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Wednesday, July 14, 2010

बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की.. नारी-मन में मचलते दर्द को दिल से उभारा है परवीन और मेहदी हसन ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९२

"नारी-मन की व्यथा को अपनी मर्मस्पर्शी शैली के माध्यम से अभिव्यक्त करने वाली पाकिस्तानी शायरा परवीन शाकिर उर्दू-काव्य की अमूल्य निधि हैं।" - यह कहना है सुरेश कुमार का, जिन्होंने "परवीन शाकिर" पर "खुली आँखों में सपना" नाम की पुस्तक लिखी है। सुरेश कुमार आगे लिखते हैं:

बीसवीं सदी के आठवें दशक में प्रकाशित परवीन शाकिर के मजमुआ-ए-कलाम ‘खुशबू’ की खुशबू पाकिस्तान की सरहदों को पार करती हुई, न सिर्फ़ भारत पहुँची, बल्कि दुनिया भर के उर्दू-हिन्दी काव्य-प्रेमियों के मन-मस्तिष्क को सुगंधित कर गयी। सरस्वती की इस बेटी को भारतीय काव्य-प्रेमियों ने सर-आँखों पर बिठाया। उसकी शायरी में भारतीय परिवेश और संस्कृति की खुशबू को महसूस किया:

ये हवा कैसे उड़ा ले गयी आँचल मेरा
यूँ सताने की तो आदत मेरे घनश्याम की थी


परवीन शाकिर की शायरी, खुशबू के सफ़र की शायरी है। प्रेम की उत्कट चाह में भटकती हुई, वह तमाम नाकामियों से गुज़रती है, फिर भी जीवन के प्रति उसकी आस्था समाप्त नहीं होती। जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए, वह अपने धैर्य का परीक्षण भी करती है।

कमाल-ए-ज़ब्त को खुद भी तो आजमाऊँगी
मैं अपने हाथ से उसकी दुलहन सजाऊँगी


प्रेम और सौंदर्य के विभिन्न पक्षों से सुगन्धित परवीन शाकिर की शायरी हमारे दौर की इमारत में बने हुए बेबसी और विसंगतियों के दरीचों में भी अक्सर प्रवेश कर जाती है-

ये दुख नहीं कि अँधेरों से सुलह की हमने
मलाल ये है कि अब सुबह की तलब भी नहीं


पाकिस्तान की इस भावप्रवण कवयित्री और ख़्वाब-ओ-ख़याल के चाँद-नगर की शहज़ादी को बीसवीं सदी की आखिरी दहाई रास नहीं आयी। एक सड़क दुर्घटना में उसका निधन हो गया। युवावस्था में ही वह अपनी महायात्रा पर निकल गयी।

कोई सैफो हो, कि मीरा हो, कि परवीन उसे
रास आता ही नहीं चाँद-नगर में रहना

परवीन शाकिर के मौत की बरसी पर "स्टार न्युज़ एजेंसी" ने यह खबर छापी थी:

आज परवीन शाकिर की बरसी है...परवीन शाकिर ने बहुत कम अरसे में शायरी में वो मुकाम हासिल किया, जो बहुत कम लोगों को ही मिल पाता है. कराची (पाकिस्तान) में २४ नवंबर १९५२ को जन्म लेने वाली परवीन शाकिर की ज़िन्दगी २६ दिसंबर १९९४ को इस्लामाबाद के कब्रस्तान की होने तक किस-किस दौर से गुज़री...ये सब उनकी चार किताबों खुशबू, खुद कलामी, इनकार और माह तमाम की सूरत में हमारे सामने है...माह तमाम उनकी आखिरी यादगार है...

२६ दिसंबर १९९४ को इस्लामाबाद में एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई थी. जिस दिन परवीन शाकिर को कब्रस्तान में दफ़नाया गया, उस रात बारिश भी बहुत हुई, लगा आसमान भी रो पड़ा हो...सैयद शाकिर के घराने का ये रौशन चराग इस्लामाबाद के कब्रस्तान की ख़ाक में मिल गया हो, लेकिन उसकी रौशनी और खुशबू अदब की दुनिया में रहती दुनिया तक कायम रहेगी..

