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Friday, November 27, 2009

स्वप्न साकार होते हैं...... चाँद शुक्ला हदियाबादी

हम अपने आवाज़ के दुनिया के दोस्तों को समय-समय में भाषा-साहित्य, कला-संस्कृति जगत के कर्मवीरों से मिलवाते रहते हैं। और जब भी बात इंटरनेट पर इस दिशा में हो रहे सकारात्मक प्रयासों की होती है तो वेबमंच रेडियो सबरंग डॉट कॉम के संस्थापक चाँद शुक्ला हमारी आँखों के सामने आ जाते हैं। आज इन्हीं से रूबर होते हैं सुधा ओम ढींगरा की इनसे हुई एक गुफ्तगु के माध्यम से-


हदियाबाद, फगवाड़ा, पंजाब में एक बालक विविध भारती सुनता हुआ अक्सर कल्पना की दुनिया में पहुँच जाता और आकाशवाणी के संसार में खो जाता। उसे लगता कि उसकी आवाज़ भी रेडियो से आ रही है और जनता सुन रही है। इस स्वप्न का आनन्द लेते हुए वह किशोरावस्था से युवावस्था में पहुँच गया। कई बार उसे महसूस होता कि स्वप्न सच कहाँ होते हैं। पर फिर कहीं से एक आशा की किरण कौंध जाती, सपने साकार होते हैं। पढ़ाई पूरी कर, संघर्ष और चुनौतियों का सामना करते हुए वह युवक अमेरिका, जर्मन घूमते हुए डेनमार्क आ गया। उस समय पूरे यूरोप ने कम्युनिटी रेडियो की स्वीकृति दे दी थी। डेनमार्क पहला ऐसा देश है, जहाँ 1983 में कम्युनिटी रेडियोज़ की स्थापना हुई। कोई भी लाईसैंस ले कर रेडियो प्रोग्राम शुरू कर सकता था। कई लोगों ने अपने राज्य, अपने शहर, अपने एरिया में रेडियो प्रोग्राम शुरू कर लिए। युवक को अपने बचपन का सपना साकार होता महसूस हुआ। उसने ग्रास रूट ऑर्गेनाईजेशन 98.9 एफ़.एम से अपने कार्यक्रम के लिए समय माँगा और उन्होंने उस युवक की बात मान कर भारतीय प्रोग्राम के तहत उसे साथ ले लिया। अगस्त 1989 में उसने अनेकता में एकता का प्रतीक रेडियो सबरंग का प्रसारण शुरू किया। उस समय रेडियो सबरंग की रेंज 40-50 किलोमीटर होती थी और भारतीय, पाकिस्तानी, बंगलादेशी कहने का भाव हिन्दी, उर्दू समझते वाले सभी इस प्रोग्राम को सुनते, यह प्रोग्राम बहुत पापुलर हुआ। 15 वर्ष यह कार्यक्रम चला और बहुत से प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित लोगों से फ़ोन पर सीधा सम्पर्क स्थापित कर रेडियो पर प्रसारण होता था। आज मैं आप की मुलाकात कई भाषाओं में परांगत उस व्यक्तित्व और आवाज़ से करवा रही हूँ जिसे सुनने को लोग लालायित रहते हैं और जिसकी स्वप्नशील आँखों और कल्पना ने वेब रेडियो सबरंग का रूप धरा-- अध्यक्ष Global Community Radio Broadcasters एवं डायरेक्टर वेब रेडियो सबरंग--नाम है चाँद शुक्ला 'हदियाबादी'.

चाँद जी, यह बताएँ कि रेडियो सबरंग वेब रेडियो सबरंग में कब और कैसे परिवर्तित हुआ?

