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Saturday, October 21, 2017

चित्रकथा - 41: भाई-दूज विशेष: फ़िल्म-संगीत जगत में भाई-बहन की जोड़ियाँ

अंक - 41

भाई-दूज विशेष: फ़िल्म-संगीत जगत में भाई-बहन की जोड़ियाँ


"एक हज़ारों में मेरी बहना है..." 



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! प्रस्तुत है फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत के विभिन्न पहलुओं से जुड़े विषयों पर आधारित शोधालेखों का स्तंभ ’चित्रशाला’। आज रक्षाबंधन है, इस पावन अवसर पर हम अपने सभी पाठकों का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं। दोस्तों, हिन्दी सिने संगीत जगत में कई भाई-बहन की जोड़ियों ने काम किया है। आज रक्षाबंधन के अवसर पर आइए ’चित्रशाला’ के ज़रिए याद करें कुछ ऐसे भाई-बहनों को जिन्होंने फ़िल्म संगीत को समृद्ध किया है। तो आइए क्यों ना आज ’चित्रकथा’ के इस अंक में हम याद करें कुछ ऐसी ही भाई-बहन की जोड़ियों को जिन्होंने फ़िल्म-संगीत जगत में अपनी पहचान बनाई हैं, अपनी छाप छोड़ी है।




क ही परिवार के दो भाई या दो बहनों के फ़िल्म संगीत जगत में काम करने के उदाहरण तो हमें बहुत से मिल जायेंगे, पर एक ही परिवार से एक भाई और एक बहन की जोड़ियों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है। फ़िल्म संगीत के शुरुआती दौर की तरफ़ चलें तो सबसे पहले जिस भाई-बहन की जोड़ी हमें याद आती है, वह है सुनहरे दौर के फ़िल्म संगीतकारों में भीष्म-पितामह की हैसियत रखने वाले संगीतकार अनिल बिस्वास और फ़िल्म संगीत की प्रथम पार्श्वगायिका पारुल घोष की जोड़ी। पारुल घोष अनिल दा से दो वर्ष छोटी थीं। भाई बहन दोनों में संगीत के बीज बोये उनकी माँ ने जिन्हें संगीत से बहुत लगाव था। पारुल का विवाह अनिल दा के मित्र और बांसुरी नवाज़ पंडित पन्नालाल घोष से सम्पन्न हुआ और संगीत की धारा बहती चली गई। भाई ने अपनी बहन को अपने द्वारा स्वरबद्ध किए हुए बहुत से गीत गवाए, जिनमें पारुल घोष का सबसे हिट गीत "पपीहा रे मेरे पिया से कहियो जाए" भी शामिल है।

अनिल बिस्वास - पारुल घोष के बाद जिस जोड़ी का ज़िक्र हमारे ज़हन में आता है, वह है पार्श्वगायिका गीता दत्त और कमचर्चित संगीतकार मुकुल रॉय की। मुकुल रॉय जो आजकल महाराष्ट्र के नासिक में रहते हैं, उन्होंने अपनी बहन गीता दत्त की जीवनी "Geeta Dutt - The Skylark" को प्रकाशित करने में लेखिका हेमन्ती बनर्जी की बहुत सहायता की है। मुकुल रॉय अपनी बहन की तरह कामयाब तो नहीं हुए, पर ’सैलाब’, ’डीटेक्टिव’ और ’भेद’ जैसी फ़िल्मों में उनके स्वरबद्ध गीत बहुत लोकप्रिय हुए थे। गीता दत्त की आवाज़ में ’डीटेक्टिव’ का "मुझको तुम जो मिले ये जहान मिल गया" और ’सैलाब’ का "है यह दुनिया कौन सी ऐ दिल" गली गली गूंजा करता था। मुकुल अपनी बहन के बहुत करीब थे और गीता दत्त की ज़िन्दगी में जब निराशा और हताशा ने घर कर लिया था, तब मुकुल ही थे जिन्होंने उनका हमेशा साथ दिया। गुरु दत्त और गीता दत्त की असामयिक मृत्यु के बाद इनकी संतानों - तरुण और अरुण - को मुकुल रॉय ने ही बड़ा किया। एक भाई का अपनी बहन के प्रति निस्वार्थ प्रेम का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है भला!

एक ऐसा परिवार जिसने फ़िल्म संगीत जगत को शायद सर्वाधिक योगदान दिया है, वह है मंगेशकर परिवार। चार बहनों और एक भाई ने मिल कर संगीत का ऐसा ताना-बाना बुना है कि फ़िल्म संगीत का जब भी इतिहास लिखा जाएगा, उसके कम से कम आधे हिस्से में इस परिवार के किसी ना किसी का उल्लेख रहेगा। मंगेशकर परिवार के बारे में नई बात बताने को अब कुछ बाक़ी नहीं बचा है। लता, मीना, आशा, उषा और हृदयनाथ - चार बहनें और एक भाई - स्वाभाविक है कि इन चारों दीदी से हृदयनाथ को अपार प्यार मिला। हालाँकि हृदयनाथ हिन्दी फ़िल्म जगत में ज़्यादा काम नहीं कर सके, पर मराठी और ग़ैर फ़िल्म-संगीत में उनका योगदान उल्लेखनीय है। लता, आशा और उषा ने उनके बहुत सी सुन्दर रचनाओं को कंठ दिया है। मंगेशकर परिवार में भाई-बहन का रिश्ता अगली पीढ़ी में भी जारी रहा। आशा की संताने - हेमन्त और वर्षा - जब संगीतकार और गायिका बनीं तब आशा की ख़ुशियों का ठिकाना न रहा। आशा के शब्दों में, "कोई भी क्षण ज़िन्दगी के ऐसे होते हैं जो भुलाये नहीं जा सकते, बड़े मज़ेदार होते हैं। मेरा लड़का हेमन्त, आप समझते होंगे माँ के लिए बेटा क्या चीज़ होता है, एक दिन वो म्युज़िक डिरेक्टर बन गया और मेरे पास आकर कहने लगा कि यह मेरा गाना है, तुम गाओ। कैसा लगता है ना? जो कल तक इतना सा था, आज वो मुझसे कह रहा है कि मेरा गाना गाओ। फिर उसने अपनी बहन, मेरी बेटी वर्षा से कहने लगा कि तुम्हे भी गाना पड़ेगा। वर्षा बहुत शर्मिली है, उसने कहा कि बड़ी मासी इतना अच्छा गाती है, माँ इतना अच्छा गाती है, मैं नहीं गाऊँगी। लेकिन हेमन्त ने बहुत समझाया और उसका पहला गाना रेकॉर्ड हुआ। मैं स्टुडियो पहुँची तो देखा कि लड़की माइक के सामने खड़ी है और उसका भाई वन-टू बोल रहा है। यह क्षण मैं कभी नहीं भूल सकती। और वह गाना था फ़िल्म ’जादू-टोना’ का "यह गाँव प्यारा-प्यारा..."।" अफ़सोस की बात है कि हेमन्त और वर्षा, दोनों में से किसी को भी सफलता नहीं मिली, और वर्षा ने तो हाल ही में आत्महत्या भी कर ली।

भाई-बहन का रिश्ता हमेशा ख़ून का ही रिश्ता हो यह ज़रूरी नहीं। लता मंगेशकर का मदन मोहन के साथ सगे भाई जैसा ही रिश्ता था। इस रिश्ते की शुरुआत और पहली बार राखी बंधवाने का क़िस्सा लता के शब्दों में कुछ यूं है - "मैं पहली बार मदन भ‍इया से उनका स्वरबद्ध कोई गीत गाने के लिए नहीं बल्कि उनके साथ एक डुएट गीत गाने के लिए मिली थी। मास्टर ग़ुलाम हैदर ने हम दोनो को फ़िल्म ’शहीद’ में एक भाई-बहन के रिश्ते के गीत को गाने के लिए बुलाया था जिसके बोल थे "पिंजरे में बुलबुल बोले मेरा छोटा सा दिल डोले..."। गीत के बाद हम दोनों ने एक दूसरे की तारीफ़ की और तुरन्त हमारे बीच एक जुड़ाव सा हो गया। उन्होंने मुझसे यह वादा लिया कि जब भी वो संगीतकार बनेंगे तो उनकी पहली फ़िल्म में मुझे गाना पड़ेगा। मैंने वादा किया। पर किसी कारण से मैं उनकी पहली फ़िल्म ’आँखें’ में नहीं गा सकी और हमारे मीठे रिश्ते में एक खटास आई। मदन भ‍इया का दिल टूट गया। पर कुछ ही दिनों में मदन भ‍इया हमारे घर आए और कहा कि हमारा रिश्ता भाई-बहन के एक प्यार भरे गीत से शुरु हुआ था, आज रक्षाबंधन है, मेरी कलाई पर यह राखी बाँधो और वादा करो कि हम हमेशा भाई-बहन रहेंगे और तुम हमेशा मेरे लिए गाओगी। उन्हें राखी बाँधते हुए मेरी आँखों से आँसू टपकने लगी।"

