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Wednesday, December 8, 2010

है जिसकी रंगत शज़र-शज़र में, खुदा वही है.. कविता सेठ ने सूफ़ियाना कलाम की रंगत हीं बदल दी है

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०५

ससे पहले कि हम आज की महफ़िल की शुरूआत करें, मैं अश्विनी जी (अश्विनी कुमार रॉय) का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा। आपने हमें पूरी की पूरी नज़्म समझा दी। नज़्म समझकर हीं यह पता चला कि "और" कितना दर्द छुपा है "छल्ला" में जो हम भाषा न जानने के कारण महसूस नहीं कर पा रहे थे। आभार प्रकट करने के साथ-साथ हम आपसे दरख्वास्त करना चाहेंगे कि महफ़िल को अपना समझें और नियमित हो जाएँ यानि कि ग़ज़ल और शेर लेकर महफ़िल की शामों (एवं सुबहों) को रौशन करने आ जाएँ। आपसे हमें और भी बहुत कुछ सीखना है, जानना है, इसलिए उम्मीद है कि आप हमारी अपील पर गौर करेंगे। धन्यवाद!

आज हम अपनी महफ़िल को उस गायिका की नज़र करने वाले हैं, जो यूँ तो अपनी सूफ़ियाना गायकी के लिए मक़बूल है, लेकिन लोगों ने उन्हें तब जाना, तब पहचाना जब उनका "इकतारा" सिद्दार्थ (सिड) को जगाने के लिए फिल्मी गानों के गलियारे में गूंज उठा। एकबारगी "इकतारा" क्या बजा, फिल्मी गानों और "पुरस्कारों" का रूख हीं मुड़ गया इनकी ओर। २००९ का ऐसा कौन-सा पुरस्कार है, ऐसा कौन-सा सम्मान है, जो इन्हें न मिला हो!

इन्हें सुनकर एक अलग तरह की अनुभूति होती है.. ऐसा लगता है मानो आप खुद "ट्रांस" में चले गए हों और आपके आस-पास की दुनिया स्वर-विहीन हो गई हो.. शांति का वातावरण-सा बुन गया हो कोई... ।

आत्मा में कलम डुबोकर लिखी गई किसी कविता की तरह हीं हैं ये, जिनका नाम है "कविता सेठ"। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बरेली में हुआ, वहीं इनका पालन-पोषण हुआ और वहीं पर स्नातक तक की शिक्षा इन्होंने ग्रहण की। शादी के बाद ये दिल्ली चली आई और फिर ऑल इंडिया रेडिया एवं दूरदर्शन के लिए गाना शुरू कर दिया। इसी दौरान इन्होंने दिल्ली के हीं "गंधर्व महाविद्याल" से "संगीत अलंकार" (संगीत के क्षेत्र में स्नातकोत्तर) की उपाधि प्राप्त की .. साथ हीं साथ दिल्ली विश्वविद्यालय से "हिन्दी साहित्य" में परा-स्नातक की डिग्री भी ग्रहण की। इन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्वालियर घराने के "एन डी शर्मा", गंधर्व महाविद्यालय के विनोद एवं दिल्ली घराने के उस्ताद इक़बाल अहमद खान से प्राप्त की है।