सुधा जी, ऍफ़.एम रेडियो की जब रेंज कम हो गई तो महसूस हुआ कि हमारे श्रोता ही हमें सुन नहीं पा रहे तो हमने इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लाने का फैसला किया. पिछले कई वर्षों से नियमित प्रसारित होने वाला 'रेडियो सबरंग' ही हमने वेब रेडियो सबरंग में परिवर्तित कर दिया. यह वैश्विक समुदाय को एकजुट करने का एक सराहनीय और अनूठा प्रयास है. यह अनेकता में एकता का प्रतीक है। साहित्य और भाषा का एक ऐसा रेडियो वेब है जिसने अपनी सार्थक और प्रासंगिक सामग्री के कारण हिन्दी भाषा प्रेमियों के मध्य समस्त संसार में अपनी अलग पहचान बनाई है ।

विदेशों में अपनी भाषा में कुछ भी करने के लिए काफी चुनौतियों का सामना करता पड़ता है --आप को भी आई होंगी?

तकनीक ना जानने की कठिनाईयाँ आईं, आवाज़ तो हम दे सकते थे, लेकिन उसे मिक्सर से बाहर कैसे निकालना है यह चुनौती थी, पर ग्रास रूट ऑर्गेनाईजेशन वालों ने तकनीकि जानकार मुहैया करवाए. हमने इसे बारीकी से समझा और फिर कार्यक्रम चल निकला. मैंने इसमें दुनिया की नामवर हस्तियों के इंटरव्यू लिए -नेता, अभिनेता, पत्रकार, लेखक, कवि, शायर, कलाकार.

आप ने जिन हस्तियों के इंटरव्यू लिए हैं कुछेक नाम बताएँगे..हालाँकि नामों की लिस्ट तो बहुत लम्बी होगी...

जी, साहिबा --ज्ञानी ज़ैल सिंह, गुलाम नबी आज़ाद, सुषमा स्वराज, अरुण जेतली, किरण बेदी, अमृता प्रीतम , कुलदीप नैय्यर , आशा भोंसले, मन्ना डे , नुसरत फतेह अली , मेंहदी हसन, सुरिन्द्र कौर, सबरी ब्रदर्स, सुरेश वाडेकर, नरेन्द्र चंचल आदि...आदि

चाँद जी, वेब रेडियो सबरंग है क्या?

'रेडियो सबरंग' (डेनमार्क) से संचालित होने वाला हिन्दी साहित्य और भाषा का एक ऐसा रेडियो वेब है जिसने अपनी सार्थक और प्रासंगिक सामग्री के कारण हिन्दी भाषा प्रेमियों के मध्य समस्त संसार में अपनी अलग पहचान बनाई है । 'रेडियो सबरंग' में श्रोताओं के लिए 'सुर संगीत ' , 'कलामे- शायर ' ,'सुनो कहानी' तथा ' भूले बिसरे गीत ' जैसी वशिष्ट सामग्री को बेहद रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है । 'सुर संगीत' में श्रोता सुरीले गीतों तथा कविताओं का आनन्द ले सकते हैं. कवि /गीतकारों द्वारा रचित गीतों को बहुत मधुर संगीत में स्वरबद्ध करके प्रस्तुत किया गया है. जिसमें विश्वभर के सुप्रसिद्ध कवियों और गीतकारों की रचनाएँ स्वरबद्ध की गई हैं. कलामे शायर – इसमें विशेष बात यह है कि आप रचनाओं को स्वयं शायर/कवि की आवाज़ में सुनने का आनंद उठा सकते हैं .सुनो कहानी- 'रेडियो सबरंग' में हम कहानीकार को स्वयं की आवाज़ में कहानी सुनाते सुनेगें . यह बेहद रोमांचकारी अनुभव है. भूले- बिसरे गीत- इस के द्वारा हिन्दी फ़िल्मों के सदाबहार गीतों को प्रस्तुत किया गया है . अभी बहुत से कहानीकार, कवि, शायर इसमें आप और देखेंगे. कार्य धीरे -धीरे प्रगति कर रहा है. अपने वर्तमान स्वरुप में ' रेडियो सबरंग' साहित्य की विभिन्न विधाओं के रचनात्मक प्रस्तुतीकरण के कारण पूरे संसार में सुना और सराहा जा रहा है . कुल मिलाकर विदेश की धरती पर हिंदी भाषा को समर्पित 'रेडियो सबरंग' ने पूरे वैश्विक समुदाय को हिंदी भाषा और साहित्य के द्वारा एक सूत्र में बांधने का उल्लेखनीय कार्य किया हैं.