परवीन की मौत के बाद उनकी याद में एक "क़िता-ए-तारीख" की तख्लीक की गई थी:

सुर्ख फूलों से ढकी तुरबत-ए-परवीन है आज
जिसके लहजे से हर इक सिम्त है फैली खुशबू
फ़िक्र-ए-तारीख-ए-अजल पर यह कहा हातिफ़ ने
फूल! कह दो "है यही बाग-ए-अदब की खुशबू


उपरोक्त पंक्तियाँ "तनवीर फूल" की पुस्तक "धुआँ धुआँ चेहरे" में दर्ज हैं।

परवीन शाकिर अच्छी-खासी पढी-लिखी थीं। अच्छी-खासी कहने से अच्छा है कि कहूँ अव्वल दर्जे की शिक्षित महिला थीं क्योंकि उनके पास एक नहीं तीन-तीन "स्नातकोत्तर" की डिग्रियाँ थीं.. वे तीन विषय थे - अंग्रेजी साहित्य, लिग्विंसटिक्स एवं बैंक एडमिनिस्ट्रेशन। वे नौ वर्ष तक शिक्षक रहीं, उसके बाद वे प्रशासनिक सेवा का हिस्सा बन गईं। १९८६ में उन्हें CBR का सेकेंड सेक्रेटरी नियुक्त किया गया। उन्होंने कई सारी किताबें लिखीं। उनकी पहली किताब "खुशबू" ने उन्हें "अदमजी" पुरस्कार दिलवाया। आगे जाकर उन्हें पाकिस्तान के सर्वोच्च पुरस्कार "प्राईड ऑफ परफ़ोरमेंश" से भी नवाज़ा गया। पहले-पहल परवीन "बीना" के छद्म नाम से लिखा करती थीं। वे "अहमद नदीम क़ासमी" को अपना उस्ताद मानती थीं और उन्हें "अम्मुजान" कहकर पुकारती थीं। परवीन का निकाह डाक्टर नसिर अहमद से हुआ था लेकिन परवीन की दुखद मौत से कुछ दिनों पहले हीं उन दोनों का तलाक हो गया।

यह था परवीन का संक्षिप्त परिचय। इनके बारे में अगर ज्यादा जान हो तो यहाँ जाएँ। मैं अगर सही हूँ और जहाँ तक मुझे याद है, हमारी इस महफ़िल में आज से पहले किसी शायरा की आमद नहीं हुई थी यानि कि परवीन पहली शायरा हैं, जिनके नाम पर पूरी की पूरी महफ़िल सजी है। हमें इस बात का गर्व है कि देर से हीं सही लेकिन हमें किसी शायरा की इज़्ज़त-आफ़जाई करने का मौका तो मिला। हम आगे भी ऐसी कोशिश करते रहेंगे क्योंकि ग़़ज़ल की दुनिया में शायराओं की कमी नहीं।

परवीन की शायरी अपने-आप में एक मिसाल है। इनकी गज़लों के एक-एक शेर मुखर हैं। मन तो हुआ कि सारी गज़लें यहाँ डाल दूँ लेकिन जगह अनुमति नहीं देती। इसलिए बगिया से कुछ फूल चुनकर लाया हूँ। खुशबू कैसी है, कितनी मनभावन है यह जानने के लिए आपको इन फूलों को चुमना होगा, गुनना होगा:

आज तो उस पे ठहरती ही न थी आंख ज़रा
उसके जाते ही नज़र मैंने उतारी उसकी

तेरे सिवा भी कई रंग ख़ुशनज़र थे मगर
जो तुझको देख चुका हो वो और क्या देखे

मेरे बदन को नमी खा गई अश्कों की
भरी बहार में जैसे मकान ढहता है

सर छुपाएँ तो बदन खुलता है
ज़ीस्त मुफ़लिस की रिदा हो जैसे

तोहमत लगा के माँ पे जो दुश्मन से दाद ले
ऐसे सुख़नफ़रोश को मर जाना चाहिये


परवीन शाकिर के बारे में ज्यादा कुछ न कह सका क्योंकि मेरी "तबियत" आज मेरा साथ नहीं दे रही। पहले तो लगा कि आज महफ़िल-ए-ग़ज़ल सजेगी हीं नहीं, लेकिन "मामूल" से पीछे हटना मुझे नहीं आता, इसलिए जितना कुछ हो पाया है, वही लेकर आपके बीच आज हाज़िर हूँ। उम्मीद करता हूँ कि आप मेरी मजबूरी समझेंगे और बाकी दिनों की तरह आज भी महफ़िल को ढेर सारा प्यार नसीब होगा। चलिए तो अब आज की ग़ज़ल की ओर रूख कर लेते हैं। इस ग़ज़ल को अपनी मखमली आवाज़ से मुकम्मल किया है ग़ज़लगायकी के बादशाह मेहदी हसन साहब ने। यूँ तो मेहदी साहब ने बस ३ हीं शेर गाए हैं, लेकिन मैंने पूरी ग़ज़ल यहाँ उपलब्ध करा दी है, ताकि बचे हुए शेरों की ज़ीनत भी खुलकर सामने आए। तो पेश-ए-खिदमत है आज की ग़ज़ल:

कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की
उस ने ख़ुश्बू की तरह मेरी पज़ीराई की

कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की

वो कहीं भी गया लौटा तो मेरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मेरे हरजाई की

तेरा पहलू तेरे दिल की तरह आबाद रहे
तुझ पे गुज़रे न ____ शब-ए-तन्हाई की

उस ने जलती हुई पेशानी पे जो हाथ रखा
रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "पालकी" और शेर कुछ यूँ था-

मेरे बाज़ुओं में थकी-थकी, अभी महव-ए-ख़्वाब है चांदनी
न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो

पिछली महफ़िल की शोभा बनीं नीलम जी। आपने अपने खास अंदाज में हमें धमका भी दिया.. आपकी यह अदा हमें बेहद पसंद आई। नीलम जी के बाद महफ़िल की शम्मा शरद जी के सामने ले जाई गई। इस बार शरद जी का अंदाज़ अलहदा-सा था और उन्होंने स्वरचित शेरों के बजाय नीरज के शेरों से महफ़िल को रौशन किया। भले हीं शरद जी दूसरे रास्ते पर निकल गए हों लेकिन मंजु जी ने अपनी लीक नहीं छोड़ी.. उन्होंने तो स्वरचित शेर हीं पेश करना सही समझा। इंदु जी, आपने सही कहा.. बशीर बद्र साहब और हुसैन बंधु ये तीनॊं ऐसी हस्तियाँ हैं, जिन्हें उनके हक़ की मक़बूलियत हासिल नहीं हुई। मनु जी, कुछ और भी कह देते.. खैर आप ठहरे "रमता जोगी".. आप किसकी सुनने वाले :) अवध जी, आपने "नीरज" की नज़्म याद दिलाकर महफ़िल में चार चाँद लगा दिए। शन्नो जी, ग़ज़ल और आलेख आपके पसंद आए, हमें इससे ज्यादा और क्या चाहिए। अमित जी, हमारी महफ़िल तो इसी कोशिश में है कि फ़नकार चाहे जो भी हो, अगर अच्छा है तो उसे अंधकार से प्रकाश में आना चाहिए। सीमा जी, इस बार एक हीं शेर.. ऐसा क्यों? और इस बार आपने देर भी कर दी है। अगली बार से ऐसा नहीं चलेगा :) अवनींद्र जी, आप आए नहीं थे तो मुझे लगा कि कहीं फिर से नाराज़ तो नहीं हो गएँ.. अच्छा हुआ कि नीलम जी ने पुकार लगाई और आप खुद को रोक न सके। अगली बार से यही उपाय चाहिए होगा क्या? :)

बातों के बाद अब बारी है पिछली महफ़िल के शेरों की:

सोचता था कैसे दम दूं इन बेदम काँधों को अपने
पिता ने काँधे से लगाया जब ,मेरी पालकी को अपने (नीलम जी)

जैसे कहार लूट लें दुल्हन की पालकी
हालत वही है आजकल हिन्दोस्तान की (नीरज)

अल्लाउदीन से मिलने गई जब रानी पदमनी ,
उसे हर पालकी में नजर आई रानी पदमनी (मंजु जी)

पर तभी ज़हर भरी गाज एक वोह गिरी
पुंछ गया सिंदूर तार तार हुई चुनरी
और हम अजान से, दूर के मकान से
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे (नीरज)

