Thursday, September 29, 2016

नव दधीचि हड्डियां गलाएँ, आओ फिर से दिया जलाएँ... अटल जी के शब्दों को मिला लता जी की आवाज़ का पुर-असर जादू



कहकशाँ - 20
लता मंगेशकर की आवाज़ में अटल बिहारी वाजपेयी की रचना   
"आओ फिर से दिया जलाएँ..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर की आवाज़ में अटल बिहारी वाजपेयी की रचना "आओ फिर से दिया जलाएँ..."।


राजनीति और साहित्य साथ-साथ नहीं चलते। इसका कारण यह नहीं कि राजनीतिज्ञ अच्छा साहित्यकार नहीं हो सकता या फिर एक साहित्यकार अच्छी राजनीति नहीं कर सकता, बल्कि यह है कि उस साहित्यकार को लोग "राजनीति" के चश्मे से देखने लगते हैं। उसकी रचनाओं को पसंद या नापसंद करने की कसौटी बस उसकी प्रतिभा नहीं रह जाती, बल्कि यह भी होती है कि वह जिस राजनीतिक दल से संबंध रखता है, उस दल की क्या सोच है और पढने वाले उस सोच से कितना इत्तेफ़ाक़ रखते हैं। अगर पढने वाले उसी सोच के हुए या फिर उस दल के हिमायती हुए तब तो वो साहित्यकार को भी खूब मन से सराहेंगे, लेकिन अगर विरोधी दल के हुए तो साहित्यकार या तो "उदासीनता" का शिकार होगा या फिर नकारा जाएगा... कम ही मौके ऐसे होते हैं, जहाँ उस राजनीतिज्ञ साहित्यकार की प्रतिभा का सही मूल्यांकन हो पाता है। वैसे यह बहस बहुत ज़्यादा मायना नहीं रखती, क्योंकि "राजनीति" में "साहित्य" और "साहित्यकार" के बहुत कम ही उदाहरण देखने को मिलते है, जितने "साहित्य" में "राजनीति" के। "साहित्य" में "राजनीति" की घुसपैठ... हाँ भाई यह भी होती है और बड़े जोर-शोर से होती है, लेकिन यह मंच उस मुद्दे को उठाने का नहीं है, इसलिए "साहित्य में राजनीति" वाले बात को यहीं विराम देते हैं और "राजनीति" में "साहित्य" की ओर मुख़ातिब होते हैं। अगर आपसे पूछा जाए कि जब भी इस विषय पर बात होती है तो आपको सबसे पहले किनका नाम याद आता है.. (मैं यहाँ पर हिन्दी साहित्य की बात कर रहा हूँ, इसलिए उम्मीद है कि अपने जवाब एक ही होंगे), तो निस्संदेह आपका उत्तर एक ही इंसान के पक्ष में जाएगा और वे इंसान हैं हमारे पूर्व प्रधानमंत्री "श्री अटल बिहारी वाजपेयी"। यहाँ पर यह ध्यान देने की बात है कि इस आलेख का लेखक यानि कि मैं किसी भी दलगत पक्षपात/आरक्षण के कारण अटल जी का ज़िक्र नहीं कर रहा, बल्कि साहित्य में उनके योगदान को महत्वपूर्ण मानते हुए उनकी रचना को इस महफ़िल का हिस्सा बना रहा हूँ। अटल जी की इस रचना का चुनाव करने के पीछे एक और बड़ी शक्ति है और उस शक्ति का नाम है "स्वर-कोकिला", जिन्होंने इसे गाने से पहले वही बात कही थी, जो मैंने अभी-अभी कही है: "मैं उन्हें एक कवि की तरह देखती हूँ और वो मुझे एक गायिका की तौर पे.. हमारे बीच राजनीति कभी भी नहीं आती।"

अटल जी.. इनका कब जन्म हुआ और इनकी उपलब्धियाँ क्या-क्या हैं, मैं अगर इन बातों का वर्णन करने लगा तो इनकी राजनीतिक गतिविधियों से बचना मुश्किल होगा, इसलिए सही होगा कि हम सीधे-सीधे इनकी रचनाओं की ओर रुख कर लें। "कवि के रूप में अटल" - इस विषय पर "हिन्दी का विकिपीडिया" कुछ ऐसे विचार रखता है: 

