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Sunday, November 4, 2018

राग जयजयवन्ती : SWARGOSHTHI – 392 : RAG JAYJAYVANTI






स्वरगोष्ठी – 392 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 7 : राग जयजयवन्ती

लता मंगेशकर से फिल्म का एक गीत और पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष से राग जयजयवन्ती सुनिए




ज्ञानप्रकाश घोष
लता मंगेशकर
"रेडियो प्लेबैक इण्डिया" के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की सातवीं कड़ी में आज हमने राग जयजयवन्ती चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम विश्वविख्यात गायिका लता मंगेशकर के स्वर में 1955 में प्रदर्शित फिल्म “सीमा” से राग जयजयवन्ती पर आधारित एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष के स्वर में राग जयजयवन्ती की एक बन्दिश भी प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग जयजयवन्ती का सम्बन्ध खमाज थाट से माना जाता है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। इसका गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर के उत्तरार्द्ध में किए जाने की परम्परा है। राग जयजयवन्ती को परमेल-प्रवेशक राग कहा जाता है। इसका कारण यह है कि यह रात्रि के दूसरे प्रहर के अन्तिम समय में गाया-बजाया जाता है। इस राग के बाद काफी थाट के रागों का समय प्रारम्भ हो जाता है। राग जयजयवन्ती में खमाज और काफी दोनों थाट के स्वर लगते हैं। शुद्ध गान्धार खमाज थाट का और कोमल गान्धार काफी थाट का सूचक है। कोमल गान्धार स्वर का अल्प प्रयोग केवल अवरोह में दो ऋषभ स्वरों के बीच किया जाता है। रात्रि के दूसरे प्रहर के रागों में राग जयजयवन्ती के अलावा कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- राग नीलाम्बरी, खमाज, आसा, खम्भावती, गोरख कल्याण, जलधर केदार, मलुहा केदार, श्याम केदार, झिंझोटी, तिलक कामोद, तिलंग, दुर्गा, देस, नट, नारायणी, नन्द, रागेश्री, शंकरा, सोरठ, हेम कल्याण आदि। राग जयजयवन्ती के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आइए सुनते हैं, इस राग की मोहक बन्दिश। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष।

राग जयजयवन्ती : “मेरो मन मोहन सों अटक्यो...” : पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष


जयजयवन्ती राग, खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इसमें भी दोनों गान्धार और दोनों निषाद स्वर का प्रयोग किया जाता है। यह सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। राग जयजयवन्ती का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर के अन्तिम भाग में किया जाता है। आरोह में पंचम के साथ शुद्ध निषाद और धैवत के साथ कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। अवरोह में हमेशा कोमल निषाद का प्रयोग होता है। इस राग की प्रकृति गम्भीर है और चलन तीनों सप्तकों में समान रूप से होती है। इस राग में ध्रुवपद, धमार, खयाल, तराना आदि गाये जाते है। इसमें ठुमरी नहीं गायी जाती। यह राग दो अंगों, देस और बागेश्री, में प्रयोग होता है। देस अंग की जयजयवन्ती, जिसमें कभी-कभी बागेश्री अंग भी दिखाया जाता है, प्रचार में अधिक है। लीजिए, अब आप सुनिए, राग जयजयवन्ती के स्वरों में पिरोया मनमोहक फिल्मी गीत। इसे हमने 1955 में बनी फिल्म ‘सीमा’ से लिया है। सुविख्यात पार्श्वगायिका लता मंगेशकर ने इसे गाया है। यह गीत एकताल में निबद्ध है। गीत के संगीतकार शंकर जयकिशन हैं। आप भी यह गीत सुनिए और आज के इस अंक को यहीं विराम देने की हमें अनुमति दीजिए।

राग जयजयवन्ती : “मनमोहना बड़े झूठे...” : लता मंगेशकर : फिल्म सीमा



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 392वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1975 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 10 नवम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 394वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 390वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म “मुगल-ए-आजम” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – केदार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की सातवीं कड़ी में आपने राग जयजयवन्ती का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष से एक बन्दिश का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग में पिरोया संगीतकार शंकर जयकिशन द्वारा संगीतबद्ध फिल्म “सीमा” का एक गीत लता मंगेशकर से सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग जयजयवन्ती : SWARGOSHTHI – 392 : RAG JAYJAYVANTI : 4 नवम्बर, 2018

Sunday, December 31, 2017

ठुमरी तिलंग : SWARGOSHTHI – 350 : THUMARI TILANG




स्वरगोष्ठी – 350 में आज

फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व – 7 : समापन कड़ी में तिलंग की ठुमरी

पाश्चात्य संगीत के भराव के साथ ठुमरी - "सजन संग काहे नेहा लगाए..."




लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की इस सातवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला में हमने आपके लिए फिल्मों में पारम्परिक ठुमरी के साथ-साथ उसके फिल्मी प्रयोग को भी रेखांकित किया था। इस श्रृंखला में भी हमने आपसे केवल फिल्मी ठुमरियों पर ही चर्चा की है, किन्तु ये ठुमरियाँ पारम्परिक रही हों, यह आवश्यक नहीं हैं। इन ठुमरी गीतों को फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकारों ने लिखा है और संगीतकारों ने इन्हें विभिन्न रागों में बाँध कर ठुमरी गायकी के तत्वों से अभिसिंचित किया है। हमारी इस श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल किये गए ऐसे गीत हैं जिनमे राग, भाव और रस की दृष्टि से उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी के तत्वों का उपयोग हुआ है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में अनेकानेक ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे पाँचवें और छठे दशक की ऐसी ही कुछ गैर-पारम्परिक चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात कर रहे हैं। आज हम आपके लिए जो ठुमरी गीत प्रस्तुत करने जा रहें हैं, वह एक पारम्परिक ठुमरी को आधार बना कर रची गई है। आज की ठुमरी में हारमोनियम की ही नहीं बल्कि अन्य कई पाश्चात्य वाद्यों की भी संगति की गई है। राज कपूर, माला सिन्हा, मुबारक और लीला चिटनिस द्वारा अभिनीत फिल्म "मैं नशे में हूँ" के एक प्रसंग में संगीतकार शंकर जयकिशन ने ठुमरी अंग में इस गीत का संगीत संयोजन किया है। लता मंगेशकर के गाये इस ठुमरी गीत का मुखड़ा तो एक पारम्परिक ठुमरी -"सजन संग काहे नेहा लगाए..." का है लेकिन दोनों अन्तरे गीतकार हसरत जयपुरी ने फिल्म के नायक के चरित्र के अनुकूल, परम्परागत ठुमरी की शब्दावली में रचे हैं।


ध्यकाल में ठुमरी तवायफ़ों के कोठों सहित रईसों और जमींदारों की छोटी-छोटी महफ़िलों में फलती-फूलती रही। इस समय तक ठुमरी गायन की तीन प्रकार की उप-शैलियाँ विकसित हो चुकी थी। नृत्य के साथ गायी जाने वाली ठुमरियों में लय और ताल का विशेष महत्त्व होने के कारण ऐसी ठुमरियों को "बन्दिश" या "बोल-बाँट" की ठुमरी कहा जाने लगा। इस प्रकार की ठुमरियाँ छोटे ख़याल से मिलती-जुलती होती हैं, जिसमे शब्द का महत्त्व बढ़ जाता है। ऐसी ठुमरियों को सुनते समय ऐसा लगता है, मानो तराने पर बोल रख दिए गए हों। ठुमरी का दूसरा प्रकार जो विकसित हुआ उसे "बोल-बनाव" की ठुमरी का नाम मिला। ऐसी ठुमरियों में शब्द कम और स्वरों का प्रसार अधिक होता है। गायक या गायिका कुछ शब्दों को चुन कर उसे अलग-अलग अन्दाज़ में प्रस्तुत करते हैं। धीमी लय से आरम्भ होने वाली इस प्रकार की ठुमरी का समापन द्रुत लय में कहरवा की लग्गी से किया जाता है। ठुमरी के यह दोनों प्रकार "पूरब अंग" की ठुमरी कहे जाते हैं। एक अन्य प्रकार की ठुमरी भी प्रचलन में आई, जिसे "पंजाब अंग" की ठुमरी कहा गया। ऐसी ठुमरियों को प्रचलित करने का श्रेय बड़े गुलाम अली खाँ, उनके भाई बरकत अली खाँ और नजाकत-सलामत अली खाँ को दिया जाता है। ऐसी ठुमरियों में "टप्पा" जैसी छोटी- छोटी तानों का काम अधिक होता है।

