शनिवार, 19 जनवरी 2013

'सिने पहेली' में आज सुलझाइये कुछ गीतों भरी पहेलियाँ



19 जनवरी, 2013
सिने-पहेली - 55  में आज 

सुलझाइये कुछ गीतों भरी पहेलियाँ

'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, 'सिने पहेली' के छठे सेगमेण्ट के बीचोंबीच आज हम आ पहुँचे हैं, आज है इसकी 55-वीं कड़ी। इस लम्बे सफ़र को तय करते हुए बहुत से प्रतियोगी हमसे जुड़े, जिनमें से कुछ अब भी लगातार हमारे साथ जुड़े हुए हैं, कुछ ने साथ छोड़ दिया है और नए खिलाड़ी लगातार जुड़ते चले जा रहे हैं। 100 कड़ियों के बाद इस महासंग्राम का महाविजेता घोषित किया जाएगा, इसलिए सभी प्रतियोगियों से निवेदन है कि इस प्रतियोगिता में नियमित भाग लेते रहें, और नए खिलाड़ियों के लिए भी अब भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का, इसलिए डटे रहिए, और सुलझाते रहिये ये पहेलियाँ।


'सिने पहेली' की 53-वीं कड़ी में एक सवाल पूछा गया था कि आशा भोसले और पंचम का गाया अन्तिम युगल गीत कौन सा है। इसके जवाब में आप सभी ने 1983 की फ़िल्म 'महान' के गीत का उल्लेख किया है, जबकि हमारे हिसाब से 1993 में जारी फ़िल्म 'गुरुदेव' का गीत "आजा सुन ले सदा" इस जोड़ी का अन्तिम युगल गीत होना चाहिए। हमारे नियमित प्रतियोगी विजय कुमार व्यास जी ने हमें ईमेल के माध्यम से सूचित किया कि तमाम वेबसाइटों पर और यहाँ तक कि पंचम के ऑफ़िशियल साइट पर भी फ़िल्म 'महान' का ही उल्लेख है। आख़िर माजरा क्या है? ऐसे में हमने सहारा लिया श्री पवन कुमार झा का, जिनका नाम इंटरनेट के तमाम सोशल नेटवर्किंग्‍ साइटों पर राहुल देव बर्मन के विशेषज्ञ के रूप में लिया जाता है। जब मैंने उनसे इस संशय के बारे में पूछा तो उनका जवाब था "undoubtedly its "aaja sun le sadaa" from Gurudev"। अब इसके बाद हम इसी नतीजे पर पहुँचे हैं कि इसी गीत को आशा-पंचम का आख़िरी युगल गीत माना जाना चाहिये। अगर आप यह सिद्ध कर दें कि इस गीत की रेकॉर्डिंग्‍ 1983 में या उससे पहले हुई थी, तो हम आप सभी प्रतियोगियों को अंक प्रदान कर देंगे। चलिए अब आगे बढ़ते हैं आज की पहेली की ओर...

आज की पहेली : गान पहचान

आज हम आपसे पूछ रहे हैं कुछ गीतों भरी पहेलियाँ। 

1. आशा भोसले के गाये इस गीत में "फ़िल्मी गीत" है तो उन्हीं के गाये एक अन्य गीत में "फ़िल्म का गाना" है। किन दो गीतों की तरफ़ हमारा इशारा है? (2+2=4 अंक)

2. रफ़ी साहब के गाये किस गीत में "फ़िल्मों के सितारे" शब्द आते हैं? इस गीत में राज कपूर भी नज़र आते हैं। (2 अंक)

3. आप ने कई जगहों पर नोटिस लगा हुआ देखा होगा कि यह आम रस्ता नहीं है। बताइये कि आनन्द बक्शी साहब ने किस गीत में इस चीज़ का इस्तमाल किया है? (2 अंक)

4. कल (18 जनवरी) को जिस महान कलाकार की पुण्यतिथि थी, उनकी किसी फ़िल्म में गाई हुई एक ठुमरी को आगे चलकर एक अन्य फ़िल्म में भी शामिल किया गया जिसे दो ग़ज़ल गायकों ने गाया। इन दोनों फ़िल्मों के नाम बताइये? (1+1=2 अंक)