इन्होंने बरेली के "खान-कहे नियाज़िया दरगाह" से अपनी हुनर का प्रदर्शन प्रारंभ किया, फिर आगे चलकर ये पब्लिक शोज़ एवं म्युज़िकल कंसर्ट्स में गाने लगीं। कविता मुख्यत: सूफ़ी गाने गाती हैं, अगरचे गीत, ग़ज़ल एवं लोकगीतों में भी महारत हासिल है। इन्होंने देश-विदेश में कई सारी जगहों पर शोज़ किए हैं। ऐसे हीं एक बार मुज़फ़्फ़र अली के अंतरराष्ट्रीय सूफ़ी महोत्सव इंटरनेशल सूफ़ी फ़ेस्टिवल) में इनके प्रदर्शन को देखकर/सुनकर सतीश कौशिक ने इन्हें अपनी फिल्म "वादा" में "ज़िंदगी को मौला" गाने का न्यौता दिया था। आगे चलकर जब ये मुंबई आ गईं तो इन्हें २००६ में अनुराग बसु की फिल्म "गैंगस्टर" में "मुझे मत रोको" गाने का मौका मिला। इस गाने में इनकी गायकी को काफी सराहा गया, लेकिन अभी भी इनका फिल्मों में सही से आना नहीं हुआ था। ये अपने आप को प्राइवेट एलबम्स तक हीं सीमित रखी हुई थीं। इन्होंने "वो एक लम्हा" और "दिल-ए-नादान" नाम के दो सूफ़ी एलबम रीलिज किए। फिर आगे चलकर एक इंडी-पॉप एलबम "हाँ यही प्यार है" और दो सूफ़ी अलबम्स "सूफ़ियाना (२००८)" (जिससे हमने आज की नज़्म ली है) एवं "हज़रत" भी इनकी नाम के साथ जुड़ गए। "सूफ़ियाना" सूफ़ी कवि "रूमी" की रूबाईयों और कलामों पर आधारित है.. कविता ने इन्हें लखनऊ के ८०० साल पुराने "खमन पीर के दरगाह" पर रीलिज किया था।


कुछ महिनों पहले हीं कविता "कारवां" नाम के सूफ़ी बैंड का हिस्सा बनीं हैं, जब एक अंतर्राष्ट्रीय सूफ़ी महोत्सव में इनका ईरान और राजस्थान के सूफ़ी संगीतकारों से मिलना हुआ था। तब से यह समूह सूफ़ी संगीत के प्रचार-प्रसार में पुरज़ोर तरीके से लगा हुआ है। आजकल ये अपने बेटे को भी संगीत की दुनिया में ले आई हैं।

कविता से जब उनके पसंदीदा गायक, संगीतकार, गीतकार के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब कुछ यूँ था: (साभार: प्लैनेट बॉलीवुड)

पसंदीदा गायक: एल्टन जॉन, ए आर रहमान, सुखविंदर, शंकर महादेवन, आबिदा परवीन
पसंदीदा संगीतकार: ए आर रहमान, अमित त्रिवेदी, शंकर-एहसान-लॉय
पसंदीदा गीतकार/शायर: वसीम बरेलवी, ज़िया अल्वी, जावेद अख़्तर, गुलज़ार साहब
पसंदीदा वाद्य-यंत्र: रबाब, डफ़्फ़, बांसुरी, ईरानी डफ़्फ़
पसंदीदा सूफ़ी कवि: कबीरदास, मौलाना रूमी, हज़रत अमिर खुसरो, बाबा बुल्लेशाह
पसंदीदा गीत: ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा (जोधा-अकबर)

उनसे जब यह पूछा गया कि नए गायकों को "रियालिटी शोज़" में हिस्सा लेना चाहिए या नहीं, तो उनका जवाब था: "रियालिटी शोज़ के बारे में कभी न सोचें, बल्कि यह सोचें कि "रियालिटी" में उनकी गायकी कितनी अच्छी है। जितना हो सके शास्त्रीय संगीत सीखने की कोशिश करें। कहा भी गया है कि - नगमों से जब फूल खिलेंगे, चुनने वाले चुन लेंगे, सुनने वाले सुन लेंगे, तू अपनी धुन में गाए जा।" वाह! क्या खूब कहा है आपने!

चलिए तो अब आज की नज़्म की ओर रूख करते हैं। कविता को यह नज़्म बेहद पसंद है और उन्हें इस बात का दु:ख भी है कि यह नज़्म बहुत हीं कम लोगों ने सुनी है, लेकिन इस बात की खुशी है कि जिसने भी सुनी है, वह अपने आँसूओं को रोक नहीं पाया है। आखिर नज़्म है हीं कुछ ऐसी! आप यह तो मानेंगे हीं कि सूफ़ियाना कलामों में ख़ुदा को जिस नज़रिये से देखा जाता है, वह नज़रिया बाकी कलामों में शायद हीं नज़र आता है। कविता इसी नज़रिये को अपनी इस नज़्म के माध्यम से हम सबके बीच लेकर आई हैं। "शब को सहर" मे बदलने वाला वह ख़ुदा आखिरकार कैसा लगता है, आप खुद सुनिए:

बदल रहा है जो शब सहर में,
ख़ुदा वही है..

