Sunday, June 24, 2018

राग पूरियाधनाश्री : SWARGOSHTHI – 375 : RAG PURIYADHANASHRI






स्वरगोष्ठी – 375 में आज

राग से रोगोपचार – 4 : दिन के चौथे प्रहर का राग पूरियाधनाश्री

उच्चरक्तचाप, धड़कन और अपच का निदान छुपा है पूरियाधनाश्री के स्वरों में




पण्डित भीमसेन जोशी
उस्ताद अमीर  खाँ
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृति की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गातन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ताविकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे हैं। श्रृंखला के चौथे अंक में आज हम राग पूरियाधनाश्री के स्वरो से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको सुविख्यात गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में राग पूरियाधनाश्री में निबद्ध दो खयाल रचना सुनवाएँगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार फिल्म “बैजू बावरा” से उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में इस राग में पिरोया एक गीत भी प्रस्तुत करेंगे।



राग पूरियाधनाश्री को सायंकाल 6 बजे से 7 बजे तक गाने-बजाने का चलन है। इसका वादी स्वर पंचम तथा संवादी स्वर षडज होता है। इस राग के आरोह में नि, रे॒, ग, म॑, प, म॑, ध॒, नि सां और अवरोह में रे॒, नि, ध॒, प, म॑, ग, म॑, रे॒, ग, रे॒, सा स्वर लगते हैं। नि, रे॒, ग, स्वरों से उम्मीद, रे॒, ग, म॑, रे॒, ग, स्वरों से मायूसी के साथ इन्तजार तथा प, म॑, ध॒, प, स्वरों से कटु अनुभव का भाव उत्पन्न होता है। म॑, ग, म॑, रे॒, ग, स्वर समूह से अनुभव दुखदायी होता है, किन्तु ईश्वर पर भरोसा का भाव जागृत होता है। रे॒, सा स्वर निराशा में आशा की उम्मीद जगाता है। चिन्ताविकृति से ग्रस्त व्यक्ति की मनोदशा उक्त स्वरों द्वारा स्पष्ट होती है। डिप्रेशन में भी ऐसी अनुभूति हो सकती है। यदि सुरीला गायक या वादक उक्त मनःस्थिति से ग्रस्त हो जाए तो स्वरयोग विधि से राग पूरियाधनाश्री की साधना करे तो उन्हें मानसिक शान्ति प्राप्त हो सकती है। एक माह तक यदि उपरोक्त प्रक्रिया को पूर्ण कर लिया जाए तो विश्वास है कि राग की सकारात्मक, सार्थक और संवेदनशील स्वरावलियों की नादात्मक परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से उक्त मानसिक समस्याओं तथा उनके कारण उत्पन्न मनोदैहिक समस्याओं; उच्चरक्तचाप, धड़कन, अपच आदि अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है। यदि समस्याग्रस्त कोई संगीत-प्रेमी है तो उसे राग पूरियाधनाश्री के गायन अथवा वादन की रिकार्डिंग का एक माह तक श्रवण करना चाहिए, अवश्य लाभ होगा। अब हम राग पूरियाधनाश्री में निबद्ध दो खयाल; “अरज सुनो पार करो...” और “पायलिया झनकार मोरी...” प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे सुविख्यात गायक पण्डित भीमसेन जोशी ने स्वर दिया है।

राग पूरियाधनाश्री : “अरज सुनो...” और “पायलिया झनकार मोरी...” : पण्डित भीमसेन जोशी


पूर्वी थाट के विभिन्न रागों में राग पूरियाधनाश्री एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है। राग पूर्वी की तरह राग पूरियाधनाश्री भी सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर इस्तेमाल किये जाते हैं। इसका ऋषभ और धैवत स्वर कोमल होता है तथा मध्यम स्वर तीव्र होता है। आरोह के स्वर- नि, रे(कोमल), ग, म॑(तीव्र), प, (कोमल), प, नि, सां और अवरोह के स्वर- रे(कोमल), नि, (कोमल), प, म॑(तीव्र), ग, म॑(तीव्र), रे(कोमल), ग, रे(कोमल), सा होते हैं। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। राग पूरियाधनाश्री के गायन-वादन के लिए चौथा प्रहर अर्थात सायंकाल सन्धिप्रकाश के समय को उपयुक्त माना जाता है। राग पूरियाधनाश्री दो रागों; पूरिया और धनाश्री का मिश्रण है। प्रचलित राग धनाश्री काफी थाट का राग है, जिसमे गान्धार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। अतः अधिकतर संगीतज्ञ राग पूरियाधनाश्री को एक स्वतंत्र राग मानते हैं। हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव लिखित पुस्तक ‘राग परिचय’, भाग – 3 में इस राग के बारे में एक तथ्य का उल्लेख है। इसके अनुसार पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे कृत ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’ के चौथे भाग में इस राग का वादी-संवादी क्रमशः पंचम और ऋषभ माना गया है। हम सभी जानते हैं कि वादी-संवादी में षडज-पंचम भाव अथवा षडज-मध्यम भाव का होना आवश्यक है। पंचम और ऋषभ में इनमें से कोई भाव नहीं है। इस दृष्टि से कोमल ऋषभ का संवादी होना उचित नहीं है। इस राग में कोमल ऋषभ स्वर पर कभी भी न्यास नहीं किया जाता। इस दृष्टि से भी ऋषभ का संवादी होना उचित नहीं है। कोमल ऋषभ के स्थान पर षडज स्वर को संवादी मानना न्यायसंगत है। कुछ विद्वान पंचम को वादी और षडज को संवादी मानते हैं। आइए, अब आप 1952 में प्रदर्शित फिल्म “बैजू बावरा” से राग पूरियाधनाश्री में पिरोया एक गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में सुनिए। फिल्म के लगभग सभी गीत विभिन्न रागों पर आधारित हैं। इस फिल्म के संगीतकार नौशाद हैं। आप इस गीत का आनन्द लीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने  की अनुमति दीजिए।

राग पूरियाधनाश्री : “तोरी जय जय करतार...” : उस्ताद अमीर खाँ : फिल्म – बैजू बावरा



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 375वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सातवें दशक की एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 380वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस युगल-गीत में किस गायक और गायिका के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 30 जून, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 377वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 373वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म “दिल की राहें” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मधुवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, कोटा, राजस्थान से तुलसी राम वर्मा, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की चौथी कड़ी में आपने कुछ शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग पूरियाधनाश्री का परिचय प्राप्त किया और इस राग में पिरोया दो खयाल पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही इसी राग पर आधारित फिल्म “बैजू बावरा” से नौशाद का संगीतबद्ध एक फिल्मी गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग पूरियाधनाश्री : SWARGOSHTHI – 375 : RAG PURIYADHANASHRI : 24 जून, 2018


Tuesday, June 19, 2018

मन का उजाला - सीमा सिंह

बोलती कहानियाँ स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में विनोद नायक की लघुकथा "दवा और दुआ" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम लेकर आये हैं सीमा सिंह की सेतु लघुकथा प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित लघुकथा: मन का उजाला, जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

लघुकथा का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 4 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। इस लघुकथा का गद्य सेतु पत्रिका पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

सीमा सिंह
सेतु, दैनिक जागरण, दैनिक ट्रिब्यून, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान, महानगर मेल, शोध-दिशा, हस्ताक्षर, अटूट बंधन, सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन

हर सप्ताह सुनिए एक नयी कहानी

“मुन्ना, ओ मुन्ना! अरे सो गया क्या?” उसने बेटे को पुकारा, पर कोई प्रत्युत्तर न पा, कमरे में झाँका।
(सीमा सिंह की "मन का उजाला" से एक अंश)



नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाउनलोड कर लें:
मन का उजाला MP3

#Eleventh Story, Man Ka Ujala: Seema Singh/Hindi Audio Book/2018/11. Voice: Anurag Sharma

Sunday, June 17, 2018

राग मधुवन्ती : SWARGOSHTHI – 374 : RAG MADHUVANTI






स्वरगोष्ठी – 374 में आज

राग से रोगोपचार – 3 : तीसरे प्रहर का राग मधुवन्ती

चरम सीमा तक पहुँची निराशा और चिन्ताविकृति को दूर करने में सहयोगी है राग मधुवन्ती




पण्डित रविशंकर
लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृत की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गातन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ताविकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे हैं। श्रृंखला के तीसरे अंक में आज हम राग मधुवन्ती के स्वरो से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको राग मधुवन्ती में सितार पर एक रचना सुनवाएँगे जिसे पण्डित रविशंकर ने प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार लता मंगेशकर के स्वर में राग मधुवन्ती पर आधारित फिल्म “दिल की राहें” का एक गीत भी प्रस्तुत करेंगे।



