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Tuesday, January 24, 2012

ब्लोग्गर्स चोईस विद रश्मि प्रभा - मेहमान है सलिल वर्मा

रश्मि प्रभा 

बड़ा जोर है सात सुरों में बहते आंसू जाते हैं थम. संगीत तो वाकई जादू है. दुःख हो सुख हो डूबती कश्ती हो ख्यालों के गीत सुकून देते हैं, राह देते हैं...मैं रश्मि प्रभा अब तक ब्लौगरों की कलम से आपको मिलवाती रही हूँ, इस मंच पर मैं उनकी पसंद के कम से कम 5 गाने आपको सुनाऊंगी, आप भी तो जानिए इनकी पसंद क्या है ! आँखें बन्द कर उनकी पसंद की लहरों में खुद को बहने दीजिये, और बताइए कैसा लगा...क्रम से लोग आ रहे हैं गीतों की खुशबू लिए - ये पहला नाम है सलिल वर्मा जी का,.... रुकिए रुकिए ब्लॉग प्रसिद्द 'चला बिहारी ब्लॉगर बनने' से आप ज्यादा परिचित हैं . थी तो मैं भी , पर ध्यान गया जब मैं बुलेटिन टीम में आई तो इनकी बगिया में भी सैर कर आई. घूमकर आई तो देखा बिहारी भाई बिहारी बहन के बगीचे में घूम रहे हैं .... मैंने पूछा - कौन ? , रश्मि दी .... इस संबोधन के बाद कुछ अनजाना नहीं रहता. लिखते तो सलिल जी बहुत ही बढ़िया हैं, आप मिले होंगे इनसे http://chalaabihari.blogspot.com/ पर . सोच पैनी, कलम ज़बरदस्त... और गानों की पसंद भी ज़बरदस्त.... तो अब देर किस बात की . ये रहे गाने और उनके लिए एक ख्याल सलिल जी के, कोई बिना सुने हटेगा नहीं -


ब्लॉगर सलिल वर्मा 
१. कोई दूर से आवाज़ दे चले आओ!
मेरी प्रिय गायिका गीता दत्त का गाया यह गीत फिल्म ‘साहब बीवी और गुलाम’ से है. हेमंत कुमार का संगीत दिल को छू जाता है. जब मैं यह फिल्म देखने गया था तो फिल्म बस शुरू हो चुकी थी. और मैं जैसे ही हॉल में घुसा यह गीत शुरू हुआ. मैं गीत समाप्त होने तक सीढ़ियों पर बैठा रह गया. जब गाना समाप्त हुआ तब लगा किसी ने झकझोरकर जगाया. मीना कुमारी और गीता दत्त एक दूसरे में ऐसे समाये दिखे हैं फिल्म के सभी गानों में कि दोनों में अंतर करना मुश्किल हो जाता है. शायद एक कॉमन व्यथा थी दोनों के बीच.

२. फिर वही शाम, वही गम, वही तन्हाई है:
तलत महमूद साहब का गया यह गाना फिल्म जहाँआरा फिल्म से है. मदन मोहन का मधुर संगीत और राजिंदर किशन साहब की उम्दा शायरी, जब तलत साहब की मखमली आवाज़ में गीत बनाकर ढलती है तो बस जादू का सा असर करती है. तलत साहब के गले की मुरकियां, जो उनकी खासियत थी, इस गाने में बड़ी गहराई से महसूस की जा सकती है.

३. ये दुनिया, ये महफ़िल, मेरे काम की नहीं:
हीर-रांझा फिल्म का यह गीत रफ़ी साहब ने गाया है. एक बार फिर मदन मोहन का संगीत और कैफी आज़मी साहब की शायरी. फिल्म में राजकुमार साहब परदे पर रांझा के अलग अलग रूप में नज़र आते हैं, पागल प्रेमी, साधू, मलंग या फ़कीर... रफ़ी साहब ने आवाज़ से जो असर पैदा किया है वो बिलकुल ऐसा लगता है जैसे तस्वीर खींच दी गयी हो. सुनने वाले को सिर्फ आँख बंद करना होता है और सारा दृश्य सामने हाज़िर हो जाता है. अगर सोचें कि रांझा ने यह गीत गया होता तो आवाज़ ज़रूर रफ़ी साहब की ही होती!!

४. दिल की गिरह खोल दो, चुप न बैठो:
मन्ना दे और लता मंगेशकर का गया यह युगल गीत फिल्म “रात और दिन” से है. मेरे प्रिय संगीतकार शंकर-जयकिशन की बनाई धुन. गाने की मिठास अपनी जगह मगर “महफ़िल में अब कौन है अजनबी..” गाते समय लता जी और मन्ना दे जब सुर को नीचे से उठाकर ऊपर के सुर तक ले जाते हैं तो आवाज़ की मिठास को बनाए रखते हुए गाने में एक जादुई असर पैदा होता है. यह गाना रोमांटिक युगल गीतों में एक मील का पत्थर है और नरगिस की अदाकारी की बुलंदी का नमूना भी.

५. परबतों के पेड़ों पर, शाम का बसेरा है:
साहिर साहब के लिखे इस गाने को अगर एक पेंटिंग कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी. पूरी शायरी में शाम की जो तस्वीर खींची है उन्होंने, वो किसी कनवास पर बनी पेंटिंग सी लगती है. खय्याम साहब की बनाई धुन फिल्म ‘शगुन’ से और आवाज़ मुहम्मद रफ़ी के साथ प्यारी आवाज़ की मलिका सुमन कल्यानपुर की. गीत में सुमन जी की आवाज़ इतनी भोली लगती है मानो शाम के धुंधलके में घुली जा रही हो! अगर कोई बोलती हुयी पेंटिंग देखनी सुननी हो तो बस आँखें बंद करके यह गाना सुनने से ज़्यादा कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं.

सुनिए हमारे आज के ब्लॉगर की पसंद के ये सभी गीत, क्रमबद्ध इस प्लेयर में -



अगली पेशकश के लिए रहिये बेताब ... और सुनिए - कल की हंसीं मुलाकात के लिए....

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