चाँद जी, आलोचक रेडियो सबरंग पर दोष लगते हैं कि इसमें अधिकतर मंचीय कवि/शायर हैं. समकालीन साहित्य दूर है. आप की चुनाव पद्धति क्या है?

मोहतरमा, नए पुराने हम नहीं देखते. हमने वैश्विक समुदाय से कई लोगों को अवसर दिया है और आगे भी देंगे. चुनाव पद्धति कहें या प्रणाली हम दमदार रचना /कलाम, अभिव्यक्ति और लुभावनी आवाज़ जो लोगों के दिलों को छू ले, ढूँढते हैं. आकर्षित करने वाले साहित्यकार जिन्हें लोग सुनने के लिए हमारे रेडियो पर आएँ, हम चाहते हैं. समकालीन साहित्य की बात करूँ तो कुछ नाम ले रहा हूँ - एस.आर. हरनोट, सूरज प्रकाश, इला प्रसाद, सुभाष नीरव, तेजेन्द्र शर्मा, सुधा ओम ढींगरा आदि क्या समकालीन साहित्यकार नहीं हैं..अभी तो शुरुआत है कुल तीन वर्ष ही हुए हैं और बड़ी कठिनाईयाँ आईं हैं. आगे -आगे देखिये होता है क्या ? हम भिन्न-भिन्न रूचि के लोगों के लिए हर तरह की सामग्री देना चाहते हैं. आखिर यह वैश्विक समुदाय की प्रस्तुति है और पूरे विश्व के लोगों के लिए है.

भविष्य में आप की योजनाएँ क्या हैं? वेब रेडियो सबरंग को आप कहाँ देखना चाहते हैं?

इनसे मिलें नया मंच शुरू करना चाहता हूँ जिसमें ऍफ़.एम रेडियो सबरंग की तरह बड़े -बड़े साहित्यकारों के फ़ोन पर इंटरव्यू ले कर लगाना चाहता हूँ , कलामे शायर और सुनो कहानी की तरह.
अभी तो अंतर्राष्ट्रीय सामग्री आ रही है. बाकि श्रोता जो सुझाव देंगे, उसके अनुसार इसे रंग रूप देते रहेंगे. परिवर्तन जीवन का नियम है. यह लोगों का अपना रेडियो है और उनकी राय का ध्यान रखा जायेगा.

कोई और स्वप्न जो अधूरा हो....?

मैडम, जब मैं डेनमार्क आया था तो एफ़. ऍम रेडियो को सुनकर सोचता था कि काश! भारत में भी ऐसा हो सके. तब मैंने और स्वर्गीय शमशेर सिंह शेर ने पंजाब केसरी के तत्त्वाधान में जालन्धर और दिल्ली में प्रेस काँफ्रैंसेस की थीं, और एफ़. ऍम रेडियो शरू करने के लिए एक पत्थर उछाला था, नारा बुलन्द किया था.. काम तो प्रसार भारती ने किया पर मुझे ख़ुशी है कि मेरा यह सपना भी पूरा हुआ- पूरे भारत में एफ़. ऍम रेडियो सुना जाता है...

