चल रही होगी जिस वजह से उनकी आवाज़ और ज़्यादा काँपने लगी टेक दर टेक। नौशाद साहब को यह बात पसन्द नहीं आ रही थी और रेकॉर्डिंग् में देर होती जा रही थी। एक वक़्त तो नौशाद साहब ने यह भी सोचा कि तलत साहब को हटा दिया जाए अन्द मुझसे इस बारे में कहा। मैंने उन्हें समझाया कि तलत की आवाज़ बहुत अच्छी है पर वो ज़रा नर्वस हो गए हैं, हमें उनका हौसला अफ़ज़ाई करना चाहिए और तभी रेकॉर्डिंग् समय पर हो पाएगी। मैंने नौशाद साहब को उनका हौसला बढ़ाने के लिए कहा। मैंने उनसे कहा कि वो रेकॉर्डिंग् रूम में जाएँ और तलत को मुस्कुराते चेहरे से ’थम्प्स-अप’ दिखाए चाहे वो कैसे भी गाएँ! ऐसा करने पर उन्हें उनका फ़ाइनल टेक जल्दी ही मिल जाएगा। जैसे ही नौशाद साहब अन्दर चले गए, मैंने तलत से कहा कि आपकी आवाज़ बहुत अच्छी है, बस आप ज़रा नर्वस हो रहे हैं। इस तरह से नर्वस होकर तो आप अपन अकरीयर बिगाड़ लेंगे। कुछ समय के लिए यह भूल जाइए कि मैं और नौशाद बड़े फ़नकार हैं। दिल में रब का नाम लीजिए और गाना शुरु कीजिए, सब ठीक हो जाएगा। हमें आप अपने कलीग मानिए और अपना पूरा जी-जान लगा दीजिए इस गीत में। अरे अगर मरना ही है तो डर के क्यों मरो, लड़ के मरो। ऐसा कहने पर उन्हें हिम्मत मिली और पहला टेक पहले से काफ़ी बेहतर हुआ। नौशाद के ’थम्प्स-अप’ को देख कर उन्हें और हिम्मत मिली और फ़ाइनली तीसरा टेक ओ.के. हो गया।


यह बहुत ही अच्छा क़िस्सा आपने बताया। आप वैसे भी हमेशा सब की मदद की है। मैंने कहीं पढ़ा था कि आपके नुसखे गायक मुकेश के भी काम आए?

जी हाँ, एक वक़्त ऐसा था जब मुकेश की तबीयत ठीक नहीं थी जिस वजह से उनकी रेकॉर्डिंग्स कैन्सल हो रही
थी एक के बाद एक। मुझे अफ़सोस हो रहा था कि उनका माली नुकसान हो रहा है, उस वक़्त वो स्ट्रगल ही कर रहे थे। एक दिन मेरी उनके साथ रेकॉर्डिंग् थी और मैंने उ्नसे इस बारे में बात की। शुरु शुरु में तो वो हिचकिचा रहे थे मुझे बताने से, लेकिन फिर बोले। उसकी नाभी खिसक रही थी। मैंने पूछा कि क्या सिर्फ़ यही बात है? इसका हल आपके घर के औरतों को ज़रूर पता होगा। औरतों में यह आम बीमारी है। मैंने उनसे कहा, हार पिरोने वाला सूत सात दफ़ा इकट्ठा करो और पैर के बड़े अंगूठे से लूज़-टाइट बाँध दो। यह नुसखा उनके काम आ गई। और उन्होंने मुझे इस इलाज के लिए शुक्रिया भी कहा। मैं हमेशा लोगों की मदद करना चाहती थी। मैंने चित्रगुप्त जी के करीयर को भी दुबारा उपर लाना चाहा उनके लिए स्टण्ट फ़िल्मों में गा गा कर जैसे कि ’सिंदबाद जहाज़ी’, हालाँकि लोगों ने मुझे चेतावनी दी थी कि ऐसा करना मेरे लिए अच्छा नहीं होगा क्योंकि मेन-स्ट्रीम सिंगर्स के लिए ऐसी फ़िल्मों में गाना करीयर के लिए ठीक नहीं। इस तरह की फ़िल्मों में दूसरी स्तर की गायिकाएँ गाती हैं। नाशाद ने भी बुरा वक़्त देखा है। मैंने उनके लिए ’दादा’ में गाया था। 1953 में मैंने उनके लिए ’नगमा’ फ़िल्म के लिए बूकिंग् दी थी जिसने उनके करीयर को बढ़ावा दिया। आज तक वो मेरे उस गीत "काहे जादू किया जादूगर बालमा" के लिए याद किए जाते हैं!

आप ने राज कपूर की भी मदद की थी उनकी पहली फ़िल्म ’आग’ में गीत गा कर?

जी हाँ, वो मेरे पास आए थे और कहने लगे कि मैं पृथ्वीराज कपूर का बेटा हूँ, मैंने उनकी मदद की। उन्होंने मेरा
शुक्रिया अदा किया, लेकिन बाद में बहुत सालों के बाद जब मिले तो अफ़सोस ज़ाहिर की और माफ़ी भी माँगी कि उन्होंने मेरे लिए कुछ कर नहीं सके। मैंने मदन मोहन, सी. रामचन्द्र, ओ. पी. नय्यर और भी कई नए नए संगीतकारों की शुरुआती फ़िल्मों में गाया। इन संगीतकारों के इन शुरुआती गीतों ने उन्हें इंडस्ट्री में स्थापित किया। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि अल्लाह ने मुझे मौक़ा दिया कि दूसरों की मदद करूँ, बिना किसी ख़ुद के फ़ायदे के।

किशोर कुमार एक और ऐसे गायक थे जो आपके एहसानमन्द थे।

जी हाँ, फ़िल्म ’बहार’ में मेरे साथ गाते हुए उनको अपना मेजर ब्रेक मिला था, और वहीं से उनके करीयर ने कामयाबी की सीढी पकड़नी शुरु की। उसने दरियादिली से मेरा शुक्रिया अदा किया क्योंकि मेरे साथ गाने की वजह से उन्हें पहचान मिली।


आप महबूब ख़ान के क़रीब थीं और ’मदर इण्डिया’ के गाने भी बहुत लोकप्रिय हुए थे।

यहाँ उषा रात्रा जी बताती हैं....

जी हाँ, हम महबूब साहब के एहसानमन्द हैं। यह ज़्यादा लोगों को मालूम नहीं कि उन्होंने मम्मी के करीयर को
एक बार नहीं बल्कि दो बार बढ़ावा दिया था। पहली बार की बात तो मम्मी बता चुकी हैं। मेरे डैडी का 1955 में अचानक इन्तकाल हो गया, जिससे मेरी मम्मी को बहुत बड़ा शौक लगा।  वो हमेशा रोती रहती थीं, अल्लाह को याद करती रहती थीं। लगभग एक साल तक उन्होंने कोई गाना नहीं गाया। उस समय महबूब ख़ान ’मदर इण्डिया’ पर काम कर रहे थे। उनकी इच्छा थी कि बस मम्मी ही उनकी फ़िल्म के लिए गाए। नौशाद साहब ने उन्हें बताया कि मम्मी तो आजकल गा नहीं रही हैं, फिर भी महबूब साहब ने नौशाद साहब से कहा कि आप उनसे दरख्वास्त कीजिए कि वो गाने के लिए तैयार हो जाएँ। लेकिन मम्मी ने नौशाद साहब को ना कह दिया। उस पर नौशाद साहब ने कहा कि अगर आप नहीं चलेंगी तो मैं आपको ज़बरदस्ती उठा ले जाऊँगा।


आगे की दासतान शमशाद जी बताती हैं...

उन्होंने कहा, जब मेरे हँसने वाले गाने गाए तो क्या आपको कभी दुख नहीं था? आप एक उम्दा आर्टिस्ट हो। आप फ़ीलिंग्स बहुत अच्छी तरह से माइक के सामने गा सकती हो चाहे आपके अन्दर जो भी फ़ीलिंग्स चल रही हों! उनके लिए मेरे दिल में बहुत इज़्ज़त है और आख़िर में कहा कि मैं आपको निराश नहीं करूँगी। रिहर्सलें शुरु हुईं। पहला गाना जो रेकॉर्ड हुआ, वह था "होली आई रे कन्हाई" जो एक ही टेक में ओ.के. हो गई। मुझे अब तक याद है कि "पी के घर" गीत के रेकॉर्डिंग् के वक़्त वहाँ मौजूद सभी आर्टिस्ट्स रो रहे थे।

आप भी रो रही थीं?

(हँसते हुए) नहीं, मैं रोती तो टेक कैसे होता? इस गीत के बाद भी मेरे बहुत से हिट गीत आए, और काम करते करते धीरे धीरे मैं अपने वालिद की मौत के ग़म से बाहर निकली।

आपने मद्रास के कई स्टुडियोज़ के लिए भी बहुत गीत गाई हैं? उन लोगों के साथ भी आपका बहुत अच्छा रिश्ता बन गया था।

जी हाँ, वो लोग मुझे बूक करते थे और मैं 15 दिनों के लिए मद्रास जाया करती थी रेकॉर्डिंग्स के लिए। उन दिनों में होटल से स्टुडियो, और वापस स्टुडियो से होटल, लगातार करती रहती थी। रात के दस बजे होटल वापस लौटती थी, फिर सुबह उठ कर वापस स्टुडियो के लिए निकल जाती। इस वजह से मद्रास शहर को देखने का ज़्यादा मौक़ा नहीं मिला। लेकिन वहाँ के लोगों ने मेरे काम की बहुत तारीफ़ की।

फ़िल्म ’आन’ के तमिल वर्ज़न में भी आपने गाया था?

जी हाँ, लेकिन अफ़सोस कि मुझे मालूम नहीं वो मौजूद हैं भी या नहीं!

मुझे भी वो कहीं पर नहीं मिले। हमें उम्मीद है कि इस साक्षात्कार को पढ़ने वाले पाठकों में से कोई पाठक उन्हें ढूंढ़ने में कारगर साबित होंगे। शमशाद जी, यह वाक़ई हैरान कर देने वाली बात है कि आप इतनी बड़ी फ़नकार होते हुए भी इतनी आमफ़हम हैं, इतनी ज़मीन पर हैं। 

जी हाँ, मेरी पैदाइश ही ऐसी है। जैसा कि मैंने कहा था कबीर वाली बात कि ्ना काहु संग दोस्ती ना काहु संग बैर। मेरे लिए यह जुमला काम कर गई।


यहाँ उषा रात्रा जी बताती हैं...

जी हाँ, मम्मी ने कभी रेकॉर्डिंग् कैन्सल नहीं की। मुझे याद है एक बार उन्हें 102 डिग्री बुखार था और फिर भी
ज़िद करने लगी कि रेकॉर्डिंग् पे जाएगी। मैंने पूछा कि ऐसी क्या मजबूरी है ऐसी हालत में रेकॉर्डिंग् पे जाने की? क्या आपको पैसों की ज़रूरत है? तो वो हँसने लगी और कहा कि बेटा, मैं वहाँ म्युज़िशियनों के लिए जा रही हूँ। जब रेकॉर्डिंग् कैन्सल हो जाती है तो उन्हें ख़ाली हाथ घर लौटना पड़ता है और भूखे पेट भी कई दफ़ा रहने पड़ते हैं। उनके दिल में मेरे लिए बहुत इज़्ज़त है और मेरे रेकॉर्डिंग् पर बजा कर उन्हें बहुत ख़ुशी मिलती है। वो कहते कि अगर आज वो आ रही हैं तो हमें भी आज खाना मिलेगा। उन लोगों ने मुझे ऐसी इज़्ज़त दी है कि मैं उन्हें निराश या तकलीफ़ नहीं पहुँचा सकती। इसलिए मैं हमेशा रेकॉर्डिंग् पर जाती हूँ, यह ज़रूरी नहीं कि मैं क्या फ़ील कर रही हूँ। इस तरह की इंसान हैं ये। इन्होंने हमेशा सादगी भरी ज़िन्दगी जी है और पूरे समर्पण के साथ काम किया है।

इसमें कोई शक़ नहीं। मैंने कहीं पढ़ा है कि एक बार सी. रामचन्द्र जी के साथ एक रेकॉर्डिंग् पर किसी ग़लतफ़हमी की वजह से 1951 में आपने गाने की किताब को बन्द करके स्टुडियो से निकल गई थीं और कभी उनके पास वापस न आने का इरादा बनाकर। क्या यह सच है?

जी नहीं, यही किसी का ख़याली पुलाव है। ऐसी कोई बात नहीं हुई थी। जब भी उन्होंने मुझे बुलाया, मैं गई उनके लिए गाने। प्रोड्युसर्स ही हमारी बूकिंग्स किया करते थे। ज़्यादातर जगहों पर कम्पोज़र के पास सिंगर चुनने का ज़्यादा हक़ नहीं होता था। 50 के दशक के दूसरे भाग में भी मैं उनके लिए गा रही थी। उनके गीतों की लिस्ट पर आप ग़ौर करेंगे तो इस बात का पता चलेगा आपको। अफ़सोस कि उस वक़्त उनका करीयर ढलान पर था। मैंने 1970 में अपनी शो पर आने का दावत भी उन्हें दिया था। वो मुझे बहुत इज़्ज़त देते थे और आभारी थे।

जी हाँ, मैंने उस शो की तसवीरें देखी हैं। और उसी शो में आपकी तसवीरें पहली बार प्रकाशित हुई थीं, है ना?

जी हाँ, 1970 के आसपास मैंने दो शो किए थे और उनकी पब्लिसिटी के लिए मुझे एक फ़ोटोशूट करना पड़ा था। आप मेरी जिस तसवीर को लगभग सभी आर्टिकल्स में देखते हैं, वह ’माधुरी’ मैगज़ीन के दफ़्तर में खींची गई थी। इससे जुड़ा एक मज़ेदार क़िस्सा बताती हूँ। मैं उसी फ़ोटो के शूट के लिए जा रही थी। बिल्डिंग् पर पहुँचकर मैं अपनी बेटी के साथ लिफ़्ट में घुसी और कुछ दूसरे लोग भी थे लिफ़्ट में। एक लड़की जो एक जर्नलिस्ट थी, वो किसी को बता रही थी कि वो कितनी ख़ुश है कि आज आख़िरकार उसे शमशाद बेगम को देखने का मौका मिलेगा। वहाँ किसी ने मुझे नहीं पहचाना क्योंकि मेरी कोई तसवीर नहीं थी अब तक। वो बता रही थी कि अगले कुछ ही मिनटों में वो मुझे सामने से देख सकेगी और मैं वहाँ उसकी बगल में ही खड़ी थी और उसे नहीं मालूम!


