शनिवार, 15 अगस्त 2015

चित्रशाला - 02: स्वाधीनता संग्राम में फ़िल्म-संगीत की भूमिका


स्वतंत्रता दिवस पर विशेष प्रस्तुति


चित्रशाला - 02

स्वाधीनता संग्राम में फ़िल्म-संगीत की भूमिका




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विविध पहलुओं से सम्बन्धित शोधालेखों पर आधारित श्रृंखला 'चित्रशाला' में आप सब का स्वागत है। आज राष्ट्र अपना 69-वाँ स्वाधीनता दिवस मना रहा है। इस विशेष पर्व पर हम अपने सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं। भारत के स्वाधीनता संग्राम में केवल क्रान्तिकारियों और नेताओं का ही योगदान नहीं था, बल्कि समाज के हर वर्ग के लोगों और संस्थाओं ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस देश को आज़ादी दिलाने में अपना अपना योगदान दिया। फ़िल्म, संगीत और फ़िल्म-संगीत का भी योगदान कम उल्लेखनीय नहीं था। आइए आज ’चित्रशाला’ के दूसरे अंक में जाने कि किस तरह से फ़िल्मी गीतों ने हमारे स्वाधीनता संग्राम में राष्ट्रीय भावना को जनसाधारण में जागृत करनए में योगदान दिया। प्रस्तुत है सुजॉय चटर्जी द्वारा लिखित शोधालेख ’स्वाधीनता संग्राम में फ़िल्म संगीत की भूमिका’।



1930 के दशक के आते-आते पराधीनता के ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ देश आज़ादी के लिए ज़ोर शोर से कोशिशें करने लगा। 14 मार्च 1931 को पहली बोलती फ़िल्म ‘आलम-आरा’ प्रदर्शित हुई तो इसके ठीक नौ दिन बाद, 23 मार्च को भरत सिंह की फाँसी हो गई। समूचे देश का ख़ून खौल उठा। राष्ट्रीयता और देश-प्रेम की भावनाओं को जगाने के लिए फ़िल्म और फ़िल्मी गीत-संगीत मुख्य भूमिकाएँ निभा सकती थीं। पर ब्रिटिश सरकार ने इस तरफ़ भी अपना शिकंजा कसा और समय-समय पर ऐसी फ़िल्मों और गीतों पर पाबंदियाँ लगाई जो देश की जनता को ग़ुलामी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए प्रोत्साहित करती थीं। ग़ैर फ़िल्मी गीतों और कविताओं पर भले प्रतिबंध लगा पाना मुश्किल था, पर सेन्सर बोर्ड के माध्यम से फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों पर प्रतिबंध लगाना ज़्यादा मुश्किल कार्य नहीं था। और यही कारण है कि स्वाधीनता से पहले कोई भी फ़िल्म निर्माता शहीद भगत सिंह के जीवन पर फ़िल्म बनाने में असमर्थ रहे। देश आज़ाद होने के बाद उन पर बहुत सी फ़िल्में ज़रूर बनीं।

ब्रिटिश सरकार की लाख पाबंदियों के बावजूद फ़िल्मकारों ने बार-बार अपनी फ़िल्मों के माध्यम से देश की जनता को देश-भक्ति का पाठ पढ़ाया है। स्वाधीनता संग्रामियों की ही तरह ये फ़िल्मकार भी अपनी फ़िल्मों के माध्यम से हमारी स्वाधीनता संग्राम में अंशग्रहण किया और इस दिशा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। बोलती फ़िल्मों के शुरुआती दो-तीन वर्षों में देश-भक्ति रचनाएँ फ़िल्मों में सुनने को भले न मिली हों, पर 1935 में संगीतकार नागरदास नायक ने प्रफ़ुल्ल राय निर्देशित ‘भारत लक्ष्मी पिक्चर्स’ की फ़िल्म ‘बलिदान’ में “जागो जागो भारतवासी, एक दिन तुम थे जगद्‍गुरू, जग था उन्नत अभिलाषी” स्वरबद्ध कर जनता को स्वाधीनता की ओर उत्तेजित करने की कोशिश की थी। इस गीत के बाद इसी वर्ष नागरदास की ही धुन पर पंडित सुदर्शन का लिखा हुआ एक और देशभक्ति भाव से ओत-प्रोत गीत आया “भारत की दीन दशा का तुम्हें भारतवालों, कुछ ध्यान नहीं”; फ़िल्म थी ‘कुँवारी या विधवा’। इन दोनो गीतों के गायकों का पता तो नहीं चल सका है पर स्वाधीनता संग्राम के शुरुआती देशभक्ति फ़िल्मी गीतों के रूप में इनका उल्लेख अत्यावश्यक हो जाता है। चन्दुलाल शाह निर्देशित देश-भक्ति फ़िल्म ‘देश दासी’ भी इसी वर्ष आई पर इसके संगीतकार/गीतकार की जानकारी उपलब्ध नहीं है; हाँ इतना ज़रूर बताया जा सकता है कि इस फ़िल्म में भी एक देशभक्ति गीत था “सेवा ख़ुशी से करो देश की रे जीवन हो जाए फूलबगिया”, जिसमें देश-सेवा के ज़रिये देश को एक महकता बगीचा बनाने का सपना देखा गया है। देश सेवा को ईश्वर सेवा बताता हुआ इसी फ़िल्म का एक अन्य गीत था “यही है पूजा यही इबादत, यही है भगवत भजन हमारा, वतन की ख़िदमत…”। ‘वाडिआ मूवीटोन’ की 1935 की फ़िल्मों में ‘देश दीपक’ (‘जोश-ए-वतन’ शीर्षक से भी प्रदर्शित) उल्लेखनीय है जिसमें संगीत दिया था मास्टर मोहम्मद ने और गीत लिखे थे जोसेफ़ डेविड ने। सरदार मन्सूर की आवाज़ में फ़िल्म का एक देशभक्ति गीत “हमको है जाँ से प्यारा, प्यारा वतन हमारा, हम बागबाँ हैं इसके…” लोकप्रिय हुआ था। इन बोलों को पढ़ कर इससे "सारे जहाँ से अच्छा" गीत के साथ समानता नज़र आती है। 1936 में 'वाडिआ मूवीटोन' की ही एक फ़िल्म आई ‘जय भारत’, जिसमें सरदार मंसूर और प्यारू क़व्वाल के अलावा मास्टर मोहम्मद ने भी कुछ गीत गाये थे। मास्टर मोहम्मद का गाया इसमें एक देश भक्ति गीत था “हम वतन के वतन हमारा, भारत माता जय जय जय”। इस तरह से 1935-36 में हिन्दी फ़िल्मों में देशभक्ति गीत गूंजने लग पड़े थे और जैसे ये गीत स्वाधीनता संग्राम की अग्नि में घी का काम किया।