जवाब भेजने का तरीका

उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 55" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 24 जनवरी शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।


पिछली पहेली का हल


दिये गये 16 गीतों से एक-एक शब्द निकाल कर जो गीत बनता है वह है फ़िल्म 'ब्लैकमेल' का गीत "नैना मेरे रंग भरे सपने तो सजाने लगे, क्या पता प्यार की शमा जले ना जले"।


पिछली पहेली का परिणाम



इस बार कुल 10 प्रतियोगियों ने 'सिने पहेली' में भाग लिया पर केवल 6 प्रतियोगियों ने पहेली का सही जवाब भेजा। सबसे पहले सही भेज कर इस बार 'सरताज प्रतियोगी' बने हैं पटना, बिहार के राजेश प्रिया। राजेश जी, बहुत बहुत बधाई आपको और साथ ही आपका पुन: एक बार 'सिने पहेली' में स्वागत है। आपने लिखा है कि इंटरनेट की गड़बड़ियों की वजह से आप 'सिने पहेली' से दूर चले गए थे, पर अब से नियमित प्रतियोगी बनने की इच्छा रखते हैं। बहुत अच्छा लगा यह जान कर, और हम भी यही उम्मीद करेंगे कि आप हर पहेली में भाग लें और महाविजेता बनने की लड़ाई में जुट जाएँ। इस सप्ताह 'सिने पहेली' से एक और नई प्रतियोगी जुड़ी हैं - गुड़गाँव, हरियाणा की सरिता शर्मा। सरिता जी, आपका भी हार्दिक स्वागत है इस प्रतियोगिता में और आप से भी अनुरोध है कि नियमित प्रतियोगी बनें और इस मुकाबले का आनन्द लें।

आइए अब नज़र डालते हैं इस सेगमेण्ट के अब तक के सम्मिलित स्कोरकार्ड पर।



नये प्रतियोगियों का आह्वान

नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। अगले सप्ताह से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के साथी, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बताएँ और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम।

कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता?
1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा।

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। पाँचवें सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...



4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, आज के लिए मुझे अनुमति दीजिए, अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी, नमस्कार। 

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

एक गीत सौ कहानियाँ - तुम तो ठहरे परदेसी

  
भारतीय सिनेमा के सौ साल – 32

एक गीत सौ कहानियाँ – 21
‘तुम तो ठहरे परदेसी साथ क्या निभाओगे... ’


दोस्तों, सिने-संगीत के इतिहास में अनेक फिल्मी और गैर-फिल्मी गीत रचे गए, जिन्हें आगे चल कर ‘मील के स्तम्भ’ का दर्जा दिया गया। आपके प्रिय स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी ने 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर गत वर्ष 'एक गीत सौ कहानियाँ' नामक स्तम्भ आरम्भ किया था, जिसके अन्तर्गत हर अंक में वे किसी फिल्मी या गैर-फिल्मी गीत की विशेषताओं और लोकप्रियता पर चर्चा करते थे। यह स्तम्भ 20 अंकों के बाद मई 2012 में स्थगित कर दिया गया था। आज से इस स्तम्भ को पुनः शुरू किया जा रहा है। आज से 'एक गीत सौ कहानियाँ' नामक यह स्तम्भ हर महीने के तीसरे गुरुवार को प्रकाशित हुआ करेगा। आज 21वीं कड़ी में सुजॉय चटर्जी प्रस्तुत कर रहे हैं, अलताफ़ राजा के गाये मशहूर ग़ैर-फ़िल्मी गीत "तुम तो ठहरे परदेसी साथ क्या निभाओगे…" की चर्चा। 


