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Monday, June 1, 2009

जवाँ है मोहब्बत हसीं है ज़माना...यादें है इस गीत में मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 98

ज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' बहुत ख़ास है क्योंकि आज हम इसमे एक ऐसी आवाज़ आप तक पहुँचा रहे हैं जो ४० के दशक मे घर घर गली गली गूँजा करती थी। १९४७ में देश के बँटवारे के बाद वो फनकारा पाक़िस्तान चली गयीं और पीछे छोड़ गयीं अपनी आवाज़ का वो जादू जिन्हे आज तक सुनते हुए हमारे कान नहीं थकते और ना ही उनकी आवाज़ को कोई भुला ही पाया है. लताजी के आने से पहले यही आवाज़ थी हमारे देश की धड़कन, जी हाँ, हम बात कर रहे हैं मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की। नूरजहाँ की आवाज़ उस ज़माने मे इतनी लोकप्रिय थी कि उन दिनों हर उभरती गायिका उन्हे अपना आदर्श बनाकर पार्श्वगायन के क्षेत्र में क़दम रखती थीं। यहाँ तक कि अगर हम सुरकोकिला लताजी के शुरुआती दो चार फ़िल्मों के गानें सुनें तो उनमें भी नूरजहाँ का अंदाज़ साफ़ झलकता है। यह बेहद अफ़सोस की बात है हम भारतवासियों के लिए कि स्वाधीनता के बाद नूरजहाँ अपने पति शौकत अली के साथ पाक़िस्तान जा बसीं जिससे कि हमारी यहाँ की फ़िल्में उनकी आवाज़ के जादू से वंचित रह गयीं। कहते हैं कि कला की कोई सीमा नहीं होती और ना ही कोई सरहद इसे रोक पायी है। नूरजहाँ की जादूई आवाज़ आज भी हमारे यहाँ मौजूद है उनके यहाँ गाये हुए तमाम गीतों में जो फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने का एक अमूल्य सम्पदा है। कई लोग इस तर्क में जाते हैं कि अगर नूरजहाँ यहाँ रहतीं तो लताजी उस शिखर पर शायद नहीं पहुँच पातीं जहाँ पर वो आज पहुँची हैं। दोस्तों, यह तर्क बेकार और अर्थहीन है। लता लता है और नूरजहाँ नूरजहाँ। ये दोनो अपनी अपनी जगह पर हैं और इन दोनो का एक दूसरे से तुलना करना बिल्कुल निरर्थक है। हम तो बस यही कहेंगे कि अगर नूरजहाँ हमारे देश मे रहतीं तो यहाँ का फ़िल्म संगीत और भी समृद्ध होता।