1939 में 'बॉम्बे टॉकीज़' की फ़िल्म ‘कंगन’ में कवि प्रदीप ने गीत भी लिखे और तीन गीत भी गाए। यह वह दौर था जब द्वितीय विश्वयुद्ध रफ़्तार पकड़ रहा था। 1 सितम्बर 1939 को जर्मनी ने पोलैण्ड पर आक्रमण कर दिया, और चारों तरफ़ राजनैतिक अस्थिरता बढ़ने लगी। इधर हमारे देश में भी स्वाधीनता के लिए सरगर्मियाँ तेज़ होने लगीं थीं। ऐसे में फ़िल्म ‘कंगन’ में प्रदीप ने एक गीत लिखा “राधा राधा प्यारी राधा, किसने हम आज़ाद परिंदों को बंधन में बांधा”। अशोक कुमार और लीला चिटनिस ने इस गीत को गाया था। ब्रिटिश राज में राष्ट्रीयता वाले गीत लिखने और उसका प्रचार करने पर सज़ा मिलती थी, ऐसे में प्रदीप ने कितनी चतुराई से इस गीत में राष्ट्रीयता के विचार भरे हैं। प्रदीप की राष्ट्रप्रेम की कविताओं और गीतों का असर कुछ ऐसा हुआ कि बाद में वो ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि से सम्मानित हुए। यह भी स्मरण में लाने योग्य है कि अमर देश-भक्ति गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी” भी उन्हीं के कलम से निकला था। अगर प्रदीप एक देशभक्त गीतकार थे तो उनकी ही तरह एक देश-भक्त संगीतकार हुए अनिल बिस्वास, जिन्होंने संगीत क्षेत्र में आने से पहले कई बार जेल जा चुके थे अपनी राजनैतिक गतिविधियों की वजह से। 1939 में ही ‘सागर मूवीटोन’ की एक फ़िल्म आई ‘कॉमरेड्स’ (हिन्दी में ‘जीवन साथी’ शीर्षक से) जिसमें अनिल दा का संगीत था। सुरेन्द्र, माया बनर्जी, हरीश और ज्योति अभिनीत इस फ़िल्म में सरहदी और कन्हैयालाल के साथ साथ आह सीतापुरी ने भी कुछ गीत लिखे थे। फ़िल्म में एक देशभक्ति गीत “कर दे तू बलिदान बावरे कर दे तू बलिदान, हँसते-हँसते तू दे दे अपने प्राण” स्वयं अनिल बिस्वास ने ही गाया था और इस गीत का फ़िल्मांकन पृष्ठभूमि में हुआ था। देश पर न्योछावर होने का पाठ पढ़ाता यह जोशिला गीत उस ज़माने में काफ़ी चर्चित हुआ था।

चर्चित फ़िल्मों के अलावा कई ऐसी फ़िल्में भी बनीं जो व्यावसायिक दृष्टि से असफल रहीं, पर ये फ़िल्में इस बात के लिए महत्वपूर्ण थीं कि इनमें देश-भक्ति के गीत थे। और उस दौर में जब कि देश पराधीन था, निस्संदेह ऐसे गीतों का महत्व और भी बढ़ जाता है। 1939 की स्टण्ट फ़िल्म ‘पंजाब मेल’ में नाडिया, सरिता देवी, शहज़ादी, जॉन कावस आदि कलाकार थे। पंडित ‘ज्ञान’ के लिखे गीतों को सरिता, सरदार मन्सूर और मोहम्मद ने स्वर दिया । फ़िल्म में दो देशभक्ति गीत थे - “इस खादी में देश आज़ादी दो कौड़ी में बेड़ा पार, देश भक्त ने…” (सरिता, मोहम्मद, साथी) और “क़ैद में आए नन्ददुलारे, दुलारे भारत के रखवारे” (सरिता, सरदार मन्सूर)। संगीतकार एस. पी. राणे का संगीत इस दशक के आरम्भिक वर्षों में ख़ूब गूंजा था और 30 के दशक के आख़िर तक कम होता दिखाई दे रहा था। 1939 में उनकी धुनों से सजी एक ही फ़िल्म आई ‘इन्द्र मूवीटोन’ की ‘इम्पीरियल मेल’ (संगीतकार प्रेम कुमार के साथ)। सफ़दर मिर्ज़ा के लिखे इस फ़िल्म के गीत आज विस्मृत हो चुके हैं, पर इस फ़िल्म में दो देशभक्ति गीत थे “सुनो सुनो हे भाई, भारत माता की दुहाई, ग़ैरों की ग़ुलामी करते…” और “करेंगे देश को आज़ाद, ज़र्रे-ज़र्रे की है ज़बाँ पर भारत की फ़रियाद”। देश को आज़ाद कराने की चाहत देश के हर नागरिक के दिल में तो थी ही, फ़िल्मी देश-भक्ति गीतों में भी यही विचार उभरने लगी। “करेंगे देश को आज़ाद” गीत पर ब्रिटिश राज की प्रतिबंध लगी जो कोई हैरानी की बात नहीं थी। पर जब समूचा देश अपने आप को आज़ाद कराने के सपने देख रहा हो तो ऐसे में कोई भी प्रतिबंध इस जोश को दबा नहीं सकती थी। किसी गीत या फ़िल्म को दबाया जा सकता है पर उस जोश को कैसे दबायें जो हर भारतवासी के दिल में उमड़ रहा था! 

30 के दशक के आख़िरी साल, यानी 1939 में, बहुत से देशभक्ति गीत फ़िल्मों में सुनाई पड़े हैं। इस वर्ष ‘वनराज पिक्चर्स, बम्बई’ की एम. उदवाडिया निर्देशित फ़िल्म अई थी ‘वतन के लिए’। इस फ़िल्म के लिए पराधीन भारत के लोगों में देशभक्ति के जस्बे को जगाने के लिए मुन्शी दिल ने दो देशभक्ति गीत लिखे; पहला “ईतहाद करो, ईतहाद करो, तुम हिन्द के रहने वालों” और दूसरा “भारत के रहने वालों, कुछ होश तो संभालो, ये आशियाँ हमारा”। इन दोनों गीतों को गुलशन सूफ़ी और बृजमाला ने गाया था। उधर 'न्यू थिएटर्स' के संगीतकार तिमिर बरन के करीयर की सबसे बड़ी उपलब्धि 1939 में उनकी कम्पोज़ की हुई ‘वन्दे मातरम’ रही। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस इस गीत के लिए एक ऐसी धुन चाहते थे जो समूहगान के रूप में गाई जाए और जिससे जोश पैदा हो मातृभूमि के लिए मर-मिटने की। तिमिर बरन ने राग दुर्गा में नेताजी की मनोकामना को पूरा किया और जब नेताजी ने अपनी ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ का निर्माण किया तो सिंगापुर रेडियो से ‘वन्दे मातरम’ के इसी संस्करण को बजवाया।