ठुमरी के साथ हमोनियम की संगति बीसवीं शताब्दी के आरम्भ से ही शुरू हो गई थी। पिछली कड़ियों में हमने हारमोनियम पर ठुमरी बजाने में दक्ष कलाकार भैया गणपत राव की चर्चा की थी। आज की कड़ी में हम उस समय के कुछ और हारमोनियम वादकों की चर्चा करेंगे। बनारस के लक्ष्मणदास मुनीम (मुनीम जी), इस पाश्चात्य वाद्य पर गत और तोड़े बेजोड़ बजाते थे। राजा नवाब अली भी हारमोनियम पर रागों कि व्याख्या कुशलता से करते थे। इलाहाबाद के नीलू बाबू भी बहुत अच्छा हारमोनियम बजाते थे। ठुमरी और हारमोनियम का चोली-दामन का साथ रहा है।

आज जो ठुमरी हम आपको सुनवाने जा रहे हैं उसमें हारमोनियम की ही नहीं बल्कि अन्य कई पाश्चात्य वाद्यों की भी संगति की गई है। राज कपूर, माला सिन्हा, मुबारक और लीला चिटनिस द्वारा अभिनीत फिल्म "मैं नशे में हूँ" के एक प्रसंग में संगीतकार शंकर जयकिशन ने ठुमरी अंग में इस गीत का संगीत संयोजन किया है। लता मंगेशकर के गाये इस ठुमरी गीत का मुखड़ा तो एक पारम्परिक ठुमरी -"सजन संग काहे नेहा लगाए..." का है लेकिन दोनों अन्तरे गीतकार हसरत जयपुरी ने फिल्म के नायक के चरित्र के अनुकूल, परम्परागत ठुमरी की शब्दावली में रचे हैं। फिल्म के कथानक और प्रसंग के अनुसार इस ठुमरी के माध्यम से नायक (राज कपूर) और नायिका (माला सिन्हा) के परस्पर विरोधी सोच को दिखाना था। इसीलिए दोनों अन्तरों से पहले तेज लय में पाश्चात्य संगीत के दो अंश डाले गए हैं। शेष पूरा गीत ठहराव लिये हुए बोल- बनाव की ठुमरी की शक्ल में है। गीत में भारतीय और पाश्चात्य संगीत के समानान्तर प्रयोग से दर्शकों और श्रोताओं को बेहतर संगीत चुनने का अवसर देना भी प्रतीत होता है। स्वर-साधिका लता मंगेशकर ने उलाहना भाव से भरी इस ठुमरी में करुण रस का स्पर्श देकर गीत को अविस्मरणीय बना दिया है। राग तिलंग में निबद्ध होने से ठुमरी का भाव और अधिक मुखरित हुआ है। वर्ष 2017 को विदायी देते हुए आइए, सुनते हैं, रस से भरी यह ठुमरी।

ठुमरी तिलंग : "सजन संग काहे नेहा लगाए..." : लता मंगेशकर : फिल्म – मैं नशे में हूँ




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के अगले दो अंक 351 और 352, संगीत पहेली के महाविजेताओं की प्रस्तुतियों पर केन्द्रित होगा, अतः आज के अंक और अगले अंक में हम आपसे पहेली का कोई प्रश्न नहीं पूछ रहे हैं। 352वें अंक से पहेली का क्रम पूर्ववत जारी रहेगा। अगले दो अंको में आप पहेली के महाविजेताओं की प्रस्तुतियों की रसानुभूति कीजिए।

इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 348वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1959 में प्रदर्शित फिल्म “धूल का फूल” से एक ठुमरी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग काफी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल और कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – सुधा मल्होत्रा

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में मुम्बई, महाराष्ट्र की शुभा खाण्डेकर ने पहली बार भाग लिया है और तीनों प्रश्नो के सही उत्तर दिये हैं। हम शुभा जी का हार्दिक स्वागत करते हैं और आशा करते हैं कि अपने संगीत-ज्ञान से भविष्य में भी श्रोताओं को लाभान्वित कराती रहेंगी। पहेली के प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर अब तक जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मी गीतों में ठुमरी के तत्व” की यह समापन कड़ी थी। इस कड़ी में आपने 1959 में प्रदर्शित फिल्म “मैं नशे में हूँ” के ठुमरी गीत का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हमने आपसे कुछ ऐसे फिल्मी गीतों पर चर्चा की है जिसमें आपको ठुमरी शैली के दर्शन हुए होंगे। आज आपने जो गीत सुना, वह राग तिलंग पर आधारित है। “स्वरगोष्ठी” की आगामी श्रृंखलाओं में भी हम शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा जारी रखेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले दो अंकों में हम संगीत पहेली के विजेताओं से आपका परिचय कराएँगे और उनकी प्रस्तुतियों से आपका रसास्वादन भी कराएँगे। अगले रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Monday, November 6, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 13 || जयकिशन

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 13
Jaikishan


फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के तेरहवें एपिसोड में सुनिए कहानी सुरों के बाज़ीगर जयकिशन की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -

Saturday, October 15, 2016

"जाने कहाँ गए वो दिन...", कौन कौन से थे इस गीत के वो तीन अन्तरे जो जारी नहीं हुए?