जो लोग उस शो में मौजूद थे, वो आज भी याद करते हैं कि किस तरह से आपने गुज़रे ज़माने के उन अनमोल नग़मों को गाया था और आपकी आवाज़ में क्या चमक थी तब भी। आपने गाना छोड़ क्यों दिया शमशाद जी?


जिस तरह से उन दिनों रेकॉर्डिंग्स हो रही थी, मैं उससे ख़ुश नहीं थी। मैं कभी काम माँगने के लिए लोगों के पीछे-पीछे नहीं घूमी। यह मेरी आदत नहीं थी। इसलिए धीरे धीरे मेरी बूकिंग् कम होने लगी बावजूद हिट गीत देने के। मैंने एक हिट गीत दी। उससे पहले अगर मुझे 20 गीत मिल रहे होते तो अचानक उस हिट गीत के बाद मुझे 10 गीत मिलने लगे, और इस तरह से कम होते गए। मैं इस बारे में कुछ समय तक सोचती रही। मेरी बेटी की शादी भी हो चुकी थी तब तक और मैं अपने बेटी-दामाद के साथ पूरे हिन्दुस्तान में घूमने लगी क्योंकि मेरा दामाद फ़ौज (आर्मी) में था। मैं हमेशा फ़न के लिए गाती थी, ना कि पैसों के लिए। मैं बहुत सादा क़िस्म की ज़िन्दगी जीती थी। सिवाय खाने और कपड़ों के मेरा कोई और खर्चें नहीं था। पैसों का मैं क्या करती? मामूली लत्थे की सलवार-कमीज़ पहनती थी उस ज़माने में भी। तीन-चार ख़रीद लिया तो साल भर चल जाते। अब वक़्त बदल गया है। सारे पुराने कम्पोज़र्स चले गए या पीछे रह गए, धुंधले हो गए। और इस वजह से भी मेरे अन्दर रेकॉर्डिंग् की वह जोश कम हो गई थी। इसलिए मैं वो सब कुछ छोड़ कर अपनी बेटी के परिवार में शामिल होना ही ठीक समझा। फिर मैं इनके पोस्टिंग के साथ-साथ घूम रही थी, हिन्दुस्तान के बाहर भी रही। मेरी बेटी और दामाद ने मेरा बहुत अच्छे से ख़याल रखा है। मैं कहूँगी कि हर किसी को उषा जैसी बेटी और योगराज जैसा दामाद मिले।

यह किस वक़्त की बात है?

यह कोई 1971 की बात होगी; मुझे याद है कि यह उन दो शोज़ के बाद के वक़्त की बात है। हालाँकि पहले के रेकॉर्डेड गाने उसके बाद भी रिलीज़ होते रहे।

जहाँ तक मुझे पता है आपके आख़िरी गीतों में से थे 1981 की फ़िल्म ’गंगा माँग रही बलिदान’ के गाने जो आपने प्रेम धवन जी के लिए गाए थे। क्या यह फ़िल्म बहुत से रिलीज़ हुई (लगभग दस साल बाद) या फिर आपने 1981 में ही इन्हें गाया था?

ये मेरे आख़िरी गीतों में से होंगे जैसा कि आपने कहा। मुझे वाक़ई अब याद नहीं कि मैंने इन्हें कब गाया था। मैं हमेशा सफ़र पर रहती थी परिवार के साथ। यह संभव है कि कभी मैंने प्रेम धवन के लिए ये गीत गाए होंगे जिनके साथ मैंने पहले बहुत काम किया हुआ है। अब इस उम्र में मुझे 100% सही से नहीं कह सकती कि ये गानें मैंने कब रेकॉर्ड करवाए थे।

(इन गीतों के फ़िल्मांकन में जुनियर महमूद की उम्र को देखते हुए यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह देर से प्रदर्शित हुई फ़िल्म होगी)

शमशाद जी, मैं किन शब्दों में आपका शुक्रिया अदा करूँ समझ नहीं आ रहा, पिछले साढ़े छह घंटों से आप इस एक कुर्सी पर बैठी हुईं हमसे बात कर रही हैं। आपसे विदा लेने से पहले एक आख़िरी सवाल पूछना चाहता हूँ जो आपने सभी चाहने वाले पूछना चाहते होंगे शायद, और वह यह कि आपको अपने गाए हुए गीतों में से सबसे पसन्दीदा गाने कौन कौन से हैं?

माँ को सभी बच्चे प्यारे होते हैं! मुझे हर एक गीत गाने में उतना ही मज़ा आया। हर एक गीत का अपना अलग तजुर्बा था और मैं हर गीत को बराबर मानती हूँ। मेरे कई अच्छे गाने ज़्यादा नहीं चले और कई बन्द भी हो गए। लेकिन मैं हर एक गीत से साथ पूरा इंसाफ़ करने की कोशिश करती थी।

और बहुत से गाने ऐसे हैं जिन्हें पब्लिक ने ख़ूब गुनगुनाया, ख़ूब दाद दी। किन किन गीतों के लिए आपको पब्लिक से बहुत ज़्यादा दाद मिली?

अल्लाह का करम है कि मेरी झोली में बहुत सारी हिट गीत दिए हैं और उन गीतों की वजह से आज तक लोगों ने मुझे याद रखा है। उनके रीमिक्स वर्ज़न आज की पीढ़ी को भी नचा रही है। मेरे गीत जैसे कि "एक तेरा सहारा", "छोड़ बाबुल का घर", "सावन के नज़ारे हैं" सदाबहार हैं। मुझे याद है "छोड़ बाबुल का घर" मेरी बेटी की विदाई के मौक़े पर बैण्ड वाले बजा रहे थे। मुझे रोना आ रहा था और तब मेरा ही गाया यह गीत बजने लगा मेरे दिल को बहलाने के लिए।

जी हाँ, ये गीत अब तक याद किए जाते हैं, सुने जाते हैं। मैंने सुना है कि आपको बहुत जल्द Gr8 Women Achievers award function में कोई पुरस्कार मिलने वाला है?

जी हाँ, मुझे बहुत ख़ुशी है कि इस उम्र में आने बाद लोग मुझे याद कर रहे हैं। यह मेरे फ़ैन्स के प्यार का ही नतीजा है और मेरे काम का सच्चा पुरस्कार आज जाकर मुझे मिल रहा है।

यहाँ उषा जी बताती हैं....

जी हाँ, देर से ही सही पर आज जो इन्हें सम्मान मिल रहा है, उससे हम बहुत ख़ुश हैं। जब इन्हें हम पद्मभूषण
पुरस्कार ग्रहण करवाने दिल्ली ले गए थे तब ये बहुत ख़ुश थीं और बहुत सुन्दर तरीके से इसे प्राप्त किया। पर जैसी उनकी प्रोफ़ेशनल आदत थी कि रेकॉर्डिंग् स्टुडियो से सीधे घर चली आती थी, वहाँ भी पुरस्कार लेने के बाद वापस चले आने के लिए अधीर हो उठीं। वहाँ बहुत से लोग आए उन्हें बधाई देने के लिए। गुरशरण कौर (प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह की पत्नी) बहुत अच्छे से हमसे मिलीं। अक्षय कुमार और ऐश्वर्या राय को भी पद्म पुरस्कार मिला था, वो दोनों आए मम्मी से आशिर्वाद लेने। एक मज़ेदार क़िस्सा भी उस पार्टी में आगे चलकर। मम्मी को फ़िल्में देखने का ज़्यादा शौक़ नहीं था। अगर आप ’मुग़ल-ए-आज़म’ या ’मदर इण्डिया’ के प्रीमियर की बात करें तो उसमें उन फ़िल्मों से जुड़े सभी लोग शामिल थे एक मम्मी को छोड़ कर। जया बच्चन जी उन्हें बधाई देने के लिए आए और कहा कि मैं आपकी बहुत बड़ी फ़ैन हूँ, जिसके जवाब में मम्मी ने फ़ौरन कहा कि मैं भी आपकी बड़ी फ़ैन हूँ। और यह मम्मी दिल से और ईमानदारी से बोल रही थीं। मम्मी जो आम तौर पर फ़िल्में नहीं देखती, जया जी की अदाकारी की वजह से ’ख़ामोशी’ पूरे तीन बार देखी थी।

शमशाद जी ने गर्व के साथ मुझे अपना ’भारत भूषण’ पुरस्कार दिखाया जो ड्रॉविंग् रूम में रखा हुआ था। उन्होंने बताया कि उन्हें कितनी ख़ुशी हुई थी इसे ग्रहण करते हुए क्योंकि बीते ज़माने के फ़नकारों में से बहुत कम ही फ़नकारों को पद्मभूषण मिला है अब तक (अधिकतर को पद्मश्री मिला है)। लेकिन फिर वो कहती हैं कि उन्हें सबसे ज़्यादा ख़ुशी मिलती है उनके चाहने वालों के प्यार से। वो याद करती हैं अपनी बेटी की बिदाई का मौक़ा जब वो रो रही थीं, पर उनकी आँसू एक पल के लिए जैसे रुक गईं जब बैण्ड वालों ने "छोड़ बाबुल का घर" बजा उठे। शमशाद जी के परिवार ने उनके बहुत सारे कैसेट्स और पुरानी यादों का सामान सहेज कर रखा हुआ है जो किसी ख़ज़ाने से कम नहीं। मैंने ख़ुद देखा कि ढेर सारा फ़ैन-मेल रखा हुआ है और उनमें मेरी लिखी हुई वह कविता भी शामिल है जो मैंने उन्हें भेजा था। रात्रा परिवार ने कुछ दुर्लभ तसवीरें दिखाईं और हमें अपने वेबसाइट पर अपलोड करने की अनुमति दी जिसके लिए हम उनके आभारी हैं।

जैसे हम वहाँ से निकल रहे थे, शमशाद जी ने कहा कि वो अल्लाह का शुक्रगुज़ार हैं जो कुछ भी उन्हें मिला है ज़िन्दगी से, और उन्हें अपनी ज़िन्दगी से कोई शिकवा नहीं है, कोई गिला नहीं है। उनके इस बात पर हमने उनसे विदा ली और उनसे वादा किया कि अगली बार जब मुंबई आना होगा तो उनसे दुबारा मिलेंगे। ईश्वर शमशाद को उम्रदराज़ करें, और उनके परिवार को ढेरों ख़ुशियाँ दे!

इस साक्षात्कार के 16 महीने बाद, 23 अप्रैल 2013 के दिन 94 वर्ष की आयु में शमशाद बेगम ने इस दुनिया-ए-फ़ानी को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। आज शमशाद बेगम ज़िन्दा हैं अपने गीतों के ज़रिए और हमेशा ज़िन्दा रहेंगी!



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 


साक्षात्कार : गजेन्द्र खन्ना
अनुवाद एवं प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Saturday, March 26, 2016

BAATON BAATON MEIN - 17: INTERVIEW OF LYRICIST SHAKEEL BADAYUNI'S SON JAVED BADAYUNI

बातों बातों में - 17

गीतकार शकील बदायूनी के पुत्र जावेद बदायूनी से बातचीत 


"मुझे फ़क़्र है मेरी शायरी मेरी ज़िन्दगी से जुदा नहीं "  




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज मार्च 2016 का चौथा शनिवार है। आज इस स्तंभ में हम आपके लिए लेकर आए हैं फ़िल्म जगत के मशहूर गीतकार और अदबी शायर शकील बदायूनी के पुत्र जावेद बदायूनी से की गई बातचीत के सम्पादित अंश। जावेद साहब से यह बातचीत वर्ष 2011 में की गई थी। संयोग से उस दिन होली था। क्योंकि इस सप्ताह हम होली का त्योहार मना रहे हैं, इसलिए ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के ख़ज़ाने से हम इसे आपके लिए दुबारा चुन लाए हैं।

    


जावेद बदायूनी साहब, नमस्कार, और 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' परिवार की तरफ़ से आपको और आपके पूरे परिवार को होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ!


शुक्रिया बहुत बहुत, और आपको भी होली की शुभकामनाएँ! मुझे याद करने के लिए आपका शुक्रिया!

आज का दिन बड़ा ही रंगीन है, और हमें बेहद ख़ुशी है कि आज के दिन आप हमारे पाठकों से रु-ब-रु हो रहे हैं। 

मुझे भी बेहद ख़ुशी है अपने वालिद के बारे में बताने का मौका पाकर।

जावेद साहब, इससे पहले कि मैं आप से शकील साहब के बारे में सवालात का सिलसिला शुरु करूँ,  मैं यह कहना चाहूँगा कि यह बड़ा ही संयोग की बात है कि हमारी और आपकी बातचीत होली के मौक़े पर हो रही है और शकील साहब ने होली पर एक नहीं दो नहीं बल्कि बहुत सारे गीत लिखे हैं।

जी हाँ,, आपने ठीक कहा, उन्होंने कई होली गीत फ़िल्मों के लिए लिखे हैं। ’मदर इण्डिया’ में शमशाद बेगम का गाया "होली आई रे कन्हाई, रंग छलके, सुना दे ज़रा बांसुरी", शायद यही उनका पहला मशहूर होली गीत था।

जी। और इसके बाद भी उन्होंने कई और गीत लिखे जिनकी चर्चा हम आगे करेंगे। फ़िल्हाल यह बताइए कि जब आप छोटे थे, तब पिता के रूप में शकील साहब का बरताव कैसा हुआ करता था? घर परिवार का माहौल कैसा था?


जावेद बदायूनी
एक पिता के रूप में उनका व्यवहार दोस्ताना हुआ करता था, और सिर्फ़ मेरे साथ ही नहीं, अपने सभी बच्चों को बहुत प्यार करते थे और सब से हँस खेल कर बातें करते थे। यानी कि घर का माहौल बड़ा ही ख़ुशनुमा हुआ करता था। कई परिवारों में ऐसा देखा गया है कि पिता बहुत सख़्त होते हैं जिस वजह से बच्चे उनके साथ घुलमिल नहीं सकते, एक दूरी बनी रहती है हमेशा। पर हमारे साथ ऐसा बिलकुल नहीं हुआ। बहुत ही शानदार यादें हैं मेरे मन में अपने वालिद के।

क्या उस समय घर पर शायरों का आना जाना लगा रहता था?