बातचीत और प्रस्तुति-- सुधा ओम ढींगरा

Thursday, August 20, 2009

प्यार में आता नहीं उसको गुंजाइशें करना- हुमैरा रहमान

सुनिए मशहूर ऊर्दू शायरा हुमैरा रहमान का साक्षात्कार

हम समय-समय पर कला, साहित्य और संस्कृति जगत की हस्तियों से आपको रूबरु करवाते रहते हैं। आज मिलिए प्रसिद्ध ऊर्दू शायरा हुमैरा रहमान से, जिनका नाम परवीन शाक़िर की परम्परा को आगे बढ़ाने के तौर पर भी लिया जाता है। हुमैरा रहमान जब दिल्ली में हुए एक अंतर्राष्ट्रीय मुशायरा 'जश्न-ए-बहारा' में भाग लेने भारत आई थीं तो हमारे साथी निखिल आनंद गिरि ने उनसे मुलाक़ात की और इंटरनेट की दुनिया का परिचय दिया। हुमैरा ने पूरे एक घंटे तक कविता (ग़ज़ल), हिन्दुस्तान-पाकिस्तान-अमेरिका, रिश्ते, शिक्षा, राजनीति और अपनी पसंद-नापसंद, अपने बचपन पर खुलकर बात की। कुछ ग़ज़लें भी कहीं, कुछ सलाहें भी दी। सुनिए और बताइए कि आपको यह साक्षात्कार कैसा लगा?




हुमैरा रहमान

हुमैरा रहमान ऊर्दू शायरी का एक चर्चित नाम है और एक अंतर्राष्ट्रीय चेहरा है। हुमैरा की बचपन से ही साहित्य में रुचि थी। स्नातक की पढ़ाई करने के दरम्यान गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ मुल्तान (पाकिस्तान) के स्टूडेंट यूनियन की ये महासचिव रहीं। कॉलेज के दिनों से ही ये ग़ज़लपाठ, कार्यक्रम-प्रबंधन से जुड़ी रहीं। कॉलेज से पहले के दिनों में (1969-70) इन्होंने महिलाओं के लिए 'बज़्म-ए-हरीम-ए-फ़न' नामक साहित्यिक संस्था का गठन किया और इसकी महासचिव रहीं। आगे इनका जुड़ाव रेडियो पाकिस्तान, कराची (1971-76) से हुआ, जहाँ इन्होंने रेडियो उद्‍घोषक और ड्रामा कलाकार के तौर पर अपनी सेवाएँ दीं। हुमैरा का नाम पाकिस्तान की शुरू के तीन महिला उद्‍घोषकों में भी लिया जाता है। सन 1977 में ये बीबीसी, लंदन से जुड़ गयीं, जहाँ इन्होंने एनांउसर, स्क्रिप्ट लेखक के तौर पर काम किया (1988 तक)।

बाद में यह न्यूयॉर्क चली आयीं जहाँ 1990 में न्यूयॉर्क स्थित यॉन्कर्स पब्लिक लाइबरेरी में ये मॉडरेटर हो गईं और पाकिस्तान की सांस्कृतिक विरासत को दुनिया की नज़र करने के लिए अनेक प्रोग्रेम किये। 1999 में न्यूयॉर्क की एशिया सोशायटी के लिए भी मॉडरेटर का काम किया। 2000-2002 तक इन्होंने वेस्टचेस्टर मुस्लिम सेंटर, न्यूयॉर्क में ऊर्दू भाषा अध्यापन का काम किया। पिछले 1 साल से न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में ऊर्दू भाषा की संयुक्त प्रशिक्षक के तौर पर काम कर रही हैं।

दुनिया भर के लगभग सभी नामी मुशायरों में हुमैरा रहमान काव्यपाठ कर चुकी हैं। देश-विदेश के रेडियो और टीवी कार्यक्रमों में अपनी ग़ज़लों के हवाले से लोगों के दिलों में अपना विशेष स्थान बना चुकीं हुमैरा की तीन पुस्तकें 'ज़ख़्म ज़ख़्म उजाला'(संपादन), 'इंदेमाल', 'इंतेसाब' भी प्रकाशित हैं।

Thursday, June 11, 2009

सुजॉय की यह कोशिश वेब रेडियो की बेहतरीन कोशिश है

सुजॉय चटर्जी एक ऐसा नाम जिससे आवाज़ के सभी नियमित श्रोता अब तक पूरी तरह से परिचित हो चुके हैं. रोज शाम वो ओल्ड इस गोल्ड पर लेकर आते हैं एक सोने सा चमकता नगमा हम सब के लिए, और खोल देते हैं बातों का एक ऐसा झरोखा जहाँ से आती खुशबू घोल देती है सांसों में ढेरों खट्टी मीठी गुजरे दिनों की यादें. ओल्ड इस गोल्ड ने पूरे किये अपने १०० एपिसोड और इस एतिहासिक अवसर पर हमने सोचा कि क्यों न आपके रूबरू लेकर आया जाए आपके इतने प्यारे ओल्ड इस गोल्ड के होस्ट सुजॉय चटर्जी को, तो मिलिए आज सुजॉय से -