"मेरी इक्यावन कविताएं" वाजपेयी जी का प्रसिद्ध काव्यसंग्रह है। अटल बिहारी वाजपेयी को काव्य रचनाशीलता एवं रसास्वाद विरासत में मिले हैं। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत में अपने समय के जाने-माने कवि थे। वे ब्रजभाषा और खड़ी बोली में काव्य रचना करते थे। पारिवारिक वातावरण साहित्यिक एवं काव्यमय होने के कारण उनकी रगों में काव्य रक्त-रस घूम रहा है। उनकी सर्व प्रथम कविता ताजमहल थी। कवि हृदय कभी कविता से वंचित नहीं रह सकता। राजनीति के साथ-साथ समष्टि एवं राष्ट्र के प्रति उनकी वैयक्तिक संवेदनशीलता प्रकट होती रही। उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियां, राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, जेलवास सभी हालातों के प्रभाव एवं अनुभूति ने काव्य में अभिव्यक्ति पायी। उनकी कुछ प्रकाशित रचनाएँ हैं:

मृत्यु या हत्या
अमर बलिदान (लोक सभा मे अटल जी वक्तव्यों का संग्रह)
कैदी कविराय की कुन्डलियाँ
संसद में तीन दशक
अमर आग है
कुछ लेख कुछ भाषण
सेक्युलर वाद
राजनीति की रपटीली राहें
बिन्दु बिन्दु विचार
न दैन्यं न पलायनम
मेरी इक्यावन कविताएँ...इत्यादि

बात जब अटल जी की कविताओं की ही हो रही है तो क्यों न इनकी कुछ पंक्तियों का आनंद लिया जाए:

क) हमें ध्येय के लिए 
जीने, जूझने और 
आवश्यकता पड़ने पर 
मरने के संकल्प को दोहराना है। 

आग्नेय परीक्षा की 
इस घड़ी में 
आइए, अर्जुन की तरह 
उद्घोष करें : 
"न दैन्यं न पलायनम्।" ("न दैन्यं न पलायनम्" से)

ख) पहली अनुभूति:
गीत नहीं गाता हूँ

बेनक़ाब चेहरे हैं,
दाग़ बड़े गहरे हैं 
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ

दूसरी अनुभूति:
गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात
प्राची मे अरुणिम की रेख देख पाता हूँ ("दो अनुभूतियाँ" से)

ग) ऊँचे पहाड़ पर, 
पेड़ नहीं लगते, 
पौधे नहीं उगते, 
न घास ही जमती है।
जमती है सिर्फ बर्फ..

....
न वसंत हो, न पतझड़, 
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़, 
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा। 

मेरे प्रभु! 
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना, 
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ, 
इतनी रुखाई कभी मत देना। ("ऊँचाई" से)

रचनाएँ तो और भी कई सारी हैं, लेकिन "वक़्त" और "जगह" की पाबंदी को ध्यान में रखते हुए आइये आज की नज़्म से रूबरू होते हैं। "आओ फिर से दिया जलाएँ" एक ऐसी नज़्म है, जो मन से हार चुके और पथ से भटक चुके पथिकों को फिर से उठ खड़ा होने और सही राह पर चलने की सीख देती है। शुद्ध हिन्दी के शब्दों का चुनाव अटल जी ने बड़ी ही सावधानी से किया है, इसलिए कोई भी शब्द अकारण आया प्रतीत नहीं होता। अटल जी ने इसे जिस ख़ूबसूरती से लिखा है, उसी ख़ूबसूरती से लता जी ने अपनी आवाज़ का इसे अमलीजामा पहनाया है। इन दोनों बड़ी हस्तियों के बीच अपने आप को संयत रखते हुए "मयूरेश पाई" ने भी इसे बड़े ही "सौम्य" और "सरल" संगीत से संवारा है। लेकिन इस गीत की जो बात सबसे ज्यादा आकर्षित करती है, वह है गीत की शुरूआत में बच्चों का एक स्वर में हूक भरना। यह गीत "अंतर्नाद" एलबम का हिस्सा है, जो साल 2004 में रीलिज हुई थी और जिसमें अटल जी के लिखे और लता जी के गाए सात गाने थे। अटल जी और लता जी की यह जोड़ी कितनी कारगर है यह तो इसी बात से ज़ाहिर है कि अंग्रेजी में अटल को उल्टा पढने से लता हो जाता है (यह बात ख़ुद लता जी ने कही थी इस एलबम के रीलिज के मौके पर)। इसी ट्रीविया के साथ चलिए हम और आप सुनते हैं यह नज़्म:

आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोह जाल में
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ






’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Wednesday, September 28, 2016

"हर गीत की अपनी एक किस्मत होती है, हिट हो या न हो" - अज़ीम शिराज़ी : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (30)

"वार छोड़ न यार", "जैकपोट", और "१९२० लन्दन" जैसी फिल्मों में गीत लिख चुके शायर गीतकार अज़ीम शिराज़ी हैं हमारे आज के मेहमान, कार्यक्रम एक मुलाकात ज़रूरी है में, जानिये "कभी जो बादल बरसे" जैसे हिट गीत के कलमकार की ये कहानी...



एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Tuesday, September 27, 2016

दीपक मशाल की लघुकथा निमंत्रण

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने पूजा अनिल के स्वर में संतोष श्रीवास्तव की कथा "शहतूत पक गये हैं" का पाठ सुना था।

24 सितम्बर को अंतर्राष्ट्रीय द्वैभाषिक पत्रिका सेतु के सम्पादक दीपक मशाल का जन्मदिन भी है। इस उपलक्ष्य में जन्मदिन एके शुभकामनाओं के साथ इस बार हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं उनकी लघुकथा निमंत्रण, जिसे स्वर दिया है पूजा अनिल ने।

प्रस्तुत लघुकथा "निमंत्रण" का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 55 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

कुछ बड़े लोगों से मिला था कभी,
तबसे कोई बड़ा नहीं लगता
इतनी बौनी है दुनिया कि कोई,
खड़ा हुआ भी खड़ा नहीं लगता
 ~ दीपक मशाल

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"सेठजी के लिये यह बात अनुभवों की गिनती में इजाफा भर नहीं थी।”
 (दीपक मशाल की लघुकथा "निमंत्रण" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
निमंत्रण MP3

#Seventeenth Story, Nimantran; Dipak Mashal; Hindi Audio Book/2016/17. Voice: Pooja Anil

Sunday, September 25, 2016

जयन्त मल्हार : SWARGOSHTHI – 285 : JAYANT MALHAR




स्वरगोष्ठी – 285 में आज

पावस ऋतु के राग – 6 : बसन्त देसाई की अन्तिम रचना

‘मेहा बरसने लगा है आज...’ और ‘ऋतु आई सावन की...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में आज हम राग जयन्त अथवा जयन्ती मल्हार पर चर्चा करेंगे। इस राग में पहले हम आशा भोसले की आवाज़ में एक फिल्मी गीत प्रस्तुत करेंगे। यह गीत 1976 में प्रदर्शित फिल्म ‘शक’ से लिया गया है, जिसके संगीतकार हैं बसन्त देसाई। दूसरे चरण में राग जयन्त मल्हार की एक प्राचीन किन्तु मोहक बन्दिश का हमने चयन किया है। अपने समय के बहुआयामी संगीतज्ञ पण्डित विनायक राव पटवर्धन ने इस रचना को स्वर दिया है।



