Showing posts with label Raksha Bandhan. Show all posts
Showing posts with label Raksha Bandhan. Show all posts

Tuesday, August 7, 2012

रेशम की डोरी में छुपे अनगिनित एहसास शब्दों में गुंथे


शब्दों की चाक पर - एपिसोड 10

शब्दों की चाक पर हमारे कवि मित्रों के लिए हर हफ्ते होती है एक नयी चुनौती, रचनात्मकता को संवारने  के लिए मौजूद होती है नयी संभावनाएँ और खुद को परखने और साबित करने के लिए तैयार मिलता है एक और रण का मैदान. यहाँ श्रोताओं के लिए भी हैं कवि मन की कोमल भावनाओं उमड़ता घुमड़ता मेघ समूह जो जब आवाज़ में ढलकर बरसता है तो ह्रदय की सूक्ष्म इन्द्रियों को ठडक से भर जाता है. तो दोस्तों, इससे पहले कि  हम पिछले हफ्ते की कविताओं को आत्मसात करें, आईये जान लें इस दिलचस्प खेल के नियम - 



1. कार्यक्रम की क्रिएटिव हेड रश्मि प्रभा के संचालन में शब्दों का एक दिलचस्प खेल खेला जायेगा. इसमें कवियों को कोई एक थीम शब्द या चित्र दिया जायेगा जिस पर उन्हें कविता रचनी होगी...ये सिलसिला सोमवार सुबह से शुरू होगा और गुरूवार शाम तक चलेगा, जो भी कवि इसमें हिस्सा लेना चाहें वो रश्मि जी से संपर्क कर उनके फेसबुक ग्रुप में जुड सकते हैं, रश्मि जी का प्रोफाईल यहाँ है.

2. सोमवार से गुरूवार तक आई कविताओं को संकलित कर हमारे पोडकास्ट टीम के हेड पिट्सबर्ग से अनुराग शर्मा जी अपने साथी पोडकास्टरों के साथ इन कविताओं में अपनी आवाज़ भरेंगें. और अपने दिलचस्प अंदाज़ में इसे पेश करेगें.

3. हमारी टीम अपने विवेक से सभी प्रतिभागी कवियों में से किसी एक कवि को उनकी किसी खास कविता के लिए सरताज कवि चुनेगें. आपने अपनी टिप्पणियों के माध्यम से ये बताना है कि क्या आपको हमारा निर्णय सटीक लगा, अगर नहीं तो वो कौन सी कविता जिसके कवि को आप सरताज कवि चुनते. 

आज शैफाली गुप्ता और अभिषेक ओझा के साथ हम सुनते हैं कि हमारे कवि मित्र भाई बहन के अटूट रिश्ते को रेशम के नाज़ुक डोर से बाँध कर और मजबूती देते त्यौहार रक्षा बंधन को लेकर क्या विचार रख रहें हैं. स्क्रिप्ट है विश्व दीपक की, संचालन रश्मि प्रभा का, प्रस्तुति है अनुराग शर्मा और सजीव सारथी का. तो दोस्तों सुनिए सुनाईये और छा जाईये...

(नीचे दिए गए किसी भी प्लेयेर से सुनें)


 या फिर यहाँ से डाउनलोड करें 

सूचना - इस हफ्ते हम कवितायेँ स्वीकार करेंगें "हमारे बुजुर्ग और हम" विषय पर. अपनी रचनाएँ आप उपर दिए रश्मि जी के पते पर भेज सकते हैं. गुरूवार शाम तक प्राप्त कवितायेँ ही स्वीकार की जायेंगीं.

Saturday, August 13, 2011

रेडियो और रेशम की डोरी

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 54



'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नम्स्कार! आज रक्षाबंधन है। भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को मनाता यह त्योहार आप सभी के जीवन में ख़ुशियाँ लेकर आये, यह हमारी शुभकामना है। आप सभी को इस पावन पर्व रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ। आज के इस शनिवार विशेषांक में मैं अपने ही जीवन के का अनुभव आप सभी के साथ बाँटने जा रहा हूँ जो शायद आज के दिन के लिए बहुत सटीक है।



