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Tuesday, August 3, 2010

"इश्क़ महंगा पड़े फिर भी सौदा करे".. ऐसा हीं एक सौदा करने आ पहुँचें हैं कभी साफ़, कभी गंदे, "लफ़ंगे परिंदे"

ताज़ा सुर ताल २९/२०१०

विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों! जैसा कि हाल के सालों में हम देखते आ रहे हैं.. आज के फ़िल्मकार नई नई कहानियाँ हिंदी फ़िल्मों में ला रहे हैं। वैसे तो ज़्यादातर फ़िल्मों की कहानियों का आधार नायक-नायिका-खलनायक ही होते रहे हैं और आज भी है, लेकिन बदलते समाज और दौर के साथ साथ फ़िल्म के पार्श्व में काफ़ी परिवर्तन आ गए हैं। अब आप ही बताइए मुंबई के 'बाइक गैंग्स' पर किसी फ़िल्म की कल्पना क्या ७० के दशक में की जा सकती थी?

सुजॊय - क्योंकि फ़िल्म समाज का आईना कहलाता है, तो बदलते दौर के साथ साथ, बदलते समाज के साथ साथ फ़िल्में भी बदल रही है। और यही बात लागू होती है फ़िल्म संगीत पर भी। जब जब फ़िल्मी गीतों के गिरते हुए स्तर पर लोग चर्चा शुरु कर देते हैं, तब भी उन्हें इसी बात को ध्यान में रखना होगा कि अब वक़्त बदल गया है। आज की नायिका अगर "चुप चुप खड़े हो ज़रूर कोई बात है" जैसे गीत गाये, तो वह बहुत ज़्यादा नाटकीय और बेमानी लगेगी। इसलिए बदलते दौर के साथ साथ बदलते संगीत को भी खुले दिल से स्वीकारें, इसी में शायद सब की भलाई है। हाँ, यह ज़रूर है कि गीतों का स्तर नहीं गिरना चाहिए। अच्छा फ़नकार वही है जो लाख पाबंदियों के बावजूद भी अच्छा काम कर निकल जाए। और पिछले कुछ दिनों से हम देख भी रहे हैं कि कुछ कलाकार इस ओर ध्यान दे भी रहे हैं।

विश्व दीपक - तो अब आज की फ़िल्म की चर्चा शुरु की जाए! जैसा कि हमने पिछले हफ़्ते हीं इशारा कर दिया था, आज हम लेकर आए हैं फ़िल्म 'लफ़ंगे परिंदे' के गीतों को। यह फ़िल्म मुंबई के बाइक गैंग्स की कहानी है जिसका निर्माण किया है आदित्य चोपड़ा ने और निर्देशन है प्रदीप सरकार का। नील नितिन मुकेश फ़िल्म के नायक हैं जो नंदु की भूमिका में नज़र आएँगे, जो एक फ़ाइटर है और जो आँखों में पट्टी लगाकर रिंग में लड़ेंगे। उधर फ़िल्म की नायिका बनीं हैं दीपिका पडुकोण जो निभा रही है पिंकी का किरदार, जो एक नृत्यांगना है और जो नेत्रहीन है। नंदु पिंकी को अपनी आँखों से दुनिया दिखाता है तो पिंकी उसे प्यार करना सिखाती है। लेकिन इन दोनों को अपने प्यार के लिए किस तरह की कीमत चुकानी होगी, यह आप ख़ुद देख लीजिएगा २० अगस्त के बाद, यानी जब यह फ़िल्म प्रदर्शित हो जाएगी।

सुजॊय - तो दोस्तों, यश राज के बैनर तले बनने वाली इस फ़िल्म का पहला गीत सुनते हैं नवोदित गायक रोनित सरकार की आवाज़ में। फ़िल्म के गीतकार हैं प्रदीप सरकार के चहेते गीतकार स्वानंद किरकिरे, और संगीत के लिए चुना गया है आर. आनंद को।

गीत - लफ़ंगे परिंदे


विश्व दीपक - आजकल रॊक शैली का लगभग सभी फ़िल्मों में इस्तेमाल हो रहा है। पिछले कुछ हफ़्तों में हमने जिन जिन फ़िल्मों के गानें इस स्तंभ में सुने हैं, उन सब में एक ना एक रॊक अंदाज़ का गीत ज़रूर रहा है। "लफ़ंगे परिंदे" गीत भी उसी रॊक स्टाइल का है। हेवी मेटल, गीटार की भरमार और उस पर रोनित सरकार की वज़नदार आवाज़ धुन और इन हेवी मेटल्स के साथ पूरा पूरा न्याय करती है। यह गीत किसी रॊक ऐल्बम में होती तो इसे ज़्यादा कामयाबी मिलती, फ़िल्मी गीत के रूप में इस तरह के गीत का लोगों की ज़ुबान पर चढ़ना ज़रा मुश्किल सा हो जाता है। गीत अच्छा है इसमें कोई शक़ नहीं है, और इस गीत से इस ऐल्बम की धमाकेदार शुरुआत हुई है।

सुजॊय - इस बात पर अगर हम ग़ौर करें कि यह एक यशराज फ़िल्म है, तो हमेशा से यशराज के फ़िल्म का शीर्षक गीत बड़ा ही रोमांटिक और नर्मोनाज़ुक हुआ करता है। उस दृष्टि से यह एक उल्लंघन है उनके हीं नियमों का है और ऐसा यशराज की फ़िल्म से उम्मीद नहीं किया करते हैं लोग। तो सब को चौंका कर ही कह सकते हैं कि यशराज बैनर अब अपना इमेज बदल रहा है। अच्छा, अगले गीत की तरफ़ बढ़ने से पहले आप को यह बता दें कि इस फ़िल्म के संगीतकार आर. आनंद का दुबारा पदार्पण हुआ है फ़िल्म जगत में। इससे पहले आर. आनंद ने आग़ोश बैण्ड के ज़रिए 'पैसा' नामक ऐल्बम का निर्माण किया था। फिर उसके बाद इन्होंने दक्षिण के कुछ फ़िल्मों में संगीत दिया और आनंद की आख़िरी फ़िल्म थी 'ज़ोर'। अब देखते हैं हिंदी फ़िल्मों में वो क्या कुछ कर दिखाते हैं।