राग मधुवन्ती में कोमल गान्धार, तीव्र माध्यम, शुद्ध निषाद, शुद्ध धैवत और शुद्ध ऋषभ का प्रयोग होता है। इसके आरोह के स्वर हैं; नि, सा, ग॒, म॑, प, नि, सां और अवरोह के स्वर हैं; सां, नि, ध, प, म॑, ग॒, रे, सा। राग मुल्तानी के कोमल ऋषभ और कोमल धैवत स्वरों को शुद्ध स्वरों में परिवर्तित किया जाए तो राग मधुवन्ती का दर्शन होता है। इस राग के स्वर; ग॒, म॑, प, ग॒, व्यक्ति को निराशा का अनुभव कराने के पश्चात; ग॒, रे, सा स्वर उम्मीद का बोध कराते हैं। दिन के पूर्वाह्न और मध्याह्न में काफी परिश्रम करने के बाद भी जब निराशा दिखाई पड़ती है, मनोबल डगमगाने लगता है, तब मधुवन्ती के स्वर उसे दिलासा और सहानुभूति प्रदान करके सही दिशा दिखाते हैं और मनोबल को सशक्त करते हैं। इसके गायन और वादन का सटीक समय दिन में 3 बजे से 3-30 बजे तक है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। व्यक्ति का डिप्रेशन, चिन्ताविकृति और निराशा जब चरम सीमा पर हो तो राग मधुवन्ती के गायन, वादन अथवा श्रवण का सेवन यदि कराया जाए तो अवश्य शान्ति मिलेगी। इस राग के स्वर पीड़ित की असामान्य मनःस्थिति रूपी बर्फ को अपनी शीतल आँच से धीरे-धीरे पिघला देंगे और उसे शान्ति मिलेगी। उपचार की यह प्रक्रिया कम से कम एक माह तक जारी रखें। आइए, अब हम आपको सितार पर बजाया राग मधुवन्ती की एक रचना सुनवाते हैं। विश्वविख्यात संगीतज्ञ और सितार वादक पण्डित रविशंकर ने इसे प्रस्तुत किया है।

राग मधुवन्ती : सितार पर आलापचारी और गत : पण्डित रविशंकर


राग मधुवन्ती का सम्बन्ध तोड़ी थाट से मान लिया जाता है। इसमें गान्धार स्वर कोमल, मध्यम स्वर तीव्र और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित होता है तथा अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए इस राग की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। राग मधुवन्ती का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। इसके गायन और वादन का समय दिन के तीसरे प्रहर में माना जाता है। राग मधुवन्ती एक नया राग है, जिसकी रचना राग मुल्तानी में ऋषभ और धैवत स्वर को कोमल से शुद्ध करने से हुई है। वर्तमान समय में यह राग मुल्तानी की अपेक्षा अधिक लोकप्रिय है। राग मुल्तानी के समान इस राग में भी मन्द्र निषाद स्वर से आगे बढ़ते समय गान्धार स्वर पर मध्यम स्वर का कण लेने के बाद ही ऊपर बढ़ते हैं। इस राग के वादी-संवादी और गायन-वादन समय में विरोधाभास है। वादी-संवादी की दृष्टि से यह उत्तरांग प्रधान राग होना चाहिए, किन्तु गायन समय की दृष्टि से यह पूर्वांग प्रधान राग है। राग की रंजकता बढ़ाने के लिए कभी-कभी अवरोहात्मक स्वरों में कोमल निषाद का अल्प प्रयोग कर लिया जाता है। थाट की दृष्टि यह दस थाट में से किसी भी थाट के अनुकूल नहीं है, फिर भी इसे तोड़ी थाट का राग मान लिया गया है। दक्षिण भारतीय संगीत प्रणाली में राग मधुवन्ती धर्मावती मेल के उपयुक्त है। कुछ विद्वान इसे राग अम्बिका नाम से भी पुकारते हैं। अब हम आपको वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म “दिल की राहें” से राग मधुवन्ती पर आधारित एक गीत लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। गीतकार नक्श लायलपुरी के लिखे इस गीत के संगीतकार मदन मोहन हैं। गीत के आरम्भ में मदन मोहन की आवाज़ में गीत की भावाभिव्यक्ति प्रस्तुत की गई है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग मधुवन्ती : “रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएँ तो निभाएँ कैसे...” : लता मंगेशकर : फिल्म – दिल की राहें



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 374वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छठे दशक की एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 380वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस उस्ताद गायक के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 23 जून, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 376वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 372वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1971 में प्रदर्शित फिल्म “शर्मीली” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – पटदीप, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – रूपकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की तीसरी कड़ी में आपने कुछ शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग मधुवन्ती का परिचय प्राप्त किया और इस राग में पिरोया पंडित रविशंकर के सितार पर आलापचारी और एक गत का रसास्वादन किया। इसके साथ ही इसी राग पर आधारित फिल्म “दिल की राहें” का एक फिल्मी गीत कोकिलकण्ठी लता मंगेशकर के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग मधुवन्ती : SWARGOSHTHI – 374 : RAG MADHUVANTI : 17 जून, 2018

Saturday, June 16, 2018

चित्रकथा - 73: गीतकार आनन्द बक्शी के सुपुत्र राकेश बक्शी से बातचीत (भाग-2)

अंक - 73

गीतकार आनन्द बक्शी के सुपुत्र राकेश बक्शी से बातचीत (भाग-2)


"ज़िंदगी के सफ़र में..." 




रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। आज इस स्तंभ के माध्यम से हम आपसे मिलवाने जा रहे हैं हिन्दी सिने-संगीत जगत के सुप्रसिद्ध और लोकप्रियतम गीतकारों में से एक, आनद बक्शी के सुपुत्र राकेश बक्शी से। राकेश आनन्द बक्शी के नाम से अपना परिचय देने वाले राकेश जी बहुत ही उदारता का परिचय देते हुए ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की इस प्रस्तुति के लिए आपके इस दोस्त से लम्बी बातचीत की थी वर्ष 2011 में। ’ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष’ और ’बातों बातों में’ स्तंभों में पूर्वप्रकाशित यह साक्षात्कार हम आपके लिए फिर एक बार प्रस्तुत कर रहे हैं इस उद्येश्य से कि हमारे बहुत से पाठक जो हाल के वर्षों में हमसे जुड़े हैं, वो इस साक्षात्कार का आनन्द उठा सके। तो आइए प्रस्तुत है बक्शी साहब के बेटे राकेश बक्शी से सुजॉय चटर्जी की लम्बी बातचीत के संपादित अंश। आज पेश है इस बातचीत का दूसरा व अंतिम  भाग।



राकेश जी, अच्छा क्या ऐसा कभी हुआ कि आप ने जाने अंजाने उन्हें कोई गीत लिखने का सुझाव दिया हो या आपने कोई मुखड़ा या अंतरा सुझाया हो? या उन्होंने कभी आप बच्चों से पूछा हो कि भई बताओ, इस गीत को किस तरह से लिखूँ?

नहीं, कभी भी नहीं! लेकिन मुझे मालूम है कि एक गीत है १९८७ की फ़िल्म 'हिफ़ाज़त' का, "बटाटा वडा, बटाटा वडा, प्यार नहीं करना था, करना पड़ा"।

हा हा हा

यह गीत उन्होंने इसलिए लिखा था क्योंकि उनकी पोती को बटाटा वडा बहुत ज़्यादा पसंद थी।

क्या आप कभी रपने पिताजी के साथ रेकॉर्डिंग्‍ पर जाते थे?

जी हाँ, मैं रेकॉर्डिंग्‍ पर जाता था। और बहुत ही अच्छा अनुभव होता था और मुझे बहुत गर्व होता था। लेकिन साथ ही साथ अंतर्मुखी होने की वजह से मैं म्युज़िशियन्स, कम्पोज़र्स और सिंगर्स से शर्माता था और वो लोग मुझे प्यार करते थे। कुछ लोग तो बिना यह जाने कि मैं किनका बेटा हूँ, मुझे प्यार करते।

राकेश जी, आनंद बक्शी वो गीतकार हैं जिन्होंने फ़िल्मों में सब से ज़्यादा गीत लिखे हैं। इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि वो बहुत ज़्यादा व्यस्त भी रहते होंगे। तो किस तरह से वो 'वर्क-लाइफ़ बैलेन्स' को मेण्टेन करते थे? परिवार के लिए समय निकाल पाना क्या मुश्किल नहीं होता था?