किसी नें ठीक ही कहा है कि कुछ रिश्तों को नाम नहीं दिया जा सकता। ये रिश्ते न तो ख़ून के रिश्ते हैं, न ही दोस्ती के, और न ही प्रेम-संबंध के। ये रिश्ते बस यूं ही बन जाया करते हैं। मेरा भी एक ऐसा ही रिश्ता बना है रेडियो की तीन उद्‍घोषिकाओं के साथ, जिनकी आवाज़ें मैं करीब २७-२८ सालों से सुनता चला आ रहा हूँ, पर जिनसे मिलने का मौका अभी पिछले वर्ष ही हुआ। इस रिश्ते की शुरुआत शायद तब हुई जब मैं बस चार साल का था। मेरी माँ स्कूल टीचर हुआ करती थीं जिस वजह से मैं और मेरा बड़ा भाई दोपहर को घर पर अकेले ही होते थे। ८० के दशक के उन शुरुआती सालों में मनोरंजन का एकमात्र ज़रिया रेडियो ही हुआ करता था। हम लोग गुवाहाटी में रहते थे जहाँ के स्थानीय रेडियो स्टेशन से दोपहर के समय १२:३० से २:१० बजे तक 'सैनिक भाइयों का कार्यक्रम' प्रसारित होता था (औत अब भी होता है)। इसके अन्तर्गत फ़िल्मी गीतों पर आधारित अलग अलग तरह के कार्यक्रम पेश होते थे, और इन्हें पेश करने वाली होती थीं तीन महिलाएँ जो अपना नाम अपने सैनिक भाइयों को रेखा बहन, सीमा बहन और मीता बहन बताया करतीं। इस कार्यक्रम को निरन्तर सुनते हुए उनकी आवाज़ें इतनी जानी-पहचानी से बनती चली गईं कि वो आवाज़ें कब मेरे जीवन का हिस्सा बन गईं पता ही नहीं चला। व्यक्तिगत रूप से उन्हें न मिलने के बावजूद ऐसा लगता कि जैसे उनको मैं पहचानता हूँ। जिस दिन उनमें से एक छुट्टी पर होतीं तो दिल जैसे थोड़ा उदास हो जाता। और इस तरह से उन्हें सुनते रहने का सिलसिला जारी रहा, दिन, महीने, साल गुज़रते चले गए। रविवार को और किसी भी छुट्टी के दिन दोपहर के वक़्त रेडियो सुनना नहीं भूलते।



फिर एक दिन शुरु हुआ पत्र लिखने का सिलसिला। हिम्मत जुटा कर मैंने उस कार्यक्रम में पत्र लिखा, कार्यक्रमों के लिए सुझाव दिए, कुछ चीज़ों की आलोचना भी की। पर मेरा पत्र कभी कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया। कारण एक ही था, मैं सनिक नहीं था और वह केवल सैनिक भाइयों का कार्यक्रम था। मुझे अफ़सोस तो हुआ पर ज़्यादा बुरा नहीं लगा। पर मन ही मन तरसता रहा कि काश कभी उनके मुख से मेरा नाम सुनने को मिल जाता रेडियो पर। पर वह दिन कभी नहीं आया। फिर टेलीविज़न भी आ गया, पर रेडियो मेरी ज़िंदगी में अपनी जगह पर कायम रहा, और रेखा-सीमा-मीता बहनों की आवाज़ें भी। फिर मैं स्कूल और कॉलेज की दहलीज़ पार कर एक दिन इंजिनीयर बन गया। पत्र लिखने का सिलसिला भी वैसा चलता रहा, और जवाब न पाने का सिलसिला भी। लेकिन एक शाम ऐसी आई जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। एक दिन मेरे घर के फ़ोन पर कॉल आई। लाइन के दूसरी तरफ़ महिला बिना अपना नाम बताए मुझे इंजिनीयरिंग् में प्रथम आने की बधाई देने लगीं। धन्यवाद देते हुए फिर जब मैंने उनसे उनका नाम पूछा तो बोलीं, "मैं सीमा बहन बोल रही हूँ"। एक पल के लिए तो जैसे मेरी सांस रुक गई। समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोलूँ। दरअसल प्रथम आने पर मेरा नाम और जगह का नाम अखबार में छपा था। और क्योंकि मैं अपने पत्रों में अपना फ़ोन नंबर लिख दिया करता था, वहीं से उनको मेरे बारे में पता चल गया। मैं तो यही समझता था कि वो लोग शायद ही मेरे पत्रों को पढ़ती होंगी, पर सीमा बहन नें मुझे फ़ोन पर बताया कि वो लोग मेरे हर पत्र को बड़े ध्यान से पढ़ते थे और अफ़सोस भी करते थे कि चाहते हुए भी मेरे पत्र कार्यक्रम में वो शामिल नहीं कर सकते। फ़ोन पर ये सब बातें सुन कर मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। ऐसा लगा कि जैसे पिछले १८ वर्ष की मेरी साधना का फल मुझे मिल गया हो।