जी हाँ जी हाँ, शकील साहब के दोस्त लोगों का आना जाना लगा ही रहता था जिनमें बहुत से शायर भी होते थे। घर पर ही शेर-ओ-शायरी की बैठकें हुआ करती थीं। एक अदबी माहौल होता था घर पर। 

शकील साहब ने अपने एक पुराने इंटरव्यु में ऐसा कहा था कि उनके करीयर को चार पड़ावों में विभाजित किया जा सकता है। पहले भाग में 1916 से 1936 का समय जब वे बदायूँ में रहा करते थे। फिर 1936 से 1942 का समय अलीगढ़ का; 1942 से 1946 का दिल्ली का उनका समय, और 1946 के बाद बम्बई का सफ़र। हमें उनकी फ़िल्मी करीयर, यानी कि बम्बई के जीवन के बारे में तो फिर भी पता है, क्या आप पहले तीन के बारे में कुछ बता सकते हैं?

शकील साहब का जन्म बदायूँ में हुआ, उनके वालिद का नाम था मोहम्मद जमाल अहमद सोख़ता क़ादरी। वो चाहते थे कि उनके बेटे का करीअर बहुत अच्छा हो। इसलिए उन्होंने घर पर ही अरबी, उर्दू, फ़ारसी और हिन्दी के ट्युशन का इन्तज़ाम कर दिया।

इसका मतलब कि जैसे ज़्यादातर शायरों को यह परम्परा विरासत में मिली होती है, शकील साहब के साथ ऐसा नहीं हुआ?

बिलकुल नहीं हुआ!

फिर शेर-ओ-शायरी क चसका उन्हें कैसे लगा?


उनके एक दूर के रिश्तेदार हुआ करते थे जिनका नाम था ज़िया-उल-क़ादरी बदायूनी। वो एक मज़हबी शायर थे। तो उनकी शायरी से शकील साहब काफ़ी प्रभावित हुए। और साथ ही बदायूँ का समकालीन माहौल कुछ ऐसा था कि इस तरफ़ उनका रुझान हुआ। और वो शेर-ओ-शायरी की तरफ़ मुड़ गए।

सार्वजनिक रूप से शकील साहब ने शेर-ओ-शायरी और मुशायरों में हिस्सा लेना कब से शुरु किया?

1936 में जब उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया, तब से वो इन्टर-कॉलेज, इन्टर-यूनिवर्सिटी मुशायरों में हिस्सा लेते थे और अक्सर जीत भी जाते। यह सिलसिला उस ज़माने से शुरु हुआ। तब उनकी उम्र कोई 20 साल की होगी। उनका काफ़ी नाम हो गया था उस समय से ही। 

आपने बताया कि बदायूं में उनके दूर के रिश्तेदार से प्रभावित होकर उनके अन्दर शायरी के अन्कुर फूटे। क्या किसी और से भी उन्होंने कोई तालीम ली?

अलीगढ़ के दिनों में उन्होंने उर्दू में पारदर्शी बनने के लिए हकीम अब्दुल वहीद ’अश्क़’ बिजनोरी से ट्युशन लेने लगे। बस यहीं तक, बाक़ी सब उनके अन्दर ही था।

पढ़ाई पूरी होने के बाद क्या वो दिल्ली आ गए थे?

1940 में उनका निकाह मेरी वालिदा से हुआ, मेरी वालिदा का नाम है सलमा। मेरी वालिदा उनके दूर के रिश्तेदारों में थीं और बचपन से वो मेरे वालिद साहब को जानती भी थीं। लेकिन उनके परिवार में परदा का रिवाज़ था जिस वजह से दोनों कभी पास नहीं आ सके थे उन दिनों। और ना ही कभी मेरे वालिद ने उसे देखा था। तो निकाह हो गया, और बी.ए. की डिग्री लेकर वो दिल्ली चले गए बतौर सपलाई अफ़सर। साथ ही ख़ाली समय में शौक़िया तौर पर मुशायरों में भाग लेना नहीं भूलते। उनका नाम चारों तरफ़ फ़ैलने लगा था। अलीगढ़, बदायूँ से निकल कर दिल्ली में भी उनका नाम हो गया और धीरे-धीरे पूरे हिन्दुस्तान में उनकी चर्चा होने लगी।

वाह! बहुत ख़ूब!

ये वो दिन थे जब शायर अक्सर समाज के दलित और शोषित वर्गों के लिए लिखा करते थे, उनके उत्थान के लिए, समाज की भलाई के लिए। पर शकील साहब की शायरी का रंग बिलकुल अलग था। उनकी शायरी में रोमान्स था जो दिल के बहुत क़रीब था। उनकी शायरी में नयापन था जो लोगों को पसन्द आया। वो अक्सर कहते थे मैंने सुना है "मैं शकील दिल का हूँ तरजुमाँ, कह मोहब्बतों का हूँ राज़दाँ, मुझे फ़क़्र है मेरी शायरी मेरी ज़िन्दगी से जुदा नहीं"।

वाह! क्या बात है! अच्छा ये सब बातें दिल्ली की हैं। दिल्ली से बम्बई तक का फ़सला कैसे और कब मिटा?


शकील साहब लता जी से क्या कह रहे हैं भला?
शकील साहब 1944 में बम्बई शिफ़्ट हो गए थे। वो फ़िल्मों में गाने लिखना चाहते थे। शुरुआत मुशायरों से ही की। वहाँ भी वो मुशायरों की जान बन बैठे बहुत जल्दी ही। ऐसे ही किसी एक मुशायरे में नौशाद साहब और ए. आर. कारदार साहब भी गये हुए थे और इन्होंने शकील साहब को नज़्म पढ़ते हुए वहाँ सुना। उन पर शकील साहब की शायरी का बहुत असर हुआ। उन्हें लगा कि शकील साहब एक सफल फ़िल्मी गीतकार बन सकते हैं। तो कारदार साहब और नौशाद साहब उनसे मिले और नौशाद साहब ने उनसे पूछा कि क्या आप अपने शायराना अंदाज़ का बयाँ एक लाइन में कर सकते हैं? इस सवाल पर शकील साहब का जवाब था "हम दर्द का अफ़साना दुनिया को सुना देंगे, हर दिल में मोहब्बत की एक आग लगा देंगे"।

वाह!

बस फिर क्या था, नौशाद साहब ने फ़ौरन कारदार साहब से कह कर उन्हें 1947 की फ़िल्म ’दर्द’ में गाने लिखने के लिए साइन करवा लिया। और इसी शेर को इस फ़िल्म का टाइटल सॉंग् भी बनाया गया, "हम दर्द का अफ़साना दुनिया को सुना देंगे"। इस फ़िल्म के गाने मशहूर हो गए, ख़ास कर उमा देवी का गाया "अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ए-बेक़रार का"। ऐसा बहुत कम होता है कि किसी गीतकार को अपनी पहली ही फ़िल्म में इतनी बड़ी कामयाबी मिले। पर शकील साहब ने ’दर्द’ से ही कामयाबी का जो झंडा लहराना शुरु किया, वो आख़िर तक कायम रहा।

इसमें कोई शक़ नहीं! जावेद साहब, क्या शकील साहब कभी आप भाई बहनों को भी प्रोत्साहित किया करते थे लिखने के लिए?

जी हाँ, वो प्रोत्साहित भी करते थे और जब हम कुछ लिख कर उन्हें दिखाते तो वो ग़लतियों को सुधार भी दिया करते थे। 

शकील बदायूनी और नौशाद अली, जैसे एक ही सिक्के के दो पहलू। ये दोनों एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त भी थे। क्या शकील साहब आप सब को नौशाद साहब और उस दोस्ती के बारे में बताया करते थे? या फिर इन दोनों से जुड़ी कोई यादगार घटना या वाक्या?


शकील साहब और नौशाद साहब वीयर ग्रेटेस्ट फ़्रेण्ड्स! यह हक़ीक़त है कि शकील साहब नौशाद साहब के साथ अपने परिवार से भी ज़्यादा वक़्त बिताया करते थे। दोनों की आपस की ट्युनिंग् ग़ज़ब की थी और यह ट्युनिंग् इनके गीतों से साफ़ छलकती है। शकील साहब के गुज़र जाने के बाद भी नौशाद साहब हमारे घर आते रहते थे और हमारा हौसला अफ़ज़ाई करते थे। यहाँ तक कि नौशाद साहब हमें बताते थे कि ग़ज़ल और नज़्म किस तरह से पढ़ी जाती है और मैं जो कुछ भी लिखता था, वो उन्हें सुधार भी दिया करते थे। नौशाद साहब जितने बड़े संगीतकार थे, उतनी ही अच्छी शेर-ओ-शायरी भी किया करते थे। अगर वो गीतकार भी होते तो भी उतने ही मशहूर होते इसमें कोई शक़ नहीं।

सही है! यानी कि शकील साहब एक पिता के रूप में जिस तरह से आपको गाइड करते थे, उनके जाने के बाद वही किरदार नौशाद साहब ने निभाया और आपको पिता समान स्नेह दिया।

बिलकुल ठीक, इसमें कोई शक़ नहीं!

शकील-नौशाद जोड़ी का कौन सा गीत आपको सबसे ज़्यादा पसन्द है?

इस जोड़ी का हर गीत अपने आप में एक मील का पत्थर है। किस किस गीत की बात करूँ? 'दुलारी’ (1949), ’दीदार’ (1951), 'बैजु बावरा’ (1952), 'शबाब’ (1954), 'मदर इण्डिया’ (1957), ’मुग़ल-ए-आज़म’ (1960), ’शबाब’ (1954), ’गंगा जमुना’ (1961), ’मेरे महबूब’ (1963), ये सारी फ़िल्मों के गानें बहुत हिट हुए थे, मुझे भी पसन्द है।

जावेद साहब, बचपन की कई यादें ऐसी होती हैं जो हमारे मन-मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ जाती हैं। शकील साहब से जुड़ी आप के मन में भी कई स्मृतियाँ होंगी। उन स्मृतियों में से कुछ आप हमारे साथ बाँटना चाहेंगे?

शकील साहब के साथ हम सब रेकॊर्डिंग् पर जाया करते थे और कभी कभी तो वो हमें शूटिंग् पर भी ले जाते थे। फ़िल्म 'राम और श्याम' के लिए वो हमें मद्रास ले गये थे। 'दो बदन', 'नूरजहाँ' और कुछ और फ़िल्मों की शूटिंग् पर सब गये थे। वो सब यादें अब भी हमारे मन में ताज़े हैं जो बहुत याद आते हैं। 

आपने शकील-नौशाद की जोड़ी के कुछ फ़िल्मों के नाम गिनाये जिनके गीत आपको पसन्द है। शकील साहब ने अन्य संगीतकारों के लिए भी गीत लिखे हैं जैसे कि रवि, हेमन्त कुमार प्रमुख। इन संगीतकारों के लिए शकील साहब के लिखे कौन कौन से गीत आपको व्यक्तिगत तौर पे सब से ज़्यादा पसंद हैं?

उनके लिखे सभी गीत अपने आप में मास्टरपीस हैं, चाहे किसी भी संगीतकार के लिये लिखे गये हों। यह बताना नामुमकिन है कि कौन सा गीत सर्वोत्तम है। मैं कुछ फ़िल्मों के नाम ज़रूर ले सकता हूँ, जैसे कि ’दो बदन’ और 'चौधवीं का चांद' रवि साहब के साथ, 'साहब बीवी और ग़ुलाम' हेमन्त कुमार साहब के साथ।

जावेद साहब, आज होली है और जैसा कि मैंने शुरु में ही कहा था कि शकील साहब ने बहुत सारे फ़िल्मी होली गीत लिखे हैं, एक गीत का उल्लेख हमने किया, बाक़ी गीतों के बारे में बताइए?

’मुग़ल-ए-आज़म’ में एक गीत था, हालाँकि यह होली गीत तो नहीं, बल्कि जन्माष्टमी के सिचुएशन का गीत था फ़िल्म में, "मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे"। फ़िल्म ’कोहिनूर’ में "तन रंग लो जी आज मन रंग लो"। यह नौशाद सहब के साथ था। फिर रवि साहब के साथ फ़िल्म ’फूल और पत्थर’ में "लायी है हज़ारों रंग होली, कोई तन के लिये, कोई मन के लिये"।

जी हाँ, ’कोहिनूर’ और ’फूल और पत्थर’ के इन दोनो गीतों में ही "तन" और "मन" शब्दों का शकील साहब ने इस्तमाल किया अलग अलग तरीक़ों से, बहुत ही सुन्दर और रंगीन। जावेद साहब, अब हम बात करना चाहेंगे शकील साहब को मिले हुए पुरस्कारों के बारे में?


पुरस्कारों की क्या बात करूँ, उन्हें लगातार तीन साल तक फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला था।

क्या बात है! इनके बारे में बताएँगे विस्तार से?

1961 में ’चौधवीं का चाँद’ फ़िल्म के टाइटल गीत के लिए, 1962 में फ़िल्म ’घराना’ के "हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं" के लिए, और 1963 में ’बीस साल बाद’ के "कहीं दीप जले कहीं दिल" गीत के लिए।

मतलब दो बार रवि साहब और एक बार हेमन्त दा के गीत के लिए। नौशाद साहब के किसी गीत में उन्हें यह पुरस्कार नहीं मिला, यह आश्चर्य की बात है।

भारत सरकार ने उन्हें ’गीतकार-ए-आज़म’ की उपाधि से सम्मानित किया था। 3 मई 2013 को उनकी तस्वीर के साथ एक डाक टिकट India Post ने जारी किया है।

वाह! बहुत ख़ूब! जावेद साहब, नौशाद साहब के साथ शकील साहब के दोस्ती की बात हमने की, और कौन कौन से उनके दोस्त थे फ़िल्म इन्डस्ट्री से?