है जिसका जलवा नज़र-नज़र में,
ख़ुदा वही है..

जो फूल खुशबू गुलाब में है,
ज़मीं, ______, आफ़ताब में है,
है जिसकी रंगत शज़र-शज़र में,
खुदा वही है..




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "सांवला" और शेर कुछ यूँ था-

हो छल्ला पाया ये गहने, दुख ज़िंदरी ने सहने,
छल्ला मापे ने रहने, गल सुन सांवला
ढोला,
ओए सार के कित्ते कोला

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

मेरा हर लफ़्ज़ लकीर, अहसास स्याही है "आजाद"
चेहरा एक सांवला-सा ग़ज़ल में दिख रहा होगा. -आजाद

सांवले की आमद से हर चीज़ खिल गयी है.
मौसम हुआ है खुशनुमा दुनिया बदल गयी है. -अवध लाल जी

सांवला सभी को मेरा लगे है सजन
मगर मुझे ऐसा लागे जैसे किशन । - शरद तैलंग जी

कोई सांवला यहाँ कोई सफेद है
कोई खुश तो किसी को खेद है
एक खुदा ने बनाया हम सबको
फिर सबके रंगों में क्यों भेद है? - शन्नो जी (जबरदस्त....... )

सांवला सा मन और उजली सी धूप,
बस इसके सिवा कुछ नहीं,कैसा भी हो रूप - नीलम जी

चितचोर सांवला सजन , करता है नित शोर .
नदी पर करे इशारा , आजा मेरी ओर . - मंजु जी

मन के वीरान कोने मैं एक सांवला सा गम
मन के अँधेरे मैं कुछ घुल मिल सा गया है !!
सिसकियों की स्याह गोद मैं
सहमी सहमी सी यादों के
शूल भरे फूलों से कुछ छिल सा गया है !! - अवनींद्र जी

पिछली महफ़िल की शुरूआत हुई सजीव जी के प्रोत्साहन के साथ। आपके बाद शन्नो जी की आमद हुई। अपने बहुचर्चित मज़ाकिया लहजे में शन्नो जी ने फिर से हमें डाँट की खुराक पिलाई, लेकिन हमारे आग्रह करने के बाद उन्होंने गीत को फिर से सुना और अंतत: गायब शब्द की शिनाख्त करने में सफ़ल हुईं। तो इस तरह से कुछ कोशिशों के बाद महफ़िल का गायब शब्द सब के सामने प्रस्तुत हुआ। शन्नो जी, आपने शब्द तो पहचान लिया, लेकिन आपसे एक गलती हो गई। अगर आप उस शब्द पर कोई शेर कह देतीं तो हम "शान-ए-महफ़िल" के खिताब से आप हीं को नवाज़ते। अब चूँकि "साँवला" शब्द पर शेर लेकर पूजा जी सबसे पहले हाज़िर हुईं, इसलिए हम उन्हें हीं "शान-ए-महफ़िल" घोषित करते हैं। पूजा जी के बाद अवध जी, शरद जी , नीलम जी, मंजु जी एवं अवनींद्र जी का महफ़िल में आना हुआ। आप सभी के स्वरचित शेर एवं नज़्म कमाल के हैं। बधाई स्वीकारें! इन सबके बाद शन्नो जी फिर से महफ़िल में आईं, लेकिन इस बार वो खाली हाथ न थीं.. आपकी झोली में तीन-तीन रूबाईयाँ थीं और तीनों एक से बढकर एक। हमारी पिछली महफ़िल की सबसे बड़ी उपलब्धि रही अश्विनी जी का महफ़िल में आना। यूँ तो आपका शुक्रिया हम शुरूआत में हीं कर चुके हैं, लेकिन आपका जितना भी आभार प्रकट किया जाए कम होगा। उम्मीद करता हूँ कि हमारे बाकी मित्र भी भविष्य में इसी तरह हमारी सहायता करेंगे।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, June 23, 2009