ग़ैर-फ़िल्मी गीतों, जिन्हें हम ऐल्बम सॉंग्स भी कहते हैं, को सर्वाधिक लोकप्रियता 80 के दशक में प्राप्त हुई थी। ग़ज़ल और पाश्चात्य संगीत पर आधारित पॉप गीत ख़ूब लोकप्रिय हुए। फिर 90 के दशक में क़व्वालियों और सूफ़ी रंग में रंगे गीत-संगीत की लोकप्रियता में कुछ वृद्धि हुई। आज भले प्राइवेट ऐल्बम्स का दौर लगभग समाप्त हो चुका हो, परन्तु उस दौर में यह जौनर फ़िल्मी गीतों के साथ क़दम से क़दम मिला कर चल रहा था। ग़ैर-फ़िल्मी जौनर के गायक-गायिकाओं में एक महत्वपूर्ण नाम अलताफ़ राजा का है जिन्हें 90 के दशक में अपार सफलता मिली। उनका गाया "तुम तो ठहरे परदेसी…" तो जैसे उन्ही का पर्यायवाची बन गया था। इस गीत को जितनी सफलता मिली थी, वह किसी लोकप्रिय फ़िल्मी गीत की सफलता से किसी मात्रा में कम नहीं थी। और इसी गीत ने अलताफ़ राजा को रातों-रात सफलता के शिखर पर बिठा दिया।

अलताफ़ राजा के गाये "तुम तो ठहरे परदेसी…" के बारे में विस्तार से जानने से पहले उनसे सम्बन्धित एक रोचक तथ्य यह है कि बचपन में इन्होंने फ़िल्म 'रात और दिन' का लता मंगेशकर और मन्ना डे का गाया "दिल की गिरह खोल दो…" गीत सुना और इस गीत ने उनके कोमल मन पर ऐसा प्रभाव डाला कि उन्होंने तय कर लिया कि अब संगीत के क्षेत्र में ही जाना है। इस गीत को सुन कर उनके दिल में एक अजीब कशिश जागी, संगीत की। ख़ैर, "तुम तो ठहरे परदेसी" उस ऐल्बम का शीर्षक भी था, जब उनसे यह पूछा गया कि कैसे आपके जेहन में इसका कानसेप्ट आया, तो इसकी रचना प्रक्रिया के बारे में अलताफ़ राजा ने कुछ इस तरह से बताया (सूत्र : विविध भारती) -"जी, इसका एक अजब वाकया है, 'तुम तो ठहरे परदेसी…' का, हालाँकि 'तुम तो ठहरे परदेसी' 1996 का ऐल्बम था और 1997 में मक़बूल हुआ था, लेकिन इसके पहले 1993 में मेरा एक डिवोशनल ऐल्बम आया था, 'सजदा रब का कर लो', वीनस कम्पनी से आया था। तो 'तुम तो ठहरे परदेसी' मैं 1990 से ही गाता था महफ़िलों में, और महफ़िलों में उसका रेस्पॉन्स बहुत अच्छा आता था, उसका जैसे आपने ऑडियो सुना है, जैसे शायरी, नज़्म, और रुबाइयाँ, वो सब मैं पढ़-पढ़ के गाता था। तो 1996 तक मैं इतना थक गया था, इसको गा-गा के कि वीनस से एक नया ऐल्बम बनाने की पेशकश आयी। तो अपने ऐल्बम का हाइलाइट ही अपने सांग्‍ का बनाया "पंगा ले लिया", जो ऐल्बम के बनाने की देख-रेख कर रहे थे, मोहम्मद शफ़ी नियाज़ी साहब, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, उन्होंने कहा कि तुम महफ़िल में कौन-कौन से गाने गाते हो? तो मैंने उनको सब बताया, -"दोनों ही मोहब्बत के जज़बात में जलते", "तुम तो ठहरे परदेसी", "मेरी याद आयी जुदाई के बाद" वगैरह सभी कुछ जो भी मैं गाता था। तो उन्होंने कहा कि "पंगा ले लिया" को हाइलाइट करते हैं। तो एक और गाने की ज़रूरत थी ऐल्बम में, अब "तुम तो ठहरे परदेसी" मैं गा-गा कर थक गया था, मम्मी ने कहा कि तुम्हारा वह आइटम जो जनता ने इतनी पसन्द की है, तुम उसको भी डाल दो अपने ऐल्बम के अन्दर। तो मैंने कहा कि लोग तो इतना सुन चुके हैं। उन्होंने कहा कि जिन्होंने नहीं सुना है वो तो सुनेंगे! तो इस हिसाब से "तुम तो ठहरे परदेसी" को डाल दिया गया, और बाद में आप ने जो देखा, फिर वही गीत आज तक मैं गा रहा हूँ।"