विश्व दीपक - और अब "लफ़ंगे परिंदे" के बाद "मन लफ़ंगा"।

गीत - मन लफ़ंगा


सुजॊय - पिछले गीत से जो एक ख़ास मूड बन गया था, उसी मूड को आगे बढ़ाता हुआ यह गीत हमने सुना मोहित चौहान की आवाज़ में। गोवानीज़ कोरल गायन का इस्तेमाल सुना जा सकता है इस गीत में। ऒरकेस्ट्रेशन भी गोवा के संगीत जैसा लगता है। मोहित की आवाज़ ने एक बार फिर गीत के साथ पूरा पूरा न्याय किया और कहने की ज़रूरत नहीं कि मोहित चौहान एक के बाद एक सफलता की सीढ़ी चढ़ते जा रहे हैं। उनके गाये ज़्यादातर गानें ही हिट हो रहे हैं। इन दिनों 'वन्स अपन ए टाइम' का "पी लूँ" गीत हर चैनल पर सुनने को मिल रहा है जो चार्टबस्टर भी बन चुका है। "मन लफ़ंगा" गीत का एक रीमिक्स भी है फ़िल्म के ऐल्बम में लेकिन ऒरिजिनल के साथ इसकी तुलना अर्थहीन है।

विश्व दीपक - अकोस्टिक गीटार का जो इस्तेमाल हुआ है, वह कई दृष्टि से नवीन लगता है। एक सादा सरल बीट और रीदम गीत के प्रवाह को कर्णप्रिय बनाता है और लगता है कि यह गीत भी एक मक़बूल रोमांटिक गीत के रूप में उभर कर आएगा। स्वानंद के बोल भी कमाल के हैं कि नायक कह रहा है कि उसे अपने मन पर कोई बस नहीं है, मन तो लफ़ंगा है, जब प्यार की बात आती है तो वो किसी की नहीं सुनता, वह मनमानी करता है। "इश्क़ महंगा लगे.. फिर भी सौदा करे".. यह पंक्ति अपने आप में हीं सारी बात कह देती है। इस गीत को पहली बार सुनने के बाद एक बार और सुनने को दिल करता है। दोस्तों, आप लोग अगला गीत सुनिए, मैं ज़रा इस गीत को दोबारा सुन कर फिर अगला गीत सुनता हूँ।

सुजॊय - अगला गीत है शैल हाडा और अनुष्का मनचंदा की अवाज़ों में, आइए सुनते हैं।

गीत - धतड़ ततड़


विश्व दीपक - इस ऐल्बम का रॊक फ़ील बरकरार रखा है इस "धतड़ ततड़" ने। शैल हाडा सांवरिया का शीर्षक गीत गाने के बाद जैसे ग़ायब हो गए थे, उन्हे वापस लौटा देख कर ख़ुशी हो रही है, क्योंकि वो बेहद गुणी कलाकार हैं। उनके इंटरव्यु से पता चलता है कि शास्त्रीय संगीत सीखे हुए कलाकार है, जिन्होंने कई सालों तक मुंबई के किसी स्कूल में बच्चों को संगीत सिखाया भी है। और इस गीत में उनके साथ अनुष्का मनचंदा की आवाज़ ने अच्छा साथ दिया है। रॊक और लोक संगीत का फ़्युज़न है इस गीत में, स्ट्रिंग्स के साथ साथ ढोल का इस्तेमाल हुआ है जो क़दमों को थिरकाने लगते हैं।

सुजॊय - सुनिधि चौहान और श्रेया घोषाल के बाद अब ऐसा लगने लगा है कि जो दो गायिका दूसरों के मुक़ाबले कुछ आगे निकल रही हैं वो हैं अनुष्का मनचंदा और शिल्पा राव। धीरे धीरे संगीतकारों की निगाहें इन्ही दो गायिकाओं पर टिक-सी रही है ऐसा प्रतीत होता है। पूरी तरह से मुंब‍इया डान्स नंबर है और लगता है और इस बार गणपति में तो शायद इसी गीत की धूम रहेगी। लोग ख़ूब झूमने वाले हैं इस गीत के साथ जैसे पिचले साल सलमान ख़ान की फ़िल्म 'वाण्टेड' का गीत "तेरा ही जल्वा" छाया हुआ था। ख़ैर, इस धतड़ ततड़ के बाद अब एक सुकूनदायक गीत की बारी शिल्पा राव की आवाज़ में हो जाए!

गीत - नैन परिंदे


विश्व दीपक - एक ख़ूबसूरत पियानो पीस के साथ शुरु होकर यह गीत बेहद सुरीला आकार ले लेता है। शिल्पा राव इस तरह के गानें एक के बाद एक गा रही हैं और उनकी आवाज़ में इस तरह के गानें ख़ूब जँचते भी हैं। "सजदे में युंही" (बचना ऐ हसीनों), "उड़ी उड़ी मुड़ी मुड़ी" (पा), "रंग दे" (लाहौर), जैसे गीत शिल्पा राव के हाल के सफल गीतों में शुमार होते हैं। इस गीत की बात करें तो स्वानंद किरकिरे के शब्द बड़े ही काव्यात्मक और अर्थपूर्ण लगते हैं।

सुजॊय - शिल्पा राव की आवाज़ दीपिका के उपर अच्छी बैठी है, जिनके लिए "सजदे में युंही" भी शिल्पा ने गाया था। देखते हैं कि क्या शिल्पा भविष्य में दीपिका का स्क्रीन वॉयस बन पाती हैं या नहीं। और अब एक और रॉक सॉंग आज के समय के सब से कामयाब रॉकस्टार सूरज जगन की आवाज़ में। सूरज जगन एक रॉक सिंगर हैं जो फ़िल्म 'रॉक ऒन' में परदे पर नज़र भी आए थे। उन्होंने उस फ़िल्म में दूसरे बैंड के लीड सिंगर का किरदार निभाया था। उनकी आवाज़ में वह जोश है, वह वज़न है, जो इन हार्ड मेटल संगीत में साफ़ साफ़ सुनाई भी दे और अपना असर भी करे।