वाह-वाह रम्ज़ सजन दी होर..... महफ़िल-ए-अथाह और "बाबा बुल्ले शाह"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२३

क शख्स जिसे उसकी लीक से हटकर धारणाओं और भावनाओं के कारण गैर-इस्लामिक करार दिया गया और जिसे कज़ा के बाद भी अपने समुदाय का कब्रिस्तान नसीब न हुआ,क्योंकि आसपास के मुल्लाओं को उसकी बातों में "काफ़िर" होने की बू आती थी, नियति का यह खेल देखिए कि आज उसे पूरी दुनिया में इबादत के शिखर पर स्थान दिया जाता है और उसके दर्शन और लेखन की तुलना "रूमि" और "शम्स-ए-तबरिज़" से की जाती है। जन्म से मुसलमान होने के बावजूद उसकी प्रसिद्धि सारे धर्मों में एक-सी है, दरवेश और बुद्धिजीवी उसे "दोनों दुनिया का शेख","खुदा का बंदा" कहकर संबोधित करते हैं और न सिर्फ़ पंजाब बल्कि पूरे मुल्क या कहिए पूरी दुनिया में "पराभौतिक/रहस्यवादी" कविता का जानकार उससे अच्छा नहीं मिलता। उसे "सूफी-साहित्य का शिखर-पुरूष" कहने वाले भी कम नहीं है। "क़सुर" में उसके कब्र के पास की ज़मीन आज भी इंसानियत का दम भरती है और आज भी उस जगह पर बड़े-छोटे का भेदभाव नहीं होता, वहाँ जो भी जाता है कुछ न कुछ हासिल करके हीं आता है। उसका जन्म कब हुआ, इसकी सही जानकारी किसी को नहीं है, लेकिन ज्यादातर विद्वानों का यह मत है कि उसने १६८० से १७५८ तक इस दुनिया को अपने होने का अनुभव दिया था। जन्म से छ: महीने तक की अवधि उसने "बहावलपुर" के "उच" नामक जगह पर बिताई,जोकि अब पाकिस्तान में है और उसके बाद उसका परिवार "मलकवल" चला गया। पिता "शाह मोहम्मद दरवेश" गाँव की हीं मस्जिद में "ज़ाहिद" थे और "शिक्षक" भी। "मलकवल" में कुछ दिन बिताने के बाद उसे अपने परिवार के साथ "पंडोके" जाना पड़ा, जोकि "क़सुर" से ५० मील दक्षिण-पूर्व की ओर था । वैसे कुछ लोगों का यह भी मानना है कि उसका जन्म "पंडोके" में हीं हुआ था। हज़ार लोग,हज़ार बातें,इसलिए पक्के से यह कहा नहीं जा सकता कि सच्चाई किस में है, वैसे सच्चाई जो भी है,यह तो तय है कि "काफ़ी/कफ़ी"(पंजाबी साहित्य का एक रूप) का जानकार उस-सा दूसरा कोई न हुआ।