एक गीत सौ कहानियाँ - 95
'जाने कहाँ गए वो दिन ...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 95-वीं कड़ी में आज जानिए 1970 की फ़िल्म ’मेरा नाम जोकर’ के मशहूर गीत "जाने कहाँ गए वो दिन..." के बारे में जिसे मुकेश ने गाया था। बोल हसरत जयपुरी के और संगीत शंकर-जयकिशन का।

मुकेश, दत्ताराम, हसरत
फ़िल्म ’मेरा नाम जोकर’ के तमाम गीतों में से जो दिल सबसे ज़्यादा दिल को छू लेता है, वह गीत है "जाने कहाँ गए वो दिन, कहते थे तेरी राह में नज़रों को हम बिछायेंगे..."। इस गीत में हमें भले दो अन्तरे सुनाई पड़ते हैं, पर असल में इस गीत के लिए तीन नहीं चार नहीं पूरे के पूरे पाँच अन्तरे लिखे गए थे। जो हमें सुनाई देते हैं, वो दो अन्तरे ये रहे...

मेरे क़दम जहाँ पड़े सजदे किए थे यार ने,
मुझको रुला रुला दिया जाती हुई बहार ने।

अपनी नज़र में आजकल दिन भी अन्धेरी रात है,
साया ही अपने साथ था, साया ही अपने साथ है।


लेकिन जब इस गीत को रेकॉर्ड किया गया तब दो नहीं पूरे पाँच अन्तरों के साथ रेकॉर्ड किया गया था। बाद में, फ़िल्म की लम्बाई बहुत ज़्यादा हो रही थी, इसलिए तीन अन्तरे हटा दिए गए। गीत लिखा था हसरत जयपुरी ने और उन्होंने सिचुएशन के हिसाब केवल दो ही अन्तरे लिखे क्योंकि फ़िल्म में इस गाने के बाद सर्कस के कलाकार स्टेज पर एन्ट्री करते हैं और दूसरा गाना "जीना यहाँ मरना यहाँ" शुरु हो जाता है। म्युज़िक सिटिंग् में हसरत साहब ने जब यह गाना सुनाया तो वहाँ मुकेश जी भी मौजूद थे। मुकेश जी बोले, गीत तो बहुत अच्छा है मगर बहुत छोटा लग रहा है। इसे थोड़ा लम्बा होना चाहिए। उस वक़्त सभी को लगा कि मुकेश जी ठीक कह रहे हैं। सब ने कहा हसरत साहब से कि कुछ और अन्तरे लिख दीजिए। ये तीन अन्तरे लिखे गए... 

इस दिल के आशियाने में उनके ख़याल रह गए,
तोड़ के वो दिल चल दिए हम फिर अकेले रह गए।

मेरे निगाह-ए-शोख़ में आँसुओं के मेले रह गए,
आँसू भी मेरे कह रहे साथी तेरे किधर गए।

हमने तो अपना जानकर उनको गले लगाया था,
पत्थर को हमने पूज कर अपना ख़ुदा बनाया था।


ये तीन अन्तरे लिखे और रेकॉर्ड किए गए, पर फ़िल्म में नहीं लिए गए। मगर मुकेश जी जब भी भारत में या विदेश में शो करते थे, तो इन एक्स्ट्रा तीन अन्तरों के साथ ही पूरा गाना गाया करते थे। उन्हीं के कहने पर हसरत साहब ने ये अन्तरे लिखे थे, इसलिए उन्होंने कभी भी इन अन्तरों को अपने आप से अलग नहीं किया। भले ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर ये अन्तरे नहीं आए, पर हसरत साहब की मेहनत को मुकेश ने कभी नहीं भुलाया। मुकेश जी के जाने के बाद नितिन मुकेश ने भी यह गाना पाँच अन्तरों के साथ ही पर्फ़ॉर्म करना शुरु किया। 1983 में जब हसरत जयपुरी साहब विविध भारती पर जयमाला प्रस्तुत करने के लिए तशरीफ़ लाए थे, तब इस गीत को बजाने से पहले उन्होंने ये कहा था - "हाँ फ़ौजी भाइयों, फिर होशियार, अबके दिल थाम लीजिए, फिर वही एक शेर पहले अर्ज़ करूंगा। अर्ज़ किया है, आइना क्यों ना दूँ कि तमाशा कहें जिसे, ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझसा कहें जिसे। "तुझसा कहें जिसे" मैंने क्यों कहा, आप ख़ुद सुन लीजिए!"

