रविवार, 11 फ़रवरी 2018

राग दुर्गा : SWARGOSHTHI – 356 : RAG DURGA




स्वरगोष्ठी – 356 में आज

पाँच स्वर के राग – 4 : “चन्दा रे मोरी पतियाँ ले जा…”

उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ से राग दुर्गा की बन्दिश तथा मुकेश और लता से श्रृंगाररस का गीत सुनिए




उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ
फिल्म 'बंजारिन' का पोस्टर
 ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की चौथी कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग दुर्गा का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात गायक उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ के स्वरों में राग दुर्गा की एक बन्दिश के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग दुर्गा के स्वरों का बहुत कम फिल्मी गीतों में उपयोग किया गया है। राग दुर्गा के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1960 में प्रदर्शित फिल्म “बंजारिन” से एक विख्यात गीत –“चन्दा रे मोरी पतियाँ ले जा…”, लता मंगेशकर और मुकेश के स्वर में सुनवा रहे हैं।



आज की कड़ी में हम पाँच स्वर के जिस राग की चर्चा कर रहे हैं, उसे राग दुर्गा के नाम से पहचाना जाता है। संगीत का परिचय देने वाले ग्रन्थों में राग दुर्गा के दो रूप मिलते हैं। इस राग का सर्वाधिक प्रचलित स्वरूप बिलावल थाट के अन्तर्गत माना जाता है और इसमें गान्धार और निषाद स्वर वर्जित होता है। राग दुर्गा का दूसरा स्वरूप खमाज थाट के अन्तर्गत आता है और इसमें ऋषभ और पंचम स्वर वर्जित होता है। आज के अंक में हम बिलावल थाट के राग दुर्गा पर चर्चा कर रहे हैं और इसी स्वरूप का उदाहरण भी प्रस्तुत कर रहे हैं। पहले आप राग दुर्गा के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनेंगे। वर्ष 1960 में रतन पिक्चर्स के बैनर से जसवन्त झवेरी द्वारा निर्मित और निर्देशित तथा मनहर देसाई, कंचन कामिनी और ललिता कुमारी अभिनीत फिल्म “बंजारिन” प्रदर्शित हुई थी। टिकट खिड़की पर यह फिल्म बहुत सफल तो नहीं हुई थी, किन्तु फिल्म का गीत-संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ था। फिल्म के गीतकार थे पण्डित मधुर और संगीतकार थे परदेशी। फिल्म संगीत के इतिहास में चाँद परदेशी अथवा परदेशी एक ही व्यक्ति का नाम है। अब इन्हें ‘भूले बिसरे संगीतकार’ के रूप में चिह्नित किया जाता है। उन्होने बहुत कम फिल्मों में संगीत दिया है, किन्तु जितना भी दिया है, उनमें गज़ब का सुरीलापन है। फिल्म संगीत के इतिहास में उनके बारे में नाममात्र की जानकारी ही उपलब्ध है। यहाँ तक कि इस आलेख को तैयार करते समय हमें चाँद परदेशी का कोई भी चित्र नहीं मिला। हाँ, उनकी संगीतबद्ध फिल्म “बंजारिन” का एक पोस्टर अवश्य मिला, जिसे हम अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। चाँद परदेशी ने 1960 से लेकर 1983 के बीच जितनी भी फ़िल्मों का संगीत-निर्देशन किया उनमें से लगभग 10 फिल्मों की जानकारी उपलब्ध हुई है। शेष फिल्मों के न तो वीडियो उपलब्ध हैं, न पोस्टर या अन्य कोई सूत्र। वर्ष 1960 में ‘बंजारिन’, 1964 में ‘खुफिया महल’, 1972 में ‘बाँकेलाल’, 1973 में ‘परिवर्तन’, 1976 में ‘कितने दूर कितने पास’, 1979 में ‘वनमानुष’, 1981 में ‘ये कैसा नशा’, 1983 में ‘भाई आखिर भाई होता है’ और इसी वर्ष ‘एक बार चले आओ’ चाँद परदेशी के संगीत निर्देशन में बनी फिल्मों की जानकारी उपलब्ध है। पाठकों से अनुरोध है कि इस प्रतिभावान संगीतकार के बारे में यदि कोई जानकारी हो या दी गई जानकारी में कोई संशोधन हो तो हमें अवश्य सूचित करें, ताकि हम अपने पाठको को सही जानकारी उपलब्ध करा सकें। आइए, चाँद परदेशी के संगीत निर्देशन में 1960 में प्रदर्शित फिल्म “बंजारिन” का यह युगलगीत सुनते हैं, जिसे लता मंगेशकर और मुकेश ने स्वर दिया है। यह गीत राग दुर्गा के स्वरों पर आधारित है।