संगीत के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण परिवार रहा है पंडित जसराज जी का। सुलक्षणा, विजेता, जतिन और ललित उन्हीं के भतीजी/भतीजे हैं। जब जतिन और ललित फ़िल्म जगत में आए तब तक सुलक्षणा फ़िल्मों से संयास ले चुकी थीं। इसलिए सुलक्षणा द्वारा जतिन-ललित के किसी गीत के गाने की जानकारी नहीं है। छोटी बहन विजेता ने ज़रूर जतिन-ललित के निर्देशन में कुछ गीत गाई हैं जिनमें "जवाँ हो यारों यह तुमको हुआ क्या" (जो जीता वही सिकन्दर) और "सच्ची यह कहानी है" (कभी हाँ कभी ना) चर्चित रहे। मंगेशकर और पंडित परिवार के बाद अब ज़िक्र शिवराम परिवार का। संगीतकार पंडित शिवराम कृष्ण का नाम आज लोग लगभग भुला चुके हैं पर चार पीढ़ियों से उनका परिवार संगीत की सेवा में निरन्तर लगा हुआ है। संगीतकार जोड़ी जुगल किशोर और तिलक राज उन्हीं के बेटे हैं जिन्होंने ’भीगी पलकें’, ’समय की धारा’ आदि फ़िल्मों में संगीत दिया है। ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ को दिए एक साक्षात्कार में जुगल किशोर जी ने अपने परिवार के बारे में बताते हुए अपनी बहनों का भी उल्लेख किया था कुछ इस तरह - "तिलक राज तो मेरा ही छोटा भाई है। बचपन से ही हम दोनों साथ में संगीत की चर्चा भी करते थे और साथ ही में बजाते भी थे। अपने स्कूल के वार्षिक दिवस के कार्यक्रम के लिए दोनों साथ में मिल कर नए गाने कम्पोज़ करते थे और स्टेज पर साथ में गाते थे। हमने अपना ऑरकेस्ट्रा भी बनाया था 'जयश्री ऑरकेस्ट्रा' के नाम से। जयश्री मेरी छोटी बहन है। आपने जयश्री शिवराम का नाम सुना होगा जो एक प्लेबैक सिंगर रही है। 'रामा ओ रामा' फ़िल्म का शीर्षक गीत उसी ने ही गाया था। हम लोग आठ भाई बहने हैं और सभी के सभी फ़िल्म इंडट्री से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। मैं वायलिनिस्ट, कम्पोज़र और सिंगर, तिलक राज कम्पोज़र और सिंगर, मुकेश शिवराम एक सिंगर है, भगवान शिवराम एक रिदम प्लेअर, पूर्णिमा परिहार एक सिंगर, नवीन शिवराम एक कीबोर्ड प्लेअर, तथा जयश्री शिवराम व निशा चौहान सिंगर्स। इस तरह से तीन पीढ़ियों से हमारा परिवार संगीत की सेवा में लगा हुआ है।" अपनी बहन के नाम पर ऑरकेस्ट्रा रखने वाले जुगल किशोर और तिलक राज ने अपनी बहन जयश्री को फ़िल्म ’समय की धारा’ और ’तेरे बिना क्या जीना’ में गीत गवाया था। मशहूर संगीतकार बप्पी लाहिड़ी ने बरसों पहले अपनी बेटी रीमा को लौन्च किया था, और अब हाल में उनके बेटे बप्पा ने भी फ़िल्म जगत में क़दम रख दिया है। नए-नए संगीतकार बने बप्पा लाहिड़ी ने बहन रीमा को अपनी पहली फ़िल्म ’जय वीरू’ में हार्ड कौर के साथ एक गीत गवाया है "ऐसा लश्कारा..."। 

अब तक जितने भी भाई-बहन जोड़ियों की हमने बातें की, उन सब में भाई संगीतकार और बहन गायिका हैं। अब ज़िक्र करते हैं उन भाई-बहन जोड़ियों की जिनमें भाई और बहन दोनो ही गायक/गायिका हैं। पहली जोड़ी है नाज़िया हसन और ज़ोहेब हसन की। नाज़िया और ज़ोहेब, दोनों का बचपन कराची और लंदन में बीता। 70 के दशक के अन्त में दोनो ने साथ मिल कर "संग संग चलें" और "कलियों का मेला" जैसे लोकप्रिय म्युज़िकल शोज़ में गाया। 1976 में दोनो नज़र आये Beyond the Last Mountain फ़िल्म के एक गीत में। नाज़िया हसन की पहली और बेहद कामयाब ऐल्बम ’डिस्को दीवाने’ में ज़ोहेब की भी आवाज़ शामिल थी। इसके बाद ’बूम बूम’ ऐल्बम भी ख़ूब चला, जिसके गाने ’स्टार’ फ़िल्म में लिया गया। बप्पी लाहिड़ी ने नाज़िया और ज़ेहेब से फ़िल्म ’शीला’ में गीत गवाये। नाज़िय को जितनी लोकप्रियता हासिल हुई, भाई ज़ोहेब को उतनी कामयाबी नहीं मिली। अफ़सोस की बात है कि मात्र 35 वर्ष की आयु में नाज़िया हसन इस दुनिया से चल बसीं और भाई-बहन की यह जोड़ी टूट गई। सरहद के इस पार इसी तरह की एक जोड़ी रही है शान और सागरिका की। पार्श्व गायन के क्षेत्र में क़दम जमाने से पहले संगीतकार मानस मुखर्जी के बेटे शान ने अपनी बड़ी बहन सागरिका के साथ मैगनासाउण्ड कंपनी के साथ एक अनुबन्ध किया और कई ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम्स में गाये जिनमें ’नौजवान’ और ’Q – Funk’ ख़ास चर्चित रहे। जिस तरह से बिद्दु ने नाज़िया और ज़ोहेब की जोड़ी को काफ़ी काम दिये, वैसे ही शान और सागरिका से भी बहुत से गीत और रीमिक्स गवाये। शान-सागरिका की जोड़ी भी बहुत ज़्यादा नहीं चल सकी क्योंकि शान पार्श्वगायन में व्यस्त हो गए और सागरिका का भी अपना अलग स्टाइल था। पर भाई-बहन के आपसी रिश्ते में कभी दरार नहीं आई। मशहूर पार्श्वगायिका अलका याज्ञनिक ने अपने भाई समीर याज्ञनिक के साथ मिल कर एक प्राइवेट ऐल्बम ’दिल था यहाँ अभी’ में गीत गाए। अपने भाई को बढ़ावा मिल सके इसी उद्देश्य से अलका ने यह ऐल्बम की जिसके गीत पसन्द तो बहुत किए गए पर समीर के करीयर को सँवारने में यह ऐल्बम असफल रही।

इस तरह से हर दशक में भाई-बहन की जोड़ियाँ हिन्दी फ़िल्म-संगीत जगत में आती रही हैं और शायद आगे भी आती रहेंगी, और यह परम्परा यूं ही चलती रहेगी।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, October 14, 2017

चित्रकथा - 40: किशोर कुमार को याद करती हुईं फ़िल्म जगत की पाँच अभिनेत्री और गायिकाएँ

अंक - 40

किशोर कुमार को याद करती हुईं फ़िल्म जगत की पाँच अभिनेत्री और गायिकाएँ


"बेक़रार दिल तू गाएजा..." 



दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत की इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकीया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। आज ’चित्रकथा’ के इस अंक में प्रस्तुत है हरफ़नमौला कलाकार किशोर कुमार के बारे में फ़िल्म जगत की कुछ अभिनेत्रियों व गायिकाओँ द्वारा कहे हुए शब्द और किशोर दा से जुड़ी उनकी स्मृतियाँ। कल 13 अक्तुबर को किशोर दा की पुण्यतिथि थी; अत: आज का यह अंख उन्ही को समर्पित करते हैं।



माला सिन्हा

"वो सबसे अच्छा कॉमेडियन, और एक बहुत अच्छे इंसान थे। मैंने उनके साथ दो हिन्दी फ़िल्मों में काम किया। एक था आइ. एस. जौहर का 'बेवकूफ़' और दूसरा एस. डी. नारंग का 'बम्बई का ठग'। सेट पे वो एक मिनट चुप नहीं बैठने का। जैसे कोई स्प्रिंग्‍ लगा हो! हर डिरेक्टर का नकल करना, एस. डी. नारंग कैसे बात करते हैं, के. एन. सिंह का इतना अच्छा नकल करते थे वो। टैप डान्स मैंने उन जैसा किसी को करते हुए नहीं देखा। किशोर दा असली जीनियस थे। He was a great actor, वो जो दादा गये, सो गये, उन जैसा अब कोई नहीं आ सकता, कोई आनेवाला नहीं। उनका गाना, गाना जैसे नहीं लगता, जैसे कि वो बात कर रहे हैं, very very expressive। मुझे गाने के रेकॉर्डिंग्‍स पर जाने का शौक था। जब भी मुझे पता चलता कि कहीं पे रेकॉर्डिंग्‍ चल रही है, मैं वहाँ पहुँच जाती थी। एक बार 'महबून स्टुडियोस' में किशोर दा के किसी गाने की रेकॉर्डिंग्‍ में मैं पहुँच गई। रेकॉर्डिंग्‍ से पहले कोई भी सिंगर कुछ चीज़ों से परहेज़ करते हैं, जैसे कि ठंडा पानी, इमली वगेरह। तो किशोर दा ने कहा कि मेरे लिए लेमन सोडा ले आओ, वह भी बरफ़ डाल कर। मैंने उनसे जाके पूछा, "दादा, आप रेकॉर्डिंग्‍ के समय ठंडा पीने की ज़िद कर रहे हैं, गला ख़राब नहीं हो जायेगा?" तो उन्होंने कहा कि अरे ये सब वहम है, जिसको उपरवाले का देन है, उसे कुछ नहीं होता। इतना ज़िंदा दिल इंसान मैंने कहीं और नहीं देखा।"



शशिकला

"'करोड़पति' हमारे घर की फ़िल्म थी। इसमें मैं थी, और हमारे किशोर कुमार थे। म्युज़िक था शंकर-जयकिशन का। लेकिन फ़िल्म बिल्कुल नहीं चली। गाने भी नहीं चले। शंकर-जयकिशन के होने के बावजूद नहीं चले। हम कहते थे कि 'करोड़पति' बनाते-बनाते हम कंगालपति बन गये। किशोर दा, उन दिनों में, मेरा ख़याल है सिर्फ़ तीन या चार आर्टिस्ट टॉप में थे - दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनन्द और किशोर कुमार। उनसे मिलना बहुत मुश्किल का काम था। टाइम देते थे, पर मिलते नहीं थे। टाइम देते थे, पर कभी नहीं आते थे। बिल्कुल शैतान बच्चे की तरह। आपको मैं उनका आख़िरी क़िस्सा सुनाती हूँ। फ़िल्म तो बन गई, फ़्लॉप भी हो गई, चली नहीं, ये सब हुआ, एक दिन मुझे फ़ोन आता है उनका कि शशि, तुम मुझे मिलने आओ। तो मैं गई अपने फ़्रेन्ड के साथ मिलने के लिए। तो बात कर रहे हैं, मुझे हार्ट-अटैक हो गया, ऐसा हुआ, वैसा हुआ, और अचानक मुझे आवाज़ आती है, 'टाइम अप, टाइम अप, टाइम अप'। मैं तो घबरा गई, मैंने कहा कि अरे यह आवाज़ कहाँ से आ रही है? हँसने लगे, हा हा हा, पता है मैं हार्ट का पेशण्ट हूँ न, इसलिए यहाँ पे एक रेकॉर्डिंग्‍ करके रखी है, पाँच मिनट से ज़्यादा किसी से बात नहीं करनी है। मैंने कहा कि किशोर दा, आपने मुझे डरा ही दिया बिल्कुल! और बहुत ईमोशनल थे मेरा ख़याल है, very emotional person। उनके तो कितने क़िस्से हैं, जितना सुनाये तो कम है, पर बहुत ही अच्छे, बहुत ही कमाल के आर्टिस्ट, जीनियस भी कहना चाहिए, देखिये गाने भी उन्होंने कितने अच्छे लिखे, म्युज़िक भी कितना अच्छा दिया, गाते तो अच्छा थे ही।"