अलताफ़ राजा भले "तुम तो ठहरे परदेसी" गा-गा कर थक गये हैं पर उनके चाहने वाले अब तक नहीं थके हैं इसे सुनते हुए। इसे अलताफ़ राजा लोगों का प्यार बताते हैं। वैसे इस ऐल्बम में उनकी पसन्दीदा ग़ज़ल है "मेरी याद आई जुदाई के बाद, वो रोयी बहुत बेवफ़ाई के बाद"। अलताफ़ राजा के बहुत से ऐल्बम्स जारी हुए हैं, पर उनके दिल के करीब कौन सा ऐल्बम है? वो बताते हैं, "देखिये जैसे माँ-बाप को अपने सभी बच्चे प्यारे होते हैं, तो मैंने हर ऐल्बम पे, जो भी ऐल्बम मैंने बनाये हैं, बहुत मेहनत से, मैंने कभी क्वालिटी से समझौता नहीं किया, क्वाण्टिटी पे कभी ध्यान नहीं दिया, और सभी ऐल्बम मेरे दिल के करीब हैं, लेकिन एक बात है कि जिस ऐल्बम से मुझे शोहरत मिली, लोगों ने प्यार दिया, लोगों ने एक कैसेट को चार-चार बार रिपीट कर कर के सुना, वह है 'तुम तो ठहरे परदेसी', मैं इसका नाम नहीं लूँगा तो नाइंसाफ़ी होगी। तो वह तो दिल के करीब है ही, बाकी सब ऐल्बम्स भी मेरे दिल के करीब हैं।

ग़ैर फ़िल्म-संगीत में मशहूर होने के बाद उनके क़दम फ़िल्म संगीत में भी पड़े। फ़िल्म जगत में इन्होंने किन पर अपना जादू चलाया और कैसे फ़िल्मों में क़दम रखा? किन से आपकी मुलाक़ात हुई जिससे कि आप फ़िल्मों में आये, जैसे कि पहली फ़िल्म राम गोपाल वर्मा साहब की? इस पर अलताफ़ राजा कहते हैं, "हाँ, राम गोपाल वर्मा साहब 2002 में, दरअसल यह क्रेडिट मैं 'तुम तो ठहरे परदेसी' को ही दूँगा, यह इतना मक़बूल हुआ कि एक प्रोड्युसर थे राजीव बब्बर साहब, वो गए हुए थे वैष्णो देवी के दर्शन के लिए। तो मुझे तो नहीं पता था, उनका फ़ोन आया एक दिन कि मैं एक फ़िल्म बना रहा हूँ और आपका गाना रखना चाहता हूँ, आप मुझसे मीटिंग्‍ कीजिए। मिलने गये तो उन्होंने बताया कि दर्शन करने गए थे तो नीचे से उपर तक उनको यही गाना सुनने को मिला "तुम तो ठहरे परदेसी"। तो बोले कि आप मेरे फ़िल्म के अन्दर, मिथुन चक्रवर्ती जी हैं और जैकी श्रॉफ़ जी हैं, और भी अच्छे-अच्छे कलाकार हैं। तो मैंने पूछा कि मुझे किनके लिए प्लेबैक करना है? बोले कि नहीं-नहीं आपको किसी के लिए प्लेबैक नहीं, आपको ख़ुद अपीयरैन्स देना है। क्योंकि उस वक़्त सिर्फ़ ऑडियो में और फ़ोटो से लोग मुझे जानते थे, इस गीत से मैं सीधे फ़िल्म के परदे पर आ गया। इस तरह से अलताफ़ राजा को ग़ैर फ़िल्मी दुनिया से फ़िल्मी दुनिया में लाने का काम भी "तुम तो ठहरे परदेसी" ने ही किया। कमाल का गीत है, कमाल का असर है, कमाल की ये कहानियाँ हैं।

ऐल्बम गीत : ‘तुम तो ठहरे परदेसी साथ क्या निभाओगे...’ : गायक- अलताफ़ राजा



आपको 'एक गीत सौ कहानियाँ' का यह अंक कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया, अपने सुझाव और अपनी फरमाइश हमें radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। इस स्तम्भ के अगले अंक में हम किसी अन्य गीत और उससे जुड़ी कहानियों के साथ पुनः उपस्थित होंगे। आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अब हमें अनुमति दीजिए। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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