उसे लेकर गयी पालकी जहाँ उसकी कोई कदर न थी
जो जहान था उसके लिये उसकी नजर कहीं और थी. (शन्नो जी)

शब्द की नित पालकी उतरी सितारों की गली में
हो अलंकॄत गंध के टाँके लगाती हर कली में (राकेश खंडेलवाल )

मन की पालकी मैं वेदना निढाल सी
अश्क मैं डूबी हुई भावना निहाल सी (अवनींद्र जी)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, January 13, 2010

असीर जहनों में सोच भरना कोई तो सीखे... नीलमा सरवर की धारदार गज़ल को तेज किया हामिद ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६६

ज की महफ़िल का श्रीगणेश हो, इससे पहले हीं हम आपसे माफ़ी माँगना चाहते हैं और वो इसलिए क्योंकि आज की महफ़िल थोड़ी छोटी रहनी वाली है। कारण? कारण यह है कि लेखक(यहाँ पर मैं) सामग्रियाँ इकट्ठा करने में इतना मशगूल हो गया कि लिखने के लिए पर्याप्त वक्त हीं नहीं निकाल पाया। तो आज की महफ़िल बस ४५ मिनट में लिखी गई है.. अब इतने कम वक्त में क्या सोचा जा सकता है और क्या लिखा जा सकता है। तो चलिए इस माफ़ीनामे पर दस्तखत करने के बाद महफ़िल की विधिवत शुरूआत करते हैं।इस महफ़िल में जिस गज़ल की पेशी या फिर अच्छे शब्दों में कहना हो तो ताज़पोशी होने वाली है,उसे लिखने वालीं गज़लगो पाकिस्तान के कुछ चुनिंदा शायराओं में शुमार होती हैं। ये शायराएँ पाकिस्तान में पल-बढ रहे रूढिवादियों और पाकिस्तान के इस्लामिकरण के खिलाफ़ जोर-शोर से आवाज़ उठाती आई हैं। इनके गुस्से की तब सीमा नहीं रही जब १० फरवरी १९७९ को पाकिस्तान में "हुदूद अध्यादेश" पारित किया गया, जिसके तहत क़्फ़्क़ (झूठी गवाही), ज़िना (नाज़ायज़ संबंध) और ज़िना-बिल-जब्र(बलात्कार) की स्थिति में महिलाओं को चादर और चाहरदीवारी के अंदर ढकेल देने का प्रस्ताव था.. यानि कि अगर किसी महिला का बलात्कार हो जाए तब भी दोषी महिला हीं है, पुरूष नहीं। इन शायराओं ने "शरिया" (इस्लामिक कानून) के तहत खुद को अच्छी औरत साबित करने से साफ़ इंकार कर दिया और ऐसी कविताएँ लिखीं जो आज भी पुरूष-प्रधान समाज के सीने पर कील ठोंकने का काम करती हैं। इन सात शायराओं के नाम हैं: किश्वर नाहिद, फ़हमिदा रियाज़, सईदा गज़दर, सारा शगुफ़्ता, इशरत आफ़रीन, नीलमा सरवर और ज़ेहरा निगह। इन सातों की कुछ चुनिंदा रचनाओं का संकलन "वी सिनफ़ुल वीमेन" नाम से १९९० में लंदन के वीमेन्स प्रेस से प्रकाशित किया गया। रचनाओं का अंग्रेजी में अनुवाद "रूख्साना अहमद" ने किया है। "वी सिनफ़ुल वीमेन" यानि कि "हम गुनहगार औरतें" किश्वर नाहिद की रचना है। आगे बढने से पहले हम चाहेंगे कि आप एक नज़र उस रचना पर डाल लें:

ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो मानती नहीं रौब चोगाधारियों की
शान का

जो बेचती नहीं अपने जिस्म
जो झुकाती नहीं अपने सिर
जो जोड़ती नहीं अपने हाथ।

ये हम गुनहगार औरतें हैं
जबकि हमारे जिस्मों की फसल बेचने वाले
करते हैं आनंद
हो जाते हैं लब्ध-प्रतिष्ठ
बन जाते हैं राजकुमार इस दुनिया के।

ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो निकलती हैं सत्य का झंडा उठाए
राजमार्गों पर झूठों के अवरोधों के खिलाफ
जिन्हें मिलती हैं अत्याचार की कहानियाँ हरेक दहलीज पर
ढेर की ढेर
जो देखती हैं कि सत्य बोलने वाली ज़बानें
दी गयीं हैं काट

ये हम गुनहगार औरतें हैं
अब,चाहे रात भी करे पीछा
ये आंखें बुझेंगी नहीं
क्योंकि जो दीवार ढाह दी गयी है

मत करो ज़िद दोबारा खड़ा करने की उसे ।

ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो मानती नहीं रौब चोगाधारियों की
शान का
जो बेचती नहीं अपने जिस्म
जो झुकाती नहीं अपने सिर
जो जोड़ती नहीं अपने हाथ।

कितना जोश भरा है इन पंक्तियों में, तभी तो इन शायराओं को छुप-छुपकर और घुट-घुटकर अपना जीवन तमाम करना पड़ा था या फिर पड़ रहा है। इन्हीं शायराओं में से एक थीं सारा शगुफ़्ता, जिन्हें पाकिस्तान का अमृता प्रीतम भी कहा जाता था, लेकिन उन्हें एक दिन समाज के सामने मजबूर होना पड़ा और १९८४ में(जिस दौरान उनकी उम्र महज़ ३० साल थी) उन्होंने जहर खाकर आत्महत्या कर ली...साहित्य को एक चमकता सितारा हासिल हो रहा था, लेकिन नियति को कुछ और हीं मंजूर था। इसरत आफ़रीन को तो अपनी ज़िंदगी बचाने के लिए अपने पति के साथ भागकर हिन्दुस्तान आना पड़ा। ज़ेहरा निगह की लिखी रचना "हुदूद अध्यादेश" उन लड़कियों को समर्पित है, जो इस कानून के कारण अपनी बाकी ज़िंदगी जेल में गुजारने को मजबूर हैं। गज़दर की "१२ फरवरी १९८३" उन रचनाओं में सबसे बड़ी रचना है, जिसमें उन्होंने लाहौर में की गई एक रैली का ज़िक्र किया है, जिसमें २०० से भी ज्यादा महिलाओं ने "गवाह के कानून" के खिलाफ़ हिस्सा लिया था..यह कानून ऐसा था(है), जिसमें पीड़ित महिला के बयान को तब तक तवज्जो नहीं दी जाती है, जब तक कोई और महिला उसके पक्ष में गवाही न दे दे। ये सारे इतने बेहूदे कानून हैं कि इनके बारे में कुछ लिखना भी अजीब लगता है। अब हम आपको उस शायरा का नाम बता देते हैं जिसकी गज़ल से आज की महफ़िल सजी है.. उस शायरा का नाम है "नीलमा सरवर"। इनके बारे में व्यक्तिगत जानकारी तो कुछ हासिल नहीं हुई, ना हीं इनकी कोई भी रचना हिन्दी में लिखी हुई दिखी हमें, इसलिए हम इनकी वह रचना यहाँ पर पेश किए देते हैं, जो अंग्रेजी में अनुवादित है और "वी सिनफ़ुल वीमेन" में शामिल की गई है.. रचना का नाम है "प्रीज़न" यानि कि कारागार:

As I sat in a garden full of flowers
I saw a huge cage
Crammed with human beings,
Pallid of hue
Wild-eyed
Wild-haired human beings
In that small cramped cage.

Some sat, some lay on the floor
But they were all thinking something.

Perhaps of their punishments
Or of their crimes
Or, maybe, about those people
Who sat outside the cage
And smugly presumed they were free.