राज कपूर, हसरत, शंकर-जयकिशन, शैलेन्द्र - जाने कहाँ गए वो दिन
60 के दशक के अन्त तक आते-आते राज कपूर की टीम जैसे टूटने लग गई थी। शैलेन्द्र और शंकर जयकिशन चल बसे। ऐसे में ’मेरा नाम जोकर’ में यह गीत जैसे पुकार पुकार कर इस टीम के दिल की बात बयाँ कर रही हो। तभी तो जब शंकर जी विविध भारती पर जयमाला प्रस्तुत करने आए थे, तब उन्होंने न केवल इस गीत को बजाया, बल्कि भूमिका भी बड़े मार्मिक रूप में दी। आप भी पढ़िए - "आज जब आपको अपनी पसन्द के गाने सुनाने का मौक़ा मिला है तो एक अजीब कश्मकश में फँस गया हूँ। पिछले 25-30 सालों में इस शंकर-जयकोशन ने आपकी सेवा में इतनी सारी धुनें तैयार की हैं कि उनमें से कुछ गीतों को चुनने बैठा हूँ तो उलझ कर रह गया हूँ। किसे भूल जाऊँ, किसे याद रखूँ! सामने रेकॉर्ड्स का ढेर लगा है, हर गाने के साथ मीठी यादों के सपने सजे हैं। आँखों के सामने मानो बीती हुए दिन यूं उभर रहे हैं जैसे कोई फ़िल्म चल रही हो! पहला दृश्य उभरता है जब मैं, जयकिशन, शैलेन्द्र, हसरत, मुकेश और राज कपूर आर.के. स्टुडिओज़ में बैठे हुए हैं और हो रही है गीतों की बरसात। ’बरसात’ के बाद ’आवारा’, ’आह’, ’बूट पालिश’, ’संगम’, ’कल आज और कल’, ’जिस देश में गंगा बहती है’ और ’मेरा नाम जोकर’। और तभी जैसे फ़िल्म टूट जाती है, रोशनी हुई तो देखा कि शैलेन्द्र नहीं है, जयकिशन भी बहुत दूर जा चुका है, और जो रह गए हैं वो भी बेगाने से लगते हैं। हर एक आह पर सोचने पे मजबूर हो जाता हूँ कि "जाने कहाँ गए वो दिन"! जाने वाले कभी नहीं आते, आती हैं तो बस उनकी यादें। जयकिशन मेरा केवल पार्टनर ही नहीं बल्कि वो मेरा भाई, मेरा हमदम था। एक दूसरे के बिना हम अधूरे थे। इसलिए आज भी मैंने जय को अपने से अलग नहीं किया। आज भी डिवान पर दो हारमोनियम रखे हुए हैं। जब पुराने साथी बेगाने से लगते हैं, तब ऐसा लगता है कि जैसे जय कह रहा हो कि शंकर भाई, हिम्मत हारने से काम नहीं चलेगा, तुम हँसते रहो और आगे बढ़ते रहो!"



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आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, January 16, 2016

"हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं....", क्या परेशानी थी मनोज कुमार को इस गीत से?