राग दुर्गा : “चन्दा रे मोरी पतियाँ ले जा...” : लता मंगेशकर और मुकेश : फिल्म – बंजारिन


थाट बिलावल, ग नि वर्जित, औड़व-औड़व जाति,
ध रे स्वर संवाद करत, जब गावत गुनिजन रात्रि।

संगीत के ग्रन्थों में दुर्गा नाम से राग के दो प्रकार मिलते हैं। एक का सम्बन्ध बिलावल थाट से और दूसरे का सम्बन्ध खमाज थाट से माना जाता है। आजकल बिलावल थाट के राग दुर्गा का प्रचलन अधिक है। राग दुर्गा के इन दोनों प्रकार की जाति औड़व-औड़व होती है, अर्थात दोनों रूप के आरोह-अवरोह में पाँच-पाँच स्वर होते हैं। बिलावल थाट के राग दुर्गा में वादी और संवादी स्वर क्रमशः धैवत और ऋषभ होता है तथा इस राग में गान्धार और निषाद वर्जित होता है। जबकि खमाज थाट के राग दुर्गा में वादी-संवादी क्रमशः गान्धार और निषाद होता है तथा ऋषभ और पंचम स्वर वर्जित होता है। इसके साथ ही खमाज थाट के राग दुर्गा के आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग भी होता है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे के मतानुसार राग दुर्गा में वादी-संवादी क्रमशः मध्यम और षडज होता है। ग्रन्थकार हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव और अन्य विद्वान इस विचार से सहमत नहीं हैं। इनके अनुसार राग दुर्गा के समप्रकृति राग जलधर केदार में वर्जित स्वर समान होते है। ऐसे में यदि वादी-संवादी स्वर भी एक जैसे हो तो दोनों रागों में अन्तर करना कठिन हो जाता है। इसके अलावा राग दुर्गा पंचम की अपेक्षा धैवत स्वर अधिक महत्वपूर्ण होता है और अन्य किसी राग की छाया आने की सम्भावना नहीं होती। इसके विपरीत मध्यम पर न्यास करने से जलधर केदार राग की स्पष्ट छाया आती है। अतः राग दुर्गा के वादी और संवादी स्वर क्रमशः धैवत और ऋषभ सर्वाधिक उपयुक्त हैं। यह उत्तरांग प्रधान राग है। दक्षिण भारतीय संगीत प्रणाली में राग दुर्गा के समतुल्य राग को शुद्ध सावेरी के नाम से जाना जाता है। रात्रि के दूसरे प्रहर में राग दुर्गा का गायन-वादन सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। बिलावल थाट के राग दुर्गा के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ के स्वर में इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचन के बोल हैं –“जय दुर्गे दुर्गति परिहारिणी...”। आप यह खयाल रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग दुर्गा : “जय दुर्गे दुर्गति परिहारिणी...” : उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ

 संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 356वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायक और गायिका की युगल आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 10 फरवरी, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 357वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 354वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म “बैजू बावरा” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मालकौंस, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुहम्मद रफी

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में पहली बार भाग लेने वाले मगनलाल गढ़िया ने तीनों प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं। हम उनका हार्दिक अभिनन्दन करते है। इस पहेली के हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 

अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” के इस अंक में आपने राग दुर्गा का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ के स्वर में राग दुर्गा के एक द्रुत खयाल का रसास्वादन कराया। राग दुर्गा के स्वरों का उपयोग करते हुए बहुत कम फिल्मी गीत रचे गए हैं। आज आपने फिल्म “बंजारिन” से राग दुर्गा के स्वरों में पिरोया एक चर्चित गीत लता मंगेशकर और मुकेश के युगल स्वर में सुना। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 








मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

मैजस्टिक मूँछें - सलिल वर्मा, उषा छाबड़ा, अनुराग शर्मा

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में विष्णु प्रभाकर की कहानी रोटी या पाप का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं अनुराग शर्मा की "मैजस्टिक मूँछें", जिसको स्वर दिया है सलिल वर्मा, उषा छाबड़ा, और अनुराग शर्मा ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 19 मिनट 45 सेकण्ड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

अनुराग शर्मा की कहानी मैजेस्टिक मूँछें का गद्य हिंदी समय पर उपलब्ध है। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानी, उपन्यास, नाटक, धारावाहिक, प्रहसन, झलकी, एकांकी, या लघुकथा को स्वर देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

शक्ति के बिना धैर्य ऐसे ही है जैसे बिना बत्ती के मोमबत्ती।
अनुराग शर्मा (पिट्सबर्ग)

हर सप्ताह यहीं पर सुनिए एक नयी कहानी

"तुम जबसे गयीं, निपट अकेला हूँ। वही शनिवार, वही तीसरा पहर, वही अड्डा, वही बेंच, वही आवाज़ें।"
(अनुराग शर्मा की "मैजस्टिक मूँछें" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
मैजेस्टिक मूँछें mp3

#Fourth Story: Majestic Moustache; Author: Anurag Sharma; Voice: Salil Varma, Usha Chhabra, Anurag Sharma; Hindi Audio Book/2018/4.