लीना चन्दावरकर

"किशोर जी में जो एक बच्चा था, वह बच्चा उनके साथ ही रहता था, और वह आख़िर तक था। आशा जी को भी आप पूछिये कि किस तरह से वो... मैं शुरू शुरू में थोड़ा डर गई थी क्योंकि ये क्या करते हैं हरकतें न! और ऐसे डराते थे! मैंने उनके बारे में बहुत कुछ सुन रखा था, जब मैं फ़िल्मों में काम कर रही थी। कहीं न कहीं से उनका ज़िक्र आ ही जाता था। रवैल साहब, 'महबूब की मेहन्दी' के सेट पे, सब उनकी बातें कर रहे थे। किशोर जी के बारे में तो सबसे दिलचस्प टॉपिक होता था। तो 'शराफ़त' फ़िल्म में उन्होंने काम किया था रवैल साहब के साथ। राजकुमार जी, मीना जी। तो मैं वहाँ पे नयी थी तो सुनती थी इंटरेस्ट लेके कि क्या बातें हो रही हैं और ये सब सीनियर आर्टिस्ट्स हैं। तो बाद में (उनसे शादी होने के बाद) मुझे मालूम हुआ कि सब बढ़ा-चढ़ा कर बोलते थे। किशोर जी को मैंने ऐसा कभी नहीं देखा। बहुत ही बैलेन्स्ड इंसान थे, उनको थोड़ा सा था कि लोगों को दिखाये कि मैं पागलपन करता हूँ। उनको मज़ा आता था। दादामुनि थे न, अशोक कुमार जी, दादामुनि को वो कहते थे कि दादामुनि, तुम सयाने बन के फँस जाते हो, मैं पागल बन के बच जाता हूँ। क्योंकि एक दिन बर्थडे था उनका और उन्होंने किसी को इनवाइट नहीं किया था, और पता भी नहीं था कि खाना बनाना है कि क्या करना है! हम लोग गये थे, हमको तो पता था कि दादामुनि का बर्थडे है। भाभी ने हमारे लिए पूरी-तरकारी, उनको मालूम था कि इनकी क्या पसन्द है। बुलाने की क्या ज़रूरत है, सबको पता था कि दादामुनि का बर्थडे है तो करीबी लोग आने लगे। एक एक करके आने लगे और बैठ गये। किशोर जी भी बैठे हैं और एक दम, गाना भी गा रहे हैं। सुनाये जा रहे हैं, सबको मज़ा आ रहा है। तो खाने का वक़्त आ गया, डिनर। खाना भी बनाया था। लेकिन इतने लोग आ गये कि इतने लोगों का खाना है नहीं घर में। भाभी परेशान, बाद में कैसे भी करके मैनेज किया, होटल वगेरह से मँगवा के। हम इतने परेशान थे कि अभी ऑर्डर करेंगे, फिर दस लोग आ जायेंगे तो क्या होगा? क्योंकि रात हो चली थी। तो दादामुनि ने अन्दर आके मुझसे कहा कि अब क्या होगा, मैंने इतने लोगों को इनवाइट तो नहीं किया था, तेरी भाभी इतने लोगों का कैसे खाना बनायेगी? तो किशोर दा बड़ा मज़ा ले रहे थे। बोले कि तुम बड़े सयाने हो ना, इसलिये फँस जाते हो, मैं तो पागल हूँ, मैं बच जाता हूँ। दादामुनि ने कहा कि तू तो कंजूस है। तो किशोर जी ने कहा कि नहीं नहीं मैं कंजूस नहीं हूँ, लेकिन तुमको करना पड़ेगा, इस तरह से कोई उनको बोले तो अच्छा नहीं लगता था, कहते हैं न 'rules and regulations', उनको लगता था कि हर एक को आज़ादी मिलनी चाहिये। कोई ऐबनॉर्मल बीहेव नहीं करेंगे, लेकिन अगर कोई उनसे कहे तो ये करना पड़ेगा।"



सुलक्षणा पण्डित

जब सुलक्षणा पण्डित को एक साक्षात्कार में यह पूछा गया कि उन्होंने किशोर दा के साथ ’दूर का राही’ फ़िल्म में एक कालजयी गीत "बेक़रार दिल" गाया है, इसके बारे में वो कुछ बताएँ, तब सुलक्षणा जी ने कहा - "oh my God, उस गाने में किशोर दा ने मुझे बहुत चिढ़ाया था। उन्होंने कहा, "नहीं तुम बेक़रारे बोलोगी"; मैंने कहा, "मैं बेक़रार बोलूंगी।" उन्होंने फिर कहा कि नहीं तुम "बेक़रारे" कहोगी। तो मैं बोली कि नहीं, मैं "बेक़रार" ही बोलूंगी। तो ऐसे करते करते हम स्टुडियो पहुँचे - फ़िल्म सेन्टर। वहाँ पर रेखा भी थीं। योगिता बाली भी थीं, तो किशोर दा तो किशोर दा, बोले कि इस लड़की को हटाओ यहाँ से, नहीं तो परदा लगा दो, बहुत देखती है मुझे। तो ये सब करने के बाद इस तरह से "बेक़रार दिल" हमने साथ में गाया।" सुलक्षणा जी से जब आगे पूछा गया कि यह गाना कितनी देर में रेकॉर्ड हुआ था, तो उन्होंने बताया, "मैं आपको बताऊँ, "बेक़रार दिल" सिर्फ़ दो बार गाया गया था, तो किशोर दा की माँगें कि ये लगा दो, परदा लगा दो, लड़कियों को भगा दो, और मैं भी खड़ी हुई थी वहाँ पे, अब मैं कुछ बोलूंगी तो...पर काफ़ी जब ऐसा होने लगा तो मैंने बोला, "देखिए, आप इतना क्यों कर रहे हैं, हम लोग तो ऐसे नहीं"। "तेरे को मालूम चलेगा क्या है"। फिर मैंने गाना गाया उनके साथ, और किशोर कुमार तो धनी हैं हर चीज़ के, म्युज़िक डिरेक्टर वो हैं, ऐक्टर वो हैं, राइटर वो हैं, फ़िल्ममेकर वो हैं, क्या नहीं हैं वो, हर चीज़ से भरपूर, सराफ़ा एक आर्टिस्ट नज़र आता है उनमें। उमर में वो मेरे पंडित जसराज जी जैसे ही थे लेकिन अन्दर से बच्चे, और बातें करना अपने पत्तों से, अपने गार्डन से, रोज़ अपना घर बदलना, बिगाड़ना, कभी झोपड़ी बना देते थे, इतना सा, टाइम ज़रा भी नहीं लेते थे वो। मैंने उनके साथ हज़ारों स्टेज शोज़ भी किए हैं और इतना मज़ा भी आया, इतना कुछ सीखा भी है उनसे, बहुत कमाल के हैं, किशोर कुमार दोबारा पैदा नहीं हुआ।"



अलका यागनिक

13 अक्टुबर 1987 के दिन किशोर कुमार इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह गए थे। इसी दिन रेकॉर्ड हुआ था फ़िल्म ’बटवारा’ का गीत "तेरे वास्ते रे ढोला नैन म्हारे जागे रे जागे, तू म्हारो कोण लागे" जिसे अलका यागनिक, अनुराधा पौडवाल और कविता कृष्णमूर्ती ने गाया था। इस गीत की रेकॉर्डिंग् से जुड़ी एक दुखद याद के बारे में अलका यागनिक ने एक साक्षात्कार में बताया था। तीनों गायिकाएँ तैयार थीं, दवाब भी था उन पर क्योंकि तीनों में उन दिनों प्रतियोगिता थी। इसलिए इस दवाब में थीं कि कहीं मुझसे इस गीत में कोई ग़लती ना हो जाए! गीत रेकॉर्ड हो गया, तीनों गायिकाएँ काँच के कमरे से बाहर आ गईं। लक्ष्मी-प्यारे भी उनकी तरफ़ चले आ रहे थे कन्डक्टिंग् रूम की तरफ़ से, पर किसी के चेहरे पर कोई मुस्कुराहट नहीं थी जो आम तौर पर होता है अगर गीत अच्छा रेकॉर्ड हो जाए तो। लक्ष्मी-प्यारे के उतरे हुए चेहरे देख कर तीनों गायिकाएँ घबरा गईं यह सोच कर कि कहीं उनसे कोई ग़लती तो नहीं हो गई इस गीत में? पास आने पर अलका याज्ञनिक ने प्यारेलाल जी से पूछा कि क्या बात है? प्यारेलाल जी ने बताया, "किशोर दा नहीं रहे!" दिन था 13 अक्टुबर 1987। इसी दिन किशोर दा चले गए और इसी दिन रेकॉर्ड हुआ था ’बटवारा’ का यह गीत, हालाँकि फ़िल्म 1989 में रिलीज़ हुई थी।


आख़िरी बात

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शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, July 2, 2016

"तू मेरा कौन लागे?" क्या सम्बन्ध है इस गीत का किशोर कुमार से?