शकील साहब को बैडमिन्टन खेलने का बहुत शौक़ था। पिक्निक और शिकार करना, पतंग उड़ाना उन्हें बहुत भाता था। और इन सब कामों में उनके साथी हुआ करते थे मोहम्मद रफ़ी साहब, जॉनी वाकर साहब और नौशाद साहब तो थे ही। इनके अलावा दिलीप कुमार साहब, वजाहत मिर्ज़ा साहब, ख़ुमार बाराबंकवी साहब और आज़म बजतपुरी साहब उनके करीबी लोग हुआ करते थे फ़िल्म इन्डस्ट्री से।

हम शकील साहब के लिखे गीतों को हर रोज़ ही सुनते हैं रेडियो पर, लेकिन उनके लिखे ग़ैर-फ़िल्मी नज़्मों और ग़ज़लों को कम ही सुना जाता है। इसलिए मैं आप से उनकी लिखी अदबी शायरी और प्रकाशनों के बारे में जानना चाहूँगा।


मैं आपको बताऊँ कि भले ही वो फ़िल्मी गीतकार के रूप में ज़्यादा जाने जाते हैं, लेकिन हक़ीक़त में पहले वो एक लिटररी फ़िगर थे और बाद में फ़िल्मी गीतकार। फ़िल्मों में गीत लेखन वो अपने परिवार को चलाने के लिये किया करते थे। जहाँ तक ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं का सवाल है, उन्होंने ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लों के पाँच दीवान लिखे हैं, जिनका अब 'कुल्यात-ए-शकील' के नाम से संकलन प्रकाशित हुआ है। उन्होंने अपने जीवन काल में 500 से ज़्यादा ग़ज़लें और नज़्में लिखे होंगे जिन्हें आज भारत, पाक़िस्तान और दुनिया भर के देशों के गायक गाते हैं।

आपने आंकड़ा बताया तो मुझे याद आया कि हमने आप से शकील साहब के लिखे फ़िल्मी गीतों की संख्या नहीं पूछी। कोई अंदाज़ा आपको कि शकील साहब ने कुल कितने फ़िल्मी गीत लिखे होंगे?

उन्होंने 108 फ़िल्मों में लगभग 800 गीत लिखे हैं, और इनमें 5 फ़िल्में अनरिलीज़्ड भी हैं।

बहुत ही कम उम्र में शकील साहब चले गए। क्या कारण था उनकी इस असामयिक मृत्यु का?

उन्हें डाइबेटिस तो थी ही, उन्हें टी.बी भी हो गया। पंचगनी के एक सैनिटोरियम में उनका इलाज चल रहा था। 1968-69 में वो बम्बई से पंचगनी के चक्कर लगाया करते थे। नौशाद साहब आते थे मिलने। केवल 53 साल की उम्र में उनका इन्तकाल हो गया। दिन था 20 अप्रैल 1970।

हमने सुना है कि आर्थिक स्थिति परिवार की उस समय ठीक नहीं थी। और नौशाद साहब ने निर्माताओं से कह कर शकील साहब को तीन फ़िल्मों के लिए साइन करवाया था। इस घटना के बारे में बतायेंगे?


जावेद बदायूनी
नौशाद साहब को जैसे ही इस बात का पता चला कि शकील साहब बीमार हैं और उनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं है, उन्हें बहुत ज़्यादा तकलीफ़ हुई, दुख हुआ। नौशाद साहब को पता था कि शकील साहब इतने ख़ुद्दार इंसान हैं कि किसी से पैसे वो नहीं लेंगे, यहाँ तक कि नौशाद से भी नहीं। इसलिए नौशाद साहब ने एक दूसरा रास्ता इख़्तियार किया। वो पहुँच गये कुछ फ़िल्म निर्माताओं के पास और शकील साहब की हालत का ब्योरा देते हुए उनके लिए हासिल कर लाए तीन फ़िल्मों में गीत लिखने का कॉनट्रैक्ट। यही नहीं, उस समय शकील किसी फ़िल्म के लिए जितने रकम लिया करते थे, उससे दस गुणा ज़्यादे रकम पर नौशाद ने उन फ़िल्म निर्माताओं को राज़ी करवाया। उसके बाद नौशाद ख़ुद जा पहुँचे पंचगनी जहाँ इनका इलाज चल रहा था। जैसे ही उन्होंने उन तीन फ़िल्मों में गाने लिखने और पेमेण्ट की रकम के बारे में बताया तो शकील सहब समझ गये कि उन पर अहसान किया जा रहा है। और उन्होंने नौशाद साहब से वो फ़िल्में वापस कर आने को कहा। पर नौशाद साहब ने भी अब ज़िद पकड़ ली और शकील साहब को गाने लिखने पर मजबूर किया। ये तीन फ़िल्में थीं 'राम और श्याम', 'आदमी', और 'संघर्ष'। फ़िल्म 'राम और श्याम' का गीत "आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले" उन्होंने पंचगनी के अस्पताल के बेड पर बैठे-बैठे लिखा था। अपनी दिन-ब-दिन ढलती जा रही ज़िन्दगी को देख कर उन्हें शायद यह अहसास हो चला था कि अब वो ज़्यादा दिन ज़िन्दा नहीं रहेंगे, कि उनका अन्तिम समय अब आ चला है, शायद इसीलिए उन्होंने इस गीत में लिखा कि "कल तेरी बज़्म से दीवाना चला जायेगा, शम्मा रह जायेगी परवाना चला जायेगा, आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले"। नौशाद साहब अपने जीवन के अन्त तक जब भी इस गीत को सुनते थे, उनकी आँखों में आँसू आ जाते थे शकील साहब को याद करके।

बहुत ही मार्मिक! क्या ये तीन फ़िल्में शकील साहब की अन्तिम तीन फ़िल्में थीं?

आख़िरी फ़िल्म शायद ’प्यार का रिश्ता’ थी जिसे वो शंकर-जयकिशन के लिए लिख रहे थे। इस फ़िल्म के कुल पाँच गीतों में से तीन गीत इन्होंने लिखे, फिर इनका इन्तकाल हो गया और बाक़ी के बचे दो गीत इन्दीवर साहब से लिखवाये गए। यह फ़िल्म 1973 में रिलीज़ हुई थी।

शकील साहब के जाने के बाद आपके परिवार की आर्थिक स्तिथि बिगड़ गई होगी। कैसे सम्भला फिर सब?

उनके दोस्त अहमद ज़कारिया और रंगूनवाला जी, इन्होंने मिल कर एक ट्रस्ट बनाई ’याद-ए-शकील’ के नाम से। और इस ट्रस्ट ने हमें उस बुरे वक़्त में सहारा दिया।

जावेद साहब, आप भी अपने पैरों पर खड़े हुए, यह बताइए कि आप किस क्षेत्र में कार्यरत है?

मैं पिछले 32 सालों से SOTC Tour Operators के साथ था, और अब HDFC Standard Life में हूँ, मुंबई में स्थित हूँ। 

और अब एक आख़िरी सवाल आपसे, शकील साहब ने जो मशाल जलाई है, क्या उस मशाल को आप या आपके परिवार का कोई और सदस्य, रिश्तेदार उसे आगे बढ़ाने में इच्छुक हैं?

मेरी बड़ी बहन रज़ीज़ शकील को शकील साहब के गुण मिले हैं और वो बहुत ख़ूबसूरत शायरी लिखती हैं।

बहुत बहुत शुक्रिया जावेद साहब। होली के इस रंगीन पर्व को आप ने शकील साहब की यादों से और भी रंगीन किया, भविष्य में हम आप से शकील साहब की शख़्सियत के कुछ और अनछुये पहलुयों पर चर्चा करना चाहेंगे। आपको एक बार फिर से होली की हार्दिक शुभकामना देते हुए अब विदा लेते हैं, नमस्कार!

बहुत बहुत शुक्रिया आपका!



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Saturday, February 27, 2016

BAATON BAATON MEIN -16: INTERVIEW OF SOUTH STYLE ICON & MODEL ABHI PRASAD

बातों बातों में - 16

दक्षिण युवा स्टाइल आइकन अभि प्रसाद से बातचीत 


"मेरे लिए शिक्षा प्राथमिकता है और मॉडलिंग् मेरा प्यार है! "  




नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते, काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रृंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज इस स्तंभ में हम आपके लिए लेकर आए हैं दक्षिण भारत के बेंगलुरु स्थित युवा स्टाइल आइकन अभि प्रसाद से टेलीफ़ोन पर की हुई दीर्घ बातचीत के सम्पादित अंश। अभि प्रसाद दक्षिण के जाने-माने फ़ैशन मॉडल हैं और बहुत जल्द दक्षिण फ़िल्म जगत में बतौर नायक पदार्पण करने जा रहे हैं।


    


अभि, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है आपका ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ पर!

नमस्कार, और शुक्रिया आपका मुझे अपने मैगज़ीन में जगह देने के लिए।

सबसे पहले तो मैं अपने पाठकों को यह बता दूँ कि अभिलाश प्रसाद, जो अभि प्रसाद के नाम से मशहूर हैं, उन्होंने बहुत कम उम्र में बहुत लोकप्रियता हासिल कर ली है, यूथ स्टाइल आइकन के रूप में वो युवा-वर्ग में फ़ेमस हैं। उन्होंने मॉडेलिंग् और विज्ञापन जगत में सफलता प्राप्त तो की ही है, साथ ही देश-विदेश के फ़ैशन शोज़ की शान भी बने हैं, कई शोज़ में उन्हें गेस्ट ऑफ़ ऑनर के रूप में आमन्त्रित किया गया है। एक सुपर मॉडल और एक सफल फ़िल्म अभिनेता के रूप में अभि अपने आप को स्थापित होता देखना चाहते हैं। तो आइए, अभि से सवाल-जवाब का सिलसिला शुरू करते हैं।

आपको शुक्रिया इस तारिफ़ के लिए!

अभि, सबसे पहले तो यह बताइए कि आपकी पैदाइश कहाँ की है? अपने परिवार के बारे में कुछ बताइए?


मंज़िल पर है अभि की निगाह
मेरा जन्म केरल में हुआ और वहीं मैं पला-बढ़ा। हम मूलत: केरल से हैं, हमारे पूर्वज वहीं से ताल्लुख रखते हैं। मेरे पिताजी विदेश में कारोबार करते हैं, इस सूत्र से वो बाहर ही रहते हैं। मेरी माँ सरकारी नौकरी में है। मेरा एक छोटा भाई भी है जो अभी पढ़ाई कर रहा है। बस इतना सा है मेरा परिवार। हमारा परिवार एक रूढ़िवादी हिन्दू परिवार है।

तो रुढ़िवादी परिवार होने की वजह से आपको इस मॉडलिंग् और अभिनय के क्षेत्र में उतरते समय बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ा?

जी नहीं, मुझे मेरे माता-पिता से इस ओर सहयोग मिला। मेरे पिताजी विदेश में रहते हैं, शायद यह भी एक कारण है कि वो यह समझते हैं कि आज के युग में बच्चा जो करना चाहता है, जो बनना चाहता है, उसे उसी दिशा में बढ़ावा देना चाहिए।

अपने बचपन और स्कूल के दिनों के बारे में बताइए? किस तरह के बच्चे थे आप?

मेरी शुरुआती शिक्षा केरल में ही हुई, पर हाइ स्कूल के समय मैं विदेश चला गया था। फिर उसके बाद मैं वापस केरल आकर यहीं से अपनी पढ़ाई पूरी की। Software Engineer की पढ़ाई पूरी। मैं बचपन से ही बहुत सक्रीय रहा, शर्मिला नहीं था बिल्कुल। हर तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों, जल्सों और प्रतियोगिताओं में भाग लिया करता था। इस वजह से मैं स्कूल में काफ़ी लोकप्रिय था अपने दोस्तों और शिक्षकों के बीच।

आपने विदेश का उल्लेख किया, किस देश में गए थे आप?


मिलिन्द सोमन के भक्त अभि
ओमान। वहीं मेरे पिता का व्यापार है और वो वहीं रहते हैं। इस तरह से उन्होंने मुझे वहाँ बुला लिया था कुछ समय के लिए।

क्या मॉडलिंग् का अंकुर उन्हीं दिनों आपके अन्दर अंकुरित हुआ था?

उस समय, यानी स्कूल के दिनों में तो इस तरफ़ इतना ध्यान नहीं दिया था, पर हाँ कॉलेज के समय से थोड़ा बहुत इस दिशा में मन होने लगा था। मेरे शारीरिक गठन, मुखमंडल और रूप-रंग को देख कर हर कोई मुझसे इस क्षेत्र में अपनी क़िस्मत आज़माने के लिए कहता। उससे मुझे हौसला मिलता था, आत्मविश्वास बढ़ने लगाता था। कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद मैंने मॉडलिंग् को गम्भीरता से लेना शुरू किया और अपने आप को इस क्षेत्र के लिए तैयार करने में जुट गया।

किस तरह की तैयारी की थी उस समय?

सबसे पहले तो अपने शरीर को मज़बूत बनाना, जिसके लिए मैं सुबह-शाम व्यायाम करता। खाने-पीने पर भी ख़ास ध्यान रखना पड़ता था; क्या खाना चाहिए, क्या नहीं खाना चाहिए, अपने आप पर रोक लगाना उल्टा-सीधा खाने पर, यह सब किया। फिर अपने लूक्स पर काम किया। अपने चलने के तरीके, मैनरिज़्म्स की बारीक़ियों पर ग़ौर किया। इस तरह से उस समय अपने आप को तैयार किया था।

उन दिनों आपके आइडल कौन हुआ करते थे? कौन थे आपके बचपन में आपके प्रेरणास्रोत इस क्षेत्र के?

निस्सन्देह मिलिन्द सोमन।

वाह, क्या बात है!

मिलिन्द सोमन यहाँ के शुरुआती सुपर-मॉडलों में से एक हैं। उनका काफ़ी क्रेज़ हुआ करता था। जब मैं मॉडेलिंग् की दुनिया में क़दम रख रहा था, तब मिलिन्द का काफ़ी हद तक अनुकरण किया करता था। उनके फ़ोटो शूट्स की तसवीरें देखता, कि किस तरह से वो अपने आपको प्रस्तुत करते हैं, किस तरह से देखते हैं, कैसे चलते हैं, वगेरह।

उन दिनों मिलिन्द सोमन के साथ साथ और भी कई बड़े मॉडल हुआ करते थे, तो मिलिन्द से ही आप क्यों इतने ज़्यादा मुतासिर हुए?