अह्हा.. इस रचना में स्वतंत्र और परतंत्र होने के बीच की नाजुक डोर बड़े हीं आराम से हटाई गई है.. वह जो आज़ाद दिखता है, क्या सही मायने में वह आज़ाद है। नहीं है... यानि कि जो कारागार में है, बस वही गुलाम नहीं है, वह भी गुलाम है जो बाहर आराम से अपने लौन में बैठकर चाय पी रहा है। कभी सोचिएगा..आप..आराम से। चलिए इस कविता के बाद नीलम जी के एक शेर पर भी नज़र दौड़ा लेते हैं। यहाँ भी वही रोष, वही नाराज़गी और वही सच्चाई विद्यमान है:

देखते हीं देखते वो क्या से क्या हो जाएगा,
आज जो गुल है वो कल बस खाक-ए-पा हो जागा।


और ये रही आज की गज़ल, जिसे हमने "इंतज़ार" एलबम से लिया है। इस गज़ल को अपनी आवाज़ दी है हामिद अली खान साहब ने।(इनके बारे में कभी आगे गुफ़्तगू करेंगे..आज वक्त के मामले में थोड़ा हाथ तंग है) लफ़्ज़ों में खौलते जज़्बातों को महसूस करना हो तो एक-एक हर्फ़ को खुद पढें, खुद गुनगुनाएँ। आपको मालूम पड़ जाएगा कि लिखते वक्त कवयित्री किन मनोभावों से गुजर रही थीं। मक़्ते तक पहुँचते-पहुँचते वह दर्द पूरी तरह से मुखर हो जाता है। है ना? :

उदास लोगों से प्यार करना कोई तो सीखे,
सुफ़ेद लम्हों में रंग भरना कोई तो सीखे।

कोई तो आए फ़िज़ा में पत्ते उगाने वाला,
गुलों की खुशबू को कैद करना कोई तो सीखे।

कोई दिखाए मोहब्बतों के सराब मुझको,
मेरी निगाहों से बात करना कोई तो सीखे।

कोई तो आए नई रूतों का ____ लेकर,
अंधेरी रातों में चाँद बनना कोई तो सीखे।

कोई पयंबर, कोई इमाम-ए-ज़मां हीं आए,
असीर जहनों में सोच भरना कोई तो सीखे।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "शरारत" और शेर कुछ यूं था -

वो एकबार तेरी शरारत से तौबा,
मेरा रूठ जाना तेरा मनाना।

इस शब्द की सबसे पहले पहचान की "अवध" जी ने। अवध जी, कोई बात नहीं..गलती इंसान से हीं होती है :) और वैसे भी हमने भी तो एक गलती की। आपने अगर शायर का नाम नहीं डाला तो हम भी तो वह काम कर सकते थे, लेकिन आलस्य... क्या कीजिएगा। वाकई क़तील साहब का वह शेर कमाल का था। और यह शेर भी कमाल का है, जो आपने लिखा है:

उफ यह कमसिनी, यह मासूमियत तेरी
जान ले गयी मेरी इक शरारत तेरी. (स्वरचित)

सजीव जी और निर्मला जी! हौसला-आफ़ज़ाई का शुक्रिया।

सीमा जी, हमें आप पर नाज़ है। जहाँ हमारे पुराने मित्र हमसे धीरे-धीरे कन्नी काटने लगे हैं (कहने में दु:ख तो होता हीं है), वहीं आप हमारे लिए उम्मीद की लौ बनकर आती हैं और महफ़िल की शमा बुझने नहीं देतीं। यह रही आपकी पेशकश:

वो और वफ़ा-दुश्मन मानेंगे न माना है
सब दिल की शरारत है आँखों का बहाना है (जिगर मुरादाबादी)

हँसी मासूम सी बच्चों की कापी में इबारत सी
हिरन की पीठ पर बैठे परिन्दे की शरारत सी (बशीर बद्र)

हंगामा-ए-ग़म से तंग आकर इज़्हार-ए-मुसर्रत कर बैठे
मशहूर थी अपनी ज़िंदादिली दानिस्ता शरारत कर बैठे (शकील बँदायूनी)

मंजु जी, हमें इस बात की खुशी है कि आपको हमारी महफ़िल पसंद आती है। मौलिक सृजन करके लिखना आसान नहीं होता और यह हम जैसों से अधिक कौन जान सकता है :) । यह रहा आपका स्वरचित शेर:

उनकी अदाओं की शरारतों ने घायल कर दिया ,
अरे!हम तो उनसे दिल लगा ही बैठे .