एक गीत सौ कहानियाँ - 85
 

'तू मेरा कौन लागे...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 85-वीं कड़ी में आज जानिए 1989 की फ़िल्म ’बटवारा’ के लोकप्रिय गीत "तू मेरा कौन लागे..." के बारे में जिसे अनुराधा पौडवाल, अलका याज्ञनिक और कविता कृष्णमूर्ति ने गाया था। गीत लिखा है हसन कमाल ने और संगीत दिया है लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने।  


 मारी फ़िल्मों में एकल और युगल गीतों की कोई कमी नहीं है। तीन, चार या उससे अधिक गायकों के गाये
गीतों की भी फ़ेहरिस्त काफ़ी लम्बी है। लेकिन अगर ऐसे गानें छाँटने के लिए कहा जाए जिनमें कुल तीन गायिकाओं की आवाज़ें हैं तो शायद गिनती उंगलियों पर ही की जा सकती है। दूसरे शब्दों में ऐसे गीत बहुत कम संख्या में बने हैं। आज हम एक ऐसे ही गीत की चर्चा कर रहे हैं जो बनी थी 1989 की फ़िल्म ’बटवारा’ के लिए। अलका याज्ञनिक, अनुराधा पौडवाल और कविता कृष्णमूर्ति का गाया "तू मेरा कौन लागे" गीत अपने ज़माने में काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। इस गीत की चर्चा शुरू करने से पहले जल्दी जल्दी एक नज़र डाल लेते हैं तीन गायिकाओं के गाए फ़िल्मी गीतों के इतिहास पर। पहला गीत तो वही है जो फ़िल्म संगीत इतिहास का पहला पार्श्वगायन युक्त गीत है। 1935 की फ़िल्म ’धूप छाँव’ के गीत "मैं ख़ुश होना चाहूँ..." में संगीतकार रायचन्द बोराल ने तीन गायिकाओं - पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति दुआ को एक साथ गवाया था। 40 के दशक में 1945 की फ़िल्म ’ज़ीनत’ में एक ऐसी क़व्वाली बनी जिसमें केवल महिलाओं की आवाज़ें थीं, फ़िल्म संगीत के इतिहास में यह पहली बार था। मीर साहब और हाफ़िज़ ख़ाँ के संगीत में "आहें ना भरी शिकवे ना किए...", इस क़वाली में आवाज़ें थीं नूरजहाँ, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और कल्याणीबाई की। 50 के दशक में नौशाद साहब ने तीन गायिकाओं को गवाया महबूब ख़ान की बड़ी फ़िल्म ’मदर इण्डिया’ में। तीन मंगेशकर बहनों - लता, उषा और मीना ने इस गीत को गाया, बोल थे "दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा..."। 60 के दशक में पहली बार संगीतकार रवि ने लता, आशा और उषा को एक साथ गवाकर इतिहास रचा, फ़िल्म थी ’गृहस्थी’ और गाना था "खिले हैं सखी आज..."। इसके पाँच साल बाद 1968 में कल्याणजी-आनन्दजी ने फिर एक बार इन तीन बहनों को गवाया ’तीन बहूरानियाँ’ फ़िल्म के गीत "हमरे आंगन बगिया..." में। इसी साल कल्याणजी-आनन्दजी भाइयों ने मुबारक़ बेगम, सुमन कल्याणपुर और कृष्णा बोस की आवाज़ों में ’जुआरी’ फ़िल्म में एक गीत गवाया "नींद उड़ जाए तेरी चैन से सोने वाले" जो काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। 70 के दशक में शंकर-जयकिशन ने एक कमचर्चित फ़िल्म ’दिल दौलत दुनिया’ के लिए एक दीपावली गीत रेकॉर्ड किया आशा भोसले, उषा मंगेशकर और रेखा जयकर की आवाज़ों में, "दीप जले देखो..."। और 80 के दशक में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने 1982 की फ़िल्म ’जीवन धारा’ में पहली बार अनुराधा-अलका-कविता की तिकड़ी को पहली बार साथ में माइक के सामने ला खड़ा किया, गीत था "जल्दी से आ मेरे परदेसी बाबुल..."। और जब 1989 में ’बटवारा’ में एक ऐसे तीन गायिकाओं वाले गीत की ज़रूरत आन पड़ी तब लक्ष्मी-प्यारे ने फिर एक बार इसी तिकड़ी को गवाने का निर्णय लिया। 90 के दशक में इस तिकड़ी को राम लक्ष्मण ने ’हम साथ साथ हैं’ फ़िल्म के कई गीतों में गवाया जैसे कि "मय्या यशोदा...", "मारे हिवड़ा में नाचे मोर...", "हम साथ साथ हैं..."। इसी दशक में यश चोपड़ा की फ़िल्म ’डर’ में शिव-हरि ने लता मंगेशकर के साथ कविता कृष्णमूर्ति और पामेला चोपड़ा को गवाकर एक अद्‍भुत गीत की रचना की, बोल थे "मेरी माँ ने लगा दिये सोलह बटन मेरी चोली में..."। 2000 के दशक में भी तीन गायिकाओं के गाए गीतों की परम्परा जारी रही, अनु मलिक ने ’यादें’ फ़िल्म में अलका याज्ञनिक, कविता कृष्णमूर्ति और हेमा सरदेसाई से गवाया "एली रे एली कैसी है पहेली..."।

"तू मेरा कौन लागे" गीत में डिम्पल कपाडिया के लिए अलका याज्ञनिक, अम्रीता सिंह के लिए कविता
किशोर के साथ अनुराधा की दुर्लभ तसवीर, साथ में अमित कुमार और आशा
कृष्णमूर्ति और पूनम ढिल्लों के लिए अनुराधा पौडवाल की आवाज़ निर्धारित हुई। गाना रेकॉर्ड होकर सेट पर पहुँच गया शूटिंग् के लिए। पर फ़िल्मांकन में हो गई गड़बड़। अभिनेत्री-गायिका की जोड़ियों में गड़बड़ हो गई। शुरुआती मुखड़े में अम्रीता सिंह ने अनुराधा पौडवाल के गाए हिस्से में होंठ मिला दी जबकि अनुराधा को पूनम के लिए गाना था। गीत का अन्त तो और गड़बड़ी वाला है। डिम्पल गीत को ख़त्म करती हैं "तू मारो कोण लागे" पंक्ति को चार बार गाते हुए। पर पहली दो लाइनें अलका की आवाज़ में है और अगली दो लाइनें अनुराधा की आवाज़ में। और तो और अनुराधा जो पूनम के लिए "तू मेरा कौन लागे" गा रही थीं, अब डिम्पल के लिए "तू मारो कोण लागे" गाती हैं। ऐसा क्यों है, पता नहीं! ख़ैर, अब ज़िक्र करते हैं कि इस गीत का किशोर कुमार के साथ क्या सम्बन्ध है। गीत के रेकॉर्डिंग् के दिन की बात है। तीनों गायिकाएँ तैयार थीं, दवाब भी था उन पर क्योंकि तीनों में उन दिनों प्रतियोगिता थी। इसलिए इस दवाब में थीं कि कहीं मुझसे इस गीत में कोई ग़लती ना हो जाए! गीत रेकॉर्ड हो गया, तीनों गायिकाएँ काँच के कमरे से बाहर आ गईं। लक्ष्मी-प्यारे भी उनकी तरफ़ चले आ रहे थे कन्डक्टिंग् रूम की तरफ़ से, पर किसी के चेहरे पर कोई मुस्कुराहट नहीं थी जो आम तौर पर होता है अगर गीत अच्छा रेकॉर्ड हो जाए तो। लक्ष्मी-प्यारे के उतरे हुए चेहरे देख कर तीनों गायिकाएँ घबरा गईं यह सोच कर कि कहीं उनसे कोई ग़लती तो नहीं हो गई इस गीत में? पास आने पर अलका याज्ञनिक ने प्यारेलाल जी से पूछा कि क्या बात है? प्यारेलाल जी ने बताया, "किशोर दा नहीं रहे!" दिन था 13 अक्टुबर 1987। इसी दिन किशोर दा चले गए और इसी दिन रेकॉर्ड हुआ था ’बटवारा’ का यह गीत, हालाँकि फ़िल्म 1989 में रिलीज़ हुई थी। 



फिल्म - बँटवारा : "तू मेरा कौन लागे..." : अनुराधा पौडवाल, अलका याज्ञिक, कविता कृष्णमूर्ति



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Tuesday, June 22, 2010

बहुत कुछ खत्म होके भी हिमेश भाई और संगीत के दरम्यां कुछ तो बाकी है.. और इसका सबूत है "मिलेंगे मिलेंगे"

ताज़ा सुर ताल २३/२०१०

सुजॊय - सभी श्रोताओं व पाठकों का स्वागत है 'ताज़ा सुर ताल' के एक और ताज़े अंक में। इस शुक्रवार वह फ़िल्म आख़िर रिलीज़ हो ही गई जिसकी लोग बड़ी बेसबरी से इंतज़ार कर रहे थे। 'रावण'। अभी दो दिन पहले एक न्यूज़ चैनल पर इस फ़िल्म से संबंधित 'ब्रेकिंग्‍ न्यूज़' का शीर्षक था "मिया पर बीवी हावी"। ग़लत नहीं कहा था उस न्यूज़ चैनल ने। हालाँकि अभिषेक ने अच्छा काम किया है, लेकिन ऐश की अदाकारी की तारीफ़ करनी ही पड़ेगी। देखते हैं फ़िल्म कैसा व्यापार करता है इस पूरे हफ़्ते में।

विश्व दीपक - मैने रावण देखी और मुझे तो बेहद पसंद आई। मैने ना सिर्फ़ इस फिल्म का हिन्दी संस्करण देखा बल्कि इसका तमिल संस्करण (रावणन) भी देखा.. और दुगना आनंद हासिल किया । चलिए 'रावण' से आगे बढ़ते हैं। आज हम इस स्तंभ में जिस फ़िल्म के गानें सुनने जा रहे हैं, वह कई दृष्टि से अनोखा है। पहली बात तो यह कि इस फ़िल्म की मेकिंग बहुत पहले से ही शुरु हो गई थी जब शाहीद और करीना का ब्रेक-अप नहीं हुआ था। तभी तो यह जोड़ी नज़र आएगी इस फ़िल्म में। शायद यही बात फ़िल्म की सफलता का कारण बन जाए, किसे पता! दूसरी बात यह कि इसमें हिमेश रेशम्मिया का संगीत है, लेकिन वैसा संगीत नहीं जैसा कि वो आजकल की फ़िल्मों में दे रहे हैं। मेरा ख़याल है कि इस फ़िल्म के गानें भी बहुत पहले से ही बन चुके होंगे, जिस समय हिमेश अपनी आवाज़ के मुकाबले सोनू निगम, शान, अलका याज्ञ्निक, श्रेया घोषाल जैसे गायकों को ज़्यादा मौका दिया करते थे। इसलिए जिन श्रोताओं को हिमेश की आवाज़ से ऐलर्जी है, वो शायद इस बार इस फ़िल्म के गानें सुनने में दिलचस्पी लें।