विश्व दीपक - बेस गीटार और ईलेक्ट्रिक गीटार का ख़ूब इस्तेमाल हुआ है इस गीत में, और सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि कोरस में ढोलकी और स्कॉटिश पाइप का भी इस्तेमाल हुआ है। तो चलिए इस थिरकन भरे गीत को सुन लिया जाये। वैसे भी यह फ़िल्म का एक और शीर्षक गीत है जिसके बोल हैं "रंग डालें लफ़गे परिंदे"।

गीत - रंग डालें लफ़ंगे परिंदे


सुजॊय - हाँ तो दोस्तों, कैसा लगा 'लफ़ंगे परिंदे'? मुझे तो एक और 'रॉक ऒन' लगा। फ़िल्म की कहानी के अनुसार ये गीत बने हैं जो सिचुएशनल हैं। मोहित चौहान और शिल्पा राव वाले दो गीत एक श्रेणी में रख सकते हैं और बाक़ी के तीन गीत रॉक श्रेणी में। यकीनन हीं यह ऐल्बम ऐवरेज से ऊपर है... बल्कि मैं तो कहता हूँ कि यह ऐल्बम भी इन्हीं दिनों आए बाकी ऐल्बमों-सा मक़बूल होने का माद्दा रखता है। वैसे भी यहाँ उन परिंदों की बात हो रही है जो कभी साफ तो कभी गंदे हैं लेकिन खुलेआम उड़ते हैं.. संगीत की दुनिया में भी इन्होंने लम्बी उड़ान भरी है... है ना? "ये कभी साफ़, ये कभी गंदे, लफ़ंगे परिंदे" :-)

विश्व दीपक - सुजॉय जी, सही कहा आपने। यहाँ पर मैं संगीतकार और गीतकार दोनों की तारीफ़ करना चाहूँगा। गीतकार के बारे में क्या कुछ नया कहूँ। स्वानंद साहब हर तरह के गीत लिखने में उस्ताद हो चुके हैं। भला कोई यकीन कर सकता हूँ कि इन्होंने हीं "आल इज़ वेल" लिखा था। और यहाँ पर वही "लफ़ंगे परिंदे" लिख रहे हैं.. पिछली फिल्म "राजनीति" में इन्होंने हीं कहा था "इश्क़ बरसे बूंदन बूंदन" तो वेलडन अब्बा में इन्हीं की कलम से ये बोल निकले थे "साबुन लेकर हाथ में निकले, सिस्टम को है धोना रे"। "खोया खोया चाँद" के शीर्षक गीत को भला कोई भूल सकता है... और कितने गाने गिनवाऊँ! मैं तो भाई इनका कायल हो गया हूँ। "देसी शब्दों" की बौछार इनसे अच्छा कोई और नहीं कर सकता.. यह तो मानना हीं पड़ेगा। गीतकार के बाद संगीतकार की भी बात कर लें। तो यहाँ पर प्रदीप सरकार की समझ-बूझ और विश्वास की दाद देनी होगी जो उन्होंने अपने नियमित संगीतकार "शांतनु मोइत्रा" की बजाय एक गुमनाम संगीतकार (आर आनंद) को चुना.. मैं सच कहता हूँ, मैंने इस फिल्म से पहले इनका नाम नहीं सुना था, लेकिन इस फिल्म के गानों को सुनने के बाद अब सोच रहा हूँ कि ढूँढ-ढूँढकर इनके गाने सुनूँ। इन्होंने इस फिल्म के नब्ज़ को जैसे पकड़-सा लिया है.. गानों को सुनते हीं दृश्य सामने आने लगते हैं। निस्संदेह संगीतकार की जीत हुई है। मेरी उम्मीदें इनसे अब बढ गई हैं.. देखते हैं आगे क्या होता है। चलिए तो इस सुखद बातचीत के बाद आज की समीक्षा को विराम देते हैं। अगली बार एक नई फिल्म (शायद आशाएँ या वी आर फैमिली या फिर कोई और) के साथ हम फिर हाज़िर होंगे। तब तक के लिए खुदा हाफ़िज़!

आवाज़ रेटिंग्स: लफ़ंगे परिंदे: ***१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ८५- 'लफ़ंगे परिंदे' फ़िल्म के गीत "धतड़ ततड़" को आप किशोर कुमार से कैसे जोड़ सकते हैं?

TST ट्रिविया # ८६- "मेरे उपर भी आइ.आइ.टी या पी.एम.टी की परीक्षा देने का प्रेशर था घर से। लेकिन एक बार युवा वाणी कार्यक्रम के लिए आकाशवाणी केन्द्र जाते वक़्त मेरा ऐक्सिडेन्ट हो गया। तब मम्मी ने कहा कि अब ज़िंदगी में जो करना है करो। क्योंकि उस ऐक्सिडेन्ट से बच कर निकलना मेरे लिए दूसरा जन्म था। मैं कैसे बचा मुझी कुछ नहीं पता। तो मम्मी ने कहा कि जो अब ज़िंदगी में बनना है बनो"। बताइए हम किस फ़नकार की बात कर रहे हैं।

TST ट्रिविया # ८७- प्रदीप सरकार और स्वानंद किरकिरे का साथ कई फ़िल्मों में हुआ है। बताइए इन दोनों के उस फ़िल्म के उस गीत का मुखड़ा जिसके एक अंतरे में पंक्ति है "होश लेके उड़ गया उसकी कैसी है जादूगरी"।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. प्रियदर्शन, प्रीतम, अक्षय कुमार।
२. नगीन तनवीर।
३. फ़िल्म - बिल्लू, गीत - बिल्लू भयंकर, सहगायक - अजय झिंग्रन और कल्पना.

सीमा जी आपने दो सवालों के सही जवाब दिए। अवध जी, ताजा सुर ताल पर आपको देखकर बेहद खुशी हुई। आगे भी इसी तरह अपनी उपस्थिति से हमें कृतार्थ करते रहिएगा। यही आग्रह है आपसे। आपने एक सवाल का सही जवाब दिया। बधाई स्वीकारें!