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

राग मालकौंस : SWARGOSHTHI – 355 : RAG MALKAUNS




स्वरगोष्ठी – 355 में आज

पाँच स्वर के राग – 3 : “मन तड़पत हरिदर्शन को आज…”

राजन-साजन मिश्र से श्रृंगाररस की बन्दिश और मुहम्मद रफी से भक्तिरस का गीत सुनिए





नौशाद, मुहम्मद रफी और शकील बदायूनी
पण्डित राजन और साजन मिश्र
"रेडियो प्लेबैक इण्डिया" के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा करेंगे जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की तीसरी कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग मालकौंस का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात युगल गायक राजन और साजन मिश्र के स्वरों में राग मालकौंस की एक बन्दिश के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। अनेक फिल्मी गीतों में राग मालकौंस का प्रयोग किया गया है। राग मालकौंस में ही निबद्ध 1952 में प्रदर्शित फिल्म “बैजू बावरा” से एक विख्यात गीत –“मन तड़पत हरिदर्शन को आज…”, मुहम्मद रफी के स्वर में सुनवा रहे हैं।



पाँच स्वर के राग अर्थात औड़व-औड़व जाति के रागों की श्रृंखला के अन्तर्गत आज की कड़ी में हम बेहद लोकप्रिय राग मालकौंस की चर्चा कर रहे हैं। राग मालकौंस भैरवी थाट का एक लोकप्रिय राग है। पहले आपको सुनवाते है, राग मालकौंस का एक आकर्षक फिल्मी रूपान्तरण। संगीतकार नौशाद ने फिल्म ‘बैजू बावरा’ के लिए एक कालजयी भक्तिगीत रचा था। नौशाद की भक्तिरस प्रधान गीतों की रचनात्मक कुशलता के बारे में फिल्म संगीत के इतिहासकार पंकज राग, अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में लिखते हैं- “नौशाद के संगीत के दो पहलू रहे हैं- एक तो शास्त्रीय आधार का सरस, सुगम्य रूपान्तरित लोकसंगीत और दूसरा शास्त्रीय आधारित आभिजात्य संगीत जिसमें कभी मुगलिया या लखनऊ की नवाबी संस्कृति की खूबसूरत भंगिमाएँ रहती थीं, तो कभी ईश्वर की आराधना करता उदात्त भक्ति-संगीत। साहित्य में भक्ति-साहित्य भले ही लोकरंजक और लोकसंस्कृति से प्रेरित रहा हो, पर नौशाद के भक्ति-गीतों में शुद्ध, गम्भीर शास्त्रीय सुर ही लगे हैं। नौशाद के संगीत की मूल प्रवृत्ति भारतीय शास्त्रीय संगीत-परम्परा की तरह ही कलावादी रही है।” फिल्म ‘बैजू बावरा’ के भक्तिपरक गीत यदि नौशाद को शिखर तक ले जाते हैं, वहीं गायक मुहम्मद रफी को उनके भावपूर्ण गायन के लिए प्रथम श्रेणी के गायकों में शामिल कराते हैं। प्रस्तुत है, गीतकार शकील बदायूनी, संगीतकार नौशाद और गायक मुहम्मद रफी द्वारा सृजित आस्था, समर्पण और पुकार से युक्त फिल्म ‘बैजू बावरा’ का यह गीत।