सुजॊय - सही कहा आपने। दरसल मुझे जितना पता है, 'मिलेंगे मिलेंगे' आज से पाँच साल पहले प्लान की गई थी, और उस समय हिमेश का स्टाइल कुछ और ही हुआ करता था। इस फ़िल्म के गीतों में सुनने वालों को उस पुराने हिमेश और आज के हिमेश का संगम सुनाई देगा। 'मिलेंगे मिलेंगे' के निर्देशक हैं सतीश कौशिक, जिनके साथ हिमेश ने अपनी सब से बेहतरीन फ़िल्म 'तेरे नाम' में संगीत दिया था। इसके अलावा 'वादा' और 'रन' फ़िल्म में भी ये दोनों साथ में आए थे। और कहने की ज़रूरत नहीं कि इन दो फ़िल्मों के गानें भी चले थे भले ही फ़िल्में फ़्लॊप हुईं थीं। आज इस फ़िल्म के गीतों को सुनते हुए हमें अहसास हो जाएगा कि क्या हिमेश फिर से एक बार पिछले दशक के अपने मेलोडियस गीतों की तरह इस फ़िल्म में भी वैसा ही कुछ संगीत दे पाएँ हैं! 'तेरे नाम', 'दिल मांगे मोर', 'चुरा लिया है तुमने' आदि फ़िल्मों का ज़माना क्या वापस आ पाएगा इस फ़िल्म के ज़रिए?

विश्व दीपक - अब बातों को देते हैं विराम और सुनते हैं फ़िल्म का पहला गीत हिमेश की आवाज़ में। फ़िल्म के गानें लिखे हैं गीतकार समीर ने। और आपको बता दें कि इस गीत के ज़रिए ही फ़िल्म का प्रोमो इन दिनों दिखाया जा रहा है टेलीविज़न पर।

गीत: कुछ तो बाक़ी है


सुजॊय - "कुछ तो बाक़ी है"। विश्व दीपक जी, इस गीत को सुन कर हिमेश की आवाज़ और गायन शैली के बारे में कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि कुछ नयी बात कहने की कोई गुंजाइश बाक़ी नहीं है। लेकिन संगीत और संगीत संयोजन अच्छा है और इतना तो ज़रूर कह सकते हैं कि हिमेश के संगीत में अभी बहुत कुछ बाक़ी है। आपका क्या ख़याल है?

विश्व दीपक - यह गीत यक़ीनन एक ऐसा गीत है जो एक मूड बना देता है और दोबारा सुनने के लिए उकसा देता है। समीर की लेखन शैली और स्टाइल साफ़ झलकता है इस गीत में। और जहाँ तक ऒर्केस्ट्रेशन का सवाल है, इसमें तबला, हारमोनियम और सारंगी जैसे साज़ों की ध्वनियों का सुंदर प्रयोग किया गया है। और सब से बड़ी बात यह कि इस गीत के जो बोल हैं वो फ़िल्म के किरदारों पर ही नहीं बल्कि शाहीद-करीना की निजी ज़िंदगी को भी छू जाते हैं। "सब ख़त्म होके भी तेरे मेरे दरमीयाँ कुछ तो बाक़ी है" - अब इस तरह के बोल जान बूझ कर डाले गऎ है या फिर एक महज़ इत्तेफ़ाक़ है, यह तो हम नहीं जानते हैं, लेकिन जो भी है मज़ेदार बन पड़ा है। मीडिया को भी भरपूर ख़ुराक मिलने वाला है इस फ़िल्म के रिलीज़ पर।

सुजॊय - आगे बढ़ते हैं और दूसरा जो गीत है उसे गाया है अलका याज्ञ्निक और जयेश गांधी ने। यह फ़िल्म का शीर्षक गीत है "मिलेंगे मिलेंगे", और इसी का एक और वर्ज़न भी है जिसे हम आगे चलकर सुनेंगे।

गीत: मिलेंगे मिलेंगे (अलका/जयेश)


सुजॊय - बहुत दिनों के बाद अलका की आवाज़ सुन कर अच्छा लगा। एक बात जो मैंने नोटिस की इस गीत को सुनते हुए कि इस गीत का जो ऒरकेस्ट्रेशन है, वह हिमेश के पहले के गीतों में कई कई बार हो चुका है। मुझे पता नहीं वह कौन-सा साज़ है, लेकिन इस गीत में आपको उस साज़ की धुन सुनाई देगी जिसका हिमेश ने "चुरा लिया है तुमने" गीत में भी प्रोमिनेण्ट तरीके से किया था। पार्श्व में कोरस का इस्तेमाल भी हिमेश ने अपने उसी पुराने शैली में किया है। गीत ठीक ठाक है, लेकिन कोई नई बात नज़र नहीं आई।

विश्व दीपक - और अब सोनू निगम और अलका याज्ञ्निक की युगल आवाज़ें। सुजॊय, क्या आप बता सकते हैं कि इससे पहले आपने सोनू और अलका की युगल आवाज़ें किस फ़िल्म में आख़िरी बार सुना था?

सुजॊय - मेरा ख़याल है पिछले ही साल फ़िल्म 'लाइफ़ पार्टनर' में "कल नौ बजे तुम चांद देखना" जो गीत है, उसी में ये दोनों साथ में आए थे।

विश्व दीपक - और उस गीत की तरह यह गीत भी नर्मोनाज़ुक है और इस जोड़ी ने पूरा न्याय किया है। वैसे इसे पूरी तरह से युगल कहना ग़लत होगा। भले ही फ़िल्म के सी.डी पर सोनू और अलका के नाम दिए गए हैं, लेकिन इसमें सुज़ेन डी'मेलो ने अंग्रेज़ी के बोल गाए हैं जिनकी इस गीत में कोई ज़रूरत नहीं थी।

गीत: तुम चैन हो


सुजॊय - बिलकुल सही कहा था आपने कि उन अंग्रेज़ी के शब्दों की कोई ज़रूरत नहीं थी। ज़रा याद कीजिए फ़िल्म 'लगान' के उस गीत को, "ओ री छोरी", जिसमें वसुंधरा दास ने अंग्रेज़ी की पंक्तियाँ गाईं थीं। इसका ज़िक्र मैं यहाँ इसलिए कर रहा हूँ यह बताने के लिए कि उस गीत में वह न्यायसंगत था, लेकिन इस गीत में उसकी ज़रूरत शायद ही थी। ख़ैर, सोनू निगम ने फिर एक बार अपने बेहतरीन अंदाज़ में गायन प्रस्तुत किया है, और हिमेश के अनुसार वो हैं ही आज के नंबर वन गायक। एक बार करण जोहर के 'कॊफ़ी विथ करण' में जब करण ने कई गायकों को १ से १० के स्केल में रेट करने को कहा था, तब हिमेश ने उदित नारयण को ७ और सोनू निगम को १० की रेटिंग्‍ दी थी। अलका के खाते में आए थे ८ की रेटिंग। ख़ैर, ये तो हिमेश की व्यक्तिगत राय थी।

विश्व दीपक - अगला गीत है "इश्क़ की गली है मखमली"। राहत फ़तेह अली ख़ान और जयेश गांधी की आवाज़ें। राहत साहब गाने की शुरुआत करते हैं और फिर उसके बाद जयेश गीत को आगे बढ़ाते हैं। राहत साहब अपने अंदाज़ के ऊँचे सुर में "इश्क़ की गली है मखमली रब्बा" गाते हैं, जब कि जयेश भी अपने ही अंदाज़ में "मेरे दिल को तुमसे कितनी मोहब्बत" गाते हैं। उनकी आवाज़ भी मौलिक आवाज़ है और किसी और से नहीं मिलती।

सुजॊय - इससे पहले राहत फ़तेह अली ने हिमेश रेशम्मिया की धुन पर फ़िल्म 'नमस्ते लंदन' का मशहूर गीत "मैं जहाँ रहूँ" गाया था। लेकिन उस गीत में जो बात थी, वह असर 'मिलेंगे मिलेंगे' के इस गीत में नहीं आ पाया है। चलिए सुनते हैं।

गीत: इश्क़ की गली है मखमली


विश्व दीपक - अगला जो गीत है वह थोड़ा सा अलग हट के है इसलिए क्योंकि आजकल इस तरह के गानें बनने लगभग बंद ही हो गए हैं। ९० के दशक और २००० के दशक के शुरुआती सालों तक इस तरह के "चूड़ी-कंगन" वाले गानें बहुत बनें हैं, लेकिन आज के फ़िल्मों के विषयवस्तु इस तरह के होते हैं कि इस तरह के गीतों के लिए कोई जगह या सिचुएशन ही नहीं पैदा हो पाती। यह है अलका यज्ञ्निक और साथियों की आवाज़ों में "ये हरे कांच की चूड़ियाँ, पहनी तेरे नाम की, राधा हो गई श्याम की"। वैसे बोल तो साधारण हैं लेकिन धुन ऐसी कैची है कि सुनते हुए अच्छा लगता है।

सुजॊय - और गाने के अंत में "मिलेंगे मिलेंगे" वाले गीत की धुन पर कोरस "मिलेंगे मिलेंगे" गा उठते हैं। और विश्व दीपक जी, इस गाने से याद आया कि ६० के दशक में एक फ़िल्म आई थी 'हरे काँच की चूड़ियाँ', जिसमें आशा भोसले का गाया शीर्षक गीत था "बज उठेंगे हरे काँच की चूड़ियाँ"। शैलेन्द्र जी ने उस गीत में मुखड़े और अंतरे में अंतर ना रखते हुए बड़े ही ख़ूबसूरत तरीक़े से लिखा था "धानी चुनरी पहन, सज के बन के दुल्हन, जाउँगी उनके घर, जिन से लागी लगन, आयेंगे जब सजन, जीतने मेरा मन, कुछ न बोलूँगी मैं, मुख न खोलूँगी मैं, बज उठेंगी हरे कांच की चूड़ियाँ, ये कहेंगी हरे कांच की चूड़ियाँ"।