नूरजहाँ की आवाज़ में हमने जिस गीत को चुना है आज यहाँ बजाने के लिए वह है फ़िल्म 'अनमोल घड़ी' का। यह फ़िल्म बनी थी १९४६ में और इसका निर्माण महबूब ख़ान ने किया था। नूरजहाँ, सुरेन्द्र और सुरैय्या अभिनीत यह फ़िल्म उस साल का एक 'म्युज़िकल ब्लाकबस्टर' साबित हुआ था। और क्यों न हो, नूरजहाँ, सुरेन्द्र और सुरैय्या उस ज़माने के चोटी के 'सिंगिंग स्टार्स' जो थे, और साथ में था नौशाद साहब का संगीत और तनवीर नक़वी के बोल, क़माल तो होना ही था! दोस्तों, नौशाद साहब ने सहगल साहब और नूरजहाँ के साथ बस एक एक फ़िल्म में काम किया है, सहगल साहब के साथ 'शाहजहाँ' में और नूरजहाँ के साथ इस 'अनमोल घड़ी' में। 'अनमोल घड़ी' की अपार सफलता के बाद नौशाद साहब ने महबूब साहब की हर एक फ़िल्म में संगीत दिया। १९४४ में फ़िल्म 'रतन' में ज़ोहराबाई का गाया "अखियाँ मिलाके जिया भरमाके चले नहीं जाना" की बेशुमार कामयाबी के बाद नौशाद का जो गीत इसी तरह से हर किसी के ज़ुबान पर चढ़ गया था वह था 'अनमोल घड़ी' का "जवाँ है मोहब्बत हसीं है ज़माना, लुटाया है दिल ने ख़ुशी का ख़ज़ाना"। राग पहाड़ी मे स्वरबद्ध नूरजहाँ का गाया यह गीत उनके यहाँ गाये हुए सबसे ज़्यादा मशहूर गीतों में से एक है। तो लीजिए आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ के नाम!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. कमर जलालाबादी का लिखा सुरैय्या का गाया ये गीत.
२. संगीतकार हैं सज्जाद हुसैन.
३. मुखड़े में शब्द है -"बयां".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
भई सबसे पहले तो भूल के लिए माफ़ी. मुखड़े में "खजाना" लिखना था "तराना" लिखा गया. पर फिर भी आप लोगों ने सही गीत चुन लिया, स्वप्न मंजूषा जी को विजेता होने की बधाई, चलिए इस बहाने ही सही पराग जी बहुत दिनों के बाद ओल्ड इस गोल्ड में लौटे...कहाँ थे जनाब ? हम अपनी १०० वीं कड़ी की तरफ बढ़ रहे हैं. ये ओल्ड इस गोल्ड के लिए ही नहीं बल्कि आवाज़ और हिंद युग्म के लिए भी एक एतिहासिक मौका होगा. ओल्ड इस गोल्ड के सभी नियमित श्रोता इस एपिसोड का हिस्सा जरूर बनें और यदि कोई सुझाव या बदलाव आप इस फॉर्मेट में चाहते हैं तो हमें अवश्य बतायें.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Monday, February 16, 2009

जवाँ है मुहब्बत, हसीं है ज़माना....आज भी नौशाद के संगीत का


"आज पुरानी यादों से कोई मुझे आवाज़ न दे...", नौशाद साहब के इस दर्द भरे नग्में को आवाज़ दी थी मोहम्मद रफी साहब ने, पर नौशाद साहब चाहें या न चाहें संगीत प्रेमी तो उन्हें आवाज़ देते रहेंगें, उनके अमर गीतों को जब सुनेंगें उन्हें याद करते रहेंगे. तपन शर्मा सुना रहें हैं दास्ताने नौशाद, और आज की महफ़िल है उन्हीं की मौसिकी से आबाद.


नौशाद का जन्म २५ दिसम्बर १९१९ में एक ऐसे परिवार में हुआ, जिसका संगीत से दूर दूर तक नाता नहीं था और न ही संगीत में कोई रुचि थी। पर नौशाद शायद जानते थे कि उन्हें क्या करना है। दस साल की उम्र में भी जब वे फिल्म देख कर लौटते तो उनकी डंडे से पिटाई हुआ करती थी। ये उस समय की बातें हैं जब फिल्मों में संगीत नहीं हुआ करता था। और थियेटर में पर्दे के पास बैठे संगीतकार ही संगीत बजा कर फिल्म के दृश्य के हिसाब से तालमेल बिठाया करते थे। वे कहते थे कि वे फिल्म के लिये थियेटर नहीं जाते बल्कि उस ओर्केस्ट्रा को सुनने जाते हैं। उन संगीतकारों को सुनने जो हारमोनियम, पियानो, वायलिन आदि बजाते हुए भी दृश्य की गतिविधियों के आधार पर आपस में संतुलन बनाये रखते हैं। और यही वो पल होते थे जिनमें उन्हें सबसे ज्यादा मज़ा आता था। और वो भी चार-आने वाली पहली कतार में बैठ कर।