आशा भोसले
र्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों में राग जयन्त मल्हार या जयन्ती मल्हार एक कम प्रचलित राग है। राग के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह राग जयजयवन्ती और मल्हार अंग के मेल से बनता है। वैसे राग जयजयवन्ती स्वतंत्र रूप से भी वर्षा ऋतु के परिवेश को रचने में समर्थ है। परन्तु जब राग जयजयवन्ती के साथ मल्हार अंग का मेल हो जाता है तब इस राग से अनुभूति और अधिक मुखर हो जाती है। आज हम राग जयन्त मल्हार पर आधारित एक मोहक फिल्मी गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। यह गीत 1976 में प्रदर्शित फिल्म ‘शक’ से लिया गया है। विकास देसाई और अरुणा राजे द्वारा निर्देशित इस फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई थे। बसन्त देसाई ने मल्हार अंग के रागों पर आधारित सर्वाधिक गीतों की रचना की थी। इस श्रृंखला में बसन्त देसाई द्वारा संगीतबद्ध किया यह दूसरा गीत है। ‘शक’ जिस दौर की फिल्म है, उस अवधि में बसन्त देसाई का रुझान फिल्म संगीत से हट कर शिक्षण संस्थाओं में संगीत के प्रचार-प्रसार की ओर अधिक हो गया था। फिल्म संगीत का मिजाज़ भी बदल गया था। परन्तु बसन्त देसाई ने बदले हुए दौर में भी अपने संगीत में रागों का आधार नहीं छोड़ा। फिल्म ‘शक’ उनकी अन्तिम फिल्म साबित हुई। फिल्म के प्रदर्शित होने से पहले ही एक लिफ्ट दुर्घटना में उनका असामयिक निधन हो गया। राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार के स्वरों पर आधारित फिल्म ‘शक’ का जो गीत हम सुनवाने जा रहे हैं, उसके गीतकार हैं गुलज़ार और इस गीत को स्वर दिया है आशा भोसले ने। आइए सुनते हैं यह रसपूर्ण गीत।


राग जयन्त मल्हार : ‘मेहा बरसने लगा है आज...’ : आशा भोसले : फिल्म – शक


विनायक राव पटवर्धन
पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे के ग्रन्थ में राग जयन्त मल्हार का विवरण नहीं मिलता। आपके लिए हमने इस राग का विवरण हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव की पुस्तक ‘राग परिचय’ के चौथे भाग से लिया है। यह काफी थाट का राग माना जाता है। इसमें दोनों गान्धार और दोनों निषाद का प्रयोग होता है। इसका वादी ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। राग के आरोह के स्वर हैं- सा, रे प, म प नि(कोमल) ध नि सां, तथा अवरोह के स्वर हैं- सां ध नि(कोमल) म प, प म ग रे ग(कोमल) रे सा। इसराज और मयूरवीणा के सुप्रसिद्ध वादक पं. श्रीकुमार मिश्र के अनुसार राग जयन्त मल्हार के दोनों रागों का कलात्मक और भावात्मक मिश्रण क्लिष्ट व विशेष प्रक्रिया है। पूर्वांग में जयजयवन्ती का करुण व विनयपूर्ण भक्तिभाव परिलक्षित होता है, जबकि उत्तरांग में मियाँ की मल्हार, वर्षा के तरल भावों के साथ समर्पित, पुकारयुक्त व आनन्द से परिपूर्ण भावों का सृजन करने में सक्षम होता है। इस राग में मध्यलय की रचनाएँ अच्छी लगती हैं। आपको सुनवाने के लिए हमने राग जयन्त मल्हार की एक प्राचीन किन्तु मोहक बन्दिश का चयन किया है। अपने समय के बहुआयामी संगीतज्ञ पण्डित विनायक राव पटवर्धन ने इस रचना को स्वर दिया है। पण्डित पटवर्धन ने न केवल रागदारी संगीत के क्षेत्र में, बल्कि सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर में अपना अनमोल योगदान किया था। लीजिए, राग जयन्त मल्हार की तीनताल में निबद्ध यह बन्दिश आप भी सुनिए।


राग जयन्त मल्हार : ‘ऋतु आई सावन की...’ : पण्डित विनायक राव पटवर्धन




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 285वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको उपशास्त्रीय लोक संगीत में समान रूप से लोकप्रिय शैली से लिये गए गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 290वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – भारतीय संगीत की यह कौन सी शैली है? उस शैली का नाम बताइए।

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें गायिका का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 1 अक्टूबर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम ‘स्वरगोष्ठी’ के 287वें अंक में प्रकाशित किया जाएगा। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 283 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1979 में प्रदर्शित फिल्म ‘मीरा’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – मीरा मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – वाणी जयराम