"अब्दुल्लाह शाह" या फिर "मीर बुल्ले शाह क़ादिरी शतरी" के पिता अरबी, फ़ारसी और "पाक़ क़ुरान" के बहुत बड़े जानकार थे। उनका आध्यात्म की तरफ़ भी गहरा झुकाव था,इसी झुकाव और नेकदिली के कारण लोगों ने उन्हें दरवेश की उपाधि से नवाज़ा था। कहा जाता है कि पूरे परिवार में "बुल्ले शाह" की बहन उन्हें सबसे ज्यादा चाहती थी और उसने "बुल्ले शाह" की तरह हीं ता-ज़िंदगी शादी नहीं की। "पंडोके भटियाँ" में अब भी उनका (बुल्ले शाह के पिता का) मकबरा है, जहाँ हर साल "उर्स"(एक तरह का मेला) आयोजित किया जाता है और बड़े हीं जोश-औ-जुनूँ के साथ "बुल्ले शाह" के कफ़िये गाए जाते हैं। इस तरह एक हीं साथ पिता-पुत्र दोनों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। यह तो हुई बुल्ले शाह और उनके पिता की बात, लेकिन अगर हम इनकी पीढी में पीछे की ओर जाए तो यह पता चलता है कि "शाह मोहम्मद दरवेश" और "बुल्ले शाह" के होने से लगभग ३०० साल पहले इन्हीं के वंश के "सैयद जलालुद्दीन बुखारी" "सुरख-बुखारा" से "मुल्तान" आए थे। "मुल्तान" अब पाकिस्तान में है और "सुरख-बुखारा" "उजबेकिस्तान" में। यह भी कहा जाता है कि "हज़रत मोहम्मद" इन्हीं के पूर्वज थे। इस तरह एक तरफ़ "बुल्ले शाह" "सैय्यद" वंश के होने के कारण "हज़रत मोहम्मद" से जुड़े थे तो दूसरी तरफ़ "सूफ़ी विचारो" के कारण ये न सिर्फ़ खुदा को मानते थे, बल्कि हर ज़र्रे में "खुदा" के अंश की भी मंजूरी देते थे। वैसे भी "सूफ़ियों" के अनुसार "निर्वाण" पाने की चार शर्ते हैं:

१) शरियत: इस्लाम में कहे मुताबिक एक अनुशासित ज़िंदगी जीना
२) तरिक़त: मुर्शिद या गुरू की आज्ञा का पालन करना
३) हक़ीक़त: उस खुदा के नूर से दो-चार होना
४) मार्फ़त: सच से सामना होने के बाद उसी एक सच्चाई(उस एक खुदा) में खुद को डुबो देना

"बुल्ले शाह" ने अपनी ज़िंदगी का एक बहुमूल्य समय "मुर्शिद" यानी कि "गुरू" की खोज में बीता दिया। और अंत में जिस गुरू की शरण ली, वह न तो ओहदे में उनके स्तर का था और न हीं भेष-भूषा में किसी गुरू की तरह जान पड़ता था। यूँ तो "मिस्टिसिज़्म"(पराभौतिकवाद/रहस्यवाद) पर उस इंसान ने फ़ारसी में कई सारी किताबें लिखी थीं,जिनमें "दस्तूर-उल-अमल","इस्लाह-उल-अमल","लताइफ़-इ-ग़ैब्या", "इशरतुल तालिबिन" प्रमुख हैं, लेकिन पेशे से वह इंसान एक "माली" था और इसी कारण "बुल्ले शाह" के कई सारे शुभचिंतकों ने उनसे अपनी यह राय ज़ाहिर की थी कि "आप पैगम्बर मोहम्मद के वंशज हैं और आप कई सारी तिलिस्मी शक्तियों के मालिक हैं,फिर क्या यह आपको शोभा देता है कि आप एक नीच जाति के माली के शागिर्द बन जाएँ। क्या यह शर्मनाक नहीं है?" इतना सब कुछ होने के बावजूद "बुल्ले शाह" को अपने मुर्शिद "इनायत शाह क़ादरी" के प्रति बहुत हीं ज्यादा निष्ठा थी। उनका अपने गुरू के प्रति प्रेम के कई सारे किस्से मशहूर हैं। "प्रोफ़ेसर पुर्ण सिंह" एक ऐसी हीं घटना का हवाला देते हुए लिखते हैं: "एक बार बुल्ले शाह ने एक लड़की को अपने पति का इंतज़ार करते हुए देखा और पाया कि उसी इंतज़ार में वह सज-सँवर रही है,बालों में गाँठ और जुड़ा बाँध रही है। न जाने बुल्ले शाह को क्या सूझा और उन्होंने भी अपने गुरू से मिलने जाने से पहले एक लड़की की तरह का भेष बना लिया,बालों में उसी तरह के गांठ बाँध लिए और चल पड़े गुरू रहमत से मिलने। " तो इस तरह की थी बुल्ले शाह की भक्ति और जिसकी अपने गुरू के लिए इतनी भक्ति हो ,उसके दिल में खुदा के लिए कैसा अनुराग होगा, यह अनकहे हीं स्पष्ट है। "बुल्ले शाह" को लोग प्यार से "बाबा बुल्ले शाह" भी कहते हैं। "बाबा" के समकालीन कई सारे जानेमाने सूफ़ी और उर्दू कवि थे, जिनमें "वारिश शाह"(हीर-रांझा के रचयिता), सचल सरमस्त(वास्तविक नाम- अब्दुल वहद) और "मीर तकी मीर" के नाम सबसे ऊपर आते हैं। वैसे तो "बाबा" का लिखा सबकुछ संभाले जाने और गुनने योग्य है, लेकिन एक कलाम जो खासा प्रसिद्ध हुआ और जिसने हर किसी को अपने दिल में झांकने को मजबूर कर दिया,वो कुछ यूँ है:

बुल्ला कि जाणां मैं कौन?

न मैं अरबी न लाहौरी, न मैं हिंदी शहर नगौरी
न हिंदू न तुर्क पिशौरी, न मैं रहंदा विच नदौन।

इस कलाम को "रब्बी शेरगिल" ने एक अलग हीं चेहरा दे दिया है। वैसे आज हम इसकी बात नहीं कर रहे। आज हम "बेगम" आबिदा परवीन की आवाज़ में लयबद्ध "बाबा बुल्ले शाह" एलबम से "वाह-वाह रम्ज़ सजन दी होर" लेकर आप सबके सामने हाज़िर हुए हैं। अब चूँकि रचना "पंजाबी" भाषा में है,इसलिए मुझे इसका अर्थ नहीं मालूम। मैं आप सबसे यह दरख्वास्त करूँगा कि जितना हो सके,उतना हीं "तर्ज़ुमा" हमारे लिए कर दें। तो लीजिए कलाम पेश है:

वाह-वाह रम्ज़ सजन दी होर!

कोठे चढकर देवान होका
इश्क़ विहाजो कोई ना लोकां
इस सा मूल ना खाना धोखा
जंगल बस्ती मिले ना ठौर।

दे दीदार होया जद राही
अच्नाचेत प्यी गल विच फ़ाही
अनहदी कीति बेपरवाही
मैनु मिल्या ठग लाहौर।

आशिक़ फिरदे छुप-छुपाते
जैसे मूरत साडा मदमाते
दामे ज़ुल्फ़ दे अंदर फ़ाते
ओथे चल्ले वश ना जोर।

बुल्या शाह नु कोई ना देखे
जो देखे सो किसे ना लेखे
उस दा रंग ना रूप ना रेखे
ओही होवे होके चोर।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

वो फिराक हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन,
वो गुलाब बनके खिलेगा क्या, जो ___ बनके जला न हो...

आपके विकल्प हैं -
a) चिराग, b) मशाल, c) आफ़ताब, d) माहताब

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-
पिछली महफिल का सही शब्द था -"आवारा" और सही शेर कुछ यूँ था -

एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्जाम नहीं,
दुनिया वाले दिलवालों को और बहुत कुछ कहते हैं...

स्वप्न मंजूषा जी बधाई सही जवाब के लिए, आपने जो शेर फ़रमाया वो कुछ ऐसा था -

वो जो अभी इस राह गुजर से चाक गिरेबाँ गुजरा है,
उसी आवारा दीवाने को "जालिब जालिब" कहते हैं...

नीलम जी ने अर्ज किया -

आवारा हूँ गलियों में, मैं और मेरी तन्हाई,
जाये तो कहाँ जाएँ, हर मोड़ पर रुसवाई ...

रचना जी बहुत दिनों बाद लौटी इस शेर के साथ -

आवारा सा फिरता है वो
इश्क की धुन में रहता है वो...

इश्क की इस धुन में जीने का मज़ा ही कुछ और है....सभी रसिक श्रोताओं को बधाई.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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