नौशाद ने एक वाद्ययंत्र बेचने वाली दुकान पर काम किया और हारमोनियम खरीदा। उनका अगला कदम था स्थानीय ओर्केस्ट्रा में शामिल होना। जाहिर तौर पर यह सब उन्होंने अपने पिता से विपरीत जाते हुए किया। उसके बाद नौशाद एक जूनियर थियेटर क्लब से जुड़ गये। फिर उन्होंने एक नाटक कम्पनी में काम किया जो उस समय लखनऊ गई हुई थी। वे लैला मजनू पर आधारित नाटक कर रहे थे। ये पहली मर्तबा था कि उन्होंने घर में किसी की परवाह नहीं की। वे वहाँ से भाग गये और नाटक कम्पनी के साथ कभी जयपुर, जोधपुर, बरेली और गुजरात गये। विरम्गाम में उनकी कम्पनी फ्लॉप हो गई और वे वापस घर नहीं गये।

१९३७ में हताश नौशाद ने बम्बई में कदम रखा। और तब उनका संघर्ष दोबारा शुरू हुआ। जिस अकेले आदमी को वे बम्बई में जानते थे, वे थे अन्जुमन-ए-इस्लाम हाई स्कूल के हैडमास्टर जिनके साथ उन्होंने कुछ समय बिताया। ये किस्मत की बात थी कि वे हैरी डरोविट्स के सम्पर्क में आये जो समन्दर नाम की एक फिल्म बना रहे थे। नौशाद को मुश्ताक हुसैन के ओर्केस्ट्रा में ४० रूपय प्रतिमाह की तन्ख्वाह पर पियानो बजाने की नौकरी मिली। गुलाम मोहम्मद जो बाद में नौशाद अली के सहायक बने, उस समय ६० रूपये कमाया करते थे। मुश्ताक हुसैन न्यू थियेटर, कोलकाता के मशहूर संगीत निर्देशक थे। बाद में नौशाद अपना हुनर रुसी निर्माता हेनरी डारविज की फिल्म "सुनहरी मकड़ी" में दिखाने में सफल हुए।

जब हरीश्चंद्र बाली ने फिल्म "पति-पत्नी" को छोड़ा तब उस समय नौशाद को पहली बार संगीतकार के तौर पर काम मिला। उन्हें मुश्ताक हुसैन का सहायक बनाया गया लेकिन ये ज्यादा दिन नही चला और फिल्म बंद हो गई। भाग्य ने फिर साथ दिया और वे मनोहर कपूर से मिले। मनोहर उस समय पंजाबी फिल्म "मिरज़ा साहिबान" के लिये संगीत दे रहे थे। नौशाद ने कपूर के साथ काम करना शुरु कर दिया और उन्हें ७५ रू महीने के हिसाब से मिलने लगे। ये फिल्म सभी को पसंद आई और बॉक्स ऑफिस पर जबर्दस्त हिट साबित हुई।



खेमचंद प्रकाश, मदहोक, भवनानी और ग्वालानी आदि की सहायता से नौशाद धीरे धीरे आगे बढ़ने लगे। उन्होंने भवनानी की फिल्म प्रेम नगर में संगीत दिया। उसके बाद उनकी गिनती ऊँचे संगीतकारों में होने लगी और देखते ही देखते वे ६०० रू. से १५०० रू. प्रति फिल्म के कमाने लगे। ए.आर.करदार की फिल्म नई दुनिया (१९४२) ने पहली बार उन्हें संगीत निर्देशक का दर्जा दिलवाया। करदार की फिल्मों में वे लगातार संगीत देने लगे। और फिल्म शारदा में उन्होंने १३ वर्षीय सुरैया के साथ "पंछी जा" गाने के लिये काम किया। रतन(१९४४) वो फिल्म थी जिसने उन्हें ऊँचाई तक पहुँचा दिया और उस समय के हिसाब से उन्हें एक फिल्म के २५००० रू मिलने लगे!!