इस बार की संगीत पहेली में चार प्रतिभागियों ने प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। इस बार की पहेली में हमारे नियमित विजेता प्रतिभागी हैं - चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। आप सभी चार विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘पावस ऋतु के राग’ की आज यह छठी कड़ी है। आज की कड़ी में आपने राग जयन्त मल्हार का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में हम वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले मल्हार अंग के कुछ रागों को चुन कर आपके लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं। अगले अंक में हम आपको पावस ऋतु में ही गायी जाने वाली उपशास्त्रीय और लोक सगीत में समान रूप से प्रचलित संगीत शैली के कुछ उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी, हमें लिखिए। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी कड़ी में वर्षा ऋतु का ही एक राग प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


 

Saturday, September 24, 2016

"मन क्यों बहका री बहका आधी रात को…”, क्यों प्यारेलाल इस गीत के लिए वनराज भाटिया का शुक्रिया अदा करते हैं?



एक गीत सौ कहानियाँ - 93

'मन क्यों बहका री बहका आधी रात को...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 93-वीं कड़ी में आज जानिए 1984 की फ़िल्म ’उत्सव’ के मशहूर गीत "मन क्यों बहका री बहका आधी रात को..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर और आशा भोसले ने गाया था। बोल वसन्त देव के और संगीत लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल का। 

ता मंगेशकर और आशा भोसले के गाए युगल गीतों को सुनने का एक अलग ही आनन्द है। फ़िल्म-संगीत के आकाश में ये दोनों बहने सूरज और चाँद की तरह चमकते रहे हैं। और जब जब इन दोनों ने साथ में कोई गीत गाया, गीत को एक अलग ही पहचान मिली। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ऐसे कुल 84 गीत हैं जिनमें लता जी और आशा जी, दोनों की आवाज़ें शामिल हैं। इनमें से कुछ गीतों में अन्य गायक कलाकार भी शामिल हैं। अगर लता-आशा डुएट्स की बात करें तो यह संख्या 62 के करीब है। पहली बार इन बहनों को 1949 की फ़िल्म ’बाज़ार’ में साथ में गवाया था संगीतकार श्यामसुन्दर ने, जिसमें राजकुमारी की आवाज़ भी शामिल थी, गीत के बोल थे “ज़रा सुन लो हम अपना...”। इसी साल मोहम्मद रफ़ी और सतीश बत्रा के साथ इन्हें संगीतकार विनोद ने गवाया ’एक थी लड़की’ में, जिसके बोल थे “हम चले दूर...”। लता-आशा का पहला युगल गीत वर्ष 1951 में रेकॉर्ड हुआ फ़िल्म ’दामन’ के लिए। के. दत्ता के संगीत में यह गीत था “ये रुकी रुकी हवायें...”। फिर इसके बाद तो इन बहनों को कई संगीतकारों ने गवाये जैसे कि रोशन, शंकर जयकिशन, हेमन्त कुमार, सी. रामचन्द्र, नौशाद, मदन मोहन, वसन्त देसाई, एस. एन. त्रिपाठी, सचिन देव बर्मन, आदि नारायण राव, रवि, दत्ताराम, चित्रगुप्त, कल्याणजी-आनन्दजी, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल, राहुल देव बर्मन, ख़य्याम, राम लक्ष्मण और दिलीप सेन – समीर सेन। छोटे भाई हृदयनाथ मंगेशकर ने बड़ी बहनों और आशा जी के पुत्र हेमन्त भोसले ने भी अपनी माँ और मासी को एक साथ माइक के सामने ला खड़ा किया था। लता जी और आशा जी ने आख़िरी बार 1997 की फ़िल्म ’लवकुश’ में साथ में गाया था राम लक्ष्मण के संगीत में। वैसे वर्ष 2000 में जगजीत सिंह के ऐल्बम में “कहीं कहीं से हर चेहरा...” गीत साथ में गाया था। इस गीत में जगजीत सिंह की आवाज़ भी शामिल थी।