हिंद युग्म - सुजॉय स्वागत है आपका, हमारे श्रोता ओल्ड इस गोल्ड के माध्यम से आपको जानते हैं. इतने सारे पुराने गीतों के बारे में आपकी जानकारी देखकर कुछ लोग अंदाजा लगते हैं कि आपकी उम्र कोई ४०-५० साल की होगी. तो सबसे पहले तो श्रोताओं को अपनी उम्र ही बताईये. ?


सुजॉय - वैसे अविवाहित लड़कों से उनकी उम्र पूछनी तो नहीं चाहिए, चलिए फिर भी बता देता हूँ कि मैं ३१ साल का हूँ।

हिंद युग्म - अच्छा अब अपना परिचय भी दीजिये...

सुजॉय - हम लोग बंगाल के रहनेवाले हैं, लेकिन मेरी पिताजी की नौकरी गुवाहाटी, असम में होने की वजह से मेरा जन्म और पूरी पढाई वहीं हुई। इसलिए मैं अपने आप को असम का ही रहनेवाला मानता हूँ। फ़िल्हाल मैं चण्डीगढ़ में नौकरी कर रहा हूँ। पेशे से मैं 'टेलीकाम इंजिनीयर' हूँ, और मेरी दिलचस्पी है हिंदी फ़िल्म संगीत में, फ़ोटोग्राफ़ी में, और खाना बनाने में।

हिंद युग्म - सुजॉय, ये ओल्ड इस गोल्ड का कॉन्सेप्ट कैसे बना ?

सुजॉय - सच पूछिए तो यह कॉन्सेप्ट सजीवजी का है, मैने तो बस उनके इस कॉन्सेप्ट को अंजाम दिया है। एक बात जो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के श्रोताओं को शायद ही मालूम हो कि जितने भी गाने आप इसमें सुनते हैं वे सभी सजीवजी के ही चुने हुए होते हैं। एक बार गीतों की लिस्ट मेरे हाथ लगी कि मैं अपना काम शुरु कर देता हूँ उनके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारियाँ इकट्ठा करने में। कभी कभी बहुत अच्छी बातें हाथ लगती हैं, और कभी कभी थोड़े में ही गुज़ारा करना पड़ता है। लेकिन जो भी है, मुझे बड़ा आनंद आता है इस सीरीज़ के लिए आलेख लिखने में। शायद इसी तरह का कुछ दबा हुआ था मेरे अंदर जो मैं हमेशा से करना चाहता था। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का मंच पाकर ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी उस पराधीन चाहत को आज़ाद कर दिया हो!

हिंद युग्म - ओल्ड इस गोल्ड को बहुत पसंद किया जा रहा है. एक श्रोता ने हिंद युग्म को लिखा कि ओल्ड इस गोल्ड पर आकर वो अपने बीते दिनों को जैसे फिर से जी रहे हैं. कैसा लगता है जब इस तरह के फीडबैक मिलते हैं ?

सुजॉय - बहुत अच्छा लगता है जानकर कि श्रोताओं और पाठकों को यह शृंखला पसंद आ रही है। उससे भी ज़्यादा अच्छा तब लगता है जब लोग आलेख में छुपी हुई ग़लतियों को ढूंढ निकालते हैं। इतने मनयोग से लोगों को पढ़ते हुए देखकर लगता है कि जैसे मेरी मेहनत सफल हुई। यह शृंखला लोगों को अपने बीते दिनों को याद करवाने में सहायक का काम कर रही है जानकर बहुत ख़ुशी हुई। आगे भी ऐसा ही प्रयास रहेगा।

हिंद युग्म - ओल्ड इस गोल्ड से पहले से ही आप इन्टरनेट पर विविध भारती समुदाय के माध्यम से बहुत लोकप्रिय थे, कैसे कर पाते हैं इतने सारे कार्यक्रमों को आप अपने जेहन में कैद ?