विश्व दीपक - बिलकुल मुझे भी याद है यह गीत और इसे हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर भी तो सुनवाया था। ख़ैर, अलका और सखियों की आवाज़ों में आइए यह गीत सुना जाए और हमारे श्रोताओं को सुनवाया जाए।

गीत: ये हरे काँच की चूड़ियाँ


सुजॊय - और अब हम आ पहुँचे हैं इस फ़िल्म के अंतिम गीत पर। जैसा कि उपर हमने बताया था कि अलका याज्ञ्निक और जयेश गांधी के गाए फ़िल्म के शीर्षक गीत "मिलेंगे मिलेंगे" का एक और वर्ज़न है, तो अब बारी है उसी दूसरे वर्ज़न को सुनने की जिसे ख़ुद हिमेश भाई और श्रेया घोषाल ने गाया है। यक़ीन मानिए, अलका-जयेश वाले वर्ज़न से यह वला वर्ज़न मुझे ज़्यादा अपील किया। और "मिलेंगे मिलेंगे" वाले जगह की ट्युन ऐसी है कि एक हौंटिंग वातावरण जैसा बन जाता है, और इसमें शक़ नहीं कि पूरे फ़िल्म में इसी ट्युन का बार बार इस्तेमाल होता रहेगा।

विश्व दीपक - और इस गीत में शाहीद कपूर भी कुछ लाइनें कहते हैं। सिंथेसाइज़र्स का ख़ूबसूरत इस्तेमाल हुआ है। और फिर से उसी "चुरा लिया है तुमने" वाले साज़ का इस्तेमाल ऒरकेस्ट्रेशन में सुनाई देता है। हिमेश और श्रेया की आवाज़ें एक साथ अच्छी लगती है। फ़िल्म 'रेडियो' का "जानेमन" गीत भी इन दोनों ने ख़ूब गाया था।

गीत: मिलेंगे मिलेंगे (हिमेश/श्रेया)


"मिलेंगे मिलेंगे" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***१/२

सुजॊय - इन सभी गीतों को सुन कर मैं यह कह सकता हूँ कि भले ही इन गीतों में बहुत ख़ास कोई बात नहीं है, लेकिन गानें मेलोडियस हैं, सुन कर अच्छा लगा। हालाँकि इन गीतों में वो बात नहीं है कि जो फ़िल्म को हिट करा दे, लेकिन अगर फ़िल्म दूसरे पक्षों की वजह से हिट हो जाती है तो ये गानें भी ख़ूब चलेंगे, जैसा कि हमेशा से होता आया है। बस हिमेश भाई को शुभकामनाएँ देते हुए यही कहूँगा कि हिमेश भाई, अभी भी आप में बहुत कुछ बाक़ी है, बेस्ट ऒफ़ लक!

विश्व दीपक - फिर भी इतना तो कहना होगा कि हिमेश भाई का पुराना प्रयास उनके नए प्रयासों से कई कदम आगे है। अपने हीं आप में टाईप-कास्ट हो चुके हिमेश भाई से हम यही अपील करते हैं कि कभी-कभार वो अपने खोल से बाहर निकला करें और "तेरे नाम" जैसे गाने तैयार किया करें। इसी उम्मीद के साथ हम चलते हैं। हाँ, चलते चलते 'ताज़ा सुर ताल' के श्रोताओं व पाठकों से हम यही कहेंगे कि अगले हफ़्ते फिर एक बार आप से इस स्तंभ में यकीनन मिलेंगे मिलेंगे।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ६७- "मिलेंगे मिलेंगे" शीर्षक गीत में शाहीद कपूर ने कुछ लाइनें कही हैं। क्या आप कोई और गीत बता सकते हैं जिसमें शाहीद कपूर की आवाज़ शामिल है?

TST ट्रिविया # ६८- 'मिलेंगे मिलेंगे' बोनी कपूर की फ़िल्म है। बोनी कपूर की वह और कौन सी फ़िल्म है जिसमें हिमेश रेशम्मिया ने संगीत दिया है?

TST ट्रिविया # ६९- यह एक सोनू निगम - अलका याज्ञ्निक डुएट है। हिमेश रेशम्मिया का म्युज़िक है। शाहीद कपूर ही नायक हैं। गीत का मुखड़ा उन चार शब्दों से ख़त्म होता है जिन चार शब्दों से अलका याज्ञ्निक का गाया हुआ वह गीत शुरु होता है जो एक मशहूर हॊरर फ़िल्म का है और जिसमे नायिका बनी थीं बिपाशा बासु। बताइए हम किन दो गीतों की बात कर रहे हैं।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. नरेश शर्मा
२. 'चश्म-ए-बद्दूर'
३. पलाश सेन

सीमा जी, आपने तीनों सवालों के सही जवाब दिए। बधाई स्वीकारें। "इंडलि" जी, हमें आपके प्रस्ताव पर विचार करने के लिए कुछ वक्त चाहिए। विधु जी, गाने पसंद करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

Wednesday, November 18, 2009

हाय हम क्या से क्या हो गए....लज्जत-ए-इश्क़ महसूस करें जावेद अख़्तर और अल्का याज्ञनिक के साथ

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६०

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं शरद जी की पसंद की तीसरी और अंतिम नज़्म लेकर। गायकी के दो पुराने उस्तादों(मन्ना डे और मुकेश) को सुनने-सुनाने के बाद आज हमने रूख किया है १९९० और २००० के दशक की ओर और इस सफ़र में हमारा साथ वह दे रही हैं जो आज भी उसी शिद्दत से सुनी जाती हैं जिस शिद्दत से ३० साल पहले सुनी जाती थीं। नए दौर में कई सारी नई गायिकाएँ आईं, लेकिन इनके जादू को दुहरा न सकीं। इन्होंने अपना पहला गाना १९७९ की फिल्म "पायल की झनकार" में गाया था, वह गाना ज्यादा मशहूर तो नहीं हुआ, लेकिन हाँ उस गाने ने यह घोषणा तो कर दी कि एक लम्बे दौर का घोड़ा मैदान में उतर चुका है। फिर १९८१ में आई "लावारिस" जिसमें अमिताभ बच्चन का गाया "मेरे अंगने में" बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ गया। लेकिन हाँ अमित जी के गाए इस गाने का एक रूप और था, जिसे परदे पर "राखी" गाती हैं और परदे के पीछे हमारी आज की फ़नकारा। यह गाना भी खूब चला, लेकिन अगर कोई यह पूछे कि इन्हें सही मायने में सफ़लता कब मिली, तो निर्विरोध एक हीं जवाब होगा और वह जवाब है १९८८ में रीलिज हुई फिल्म "तेजाब" का बहुचर्चित गाना "एक दो तीन"...है कोई जिसे वह गाना याद नहीं या फिर जिसे वह गाना पसंद नहीं? इन्हें इस गाने के लिए "फिल्मफ़ेयर फीमेल बेस्ट सिंगर" के अवार्ड से नवाज़ा गया। फिर उसी साल आए "क़यामत से क़यामत" तक के गानों ने तो इन्हें घर-घर की पहचान दे दी। उदित नारायण के साथ इनकी जुगलबंदी इतनी मशहूर हुई कि इस जोड़ी को न जाने कितनी हीं फिल्मों में दुहराया गया और हर बार नतीजा जबरदस्त हीं आया। १९९४ में "हम है राही प्यार के" के गाने "घूंघट की आड़ से दिलवर का" और १९९९ में "कुछ कुछ होता है" के टाईटल ट्रैक के लिए इन्हें "रजत कमल पुरस्कार" से सुशोभित किया गया। अगर फिल्मफ़ेयर पुरस्कारों की बात करें तो आशा ताई के साथ ये सबसे ज्यादा बार यह पुरस्कार (७ बार) पाने का रिकार्ड रखती हैं। हमने इनके बारे में इतनी जानकारी दी तो आप अब तक समझ हीं गए होंगे कि ये और कोई नहीं "अल्का याज्ञनिक" जी हैं। ये तो थी अलका जी, अब हम बात करने जा रहे हैं उस फ़नकार, उस लेखक, उस कवि, उस शायर की, जिनके बारे में खुद से कुछ कहना हमारे लिए संभव नहीं है। इसलिए आगे आप जो भी पढेंगे वे उनके हीं शब्द होंगे। हाँ, आगे बढने से पहले हम आपसे उनका परिचय तो करा हीं सकते हैं। तो आज की नज़्म की रचना की है उस शख्स ने, जिनका नाम उनके अब्बाजान "जांनिसार अख़्तर" ने "जादू" रखा था(यह नाम उन्होंने अपने हीं एक शेर के मिसरे "लंबा-लंबा किसी जादू का फसाना होगा" से लिया था) और आगे चलकर जो "जावेद अख़्तर" कहलाए...इन साहब का नाम आते हीं "आफ़रीन आफ़रीन" की आवाज़ कानों में घुलने लगती है। क्या कहते हैं आप?