80 के दशक में जिस लता-आशा डुएट ने सर्वाधिक धूम मचाई, वह था फ़िल्म ’उत्सव’ का “मन क्यों बहका री बहका आधी रात को...”। विविध भारती के ’उजाले उनकी यादों के’ कार्यक्रम में प्यारेलाल जी ने इस गीत का उल्लेख करते हुए कहा था, “देखिए सबसे मज़े की बात क्या थी इसमें कि एक तो वह गाना जो लिखा गया, वह बहुत ही अच्छा, वसन्त देव जी। उसके बाद जब उसके धुन बनी, सबसे जो मैंने उसमें एन्जॉय किया वह लता जी और आशा जी। मेरे ख़याल से उसके बाद उन्होंने साथ में गाया है कि नहीं, मुझे मालूम नहीं, लेकिन जो दोनो गा रही थीं, उसका हम आनन्द ले रहे थे; एक ज़रा बोले ऐसे, फिर दूसरी बोलती थीं, इतना ख़ूबसूरत लगा और मतलब, मैं तो बोलूंगा कि नेक टू नेक बिल्कुल, जैसे लता जी ने गाया, वैसा ही आशा जी ने गाया है। इस पूरे पिक्चर के अन्दर बड़ी मेहनत की हमने, क्योंकि क्या है कि गिरिश कारनाड जी बहुत ही सेन्सिबल टाइप के आदमी हैं, हर एक चीज़ प्री-प्लान्ड, बल्कि लास्ट क्लाइमैक्स के पहले दो तीन रील तो गाने ही गाने हैं, दो रील में ख़ाली गाने हैं, गाने चल ही रहे थे और बहुत मेहनत किया हम लोगों ने। और मुझे सबसे ख़ुशी क्या हुई जो मैं आपको बोलना चाहूंगा, कि शशि कपूर जी की पिक्चर, हमेशा श्याम बेनेगल या वो करते थे, और गिरिश कारनाड, जो भी करते थे, हमेशा म्युज़िक होता था वनराज भाटिया का। तो मुझे सबसे बड़ी ख़ुशी तब हुई कि एक दिन मुझे फ़ोन किया वनराज जी ने, बोले, I am very very impressed and very glad and both of you have done a great job। मुझे लगा कि आज भी अच्छे लोग हैं दुनिया में, नहीं तो होता है कि हमारी पिक्चर छीन गई, यह बड़प्पन है उन लोगों का, जो अच्छे लोग होते हैं, तो I am real thankful to Mr Vanraj Bhatia।" 

इस गीत की रेकॉर्डिंग् से जुड़ा एक और क़िस्सा प्यारेलाल जी ने एक अन्य साक्षात्कार में बताया था। जैसा कि सभी जानते हैं कि लता जी और आशा जी में हेल्दी प्रोफ़ेशनल राइवलरी हमेशा ही रही है, इस वजह से जब भी कभी एक साथ डुएट गाने की बारी आती तो दोनों अपने अपने तरीके से एक दूसरे से बेहतर प्रदर्शन करने की कोशिशें करते। इस गीत में भी यही हुआ। रिहर्सल होकर गीत रेकॉर्डिंग् तक जा पहुँचा। लता जी और आशा जी आमने-सामने शीशे के केबिनों में गा रही थीं। जैसा कि इस गीत का स्वरूप है कि हर पंक्ति का पहला भाग लता जी गाती हैं, और दूसरा भाग आशा जी, तो एक तरह से लता जी सुर को लेती हैं और आशा जी सुर को छोड़ती हैं। तो गीत के एक जगह पर रिहर्सल के दौरान दोनों बहनों ने जिस तरह से गाया था, असली रेकॉर्डिंग् के समय आशा जी ने एक अलग ही मुड़की ले ली। लता जी ने जैसे ही यह महसूस किया, तो वो आशा की तरफ़ देखीं और मुस्कुरायीं और सहमती से सर हिलाया। आपस में प्रतिस्पर्धा होते हुए भी दोनों एक दूसरे की अच्छी बातों को सराहने में पीछे नहीं रहती थीं। 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Thursday, September 22, 2016

मोहब्बत की कहानी आँसूओं में पल रही है.. सज्जाद अली ने शहद-घुली आवाज़ में थोड़ा-सा दर्द भी घोल दिया है