वो सुबह ७ बजे से सुबह ११ बजे तक, और फिर शाम ४ बजे से रात ९ बजे तक लिखते थे। रात ९ बजे के बाद उनका समय हमारे लिए होता था। रात १०:३० बजे वो खाना खाते थे, और ९ से १०:३० तक का समय वो हमें देते थे। वो हमें ढेर सारी कहानियाँ सुनाते थे अपनी ज़िंदगी के तमाम तजुर्बों की, और तमाम उर्दू के उपन्यासों की, अंग्रेज़ी उपन्यासों की। वो रोज़ाना Readers' Digest पढ़ते थे। वो कहा करते थे कि हर किसी को हर रोज़ कोई न कोई नई चीज़ पढ़नी चाहिये। जिसने यह काम किसी रोज़ नहीं किया, तो उसने जीना छोड़ दिया। वो हर रोज़ एक नई कहानी पढ़ते थे। और शायद यही वजह है कि उन्हें फ़िल्मी कहानियों और दृश्यों की इतनी अच्छी समझ थी। बहुत से निर्माता और निर्देशक अपनी फ़िल्म के रिलीज़ होने से पहले पिताजी को अपनी फ़िल्म दिखाते थे ताकि वो अपने विचार और सुझाव उनके सामने रख सकें।

आपने बताया कि बक्शी साहब को पढ़ने का बेहद शौक था और रोज़ नई कहानी पढ़ते थे। किन किन लेखकों की किताबें उन्हें ज़्यादा पसंद थी?

सिडनी शेल्डन और डैनियल स्टील। वो कुछ उर्दू मासिक पत्रिकाएँ भी पढ़ते थे, ख़ास कर दिल्ली के शमा ग्रूप के। Readers' Digest उनकी पहली पसंद थी। He believed any person who has not read anything new in 24 hours, has nothing to contribute to society, to life.

अब मैं एक सवाल मैं आपसे पूछना चाहूँगा अगर आप उसे अन्यथा न लें तो।

पूछिये।

क्या आपको लगता है कि बक्शी साहब के इतने ज़्यादा गीत लिखने की वजह से उनके लेखन के स्तर में उसका असर पड़ा है? क्या आपको लगता है कि अगर वो क्वाण्टिटी के बदले क्वालिटी पर ज़्यादा ध्यान देते तो और उम्दा काम हुआ होता?

हाँ, कभी कभी मैं इस बात को मानता हूँ। मैं उन्हें पूछता भी था कि वो कुछ निर्देशकों के लिए हमेशा अच्छे गीत लिखते और कुछ निर्देशकों के लिए हमेशा बुरे गीत लिखते, ऐसा क्यों? और उनका जवाब होता कि कुछ निर्देशक उनके पास अच्छी कहानी और सिचुएशन लेकर आते थे, अच्छे किरदार लेकर आते थे, और उससे उनको प्रेरणा मिलती थी अच्छा गीत लिखने की। यानी वो यह कहना चाहते थे कि वो सिर्फ़ आइने का काम करते थे, जो जैसी चीज़ लेकर उनके पास आते थे, वो वैसी ही चीज़ उन्हें वापस करते।

अच्छा राकेश जी, आपने बताया कि आपका इम्पोर्ट का बिज़नेस था। क्या आपके परिवार के किसी और सदस्य ने बक्शी साहब के नक्श-ए-क़दम पर चलने का प्रयास किया है?

मैं ख़ुद एक राइटर-डिरेक्टर हूँ, और कोशिश कर रहा हूँ मेरी पहली हिंदी फ़ीचर फ़िल्म बनाने की। और कोई इस लाइन में नहीं है। मेरा भाई फ़ाइनन्शियल मार्केट में है, मेरी दो बहनों की शादी हो चुकी है वो अपना अपना घर सम्भालती है।

यह तो बहुत अच्छी बात है कि आप फ़िल्म-निर्माण में क़दम रख रहे हैं। लेकिन इस राह में आपने कुछ अनुभव भी हासिल किये हैं? 

जी हाँ, इस लाइन में मैने अपना करीयर १९९९ में शुरु किया था। इस वर्ष मैंने दो स्क्रिप्ट्स लिखे - सिनेविस्टा कम्युनिकेशन्स के लिए टीवी धारावाहिक 'सबूत', और धारावाहिक 'हिंदुस्तानी' में मैंने बतौर प्रथम सहायक निर्देशक काम किया। इसी साल फ़रवरी और अगस्त के दरमीयाँ मैं 'मुक्ता आर्ट्स' में बतौर सहायक निर्देशक काम किया, उनकी फ़िल्म 'ताल' में।

'मुक्ता आर्ट्स' यानी कि सुभाष घई की बैनर?

जी हाँ। 'ताल' में मैं 'शॉट कण्टिन्युइटी' के लिए ज़िम्मेदार था, और एडिटिंग्‍ के वक़्त डिरेक्टर के साथ तथा 'प्रीमिक्स' व 'फ़ाइनल मिक्स' में ऐसोसिएट डिरेक्टर के साथ था। फिर 'मुक्ता आर्ट्स' की ही अगली फ़िल्म 'यादें' में कास्टिंग्‍ और शेड्युलिंग्‍ से जुड़ा था, और तमाम तकनीकी पक्ष संभाला था।

यह तो थी फ़िल्म-निर्माण के तकनीकी पक्षों में आपका अनुभव। आपने यह भी बताया कि आप लिखते भी हैं। तो इस ओर आपने अब तक क्या काम किया है?

साल २००३ में मैंने निर्माता वाशु भगनानी के लिए अंग्रेज़ी में एक ऑरिजिनल फ़िल्म-स्क्रिप्ट लिखी, जिसका शीर्षक था 'दि इमिग्रैण्ट'। इसी के हिंदी ऐडप्टेशन पर बनी हिंदी फ़िल्म 'आउट ऑफ़ कण्ट्रोल'। मेरी खुद की लिखी और मेरे ही द्वारा बनाई और निर्देशित जो लघु फ़िल्में हैं, उनके नाम हैं - 'कीमत - दि वैल्यु', 'एनफ़ - वी आर नेवर टू पूओर टू शेयर', 'आइ विल बी देयर फ़ॉर यू - कीपिंग्‍ लव अलाइव' और 'सीकिंग्‍ - इन सर्च ऑफ़ ब्यूटी'। २००३ में ही मैं एक हिंदी लघु फ़िल्म में निर्देशक अभय रवि चोपड़ा के साथ मिलकर उसकी स्क्रिप्ट लिखी, जिसका शीर्षक था 'इण्डिया, १९६४'। अभय की यह फ़िल्म 'दि न्यु यॉर्क स्कूल ऑफ़ विज़ुअल आर्ट्स' में उनके ग्रैजुएशन यीअर की फ़िल्म थी। इस फ़िल्म को 'स्टुडेण्ट्स ऑस्कर' के लिए नामांकन मिला था। फ़िल्म में अभिनय है रणबीर ऋषी कपूर और शरद सक्सेना का।

वाह! अच्छा सुभाष घई के साथ और किन किन फ़िल्मों में आपने काम किया था?

स्क्रिप्ट-रीडिंग्‍ और स्क्रिप्ट-एडिटिंग्‍ में मैंने उन्हें ऐसिस्ट किया 'एक और एक ग्यारह', 'जॉगर्स पार्क', 'ऐतराज़', 'इक़बाल' और '३६ चायना टाउन' में। 'किस्ना' में मैं स्क्रिप्ट-ऐसिस्टैण्ट था जिसमें मैंने सचिन भौमिक, फ़ारुख़ धोंडी और सुभाष घई के साथ स्क्रिप्ट-कूओर्डिनेशन का काम किया। 

बहुत ख़ूब! आपने ज़िक्र किया था कि आप अपनी पहली हिंदी फ़ीचर फ़िल्म की राह पर बढ़ रहे हैं। इसके बारे में कुछ बताइये।

फ़िल्म का नाम है 'फ़ितरत', जिसका मैं राइटर-डिरेक्टर हूँ। कास्ट की तलाश कर रहा हूँ। इसके अलावा एक ऐडवेंचर थ्रिलर 'एवरेस्ट' भी प्लान कर रहा हूँ। मैंने एक ऐनिमेशन फ़िल्म 'लिबर्टी टेकेन' को लिखा व निर्देशित भी किया है।

बहुत सही है! और हमारी आपके लिए यह शुभकामना है कि आप एक बहुत बड़े फ़िल्म-मेकर बने और अपने पिता से भी ज़्यादा आपका नाम हो, और आप उनके नाम के मशाल को और आगे लेकर जा सकें।

बहुत शुक्रिया!

राकेश जी, बक्शी साहब एक आला दर्जे के गीतकार तो थे ही, पर हमने सुना है कि वो गाते भी अच्छा थे?