सुजॉय - शुरु शुरु में 'रेडियो' सुनते हुए ही इन कार्यक्रमों में बोली जा रही ज़रूरी बातों को 'शौर्ट हैंड' की तरह नोट कर लेता था, और फिर बाद में आलेख की शक्ल में लिख लेता था। बाद में जब मेरी 'मोबाइल फ़ोन' की पदोन्नती हुई तो उसमें रिकार्ड करने की क्षमता भी उत्पन्न हुई और तब से इन कार्यक्रमों को उस पर रिकार्ड करके बाद मे लिख लेता हूँ। इसे मेरी हॉबी ही समझिये या पागलपन! शायद ही दुनिया में कोई और इस तरह से रेडियो से रिकार्ड कर कम्प्युटर पर टाइप करता होगा!

हिंद युग्म - और फिर पूरे के पूरे कार्यक्रम को टाइप करना, क्या इन सब में बहुत समय नहीं लगता. ?

सुजॉय - समय तो लगता ही है, आख़िर मेरे भी दो हाथ हैं, और फिर औफ़िस भी जाता हूँ, खाना भी पकाता हूँ। मेरा ऐसा विचार है कि अगर आप किसी काम को शौकिया तौर पर करना चाहें तो आप उसके लिए अपनी व्यस्तता के बावजूद समय निकाल सकते हैं।

हिंद युग्म - ओल्ड इस गोल्ड में गीतों की प्रस्तुति में आपका विविध भारती का अनुभव कितना काम आता है ?

सुजॉय - बहुत ज़्यादा! बचपन से ही विविध भारती के अलग अलग कार्यक्रम और आकाशवाणी गुवाहाटी से प्रसारित होनेवाली फ़िल्म संगीत पर आधारित 'सैनिक भाइयों का कार्यक्रम' सुनते हुए ही बड़ा हुआ हूँ। लेकिन मैने अपनी तरफ़ से जो अच्छा काम किया वह यह था कि इन कार्यक्रमों को सुनने के साथ साथ इनमें दी जा रही जानकारियों को भी मैं अपनी डायरी में और बाद में अपने कम्प्युटर में संग्रहित करता चला गया। और अब हाल यह है कि ६०० से ज़्यादा रेडियो कार्यक्रमों का आलेख मेरे इस ख़ज़ाने मे क़ैद हो चुका है, जिनका मैं भरपूर इस्तेमाल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में बिना कंजूसी के कर रहा हूँ। उस वक्त मुझे यह पता भी नहीं था कि एक दिन इन सब का इस्तेमाल यूँ किया जाएगा। मेहनत से किया गया कोई भी काम कभी बेकार नहीं जाता, यह अब मैं मान गया हूँ।

हिंद युग्म - हर गीत की प्रस्तुति से पहले क्या तैयारियां करते हैं ?

सुजॉय - सबसे पहले तो दो चार दिन तक गीतों को मन ही मन मंथन करता हूँ, और उठते बैठते सोते जागते यह सोचता रहता हूँ कि फ़लाना गीत की क्या खासियत है। फिर उसके बाद 'रेडियो' प्रोग्रामों की लिस्ट पे नज़र दौड़ाता हूँ कि कहीं कुछ जानकारियाँ पहले से ही मेरे पास उपलब्ध है या नहीं। फिर उसके बाद इंटर्नेट पर जितना हो सके सर्च करता हूँ, और सारी बातों को आलेख की शक्ल में लिख डालता हूँ। यूँ समझ लीजिए कि १० गीतों का आलेख लिखने के लिए ७ से १० दिन लग ही जाते हैं।

हिंद युग्म - ओल्ड इस गोल्ड के शतक पूरे करने की एक बार फिर बधाई. आप यूहीं अच्छे अच्छे गीत हम सभी को सुनाते रहें. हिंद युग्म को उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि आप इस खोज और आलेख प्रस्तुतीकरण का भरपूर आनंद ले पा रहे हैं. जारी रहे ये सफ़र...सब श्रोताओं की तरफ से शुभकामनायें स्वीकार करें.