अपनी पुस्तक "तरकश" में अपना परिचय वे कुछ इस तरह देते हैं: लोग जब अपने बारे में लिखते हैं तो सबसे पहले यह बताते हैं कि वो किस शहर के रहने वाले हैं–मैं किस शहर को अपना शहर कहूँ ?... पैदा होने का जुर्म ग्वालियर में किया लेकिन होश सँभाला लखनऊ में, पहली बार होश खोया अलीगढ़ में, फिर भोपाल में रहकर कुछ होशियार हुआ लेकिन बम्बई आकर काफ़ी दिनों तक होश ठिकाने रहे। जावेद साहब अपनी कहानी लखनऊ से शुरू करते हैं और कहते हैं: शहर लखनऊ... किरदार मेरे नाना-नानी, दूसरे घरवाले और मैं... मेरी उम्र आठ बरस है। बाप बम्बई में है, मां कब्र में। इस पंक्ति में अपने पिता के प्रति जावेद साहब की नाराज़गी बखूबी नज़र आ रही है। इसी क्रम में वो १८ जून १९५३ के उस दिन को याद करने लगते हैं, जिस दिन उनकी माँ की मौत हुई थी। जगह, लखनऊ, मेरे नाना का घर रोती हुई मेरी खाला, मेरे छोटे भाई सलमान को, जिसकी उम्र साढ़े छह बरस है और मुझे हाथ पकड़ के घर के उस बड़े कमरे में ले जाती हैं जहां फर्श पर बहुत-सी औरतें बैठी हैं। तख्त पर सफेद कफन में लेटी मेरी मां का चेहरा खुला है। सिरहाने बैठी मेरी बूढी नानी थकी-थकी सी हौले-हौले रो रही हैं। दो औरतें उन्हें संभाल रही हैं। मेरी खाला हम दोनों बच्चों को उस तख्त के पास ले जाती हैं और कहती है, अपनी माँ को आखिरी बार देख लो। मैं कल ही आठ बरस का हुआ था। समझदार हूं। जानता हूं मौत क्या होती है। मैं अपनी मां के चेहरे को बहुत गौर से देखता हूं कि अच्छी तरह याद हो जाए। मेरी खाला कह रही हैं इनसे वादा करो कि तुम जिंदगी में कुछ बनोगे, इनसे वादा करो कि तुम जिंदगी में कुछ करोगे। मैं कुछ कह नहीं पाता, बस देखता रहता हूं और फिर कोई औरत मेरी मां के चेहरे पर कफन ओढ़ा देती है। ऐसा तो नहीं है कि मैंने जिंदगी में कुछ किया ही नहीं है लेकिन फिर ये ख्याल आता है कि मैं जितना कर सकता हूं, उसका तो एक चौथाई भी अब तक नहीं किया और इस ख्याल को दी हुई बेचैनी जाती नहीं। अपने पिता के प्रति नाराज़गी का अफ़सोस उन्हें तब होता है, जब उनके पिता अपनी ज़िंदगी की अंतिम घड़ियाँ गिन रहे होते हैं। १८ अगस्त १९७६ को मेरे बाप की मृत्यु होती है (मरने से नौ दिन पहले उन्होंने मुझे अपनी आखिरी किताब ऑटोग्राफ करके दी थी। उस पर लिखा था 'जब हम न रहेंगे तो बहुत याद करोगे’। (उन्होंने ठीक लिखा था)। अब मेरा दिल उन बातों में ज्यादा लगता है जिनसे दुनिया की जबान में कहा जाए तो, कोई फायदा नहीं। शायरी से मेरा रिश्ता पैदाइशी और दिलचस्पी हमेशा से है। लड़कपन से जानता हूं कि चाहूँ तो शायरी कर सकता हूं मगर आज तक की नहीं है। ये मेरी नाराजगी और बगावत का एक प्रतीक है(क्योंकि मेरे पिताजी एक मक़बूल शायर थे)। १९७९ में पहली बार शेर कहता हूं और ये शेर लिखकर मैंने अपनी विरासत और अपने बाप से सुलह कर ली है।

मुंबई (तब की बंबई) में आने के बाद उनके साथ क्या-क्या हुआ, इसे याद करते हुए वे कहते हैं: ४ अक्टूबर १९६४, मैं बंबई सेंट्रल स्टेशन पर उतरा हूं। अब इस अदालत में मेरी जिंदगी का फैसला होना है। बंबई आने के छह दिन बाद बाप का घर छोड़ना पड़ता है। जेब में सत्ताईस नए पैसे हैं। मैं खुश हूं कि जिंदगी में कभी अट्ठाईस नए पैसे भी जेब में आ गए तो मैं फ़ायदे में रंगा और दुनिया घाटे में। बंबई में दो बरस होने को आए, न रहने का ठिकाना है न खाने का। यूं तो एक छोटी सी फिल्म में सौ रुपए महीने पर डायलॉग लिख चुका हूं। कभी कहीं असिस्टेंट हो जाता हूं, कभी एक आध छोटा मोटा काम मिल जाता है, अकसर वो भी नहीं मिलता। दादर एक प्रोडयूसर के ऑफिस अपने पैसे मांगने आया हूं, जिसने मुझसे अपनी पिक्चर के कॉमेडी सीन लिखवाए थे। ये सीन उस मशहूर राइटर के नाम से ही फिल्म में आएंगे जो ये फिल्म लिख रहा है। ऑफिस बंद है। एक फिल्म में डायलॉग लिखने का काम मिला है। कुछ सीन लिखकर डायरेक्टर के घर जाता हूं। वो बैठा नाश्ते में अनानास खा रहा है, सीन लेकर पढ़ता है और सारे कागज मेरे मुंह पर फेंक देता है और फिल्म से निकालते हुए मुझे बताता है कि मैं जिंदगी में कभी राइटर नहीं बन सकता। वापस बांदरा जाना है जो काफी दूर है। पैसे बस इतने हैं कि या तो बस का टिकट ले लूं या कुछ खा लूं, मगर फिर पैदल वापस जाना पड़ेगा। चने खरीदकर जेब में भरता हूं और पैदल सफर शुरू करता हूं। कोहेनूर मिल्स के गेट के सामने से गुजरते हुए सोचता हूं कि शायद सब बदल जाए लेकिन ये गेट तो रहेगा। एक दिन इसी के सामने से अपनी कार से गुजरूंगा। तपती धूप में एक सड़क पर चलते हुए मैं अपनी आंख के कोने में आया एक आंसू पोंछता हूं और सोचता हूं कि मैं एक दिन इस डायरेक्टर को दिखाऊँगा कि मैं... फिर जाने क्यों ख्याल आता है कि क्या ये डायरेक्टर नाश्ते में रोज अनानास खाता होगा? बड़ी हीं आसानी से जावेद साहब ने ग़म में भी खुशी और मस्ती का पुट डाल दिया है। यही है उनकी खासियत। चलते-चलते शबाना आज़मी और हनी इरानी से इनके रिश्ते पर भी एक नज़र डाल लेते हैं। मेरी मुलाकात शबाना से होती है। कैफी आजमी की बेटी शबाना भी शायद अपनी जड़ों की तरफ लौट रही है। उसे भी ऐसे हज़ारों सवाल सताने लगे हैं जिनके बारे में उसने पहले कभी नहीं सोचा था। कोई हैरत नहीं कि हम करीब आने लगते हैं। धीरे-धीरे मेरे अंदर बहुत कुछ बदल रहा है। १९८३ में मैं और हनी अलग हो जाते हैं। हनी से मेरी शादी जरूर टूट गई मगर तलाक भी हमारी दोस्ती का कुछ नहीं बिगाड़ सका। और अगर मां-बाप के अलग होने से रिश्तों में कोई ऐसी कड़वाहट नहीं आई तो इसमें मेरा कमाल बहुत कम और हनी की तारीफ बहुत ज्यादा है। हनी आज एक बहुत कामयाब फिल्म राइटर है और मेरी बहुत अच्छी दोस्त। मैं दुनिया में कम लोगों को इतनी इज्जत करता हूं जितनी इज्जत मेरे दिल में हनी के लिए है। जावेद साहब के बारे में हमने उन्हीं के शब्दों में बहुत कुछ जाना। इनके बारे में कहने को अभी और भी बहुत कुछ है, लेकिन वो सब फिर कभी बाद में। अभी तो उनके इस शेर का आनंद लेना ज्यादा मुनासिब लगता है:

कह गए हम किससे दिल की बात
शहर में एक सनसनी सी है...


इस शेर के बाद चलिए हम अब १९९७ में रीलिज हुए एलबम "तुम याद आए" से इस नज़्म को सुनते हैं, जिसमें जावेद साहब का वही चिरपरिचित अंदाज़ है तो अलका जी की वही मखमली आवाज़:

मोहब्बत पलकों पे कितने हसीन ख्वाब सजाती है..
फूलों-से महकते ख्वाब..
सितारों-से जगमगाते ख्वाब..
शबनम-से बरसते ख्वाब..
फिर कभी यूँ भी होता है कि
पलकों की डालियों से ख्वाबों
के सारे परिंदे उड़ जाते
हैं..और आँखें हैरान-सी रह जाती हैं

सारे सपने कहीं खो गए..
हाय हम क्या से क्या हो गए..
दिल से तन्हाई का दर्द जीता
क्या कहें हम पे क्या क्या न बीता..
तुम न आए मगर, जो गए..
हाय हम क्या से क्या हो गए॥

सारे सपने कहीं खो गए..
हाय हम क्या से क्या हो गए..

तुमने हमसे कहीं थी जो बातें..
उनको दोहराती हैं गम की रातें..
तुमसे मिलने के दिन तो गए..
हाय हम क्या से क्या हो गए..

सारे सपने कहीं खो गए..
हाय हम क्या से क्या हो गए..

कोई शिकवा न कोई गिला है..
तुमसे कब हमको ये गम मिला है...
हाँ _____ अपने ही सो गए..
हाय हम क्या से क्या हो गए..

सारे सपने कहीं खो गए..
हाय हम क्या से क्या हो गए..




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "तराने" और शेर कुछ यूं था -

लबों पे तराने अब आ ना सकेंगे,
कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है

इस शब्द की सबसे पहले शिनाख्त की "शामिख" साहब ने। आपने इस शब्द पर कुछ शेर भी कहे:

मेरे सरकश तराने सुन के दुनिया ये समझती है
कि शायद मेरे दिल को इश्क़ के नग़्मों से नफ़रत है (साहिर लुधियानवी)

एक मैं क्या अभी आयेंगे दीवाने कितने
अभी गूंजेगे मुहब्बत के तराने कितने
ज़िन्दगी तुमको सुनायेगी फ़साने कितने
क्यूं समझती हो मुझे भूल नही पाओगी (जावेद अख्तर)

गूँजे तराने सुबह के इक शोर हो गया
आलम तमाम रस में सराबोर हो गया (कैफ़ी आज़मी)

पिछली बार तो शरद जी का कोई अता-पता नहीं था, लेकिन चलिए इस बार उन्होंने निराश नहीं किया। आप अपने हीं एक स्वरचित शेर के साथ महफ़िल में तशरीफ़ लाए:

तराने हों खुशी के या हों ग़म के इतना तो तय है
उन्हें जब भी मैं सुनता हूँ सुकूं तब दिल को मिलता है।

इनके बाद महफ़िल में हाज़िरी लगी सीमा जी की। यह रही आपकी पेशकश:

अब तुमसे रुख़सत होता हूँ आओ सँभालो साजे़-गजल,
नये तराने छेडो़,मेरे नग्‍़मों को नींद आती है। (फ़िराक़ गोरखपुरी)

शुद्ध हिन्दी के शब्दों के साथ उर्दू के "तराने" का अच्छा मिश्रण किया मंजु जी ने। ये रहीं आपकी स्वरचित पंक्तियाँ:

सूर्योदय की अरुणिम बेला में ,
स्वागत में खगकुल झूम -झूम तराने गाए .