बक्शी जी को गायन से प्यार था और अपने आर्मी और नेवी के दिनों में अपने साथियों को गाने सुना कर उनका मनोरंजन करते थे। और आर्मी में रहते हुए ही उनके साथियों ने उनको गायन के लिए प्रोत्साहित किया। उन साथियों ने उन्हें बताया कि वो अच्छा गाते हैं और बहुत अच्छा लिखते हैं, इसलिए उन्हें फ़िल्मों में अपनी क़िस्मत आज़मानी चाहिये। मेरा ख़याल है कि वहीं पे उनके सपनों का बीजारोपण हो गया था। आर्मी के थिएटर व नाटकों में वो अभिनय भी करते थे और गीत भी गाते थे। फ़िल्मी पार्टियों में नियमीत रूप से वो अपनी लिखी हुई कविताओं और गीतों को गा कर सुनाते थे।

वाह! अच्छा, ये तो आपने बताया कि किस तरह से वो सेना में रहते समय साथियों के लिए गाते थे। लेकिन फ़िल्मों में उन्हें बतौर गायक कैसे मौका मिला?

दरसल क्या हुआ कि पिताजी अक्सर अपने गीतों को प्रोड्युसर-डिरेक्टर्स को गा कर सुनाया करते थे। ऐसे में एक दिन मोहन कुमार साहब ने उन्हें गाते हुए सुन लिया और उन्हें ज़बरदस्ती अपनी फ़िल्म 'मोम की गुड़िया' में दो गीत गाने के लिए राज़ी करवा लिया। इनमें से एक सोलो था और एक लता जी के साथ डुएट।

जी हाँ, और क्या ग़ज़ब का गीत था वह। उनकी आवाज़ भले ही हिंदी फ़िल्मी नायक की आवाज़ न हो, लेकिन कुछ ऐसी बात है उनकी आवाज़ में कि सुनते हुए दिल को अपने मोहपाश में बांध लेती है।

पता है "बाग़ों में बहार आयी" गीत की रेकॉर्डिंग्‍ पर वो बहुत सज-संवरकर गये थे। जब उनसे यह पूछा गया कि इतने बन-ठन के क्यों आये हैं, तो उन्होंने कहा कि पहली बार लता जी के साथ गाने का मौका मिला है, इसलिए यह उनके लिए बहुत ख़ास मौका है ज़िंदगी का।

बहुत सही है!

लेकिन वो लोगों के सामने गाने से कतराते थे। पार्टियों में वो तब तक नहीं गाते जब तक उनके दोस्त उन्हें गाने पर मजबूर न कर देते। पर एक बार गाना शुरु कर दिया तो लम्बे समय तक गाते रहते।

राकेश जी, बक्शी साहब ने हज़ारों गीत लिखे हैं, इसलिए अगर मैं आपसे आपका पसंदीदा गीत पूछूँ तो शायद बेवकूफ़ी वाली बात होगी। बताइये कि कौन कौन से गीत आपको बहुत ज़्यादा पसंद है आपके पिताजी के लिखे हुए?

"मैं शायर तो नहीं" (बॉबी), "गाड़ी बुला रही है" (दोस्त), "एक बंजारा गाये" (जीने की राह), "अच्छा तो हम चलते हैं" (आन मिलो सजना), "आदमी जो कहता है" (मजबूर), "ज़िंदगी हर क़दम एक नई जंग है" (मेरी जंग), "ये रेश्मी ज़ुल्फ़ें" (दो रास्ते), "हमको तुमसे हो गया है प्यार क्या करें" (अमर अकबर ऐन्थनी), "भोली सी सूरत आँखों में मस्ती" (दिल तो पागल है), और इसके अलवा और ३०० गीत होंगे जहाँ तक मेरा अनुमान है।

इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं!

उनके गीतों में गहरा दर्शन छुपा होता था। उनके बहुत से चाहनेवालों और निर्माता-निर्देशकों ने मुझे बताया और अहसास दिलाया कि सरल से सरल शब्दों के द्वारा भी वो गहरी से गहरी बात कह जाते थे। उनके लिखे तमाम गीत ले लीजिये, जैसे कि "चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाये", "यहाँ मैं अजनबी हूँ", "रोते रोते हँसना सीखो, हँसते हँसते रोना", "ज़िंदगी हर कदम एक नई जंग है", "तुम बेसहारा हो तो किसी का सहारा बनो", "गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है", "कैसे जीते हैं भला हम से सीखो ये अदा", "दुनिया में कितना ग़म है, मेरा ग़म कितना कम है", "ज़िंदगी क्या है एक लतीफ़ा है", "आदमी मुसाफ़िर है" (जिसके लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला था), "दुनिया में रहना है तो काम कर प्यारे", "शीशा हो या दिल हो टूट जाता है", "ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मकाम, वो फिर नहीं आते", "माझी चल, ओ माझी चल", "हाथों की चंद लकीरों का, ये खेल है सब तकदीरों का", "चिट्ठी न कोई संदेस, जाने वो कौन सा देस, जहाँ तुम चले गये", "इक रुत आये इक रुत जाये, मौसम बदले, ना बदले नसीब", "जगत मुसाफ़िरखाना है", "आदमी जो कहता है", "दुनिया में ऐसा कहाँ सबका नसीब है", और भी न जाने कितने कितने उनके दार्शनिक गीत हैं जो कुछ न कुछ संदेश दे जाते हैं ज़िंदगी के लिए।

बिलकुल बिलकुल! अच्छा राकेश जी, आपने बहुत सारे गीतों का ज़िक्र किया। अब हम आपसे कुछ चुने हुए गीतों के बारे में जानना चाहेंगे जिनके साथ कुछ न कुछ ख़ास बात जुड़ी हुई है। इस तरह के कुछ गीतों के बारे में बताना चाहेंगे?

उनका लिखा गीत है 'बॉबी' का "मैं शायर तो नहीं"। वो मुझे कहते थे और बहुत से लेखों में भी मैंने उन्हें कहते पढ़ा है कि वो अपने आप को एक शायर नहीं, बल्कि एक गीतकार मानते थे, साहिर साहब को वो शायर मानते थे। 'अमर प्रेम' के गीत "कुछ तो लोग कहेंगे" को ही ले लीजिये; जावेद साहब इस कश्मकश में थे कि क्या उन्हें अपनी शादी को तोड़ कर एक नया रिश्ता कायम कर लेनी चाहिये, और इस गीत ने उन्हें परिणाम की परवाह किये बिना सही निर्णय लेने में मददगार साबित हुई। जावेद साहब से ही जुड़ा एक और क़िस्सा है, "ज़िंदगी के सफ़र में" गीत को सुनने के बाद जावेद साहब ने पिताजी से वह कलम माँगी जिससे उन्होंने इस गीत को लिखा था। पिताजी ने अगले दिन उन्हें दूसरा कलम भेंट किया। जावेद साहब ने ऐसा कहा था कि अगर यह दुनिया उन्हें एक सूनसान द्वीप में अकेला छोड़ दे, तो केवल इस गीत के सहारे वो अपनी ज़िंदगी के बाक़ी दिन काट सकते हैं।

वाक़ई एक लाजवाब गीत है, और मैं समझता हूँ कि यह गीत एक यूनिवर्सल गीत है, और हर इंसान को अपने जीवन की छाया इस गीत में नज़र आती होगी। "कुछ लोग जो सफ़र में बिछड़ जाते हैं, वो हज़ारों के आने से मिलते नहीं, बाद में चाहे लेके पुकारा करो उनका नाम, वो फिर नहीं आते", कमाल है!!! राकेश जी, बहुत अच्छा लग रहा है जो आप एक एक गीत के बारे में बता रहे हैं, और भी कुछ इसी तरह के क़िस्सों के बारे में बताइये न!

"नफ़रत की दुनिया को छोड़ के प्यार की दुनिया में", इस गीत में एक अंतरा है "जब जानवर कोई इंसान को मारे.... एक जानवर की जान आज इंसानो ने ली है, चुप क्यों है संसार", पिताजी कभी भी मुझे किसी पंछी को पिंजरे में क़ैद करने नहीं दिया, कभी मछली को अक्वेरियम में सीमाबद्ध नहीं करने दिया। वो कहते थे कि क्योंकि वो ब्रिटिश शासन में रहे हैं और उन्हें इस बात का अहसास है कि ग़ुलामी क्या होती है, इसलिए वो कभी नहीं चाहते कि किसी भी जीव को हम अपना ग़ुलाम बनायें।

वाह! राकेश जी, चलते चलते अब हम आपसे जानना चाहेंगे बक्शी साहब के लिखे उन गीतों के बारे में जो उन्हें बेहद पसंद थे।