कहकशाँ - 19
पाकिस्तानी गायक सज्जाद अली की आवाज़  
"पानियो में चल रही है..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है पाकिस्तानी गायक सज्जाद अली की आवाज़।



ज की यह कहकशाँ जिस नज़्म से जगमगाने वाली है, जिस नज़्म के नाम है, उस नज़्म को अपनी आवाज़ से मक़बूल किया है पाकिस्तान के बहुत ही जाने-माने सेमि-क्लासिकल एवं पॉप गायक, अभिनेता, निर्माता और निर्देशक सज्जाद अली ने। पहले उनका छोटा सा परिचय देते हैं:

सज्जाद अली के अब्बाजान साजन (वास्तविक नाम: शफ़क़त हुसैन) नाम से मलयालम फिल्में निर्देशित किया करते हैं। ७० के दशक से अब तक उन्होंने लगभग ३० फिल्में निर्देशित की हैं। मज़े की बात यह है कि ख़ुद तो वे हिन्दुस्तान में रह गए लेकिन उनके दोनों बेटों ने पाकिस्तान में खासा नाम कमाया। जैसे कि आज की गज़ल के गायक सज्जाद अली पाकिस्तान के जानेमाने पॉप गायक हैं, वहीं वक़ार अली एक जानेमाने संगीतकार हैं। सज्जाद अली का जन्म १९६६ में कराची के एक शिया मुस्लिम परिवार में हुआ था। बचपन से ही इन्हें संगीत की शिक्षा दी गई। शास्त्रीय संगीत में इन्हें ख़ासी रूचि थी। उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ाँ, उस्ताद बरकत अली ख़ाँ, उस्ताद मुबारक अली ख़ाँ, मेहदी हसन ख़ाँ, ग़ुलाम अली, अमानत अली ख़ाँ जैसे धुरंधरों के संगीत और गायिकी को सुनकर ही इन्होंने खुद को तैयार किया। इनका पहला एलबम १९७९ में रीलिज हुआ था, जिसमें इन्होंने बड़े-बड़े फ़नकारों की गायिकी को दुहराया। उस एलबम के ज़्यादातर गाने "हसरत मोहानी" और "मोमिन खां मोमिन" के लिखे हुए थे। यूँ तो इस एलबम ने इन्हें नाम दिया लेकिन इन्हें असली पहचान मिली पीटीवी की २५-वीं सालगिरह पर आयोजित किए गए कार्यक्रम "सिलवर जुब्ली" में। दिन था २६ नवंबर १९८३. "लगी रे लगी लगन" और "बावरी चकोरी" ने रातों-रात इन्हें फर्श से अर्श पर पहुँचा दिया। एक वो दिन था और एक आज का दिन है, सज्जाद अली ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। अप्रेल २००८ में "चहार बलिश" नाम से इन्होंने अपना एलबम रीलिज किया, जिसमें "चल रैन दे" (यह गाना वास्तव में जुलाई २००६ में मार्केट में आया था और इस गाने ने उस समय खासा धूम मचाया था) भी शामिल है। इनके बारे में इससे ज्यादा क्या कहा जाए कि खुद ए०आर०रहमान इन्हें "ओरिजिनल क्रोसओवर" मानते हैं।

रहमान इन्हें "ओरिजिनल क्रोसओवर" मानते हैं और कहते हैं कि: "From the realm of the classical, he metamorphosed into one of the brightest lights of Pakistani pop.Always striking the right note, and never missing a beat, even the most hardened purist has to give Sajjad his due. This man can breathe life in a Ghazal even as he puts the V back into verve. He is one of the very few singers in Pakistan who seems a complete singer. As far as skill is concerned I feel nobody compares to Sajjad Ali. He is simply too good at everything he chooses to create." यानि कि "शास्त्रीय संगीत के साम्राज्य से चलकर सज्जाद ने पाकिस्तानी पॉप की चमकती-धमकती दुनिया में भी अपनी पकड़ बना ली है। ये हमेशा सही नोट लगाते हैं और एक भी बीट इधर-उधर नहीं करते, इसलिए जो "प्युरिस्ट" हैं उन्हें भी सज्जाद का महत्व जानना चाहिए। ये ग़ज़लों में जान फूँक देते हैं और गानों में जोश का संचार करते हैं। ये पाकिस्तान के उन चुनिंदे गायकों में से हैं जिन्हें एक सम्पूर्ण गायक कहा जा सकता है। जहाँ तक योग्यता की बात है तो मेरे हिसाब से सज्जाद अली की कोई बराबरी नहीं कर सकता। ये जो भी करते हैं, उसमें शिखर तक पहुँच जाते हैं।"