पूरब और पश्चिम
इसका कारण है कि मिलिन्द ना केवल एक अच्छे मॉडल हैं, बल्कि एक बहुत अच्छे और मज़बूत खिलाड़ी भी हैं। अधिकतर लोग उन्हें फ़ैशन मॉडल के रूप में जानते हैं, पर बहुत कम लोगों को उनके इस खिलाड़ी रूप के बारे में पता होगा। वो लगातार चार सालों तक राष्ट्रीय तैराक विजेता रह चुके हैं। भारत में वो लिम्का बूक ऑफ़ रेकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज करवा चुके हैं 1500 km की दूरी को 30 दिनों में दौड़ कर पूरी करने की वजह से। भारत में महिलाओं का सबसे बड़ा मैराथन, जिसे ’पिंकाथन’ के नाम से जाना जाता है, उसके वो दूत रहे। और उनकी सबसे बड़ी जो ख़ास बात है, वह यह कि वो आज भी, इस उम्र में भी बेहद सक्रीय हैं। अभी पिछले ही साल, उन्होंने ’Ironman Challenge' को 15 घण्टे और 19 मिनट में पूरी कर अपने पहले प्रयास में ही ’Ironman' की उपाधि प्राप्त की है। इस ख़िताब के लिए उन्हें कुल 16 घण्टों में 3.8 km तैराकी, 180.2 km साइकिल और 42.2 km दौड़ पूरी करनी थी जो उन्होंने किया और इस ख़िताब को हासिल किया।

वाक़ई काबिल-ए-तारिक हैं! और इस दौर के किस मॉडल को आप काफ़ी मानते हैं?

डेविड गैण्डी और केट मॉस।

डेविड गैण्डी ही क्यों?

डेविड गैण्डी मुझे बहुत पसन्द है, उनका स्टाइल और उनकी उपलब्धियाँ। 2009 में Forbes मैगज़ीन ने उन्हें तृतीय स्थान दिया विश्व भर के सफल पुरुष मॉडलों में। प्रथम स्थान मिला था मैट गॉरडन को और दूसरे पायदान पर थे सीन ओ’प्राइ। 2010 में डेविड को ’ब्रिटिश फ़ैशन काउन्सिल’ ने ’मॉडल ऑफ़ दि यीअर’ का ख़िताब दिया और 2011 में उन्हें ’फ़ेस ऑफ़ टुडे’ के लिए नामांकित किया। 2012 के अन्त में models.com ने अपने 'Money Guys' और 'Top Icons' में उन्हें स्थान दिया। 2012 में भी ’ब्रिटिश फ़ैशन काउन्सिल’ ने उन्हें ’मॉडल ऑफ़ दि यीअर’ करार दिया। 2013 में ’बिज़नेस ऑफ़ फ़ैशन’ ने 'BoF 500: The People Shaping the Global Fashion Industry' की घोषणा की जिसके तहत डेविड गैण्डी एकमात्रा पुरुष मॉडल थे 'Models & Muses' विभाग के अन्तर्गत। 2013 में Forbes ने अपनी वर्ल्ड रैंकिंग् को अपडेट करते हुए डेविड गैण्डी को द्वितीय स्थान पर ला खड़ा किया। 2014 में वो models.com के 'Super Men' और 'Sexiest Men' में शामिल हो गए। इसी साल Vogue (US) ने विश्व के ’All Time Top 10 Male Models' में डेविड को द्वितीय स्थान दिया (पहले पर थे टाइसन बेकफ़ोर्ड)। 2014 में ही स्पेन के माद्रिद में आयोजित Men of the Year Awards में उन्हें ’मॉडल ऑफ़ दि यीअर’ का पुरस्कार दिया। और अभी पिछले ही साल Yahoo! Style ने उन्हें 'Top Male Models of 2015' में शामिल किया है। कुल मिला कर पिछले कई सालों से डेविड शिखर पर विराजमान हैं और यह बात मुझे भी उर्जा प्रदान करती है।

और भारत के वर्तमान मॉडलों में आपके पसन्दीदा कौन हैं?


स्टाइल आइकन का अन्दाज़
आसिफ़ अज़ीम और शीतल मल्लार।

वही आसिफ़ अज़ीम जो हाल ही में Big Boss 7 में नज़र आए थे?

जी हाँ, बिल्कुल। आसिफ़ दरसल बांगलादेश का नागरिक है। आसिफ़ आज विश्व के श्रेष्ठ सौ मॉडलों में एक है। और तो और वो काफ़ी पढ़े लिखे भी हैं। उन्होंने ईकोनोमिक्स में एम.ए किया है। और एक अन्तर्रष्ट्रीय अभिनेता भी हैं।

अच्छा अभि, यह बताइए कि आप पढ़ाई-लिखाई में कैसे थे? आप software engineer हैं, इससे कुछ हद तक अनुमान लगाया जा सकता है कि आप अच्छे रहे होंगे। तो फिर इंजिनीयरिंग् के साथ-साथ मॉडलिंग् को प्रोफ़ेशन बनाना, यह कैसे ख़याल आया?

जी, आपने ठीक ही कहा, मैं पढ़ाई में काफ़ी अच्छा था, मैं एक मेहनती छात्र हुआ करता था, और अपनी पढ़ाई को पूरी इमानदारी से निभाता था क्योंकि शिक्षा ही मेरे लिए प्रथम प्राथमिकता रही है। यह बहुत ज़रूरी है। मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर मुंबई भाग आते हैं मॉडल या नायक बनने के लिए। इसे आप मेरा पारिवारिक पार्श्व ही समझ लीजिए कि हमारे परिवार में शिक्षा का बहुत बड़ा महत्व है, इसलिए पढ़ाई तो पूरी करनी ही थी। और जहाँ तक मॉडलिंग् का या मॉडल बनने का सवाल है, तो वह मेरा प्यार है, जिसे मैं हर हाल में पाना चाहता था। और यह प्यार हमेशा कायम रहेगा।

वाह, बहुत अच्छे तरीक़े से आपने दोनों का अन्तर स्पष्ट किया, शिक्षा प्राथमिकता है और मॉडलिंग् प्यार है।


बिल्कुल ठीक!

शिक्षा की तरफ़ जो आपका रवैया है, वह प्रशंसनीय है, हर युवा को इससे सीख लेनी चाहिए, ख़ास तौर से उन्हें जो पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि नायक या मॉडल बनने के लिए उच्च शिक्षा की क्या ज़रूरत है!

जी हाँ, शिक्षा अपनी जगह है, आप जितना पढ़ोगे, उतना ज़्यादा शिक्षित बनोगे।

आपका मॉडलिंग् करीअर कब शुरू हुआ? एक इंजिनीयर और एक मॉडल, इन दोनों को एक साथ कैसे सम्भाला शुरू शुरू में?

जैसा कि मैंने बताया था, ग्रैजुएशन के बाद ही मैंने मॉडलिंग् को गम्भीरता से लिया। दोनों को कैसे सम्भाला यह तो नहीं कह सकता पर हाँ, सम्भाल लिया। और मेदोनों के साथ पूरी-पूरी इमानदारी की। ऐसा नहीं कि मॉडल बनने के चक्कर में इंजिनीयरिंग् के काम में मन नहीं लगाया। जब तक पूरी तरह से एक क्षेत्र में सफलता नहीं मिल जाती, हमें एक बैक-अप की आवश्यकता होती है। इसलिए दोनों को साथ में लेकर चल रहा हूँ। लेकिन जल्दी ही मैं अपने सपनों के साकार होने का बेसबरी से इन्तज़ार कर रहा हूँ।

यहा बताइए कि मॉडलिंग् में आपका पदार्पण कैसे हुआ? कैसे आपको अपना पहला ब्रेक मिला?

मैं केरल में ही मॉडल बनने की तैयारी कर रहा था उस समय। और अकस्मात ही मेरी झोली में मॉडलिंग् करने का एक प्रस्ताव आ गया। हुआ यूं था कि मैं किसी फ़ंक्शन में गया हुआ था। वहाँ के एक स्थानीय डिज़ाइनर ने मुझे देखा, मेरे चलने का तरीका, चेहरा, दृष्टि, और शारीरिक गठन। कुल मिला कर सब उन्हें अच्छा लगा और उन्हें लगा कि मैं इस क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन कर सकता हूँ। वो मेरे पास आए और कहने लगे कि आप मॉडलिंग् क्यों नहीं करते? जब मैंने उनसे यह कहा कि मैं इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहता हूँ और जिसके लिए प्रयास कर रहा हूँ, तो उन्होंने उस वक़्त तो कुछ नहीं कहा और ना ही कोई वादा किया, पर अपने अगले ही फ़ैशन शो के लिए मुझे चुना और उसमें मुझे भाग लेने का मौका दिया। बस वहीं से मेरी शुरुआत हुई बतौर प्रोफ़ेशनल मॉडल। और तब से लेकर अब तक यह यात्रा जारी है। निरन्तर प्रयास जारी है अच्छे से अच्छा काम करने का।

फिर उसके बाद आपने सफलता की सीढ़ियाँ कैसे चढ़ी?


जैसा कि मैंने बताया, निरन्तर काम करता गया। मेरे लिए कुछ भी रातों रात नहीं हुआ। मुझे अत्यन्त धैर्य के साथ एक एक कर सीढ़ी चढ़ना पड़ा, जिसके लिए मुझे काफ़ी समय, प्रयास और कठिन परिश्रम करना पड़ा। और धीरे धीरे एक के बाद एक मुझे एक्स्पोज़र मिलता चला गया।

आपने बताया कि आपकी शुरुआत एक फ़ैशन शो में बतौर रैम्प मॉडल हुई। मॉडलिंग् के और किन विधाओं में आपको काम करने का मौका मिला?

रैम्प मॉडल के साथ-साथ मुझे एक प्रिण्ट मॉडल के रूप में भी काफ़ी काम मिलता चला गया। और फिर TVC में भी आ गया।

जिन पाठकों को रैम्प, प्रिण्ट और TVC के बारे में पता नहीं है, क्या आप बताएँगे कि ये क्या हैं?

ज़रूर! रैम्प मॉडलिंग् वह होती है जिसमें मॉडल किसी फ़ैशन शो में लाइव ऑडिएन्स के सामने रैम्प पर चलते हुए अपने पोशाक का प्रदर्शन करता है। इसमें मॉडल के चलने के तौर तरीकों पर लोग ध्यान देते हैं, और पहने हुए पोशाक को आप किस तरह से कैरी करते हैं, उस पर बहुत कुछ निर्भर करता है। बड़े फ़ैशन शोज़ में काफ़ी दबाव रहता है अच्छा प्रदर्शन करने का क्योंकि लोग आपको लाइव देख रहे होते हैं। दूसरा है प्रिण्ट मॉडलिंग्। इसमें लाइव ऑडिएन्स नहीं होती। डिज़ाइनर/ डिरेक्टर और फ़ोटोग्राफ़र और कुछ तकनीकी सहायक होते हैं सेट पर जो प्रिण्ट मीडिया के लिए तसवीरें खींचते हैं, यानी कि अख़्बार, मैगज़ीन या साइन-बोर्ड के लिए विज्ञापन। यह बन्द कमरे में भी हो सकता है और आउट-डोर में भी। इसमें फ़ोटोग्राफ़र का बड़ा रोल होता है, और वो हमें निर्देश देता है कि किस तरफ़ देखना है, हाथ कैसे रखने हैं वगेरह वगेरह। और तीसरे वर्ग में आता है TVC। TVC यानी TV Commercial। टेलीविज़न पर आप जो विज्ञापन देखते हैं, उनमें जो मॉडल्स आपको दिखते हैं, वो इस वर्ग में आता है। TVC का अर्थ है audio-visual advertisements।

बहुत अच्छी तरह से आपने इन तीनों का अन्तर स्पष्ट किया। आपको इसमें से कौन सा सबसे ज़्यादा पसन्द है?


ऐसा कुछ नहीं है, ये तीनों ही अपनी अपनी जगह पे महत्वपूर्ण है। प्रिण्ट और TVC में टीम-वर्क होता है। पूरी यूनिट के योगदान से काम सफल हो पाता है, जैसे कि मैंने बताया फ़ोटोग्राफ़र, विडियोग्राफ़र, लाइटमैन आदि। रैम्प पर ’next take' या ’retake' का कोई अवसर नहीं होता। जो हो गया, सो हो गया। इसलिए बहुत ध्यान पूर्वक काम करना पड़ता है। लूक्स, ऐटिट्युड और कैसे हम अपने आप को पेश कर रहे हैं, इन बातों पर सब निर्भर करता है। अपना आकर्षण बनाए रखना पड़ता है हर क्षण। बस यही सब बातें हैं कुल मिलाकर।

बहुत ख़ूब! आपने बहुत सारे अलग अलग तरह के ब्रैण्ड्स के लिए काम किया है। कुछ के नाम गिनाते चलें?

पोशाक वर्ग में Grasim, Raymond, Celio India जैसे ब्रैण्ड्स के लिए मॉडलिंग् की है। पानीय पदार्थ वर्ग में Bacardi और Pitars जैसे नाम हैं। Green Trends और Toni and Guy जैसे ब्यूटी सालों के लिए काम किया है। Daydome Fitness, Ziggar Fuga, Philips, Malabar Gold, Volvo और TV9 जैसे ब्रैण्ड्स के लिए भी मैंने काम किया है। और अब Kingfisher।

वाह! इसका मतलब आपने केवल एक दो तरह के ब्रैण्ड्स के लिए नहीं बल्कि बहुत से अलग-अलग तरह की कंपनियों के लिए मॉडलिंग् की है। आजकल आप Kingfisher के लिए काफ़ी काम कर रहे हैं। इसके बारे में कुछ बताइए?


Kingfisher के लिए मैं अपने प्रतिपालक या परामर्शदाता और गुरू इओवेल प्रभु को धन्यवाद देना चाहता हूँ क्योंकि उन्होंने ही मुझे Kingfisher का रास्ता दिखाया था। और उनके साथ-साथ कोरीओग्राफ़र राहुल देव शेट्टी को भी धन्यवाद देता हूँ। इन लोगों के साथ काम करते हुए बहुत कुछ सीखने को मिला, एक अन्तराष्ट्रीय स्तर का परिवेश मिला जहाँ बहुत से अन्तराष्ट्रीय मॉडल्स से बातचीत करने का मौका मिला, वो लोग कैसे काम करते हैं, किस तरह का होता है उनका फ़ैशन जगत, ये सब जानने को मिला।

जिन दिग्गज डिज़ाइनरों के लिए आपने काम किया, उनके बारे में बताइए?