40 के दशक के आते-आते देशभक्ति विचारधारा वाली फ़िल्मों की संख्या में भी निरन्तर वृद्धि होती गई। सन्‍ 1940 की बात करें तो ‘रणजीत मूवीटोन’ के बैनर तले निर्मित ‘आज का हिन्दुस्तान’ में दीना नाथ मधोक के लिखे और खेमचन्द प्रकाश (सहायक: बन्ने ख़ाँ) द्वारा स्वरबद्ध गीतों में ईश्वरलाल और साथियों का गाया एक देशभक्ति गीत था “चरखा चलाओ बहनों, कातो ये कच्चे धागे, धागे ये कह रहे हैं…”। इस गीत में गांधीवादी स्वदेशी विचारधारा साफ़ झलकती है। ‘ई. पी. कंगा प्रोडक्शन्स’ की वेशभूषा प्रधान फ़िल्म ‘आज़ादी-ए-वतन’ के संगीतकार का पता तो नहीं चल सका, पर मुन्शी दिल का लिखा इस फ़िल्म का एक देशभक्ति गीत था “सर करो वतन पे क़ुरबान, मुल्क के सारे नौजवान सर करो क़ुरबान”। यह फ़िल्म दरसल विदेशी भाषा के किसी फ़िल्म को डब कर के बनाई गई थी। ‘रेक्स पिक्चर्स’ की फ़िल्म ‘देश भक्त’ भी इसी श्रेणी की फ़िल्म थी जिसके संगीतकार थे वसन्त कुमार नायडू तथा गीतकार थे वाहिद क़ुरैशी और शेफ़्ता। पर इस फ़िल्म के गीतों की सूची में कोई देश भक्ति गीत की जानकारी नहीं मिल पाई है। वसन्त कुमार नायडू का संगीत ‘चन्द्रा आर्ट प्रोडक्शन्स’ की फ़िल्म ‘जंग-ए-आज़ादी’ में भी गूंजा था और इस फ़िल्म में वाहिद क़ुरैशी का लिखा देशभक्ति गीत था “वीरों, वीरों, हो जाओ क़ुरबान, अपनी इज़्ज़त ग़ैरत का हम लें दुश्मन से बदला”। ‘मोहन पिक्चर्स’ के बैनर तले निर्मित और अनिल कुमार और अमीरबाई कर्नाटकी के अभिनय से सजी फ़िल्म ‘हमारा देश’ में गीतकार मुन्शी नायाब ने एक देश भक्ति गीत लिखा था “हम देश के हैं परवाने मस्ताने दीवाने, आज़ादी के अफ़साने…”। फ़िल्म में संगीत था भगतराम बातिश का। ‘वाडिआ मूवीटोन’ की फ़िल्म ‘हिन्द का लाल’ में मधुलाल दामोदर मास्टर का संगीत था, जिसमें ज्ञान के लिखे देश भक्ति गीत “भारत की पत राखो भगवन्त, भारत की पत राखो” और “मुबारक़ हो, मुबारक़ हो, ये हिन्द का लाल मुबारक़ हो” शामिल थे। “मुबारक हो” गीत अहमद दिलावर का गाया हुआ था। वाडिआ की ही फ़िल्म ‘जय स्वदेश’ में भी मधुलाल का ही संगीत था, और जिसमें ज्ञान ने एक बार फिर एक देश भक्ति गीत लिखा “जय स्वदेश, जय जय स्वदेश, हम भारत के गुण गायेंगे”। सरदार मन्सूर, अहमद दिलावर और साथियों के गाये इस गीत के अलावा वाहिद क़ुरैशी का लिखा एक और देश भक्ति गीत भी था इस फ़िल्म में। वत्सला कुमठेकर और अहमद दिलावर का गाया यह गीत था “भारत पे काले बादल छाए रहेंगे कब तक”। भीष्मदेव चटर्जी के संगीत में ‘फ़िल्म कॉर्पोरेशन ऑफ़ इण्डिया, कलकत्ता’ की 1940 में फ़िल्म आई ‘हिन्दुस्तान हमारा’ जिसमें आरज़ू लखनवी का लिखा एक देश भक्ति गीत था “हिन्दोस्तां के हम हैं हिन्दोस्तां हमारा, है ये ज़मीं हमारी है आसमां हमारा”। कुछ कुछ इसी शैली में 1944 की फ़िल्म ‘पहले आप’ में एक गीत था “हिन्दोस्तां के हम हैं और हिन्दोस्तां हमारा, हिन्दू मुस्लिम दोनों की आँखों का तारा”। ‘हिन्दुस्तान हमारा’ में भी स्वदेशी विचारधारा का एक गीत था “चर्खा चल के काम बनाए, चर्खा आए ग़रीबी जाए, निकले चर्खे से जब तार...”। इसी साल संगीतकार ख़ान मस्ताना के संगीत में ‘मिनर्वा’ की फ़िल्म ‘वसीयत’ प्रदर्शित हुई जिसमें मस्ताना के अलावा शीला और प्रमिला ने गीत गाए। फ़िल्म में अब्दुल वकील के लिखे हुए गीत थे। शीला और साथियों का गाया हुआ एक देशभक्ति गीत भी था – “हिन्दमाता की तुम्हीं सन्तान हो, नौजवानों तुम वतन की शान हो”। 1941 में ‘सिरको प्रोडक्शन्स’ की गुंजल निर्देशित फ़िल्म ‘तुलसी’ में हरिश्चन्द्र बाली का संगीत था और गीत पंडित फ़ानी ने लिखे। इसमें एक देशभक्ति गीत था “स्वर्ग है भारत देश हमारा”, जो “जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरियसी” के विचार को व्यक्त करता है। देशप्रेम से ओत-प्रोत इन सभी फ़िल्मों और इन फ़िल्मों में शामिल देश-भक्ति गीतों ने स्वाधीनता संग्राम में राष्ट्रीयता की भावना को जगाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। ‘तुलसी’ के बाद 1942 में ‘सिरको प्रोडक्शन्स’ ने फिर एक बार हरिश्चन्द्र बाली को संगीतकार लेकर ‘अपना घर’ फ़िल्म बनाई। शान्ता आप्टे, चन्द्रमोहन, माया बनर्जी अभिनीत इस फ़िल्म के सभी गीत शान्ता आप्टे ने गाये। पंडित नरोत्तम व्यास गीतकार थे। फ़िल्म देशभक्ति मिज़ाज का था, जिसका शीर्षक गीत था “अपना घर, अपना घर, अपना देश है अपना घर”। बरसों बाद राज कपूर की फ़िल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के एक मशहूर देशभक्ति गीत में कुछ-कुछ इसी भाव को व्यक्त करती पंक्ति “लाख लुभाये महल पराये, अपना घर फिर अपना घर है” सुनाई पड़ी।

1943 के आते-आते “अंग्रेज़ों, भारत छोड़ो” के नारे देश की गली-गली में गूंजने लगे। पिछले साल शुरू हुए ‘भारत छोड़ों आंदोलन’ ने स्वाधीनता संग्राम को एक नया मोड़ दे दिया था। फ़िल्मों में भी आज़ादी का जुनून बढ़ता दिखाई दिया। ऐसे में इस वर्ष ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की फ़िल्म आई ‘क़िस्मत’ जिसने अब तक के सभी फ़िल्मों के रेकॉर्ड तोड़ दिए। कलकत्ते के ‘चित्र प्लाज़ा’ थिएटर में यह फ़िल्म लगातार साढ़े तीन साल तक चली और बॉक्स ऑफ़िस के सारे रेकॉर्ड तोड़ दिए, और ‘किस्मत’ के इस रेकॉर्ड को आगे चलकर 70 के दशक में फ़िल्म ‘शोले’ ने तोड़ा। ‘क़िस्मत’ अनिल बिस्वास की ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की सब से कामयाब फ़िल्म थी। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत एक देशभक्ति गीत था अमीरबाई और साथियों का गाया हुआ - “आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ऐ दुनियावालों हिन्दुस्तान हमारा है”। इस गीत ने स्वाधीनता-संग्राम की अग्नि को ऐसी हवा दी कि इसकी लपटें बहुत उपर तक उठीं और बहुत दूर तक इन लपटों ने राष्ट्रीयता की रोशनी बिखेरी। गीत का रिदम और ऑरकेस्ट्रेशन भी ऐसा ‘मार्च-पास्ट’ क़िस्म का था कि सुनते ही मन जोश से भर जाए! एक तरफ़ अनिल बिस्वास, जो ख़ुद एक कट्टर देशभक्त थे और जो फ़िल्मी दुनिया में आने से पहले चार बार जेल भी जा चुके थे, तो दूसरी तरफ़ इस गीत के गीतकार कवि प्रदीप, जिनकी झनझनाती राष्ट्रवादी कविताएँ लहू में उर्जा पैदा कर देती; इ्स देशभक्त गीतकार-संगीतकार की जोड़ी से उत्पन्न होने की वजह से ही शायद यह देशभक्ति गीत अमर हो गया। साथ ही ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान इसके आने से इस गीत का प्रकोप और ज़्यादा बढ़ गया। उस वक़्त देश की राजनैतिक अवस्था अच्छी नहीं थी क्योंकि उस समय के सभी बड़े नेता जेल में थे। प्रदीप ने बहुत ही चतुराई से इस गीत को लिखा जिससे कि अंग्रेज़ों को यह लगे कि यह गीत ‘ऐक्सिस पावर्स’ (Axis powers – Germany, Italy, Japan etc) के ख़िलाफ़ लिखा गया है, पर भारतीयों को इस गीत का असली अर्थ समझने में तनिक भी असुविधा नहीं हुई। ऐसा कहा जाता है कि यह गीत इतना ज़्यादा लोकप्रिय हो गया था कि थिएटर में दर्शकों की माँग पर इस गीत को बार-बार रीवाइण्ड करके दिखाया जाता। और यह हाल पूरे देश भर के सिनेमाघरों का था। भले इस गीत को ‘ऐक्सिस पावर्स’ के विरुद्ध दिखा कर सेन्सर बोर्ड से पास करवा लिया गया था, पर जल्दी ही ब्रिटिश सरकार को गीत का अर्थ समझ में आ गया और कवि प्रदीप के नाम गिरफ़्तारी का वारण्ट जारी कर दिया गया। यह ख़बर सुनते ही प्रदीप भूमिगत हो गए। इस तरह से “आज हिमालय की छोटी से...” गीत हमारे स्वाधीनता संग्राम के इतिहास का एक अभिन्न अंग बन गया। 