सुजॉय - बहुत धन्यवाद! वैसे शुक्रिया मुझे हिंद युग्म का अदा करनी चाहिए मुझे यह मंच देने के लिए। जो काम मैं हमेशा से करना चाहता था और नहीं कर पा रहा था, हिंद युग्म ने मुझे वह काम करने का मौका दिया, इससे ज़्यादा और मैं हिंद युग्म से क्या माँग सकता हूँ। चलते चलते वही लाइन फिर से कहूँगा जो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की हीरक जयंती अंक मे मैने कहा था कि "तुम अगर साथ देने का वादा करो, हम यूँही मस्त नग़में लुटाते रहें"। बहुत धन्यवाद!

ओल्ड इस गोल्ड के श्रोताओं में कुछ ऐसे नाम भी हैं जिन्होंने इस शृंखला के विषय में मीडिया के माध्यम से जानकारी देकर संगीत प्रेमियों को इससे जुड़ने के लिए प्रेरित किया है, मशहूर ब्लॉग "मोहल्ला" के संचालक अविनाश जी भी इन्हीं में से एक हैं जिन पर सुजॉय का जादू जम कर चला है. तभी तो मशहूर साहित्यिक पत्रिका "कथादेश" में उन्होंने अपने "ओल्ड इस गोल्ड" अनुभव को कुछ यूँ व्यक्त किया है. पढिये -

पूरा आलेख पढ़ने के लिए निम्न चित्र पर क्लिक करें


Listen Sadabahar Geetओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.



Friday, May 1, 2009

जब अनुराग बोले रेडियो से

अनुराग शर्मा हिन्द-युग्म का बहुत जाना-पहचाना नाम है। कहानी-वाचन के लिए ये आवाज़ के श्रोताओं के दिलों में अपनी ख़ास जगह बना चुके हैं। ये एक अच्छे कवि और विचारक भी हैं। पिछले सप्ताह 19 अप्रैल 2009 को रेडियो सलाम नमस्ते पर अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति द्वारा प्रस्तुत हिन्दी कविता के विशेष कार्यक्रम ' कवितांजलि' में इनका साक्षात्कार प्रसारित हुआ। कार्यक्रम के उद्‍घोषक आदित्य प्रकाश ने इनसे संक्षिप्त बातचीत की। अब तक इस कार्यक्रम में आलोक शंकर, गौरव सोलंकी, विपुल शुक्ला, अनुपमा चौहान, निखिल आनंद गिरि, रंजना भाटिया, सुनीता शानू, मनीष वंदेमातरम् और शैलेश भारतवासी इत्यादि के काव्यपाठ और बातचीत प्रसारित हो चुके हैं।

आज सुनिए अनुराग शर्मा से बातचीत-

अनुराग शर्मा के साथ सजीव सारथी की बातचीत पढ़ने के लिए क्लिक करें।

Monday, March 23, 2009

'स्माइल पिंकी' वाले डॉ॰ सुबोध सिंह का इंटरव्यू

सुनिए हज़ारों बाल-जीवन में स्माइल फूँकने वाले सुबोध का साक्षात्कार

वर्ष २००९ भारतीय फिल्म इतिहास के लिए बहुत गौरवशाली रहा। ऑस्कर की धूम इस बार जितनी भारत में मची, उतनी शायद ही किसी अन्य देश में मची हो। मुख्यधारा की फिल्म और वृत्तचित्र दोनों ही वर्गों में भारतीय पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों ने अपनी रौनक दिखाई। स्लमडॉग मिलिनेयर की जय हुई और स्माइल पिंकी भी मुस्कुराई। और उसकी इस मुस्कान को पूरी दुनिया ने महसूस किया।