एक गीत सौ कहानियाँ - 74
 

'हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 74-वीं कड़ी में आज जानिए 1965 की फ़िल्म ’गुमनाम’ के मशहूर गीत "हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं..." के बारे में जिसे मोहम्मद रफ़ी ने गाया था। बोल हसरत जयपुरी के और संगीत शंकर-जयकिशन का।

महमूद व मनोज कुमार
बात उस वक़्त की है जब महमूद इतना बड़ा नाम हो गया था कि हिन्दी सिनेमा के बड़े-बड़े स्टार महमूद के साथ काम करने से कतराने लगे थे। कहते थे कि अगर इनके साथ हमारा सीन होगा तो ये खा जाएगा हमें! इसलिए बहुत से स्टार्स तो महमूद को अपनी फ़िल्म से निकलवाने या उनके सीन कम करने के लिए निर्माता, निर्देशक और वित्तदाताओं पर दबाव भी डाल दिया करते थे। 1965 की सुपरहिट फ़िल्म ’गुमनाम’ में भी यही हुआ। राजा नवाथे द्वारा निर्देशित और एन.एन. सिप्पी द्वारा निर्मित फ़िल्म ’गुमनाम’ के शुरुआती मसौदे में महमूद वाला किरदार था ही नहीं। वह तो वित्तदाताओं की ज़िद थी कि फ़िल्म की सफलता के लिए इसमें महमूद का होना ज़रूरी है, इसलिए उनके लिए भी रोल निकाला जाए! नहीं है तो लिखो, ऐसा हुकुम था। मनोज कुमार और प्राण इस फ़िल्म के लिए फ़ाइनल हो चुके थे। दोनों ने ही फ़िल्म में महमूद को लिए जाने का विरोध किया, लेकिन वित्तदाताओं और एन.एन. सिप्पी की ज़िद के सामने उनकी चली नहीं। और फ़िल्म में महमूद के लिए रोल लिखवाया गया। फ़िल्म की शूटिंग् शुरू हुई और महमूद पर एक गाना भी फ़िल्माया गया, "हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं..."। गाना फ़िल्माये जाने के बाद जब देखा गया तो मनोज कुमार ने फिर एक बार एन.एन. सिप्पी से कहा कि यह गाना हटा दो, यह गाना बड़ा घटिया है, इससे फ़िल्म का स्तर गिर रहा है। एन.एन. सिप्पी जब नहीं माने तो मनोज कुमार ने अपनी बात को सिद्ध करने के लिए मशहूर निर्देशक और अपने करीबी दोस्त राज खोसला के लिए फ़िल्म का एक स्पेशल शो रखवाया। इसे देख कर राज खोसला ने भी महमूद के गाने को फ़िल्म से हटाने का सुझाव दिया। लेकिन फिर भी एन. एन. सिप्पी नहीं माने। अब सिप्पी साहब के इस रवैये के बाद मनोज कुमार ने तो यहाँ तक कह दिया कि अगर महमूद का यह गाना रहा तो यह फ़िल्म तीन हफ़्ते भी नहीं चल पाएगी। 1965 में जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई तो इसने कामयाबी के कई रेकॉर्ड तोड़ दिए। पूरी फ़िल्म के दौरान जिस महमूद से प्रॉबलेम थी, उसी महमूद को साल के फ़िल्मफ़ेयर में Best Supporting Actor  के लिए नामांकित किया गया, और उन पर फ़िल्माया गीत "हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं", इस गीत ने तो धूम मचा दी। यह गीत महमूद के साथ-साथ इस फ़िल्म की पहचान भी बन गया।


हरिन्द्रनाथ और रफ़ी
इस गीत में महमूद का जितना योगदान था, उतना ही बड़ा योगदान मोहम्मद रफ़ी साहब के गायकी की भी थी। महमूद के अंदाज़ को ध्यान में रखते हुए रफ़ी साहब ने इस गीत जिस तरह का अंजाम दिया इसमें कोई शक़ नहीं कि इस गीत की सफलता के लिए महमूद का जितना श्रेय है, उतना ही श्रेय रफ़ी साहब को भी जाता है। साथ ही श्रेय गीतकार हसरत जयपुरी और संगीतकार शंकर-जयकिशन को भी तो जाता ही है। इस गीत की लोकप्रियता का आलम यह था कि इस फ़िल्म के रिलीज़ होने के चार साल बाद 1969 में इस गीत का एक अंग्रेज़ी संस्करण बनाया गया जिसे रफ़ी साहब की ही आवाज़ में रेकॉर्ड किया गया और HMV ने 45 RPM का ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड जारी किया, जिसकी रेकॉर्ड संख्या है N79866 और रेकॉर्ड का शीर्षक है ’The She I Love'। इस अंग्रेज़ी संस्करण को लिखा था हरिन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने और संगीत एक बार फिर शंकर जयकिशन का ही था। ये हरिन्द्रनाथ च्ट्टोपाध्याय वो ही हैं जिन्होंने समय-समय पर हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय के साथ-साथ कुछ अंग्रेज़ी गीत भी लिखे हैं। फ़िल्म ’जुली’ का प्रीति सागर का गाया "My heart is beating" भी उन्हीं का लिखा गीत है। अशोक कुमार अभिनीत यादगार फ़िल्म ’आशिर्वाद’ का हिट गीत "रेल गाड़ी" भी उन्हीं की रचना है। फ़िल्म ’बावर्ची’ में पिताजी की भूमिका में हरिन्द्रनाथ जी ने "भोर आई गया अन्धियारा" गीत में थोड़ा अंश गाया भी है। रफ़ी के साहब के विदेशी स्टेज शोज़ के लिए अक्सर वो उन्हें अंग्रेज़ी में गीत लिख कर दिया करते थे उनके हिन्दी गीतों की धुनों पर जिन्हें सुन कर विदेशी ऑडिएन्स ख़ुशी से झूम उठा करते। ख़ैर, हम बात कर रहे थे "हम काले हैं..." के अंग्रेज़ी संस्करण की। तो ये रहे इस संस्करण के बोल -