1943 में ही नितिन बोस निर्देशित फ़िल्म ‘काशीनाथ’ में पंडित भूषण का लिखा, पंकज मल्लिक का स्वरबद्ध किया और असित बरन का गाया एक देशभक्ति गीत था “हम चले वतन की ओर, खेंच रहा है कोई हमको”। सन् 1944 में मुमताज़ शान्ति, मोतीलाल, शेख मुख्तार, कन्हैयालाल अभिनीत ‘रणजीत मूवीटोन’ की फ़िल्म ‘पगली दुनिया’ में रामानन्द का लिखा और बुलो सी. रानी का स्वरबद्ध किया भोला का गाया एक देश भक्ति गीत था “सोए हुए भारत के मुकद्दर को जगा दे”। यह बुलो सी. रानी की पहली फ़िल्म थी बतौर संगीतकार। पहली फ़िल्म की बात करें तो संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम की भी इसी वर्ष पहली फ़िल्म आई ‘चाँद’ जिसमें गीत लिखे क़मर जलालाबादी ने। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत मंजू की आवाज़ में था, जिसके बोल थे “दो दिलों को ये दुनिया मिलने ही नहीं देती”। पर मंजू, दुर्रानी और साथियों का गाया फ़िल्म का एक देशभक्ति गीत “वतन से चला है वतन का सिपाही” भी फ़िल्म का एक महत्वपूर्ण गीत था। भारत के स्वाधीनता संग्राम में जिस तरह पुरुषों ने अपना बलिदान दिया, वैसे ही महिलाएँ भी पीछे नहीं रहीं। किसी ने अपने गहने दिए तो किसी ने अपना बेटा, किसी ने अपना पति दिया तो बहुत सी महिलाएँ ऐसी भी थीं जो ख़ुद ही लड़ाई के मैदान में उतरीं। ऐसे में महिलाओं को प्रोत्साहित करने हेतु ‘फ़िल्मिस्तान’ की 1944 की फ़िल्म ‘चल चल रे नौजवान’ में रफ़ीक ग़ज़नवी का गाया एक देशभक्ति गीत आया - “आया तूफ़ान आया तूफ़ान, जाग भारत की नारी...”। 1944 की एक और उल्लेखनीय फ़िल्म रही ‘पहले आप’। इस फ़िल्म का महत्व इस बात के लिए बढ़ जाता है कि इसमें मोहम्मद रफ़ी का गाया पहला फ़िल्मी गीत मौजूद है। फ़िल्म के संगीतकार नौशाद अली के शब्दों में – “जब मोहम्मद रफ़ी मेरे पास आए, तब वर्ल्ड वार ख़त्म हुआ चाहता था। मुझे साल याद नहीं। उस वक़्त फ़िल्म प्रोड्यूसर्स को कम से कम एक वार-प्रोपागण्डा फ़िल्म ज़रूर बनानी पड़ती थी। रफ़ी साहब लखनऊ से मेरे पास मेरे वालिद साहब का एक सिफ़ारिशी ख़त लेकर आए। छोटा सा तम्बूरा हाथ में लिए खड़े थे मेरे सामने। मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने संगीत सीखा है, तो बोले कि उस्ताद बरकत अली ख़ाँ से सीखा है, जो उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब के छोटे भाई थे। मैंने उनको कहा कि इस वक़्त मेरे पास कोई गीत नहीं है जो मैं उनसे गवा सकता हूँ, पर एक कोरस ज़रूर है जिसमें अगर वो चाहें तो कुछ लाइनें गा सकते हैं। और वह गाना था “हिन्दुस्तां के हम हैं हिन्दुस्तां हमारा, हिन्दू मुस्लिम दोनों की आँखों का तारा”। रफ़ी साहब ने दो लाइने गायीं जिसके लिए उन्हें 10 रुपये दिए गए। शाम, दुर्रानी और कुछ अन्य गायकों ने भी कुछ कुछ लाइनें गायीं।” और इस तरह से मोहम्मद रफ़ी का गाया पहला हिन्दी फ़िल्मी गीत बाहर आया। पर रेकॉर्ड पर इस गीत को “समूह गीत” लिखा गया है। यह गीत न केवल रफ़ी साहब के करियर का एक महत्वपूर्ण गीत बना, बल्कि इसके गीतकार डी. एन. मधोक के लिए भी यह उतना ही महत्वपूर्ण था क्योंकि इस गीत में उनके धर्मनिरपेक्षता के शब्दों के प्रयोग के लिए उन्हें “महाकवि” के शीर्षक से सम्मानित किया गया था। ब्रिटिश राज ने इस गीत का मार्च-पास्ट गीत के रूप में विश्वयुद्ध में इस्तमाल किया। यह गीत न तो स्वाधीनता संग्राम के लिए लिखा गया था और न ही ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़, पर साम्प्रदायिक एकता का पाठ ज़रूर इस गीत ने पढ़ाया। एक ऐसा ही साम्प्रदायिक सदभाव सिखाता गीत इसी वर्ष आया ‘कारवाँ पिक्चर्स, बम्बई’ की फ़िल्म ‘भाई’ में। गीतकार ख़ान शातिर ग़ज़नवी का लिखा और मास्टर ग़ुलाम हैदर का स्वरबद्ध किया यह गीत था “हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई, आपस में है भाई-भाई”।  ‘लक्ष्मी प्रोडक्शन्स’ की फ़िल्म ‘मिस देवी’ में अशोक घोष स्वरबद्ध सुरेन्द्र का गाया एक देशभक्ति गीत था “जागो जागो नव जवान, भारत माता की सन्तान” जिसने नौजवानो को देश पर मर-मिटने के लिए उत्साहित किया।