Tuesday, July 20, 2010

बाई दि वे, ऑन दे वे, "आयशा" से हीं कुछ सुनते-सुनाते चले जा रहे हैं जावेद साहब.. साथ में हैं अमित भी

ताज़ा सुर ताल २७/२०१०

विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों! 'ताज़ा सुर ताल' में आज हम जिस फ़िल्म के गीतों को लेकर आए हैं, उसके बारे में तो हमने पिछली कड़ी में ही आपको बता दिया था, इसलिए बिना कोई भूमिका बाँधे आपको याद दिला दें कि आज की फ़िल्म है 'आयशा'।

सुजॊय - अमित त्रिवेदी के संगीत से सजे फ़िल्म 'उड़ान' के गानें पिछले हफ़्ते हमने सुने थे, और आज की फ़िल्म 'आयशा' में भी फिर एक बार उन्ही का संगीत है। शायद अब तक हम 'उड़ान' के गीतों को सुनते नहीं थके थे कि एक और ज़बरदस्त ऐल्बम के साथ अमित हाज़िर हैं। मैं कल जब 'आयशा' के गीतों को सुन रहा था विश्व दीपक जी, मुझे ऐसा लगा कि 'देव-डी' और 'उड़ान' से ज़्यादा वरायटी 'आयशा' में अमित ने पैदा की है। इससे पहले कि वो ख़ुद को टाइप-कास्ट कर लेते और उनकी तरफ़ भी उंगलियाँ उठनी शुरु हो जाती, उससे पहले ही वे अपने स्टाइल में नयापन ले आए।

विश्व दीपक - 'आयशा' के गानें लिखे हैं जावेद अख़्तर साहब ने। पार्श्वगायक की हैसियत से में इस ऐल्बम में नाम शामिल हैं अमित त्रिवेदी, अनुष्का मनचन्दा, नोमान पिण्टो, निखिल डी'सूज़ा, रमण महादेवन, सम्राट कौशल, अनुषा मणि, ऐश किंग और तोची रैना की। दो एक नामों को छोड़ कर बाक़ी सभी नाम नए हैं। निखिल और नोमान की आवाज़ें हमने पिछले हफ़्ते की फ़िल्म 'उड़ान' में भी सुनी थी।

सुजॊय - अभी पिछले शनिवार की ही बात है, गायक अभिजीत 'ज़ी बांगला' के एक टॊक शो में पधारे थे। उसमें बातों बातों में जब आज के गीत संगीत की चर्चा छिड़ी, तो उन्होने कहा कि कुछ साल पहले तक लोग कुमार शानू, उदित नारायण, सोनू निगम, अभिजीत जैसी आवाज़ों को अलग अलग पहचानते थे, गीत सुन कर बोल देते थे कि किस संगीतकार की धुन है, लेकिन आज फ़िल्म संगीत ऐसा हो गया है कि गीत सुनने के बाद ना गायक के नाम का अनुमान लगाया जा सकता है और ना ही संगीतकार का। विश्व दीपक जी, आप बताइए, क्या आपको लगता है कि बहुत ज़्यादा फ़्रेश टैलेण्ट्स को अगर गायक के रूप में मौके दिए जाएँ तो फ़िल्मी गीतों की लोकप्रियता पर विपरीत असर पड़ेगा? मुझे कुछ कुछ ऐसा लगता है कि अत्यधिक नई आवाज़ें श्रोताओं को डिस्ट्रैक्ट करती है। किसी आवाज़ को लोगों के दिलों में बिठाने के लिए उससे कई गीत गवाने ज़रूरी हैं।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मैं अभिजीत जी के बात से पूरी तरह सहमत नहीं। हाँ, इतना तो है कि हमें अपने स्थापित गायकों को मौका देते रहना चाहिए ताकि श्रोता भी उन स्थापित कलाकारों के नाम से खुद को जोड़ सकें। इससे गाने को भी लोकप्रियता हासिल होगी। लेकिन बस कुछ हीं कलाकारों के साथ काम करने से दूसरे प्रतिभावान गायकों की अनदेखी होने का खतरा है.. पुराने समय में इतनी सारी सुविधाएँ मौजूद नहीं थी इसलिए संगीतकारों के पास नए-नए लोग कम हीं आते थे.. पर अब "इंटरनेट बूम" के बाद अपनी आवाज़ को संगीतकार के पास पहुँचाने के हज़ार जरिये हैं और संगीतकार भी बस साज़ों के साथ प्रयोग करने तक हीं सीमित नहीं रहे, वे अब आवाज़ के साथ भी प्रयोग करना चाहते हैं। अब जब इतने सारे विकल्प उपलब्ध हैं तो वे एक हीं के साथ जुड़कर क्यों रहें? और फिर अगर किसी गायक में क्षमता है कि वो अपने आप को किसी संगीतकार के लिए "जरूरी" साबित कर दे तो संगीतकार भी दूसरे किसी विकल्प के बारे में नहीं सोचेगा। हर संगीतकार के पास ऐसे एक या दो गायक जरूर हीं होते है। आप "कैलाश खेर" , "सुखविंदर", "के के", "मोहित चौहान" या फिर "श्रेया घोषाल" को हीं देख लीजिए.. भले हीं हज़ार गायक हों, लेकिन इनकी आवाज़ अमूमन हर एलबम में सुनाई पड़ हीं जाती है। जहाँ तक "संगीत" सुनकर "संगीतकार" पहचानने की बात है तो अभी भी हर संगीतकार अपना एक स्पेशल टच जरूर हीं रखता है, जिसे सुनते हीं लोग संगीतकार का नाम जान लेते हैं। हाँ, कुछ गाने या फिर कुछ जौनर ऐसे हैं, जिन्हें सुनकर संगीतकार के बारे में ठीक-ठीक जाना नहीं जा सकता, लेकिन मेरे हिसाब से यह अच्छी बात है। इससे साबित होता है कि हर संगीतकार आजकल आगे बढ रहा है, कोई भी एक जगह ठहरकर नहीं रहना चाहता। इसलिए सभी हर क्षेत्र में निपुण होने की कोशिश कर रहे हैं। यह "संगीत" के लिए अच्छी खबर है। नहीं तो पहले यह होता था कि अगर "ड्र्म्स" का इस्तेमाल सही हुआ है तो ये "एल-पी" हैं हैं। दूसरा कोई संगीतकार वैसा जादू तैयार कर हीं नहीं पाता था। आजकल टेक्नोलॉजी इतनी विकसित हो गई है कि ऐसी किसी कमी की संभावना हीं खत्म हो गई है।