सज्जाद अली के बारे में हंस राज हंस कहते हैं कि "अगर मेरा पुनर्जन्म हो तो मैं सज्जाद अली के रूप में जन्म लेना चाहूँगा।" तो इतनी काबिलियत है इस एक अदने से इंसान में। 

"विकिपीडिया" पर अगर देखा जाए तो इनके एलबमों की फेहरिश्त इतनी लंबी है कि किसे चुनकर यहाँ पेश करूँ और किसे नहीं, यह समझ नहीं आता। फिर भी मैं कुछ हिट सिंगल्स की लिस्ट दिए देता हूँ:

बाबिया, चल उड़ जा, कुछ लड़कियाँ मुझे, चीफ़ साब, माहिवाल, तस्वीरें, जादू, झूले लाल, चल झूठी, दुआ करो, प्यार है, पानियों में, सोहनी लग दी, सिन्ड्रेला, तेरी याद, ऐसा लगा, कोई नहीं, ना बोलूँगी (रंगीन), चल रैन दे (जिसका ज़िक्र हमने पहले भी किया है), पेकर (२००८)

कुछ सालों से सज्जाद गायकी की दुनिया में नज़र नहीं आ रहे थे, लेकिन अच्छी ख़बर यह है कि अभी हाल में ही इन्होंने "शोएब मंसूर" की आने वाली फिल्म "बोल" के लिए एक गाना रिकार्ड किया है। इसी अच्छी खबर के साथ चलिए हम अब आज की नज़्म की ओर रूख करते हैं।

हम अभी जो नज़्म सुनवाने जा रहे हैं उसे हमने "सिन्ड्रेला" एल्बम से लिया है, जो २००३ में रीलिज हुई थी। इस नज़्म में सज्जाद अली की आवाज़ की मिठास आपको बाँधे रखेगी, इसका मुझे पूरा यकीन है। नज़्म का उनवान है "पानियों में"..

पानियो में चल रही है,
कश्तियाँ भी जल रही हैं,
हम किनारे पे नहीं हैं.. हो..

ज़िंदगी की मेहरबानी
है मोहब्बत की कहानी,
आँसूओं में पल रही है... हो..

जो कभी मिलते नहीं हैं,
मिल भी जाते हैं कहीं पर,
ना मिलें तो ग़म नहीं है.. हो..

दूर होते जा रहे हैं,
ये किनारे, वो किनारे,
ना तुम्हारे, ना हमारे... हो..




’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Wednesday, September 21, 2016

"बॉलीवुड में जिस तरह के गानों की फरमाईश होती है, वो मेरे घराने के नहीं हैं"- संजोय चौधरी : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (29)

एक फिल्म में जितना महत्त्व फिल्म के गीतों का होता है, उतना ही महत्वपूर्ण होता है फिल्म का पार्श्व संगीत, जो पटल पर अवतरित हो रहे दृश्यों को सटीक अंजाम देता है, आज हम आपको मिलवाने जा रहे हैं हमारी बॉलीवुड इंडस्ट्री के दिग्गज पार्श्व संगीत स्कोरर संजोय चौधरी से जो कि महान संगीतकार सलिल चौधरी के सुपुत्र भी हैं, मिलिए "सरफ़रोश", "अ वेडनेसडे", "बेबी" और "प्रेम रतन धन पायो" जैसी ढेरों बड़ी और हिट फिल्मों के पार्श्व संगीतकार से आज "एक मुलाकात ज़रूरी है" में....



एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

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खरा सोना गीत

आपको प्यार छुपाने की बुरी आदत है
सी ए टी कैट...कैट माने बिल्ली
डम डम डिगा डिगा
रुला के गया सपना मेरा
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