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Sunday, December 4, 2016

राग खमाज : SWARGOSHTHI – 295 : RAG KHAMAJ



स्वरगोष्ठी – 295 में आज

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 8 : खमाज की छाया लिये गीत

“चुनरिया कटती जाए रे, उमरिया घटती जाए...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज के अंक में हम आपसे राग खमाज पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला का समापन हम आगामी 25 दिसम्बर को नौशाद अली की 98वीं जयन्ती के अवसर पर करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।



मन्ना  डे 
नौशाद अपने फिल्म संगीत के हर कदम पर नये प्रयोग और प्रणाली के सूत्रपात में अग्रणी रहे हैं। फिल्म ‘आन’ मे सौ सदस्यीय वाद्यवृन्द का उपयोग सबसे पहले उन्होने ही किया था। इसी फिल्म में नौशाद द्वारा पाश्चात्य स्वरलिपि पद्यति का उपयोग किसी संगीतकार द्वारा भारत में किया गया पहला प्रयास था। नौशाद पहले संगीतकार थे जिन्होने फिल्म ‘रतन’ (1944) में ही स्वर और वाद्य के अलग-अलग ट्रैक बनाया और बाद में मिक्सिंग की। बाँसुरी और क्लेरेनेट का संयुक्त प्रयोग तथा सितार और मेंडोलीन का संयुक्त प्रयोग भी नौशाद ने ही शुरू किया था। फिल्म संगीत में पाश्चात्य वाद्य एकॉर्डियन लाने वाले भी वह पहले संगीतकार थे। नौशाद ने रागों का आधार लेकर जिन गीतों की रचना की है, उनमें भी कई प्रयोग स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। 1952 से पहले की फिल्मों में नौशाद के राग आधारित गीतों में रागों का सरल, सुगम रूपान्तरण मिलता है। 1952 की फिल्म ‘बैजू बावरा’ और उसके बाद की फिल्मों में रागों का यथार्थ स्वरूप परिलक्षित होता है। ऐसे गीतों को स्वर देने के लिए उन्होने आवश्यकता पड़ने पर दिग्गज संगीतज्ञों को आमंत्रित करने से भी नहीं चूके। इसके अलावा नौशाद के संगीत का एक पहलू यह भी रहा है कि उनके अनेक गीतों में रागों का स्पर्श करते हुए लोक संगीत का स्वरूप दिया गया है। ऐसे ही गीतों से युक्त 1957 में एक फिल्म ‘मदर इण्डिया’ प्रदर्शित हुई थी, जिसमें नौशाद की प्रतिभा के एक अलग ही रूप का दर्शन हुआ था। महबूब खाँ ने अपनी ही फिल्म ‘औरत’ का ‘रीमेक’ ‘मदर इण्डिया’ नाम से किया था। फिल्म के कथानक की पृष्ठभूमि में ग्रामीण परिवेश है। नौशाद को इस फिल्म का संगीतकार नियुक्त किया गया था। यह फिल्म नरगिस के अविस्मरणीय अभिनय और परिवेश के अनुकूल नौशाद के संगीत के कारण भारतीय फिल्म जगत में कालजयी फिल्म बन चुकी है। फिल्म के प्रायः सभी गीतों में आंचलिक संगीत की झलक है। गीतों को जब ध्यान से सुना जाए तो आंचलिकता के साथ अधिकतर गीतों में विभिन्न रागों का स्पर्श की अनुभूति भी होती है। फिल्म के गीत – “दुःख भरे दिन बीते रे...” में मेघ मल्हार का, विदाई गीत - “पी के घर आज प्यारी चली...” में राग पीलू का, “ओ जाने वाले...” में राग भैरवी का और वैराग्य भाव के गीत – “चुनरिया कटती जाए रे...” में राग खमाज का स्पर्श स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। इन सभी गीतों में रागों का लोक संगीत में सहज रूपान्तरण नौशाद ने किया था। आज हम आपको बहुआयामी पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में इस फिल्म का राग खमाज का स्पर्श करते गीत – “चुनरिया कटती जाए रे...” सुनवाते हैं।

राग खमाज : “चुनरिया कटती जाए रे...” : मन्ना डे : फिल्म – मदर इण्डिया





पण्डित  हरिप्रसाद  चौरसिया 
राग खमाज की स्वर-संरचना खमाज थाट के अन्तर्गत मानी जाती है। यह खमाज थाट का आश्रय राग है। इस राग के आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है। अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किया जाता है। इसीलिए राग खमाज की जाति षाडव-सम्पूर्ण है। इसके आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद स्वर का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद माना जाता है। राग खमाज के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है। यह राग चंचल प्रकृति का है, अतः इस राग में द्रुत खयाल, ठुमरी, टप्पा आदि के गायन-वादन का प्रचलन है। इस राग में प्रायः विलम्बित खयाल गाने का प्रचलन नहीं है। इसी प्रकार वादन में मसीतखानी और रजाखानी अर्थात विलम्बित और द्रुत दोनों प्रकार की गतें बजाई जाती हैं। राग खमाज के आरोह में यद्यपि ऋषभ स्वर वर्जित होता है, किन्तु ठुमरी गाते समय कभी-कभी आरोह में ऋषभ स्वर का प्रयोग कर लिया जाता है। यही नहीं ठुमरी की सौन्दर्य को बढ़ाने के लिए प्रायः अन्य रागों का स्पर्श भी कर लिया जाता है। राग तिलंग, राग खमाज से मिलता-जुलता राग है। राग खमाज का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए अब हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया की सम्मोहक बाँसुरी पर एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। आप राग खमाज के श्रृंगार पक्ष का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग खमाज : बाँसुरी पर मध्य-द्रुत लय की रचना : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 295वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग 6 दशक पहले की एक क्लासिक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 297 के सम्पन्न होने के उपरान्त जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।






1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि आपको किस राग की अनुभूति हो रही है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – आप इस गीत के गायक-स्वर को पहचान कर उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 10 दिसम्बर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 297वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 293वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1954 में प्रदर्शित लोकप्रिय फिल्म ‘अमर’ से राग पर केन्द्रित गीत का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – भीमपलासी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है – स्वर – लता मंगेशकर

इस बार की पहेली के प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, जबलपुर से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। इनके अलावा फेसबुक पर ‘स्वरगोष्ठी’ की एक नियमित संगीत-प्रेमी सदस्य जेसिका मेनेजेस, जिन्होने तीन में से एक प्रश्न का सही उत्तर देकर एक अंक अर्जित किया है। जेसिका जी का हार्दिक स्वागत करते हुए हम आशा करते हैं की आगे भी वे पहेली में भाग लेती रहेंगी, भले ही उन्हें सभी प्रश्नो में से केवल एक ही उत्तर आता हो। सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में अपने सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर जारी हमारी ताज़ा लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” के इस अंक में हमने आपको सुनवाने के लिए राग खमाज की छाया लिये गीत का चुनाव किया था। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने हैं। श्रृंखला का आलेख को तैयार करने में हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा है। यदि आप भी किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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