1945 में ‘इन्द्रपुरी प्रोडक्शन्स, बम्बई’ की एक देशभक्ति फ़िल्म आई थी ‘स्वर्ग से सुंदर देश हमारा’ (अंग्रेज़ी में ‘Call of the Motherland’ के शीर्षक से)। देबकी बोस निर्देशित इस फ़िल्म जो देश भक्ति गीत था उसे फ़िल्म में तीन भागों में विभाजित किया गया था। बोल थे “देश हमारा, सुंदर देश, हमारा, स्वर्ग से सुंदर देश हमारा”। इसी वर्ष की फ़िल्म ‘ग़ुलामी’ में एस. के. पाल का संगीत था। इसमें रेणुका देवी और मसूद परवेज़ ने अभिनय के साथ साथ अपने गीत स्वयं ही गाए। जोश मलीहाबादी का लिखा फ़िल्म का एकमात्र गीत एक देशभक्ति गीत था “ऐ वतन, मेरे वतन, तुझपे मेरी जाँ निसार”, जिसे रेणुका और मसूद ने ही गाए। जोश मलीहाबादी 1925 में हैदराबाद के ओसमानिया यूनिवर्सिटी में कार्यरत थे। पर वहाँ के निज़ाम के विरुद्ध नज़्म लिखने की वजह से उन्हें हैदराबाद से निकाल दिया गया। उसके बाद उन्होंने उर्दू पत्रिका ‘कलीम’ को शुरू किया जिसमें उन्होंने बिल्कुल खुले तरीके से अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाया तथा भारत की स्वाधीनता के पक्ष में कड़े विचार व्यक्त किये। उनकी कलम में वह जोश था कि जल्दी ही लोग उन्हें ‘शायर-ए-इनक़िलाब’ कहने लगे। आगे चलकर जोश मलीहाबादी अपनी लेखनी के माध्यम से स्वाधीनता संग्राम में और ज़ोर-शोर से जुट गये और उस समय के कई बड़े राज नेताओं के निकट सम्पर्क में आये। इनमें पंडित जवाहरलाल नेहरु मुख्य रूप से शामिल थे। ब्रिटिश राज के समाप्त होने के बाद 1947 में जोश ‘आज-कल’ नामक प्रकाशन के सम्पादक बने। इस तरह से जोश मलीहाबादी का लिखा फ़िल्म ‘स्वर्ग से सुंदर देश हमारा’ का शीर्षक गीत फ़िल्म जगत और स्वाधीनता संग्राम, दोनों के लिए बहुत महत्व रखता है। सन् 1945 की कुछ और प्रविष्टियों में ‘भावनानी प्रोडक्शन्स’ की फ़िल्म ‘बीसवीं सदी’ का ज़िक्र आना चाहिए जिसमें पन्नालाल घोष का संगीत था। कहा जाता है कि इस फ़िल्म के संगीत का अधिकांश कार्य अनिल बिस्वास ने ही किया था। फ़िल्म के दो  देशभक्ति गीत थे “भारत की सन्तान, हम हैं भारत की सन्तान” और “बीसवीं सदी, बीसवीं सदी, आई है इनक्लाब लिए”। इन गीतों के गायकों की जानकारी नहीं मिल पायी है। पंडित गोबिन्दराम के संगीत में ‘अत्रे पिक्चर्स’ की फ़िल्म ‘परिन्दे’ में ज़ोहराबाई की आवाज़ में देशभक्ति गीत था “डूबते भारत को बचाओ मेरे करतार, तूफ़ान में कश्ती है” जिसे राम मूर्ति चतुर्वेदी ने लिखा था।

‘इण्डियन पीपल थिएटर ऐसोसिएशन’ (IPTA) का गठन 1943-44 में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के दौरान हुआ था। इप्टा का उद्देश्य था नामचीन कलाकारों के माध्यम से लोगों में जागरूकता लाना, उनके सामाजिक दायित्वों को याद दिलाना, और राष्ट्रीय एकता के महत्व को समझाना। ख्वाजा अहमद अब्बास (के.ए.अब्बास के नाम से प्रसिद्ध), डॉ. भाभा, अनिल डे’सिल्वा, अली सरदार जाफ़री और दादा शरमालकर द्वारा गठित इप्टा ने बहुत जल्दी ही एक राष्ट्रीय आन्दोलन का दर्जा हासिल कर लिया। भारतीय थिएटर की प्रचलित शैलियों से आगे निकलकर इप्टा ने इस क्षेत्र में नई क्रान्ति ला दी और अगले छह दशकों में इसमें कई बड़े नाम जुड़े जिनमें शामिल हैं पंडित रविशंकर, कैफ़ी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी, बलराज साहनी, शैलेन्द्र, प्रेम धवन और भी न जाने कितने। थिएटर के अलावा इप्टा ने कई फ़िल्मों का भी निर्माण किया। 1946 में इप्टा ने बनाई ‘धरती के लाल’ जिसमें इप्टा के कलाकारों ने सारा काम किया। के. ए. अब्बास निर्देशित इस फ़िल्म में शम्भु मित्र, ऊषा दत्त, बलराज साहनी जैसे कलाकारों ने अभिनय का पक्ष सम्भाला तो अली सरदार जाफ़री, प्रेम धवन, नैमीचन्द जैन और वामिक ने गीत लिखे। संगीत था रविशंकर का। कहा जाता है कि बिमल राय की इतिहास रचने वाली फ़िल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ इसी फ़िल्म की कहानी पर आधारित थी। बतौर गीतकार प्रेम धवन और अली सरदार जाफ़री की यह पहली फ़िल्म थी। प्रेम धवन ने इप्टा में रहते कई ग़ैर फ़िल्मी गीत भी लिखे थे जिनमें एक गीत “अरे भागो लंदन जाओ” बहुत मशहूर हुआ था। ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ लिखा यह गीत कुछ यूं था – “अरे अब भागो, लंदन जाओ, काहे सौ सौ मकर बनाओ, अरे तुमरी नीयत खोटी, तुमरा हर वादा है बोदा, और लड़ने मरने की बातों में ज़ालिम कैसा सौदा, अरे ख़ून का बदला ख़ून है, सुन लो आज़ादी का भाव, अरे अब भागो लंदन जाओ। अरे कैसे भूलें जलियांवाला बाग़ को कैसे भूलें, अरे कैसे भूलें ऐसे गहरे दाग़ को कैसे भूलें, एक नहीं हमरे सीने पे तो लाखों हैं घाव, अरे अब भागो लंदन जाओ। अरे बरसों चुपके चुपके तुमने जेब हमारी काटी, जाग उठे घर के रखवाले अपनी ख़ैर मनाओ, अरे अब भागो लंदन जाओ। और ये भाड़े के टट्टू राजे ये माटी के माधव, अब इनके भी दिन बीते अब इनके भी बिस्तर बांधो, अरे साहिब अपने संग अपने कुत्ते भी ले जाओ, अरे अब भागो लंदन जाओ।” यह गीत लोगों में बहुत लोकप्रिय हो गया था और ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ कई जल्सों और प्रदर्शनों में इस गीत को गाया गया। इप्टा द्वारा निर्मित 1946 की एक और फ़िल्म थी ‘नीचा नगर’ जिसे निर्देशित किया चेतन आनन्द ने। इसमें भी रविशंकर का संगीत था और गीत लिखे विश्वामित्र आदिल और मनमोहन आनन्द ने। “उठो के हमें वक़्त की गरदिश ने पुकारा” और “कब तक घिरी रात रहेगी” जैसे गीत इस फ़िल्म में थे जिन्होंने स्वाधीनता के सपने को लोगों के मन-मस्तिष्क में और भी ज़्यादा बुलंद किया। ‘नीचा नगर’ को ‘कान फ़िल्म महोत्सव’ में दिखाया गया था।