मीडिया में 'जय हो' का बहुत शोर रहा। कलमवीरों ने अपनी-अपनी कलम की ताकत से इसके खिलाफ मोर्चा सम्हाला। हर तरफ यही गुहार थी कि 'स्माइल पिंकी' की मुस्कान की कीमत मोतियों से भी महँगी है। हमें अफसोस है कि यह सोना भारतीय नहीं सँजो पा रहे हैं। कलमकारों की यह चोट हमें भी लगातार मिलती रही। इसलिए हिन्द-युग्म की नीलम मिश्रा ने डॉ॰ सुबोध सिंह का टेलीफोनिक साक्षात्कार लिया और उनकी तपस्या की 'स्माइल' को mp3 में सदा के लिए कैद कर लिया।

ये वही डॉ॰ सुबोध हैं जो महज ४५ मिनट से दो घंटे के ऑपरेशन में 'जन्मजात कटे होंठ और तालु' (क्लेफ्ट लिप) से ग्रसित बच्चों की जिंदगियाँ बदलते हैं। 'स्माइल पिंकी' फिल्म ऐसे ही समस्या से पीड़ित, मिर्जापुर (उ॰प्र॰) के छोटे से गाँव की एक लड़की पिंकी कुमार की कहानी है, जिसके होंठ जन्म से कटे हैं, जिसके कारण वो अन्य बच्चों द्वारा तिरस्कृत होती है। अंतर्राष्ट्रीय संस्था 'स्माइल ट्रेन' के साथ मिलकर उ॰प्र॰ के लिए काम करने वाले डॉ॰ सिंह ने पिंकी का ऑपरेशन किया, जिससे उसकी पूरी दुनिया पलट गई। अब पिंकी भी बाकी बच्चों के साथ स्कूल जाती है, खेलती है। उसके लिए फ़ोन आते हैं तो आस-पास के सब लोग इकट्ठा हो जाते हैं। यह पिंकी अब तो अमेरिका भी घूम आई है।

क़रीब 39 मिनट के इस वृतचित्र में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि किस तरह एक छोटी सी समस्या से किसी बच्चे पर क्या असर पड़ता है और ऑपरेशन के बाद ठीक हो जाने पर बच्चे की मनोदशा कितनी बेहतरीन हो जाती है। पिंकी के घर के लोग बताते हैं कि होंठ कटा होने के कारण वो बाक़ी बच्चों से अलग दिखती थी और उससे बुरा बर्ताव किया जाता था। डॉ॰ सुबोध ने बताया कि उनकी संस्था ने अब तक कई हज़ार बच्चों का ऑपरेशन किया है और उनकी ज़िंदगियों में हँसी बिखेरी है।

आज हम डॉ॰ सुबोध का साक्षात्कार लेकर उपस्थित हैं।



(डॉ॰ सुबोध और पिंकी के साथ 'स्माइल पिंकी' फिल्म की निर्देशक मेगन मायलन)


Thursday, March 5, 2009

इंटरनेट की मदद से हिन्दी की जड़ें मज़बूत होंगी

मानना है कथावाचक शन्नो अग्रवाल का

पिछली बार पूजा अनिल ने आपको आवाज़ के पॉडकास्ट कवि सम्मेलन की संचालिका डॉ॰ मृदुल कीर्ति से मिलवाया था। इस बार ये एक नई शख्सियत के साथ हाज़िर हैं, एक नये प्रयोग के साथ। मृदुल कीर्ति के साक्षात्कार को इन्होंने लिखित रूप से प्रस्तुत किया था, लेकिन इस बार बातचीत को आप सुन भी सकते हैं। इंटरव्यू है प्रेमचंद की कहानियों का वाचन कर श्रोताओं का मन जीत चुकी शन्नो अग्रवाल का। यह इंटरव्यू 'स्काइपी' की मदद से सीधी बातचीत की रिकॉर्डिंग है। सुनें और बतायें कि यह प्रयोग आपको कैसा लगा?





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