सुजॊय - विश्व दीपक जी, इस बहस को विराम देते हैं और सुनते हैं फ़िल्म 'आयशा' का पहला गीत जिसे गाया है अमित त्रिवेदी और ऐश किंग ने।

गीत: सुनो आएशा


विश्व दीपक - फ़िल्म का शीर्षक गीत हमने सुना। एक पेपी नंबर, लेकिन जिन साज़ों का इस्तेमाल हुआ है, और ऒरकेस्ट्रेशन जिस तरह का किया गया है, अरेंजमेण्ट में एक नवीनता है। अमित का संगीत संयोजन किसी दूसरे संगीतकार से नहीं मिलता, यही उनकी ख़ासियत है। गाने का जो बेसिक रीदम पैटर्ण है, वो कुछ कुछ फ़िल्म 'दोस्ताना' के "जाने क्यों दिल चाहता है" गीत जैसा है, और कुछ कुछ "जब मिला तू" जैसा भी है। लेकिन ’आयशा' के इस गीत को इन गीतों से नर्म अंदाज़ में गाया गया है। ऐश किंग ने अमित का अच्छा साथ दिया है इस गीत में। आपको याद दिला दें कि ये वही ऐश किंग हैं जिन्होने पिछले साथ फ़िल्म 'दिल्ली-६' में "दिल गिरा दफ़्फ़तन" गाया था।

सुजॊय - आपने संगीत संयोजन का ज़िक्र किया, तो मैं इस बात पर प्रकाश डालना चाहूँगा कि इस गीत में सैक्सोफ़ोन का ख़ासा इस्तेमाल हुआ है, और इससे याद अया कि अभी हाल ही में जाने माने सैक्सोफ़ोनिस्ट मनोहारी सिंह, यानी कि मनोहारी दादा का देहावसान हो गया जो फ़िल्म इंडस्ट्री के मशहूर सैक्सोफ़ोनिस्ट और फ़्ल्युटिस्ट रहे हैं। तो इस गीत को हम अपनी तरफ़ से मनोहारी दादा के नाम डेडिकेट करते हुए उन्हे अपनी श्रद्धांजली अर्पित करते हैं।

विश्व दीपक - यह बहुत अच्छी बात कही आपने। 'ताजा सुर ताल' के ज़रिए गुज़रे ज़माने के अज़ीम फ़नकारों को श्रद्धांजलि से बढ़कर और अच्छी बात क्या हो सकती है! चलिए इस थिरकते गीत से जो सुरीली शुरुआत हुई है इस ऐल्बम की, अब आगे बढ़ते हैं और सुनते हैं फ़िल्म का दूसरा गीत तोची रैना की आवाज़ में।

गीत: गल मिठि मिठि (मीठी मीठी) बोल


सुजॊय - भई ऐसा कह सकते हैं कि 'आयशा' ऐल्बम में जो पंजाबी तड़का अमित त्रिवेदी ने लगाया है, उसी का स्वाद चख रहे थे हम। गीत के बोल भी पूरी तरह से पंजाबी हैं और पाश्चात्य रीदम और साज़ों के साथ फ़्युज़ किया गया है। बीट्स धीमी हैं और पंजाबी भंगड़े की तरह फ़ास्ट रीदम नहीं है। वैसे यह गीत आपको 'लव आजकल' के "आहुँ आहुँ" की याद दिला हीं जाता है। आपको याद दिला दें कि तोची रैना ने अमित त्रिवेदी के लिए "ओ परदेसी" गीत गाया था 'देव-डी' में जिसे ख़ूब सराहना मिली थी।

विश्व दीपक - युं तो आज के दौर में लगभग सभी फ़िल्मों में पंजाबी गीत होते ही हैं, लेकिन यह गीत लीक से हट के है। इस गीत में वो सब बातें मौजूद हैं जो इसे लोकप्रियता की पायदानों पे चढने में मदद करेंगे। देखते हैं जनता का क्या फ़ैसला होता है! और अब फ़िल्म का तीसरा गीत। यह है अमित त्रिवेदी और नोमान पिण्टो का गाया "शाम भी कोई जैसे है नदी"। जावेद साहब का शायराना अंदाज़ है इस गीत में, आइए सुनते हैं।

गीत: शाम भी कोई जैसे है नदी (बूम बूम बूम परा)


सुजॊय - यह गीत भी अपना छाप छोड़ हीं जाती है। अरेंजमेण्ट ऐसा है गाने का कि ऐसा लगता है जैसे कोई युवक हाथ में गीटार लिए आपके ही सामने बैठे गा रहा हो बिल्कुल लाइव! और यही बात आकर्षित करती है इस गीत की तरफ़। अमित और नोमान ने जिस नरमी और फ़ील के साथ गाने को गाया है, और धुन भी उतना ही मेलोडियस! एक कर्णप्रिय यूथ अपील इस गीत से छलकती है।

विश्व दीपक - हाँ, और यह तो बिल्कुल अमित त्रिवेदी टाइप का गाना है। इस गीत को रॉक शैली में भी बनाया जा सकता था, लेकिन उससे शायद फ़ील कम हो जाती। इस तरह के नरम बोलों के लिए इस तरह का म्युज़िक अरेंजमेण्ट बिलकुल सटीक है।