मैंने कई बड़े-बडए डिज़ाइनरों के लिए काम किया है जैसे कि चैतन्य राव, सुमित दासगुप्ता, कीर्ति राठौड़, हरि आनन्द, जतिन कोचर, संजना जॉन, रॉकी स्टार, मनोविरज खोसला और ऋतु कुमार। चैतन्य राव चेन्नई में स्थित हैं और तमिल व तेलुगू फ़िल्म जगत में वो एक जाना माना नाम हैं। सुमित दासगुप्ता भी एक बहुत मशहूर डिज़ाइनर हैं। उनकी बड़ी ख़ासियत यह है कि वो एक बहुत बड़े शिक्षित परिवार से ताल्लुख़ रखते हैं। उनके दादा एक ज़मीनदार होते हुए भी कपड़ों का व्यापार शुरू किया जैसे कि पटसन, खादी आदि के कपड़े। स्वाधीनता संग्राम में उन्होंने कई बड़े बड़े सेनानियों जैसे कि चित्तरंजन दास, बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को खादी के कपड़े मुफ़्त में दिया करते थे। सुमित के पिता इंजिनीयर हैं और माँ एक प्रोफ़ेसर। और वो ख़ुद भी काफ़ी पढ़े-लिखे हैं। ’सर्वमंगला’ के नाम से उनकी फ़ैशन एजेन्सी है। कीर्ति राठौड़ भी मुंबई फ़िल्म जगत से जुड़ी हुई हैं और उन्होंने अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ ख़ान, अर्जुन कपूर, विवेक ओबेरोय, इमरान ख़ान, बोनी कपूर, सलमान ख़ान, अजय देवगन, नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी, सुशान्त सिंह, यामी गौतम, ऋषिता भट्ट, सोनाली राउत, साना ख़ान, पूनम ढिल्लों, पंकज धीर, कार्तिक तिवारी, अनुष्का शर्मा, श्रीदेवी, मन्दिरा बेदी, एजाज़ ख़ान और शक्ति कपूर जैसे कलाकारों के लिए डिज़ाइन कर चुकी हैं। हरि आनन्द भी दक्षिण स्थित डिज़ाइनर हैं जिनका दुनिया भर में नाम है।

आप केरल से हैं और जहाँ तक मुझे याद है एक बार हरि आनन्द ने कोचि में आयोजित अन्तराष्ट्रीय फ़ैशन शो में भाग लिया था और काफ़ी चर्चित हुए थे?


जी हाँ बिल्कुल! फिर जतिन कोचर भी एक बहुत बड़े डिज़ाइनर हैं। उनका मुझे यह अच्छा लगता है कि वो सिर्फ़ एक डिज़ाइनर ही नहीं हैं, बल्कि उनकी रचनात्मक्ता इतनी है कि वो ऐंकरिंग् भी कर लेते हैं, लिखते भी हैं। उनके डिज़ाइन किए कपड़े बहुत ही साधारण लेकिन उच्चस्तरीय होते हैं ताकि आम लोग उन्हें पहन कर बाहर निकल सके। उन्हें बहुत से पुरस्कार भी मिले हैं। संजना जॉन, जो अमरीका स्थित डिज़ाइनर हैं, वो मशहूर डिज़ाइनर आनन्द जॉन की बहन हैं। रॉकी स्टार ’Rocky S' के ब्रैण्ड नेम से अपना काम करते हैं। वो भारत के पहले डिज़ाइनर हैं जिन्होंने एक सुगंधी का प्रमोचन किया। Rocky S Noir Femme और Rocky s Noir Pour Hommes, इन सुगंधियों का अनावरण अर्जुन रामपाल के हाथों हुआ था। मनोविरज खोसला बेंगलुरु स्थित डिज़ाइनर हैं जिनका सिग्नेचर है ट्रेन्डी ऐण्ड हिप। और ऋतु कुमार के नाम से तो हर कोई वाकिफ़ हैं ही, उनके बारे में और क्या बताऊँ!

किसी भी मॉडल के लिए उसके फ़ोटोग्राफ़र पर बहुत कुछ निर्भर करता है। कौन हैं आपके सबसे पसन्दीदा फ़ोटोग्राफ़र?
मनपसन्द फ़ोटोग्राफ़र अमित खन्ना के कैमरे से

आपने बिल्कुल सही कहा कि फ़ोटोग्राफ़र पर बहुत कुछ निर्भर करता था। अगर वो चाहे तो काम बना भी सकता है और चाहे तो बिगाड़ भी सकता है। मैंने भारत के बहुत सारे फ़ोटोग्राफ़र्स के साथ काम किया है, पर मुझे जो सबसे ज़्यादा पसन्द हैं वो हैं अमित खन्ना।

एक समय था जब नए मॉडलों के साथ काफ़ी शोषण होता था। काम मिलने के लिए कई समझौते करने पड़ते थे बहुतों को। और अब समय के साथ-साथ लोगों ने इसे भी ’part of the game' मान लिया और अब तो यह एक आम बात हो गई है। आपका क्या ख़याल है इस बारे में?


मुझे नहीं लगता कि हर किसी को इससे गुज़रना पड़ता है। मैं यह इसलिए कह सकता हूँ क्योंकि मैं इसी इन्डस्ट्री का हिस्सा हूँ और मुझे कभी किसी ने शोषित नहीं किया। हाँ, यह बात ज़रूर है कि मुझे सफलता धीरे धीरे मिली जिसके लिए मुझे निष्ठा, स्थिरता, सपना और जोश को हमेशा बरकरार रखना पड़ा। जो लोग रातों रात स्टार बनने का सपना रखते हैं, वो अक्सर ग़लत जगह फँस जाते हैं और शिकायत करते हैं कि उनका शोषण हो गया। इस इंडस्ट्री में बहुत नकल लोग घुस गए हैं जो नवान्तुकों को बेवकूफ़ बना कर पैसे लूट लेते हैं या उनका शारीरिक शोषण करते हैं। इसलिए सही व्यक्ति को चुनने में ग़लती नहीं होनी चाहिए। और हाँ, there is no shortcut to success.

यह बहुत ही अच्छी बात बताई आपने कि सफलता का रास्ता लम्बा है, जल्द-बाज़ी में खेल बिगड़ सकता है ज़िन्दगी भर के लिए। उन मॉडल्स के लिए आप क्या सलाह देंगे जो इन नीची राहों को स्वीकार कर लेते हैं ऊँचाइयों तक पहुँचने के लिए?

यह अपने अपने विचार हैं, मैं कोई टिप्पणी नहीं कर सकता। अगर उन्हें लगता है कि वो जो कुछ कर रहे हैं, वो उनके लिए सही है, तो फिर सही है।

इस दौर में बहुत से मॉडल्स सफल टीवी व फ़िल्म अभिनेता भी बन गए हैं। आप इस राह में अग्रसर नहीं हो रहे?

जी ज़रूर! यह मेरा अगला क़दम होगा अपने करीयर का। दक्षिण के कुछ निर्देशकों के साथ मेरी बातचीत चल रही है। सही समय और सही प्रोजेक्ट जैसे ही हाथ लगेगा, मैं अभिनय जगत में क़दम रख दूँगा। इस वक़्त इससे ज़्यादा मैं कुछ और नहीं बता सकता।

अभिनय की बात चल रही है तो यह बताइए कि आपके पसन्दीदा अभिनेता-अभिनेत्रियाँ कौन कौन हैं?


निस्सन्देह अमिताभ बच्चन और रेखा। और पश्चिम की बात करें तो ब्रैड पिट्ट और मेगा फ़ॉक्स।

वाह, बहुत अच्छी पसन्द है आपकी! अच्छा अपने शारीरिक गठन को बरकरार रखने के लिए किस तरह की कसरत करते हैं आप?

मेरा फ़िटनेस रिजिम (स्वस्थ रहने की पद्धति) दूसरों से बिल्कुल अलग है। मैं अन्य बॉडी-बिल्डर्स की तरह स्टेरोएड वगेरह नहीं लेता। मैं हमेशा फ़िट रहने की कोशिश करता हूँ प्राकृतिक तरीकों से। प्राकृतिक संतुलित आहार का सेवन करता हूँ। प्रचूर मात्रा में फल, फलों के रस, और पानी पीता हूँ। जहाँ जिम में व्यायाम करने की बात है तो हर रोज़ करीब एक घण्टे जिम में रहता हूँ जिसमें बीस मिनट कार्डिओ और चालीस मिनट का वेट ट्रेनिंग् होता है। इस तरह से हमेशा सौन्दर्यात्मक रूप बनाए रखने की कोशिश करता हूँ।

और खाली समय में क्या करते हैं? आपकी रुचियाँ क्या हैं?

मुझे फ़ूटबॉल खेलने का बहुत शौक है और अब भी मैं खेलता हूँ। और मैं पेण्टिंग् भी करता हूँ।

वाह! बहुत ख़ूब! खेलकूद और कला, दोनों से आपका लगाव है यह जानकर बहुत अच्छा लगा। अच्छा यह बताइए कि आप जिस सॉफ़्टवेयर कंपनी में नौकरी करते हैं, वहाँ के आपके सहकर्मियों से आपके मॉडलिंग् के बारे में कैसी प्रतिक्रियाएँ मिलती हैं?


मेरे सहकर्मी मित्रगण मुझे भरपूर सहयोग देते हैं ताकि मैं दोनों काम अच्छी तरीके से निभा सकूँ। दोनों इंडस्ट्री एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत हैं, फिर भी मुझे ज़्यादा परेशानी उठानी नहीं पड़ी क्योंकि मुझे अपने सहकर्मियों से पूरा पूरा सहयोग मिला। वो लोग मेरे मॉडलिंग् के काम की सराहना करते हैं और मुझे प्रोत्साहित करते हैं और उपर चढ़ने के लिए।

एक सॉफ़्टवेयर इंजिनीयर होने के नाते आपके मन में कभी यह ख़याल नहीं आया कि अमरीका जाकर एक अच्छी नौकरी के साथ सेटल हो जाऊँ?

अमरीका छुट्टियाँ बिताने के लिए अच्छा है, मुझे अपने देश से प्यार है और मैं यहीं स्थापित होना चाहता हूँ।

बहुत अच्छे! बेंगलुरू से मुंबई स्थानान्तरित होने के बारे में क्या विचार हैं? वैसे क्या फ़र्क है बेंगलुरू और मुंबई फ़ैशन जगत में?

मैंने अपनी करीअर की शुरुआत बेंगलुरू में की थी, इसलिए इस जगह से मुझे बहुत लगाव है और कई भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। मेरा मुंबई जाना लगा रहता है काम के सिलसिले में, इस तरह से बेंगलुरू और मुंबई, दोनों जगहों के बीच संतुलन बनाए रखा हुआ हूँ। लेकिन यह सत्य है कि फ़ैशन जगत की जहाँ तक बात है, मुंबई का कोई मुक़ाबला नहीं। मुंबई हमारा फ़ैशन कैपिटल है और इस क्षेत्र में वहाँ ढेरों मौके और सुविधाएँ हैं।

नई पीढ़ी जो इस क्षेत्र में आना चाहते हैं, उन्हें आप क्या सलाह देंगे?

मैं वही बात दोहराता हूँ कि शिक्षा का कोई विकल्प नहीं है। पहले शिक्षित हो जाइए, कम से कम ग्रैजुएशन कम्प्लीट कीजिए, फिर इस क्षेत्र में क़दम रखिए। मॉडलिंग् के क्षेत्र में उतरने से पहले अपना आंकलन ख़ुद कीजिए कि क्या आप में वह बात है? कई बार ऐसा होता है कि दोस्त लोग या रिश्तेदार बढ़ा-चढ़ा कर तारीफ़ें कर देते हैं और उपर चढ़ा देते हैं, जिन्हें सुन कर वह ख़्वाबों की दुनिया में चला जाता है। यह राह आसान नहीं है, इस चमक-दमक के पीछे जो अन्धेरा है, उससे सावधान हो जाइए और सोच विचार के बाद, अपना आंकलन करने के बाद इस क्षेत्र में पूरी तैयारी के साथ उतरिए।

अभि, बहुत अच्छा लगा आपसे इतनी लम्बी बातचीत करके। बहुत बहुत धन्यवाद आपका जो अपनी व्यस्तता के बावजूद हमें इतना समय दिया। हम आपको शुभकामनाएँ देते हैं कि आप दिन दुगुनी रात चौगुनी तरक्के करें, आने वाले समय में आप सुपरमॉडल के रूप में प्रतिष्ठा पाएँ, और फ़िल्म जगत में अपना नाम रोशन करें जैसा कि आपका सपना है। बहुत बहुत धन्यवाद, नमस्कार!

आपको बहुत बहुत धन्यवाद इस मुलाक़ात के लिए, आपकी शुभकामनाओँ के लिए। नमस्कार!




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी soojoi_india@yahoo.co.in पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए। 



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Saturday, February 28, 2015

INTERVIEW OF LYRICIST HASRAT JAIPURI'S DAUGHTER KISHWARI JAIPURI

 बातों बातों में - 05

 गीतकार हसरत जयपुरी की पुत्री किश्वरी जयपुरी से सुजॉय चटर्जी की बातचीत

"तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे..." 