शामिख जी, बड़ी देर से आपकी आमद हुई। कुछ और देर कर देते तो आपके ये शेर इस महफ़िल में पेश होने से छूट जाते:

गुल था शरारत करने लगा जब
तितली ने कोसा जा खार हो जा (हमारे श्याम सखा ’श्याम’ जी)

अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई,
मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई (गोपालदास 'नीरज')

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, August 20, 2009

प्यार में आता नहीं उसको गुंजाइशें करना- हुमैरा रहमान

सुनिए मशहूर ऊर्दू शायरा हुमैरा रहमान का साक्षात्कार

हम समय-समय पर कला, साहित्य और संस्कृति जगत की हस्तियों से आपको रूबरु करवाते रहते हैं। आज मिलिए प्रसिद्ध ऊर्दू शायरा हुमैरा रहमान से, जिनका नाम परवीन शाक़िर की परम्परा को आगे बढ़ाने के तौर पर भी लिया जाता है। हुमैरा रहमान जब दिल्ली में हुए एक अंतर्राष्ट्रीय मुशायरा 'जश्न-ए-बहारा' में भाग लेने भारत आई थीं तो हमारे साथी निखिल आनंद गिरि ने उनसे मुलाक़ात की और इंटरनेट की दुनिया का परिचय दिया। हुमैरा ने पूरे एक घंटे तक कविता (ग़ज़ल), हिन्दुस्तान-पाकिस्तान-अमेरिका, रिश्ते, शिक्षा, राजनीति और अपनी पसंद-नापसंद, अपने बचपन पर खुलकर बात की। कुछ ग़ज़लें भी कहीं, कुछ सलाहें भी दी। सुनिए और बताइए कि आपको यह साक्षात्कार कैसा लगा?




हुमैरा रहमान

हुमैरा रहमान ऊर्दू शायरी का एक चर्चित नाम है और एक अंतर्राष्ट्रीय चेहरा है। हुमैरा की बचपन से ही साहित्य में रुचि थी। स्नातक की पढ़ाई करने के दरम्यान गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ मुल्तान (पाकिस्तान) के स्टूडेंट यूनियन की ये महासचिव रहीं। कॉलेज के दिनों से ही ये ग़ज़लपाठ, कार्यक्रम-प्रबंधन से जुड़ी रहीं। कॉलेज से पहले के दिनों में (1969-70) इन्होंने महिलाओं के लिए 'बज़्म-ए-हरीम-ए-फ़न' नामक साहित्यिक संस्था का गठन किया और इसकी महासचिव रहीं। आगे इनका जुड़ाव रेडियो पाकिस्तान, कराची (1971-76) से हुआ, जहाँ इन्होंने रेडियो उद्‍घोषक और ड्रामा कलाकार के तौर पर अपनी सेवाएँ दीं। हुमैरा का नाम पाकिस्तान की शुरू के तीन महिला उद्‍घोषकों में भी लिया जाता है। सन 1977 में ये बीबीसी, लंदन से जुड़ गयीं, जहाँ इन्होंने एनांउसर, स्क्रिप्ट लेखक के तौर पर काम किया (1988 तक)।

बाद में यह न्यूयॉर्क चली आयीं जहाँ 1990 में न्यूयॉर्क स्थित यॉन्कर्स पब्लिक लाइबरेरी में ये मॉडरेटर हो गईं और पाकिस्तान की सांस्कृतिक विरासत को दुनिया की नज़र करने के लिए अनेक प्रोग्रेम किये। 1999 में न्यूयॉर्क की एशिया सोशायटी के लिए भी मॉडरेटर का काम किया। 2000-2002 तक इन्होंने वेस्टचेस्टर मुस्लिम सेंटर, न्यूयॉर्क में ऊर्दू भाषा अध्यापन का काम किया। पिछले 1 साल से न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में ऊर्दू भाषा की संयुक्त प्रशिक्षक के तौर पर काम कर रही हैं।

दुनिया भर के लगभग सभी नामी मुशायरों में हुमैरा रहमान काव्यपाठ कर चुकी हैं। देश-विदेश के रेडियो और टीवी कार्यक्रमों में अपनी ग़ज़लों के हवाले से लोगों के दिलों में अपना विशेष स्थान बना चुकीं हुमैरा की तीन पुस्तकें 'ज़ख़्म ज़ख़्म उजाला'(संपादन), 'इंदेमाल', 'इंतेसाब' भी प्रकाशित हैं।

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