सुजॊय - अच्छा, हमने इस फ़िल्म के अभिनेताओं का ज़िक्र तो किया ही नहीं! फ़िल्म 'आयशा' में नायक हैं अभय देओल और नायिका हैं सोनम कपूर। यानी कि आयशा बनी हैं सोनम कपूर। सोनम भी फ़िल्म दर फ़िल्म अपने कैरियर की सीढ़ियाँ चढ़ती जा रही हैं। 'दिल्ली-६' और ' आइ हेट लव स्टोरीज़' में उनके अभिनय को सराहा गया, और शायद 'आयशा' में भी वो सफल रहेंगी। अभय देओल अपना एक लो-प्रोफ़ाइल मेनटेन करते हैं लेकिन तीनों भाइयों की अगर बात करें तो मुझे तो सनी और बॊबी से ज़्यादा अभय की ऐकटिंग ज़्यादा जँचती है। ख़ैर, पसंद अपनी-अपनी ख़याल अपना-अपना। लीजिए सुनिए 'आएशा' का चौथा गाना।

गीत: बहके बहके नैन


विश्व दीपक - बहके बहके अंदाज़ में यह गीत गाया है अनुष्का मनचन्दा, सम्राट कौशल और रमण महादेवन ने। पूरी तरह से कारनिवल फ़ील लिए हुए है। हिंदी और अंग्रेज़ी के बोलों का संतुलित संगम है यह गीत। सम्राट और रमण ने जहाँ अंग्रेज़ी बोलों के साथ पूरा न्याय किया है, वहीं अनुष्का भी अपनी गायकी का लोहा मनवाने में कामयाब रही हैं। जिस तरह की अदायगी, जिस तरह का थ्रो इस गाने में चाहिए था, अनुष्का ने उसका पूरा पूरा ख़याल रखा। ऐकॊरडिओन की ध्वनियाँ इस गीत में सुनने को मिलती है, और जो हमें याद दिलाती है शंकर जयकिशन की।

सुजॊय - पूरी तरह से एक डांस नंबर है यह गीत और जैसा कि आपने कहा कि कारनिवल गीत, तो कुछ इसी तरह के कारनिवल गीतों की याद दिलाएँ आप सब को। फ़िल्म 'धूम' में "सलामी", 'धूम-२' में "टच मी डोण्ट टच मी सोणीया", 'हनीमून ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड' में "प्यार की ये कहानी सुनों", ये सभी इसी जौनर में आते हैं।

विश्व दीपक - हाँ, और इन सब गीतों में करीबीयन, अरबी और कुछ कुछ गोवन (पोर्चुगीज़) संगीत की छाप नज़र आती है। और ऐसे गीतों में लैटिन नृत्य शैली का ख़ास तौर से प्रयोग होता है। इस गीत से एक मूड बन गया है, तो इस मूड को थोड़ा सा बदलते हुए एक बिल्कुल ही अलग किस्म का गीत सुनते हैं।

गीत: लहरें


सुजॊय - "खोयी खोयी सी हूँ मैं, क्यों ये दिल का हाल है, धुंधले सारे ख़्वाब हैं, उलझा हर ख़याल है, सारी कलियाँ मुरझा गईं, लोग उनके यादों में रह गए, सारे घरोंदे रेत के, लहरें आईं लहरों में मिल गए" - एक बेहतरीन गीत, शब्दों के लिहाज़ से, संगीत के लिहाज़ से और गायकी के लिहाज़ से भी। अनुषा मणि की मुख्य आवाज़ थी इस गीत में जिसे उन्होने एक हस्की फ़ील के साथ गाया। नोमान पिण्टो और निखिल डी'सूज़ा ने वोकल बैकिंग दी।

विश्व दीपक - हर तरह से यह गीत इस ऐल्बम का सर्वश्रेष्ठ गीत है, और हो सकता है कि अनुषा मणि पिछले साल "इकतारा" के कविता सेठ की तरह इस बार फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार हासिल कर लें। अब तक इस फ़िल्म के जितने भी गानें हमने सुनें, किसी भी गीत से हताशा नहीं हुई और हर एक गीत में कुछ ना कुछ अच्छी बात दिल को छू गई। तो अब जो इस फ़िल्म का एक अंतिम गीत बचा है, उसे भी सुनते चलें।

सुजॊय - ज़रूर!

गीत: बाइ दि वे


सुजॊय - जिस तरह से ऐल्बम की सुरीली शुरुआत हुई थी "सुनो आयशा" गीत के साथ, उतना ही धमाकेदार समापन हुआ अनुष्का मनचन्दा और नोमान पिण्टो के गाए इस फ़ास्ट डान्स नंबर से। इस रॉक पॊप सॊंग में अनुष्का जिस तरह से बोलती भी हैं, हमें फ़िल्म 'गजनी' में सुज़ेन डी'मेलो के गाए "ऐ बच्चु तू सुन ले" गीत की झलक दिखा जाती है।

"उड़ान" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****

सुजॊय - कुल मुलाकर, इस ऐल्बम के बारे में मेरा तो यही ख़याल है कि 'उड़ान' से ज़्यादा वरायटी इस ऐल्बम में है और बहुत जल्द ही अमित त्रिवेदी पहले कतार के संगीतकारों में अपना स्थान पक्का कर लेंगे और उस राह पर वो बड़े पुख़्ता क़दमों से चल भी पड़े हैं। अनुष्का मनचन्दा को अगर इसी तरह से गाने के मौके मिलते रहें तो वो भी सुनिधि की तरह नाम कर सकती है ब-शर्ते कि वो अपनी वरसटायलिटी बनाए और इन तेज़ रफ़्तार रॉकक गीतों के बाहर भी दूसरे जौनर के गीतों को निभाने की कोशिश करे। अनुषा मणि के लिए शुभकामनाएँ कि आने वाले दिनों में वो अपनी क्षमता का और सबूत पेश करें। और अमित त्रिवेदी का संगीत जितना नवीन है, उनकी आवाज़ में भी वही ताज़गी है। और रही बात जावेद अख़्तर साहब, तो भई उनकी शान में और क्या कह सकते हैं, वो तो हैं ही नंबर वन!