फ़िल्म जगत के संगीतकारों में एक उल्लेखनीय नाम चित्रगुप्त का भी रहा है। उनका संगीतकार बनने का सपना तब पूरा हुआ जब ‘न्यू दीपक पिक्चर्स’ के रमणीक वैद्य ने 1946 की दो स्टण्ट फ़िल्मों में उन्हें संगीत देने का निमन्त्रण दिया। ये फ़िल्में थीं ‘लेडी रॉबिनहुड’ और ‘तूफ़ान क्वीन’। इन दो फ़िल्मों के गीतकार थे क्रम से ए. करीम और श्याम हिन्दी। दोनों फ़िल्मों के मुख्य कलाकार लगभग एक ही थे – नाडिया, प्रकाश, शान्ता पटेल, अनन्त प्रभु प्रमुख। ‘लेडी रॉबिनहुड’ में एक देशभक्ति गीत था “भारत की नारी जाग उठी, अब होगा देशोद्धार”। ‘कमल पिक्चर्स, बम्बई’ की ऐतिहासिक फ़िल्म ‘मगधराज’ में मोहनतारा और हमीदा बानो के गाए गीतों के अलावा फ़िरोज़ दस्तूर का गाया एक देशभक्ति गीत था “जननी जन्म भूमि माता, तेरा नाता, गोद में तेरी खेलने वाले”। फ़िल्म के गीतकार थे पंडित इन्द्र और संगीतकार थे बुलो सी. रानी। ‘के. अब्दुल्ला प्रोडक्शन्स’ के बैनर तले निर्मित फ़िल्म ‘हमजोली’ में हफ़ीज़ ख़ान का संगीत था और अंजुम पीलीभीती के गीत थे। नूरजहाँ, जयराज और गुलाम मोहम्मद अभिनीत इस फ़िल्म में नूरजहाँ के गाये अन्य गीतों के अलावा एक देशभक्ति गीत भी था “ये देश हमारा प्यारा हिन्दुस्तान जहान से न्यारा, हिन्दुस्तान के हम हैं प्यारे, हिन्दुस्तान हमारा प्यारा”। इस गीत ने स्वाधीनता संग्राम के उस अंतिम चरण में लोगों के दिल को छूआ ज़रोरो होगा, पर उस समय यह गीत नूरजहाँ के लिए एक उपहास सिद्ध हुआ क्योंकि अगले ही वर्ष स्वाधीनता के बाद उन्हें हिन्दुस्तान छोड़ पाक़िस्तान जा बसना पड़ा। नूरजहाँ और सुरैया उस ज़माने की सबसे मशहूर अभिनेत्री-गायिकाएँ थीं। इन दोनों ने साथ में 1946 की मशहूर फ़िल्म ‘अनमोल घड़ी’ में काम किया था। इसके अलावा एकल रूप से सुरैया इस वर्ष नज़र आईं ‘उमर ख़य्याम’, ‘जग बीती’, ‘भटकती मैना’, ‘उर्वशी’ और ‘1957’ जैसी फ़िल्मों में। ‘1857’ एक ऐतिहासिक/ देशभक्ति फ़िल्म थी जिसका निर्माण ‘मुरारी पिक्चर्स’ के बैनर तले हुआ था। सज्जाद हुसैन के संगीत में फ़िल्म के गीत लिखे मोहन सिंह, शेवन रिज़वी, पंडित अंकुर और अंजुम पीलीभीती ने। फ़िल्म में एक समूह गीत था “दिल्ली तेरे क़िले पर होंगे निशां हमारे”। और इसके अगले ही साथ दिल्ली के लाल क़िले की प्राचीर पर पंडित नेहरू ने तिरंगा फहराया।

1943 में ‘राजकमल कलामन्दिर’ की पहली कामयाब फ़िल्म ‘शकुन्तला’ के बाद 1946 में व्ही. शान्ताराम लेकर आए ‘डॉ. कोटनिस की अमर कहानी’, जिसने उनकी प्रतिभा का एक बार फिर से लोहा मनवाया। वसन्त देसाई के संगीत में जयश्री का गाया एक देशभक्ति गीत था “चल आ, चल आ, ग़ुलामी और नहीं तू जोश में आ, ये देश है तेरा”, जिसके बोल और धुन मशहूर चीनी रण-गीत ‘चिलाई’ पर आधारित था। ‘राजकमल’ की 1946 की एक और मशहूर फ़िल्म थी ‘जीवन यात्रा’ जिसके मुख्य कलाकार थे नयन तारा, याकूब, बाबूराव पेण्ढारकर, प्रतिमा देवी प्रमुख। मास्टर विनायक फ़िल्म के निर्देशक थे। आज़ादी के द्वार पर देश आ पहुँचा था। इसलिए फ़िल्मों में भी आज़ादी की ख़ुशी के गीत बनने शुरु होने लगे थे। मनमोहन कृष्ण और साथियों का गाया इस फ़िल्म का एक ऐसा ही गीत था “आओ आज़ादी के गीत गाते चलें, इक सुनहरा संदेसा सुनाते चलें”। और फिर आया 15 अगस्त 1947 का वह ऐतिहासिक दिन जो भारत के इतिहास का एक सुनहरा दिन बन गया। एक तरफ़ आया ‘Freedom at Midnight’ और दूसरी तरफ़ प्रदर्शित हुई ‘फ़िल्मिस्तान’ की महत्वाकांक्षी फ़िल्म ‘शहनाई’। यह फ़िल्म बम्बई के नोवेल्टी थिएटर में प्रदर्शित हुई थी जब पूरा देश आज़ादी की ख़ुशियाँ मना रहा था। ‘शहनाई’ की मंगलध्वनियाँ गली-गली गूंज उठीं अमीरबाई और शमशाद बेगम की आवाज़ों के साथ फ़िल्म के शीर्षक गीत “हमारे अंगना हो हमारे अंगना, आज बाजे, बाजे शहनाई” के रूप में।