राग मालकौंस : ‘मन तड़पत हरिदर्शन को आज...’ : मुहम्मद रफी : फिल्म - बैजू बावरा



थाट भैरवी, वादी म सा, रखिए रे प वर्ज्य,
तृतीय प्रहर निशि गाइए, मालकौंस का अर्ज।

राग मालकौंस की गणना भैरवी थाट के अन्तर्गत की जाती है। इसमें ऋषभ और पंचम स्वर वर्जित वर्जित होता है। अतः इसकी जाति औड़व-औड़व होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग मालकौंस में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। इस राग का गायन-वादन रात्रि के तीसरे प्रहर में सर्वाधिक अनुकूल होता है। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में समान रूप से किया जाता है। सुविख्यात इसराज और मयूरवीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र से इस राग पर हमारी विस्तृत चर्चा हुई। उन्होने बताया कि राग भैरवी के कोमल ऋषभ और पंचम को हटा देने पर बचे हुए भैरवी के स्वरों- कोमल गान्धार, मध्यम, कोमल धैवत और कोमल निषाद में मध्य व तार सप्तक के षडज का संयोग कर देने से जिस राग का रूप निर्मित होता है वह मालकौंस है। औड़व जाति के इस इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग मालकौंस सागर की भाँति है। विविध नदियों का मानों इसमें समागम है। इसके मन्द्र धैवत को षडज मान कर यदि मालकौंस के स्वरों का प्रयोग किया जाए तो राग भूपाली का दर्शन होने लगता है। मन्द्र निषाद को जब षडज मान कर मालकौंस के स्वरों का प्रयोग किया जाता है तब राग मेघ मल्हार का आभास होने लगता है। इसी प्रकार गान्धार स्वर को यदि षडज मान कर प्रयोग किया जाए तो राग दुर्गा और मध्यम को षडज मान कर चलने पर राग धानी की झलक मिलने लगती है। राग भूपाली का आत्मनिवेदन, मेघ मल्हार का नैसर्गिक गाम्भीर्य, राग दुर्गा में व्याप्त भक्तिभाव की विनयपूर्ण अभिव्यक्ति और राग धानी का वैचित्र्य भाव, इन सभी के समागम से राग मालकौंस का गम्भीर चिन्तनशील स्वरूप कायम होता है। राग मालकौंस में षडज स्वर आधार है। कोमल गान्धार स्वर से पुकार का भाव और मध्यम स्वर पर ठहराव से मन व्यापक चिन्तन की दिशा में अग्रसर होने लगता है। राग मालकौंस में कोमल ऋषभ और पंचम स्वर के न होने से मध्यम के साथ शेष तीनों कोमल स्वर गान्धार, धैवत और निषाद के मिलाप से गाम्भीर्य कायम होता है। कोमल ऋषभ के विषाद भाव और पंचम की जागृति दोनों ही दार्शनिक गाम्भीर्य निर्मित करने में व्यवधान उत्पन्न न करें, इसीलिए इनका प्रयोग निषिद्ध है। राग मालकौंस में प्रयुक्त स्वरों को निरन्तर दुहराने से राग भूपाली, मेघ मल्हार, दुर्गा और धानी झलक जाएँगे। इसलिए राग मालकौंस को बरतना सरल नहीं होता। मध्यम के साथ मिल कर स्वरात्मक व सहयोगी क्रियाकलाप होंगे तो मालकौंस का स्वरूप कायम रहेगा। अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, राग मालकौंस के शास्त्रीय स्वरूप को प्रदर्शित करने के लिए इस राग की एक बन्दिश। अब आप सुनिए, सुविख्यात युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वर में द्रुत तीनताल में निबद्ध एक खयाल रचना। आप इस रचना का आस्वादन करें और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की की अनुमति दें।

राग मालकौंस : “आज मोरे घर आइल बलमा...’ : पण्डित राजन और साजन मिश्र



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 355वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा दो प्रश्न का उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 360वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा के साथ ही उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायक और गायिका की युगल आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 10 फरवरी, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 357वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 353वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – तिलंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

वर्ष 2018 की पहेली क्रमांक 353 का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी चार प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, आज हम आपको एक चिन्ताजनक सूचना देना चाहते हैं। "स्वरगोष्ठी" की पहेली प्रतियोगिता की पिछले कई वर्षों की महाविजेता और हमारी नियमित पाठक व श्रोता, पेंसिलवेनिया, अमेरिका की श्रीमती विजया राजकोटिया अवस्थ हैं। आगामी 12 फरवरी, 2018 को अमेरिका में उनकी स्पाइनल सर्जरी होने वाली है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक और सम्पादक मण्डल के सभी सदस्य उनके इस कष्ट से उदास हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि विजया जी को शीघ्र स्वस्थ करें। ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” के इस अंक में आपने राग मालकौंस का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए हमने पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वर में राग मालकौंस के एक द्रुत खयाल का रसास्वादन कराया। राग मालकौंस के स्वरों का उपयोग करते हुए कई फिल्मी गीत भी रचे गए हैं। आज आपने फिल्म “बैजू बावरा” से राग मालकौंस के स्वरों में पिरोए एक चर्चित गीत मुहम्मद रफी के स्वर में सुना। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग मालकौंस : SWARGOSHTHI – 355 : RAG MALKAUNS : 4 Feb., 2018

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