विश्व दीपक - सुजॊय जी, सही कहा आपने। आयशा के गीतों के सुनने के बाद मुझे लग रहा है कि हमने पिछली दफ़ा जो "आयशा" के आने की घोषणा की थी तो हमारी वह उम्मीद पूरी तरह से सही हीं साबित हुई है। अमित के बारे में और क्या कहूँ, मैंने "उड़ान" के गीतों की समीक्षा के दौरान हीं अपना दिल खोल कर रख दिया था। हाँ, जावेद साहब की कही कुछ बातें आपसे जरूर बाँटना चाहूँगा। "आयशा" के "म्युजिक-रीलिज" के समय जावेद साहब ने हँसी-मज़ाक में हीं सही, लेकिन एक "गीतकार" की हालत जरूर बयान कर दी। उन्होने कहा कि आज का दिन मेरे लिए सबसे अच्छा दिन है, क्योंकि आज के बाद मुझे "रिया कपूर" (फिल्म की निर्माता और सोनम की छोटी बहन) के फोन नहीं आएँगे। आज के बाद कोई मुझसे यह नहीं कहेगा कि "मुखरा" बदल दीजिये या फिर "दूसरे अंतरा" की तीसरी पंक्ति "पुराने गानों" जैसी लग रही है, इसे हटाईये। जावेद साहब ने अपनी नानी/दादी का ज़िक्र करते हुए कहा कि वे मुझे डराने के लिए "भूत" का नाम लेती थीं और आजकल के निर्माता-निर्देशक मुझे डराने के लिए "यूथ" (युवा-पीढी) का नाम लेते हैं और कहते हैं कि यह "यूथ" की भाषा नहीं। आखिरकार जावेद साहब पूछ हीं बैठे कि भई यूथ की भाषा क्या है, उसकी कोई डिक्शनरी, उसका कोई ग्रामर तो होगा हीं। जिस किसी के पास वे किताबें हों, मुझे दे जाए, बड़ी हीं कृपा होगी। अगली फिल्म से मैं उस किताब को देखकर हीं गाने लिखूँगा। तो अगर यह हालत जावेद साहब की है, तो दूसरे गीतकारों के साथ क्या होता होगा। जब तक निर्माता, निर्देशक या दूसरा कोई और गीतकार के काम में दखल देना बंद नहीं करेगा, तब तक दिल को छूने वाले अच्छे गाने कहाँ से लिखे जाएँगें। जाते-जाते जावेद साहब ने गीतकार-संगीतकार के लिए बन रहे नए ऐक्ट की भी बात की, जिसमें गानों के राईट इन सबको भी हासिल होंगे। उन्होंने कहा कि जब गीतकार गाने का मालिक हो जाएगा तो फिर लोग उसे तुच्छ जीव समझने की भूल नहीं करेंगे। मुझे भी उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार है। खैर, बात तो समीक्षा की हो रही थी और मैं न जाने कहाँ बह निकला। तो वापस आते हैं "आयशा" पे। मुझे पक्का यकीन है कि आप सबों को इसके सारे गाने पसंद आएँगे। इसी उम्मीद के साथ हम आज की समीक्षा पर विराम लगाते हैं। अगली दफ़ा ऐसी हीं कोई फिल्म होगी.. शायद "पिपली लाईव" या "खट्टा-मीठा" या फिर कोई और हीं फिल्म। अभी कह नहीं सकता, जानने के लिए अगले "ताज़ा सुर ताल" का हिस्सा जरूर बनें।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ७९- अमित त्रिवेदी के जोड़ीदार गीतकार रहे हैं अमिताभ भट्टाचार्य। इस फ़िल्म में जावेद अख़्तर का साथ अमित को मिला। तो बताइए कि इससे पहले जावेद साहब के लिखे किस गीत की धुन अमित त्रिवेदी ने बनाई थी?

TST ट्रिविया # ८०- हमने मनोहारी सिंह का ज़िक्र आज इस स्तंभ में किया। आपको बताना है कि मनोहारी दा ने सब से पहले किस हिंदी फ़िल्मी गीत में सैक्सोफ़ोन बजाया था?

TST ट्रिविया # ८१- गीतकार जावेद अख़्तर को आप फ़िल्म 'ठोकर' के मशहूर गीत "ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ" से कैसे जोड़ सकते हैं? (इस नज़्म का ज़िक्र हमने महफ़िल-ए-ग़ज़ल पर भी किया था)


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. कविता चौधरी।
२. 'यूं होता तो क्या होता'।
३. अमित त्रिवेदी (संगीतकार) और अमिताभ भट्टाचार्य (गीतकार) ने। (इस राज़ का पर्दाफ़ाश खुद अमित ने एक इंटरव्यु में किया था)।

सीमा जी आपने दो सवालों के सही जवाब दिए। बधाई स्वीकारें!
तीसरा नहीं भी पता था तो तुक्का मार देतीं.. क्योंकि तुक्के में इन्हीं दोनों कलाकारों के नाम आने की ज्यादा संभावनाएँ हैं।.. खैर कोई बात नहीं.. इस बार के सवालों पर नज़र दौड़ाईये।

Thursday, October 1, 2009

मेक ए विश...कह रहे हैं अमिताभ...इस दिवाली मांग ही डालिए कुछ अपने जिन्नी से

ताजा सुर ताल (26)

दोस्तों आज ताजा सुर ताल में मैं सजीव सारथी अकेला ही हूँ आपके स्वागत के लिए क्योंकि आपके प्रिय होस्ट सुजॉय दुर्गा पूजा की खुशियाँ अपने परिवार के साथ बांटने घर गए हुए है....खैर आज मैं जो गीत आपको सुनवाने जा रहा हूँ, वो एक "रैप" सोंग है, रैप यानी एक सधे हुए पेटर्न पर गीत की पंक्तियों को तेजी से बोलना, बरसों पहले अशोक कुमार ने फिल्म आशीर्वाद के लिए "रेलगाडी" गीत गाया था कुछ इसी अंदाज़ में, याद है न ?, पता नहीं उस ज़माने में इसे रैप ही कहते थे या कुछ और....पाश्चात्य संगीत की इस मशहूर संगीत परंपरा को हिन्दुस्तान में बाबा सहगल ने अपने "ठंडा ठंडा पानी" से लोकप्रिय बनाया..बाद में रहमान ने भी कुछ गीतों में रैप का इस्तेमाल किया....आजकल तो ये लगभग हर गीत का हिस्सा बन चूका है. आज कल लगभग हर दूसरे गीत हिप होप बनाने के लिए उसमें कुछ अंग्रेजी शब्दों का मायाजाल बुनकर उसे रैप शैली में गवा दिया जाता है. खैर हमने जो आज का गीत चुना है वो कोई मामूली रैप नहीं है..पूछिए क्यों ...