नमस्कार दोस्तो। हम रोज़ फ़िल्म के परदे पर नायक-नायिकाओं को देखते हैं, रेडियो-टेलीविज़न पर गीतकारों के लिखे गीत गायक-गायिकाओं की आवाज़ों में सुनते हैं, संगीतकारों की रचनाओं का आनन्द उठाते हैं। इनमें से कुछ कलाकारों के हम फ़ैन बन जाते हैं और मन में इच्छा जागृत होती है कि काश, इन चहेते कलाकारों को थोड़ा क़रीब से जान पाते; काश; इनके कलात्मक जीवन के बारे में कुछ जानकारी हो जाती, काश, इनके फ़िल्मी सफ़र की दास्ताँ के हम भी हमसफ़र हो जाते। ऐसी ही इच्छाओं को पूरा करने के लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ने फ़िल्मी कलाकारों से साक्षात्कार करने का बीड़ा उठाया है। । फ़िल्म जगत के अभिनेताओं, गीतकारों, संगीतकारों और गायकों के साक्षात्कारों पर आधारित यह श्रॄंखला है 'बातों बातों में', जो प्रस्तुत होता है हर महीने के चौथे शनिवार को। आज फ़रवरी माह का चौथा शनिवार है और आज प्रस्तुत है फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध गीतकार हसरत जयपुरी की पुत्री किश्वरी जयपुरी से की गई हमारी लम्बी बातचीत के सम्पादित अंश।




किश्वरी जी, नमस्कार और बहुत बहुत स्वागत है आपका ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर।

नमस्कार, और शुक्रिया मुझे याद करने के लिए।

हम बता नहीं सकते कि हमें कितनी ख़ुशी हो रही है कि हसरत जयपुरी साहब जैसे दिग्गज और लीजेन्डरी गीतकार की पुत्री, यानी कि आप आज हमारे बीच हैं और हमें आप के ज़रिए हसरत साहब की ज़िन्दगी और उनके गीतों से सम्बन्धित तमाम बातचीत करने का मौका मिल रहा है।

मुझे भी यकीनन बेहद ख़ुशी होगी, अपने डैडी के बारे में बताते हुए। 

किश्वरी जी, हसरत साहब के बारे में जो आम जानकारी है वो सब तो इन्टरनेट पर उपलब्ध है, उनके लिखे गीतों की फ़ेहरिस्त भी आसानी से मिल जाती है, इसलिए हमने सोचा कि आज के इस साक्षात्कार में हम आपसे कुछ ऐसे सवाल पूछें जो बिल्कुल एक्स्क्लूसिव हों। मेरा मतलब है कि एक बेटी की नज़र से हसरत साहब की शख़्सियत को हम जानना चाहेंगे।

जी ज़रूर! आप पूछ सकते हैं अपने सवाल।

शुक्रिया! सबसे पहले तो आप यह बताइए कि कैसा लगता है हसरत जयपुरी की बेटी कहलाना, वो हसरत जयपुरी जो हिन्दी फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के सबसे लोकप्रिय गीतकारों में से एक थे?

मुझे अपने डैडी की एकलौती बेटी बनने का जो मौका मिला है, इससे मैं अपने आप को बहुत ही ज़्यादा ख़ुशनसीब समझती हूँ, I feel extremely privileged। मैं अल्लाह का शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने मुझे इस धरती पर रोमान्स के मशहूर शहंशाह की एकलौती बेटी बना कर भेजा है। इससे ज़्यादा और इससे बेहतर मैं कुछ नहीं माँग सकती थी। 

वाह, क्या बात है! वाकई आप ख़ुशक़िस्मत हैं कि आप हसरत जयपुरी की बेटी हैं। अच्छा किश्वरी जी, यह बताइए कि आपका जो बाल्यकाल था, यानी जब आप एक बच्ची के रूप में बड़ी हो रही थीं, वह दशक कौन सा दशक था?

मेरा जन्म साल 1963 को हुआ था और यह वह दौर था जब डैडी अपनी लोकप्रियता और कामयाबी की बुलन्दियों को छू रहे थे। 

जी, मेरा इशारा भी उसी तरफ़ था, मैं भी इसी बात पर आ रहा था कि हसरत साहब की उस सफल दौर में जब आप बड़ी हो रही थीं, तब क्या आपको यह अहसास था, क्या इतनी समझ थी उस वक़्त कि आप इतने बड़े गीतकार की बेटी हैं?

हसरत जयपुरी नन्ही किश्वरी के साथ
जी, जैसे जैसे मैं बड़ी हो रही थी, मेरा रिश्ता डैडी के गीतों के साथ जुड़ता और पनपता चला जा रहा था। मैं, मेरी माँ, मेरे दोनों भाई और डैडी, हम सब बैठ कर हमारे Philips Record Player पर उनके गीतों को सुना करते थे। अफ़सोस की बात है कि हम 40 और 50 के दशकों के उनके गीतों का आनन्द नहीं ले सके और उनकी कामयाबी के जश्नों को अपनी आँखों से नहीं देख सके। क्योंकि मेरा जन्म 1963 में हुआ, इसलिए 60 का दशक भी बहुत कम उम्र होने की वजह से समझ ही नहीं सकी। पर जैसे-जैसे बड़ी हुई, मैं उनके गीतों की तरफ़ खींचती चली गई, आकर्षित होती चली गई। उनका लहू मेरे रगों में दौड़ रहा है, इसलिए बाद में ही सही, पर मैं उनके गीतों से जुड़ ज़रूर गई।

हसरत साहब एक पिता के रूप में कैसे थे? किस तरह का सम्बन्ध था आप दोनों के बीच?

मेरा मेरे डैडी के साथ जो सम्बन्ध था वह इस दुनिया से परे था। यह रिश्ता बहुत ही ज़्यादा मज़बूत और बहुत ही ज़्यादा प्यार भरा था। क्योंकि मैं उनकी एकलौती बेटी थी, इसलिए लाड़-प्यार कुछ ज़्यादा ही करते थे। मैं उनकी आँखों का तारा थी, वो मुझसे इतना ज़्यादा प्यार करते थे कि अगर मैं कहती कि पिताजी, अभी दिन है, तो वो कहते हाँ दिन है, फिर चाहे वह रात ही क्यों न हो!

जो तुमको हो पसन्द वही बात कहेंगे, तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे... 

जी बिल्कुल! और फिर हर रात को सोने जाने से पहले वो हमारे बेडरूम में आते और हम तीनों से कहते - "अल्लाह इनकी हज़ारी उमर करे"। मैं क्या बताऊँ, वो एक बहुत ही ज़्यादा प्यार करने वाले पिता थे। आज भी मैं उन्हें बहुत ज़्यादा मिस करती हूँ, उनकी कमी को महसूस करती हूँ।

किश्वरी जी, मैं यही कह सकता हूँ कि भले वो शारीरिक रूप से हमारे बीच में नहीं हैं, पर उनका जो काम है, उनके जो लिखे हुए गीत हैं, वो हमेशा-हमेशा इस धरती पर गूँजते रहेंगे। इसलिए यह कहना अनुचित होगा कि आज वो हमारे बीच नहीं हैं। कलाकार भले इस फ़ानी दुनिया से चला जाए, पर उसकी कला अमर रहती है।

बिल्कुल सही कहा आपने!

पिता की गोद में किश्वरी; माँ और बड़े भाई के साथ
अच्छा किश्वरी जी, यह बताइए कि घर में सारे लोग जब मौजूद होते थे, पिताजी, माँ, दोनों भाई और आप, तो किस तरह का माहौल हुआ करता था घर में? अपनी यादों को ताज़ा करना चाहेंगी आप?

ज़रूर, पिताजी तो बड़े ही सीधे-सादे इंसान थे, फ़कीर थे, he was very down to earth। उन्हें मम्मी के हाथों से बना अच्छा मुग़लई खाना बहुत पसन्द था। शायरी तो ख़ैर उन्हें पसन्द थी। उन्होंने अपने तमाम सुनहरे हिट गीत हमारे खार स्थित एक बेडरूम-हॉल फ़्लैट में लिखे थे। 

यानी आप यह कहना चाहती हैं कि भीड़ में बैठ कर वो गाने लिखते थे, उन्हें एकान्त में लिखना पसन्द नहीं था? 
जी हाँ, क्योंकि वो God-gifted थे, उन्हें लिखने के लिए किसी तरह की प्राइवेसी की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। मैंने उन्हें किसी गीत को मिनटों में लिखते हुए देखा है। वो छन्दों को इस क़दर लिख जाते थे कि जैसे ये छन्द उपर से उतार दिए हों किसी ने उन पर। जब वो किसी गीत के मुखड़े और अन्तरों को लिख डालते, तो वो माँ को बुलाते और कहते - "अजी सुनती हो, लो यह गाना सुनो"। अगर माँ उस कमरे में मौजूद ना हों तो ख़ुद किचन में चले जाते थे और खाना बनाती हुई मेरी माँ को उसी वक़्त अपना लिखा गाना सुनाने लग जाते।

बहुत ख़ूब! अच्छा आपने तो यह बता दिया कि हसरत साहब आपकी माँ को अपना लिखा हुआ गीत पढ़ कर सुनाते थे। क्या वो आप बच्चों को भी सुनाते थे या फिर किसी गीत को लिखते समय आप से सुझाव माँगते थे या आपकी राय लेते थे?

वो ज़्यादातर माँ के साथ ही अपने गीतों की चर्चा किया करते थे। कभी-कभार वो मुझे या मेरे भाइयों से अपने गीत को हिन्दी में लिखने के लिए कहते थे क्योंकि उन्हें हिन्दी लिखना और पढ़ना नहीं आता था।

"हिन्दी लिखना और पढ़ना नहीं आता था", मतलब???

जी हाँ, वो उर्दू में अपनी शायरी और गीत लिखते थे। उन्हें हिन्दी नहीं आती थी।

बहुत ही आश्चर्य हुआ यह जानकर। हिन्दी फ़िल्मों के सफलतम गीतकारों में से एक, और हिन्दी भाषा पढ़ना और लिखना नहीं जानते थे। कमाल की बात है! किश्वरी जी, यह बताइए कि क्या आपने कभी उन्हें किसी गीत में असिस्ट किया है?

एक गीत याद है मुझे जिसमें मैंने उनकी मदद की थी क्योंकि बहुत ही कम समय में उन्हें वह गीत तैयार करना था। और वह गीत था ’राम तेरी गंगा मैली’ फ़िल्म का "सुन साहिबा सुन प्यार की धुन"। "सुन साहिबा सुन" जुमला तैयार था, पर आगे का गीत उन्हें पूरा करना था। इसलिए उन्होंने मुझसे कहा कि "सुन" से तुकबन्दी करते हुए कुछ शब्द मैं सुझाऊँ। मैंने उन्हें "धुन", "चुन", "पुन", "बुन", "शगुन" जैसे शब्द सुझाए।

वाह क्या बात है, क्या बात है! इसका मतलब यह कि इस बेहद मशहूर गीत की सफलता में आपका भी योगदान रहा है। यह बड़ी ही अनोखी जानकारी आपने दी हमें। अच्छा उसके बाद क्या हुआ?

उसके बाद डैडी ने फ़टाफ़ट अन्तरों को पूरा किया और निकल गए। रेकॉर्डिंग् से वापस आकर उन्होंने मुझे 5000 रुपये इनाम में दिए, और मेरी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा।

बहुत ख़ूब! गीतों की जब बात चल ही पड़ी है तो किश्वरी जी, यह बताइए कि हसरत साहब के लिखे अनगिनत गीतों में से वह एक गीत कौन सा है जिसे आप सबसे उपर रखना चाहेंगी, या जो आपको सबसे ज़्यादा अज़ीज़ है?

सबसे पसन्दीदा गीत तो वही गीत है जिसे Song of the Century कहा गया है, "बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है"। जैसे ही मेरे कानो में यह बात पहुँची कि डैडी के लिखे इस गीत को Song of the Century का ख़िताब दिया गया है, मैं तो जैसे आसमान में उड़ने लगी। डैडी हम सब से दूर जाने के बाद भी अमर हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं! अच्छा यह बताइए कि इस गीत की क्या ख़ास बात है?

इस गीत की सबसे बड़ी ख़ासियत तो यही है कि भले यह एक रोमान्टिक गीत है, पर डैडी ने इसे किसी ख़ूबसूरत लड़की की कल्पना करते हुए नहीं लिखा था। यह गीत तो उन्होंने हमारे प्रोफ़ेट मोहम्मद की शान में लिखा था। यह मुझे डैडी ने ख़ुद एक बार बताया था।

क्या बात है! यानी कि इस गीत को अगर गहराई से समझा जाए तो इसे एक आध्यात्मिक गीत का दर्जा भी दिया जा सकता है। 

जी हाँ।

मुझे याद है ऐसा ही एक गीत एस. एच. बिहारी साहब का लिखा हुआ है "है दुनिया उसी की ज़माना उसी का, मोहब्बत में जो हो गया हो किसी का", इस गीत के साथ भी इसी तरह का क़िस्सा जुड़ा हुआ है।

जी।

किश्वरी जी, आपका सबसे चहीता गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में "बहारों फूल बरसाओ" है। पर एक टीम हुआ करती थी राज कपूर, शैलेन्द्र-हसरत, शंकर-जयकिशन और मुकेश की। तो मुकेश का गाया और आपके पिताजी का लिखा हुआ वह कौन सा गीत है जो आपके दिल के बहुत क़रीब है?

वह गीत यकीनन फ़िल्म ’संगम’ का है, "ओ महबूबा, तेरे दिल के पास ही है मेरी मंज़िल-ए-मक़सूद"। यह दरअसल राज जी के जज़्बात थे वैजयन्तीमाला जी के लिए, जिसे डैडी ने इस ख़ूबसूरत रूमानी शायरी का जामा पहनाया। और आपको बताऊँ, यह गीत बिल्कुल उस वक़्त लिखा गया था जब राज जी और वैजयन्तीमाला जी का रोमान्स सर चढ़ कर बोल रहा था फ़िल्म ’संगम’ के निर्माण के दौरान।

किश्वरी जी, हमने अभी-अभी टीम की बात की, तो उस ज़माने में क्या आपकी भी मुलाक़ातें हुईं शंकर-जयकिशन, शैलेन्द्र जी, लता जी, मुकेश जी, और रफ़ी साहब जैसे दिग्गज हस्तियों के साथ?