उस दिन के बाद मैंने कई बार सोचा कि रेडियो स्टेशन जाकर तीनों बहनों से मिलूँ, पर संकोच वश ऐसा न कर सका। फिर मैं गुवाहाटी छोड़ उच्च शिक्षा और नौकरी के लिए बाहर चला गया। कई साल बाद जब मैं गुवाहाटी लौटा और डरते डरते रेडियो ऑन किया कि कहीं रेखा, सीमा और मीता बहनें सेवा से निवृत्त न हो गई हों। पर ऐसा नहीं था। रेडियो पर उन बहनों की आवाज़ें बिल्कुल उसी तरह सुनने को मिली और एक अजीब सी ख़ुशी महसूस हुई। अभी पिछले वर्ष दुर्गा पूजा के दौरान मैं गुवाहाटी गया और इस बार मैंने ठान लिया कि रेडियो स्टेशन जाकर उनसे मिल कर ही आना है। थोड़े संकोच के साथ जब मैं 'सैन्य कार्यक्रम' के बोर्ड वाले स्टाफ़ रूम में उपस्थित हुआ और अपना परिचय दिया तो वहाँ बैठीं सीमा और मीता बहन चौंक उठीं। सीमा बहन नें तो 'प्रोग्राम एग्ज़ेक्युटिव' को बुलाकर मेरी प्रशंसा की, और इस कार्यक्रम के प्रति मेरी वफ़ादारी और कीमती सुझावों के बारे में बताया। किसी श्रोता से मिल कर उद्‍घोषक को कितनी ख़ुशी मिल सकती है, उसका अंदाज़ा मुझे पहली बार हुआ। उनकी आँखों में वही चमक मैंने देखी जो चमक शायद मेरी आँखों में भी उस दिन आई होगी जिस दिन सीमा बहन नें पहली बार मुझे फ़ोन किया था। उस दिन सीमा बहन मुझे अपने साथ अपने घर ले गईं, अपने पति से मिलवाया और मेरा अतिथि-सत्कार किया। रेखा बहन कुछ वर्ष पहले और मीता बहन पिछले वर्ष रिटायर हो गईं। मीता बहन के रिटायरमेण्ट पर जब मैंने उनको शुभकामना स्वरूप ग्रीटिंग् कार्ड भेजा तो उसे पाकर उनकी आँखें भर आई थीं, ऐसा उन्होंने मुझे फ़ोन करके बताया था। और सीमा बहन अभी हाल ही में ३१ जुलाई को रिटायर हो चुकी हैं। इस तरह से रेखा, सीमा और मीता बहनों की आवाज़ें तो रेडियो से ग़ायब हो गईं, लेकिन उनकी गूंज आज भी मुझे सुनाई देती है अपने दिल में और शायद हमेशा सुनाई देती रहेंगी। मैं दिल से इन तीनों बहनों की सलामती की दुआ करता हूँ। उद्‍घोषक-श्रोता का रिश्ता ही कह लीजिए या भाई-बहन का, यह मेरे जीवन का एक बहुत ही सुखद अनुभव रहा है जिसे मैं उम्र भर रेलिश करता रहूंगा। आज रक्षाबंधन पर मैं इन तीनों को ढेर सारी शुभकामनाएँ देता हूँ, और आपको सुनवाता हूँ यह सदाबहार राखी गीत सुमन कल्याणपुर की सुरीली आवाज़ में।



गीत - बहना नें भाई की कलाई से प्यार बांधा है (रेशम की डोरी)





और अब आज की इस प्रस्तुति को यहीं समाप्त करने की अनुमति दीजिये, फिर भेंट होगी, नमस्कार!