जी हाँ, ये रैप कोई इंसान नहीं बल्कि एक जिन्नी का है, "जिन्नी" ? अरे आप जिन्नी को भूल गए ? याद कीजिये बचपन में जब सुनते थे की अलादीन को जादूई चिराग मिला और उसमें से निकल एक जिन्न जो कहता है "क्या हुकम है मेरे आका"...सच बताइयेगा, क्या उस कहानी को सुनकर कभी आपने मन में नहीं आया कि काश हमें भी कोई जिन्नी मिलता... सच तो ये है कि हम सब पूरी जिंदगी असंभव से ख्वाब देखते है और सोचते हैं कि काश....और इस कोशिश कोशिश में एक दिन हम खुद ही एक जिन्नी बन जाते हैं, जो कभी अपने बच्चों की मुराद पूरी करता है कभी घर परिवार की.... हम सब में छुपा जिन्न हमारे अपनों को खुश देखने के लिए पूछता ही रहता है -."मेक ऐ विश...."

अलादीन और उसके जिन्नी की ये कहानी इस हद तक मशहूर है कि जब वाल्ट डिस्नी फिल्म्स ने जब इसका हिंदी संस्करण भारत में निकला तो बच्चों बड़ों ने इसे खूब सराहा, आपको याद होगा इस फिल्म में अलादीन की आवाज़ बने थे सोनू निगम, जिन्होंने अपनी भोली आवाज़ में संवाद बोलने के आलावा कुछ बढ़िया से गीत भी गाये थे, मगर वो एक एनीमेशन फिल्म थी, अब यही फिल्म वास्तविक कलाकारों को लेकर बनी है और जल्द ही प्रदर्शन में आने वाली है, इस दिवाली आप भी अपने बच्चों को खुश कर सकते हैं ये फिल्म दिखाकर...इस फिल्म में अलादीन बने हैं रितेश देशमुख. रितेश अलादीन के रूप में कितने जचते हैं ये तो मैं नहीं कह सकता, पर हाँ जो यहाँ जिन्न बने हैं उन पर मुझे पूरा भरोसा है कि उनका अभिनय और मात्र उनकी उपस्थिति ही काफी होगी फिल्म को दिलचस्प बनाने में. जी हाँ यहाँ आपके जिन्न हैं महा नायक अमिताभ बच्चन.

दोस्तों ये साल है २००९ और आपको बता दें की साल १९६९ में अमिताभ ने रुपहले परदे पर पहली बार अपने जलवे दिखाए थे फिल्म सात हिन्दुस्तानी में, यानी ये उनके करियर का ४० वां साल है, और आज ४० सालों के बाद भी हिंदी फिल्म जगत पर राज कर रहा है ये शहंशाह....वाह बच्चन साहब क्या कहने आपके. अक्सर उनके विशाल नायकीय व्यक्तित्व के आगे एक बात अक्सर हम भूल जाते हैं वो हैं उनकी दमदार आवाज़. "नीला आसमान सो गया..." जैसे दर्द से भरे गीत हों या, "मेरे अंगने में..." की अतिनाटकीयता या फिर "रंग बरसे" की मस्ती. अमिताभ की आवाज़ में वो जादू है कि उनके गाये मामूली से मामूली गीत को भी आप अनसुना नहीं कर सकते. ये भी एक अजीब इत्तेफाक है कि जब वो अपने चरम पर थे तब कुछ चुने हुए गीत कुछ चुने हुए संगीतकारों के लिए ही गाते थे. पर साठ पार करने के बाद तो उनके भीतर का गायक कुछ और जवान हो गया है, अब तो लगभग उनकी हर फिल्म में एक गीत अवश्य होता है उनकी अपनी आवाज़ में. इस नयी फिल्म अलादीन में गीत संगीत का जिम्मा संभाला है - विशाल शेखर और अन्विता दत्त गुप्तन ने और जाहिर है ये जिन्नी रैप है खुद अमिताभ बच्चन की दमदार आवाज़ में और उनका साथ दिया है अनुष्का मनचंदा ने.

इसी माह अमिताभ बच्चन अपना जन्मदिन भी मनाएंगे, तो हम उन्हें अभी से शुभकामनाएं दिए देते है, जन्मदिन की भी और इस फिल्म अलादीन के लिए भी, कुछ सालों पहले बच्चों के दिल में अमिताभ ने ख़ास जगह बनायीं थी फिल्म "भूतनाथ" में एक भले भूत की भूमिका निभाकर. ये फिल्म मुझे और मेरे बच्चों को बेहद पसंद है, तो जाहिर है अलादीन से भी मुझे तो अच्छी ही उम्मीदें है, स्पेशल एफ्फेक्ट्स आदि भी अनूठे ही लग रहे हैं प्रोमोस देखकर. जहाँ तक संगीत की बात है इसी तरह की फिल्मों में अधिकतर गीत परिस्थितिजन्य होते है जो सुनने में कम देखने में अधिक भाते हैं. ये रैप गीत भी कुछ उसी तरह का है. इसलिए आज हम इस गीत को २.५ की रेटिंग दे रहे हैं...बाकी आप सुनकर बतायें कि आपको कैसी लगी "एंग्री यंग (?) मैन" की कूल आवाज़ इस गीत में...



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 2.5 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

चलते चलते
चलिए अब आप ने गीत सुन ही लिया है तो एक सवाल का जवाब भी दें, शर्त ये है कि आपने ईमानदारी से मात्र दो मिनट का समय लेकर निचे दिए गए वाक्य को पूरा करना है, जो भी जेहन में आये झट से लिख डालिए...क्योंकि जिन्नी के पास बहुत अधिक समत नहीं है....कौन जाने आपकी कोई मुराद इस बार पूरी ही हो जाए....वाक्य है -

जिन्नी - क्या हुक्म है मेरे आका? कौन सी आपकी तीन ख्वाहिशें ?
आप - जिन्नी मेरी तीन ख्वाहिशें ये है ______________

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

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