जब मैं छोटी थी, तब मैं शंकर अंकल, जय अंकल, मुकेश जी और राज कपूर जी से कई बार मिली जब ये लोग डैडी से मिलने हमारे घर पर आते थे। जय अंकल तो दीवाली पर हमारे घर आनेवाले लोगों में सबसे पहले होते थे अपने एक बड़े से मिठाई के डब्बे और ड्राई फ़्रूट्स के साथ। मैं बहुत ख़ुशक़िस्मत हूँ कि मुझे ग्रेट रफ़ी साहब और मन्ना दा से भी मिलने का मौका मिला जब मैं डैडी के किसी गीत की रेकॉर्डिंग् पर उनके साथ गई थी। रफ़ी साहब और मैंने एक दूसरे को सलाम किया और उन्होंने मेरे माथे को चूमा। आशा जी भी बहुत ही प्यार से मिलीं जब मैं अपने पति के साथ उनकी किसी रेकॉर्डिंग् पर गई थी। इस तरह से मेरी ख़ुशनसीबी ही कहूँगी कि मुझे ऐसे बड़े-बड़े कलाकारों से मिलने का मौक़ा नसीब हुआ अपने डैडी की वजह से।

हसरत साहब की बेटी बन कर जन्म लेना ही अपने आप में एक सौभाग्य है। अच्छा, किश्वरी जी, अब हम जानना चाहेंगे आपकी माताजी के बारे में। कहा जाता है कि हर कामयाब आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है, तो बताइए कि आपकी माताजी का आपके पिता की सफलता में कितना बड़ा योगदान था?

मेरी माँ मेरे डैडी का ताक़त स्तम्भ थीं। वो डैडी और उनकी कमाई का उचित देख-रेख किया करती थीं और चाहे ख़ुशहाली हो या तंगी, हर तरह के दिनों में, बिना किसी शर्त के, वो उनका साथ दिया करतीं। माँ डैडी के कई गीतों की प्रेरणा भी बनीं। "ग़म उठाने के लिए" एक ऐसा पछतावा भरा गीत है जिसे डैडी ने माँ के लिए लिखा था जिन्हे वो बहुत ज़्यादा प्यार करते थे।

"ग़म उठाने के लिए", आपका मतलब है फ़िल्म ’मेरे हुज़ूर’ का वह गीत?

जी हाँ।

"ग़म उठाने के लिए मैं तो जिए जाऊँगा, साँस की लय पे तेरा नाम लिये जाऊँगा"। बहुत ही ख़ूबसूरत गीत है यह।

"तू ख़यालों में मेरे अब भी चली आती है, अपनी पलकों पे उन अश्क़ों का जनाज़ा लेकर, तूने नींदे करी क़ुरबान मेरी राहों में, मैं नशे में रहा ग़ैरों का सहारा लेकर, ग़म उठाने के लिए मैं तो जिए जाऊँगा"

बहुत ख़ूब! अच्छा किश्वरी जी, यह गीत तो एक ऐसा गीत था जिसे हसरत साहब ने आपकी माताजी की याद में लिखा था। आप की राय में उनका लिखा वह कौन सा गीत होगा जिसे आप अपनी माँ की तरफ़ से हसरत साहब को समर्पित करना चाहेंगे?

"हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे"

वाह! वाह! क्या बात है!

"हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे" महज़ एक गीत नहीं है बल्कि ये प्यार की धाराएँ हैं जो स्वर्ग से धरती पर बरसी हैं। ऐसा गीत और कोई नहीं सिर्फ़ रोमान्स का बादशाह ही लिख सकता था। "हम प्यार के गंगाजल में बमलजी तन मन अपना धो बैठे"। यह गीत मुझे बेहद पसन्द है।

हम बात कर रहे थे आपकी माताजी की। उनसे जुड़ा और कोई वाक्या बताना चाहेंगी?

एक बार एक पार्टी में भगवान दादा और नादिरा जी मेरे डैडी से कहने लगे, "हसरत मिया, आप बहुत ख़ुशक़िस्मत हो जो आपको ऐसी बीवी मिली है, वरना आप जयपुर में या तो भीख माँग रहे होते या मज़दूरी कर रहे होते"। डैडी का जो ड्रीम-हाउस बंगला है ’ग़ज़ल’ के नाम से, उसके पीछे भी माँ का ही सबसे बड़ा हाथ है। डैडी माँ को ’बिलक़िस-ए-ज़मानी’ जिसका अर्थ है दुनिया की राजकुमारी। मेरी माँ का नाम बिलक़िस था।

वाह! किश्वरी जी, जब ऐसी रूमानियत भरी बातें हो रही हैं तो ऐसे में हसरत साहब के किस गीत का ज़िक्र करना चाहेंगी?

फ़िल्म ’तुमसे अच्छा कौन है" का लता जी और रफ़ी साहब का गाया "रंगत तेरी सूरत सी किसी में नहीं नहीं, ख़ुशबू तेरे बदन सी किसी में नहीं नहीं। युं तो हसीं लाख ह दुनिया की राह में, आता नहीं है कोई नहीं मेरी निगाहों में, तुझमें है जो अगन किसी में नहीं नहीं..."। इस गीत का हर एक लफ़्ज़ मोहब्बत की ख़ुशबू से भरा हुआ है। और यह गीत मुझे मेरी पहली मोहब्बत की भी याद दिला जाता है। मैं इस गीत को लगातार सुनती चली जा सकती हूँ और दिन के किसी भी वक़्त गुनगुना भी लेती हूँ।

वाह! एक वह दौर था, एक आज का दौर है। फ़िल्म-संगीत की धारा में बहुत सारे बदलाव आए हैं। तो आज के रोमान्टिक गीतों के बारे में आपके क्या विचार हैं?

आजकल के गीतों में रोमान्स के बारे में मेरा ख़याल यह है कि अब रोमान्स का वजूद ही नहीं है। डैडी के शब्दों में आज के गाने महज़ तुकबन्दी बन कर रह गए हैं। आज जिस तरह के गीत लिखे जा रहे हैं, कोई भी गीतकार बन सकता है, मैं भी लिख सकती हूँ।

क्या आपको भी लिखने का शौक़ है?

जी हाँ, थोड़ा बहुत लिख लेती हूँ। 

कुछ सुनाइए ना?

एक कविता जो मैंने डैडी को डेडिकेट करते हुए लिखा है, वह सुनाती हूँ।

ज़रूर!

हर एक मनज़र तमाशा दिखाई देता है
तेरे बिना सबकुछ फीका दिखाई देता है
अब आयें भी तो कहाँ से सदायें तेरी
ना तू है ना तेरा साया दिखाई देता है।

वाह! बहुत ख़ूब! पर एक हक़ीक़त यह भी है कि अपने गीतों के ज़रिए हसरत साहब हमेशा जीवित रहेंगे। एक और सुनाइए किश्वरी जी?

एक और ग़ज़ल सुनिए...
किस तरह जान को रोकूँ मैं, क्या करूँ मुझको यह ख़याल सताता है,
जाने का नाम जब भी लेता है वो, मैं क्या करूँ दिल मेरा डूब जाता है।

बहुत सुन्दर ग़ज़ल है! वैसे आपको हसरत साहब की कौन सी ग़ज़ल बहुत पसन्द है?

एक ग़ज़ल है फ़िल्म ’मेरे हुज़ूर’ फ़िल्म में रफ़ी साहब की आवाज़ में, "वह ख़ुशी मिली है मुझको", यह मुझे बहुत पसन्द है और हर प्यार करने वाला अपने आप को इस ग़ज़ल के साथ जोड़ सकता है।

इस ग़ज़ल के तमाम शेर आपको याद हैं?

जो गुज़र रही है मुझ पर, उसे कैसे मैं बताऊँ,
वह ख़ुशी मिली है मुझको, मैं ख़ुशी से मर ना जाऊँ।

मेरे दिल की धड़कनों का यह पयाम तुमको पहुँचे,
मैं तुम्हारा हमनशी हूँ, यह सलाम तुमको पहुँचे,
उसे बन्दगी मैं समझूँ जो तुम्हारे काम आऊँ
वह ख़ुशी मिली है मुझको मैं ख़ुशी से मर ना जाऊँ।

वाह!

मेरी ज़िन्दगी में हमदम कभी ग़म ना तुम उठाना,
कभी आए जो अन्धेरे मुझे प्यार से बुलाना,
मैं चिराग़ हूँ वफ़ा का, मैं अन्धेरे में जगमगाऊँ, 
वह ख़ुशी मिली है मुझको मैं ख़ुशी से मर ना जाऊँ।

और जो तीसरा शेर है, वह तो जैसे मेरे जसबात है डैडी के लिए....

मेरे दिल की महफ़िलों में वह मकाम है तुम्हारा,
कि ख़ुदा के बाद लब पर बस नाम है तुम्हारा,
मेरी आरज़ू यही है मैं तुम्हारे गीत गाऊँ,
वह ख़ुशी मिली है मुझको मैं ख़ुशी से मर ना जाऊँ।

वाह! क्या बात है! बहुत ही सुन्दर! अच्छा किश्वरी जी, क्या आपके दोनों भाई भी लिखते हैं? उन्हें भी शौक़ है?

जी नहीं, सिर्फ़ मैं ही थोड़ा-बहुत लिखती हूँ।

क्या नाम हैं आपके दो भाइयों के?

मेरे बड़े भाईसाहब का नाम है अख़्तर हसरत जयपुरी और मेरा छोटा भाई है आसिफ़ जयपुरी।

अच्छा किश्वरी जी, और कौन कौन से गीत हैं हसरत साहब के जो आपको पसन्द हैं?

मुकेश जी का गाया फ़िल्म ’दीवाना’ का गीत "तारों से प्यारे दिल के इशारे, प्यासे हैं अरमान आ मेरे प्यारे" मुझे बहुत पसन्द है। इस गीत को डैडी ने इतने प्यार से लिखा है कि जब भी मैं यह गीत सुनती हूँ तो रोमान्स की एक अलग ही दुनिया में पहुँच जाती हूँ। यह गीत सच्चे प्यार की ताक़त को बयान करता है...  आना ही होगा तुझे आना ही होगा...। फ़िल्म ’आख़िरी दाँव’ का एक गीत है "ऐसा ना हो कि इन वादियों में मैं खो जाऊँ, और तुम मुझे ढूंढा करो और मैं लौट के ना आऊँ", यह भी रफ़ी साहब का गाया हुआ है। डैडी लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल जी के ज़बरदस्त फ़ैन थे और उनकी एक दिली तमन्ना थी एल.पी के साथ काम करने की। इस तरह से लक्ष्मी-प्यारे जी की यह राजसी कम्पोज़िशन जिसे रफ़ी साहब की दिव्य आवाज़ ने संवारा है, मेरे दिल के बहुत करीब है क्योंकि यह मुझे डैडी की याद दिला जाता है। एक और गीत, यह भी रफ़ी साहब का ही गाया हुआ, "रुख़ से ज़रा नक़ाब उठा दो, मेरे हुज़ूर"। शहद से भरी हुई यह ग़ज़ल, और शायद ’मेरे हुज़ूर’ फ़िल्म के शीर्षक गीत के रूप में इससे बेहतर गीत नहीं सकता था। मिठास और ख़ुशबू लिए यह ग़ज़ल हर प्यार करने वाले को समर्पित है। फ़िल्म ’आरज़ू’ की ग़ज़ल "अजी रूठ कर अब कहाँ जाइयेगा" भी मुझे बेहद पसन्द है। डैडी ने प्यार के बेहद नाज़ुक शब्दों का इस्तेमाल इसमें किये हैं, जितनी भी तारीफ़ करूँ रुकती नहीं ज़ुबाँ। राजसी ग़ज़ल!

वाक़ई एक से बढ़ कर एक रचनाएँ हैं ये सभी, और आपकी पसन्द की भी दाद देता हूँ किश्वरी जी।

शुक्रिया!

किश्वरी जी, अब हम इस साक्षात्कार के अन्तिम चरण में पहुँच गए हैं। यह बताइए कि आपकी हसरत साहब से अन्तिम मुलाक़ात कब हुई थी?

डैडी से जो मेरी अन्तिम मुलाक़ात थी वह बहुत ही दिल को छू लेने वाली और दिल को मरोड़ कर रख देने वाली थी। मैं साल 1999 में भारत आई थी और यहाँ तीन महीने रही। तीन महीने ख़त्म हो गए और मेरे वापस जाने का समय आ गया। मुझे याद है कि जब मैं एअरपोर्ट के लिए निकल रही थी तब डैडी ने कस के मुझे गले से लगा लिया और ज़ोर ज़ोर से रोने लगे और कहने लगे कि बेटा, यह हमारी आख़िरी मुलाक़ात है। और हाँ, उनकी यह भविष्यवाणी सच साबित हुई और मेरे चले जाने के एक महीने बाद ही उनका देहान्त हो गया। मैंने उन्हें उस तरह से रोते हुए कभी नहीं देखा था पहले। उस दिन को याद करते हुए आज भी मेरी आँखें भर आती हैं।

मैं समझ सकता हूँ। आपको बस हसरत साहब का ही लिखा एक गीत याद दिलाना चाहूँगा, "तुम मुझे युं भुला ना पाओगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे, संग संग तुम भी गुनगुनाओगे.."

बिल्कुल सच बात है!

चलते-चलते हसरत साहब के किस गीत के ज़िक्र से इस मुलाक़ात को आप अंजाम देना चाहेंगी?

यकीनन "जाने कहाँ गए वो दिन...", एक बहुत ही दिल को मरोड़ कर रख देने वाला गीत, जो पैथोस से भरा हुआ है। इस गीत में डैडी ने जैसे अपनी निजी भावनाओं को ही गीत की शक्ल में उतार दिए हों, यह वह समय था जब उनके तथाकथित ’good friends' ने उनका साथ छोड़ दिया था। डैडी जब भी कभी यह सुनते, रोने लगते। मैं भी जब भी कभी यह गीत सुनती हूँ, मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

किश्वरी जी, बहुत-बहुत शुक्रिया आपका, आपने हमें इतना लम्बा समय दिया, हसरत साहब की इतनी सारी बातें हमें बताईं, उनके गीतों की चर्चा कीं, ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से और अपने पाठकों की तरफ़ से, और मैं अपनी तरफ़ से आपको बहुत बहुत धन्यवाद देता हूँ, नमस्कार!

आपका भी बहुत बहुत शुक्रिया जो आपने मुझे याद किया और डैडी से जुड़ी बातें बताने का मौका दिया। नमस्कार!


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य बताइएगा। आप अपने सुझाव और फरमाइशें ई-मेल आईडी cine.paheli@yahoo.com पर भेज सकते है। अगले माह के चौथे शनिवार को हम एक ऐसे ही चर्चित अथवा भूले-विसरे फिल्म कलाकार के साक्षात्कार के साथ उपस्थित होंगे। अब हमें आज्ञा दीजिए।  



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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