और अब एक विशेष सूचना:



२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

Sunday, August 2, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (११)

नोट - आज से रविवार सुबह की कॉफी में आपकी होस्ट होंगी - दीपाली तिवारी "दिशा"

रविवार सुबह की कॉफी का एक और नया अंक लेकर आज हम उपस्तिथ हुए हैं. वैसे तो मन था कि आपकी पसंद के रक्षा बंधन गीत और उनसे जुडी आपकी यादों को ही आज के अंक में संगृहीत करें पर पिछले सप्ताह हुई एक दुखद घटना ने हमें मजबूर किया कि हम शुरुआत करें उस दिवंगत अभिनेत्री की कुछ बातें आपके साथ बांटकर.

फिल्म जगत में अपने अभिनय और सौन्दर्य का जादू बिखेर एक मुकाम बनाने वाली अभिनेत्री लीला नायडू को कौन नहीं जानता. उनका फिल्मी सफर बहुत लम्बा तो नहीं था लेकिन उनके अभिनय की धार को "गागर में सागर" की तरह सराहा गया. लीला नायडू ने सन १९५४ में फेमिना मिस इंडिया का खिताब जीता था और "वोग" मैग्जीन ने उन्हें विश्व की सर्वश्रेष्ठ दस सुन्दरियों में स्थान दिया था.

लीला नायडू ने अपना फिल्मी सफर मशहूर फिल्मकार ह्रशिकेश मुखर्जी की फिल्म "अनुराधा" से शुरु किया. इस फिल्म में उन्होंने अभिनेता बलराज साहनी की पत्नि की भूमिका निभायी थी. अनुराधा फिल्म के द्वारा लीला नायडू के अभिनय को सराहा गया और फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिये राष्ट्रीय पुरुस्कार भी मिला. अपने छोटे से फिल्मी सफर में लीला नायडू ने उम्मींद, ये रास्ते हैं प्यार के, द गुरु, बागी और त्रिकाल जैसी फिल्मों में अभिनय किया. सन १९६३ में प्रदर्शित फिल्म "ये रास्ते हैं प्यार के" ने लीला नायडू को एक अलग पहचान दी. इस फिल्म में अभिनय के बाद वो नारी स्वतंत्रता की प्रतीक बन गयीं. सन १९६३ में ही उन्होंने आइवरी प्रोडक्शन की फिल्म "हाउसहोल्डर" में भी काम किया.

उनके व्यक्तिगत जीवन पर नजर डालें तो कहा जाता है कि वह अपने निजी जीवन में भी उन्मुक्त विचारों की थी. उनके पिता रमैया नायडू आन्ध्रप्रदेश के थे और न्यूक्लियर विभाग में फिजिसिस्ट थे. उनकी माँ फ्रांसिसी मूल की थीं. अपने फिल्मी कैरियर के दौरान ही लीला नायडू ने ओबेरॉय होटल के मालिक मोहन सिंह के बेटे विक्की ओबेरॉय से विवाह कर लिया. उनसे उनकी दो बेटियाँ हैं. बाद में विक्की ओबेरॉय से तलाक हो जाने के बाद लीला नायडू ने अंग्रेजी कवि डॉम मॉरेस से विवाह किया और उनके साथ लगभग दस वर्ष फ्रांस में रहीं. जब कोर्ट ने उनकी दोनों बेटियों का जिम्मा उनसे लेकर विक्की ओबेरॉय को दे दिया तो वह भारत चलीं आयीं. यहाँ लीला नायडू की मुलाकात दार्शनिक जे.कृष्णमूर्ति से हुई. उसके बाद वह आजीवन उन्हीं के साथ रहीं.

लंबे समय तक फिल्मों से दूर रहने के बाद सन १९८५ में श्याम बेनेगल की फिल्म "त्रिकाल" से उनकी बॉलीवुड में वापिसी हुई थी. इसके बाद सन १९९२ में वह निर्देशक प्रदीप कृष्ण की फिल्म "इलैक्ट्रिक मून" में नजर आयीं थीं. यह उनकी आंखिरी फिल्म थी.