यहाँ भी एक लम्बी लिस्ट है, कुछ के नाम गिना देता हूँ - "मैंने पूछा चांद से" (अब्दुल्ला), "परदेसियों से न अखियाँ मिलाना" (जब जब फूल खिले), "चिंगारी कोई भड़के" (अमर प्रेम), "मेरे दोस्त क़िस्सा ये क्या हो गया" (दोस्ताना), "डोली ओ डोली", "खिलौना जान कर तुम तो", "जब हम जवाँ होंगे", "बाग़ों में बहार आयी", "मैं ढूंढ़ रहा था सपनों में", "सुन बंटो बात मेरी", "जिंद ले गया वो दिल का जानी", "वो तेरे प्यार का ग़म", "सावन का महीना पवन करे सोर", "राम करे ऐसा हो जाये", "जिस गली में तेरा घर न हो बालमा", "ज़िंदगी के सफ़र में", "मेरे नसीब में ऐ दोस्त तेरा प्यार नहीं", "प्रेम से क्या एक आँसू", "दीवाने तेरे नाम के खड़े हैं दिल थाम के", "क्या कोई सूरत इतनी ख़ूबसूरत हो सकती है", "तेरे नाम के सिवा कुछ याद नहीं", "दुनिया में कितना ग़म है", "आज दिल पे कोई ज़ोर चलता नहीं", "चिट्ठी आयी है", "पनघट पे परदेसी आया", "मैं आत्मा तू परमात्मा", "घर आजा परदेसी तेरा देस बुलाये रे", "जब जब बहार आयी", "कुछ कहता यह सावन", "वो क्या है, एक मंदिर है", "हर एक मुस्कुराहट मुस्कान नहीं होती", "यहाँ मैं अजनबी हूँ", "मैं तेरी मोहब्बत को रुसवा करूँ तो", आदि।

राकेश जी, क्या बताऊँ, किन शब्दों से आपका शुक्रिया अदा करूँ समझ नहीं आ रहा। इतने विस्तार से आपने बक्शी जी के बारे में हमें बताया कि उनकी ज़िंदगी के कई अनछुये पहलुओं से हमें अवगत कराया। चलते चलते कुछ कहना चाहेंगे?

"मैं बर्फ़ नहीं हूँ जो पिघल जाऊँगा", यह कविता उन्होंने अपने लिए लिखी थी। बहुत अरसे बाद इसे फ़िल्मी गीत का रूप दिया सुभाष घई साहब ने। यह कविता उन्हें निरंतर अच्छे अच्छे गीत लिखने के लिए प्रेरीत करती रही। It is the essence of his life, his attitude to his profession, his soul.

वाह! अच्छा तो राकेश जी, बहुत अच्छा लगा आपसे लम्बी बातचीत कर, आपको एक उज्वल भविष्य के लिए हमारी तरफ़ से ढेरों शुभकामनाएँ, आप फ़िल्मनिर्माण के जिस राह पर चल पड़े हैं, ईश्वर आपको कामयाबी दे, और आनन्द बक्शी साहब के नाम को आप चार-चांद लगायें यही हमारी कामना है आपके लिए, बहुत बहुत शुक्रिया।

बहुत बहुत शुक्रिया आपका।

समाप्त


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Tuesday, June 12, 2018

विनोद नायक की लघुकथा: दवा और दुआ

बोलती कहानियाँ स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में उर्दू और हिंदी प्रसिद्ध के साहित्यकार उपेन्द्रनाथ अश्क की कहानी "आ लड़ाई आ, मेरे आंगन में से जा" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम लेकर आये हैं विनोद नायक की एक लघुकथा: दवा और दुआ, जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

लघुकथा का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 1 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। इस लघुकथा का गद्य सेतु पत्रिका पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

लेखक: डॉ .विनोद नायक,  नागपुर महाराष्ट्र

हर सप्ताह सुनिए एक नयी कहानी

"मुरारी, तुम्हारे पापा का ऑपरेशन होगा"
(विनोद नायक की "दवा और दुआ" से एक अंश)



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दवा और दुआ MP3

#Tenth Story, Dawa Aur Dua: Vinod Nayak/Hindi Audio Book/2018/10. Voice: Anurag Sharma

Sunday, June 10, 2018

राग पटदीप : SWARGOSHTHI – 373 : RAG PATADEEP





स्वरगोष्ठी – 373 में आज

राग से रोगोपचार – 2 : तीसरे प्रहर का राग पटदीप

डिप्रेशन और चिन्ताविकृति का नामोनिशान मिटाता है राग पटदीप




उस्ताद राशिद खाँ
लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृत की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गातन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ता, विकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे हैं। श्रृंखला के दूसरे अंक में आज हम राग पटदीप के स्वरो से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको राग पटदीप में निबद्ध एक खयाल सुनवाएँगे, जिसे उस्ताद राशिद खाँ ने प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार लता मंगेशकर के स्वर में राग पटदीप पर आधारित फिल्म “शर्मीली” का एक गीत भी प्रस्तुत करेंगे।



राग पटदीप काफी थाट का राग माना जाता है। इसके आरोह के स्वर हैं; नि, सा (कोमल), म, प, नि, सां और अवरोह के स्वर है; सां, नि, ध, प, म, (कोमल), रे सा। यदि व्यक्ति प्रयास करते-करते निराश हो गया हो, डिप्रेशन की स्थिति में आ गया हो और अपने जीवन से निराश हो गया हो तो राग पटदीप के संवेदनापूर्ण स्वरों से उसे सहानुभूति प्रदान करते हुए प्रयास और कर्म के क्षेत्र में पूर्ण मनोयोग से संलग्न होने के लिए प्रेरणा देते हैं। राग पटदीप के उत्तरांग के स्वरों के द्वारा अन्तरात्मा की पुकार बलवती होगी और यह स्वर निराशा तथा क्लेश को हर लेती है और नवऊर्जा का संचार करेंगे। म, प, (कोमल), म, प, नि, ध, प, (कोमल), म, प, सां, ध, प, म, प, (कोमल)... स्वर मथ-मथ कर सभी आन्तरिक गुबार, पीड़ा, निराशा, डिप्रेशन को बाहर का रास्ता दिखा देंगे। इन विकृतियों के बाहर हो जाने पर व्यक्ति सरल, सात्विक और संवेदनशील मनःस्थिति के साथ परोपकार और समस्याओं के समाधान के लिए प्रयासरत होगा। राग पटदीप में कोमल गान्धार स्वर मन को पिघलाता है। मध्यम और पंचम स्वर मनोबल में वृद्धि करता है। शुद्ध निषाद पुकार का भाव कायम करता है। अवरोह के स्वरों से सफलता प्राप्ति के पश्चात संवेदनपूर्ण शान्ति का दर्शन होता है। डिप्रेशन और चिन्ताविकृति से पीड़ित व्यक्ति को राग पटदीप का श्रवण दिन के 4 से 5 बजे के बीच कराया जाना चाहिए। लगातार 15 दिनों तक इस प्रयोग को अपनाने से डिप्रेशन और चिन्ताविकृत का नामोनिशान मिट जाएगा।

राग पटदीप : ‘रंग रँगीला बनरा मोरा...’ : उस्ताद राशिद खाँ



राग पटदीप का सम्बन्ध काफी थाट से माना जाता है। इसके आरोह में ऋषभ और धैवत वर्जित है और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। अतः यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। इसका वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। इसमें केवल गान्धार स्वर कोमल और अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग पटदीप के गायन-वादन का समय दिन का तीसरा प्रहर माना जाता है। इस राग को विद्वानों ने काफी थाट का राग मान लिया है, किन्तु यह राग दस थाट में से किसी भी थाट के अनुकूल नहीं है। क्योंकि वर्णित दस थाट में कोई भी ऐसा थाट नहीं है, जिसमें केवल गान्धार स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हों। इस राग की रचना राग भीमपलासी के कोमल निषाद को शुद्ध स्वर में परिवर्तन करने से हुई है। मध्य सप्तक में बढ़त करते समय बीच-बीच में शुद्ध निषाद की झलक दिखाना आवश्यक होता है, अन्यथा राग भीमपलासी की छाया दृष्टिगोचर होने लगती है। अब हम आपको राग पटदीप पर आधारित 1971 में प्रदर्शित फिल्म “शर्मीली” का एक गीत सुनवाते हैं। लोकतत्त्वों से मिश्रित और गीतकार गोपालदास नीरज रचित इस गीत को लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। संगीत रचना सचिनदेव बर्मन की है। यह गीत रूपकताल में निबद्ध है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग पटदीप : “मेघा छाए आधी रात बैरन बन गई...” : लता मंगेशकर : फिल्म – शर्मीली



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 373वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको आठवें दशक की एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 380वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।






1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 16 जून, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 375वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 371वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1956 में प्रदर्शित फिल्म “जागते रहो’ के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – भैरव, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की दूसरी कड़ी में आपने कुछ शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग पटदीप का परिचय प्राप्त किया और इस राग में निबद्ध एक खयाल रचना का उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही इसी राग पर आधारित फिल्म “शर्मीली” का एक फिल्मी गीत कोकिलकण्ठी पार्श्वगायिका लता मंगेशकर के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। 

“स्वरगोष्ठी” के सभी संगीत-प्रेमियों के लिए आज के अंक में हम एक शुभ सूचना देना चाहते हैं। कई दशक पूर्व उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी ने सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित राधावल्लभ चतुर्वेदी की पुस्तक “ऊँची अटरिया रंग भरी” का प्रकाशन किया था। इस अनूठे ग्रन्थ में उत्तर प्रदेश के लोकगीतों का संकलन उनकी स्वरलिपि के साथ किया गया था। समय के साथ ही यह ग्रन्थ संगीत-प्रेमियों के लिए अप्राप्य हो गया है। पिछले दिनों पण्डित राधावल्लभ चतुर्वेदी की सुपुत्री सुश्री नीलम चतुर्वेदी ने सूचित किया है कि अब इस ग्रन्थ का पुनर्प्रकाशन केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी द्वारा किया जा रहा है। शीघ्र ही यह ग्रन्थ संगीत-प्रेमियों के लिए सुलभ होगा। 

आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   
रेडियो प्लेबैक इण्डिया  

Saturday, June 9, 2018

चित्रकथा - 72: गीतकार आनन्द बक्शी के सुपुत्र राकेश बक्शी से बातचीत (भाग-1)

अंक - 72

गीतकार आनन्द बक्शी के सुपुत्र राकेश बक्शी से बातचीत (भाग-1)


"ज़िंदगी के सफ़र में..." 




रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। आज इस स्तंभ के माध्यम से हम आपसे मिलवाने जा रहे हैं हिन्दी सिने-संगीत जगत के सुप्रसिद्ध और लोकप्रियतम गीतकारों में से एक, आनद बक्शी के सुपुत्र राकेश बक्शी से। राकेश आनन्द बक्शी के नाम से अपना परिचय देने वाले राकेश जी बहुत ही उदारता का परिचय देते हुए ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की इस प्रस्तुति के लिए आपके इस दोस्त से लम्बी बातचीत की थी वर्ष 2011 में। ’ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष’ और ’बातों बातों में’ स्तंभों में पूर्वप्रकाशित यह साक्षात्कार हम आपके लिए फिर एक बार प्रस्तुत कर रहे हैं इस उद्येश्य से कि हमारे बहुत से पाठक जो हाल के वर्षों में हमसे जुड़े हैं, वो इस साक्षात्कार का आनन्द उठा सके। तो आइए प्रस्तुत है बक्शी साहब के बेटे राकेश बक्शी से सुजॉय चटर्जी की लम्बी बातचीत के संपादित अंश। आज पेश है इस बातचीत का पहला भाग।




राकेश जी, 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से, हमारे तमाम पाठकों की तरफ़ से, और मैं अपनी तरफ़ से आपका हमारे इस मंच पर हार्दिक स्वागत करता हूँ, नमस्कार! यह हमारी ख़ुशनसीबी है कि आपसे मिलने और बातचीत करने का मौका मिला।

नमस्कार! मुझे भी यहाँ आकर बहुत अच्छा लग रहा है।

सच पूछिये तो हम अभिभूत हैं आपको हमारे बीच में पाकर। फ़िल्म संगीत के सफलतम गीतकारों में से एक थे आनंद बक्शी जी, और आज उनके बेटे से बातचीत करने का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ है, जिसके लिए आपको हम जितना भी धन्यवाद दें, कम होगी।

बहुत बहुत धन्यवाद!

राकेश जी, वैसे तो बक्शी साहब के बारे में, उनकी फ़िल्मोग्राफ़ी के बारे में, उनके करीयर के बारे में हम कई जगहों से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए इस बातचीत में हम उस तरफ़ न जाकर उनकी ज़िंदगी के कुछ ऐसे पहलुयों के बारे में आपसे जानना चाहेंगे जो शायद पाठकों को मालूम न होगी। और इसीलिए बातचीत के इस सिलसिले का नाम हमने रखा है 'बेटे राकेश बक्शी की नज़रों में गीतकार आनंद बक्शी'।

जी ज़रूर!

कैसा लगता है 'राकेश आनंद बक्शी' होना? मान लीजिए आप कहीं जा रहे हैं, और अचानक कहीं से बक्शी साहब का लिखा गीत बज उठता है, किसी पान की दुकान पे रेडियो पर, कैसा महसूस होता है आपको?

उनके लिखे सभी गीत मुझे नॉस्टल्जिक बना देता है। उनके लिखे न जाने कितने गीतों के साथ कितनी हसीन यादें जुड़ी हुईं हैं, या फिर कोई पर्सनल ईक्वेशन। कहीं से उनका लिखा गीत मेरे कानों में पड़ जाये तो मैं उन्हें और भी ज़्यादा मिस करने लगता हूँ।

अच्छा राकेश जी, किस उम्र में आपको पहली बार यह अहसास हुआ था कि आप 'आनंद बक्शी' के बेटे हैं? उस आनंद बक्शी के, जो कि फ़िल्म जगत के सबसे लोकप्रिय गीतकारों में से एक हैं? अपने बालपन में शायद आपको अंदाज़ा नहीं होगा कि बक्शी साहब की क्या जगह है लोगों के दिलों में, लेकिन जैसे जैसे आप बड़े होते गये, आपको अहसास हुआ होगा कि वो किस स्तर के गीतकार हैं और इंडस्ट्री में उनकी क्या जगह है। तो कौन सा था वह पड़ाव आपकी ज़िंदगी का जिसमें आपको इस बात का अहसास हुआ था?

यह अहसास एक पल में नहीं हुआ, बल्कि कई सालों में हुआ। इसकी शुरुआत उस समय हुई जब मैं स्कूल में पढ़ता था। मेरे कुछ टीचर मेरी तरफ़ ज़्यादा ध्यान दिया करते। या डॉक्टर के क्लिनिक में, या फिर बाल कटवाने के सलून में, कहीं पर भी मुझे लाइन में खड़ा नहीं होना पड़ता। बड़ा होने पर मैंने देखा कि पुलिस कमिशनर और इन्कम टैक्स ऑफ़िसर, जिनसे लोग परहेज़ ही किया करते हैं, ये मेरे पिताजी के लगभग चरणों में बैठे हैं, और उनसे अनुरोध कर रहे हैं उनके लिखे किसी नये गीत या किसी पुराने हिट गीत को सुनवाने की। 

वाक़ई मज़ेदार बात है!

जब मैं पहली बार विदेश गया और वहाँ पर जब NRI लोगों को यह बताया गया कि मैं बक्शी जी का बेटा हूँ, तो वो लोग जैसे पागल हो गये, और मुझे उस दिन इस बात का अहसास हुआ कि कभी विदेश न जाने के बावजूद मेरे पिताजी ने कितना लम्बा सफ़र तय कर लिया है। और यह सफ़र है असंख्य लोगों के दिलों तक का। मैं आपको यह बता दूँ कि उनका पासपोर्ट बना ज़रूर था, लेकिन वो कभी भी विदेश नहीं गये क्योंकि उन्हें हवाईजहाज़ में उड़ने का आतंक था, जिसे आप फ़्लाइंग-फ़ोबिआ कह सकते हैं। लेकिन यहाँ पर यह भी कहना ज़रूरी है कि सेना में रहते समय वो पैराट्रूपिंग्‍ किया करते थे अपनी तंख्वा में बोनस पाने के लिए।

इस तरह के और भी अगर संस्मरण है तो बताइए ना!

जब हम अपने रिश्तेदारों के घर दूसरे शहरों में जाते, तो वहाँ हमारे ठहरने का सब से अच्छा इंतज़ाम किया करते, या सब से जो अच्छा कमरा होता था घर में, वह हमें देते। एक वाक़या बताता हूँ, एक बार मैंने कुछ सामान इम्पोर्ट करवाया और उसके लिए एक इम्पोर्ट लाइसेन्स का इस्तमाल किया जिसमें कोई तकनीकी गड़बड़ी (technical flaw) थी। कम ही सही, लेकिन यह एक ग़ैर-कानूनी काम था जो सज़ा के काबिल था। और उस ऑफ़िसर ने मुझसे भारी जुर्माना वसूल करने की धमकी दी। लेकिन जाँच-पड़ताल के वक़्त जब उनको पता चला कि मैं किनका बेटा हूँ, तो वो बोले कि पिताजी के गीतों के वो ज़बरदस्त फ़ैन हैं। उन्होंने फिर मुझे पहली बार बैठने को कहा, मुझे चाय-पानी के लिए पूछा, जुर्माने का रकम भी कम कर दिया, और मुझे सलाह दी कि भविष्य में मैं इन बातों का ख़याल रखूँ और सही कस्टम एजेण्ट्स को ही सम्पर्क करूँ ताकि इस तरह के धोखा धड़ी से बच सकूँ। उन्होंने यह भी कहा कि अगर मैं पुलिस या कस्टम्स में पकड़ा जाऊँगा तो इससे मेरे पिताजी का ही नाम खराब होगा। उस दिन से मैंने अपना इम्पोर्ट बिज़नेस बंद कर दिया। इन सब सालों में और आज भी मैं बहुत से लोगों का विश्वास और प्यार अर्जित करता हूँ, जिनसे मैं कभी नहीं मिला, जो मेरे लिए बिल्कुल अजनबी हैं। यही है बक्शी जी का परिचय, उनकी क्षमता, उनका पावर। और मैंने भी हमेशा इस बात का ख़याल रखा कि मैं कभी कोई ऐसा काम न करूँ जिससे कि उनके नाम को कोई आँच आये, क्योंकि मेरे जीवन में उनका नाम मेरे नाम से बढ़कर है, और मुझे उनके नाम को इसी तरह से बरकरार रखना है।

वाह! क्या बात है! अच्छा, आपने ज़िक्र किया कि स्कूल में आपको स्पेशल अटेंशन मिलता था बक्शी साहब का बेटा होने के नाते।

जी!