लखनऊ में उनका परिवार हमेशा संगीत के खिलाफ रहा और नौशाद को उनसे छुपा कर रखना पड़ा कि वे संगीत के क्षेत्र में काम करते हैं। जब नौशाद की शादी हो रही थी तो बैंड उन्हें की सुपारहिट फिल्म रतन('४४) के गाने बजा रहा था। उस समय उनके पिता व ससुर उस संगीतकार को दोष दे रहे थे जिसने वो संगीत दिया... तब नौशाद की सच्चाई बताने की हिम्मत नहीं हुई कि संगीत उनका ही दिया हुआ है।



१९४६ के वर्ष में उन्होंने नूरजहां के साथ "अनमोल घड़ी" और के.एल.सहगल के साथ "शाहजहां" की और दोनों ही फिल्मों का संगीत सुपरहिट रहा। १९४७ में बंटवारा हुआ और हिन्दू मुस्लिम दंगे हुए। मुम्बई से काफी मुस्लिम कलाकार पाकिस्तान चले गये। पर बॉलीवुड में नौशाद जैसे स्थापित कलाकार वहीं रहे। १९४२ से लेकर १९६० के दशक तक वे बॉलीवुड के नामी संगीतकारों में शुमार रहे। उन्होंने अपने जीवनकाल में १०० से भी कम फिल्मों में काम किया लेकिन जितनों में भी किया उनमें से २६ फिल्में सिल्वर जुबली (२५ हफ्ते), ८ गोल्डन जुबली (५० हफ्ते) और ४ ने डायमंड जुबली (६० हफ्ते) बनाई।

नौशाद ने अनेक गीतकारों के साथ काम किया जिनमें शकील बदायूनी, मजरूह सुल्तानपुरी, मदहोक, ज़िया सरहदी और कुमार बर्बंकवी शामिल हैं। मदर इंडिया (१९५७) फिल्म जो ऑस्कर में शामिल हुई थी, उसमें उन्हीं का संगीत था। नौशाद ने गुलाम मोहम्मद की मृत्य होने पर उनकी फिल्म पाकीज़ा (१९७२) का संगीत पूरा किया। गौरतलब है कि गुलाम मोहम्मद उनके सहायक भी रह चुके थे।



१९८१ में उन्हें भारतीय सिनेमा में योगदान के लिये दादा साहेब फाल्के अवार्ड मिला। १९८८ में उन्होंने मलयालम फिल्म "ध्वनि" के लिये काम किया। १९९५ में शाहरुख की फिल्म "गुड्डु" में भी संगीत दिया जिसके कुछ गाने पॉपुलर हुए थे। सन २००४ में जब "मुगल-ए-आज़म" (रंगीन) प्रर्दशित हुई तो नौशाद विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित थे। ८६ वर्ष की आयु में जब उन्होंने फिल्म ताजमहल(२००५) का संगीत निर्देशन दिया तो वे ऐसा करने वाले विश्व के सबसे बुजुर्ग संगीतकार बन गये। उनकी ज़िन्दगी पर आधारित ५ फिल्में भी बनी हैं-नौशाद का संगीत, संगीत का बादशाह, नौशाद पर दूरदर्शन द्वारा प्रसारित एक सीरियल, महल नौशाद और टी.वी सिरियल ज़िन्दा का सफर। उन पर किताबें भी लिखी गईं हैं चाहे मराठी में दास्तान-ए-नौशाद हो या गुजराती में 'आज अवत मन मेरो' हो।

उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा रचित रचना 'उनकी याद करें' को भी संगीतबद्ध किया। इसको गाया था ४० कोरस गायकों के साथ ए. हरिहरन ने और निर्माता थे केशव कम्युनिकेशन्स। ये गीत सीमा पर तैनात जवानों के नाम था।
५ मई, २००६ को नौशाद दुनिया को अलविदा कह गये।

(जारी...)
अगले अंक में जानेंगे संगीत के अलावा क्या था नौशाद साहब का शौक और क्या कहती हैं फिल्मी हस्तियाँ मीठी धुनों के इस रचयिता के बारे में...


प्रस्तुति - तपन शर्मा


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