कवि बिहारीलाल का एक दोहा है कि "सतसैया कए दोहरे ज्यों नाविक के तीर, देखन में छोटे लगें घाव करं गंभीर" यह दोहा लीला नायडू के छोटे फिल्मी सफर पर भी लागू होता है.लीला नायडू ने छोटे फिल्मी सफर में अपने अभिनय की जो छाप छोडी़ है वो न तो बॉलीवुड भुला सकता है और न ही उनके चाहने वाले. आइये हम सभी सौन्दर्य और अभिनय की देवी को श्रद्धांजंली दें.

अब ऐसा कैसे हो सकता है कि हम आपको लीला जी पर फिमाये गए कुछ नायाब और कुछ दुर्लभ गीत ना सुनाएँ, फिल्म "अनुराधा" (इस फिल्म में बेमिसाल संगीत दिया था पंडित रवि शंकर ने ) और "ये राते हैं प्यार के", दो ऐसी फिल्में हैं जिसमें लीला जी पर फिल्माए गीतों को हम कभी नहीं भूल सकते. चलिए सुनते हैं इन्हीं दो फिल्मों से कुछ नायाब गीत -

जाने जाँ पास आओ न (सुनील दत्त, आशा भोंसले, ये रास्ते हैं प्यार के )


ये रास्ते हैं प्यार के (आशा भोंसले, शीर्षक)


आज ये मेरी जिन्दगी (आशा भोंसले, ये रास्ते हैं प्यार के)


ये खामोशियाँ (रफी- आशा, ये रास्ते हैं प्यार के, एक बेहद खूबसूरत प्रेम गीत)


सांवरे सांवरे (लता, अनुराधा)


कैसे दिन बीते (लता, अनुराधा)


और एक ये बेहद दुर्लभ सा गीत भी सुनिए -
गुनाहों का दिया हक (ये रास्ते हैं प्यार के)


रक्षा बंधन पर हमने चाहा था कि आप अपने कुछ संस्मरण बांटे पर अधिकतर श्रोता शायद इस परिस्तिथि के लिए तैयार नहीं लगे, स्वप्न जी ने कुछ लिखा तो नहीं पर अपने भाई जो अब इस दुनिया में नहीं हैं उन्हें याद करते हुए उनके सबसे पसंदीदा गीत को सुनवाने की फरमाईश की है. हमें यकीन है कि उनके आज जहाँ कहीं भी होंगे अपनी बहन की श्रद्धाजंली को ज़रूर स्वीकार करेंगें -

कोई होता जिसको अपना (किशोर कुमार, मेरे अपने)


हमलोग शुरु से ही संयुक्त परिवार में रहे. परिवार में सगे रिश्तों के अलावा ऐसे रिश्तों की भी भीड़ रही जिनसे हमारा सीधा-सीधा कोई नाता न था. यानी कि हमारा एक भरा-भरा परिवार था. हमारे यहाँ सभी तीज-त्यौहार बहुत ही विधि विधान से मनाये जाते थे. रक्षाबंधन भी इन्हीं में से एक है. मुझे आज भी याद है क मेरे ताऊजी, पापाजी तथा चाचाजी किस तरह सुबह से ही एक लम्बी पूजा में शामिल होते थे और उस दौरान नया जनेऊ पहनना आदि रस्में की जाती थीं. तरह-तरह के पकवान बनते थे. लेकिन हम बच्चे सिर्फ उनकी खुशबू से अपना काम चलाते थे क्योंकि माँ बार-बार यह कहकर टाल देती थी कि अभी पूजा खत्म नही हुई है. पूजा के बाद राखी बाँधकर खाना खाया जायेगा. उस समय तो अपने क्या दूर-दूर के रिश्तेदार भी राखी बँधवाने आते थे. आज बहुत कुछ बदल गया है. अब तो सगे भाई को भी राखी बाँधने का मौका नहीं मिलता है. खैर चलिए चलते चलते सुनते चलें रंजना भाटिया जी की पसंद का ये गीत जो इस रक्षा बंधन पर आप सब की नज़र है-

चंदा रे मेरे भैया से कहना (लता, चम्बल की कसम)


सभी भाई -बहनों के लिए ये रक्षा बंधन का पर्व मंगलमय हो इसी उम्मीद के साथ मैं दिशा आप सब से लेती हूँ इजाज़त.

प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