तो क्या आपको ख़ुशी होती थी, गर्व होता था, या फिर थोड़ा एम्बरेसिंग्‍ होता था, यानी शर्म आती थी?

मैं आज भी बहुत ही शाई फ़ील करता हूँ जब भी इस तरह का अटेंशन मुझे मिलता है, हालाँकि मुझे उन पर बहुत बहुत गर्व है। अगर मैं ऐसे किसी व्यक्ति से मिलता हूँ जो स्टेटस में मुझसे नीचे है, तो मैं अपना सेलफ़ोन या घड़ी छुपा लेता हूँ या उन्हें नहीं जानने देता कि मैं किस गाड़ी में सफ़र करता हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि मैं उनके साथ घुलमिल जाऊँ और उनसे सहजता से पेश आ आऊँ और वो भी मेरे साथ सहजता अनुभव करें।

बहुत ही अच्छी बात है यह, और कहावत भी है कि फलदार पेड़ हमेशा झुके हुए होते हैं। आनंद बक्शी साहब भी इतने बड़े गीतकार होते हुए भी बहुत सादे सरल थे, और शायद यही बात आप में भी है। अच्छा, यह बताइए कि एक पिता के रूप में बक्शी साहब कैसे थे? किस तरह का रिश्ता था आप दोनों में?

वो एक सख़्त पिता थे। सेना में एक सिपाही और रॉयल इण्डियन नेवी के कडेट होने की वजह से उन्होंने हमें भी अनुशासन, पंक्चुअलिटी और अपने पैरों पर खड़े होने की शिक्षा दी। वो मुझे लेकर पैदल स्कूल तक ले जाते थे जब कि घर में गाड़ियाँ और ड्राइवर्स मौजूद थे। कॉलेज में पढ़ते वक़्त भी मैं बस और ट्रेन में सफ़र किया करता था। जब मैं काम करने लगा, तब भी मैं घर की गाड़ी और ड्राइवर को केवल रात की पार्टी में जाने के लिए ही इस्तमाल किया करता। पिताजी कभी भी सिनेमा घरों के मैनेजरों या मालिकों को फ़िल्म की टिकट भिजवाने के लिए नहीं कहते थे, क्योंकि उन्हें मालूम था कि वो पैसे नहीं लेंगे। इसलिए हम भी सिनेमाघरों के बाहर लाइन में खड़े होकर टिकट खरीदते। सिर्फ़ प्रीमियर या ट्रायल शो के लिए हमें टिकट नहीं लेना पड़ता और वो परिवार के सभी लोगों को साथ में लेकर जाते थे। 

वाह! बहुत मज़ा आता होगा उन दिनों!

जी हाँ! रात को जब वो घर वापस आते और हमें सोये हुए पाते, तो हमारे सर पर हाथ फिराते। वो चाहते थे कि हम इंजिनीयर या डॉक्टर बने। वो नहीं चाहते थे कि हम फ़िल्म-लाइन में आये।

राकेश जी, आप किस लाइन में गये, उसके बार में भी हम आगे चलकर बातचीत करेंगे, लेकिन इस वक़्त हम और जानना चाहेंगे कि बक्शी साहब किस तरह के पिता थे?

दिन के वक़्त, जब उनके लिखने का समय होता था, तब वो बहुत ही कम शब्दों के पिता बन जाते थे, लेकिन रात को खाना खाने से पहले वो हमें अपने बचपन और जीवन के अनुभवों की कहानियाँ सुनाया करते। उन्हें किताब पढ़ने का शौक था और ख़ुद पढ़ने के बाद अगर उन्हें अच्छा लगता तो हमें भी पढ़ने के लिए देते थे; ख़ास कर मासिक 'रीडर्स डाइजेस्ट'। हम देर रात तक घर से बाहर रहे, यह उन्हें पसंद नहीं था। जब हम स्कूल में थे, तब रात को खाने के वक़्त से पहले हमारा घर के अंदर होना ज़रूरी था। खेलकूद के लिए वो हमें प्रोत्साहित किया करते थे। हम पढ़ाई या करीयर के लिए कौन सा विषय चुनेगे, इस पर उनकी कोई पाबंदी नहीं थी, उनका बस यह विचार था कि हम पढ़ाई को जारी रखें और पोस्ट-ग्रैजुएशन करें। उनको उच्च शिक्षा का मोल पता था और वो कहते थे कि यह उनका दुर्भाग्य है कि वो सातवीं कक्षा के बाद पढ़ाई जारी नहीं रख सके, देश के बँटवारे की वजह से। उनका इस बात पर हमेशा ध्यान रहता था कि हम अपनी माँ की सब से ज़्यादा इज़्ज़त करें क्योंकि उन्होंने अपनी माँ को बहुत ही कम उम्र में खो दी थी। जिन्हें माँ का प्यार मिलता है, वो बड़े ख़ुशनसीब होते हैं, ऐसा उनका मानना था।

राकेश जी, आपने बताया कि किस तरह से बक्शी साहब ने आप सब को माँ की अहमीयत बतायी। किसी की सफलता के पीछे उसके जीवन-संगिनी का बड़ा हाथ होता है। तो बताइए बक्शी साहब की जीवन-संगिनी, यानी आपकी माताजी के बारे में।

शादी के बाद पिताजी की आमदनी इतनी नहीं थी कि बम्बई में घर किराये पर लेते। इसलिए शादी के बाद भी कुछ सालों तक मेरी माँ उनके माता-पिता के घर में ही रहती थीं, लखनऊ में। वो महिलाओं के कपड़े सीती थीं ताकि अपने पिता, जो एक रिटायर्ड आर्मी मैन थे, को कुछ आर्थिक मदद कर सके। एक दिन जब मैं मेरी माताजी के साथ गुस्से से पेश आया, तब पिताजी ने मुझे बताया कि बचपन में मेरी माँ अण्डे इसलिए नहीं खाती थीं ताकि हम बच्चों को अण्डे खाने के मौके मिले। उन दिनों हमारी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि अच्छा नाश्ता कर पाते। इसलिए मेरी माताजी ने काफ़ी त्याग और समर्पण किये अपने चार बच्चों को बड़ा करने के लिए। और पिताजी ने उस दिन हम बच्चों को आगाह किया और चेतावनी भी दी कि हम कभी भी अपनी माँ के साथ बदतमीज़ी से पेश न आये।

सही बात है! अच्छा राकेश जी, ये तो थी उन दिनों की बातें जब आपकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। जब बक्शी साहब को दौलत और शोहरत हासिल हुई, उस वक़्त आपकी माताजी के व्यवहार में किसी तरह का परिवर्तन आया?

पिताजी के स्थापित होने के बाद और अमीर बनने के बाद भी माँ अपनी पुरानी साड़ियों और पुराने कपड़ों को पहनना नहीं छोड़ीं, क्योंकि वो जानती थी कि पिताजी जो कमाते थे, उसकी कीमत क्या थी। उसका मूल्य उन्हें मालूम था, और कितनी मेहनत से यह धन आता था, वह भी वो ख़ूब समझती थी। इसलिए कभी अपव्यय नहीं की। उन्होंने अपने जीवन में कभी भी पिताजी से किसी चीज़ की फ़रमाइश नहीं की। बल्कि पिताजी को ज़बरदस्ती से उन्हें कुछ अपने लिए दिलाना पड़ता था। बस एक बार मेरी माँ ने कुछ खरीदना चाहा था। यह बात थी उस वक़्त की जब पिताजी गुज़र गये थे और उन्हें हमारे रिश्तेदारों की Toyota Innova में बैठना पड़ा था, उस वक़्त उन्होंने कहा था कि हमें भी ऐसी एक गाड़ी खरीदनी चाहिये ताकि वो उसमें बैठकर हमारे पंचगनी के घर में जा सके। 

बक्शी साहब जब गीत लेखन के कार्य में बाहर जाते थे, या कभी दूसरे शहर में, या फिर कहीं हिल-स्टेशन में, तो क्या आपकी माताजी भी साथ जाया करतीं?