ब्रिटिश राज के समाप्त होते ही 1948 में जैसे फ़िल्मों में देशभक्ति और सर चढ़ कर बोलने लगा। ‘हुआ सवेरा’ शीर्षक से एक फ़िल्म आई, जिसका शीर्षक ही सब कुछ कह देता है। इस फ़िल्म में संगीतकार ज्ञान दत्त के संगीत में दो विजय गीत बने – “क़दम-क़दम पे क़ौम ने जो ज़िल्लतें सहीं.... हिन्दोस्ताँ आज़ाद” और “झण्डा हमारा ये सदा ऊँचा ही रहेगा”। ‘आज़ादी की राह पर’ फ़िल्म के लगभग सभी गीत देशभक्ति के थे जैसे कि “जाग उठा है हिन्दुस्तान” (समूह गीत), “मेरे चरखे में जीवन का राग सखि” (कविता, साथी), “दिल फ़िदा करते हैं, कुर्बान जिगर करते हैं” (जी. एम. दुर्रानी), “बदल रही है ज़िंदगी” (बी. एस. नानजी), “भारत जननी तेरी जय हो, विजय हो” (नानजी, गान्धारी, साथी) और “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा” (बी. एस. नानजी, साथी)। साहिर लुधियानवी, राम प्रसाद बिस्मिल और श्याम लाल गुप्त की ये रचनाएँ थीं। ‘रोशन पिक्चर्स’ ने दो फ़िल्में बनाईं –‘आज़ाद हिन्दुस्तान’ और ‘देश सेवा’। दोनों के गीत पंडित अनुज ने लिखे और दोनों में संगीत था ए. आर. कुरेशी का। ‘आज़ाद हिन्दुस्तान’ में संदेश साम्प्रदायिक सदभाव की तरफ़ घूम गया और फ़िल्म में कुछ गीत थे “हे भारत के नर-नारी, कैसी बिगड़ी दशा तुम्हारी”, “आपस के झगड़े दूर करो, इन्सान बनो, इन्सान बनो”, “तुम गौर करो, गौर करो, हिन्दू-मुसलमान...”। ‘देश सेवा’ क गीतों में शामिल थे “जाग उठा है देश हमारा” और “आज़ाद हो गया है हिन्दुस्तान हमारा”। 1934 में ‘प्रभात फ़िल्म कंपनी’ संत एकनाथ पर फ़िल्म बनाना चाहते थे ‘महात्मा’ शीर्षक से। पर महात्मा गांधी से इस शीर्षक की समानता की वजह से ब्रिटिश राज की सम्भावित आपत्ति को ध्यान में रखते हुए सेन्सर बोर्ड ने इस शीर्षक की अनुमति नहीं दी, और अंत में फ़िल्म का नाम रखा गया ‘धर्मात्मा’। पर देश आज़ाद होते ही 1948 में गांधी जी पर कम से कम दो फ़िल्में बनीं। एक ती ‘पटेल इण्डिया लिमिटेड, बम्बई’ की वृत्तचित्र ‘गांधीजी और दूसरी थी ‘डॉकुमेण्टरी फ़िल्म लिमिटेड, मद्रास’ की वृत्तचित्र ‘महात्मा गांधी’। इस फ़िल्म के गीतकार थे बी. राजरतनम, कु. प्रेमा और यशवंत भट्ट। ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की फ़िल्म ‘मजबूर’ में लता मंगेशकर और मुकेश का गाया नाज़िम पानीपती का लिखा व ग़ुलाम हैदर द्वारा स्वरबद्ध गीत था “अब डरने की बात नहीं अंग्रेज़ी छोरा चला गया”। इस गीत की कल्पना इसके बनने के एक साल पहले भी नहीं की जा सकती थी। मास्टर विनायक द्वारा निर्देशित अंतिम फ़िल्म ‘मंदिर’ में भी दो देश भक्ति गीत थे – “Quit India चले जाओ, हिन्द महासागर की लहरें...” और “जगमग भारत माँ का मंदिर”। इस फ़िल्म में लता मंगेशकर ने अभिनय किया था। क्या इन दो गीतों में उनकी आवाज़ शामिल थी, इस बात की पुष्टि नहीं हो पायी है। और इसी साल आई शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के जीवन पर आधारित पहली फ़िल्म ‘शहीद’। ‘फ़िल्मिस्तान’ निर्मित इस फ़िल्म में दिलीप कुमार बने भगत सिंह। ग़ुलाम हैदर के संगीत में राजा मेहंदी अली ख़ान का लिखा मोहम्मद रफ़ी, ख़ान मस्ताना और साथियों का गाया देश भक्ति गीत “वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हों” पूरे देश में आग की तरह फैल गया। 


50 और 60 के दशकों में बहुत सी देशभक्ति फ़िल्में बनीं और बहुत से फ़िल्मी देशभक्ति गीत बने, जिन्हें बेहद कामयाबी और लोकप्रियता हासिल हुई, जो आज तक राष्ट्रीय पर्वों पर बजाये जाते हैं। अफ़सोस की बात है कि स्वाधीनता संग्राम के दौरान बनने वाले फ़िल्मी देशभक्ति गीतों को आज हम लगभग भुला चुके हैं और कहीं भी ये सुनाई नहीं देते, जबकि सच्चाई यह है कि इन्हीं गीतों ने स्वाधीनता संग्राम में देशवासियों में राष्ट्रीय एकता की उर्जा पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। एक तरफ़ जनसाधारण में राष्ट्रीयता के विचार जगाने का दायित्व और दूसरी तरफ़ ब्रिटिश शासन द्वारा प्रतिबंध का डर। इस कठिन स्थिति में उस दौर के फ़िल्मकारों ने जो सराहनीय योगदान दिया है, इस लेख के माध्यम से उन्हें हम झुक कर प्रणाम करते हैं। हमारे स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में इन फ़िल्मी कलाकारों के योगदान को भी सम्माननीय स्थान मिलनी ही चाहिए।


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिए। आपके सुझावों के आधार पर हम अपने कार्यक्रम निर्धारित करते हैं। आप हमें radioplaybackindia@live.com के पते पर अपने सुझाव, समालोचना और फरमाइशें भेज सकते हैं।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी



मंगलवार, 11 अगस्त 2015

मोनिका गुप्ता की लघुकथा सहयोग

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में काजल कुमार की लघुकथा "समय" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं मोनिका गुप्ता लिखित लघुकथा सहयोग, उन्हीं के स्वर में।

इस कहानी सहयोग का कुल प्रसारण समय 1 मिनट 45 सेकंड है। इसका गद्य कथा-कहानी ब्लॉग पर उपलब्ध है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

सिरसा निवासी साहित्यकार और रेडियो व्यक्तित्व मोनिका गुप्ता देश के जाने माने राष्ट्रीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन कार्यक्रमों के अलावा उन्होने जिंगल्स और वॉइस ओवर भी किये हैं। उनका बाल उपन्यास ‘वो तीस दिन’ नैशनल बुक ट्रस्ट के नेहरू बाल पुस्तकालय द्वारा प्रकाशित हुआ है। सन 2009 में वे “हरियाणा साहित्य अकादमी” के बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित की जा चुकी हैं।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"भाईसाहब, हमें आपकी मदद चाहिए ... ”
 (मोनिका गुप्ता की लघुकथा "सहयोग" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
सहयोग MP3

#Eleventh Story,  Sahyog; Monica Gupta; Hindi Audio Book/2015/11. Voice: Monica Gupta

रविवार, 9 अगस्त 2015

कजरी के लोक स्वरूप : SWARGOSHTHI – 231 : FOLK KAJARI







स्वरगोष्ठी – 231 में आज

रंग मल्हार के – 8 : कजरी गीतों के लोक स्वरूप

‘कइसे खेले जइबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आई ननदी...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज भी जारी है, हमारी लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’। श्रृंखला की आठवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला में अब तक आप वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाएँ सुन रहे हैं और हम उन पर चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी हम प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में जहाँ मल्हार अंग के राग समर्थ हैं, वहीं लोक संगीत की रसपूर्ण विधा कजरी अथवा कजली भी पूर्ण समर्थ होती है। इस श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने आपको रागदारी संगीत के वरिष्ठ कलासाधकों से एक कजरी का रसास्वादन कराया था। आज के अंक में हम वर्षा ऋतु की मनभावन लोक शैली कजरी के विविध प्रयोग पर चर्चा करेंगे। पहले आप उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ पर, फिर कजरी अथवा कजली को मूल लोक संगीत के रूप में और अन्त में कजरी का फिल्मी प्रयोग भी सुनेंगे। 

जरी अथवा कजली मूलतः लोक संगीत की विधा है। वर्षा ऋतु के परिवेश और इस मौसम में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति में कजरी गीत पूर्ण समर्थ लोक-शैली है। शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत के कलासाधकों द्वारा इस लोक-शैली को अपना लिये जाने से कजरी गीत आज राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर सुशोभित है। कजरी गीतों के आकर्षण से शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत विधाओं के कलासाधक स्वयं को मुक्त नहीं कर सके। कजरी गीतों के सौन्दर्य से केवल गायक ही नहीं, वादक कलाकार भी प्रभावित रहे हैं। अनेक वादक कलाकार आज भी वर्षा ऋतु में अपनी रागदारी संगीत-प्रस्तुतियों का समापन कजरी धुन से करते हैं। सुषिर वाद्यों पर तो कजरी की धुन इतनी कर्णप्रिय होती है कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर तो कजरी ऐसी बजती थी, मानो कजरी की उत्पत्ति ही शहनाई के लिए हुई हो। लोक संगीत में कजरी के दो स्वरूप मिलते हैं, जिन्हें हम मीरजापुरी और बनारसी कजरी के रूप में पहचानते हैं। भारतीय संगीत जगत में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ एक ऐसे अनूठे कलासाधक रहे हैं, जिनकी शहनाई पर समूचा विश्व झूम चुका है। अब हम आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ द्वारा शहनाई पर प्रस्तुत बनारसी कजरी का रसास्वादन कराते हैं। यह मनमोहक कजरी आरम्भ में दादरा और फिर कहरवा ताल में बँधी है।