सुमित जी, शामिख साहब की बातों से मैं भी इत्तेफ़ाक़ रखता हूँ। आखिर कौन है यहाँ जिसे सारे शेर याद हैं। आपको अंतर्जाल का सहारा तो लेना हीं होगा और अगर ऐसा नहीं करना चाहते तो अपना हीं लिखा कुछ सुना दिया करें। बिना शेर की महफ़िल अधूरी-सी लगती है। आगे से ध्यान रखिएगा।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Monday, July 13, 2009

"कल नौ बजे तुम चाँद देखना..."- चाँद है आज भी प्रेम गीतों के लिए गीतकारों की प्रेरणा

ताजा सुर ताल (8)

९० के दशक के शुरुआत में एक बेहद कामियाब फिल्म आई थी "क़यामत से क़यामत तक" जिसने युवाओं को अपना दीवाना बना दिया था. इस फिल्म में नायक जब पहली बार नायिका से जुदा होता है तो कहता है कि जब भी शाम ढले तो तुम डूबते सूरज को देखना मैं भी देखूंगा और इस तरह हम एक दूजे को याद करेंगें. इस खूबसूरत से ख्याल ने बहुत से युवा प्रेमी-प्रेमिकाओं के दिल को धड्काया था उस दौर में. करीब २० साल बाद जावेद अख्तर साहब उसी संवाद में छुपे ख्याल को एक गीत रूप में लेकर हाज़िर हुए हैं आज के "ताजा सुर ताल" गीत में. आवाजें हैं गायक सोनू निगम और और गायिका अलका याग्निक की. दोनों ही फनकार प्रेम गीतों को निभाने में महारत रखते हैं, तो जाहिर है इन दो मधुर आवाजों में ढलने से गीत की शोभा और बढ़ी ही है. संगीतकार तिकडी है शंकर एहसान लॉय की.

शंकर एहसान और लॉय जब सामूहिक रूप से संगीतकार टीम बन कर नहीं आये थे और तब जब शंकर महादेवन बतौर गायक अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे थे, तभी से जावेद अख्तर का साथ उन्हें मिला, शंकर की एल्बम "ब्रेथलेस" के लिए जावेद साहब ने ही गीत लिखे, जहाँ शंकर ने एक ही सांस में पूरा गीत गाकर धूम मचा दी थी, ये हिट गीत था "कोई जो मिला तो...". इस गीत का विडियो भी जावेद साहब के साहबजादे फरहान अख्तर ने बड़े ही रचनात्मक अंदाज़ का बनाया था. बाद में फरहान जब निर्देशक बने तो उन्होंने शंकर एहसान लॉय और जावेद साहब की चौकडी को ही इस्तेमाल किया अपनी फिल्मों के लिए. इस हिट टीम (शंकर एहसान लोय और जावेद अख्तर)ने "कल हो न हो", "अरमान", "मिशन कश्मीर", "रॉक ओन्" और "लक्ष्य" जैसी फिल्मों में शानदार गीत संगीत की रचना की है. पर इधर कुछ दिनों से ("लक बाई चांस" के बाद) शंकर एहसान लॉय ने कुछ ख़ास तीर नहीं छोडे हैं अपनी संगीत कमान से. प्रस्तुत गीत भी जिस फिल्म का (शोर्ट कट) है उसमें भी इस नामी टीम ने कोई चमत्कारिक संगीत से श्रोताओं को हैरान नहीं किया है पर हाँ ये गीत अपनी मधुरता और सरल शब्दों के चलते कुछ हद तक अपनी छाप छोड़ने में कामियाब रहा है.

कल नौ बजे तुम चाँद देखना,
मैं भी देखूंगा,
और यूं दोनों की निगाहें,
चाँद पर मिल जायेंगीं...

कल नौ बजे तुम चाँद देखना,
मैं भी देखूंगी,
और यूं दोनों की निगाहें,
चाँद पर मिल जायेंगीं...

कौन कह सकता है कल मैं हूँ कहाँ,
और तुम हो कहाँ..
चाँद लेकिन युहीं निकलेगा,
यहाँ और वहां...
चाँद इस चेहरे को आइना दिखा ही देगा...
चाहती हूँ मैं तुम्हें चाँद गवाही देगा...
कल नौ बजे....

तुम मेरे साथ हो तो,
राहें सभी रोशन है,
तुम न होगे तो अँधेरा यहाँ छा जायेगा...
तुम न घबराना कि फिर चाँद यहाँ निकल आएगा,

कल नौ बजे...




आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को ३ की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं. फिल्म "अरमान" में एक दर्द भरा गीत था इसी टीम का रचा जिसमें जिंदगी से कुछ सवाल पूछे गए थे. क्या याद है आपको वो गीत ? और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

Thursday, November 13, 2008

क्या फिर लौटेगा "आशिकी" का दौर


वो १९७२ में मिले थे एक दूजे से। १९८१ में आई फ़िल्म "मैंने जीना सीख लिया" से इस संगीतकार जोड़ी ने कदम रखा फ़िल्म जगत में। "हिसाब खून का", "लश्कर", और "इलाका" जैसी फिल्मों में इनका काम किसी की भी नज़र में नहीं आया, फिर इन्हें मिला संगीत की दुनिया में नई मिसाल बनाने की योजनायें लेकर दिल्ली से मुंबई पहुंचे गुलशन कुमार का साथ। १९९० में आई महेश भट्ट निर्देशित फ़िल्म "आशिकी" ने संगीत की दुनिया को हिला कर रख दिया, और उभर कर आए - नदीम-श्रवण। एक ऐसा दौर जब फ़िल्म संगीत अश्लील शब्दों और भौंडे संगीत की गर्त में जा रहा था, एक साथ कई नए कलकारों ने आकर जैसे संगीत का सुनहरा दौर वापस लौटा दिया। शुरूआत हुई आनंद मिलिंद के संगीत से सजी फ़िल्म "क़यामत से क़यामत तक" से और इसी के साथ वापसी हुई रोमांस के सुनहरे दौर की भी। फ़िल्म "आशिकी" भी इसी कड़ी का एक हिस्सा थी, कमाल की बात यह थी कि इस फ़िल्म के सभी गीत एक से बढ़कर एक थे और बेहद मशहूर हुए। इसके बाद नदीम-श्रवण ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक सुपर हिट संगीत से सजी फिल्में -दिल है कि मानता नहीं, साजन, सड़क, फूल और कांटे, दीवाना....और सूची लम्बी होती चली गई। नदीम-श्रवण के साथ साथ गीतकार समीर, गायक कुमार सानू, अलका याग्निक, और साधना सरगम ने भी कमियाबी का स्वाद चखा। लगातार तीन सालों तक वो फ़िल्म फेयर सम्मान के सरताज रहे, १९९६ में "राजा हिन्दुस्तानी" और १९९७ में आई "परदेश" जैसी फिल्मों से उन्होंने अपना एक नया अंदाज़ दुनिया के सामने रखा.

गुलशन कुमार की निर्मम हत्या और नदीम पर लगे आरोपों ने संगीत के इस सुहावने सफर में एक ग्रहण का काम किया। लंबे समय तक इस जोड़ी ने फिल्मों से ख़ुद को दूर रखा, २००५ में लन्दन से फ़ोन कर नदीम ने श्रवण से कहा कि "मैं कुछ समय तक अपने परफ्यूम के काम पर ध्यान देना चाहता हूँ..." इसी के साथ लगा कि यह जोड़ी अब टूट गई। श्रवण की सुनें तो उन्होंने स्वीकार किया कि-"नदीम की इस बात से वो आहत ज़रूर हुए, शुरू में नहीं समझ पाये कि आखिर वो ऐसा क्यों कर रहे हैं, पर अब सोचता हूँ कि यह अन्तराल हम दोनों के लिए ज़रूरी सा था"।

एक समय आया जब यह जोड़ी संगीत-प्रेमियों की नज़र से ओझल हो गई। लेकिन कलाकार काम किये बिने चैन नहीं पाता। श्रवण ने अकेले ही 'सिर्फ़ तुम' में संगीत दिया और बहुत हिट हुए। लेकिन संगीत प्रेमियों को संगीत को वह सुंगंध और ताजगी एकाकी संगीत में नहीं मिली। न्यायिक कारणों ने सिर्फ तुम के एल्बम पर संगीतकार का नाम तक नहीं लिखा गया।

इस जोड़ी ने 'राज़' से दुबारा वापसी की, या यूँ कहिए कि दमदार वापिसी की। वैसे धड़कन फिल्म के संगीत ने ही इस जोड़ी ने लौटने का संकेत दे ही दिया था, लेकिन इनकी संगीत का असली फ्लैवर राज़ में दिखा। इसके बाद कसूर का संगीत हिट हुआ। संगीत प्रेमियों के लिए अब ये खुशी की बात है कि अब ये जोड़ी एक बार फ़िर साथ में काम करेगी, और वो भी फूरे जोर-शोर के साथ। डेविड धवन की "डू नोट डिसटर्ब" और धर्मेश दर्शन की "बावरा" है उनकी आने वाली फिल्में। हो सकता है फ़िर कुछ ऐसे नगमें सुनने को मिलें जो बरसों तक यादों में बसे रहें।
आइए सुनते हैं इसी जोड़ी द्वारा संगीतबद्ध कुछ एवरग्रीन गीत


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