ज़्यादातर समय पिताजी अपने बेड-रूम में बैठ कर ही गीत लिखते थे, और कभी लिविंग्‍-रूम में बैठ कर। उनके 99% गीत उन्होंने घर में बैठ कर ही लिखे हैं, न कि किसी पर्वत, वादी या नदी या झील के किनारे बैठ के, जैसा कि कुछ फ़िल्मों में दिखाया जाता है। इस वजह से माँ ने अपना सोशल-लाइफ़ भी बहुत सीमित कर लिया था ताकि घर में रह कर पिताजी की ज़रूरतों की तरफ़ ध्यान दे सके, ताकि गीत-लेखन कार्य में उन्हें कोई कठिनाई न हो।

यही बात मैं कह रहा था कि जीवन-संगिनी का उसकी सफलता के पीछे बहुत बड़ा हाथ होता है। अच्छा इसका मतलब यह हुआ कि आपके माताजी की सखी-सहेलियों का दायरा बहुत ही छोटा होगा?

उनकी बस एक सहेली थी और दो तीन रिश्तेदार थे जिनके वो करीब थीं। वो इनके घर महीने दो महीने में एक बार जाती थीं। पिताजी के गुज़र जाने के बाद उन्होंने एक महाशून्य महसूस किया अपनी ज़िंदगी में।

और मेरे ख़याल से यह एक ऐसा शून्य है जिसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता, अपने बच्चे भी नहीं।

बिलकुल सही! और पिताजी फ़िल्म जगत से जुड़े लोगों से ज़रा दूर दूर ही रहा करते थे, इसलिए कम्पोज़र, प्रोड्युसर और डिरेक्टर्स के परिवार वालों से हमारा ज़्यादा मेल-मिलाप नहीं हुआ। और इसलिए माँ भी फ़िल्मी पार्टियों में और अवार्ड फ़ंक्शन में नहीं जाती थीं। पिताजी की मृत्यु के बाद जब प्रेस वाले अपने न्युज़ कैमेरों से हमारे घर के अंदर शूट करना चाह रहे थे और पिताजी की पार्थिव शरीर को हमारे लिविंग्‍-रूम में रखा गया था, हमने उनसे पूछा कि क्या हमें प्रेस को अंदर कैमरों से शूट करने की अनुमति देनी चाहिये, तब उन्होंने कहा कि पिताजी अपनी पूरी ज़िंदगी प्रेस और पब्लिसिटी से दूर ही रहे ताकि उनका ध्यान लेखन से न हट जाये, और अब जब वो घर आना चाह रहे हैं, यह तुम्हारे पिताजी की उपलब्धि है, और यह उनका हक़ भी है, इसलिए उन्हें आने दो।

राकेश जी, आपकी स्मृतियों में आनन्द बक्शी साहब राज करते होंगे। उनमें से कुछ के बारे में बताइए न!

एक नहीं हज़ार हैं स्मृतियाँ, कौन कौन सा बताऊँ। हाँ, एक जो मैं बताना चाहूँगा, वह यह कि जब वो कभी रात को देर से घर लौटते थे और हमें सोया पाते थे, तो वो हमारे बगल में बैठ जाते और हमारे सर पे अपना हाथ फेरते। कभी कभी मैं जगा ही रहता था जब वो हाथ फेरते, लेकिन मैं सोने का नाटक करता था ताकि उनके हाथ फेरने का आनन्द लेता रहूँ।

वाह! वाक़ई अपने माता-पिता के छुवन से मुलायम दुनिया की और कोई चीज़ नहीं हो सकती। अच्छा राकेश जी, आप सब मिल कर, पूरा परिवार, कभी छुट्टी मनाने जाते थे? जैसे मान लीजिये कि किसी पर्वतीय स्थल पर गये हों, और वहाँ पर बक्शी जी को यकायक किसी गीत की प्रेरणा मिल गयी हो? इस तरह का वाकया कभी हुआ है?

हम हर साल महाबलेश्वर और पंचगनी जाते थे। हम अपनी गाड़ी लेकर जाते थे। उन सर्पीले रास्तों पर चढ़ाई करते हुए उनका जो फ़ेवरीट गाना था, वह था "Walk Don't Run, 64", यह 'The Ventures' का गाना है। वो अक्सर अपने फ़ेवरीट सिगरेट 555 के पैकिट के उपर झट से कोई भाव लिख लिया करते थे। ऐसा इसलिए कि भले ही वो अपना नोट-बूक भूल जायें साथ लेना, लेकिन 555 का पैकिट कभी नहीं भूलते थे। लगभग ५ से १० गीत ऐसे होंगे जो उन्होंने हिल-स्टेशन में लिखे होंगे। जैसा कि मैंने बताया था कि वो अधिकतर गीत बेडरूम और लिविंग्‍-रूम में बैठ कर ही लिखे हैं, और कभी कभी म्युज़िक डिरेक्टर्स के सिटिंग्‍ रूम में। और यह बात भी है कि छुट्टी में जाकर वो कभी नहीं लिखते थे। वो लिखते वक़्त कभी शराब नहीं पीते थे क्योंकि वो इसे माँ सरस्वती का अपमान मानते थे।

वो घर पर शराब पीते थे?

अगर कभी पीते भी थे तो रात के ९ बजे के बाद पीते थे, लेकिन डिनर के बाद कभी नहीं। यहाँ पर ऐसी मान्यता है कि शायर को लिखने के लिए पीना ज़रूरी होता है। लेकिन देखिये, पिताजी ने लिखते वक़्त शराब का कभी सहारा नहीं लिया। वो सिगरेट ज़रूर पीते थे या पान चबाते थे लिखते वक़्त। लिखते वक़्त वो व्हिसल भी बजाते थे। और मेरा ख़याल है कि कभी कभी वो ख़ुद धुन भी बनाने की कोशिश करते होंगे या व्हिसलिंग्‍ के माध्यम से मीटर पर लिखने की कोशिश करते होंगे। म्युज़िक डिरेक्टर्स भी कई बार उन्हें धुन बता देते थे, इसलिए भी वो उस धुन को व्हिसल कर उसपे बोल बिठाते। लेकिन बहुत बार उन्हें संगीतकार ने धुन नहीं भी दी। तब वो ख़ुद ही अपने बोलों को ख़ुद धुन पर बिठाते होंगे व्हिसलिंग्‍ के ज़रिये।

ऐसा कोई गीत आपको पता है जिसकी धुन बक्शी साहब ने ख़ुद बनायी या सुझायी होगी?

कुछ संगीतकारों ने ख़ुद मुझे यह बात बतायी है कि किस तरह से पिताजी उनका काम आसान बना देते थे। लेकिन मैं न उन संगीतकारों के नाम लूँगा और न ही उन गीतों के बारे में कुछ कहना चाहूँगा जिनकी धुने पिताजी ने बनाये थे। यह हक़ केवल पिताजी को था और उन्होंने कभी यह बात किसी को नहीं बतायी। इसलिए बेहतर यही होगा कि यह राज़ दुनिया के लिए राज़ ही बना रहे।

हम भी सम्मान करते हैं आपके इस फ़ैसले का। और बहुत सही किया है आपने। 

पिताजी उन्हें गीतों के साथ साथ धुने भी दे दिया करते, लेकिन कभी भी निर्माता से धुनों के लिए क्रेडिट या पब्लिसिटी की माँग नहीं की। और यही कारण है कि वो लोग उन्हें दूसरे गीतकारों की तुलना में इतना ज़्यादा सम्मान क्यों करते थे! मुझे उन संगीतकारों से ही पता चला कि पिताजी कभी कभी एक ही गीत के लिए १० से २० अंतरे लिख डालते थे, जब कि उनसे माँग दो या तीन की ही होती थी। यह उनकी प्रतिभा की मिसाल है। निर्माता और निर्देशक द्वंद में पड़ जाते थे कि उन १०-२० अंतरों में से किन तीन अंतरों को चुनना है क्योंकि सभी के सभी अंतरे एक से बढ़कर एक होते थे और उनमें से श्रेष्ठ तीन चुनना आसान काम नहीं होता था। यहाँ तक कि कई बार तो रेकॉर्डिंग्‍ के दिन तक यह फ़ैसला नहीं हो पाता था कि कौन कौन से अंतरे फ़ाइनल हुए हैं। उन्हें ऐसा लगता कि जिन अंतरों को वो नहीं ले रहे हैं, उनके साथ अन्याय हो रहा है। आज भी जब वो पुराने लोग मुझे मिलते हैं तो इस बात का ज़िक्र करते हैं।


समापन अगले सप्ताह...

आख़िरी बात

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शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



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