The she I love is a beautiful beautiful dream come true,
I love her, love her, love her, love her, so will you.
The she I love is a beautiful beautiful dream come true.

Because she thinks its pleases me,
Like a cat a rat she seizes me,
She tickles me, she teases me,
She warms me up, she freezes me.
I love her, love her, love her, love her, what shall I do?
The she I love is a beautiful beautiful dream come true.

O she is a flower lovely and rare,
Her beautiful body seems to bear,
The magical mood of morning air,
And black as night is her raven hair,
I love her, love her, love her, love her, my love is true,
The she I love is a beautiful beautiful dream come true. 


फिल्म 'गुमनाम' के इस गीत और इसी गीत की धुन पर बने अँग्रेजी गाने के वीडियो अब आप देखिए और सुनिए। पहले गीत का अँग्रेजी संस्करण और फिर फिल्म 'गुमनाम' के मूल गीत का वीडियो देखिए। 



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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, September 27, 2015

रात्रिकालीन राग : SWARGOSHTHI – 237 : RAGAS OF NIGHT





स्वरसाधिका लता मंगेशकर को उनके जन्मदिवस पर हार्दिक मंगलकामना 


स्वरगोष्ठी – 237 में आज

रागों का समय प्रबन्धन – 6 : रात के दूसरे प्रहर के राग

लता जी के दिव्य स्वर में जयजयवन्ती 
‘मनमोहना बड़े झूठे...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे छठें प्रहर अर्थात रात्रि के दूसरे प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के एक दक्षिण भारतीय राग नीलाम्बरी की एक कृति सुविख्यात संगीतज्ञ डॉ. एम. बालमुरली कृष्ण के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘सीमा’ से इसी प्रहर के राग जयजयवन्ती पर आधारित एक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में उनके जन्मदिन पर प्रस्तुत कर रहे हैं।

 

डॉ. एम.बालमुरली कृष्ण
तेरहवीं शताब्दी में सुप्रसिद्ध शास्त्रकार शारंगदेव ने अपने चर्चित ग्रन्थ ‘संगीत रत्नाकर’ में प्रत्येक वर्ग के रागों के गायन-वादन का समय निर्धारित किया था। आज हम आपसे ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जो रात्रि के दूसरे प्रहर में प्रयोग किये जाते हैं। इस प्रहर की अवधि रात्रि 9 बजे से लेकर मध्यरात्रि 12 बजे तक होती है। अब तक हमने अधवदर्शक स्वर, वादी-संवादी स्वर और पूर्वार्द्ध-उत्तरार्द्ध के स्वर के आधार पर रागों के समय निर्धारण की प्रक्रिया पर चर्चा की है। कुछ रागों का समय निर्धारण शुद्ध ऋषभ-धैवत और शुद्ध ऋषभ-गान्धार स्वरों के आधार पर किया जाता है। आज हम आपसे रात्रि के दूसरे प्रहर के जिन दो रागों पर चर्चा कर रहे हैं, उनमें दोनों गान्धार और दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। पहले आपको राग नीलाम्बरी सुनवाते हैं। यह मूलतः दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति का राग है, जिसे उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर ने प्रचलित किया था। इस राग में दोनों गान्धार और दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। आरोह में षडज के साथ कभी-कभी शुद्ध निषाद लगाया जाता है। इसी कारण राग नीलाम्बरी को काफी थाट वर्ग में रखा जाता है। आरोह में गान्धार और निषाद वर्जित होता है और अवरोह में सभी स्वर प्रयोग होते हैं। इसी कारण इस राग की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। आरोह में राग सिन्दूरा की छाया आने की सम्भावना रहती है, किन्तु अवरोह में दोनों गान्धार के प्रयोग से यह राग सिन्दूरा से अलग हो जाता है। इसी प्रकार धैवत, कोमल निषाद, कोमल गान्धार और ऋषभ की स्वर संगति के कारण राग जयजयवन्ती के आभास की सम्भावना रहती है, किन्तु कोमल गान्धार के बहुतायत से यह राग जयजयवन्ती से अलग हो जाता है। चूँकि यह दक्षिण भारतीय राग है, इसलिए आपको सुनवाने के लिए हमने इस संगीत पद्धति के प्रमुख संगीतज्ञ डॉ. एम. बालमुरली कृष्ण का गाया और स्वरबद्ध किया कृष्ण-भक्ति से परिपूर्ण राग नीलाम्बरी सुनवाते हैं।