कजरी : शहनाई पर दादरा और कहरवा ताल में निबद्ध कजरी : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ





कजरी की उत्पत्ति कब और कैसे हुई, यह कहना कठिन है, परन्तु यह तो निश्चित है कि मानव को जब स्वर और शब्द मिले होंगे और जब लोकजीवन को प्रकृति का कोमल स्पर्श मिला होगा, उसी समय से ये सब लोकगीत हमारे बीच हैं। प्राचीन काल से ही उत्तर प्रदेश का मीरजापुर जनपद माँ विन्ध्यवासिनी के शक्तिपीठ के रूप में आस्था का केन्द्र रहा है। अधिसंख्य प्राचीन कजरियों में शक्तिस्वरूपा देवी का ही गुणगान मिलता है। आज कजरी के वर्ण्य विषय काफी विस्तृत हैं, परन्तु कजरी गीतों के गायन का आरम्भ देवी गीत से ही होता है। कजरी गीतों का गायन वर्षा ऋतु में अधिकतर महिलाएँ करतीं हैं। इसे एकल और समूह में प्रस्तुत किया जाता है। समूह में प्रस्तुत की जाने वाली कजरी को ‘ढुनमुनियाँ कजरी’ कहते हैं। पुरुष वर्ग भी कजरी गायन करते हैं, किन्तु इनके मंच अलग होते हैं। वर्षा ऋतु में पूर्वाञ्चल के अनेक स्थानों पर कजरी के दंगल आयोजित होते है, जिनमें कजरी के विभिन्न अखाड़े दल के रूप में भाग लेते है। ऐसे आयोजनों में पुरुष गायक-वादकों के दो दल परस्पर सवाल-जवाब के रूप में कजरी गीत प्रस्तुत करते हैं। लोक-जीवन में प्रस्तुत की जाने वाली कजरियों के विषय वैविध्यपूर्ण होते हैं, परन्तु वर्षाकालीन परिवेश का चित्रण सभी कजरियों में अनिवार्य रूप से मिलता है। 


पारम्परिक कजरियों की धुनें और उनके टेक निर्धारित होते हैं। आमतौर पर कजरियाँ जैतसार, ढुनमुनियाँ, खेमटा, बनारसी और मीरजापुरी धुनों के नाम से पहचानी जाती हैं। कजरियों की पहचान उनके टेक के शब्दों से भी होती है। कजरी के टेक होते हैं- 'रामा', 'रे हरि', 'बलमू', 'साँवर गोरिया', 'ललना', 'ननदी' आदि। कजरी गीतों के विषय पारम्परिक भी होते हैं और अपने समकालीन लोकजीवन का दर्शन कराने वाले भी। ब्रिटिश शासनकाल में अनेक लोकगीतकारों ने ऐसी राष्ट्रवादी कजरियों की रचना की, जिनसे तत्कालीन ब्रिटिश सरकार भी भयभीत हुई थी। इस प्रकार के अनेक लोकगीतों को प्रतिबन्धित कर दिया गया था। इन लोकगीतों के रचनाकारों और गायकों को ब्रिटिश सरकार ने कठोर यातनाएँ भी दीं। परन्तु प्रतिबन्ध के बावजूद लोक-परम्पराएँ जन-जन तक पहुँचती रहीं। इन विषयों पर रची गईं अनेक कजरियों में बलिदानियों को नमन और महात्मा गाँधी के सिद्धांतों को रेखांकित किया गया। ऐसी ही एक कजरी की पंक्तियाँ देखें- "चरखा कातो, मानो गाँधी जी की बतियाँ, विपतिया कटि जइहें ननदी...”। कुछ कजरियों में अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों पर प्रहार भी किया गया। ऐसी ही एक पारम्परिक कजरी की स्थायी की पंक्तियाँ हैं- “कैसे खेले जइबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...”। इन पंक्तियों में काले बादलों का घिरना, गुलामी के प्रतीक रूप में चित्रित हुआ है। इसके एक अन्तरे की पंक्तियाँ हैं- “केतनो लाठी गोली खइलें, केतनो डामन (अण्डमान का अपभ्रंस) फाँसी चढ़िले, केतनों पीसत होइहें जेहल (जेल) में चकरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...”। आजादी के बाद कजरी-गायकों ने इस अंतरे को परिवर्तित कर दिया। अब हम आपको परिवर्तित अंतरे के साथ वही कजरी सुनवाते हैं। इस गीत को तृप्ति शाक्य और साथियों ने स्वर दिया है।


कजरी : ‘कैसे खेले जइबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...’ : तृप्ति शाक्य



भारतीय फिल्मों का संगीत आंशिक रूप से ही सही, अपने समकालीन संगीत से प्रभावित रहा है। हिन्दी फिल्मों में कजरी गीतों का प्रयोग लगभग नगण्य ही हुआ है, किन्तु कजरी की धुन को आधार बना कर कुछ गीत अवश्य रचे गए हैं। परन्तु ऐसे गीतों में वर्षाकालीन परिवेश का अभाव है। हाँ, कुछ भोजपुरी फिल्मों में पारम्परिक कजरी गीतों का अच्छा प्रयोग हुआ है। 1963 में प्रदर्शित भोजपुरी फिल्म 'बिदेशिया' में कजरी शैली का अत्यन्त मौलिक रूप प्रस्तुत किया गया है। कजरी के जिस परम्परागत रूप का इस फिल्म में प्रयोग किया गया है वह लोक शैली में ‘ढुनमुनिया कजरी’ के नाम से जानी जाती है। इस प्रकार की कजरी प्रस्तुति में महिलाएँ समूह में अर्धवृत्त बना कर गाती हैं। फिल्म 'बिदेशिया' के इस कजरी गीत की रचना अपने समय के सुप्रसिद्ध लोकगीतकार राममूर्ति चतुर्वेदी ने की थी और इसे संगीतबद्ध किया था एस.एन. त्रिपाठी ने। इस गीत को गायिका गीता दत्त और कौमुदी मजुमदार ने अपने स्वरों से फिल्मों में कजरी गायन को मौलिक स्वरूप दिया है। आप यह मनभावन कजरी सुनिए और मुझे इस अंक से यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए। अगले अंक में हम एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे।


कजरी : फिल्म बिदेशिया : ‘नीक सइयाँ बिन भवनवा...’ : गीता दत्त और कौमुदी मजुमदार



 


संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 231वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 240 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा। 

 
 
 
1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि आपको किस राग की झलक मिलती है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायिका की आवाज़ को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 15 अगस्त, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 233वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 229वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको विदुषी गिरिजा देवी और पण्डित रवि किचालू के युगल कण्ठ-स्वर में उपशास्त्रीय अंग में प्रस्तुत एक कजरी का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गीत शैली – कजरी अथवा कजली, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल - मध्यलय दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका – विदुषी गिरिजा देवी

इस बार की पहेली में तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। तीन में से दो प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’ का यह समापन अंक था। अगले अंक से हम ‘रागों के समय प्रबन्धन’ विषयक श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। इस श्रृंखला के लिए आप अपने पसन्द के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।  


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