राग नीलाम्बरी : “बंगारु मुरली श्रृंगार रमणी...” : डॉ. एम. बालमुरली कृष्ण



लता मंगेशकर 
रात्रि के दूसरे प्रहर के रागों में राग नीलाम्बरी के अलावा कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- खमाज, आसा, खम्भावती, गोरख कल्याण, जलधर केदार, मलुहा केदार, श्याम केदार, झिंझोटी, तिलक कामोद, तिलंग, दुर्गा, देस, नट, नारायणी, नन्द, रागेश्री, शंकरा, सोरठ, हेम कल्याण, जयजयवन्ती आदि। अब हम राग जयजयवन्ती पर थोड़ी चर्चा करते हैं। यह राग खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इसमें भी दोनों गान्धार और दोनों निषाद प्रयोग किया जाता है। यह सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। राग जयजयवन्ती का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर के अन्तिम भाग में किया जाता है। आरोह में पंचम के साथ शुद्ध निषाद और धैवत के साथ कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। अवरोह में हमेशा कोमल निषाद का प्रयोग होता है। इस राग की प्रकृति गम्भीर है और चलन तीनों सप्तकों में समान रूप से होती है। इस राग में ध्रुवपद, धमार, खयाल, तराना आदि गाये जाते है। इसमें ठुमरी नहीं गायी जाती। यह राग दो अंगों, देस और बागेश्री, में प्रयोग होता है। देस अंग की जयजयवन्ती, जिसमें कभी-कभी बागेश्री अंग भी दिखाया जाता है, प्रचार में अधिक है। लीजिए, अब आप राग जयजयवन्ती के स्वरों में पिरोया मनमोहक फिल्मी गीत। इसे हमने 1955 में बनी फिल्म ‘सीमा’ से लिया है। सुविख्यात पार्श्वगायिका लता मंगेशकर ने इसे गाया है। कल उनका जन्मदिन है, इस अवसर पर हम रेडिओ प्लेबैक इण्डिया परिवार की ओर से उन्हें हार्दिक शुभकामना देते हैं। यह गीत एकताल में निबद्ध है। गीत के संगीतकार शंकर जयकिशन हैं। आप भी यह गीत सुनिए और लता जी को अपनी बधाई दीजिए। साथ ही आज के इस अंक को यहीं विराम देने की हमें अनुमति दीजिए।



राग जयजयवन्ती : “मनमोहना बड़े झूठे, हार के हार नहीं माने...” : लता मंगेशकर : फिल्म सीमा





संगीत पहेली



‘स्वरगोष्ठी’ के 237वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार फिर एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 240 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस गीतांश में किस राग का स्पर्श है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 3 अक्टूबर 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 239वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 235वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘नरसी भगत’ के एक गीत का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – केदार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक हेमन्त कुमार और गायिका सुधा मल्होत्रा

इस बार की पहेली में तीनों प्रश्नों का सही उत्तर किसी भी प्रतिभागी ने नहीं दिया है। दो सही उत्तर देने वाली प्रतिभागी हैं, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ जारी है। अगले अंक में हम रात्रि के तीसरे प्रहर के कुछ रागों पर चर्चा करेंगे और आपको कुछ रागबद्ध रचनाएँ भी सुनवाएँगे। इस श्रृंखला के लिए या अगली श्रृंखला आप अपनी पसन्द के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 





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