सोमवार, 3 दिसंबर 2012

सलमान खान की दबंग -२ का दबंग संगीत

प्लेबैक वाणी -27 -संगीत समीक्षादबंग - २


दबंग का द्रितीय संस्करण सलमान खान की एक बहुप्रतीक्षित फिल्म है और शायद वर्ष २०१२ की अंतिम बड़ी फिल्म भी. पिछले संस्करण की तरह इस फिल्म से भी रिकॉर्ड तोड़ सफलता की उम्मीद की जा रही है. इस बार फिल्म के निर्देशन का जिम्मा संभाला है अरबाज़ खान ने. संगीत है पहले संस्करण के ही साजिद वाजिद का और गीतकार हैं समीर. 

लगता है जब फिल्म का संगीत सोचा गया तो बेहद प्रमुखता से इस बात का ख्याल रखा गया कि अल्बम के गीतों की संख्या, उनकी ध्वनि और यहाँ तक कि गायक गायिका का चुनाव भी उसी सफल पैमाने को ध्यान में रखकर तय किया गया होगा. अब पहले ही गीत को लें. ‘दगाबाज़ रे’ में फिर एक बार राहत फ़तेह अली खान और श्रेया की आवाजें महकी है और इस गीत की ध्वनि भी ‘तेरे मस्त मस्त दो नैन’ जैसी ही है. मगर फिर भी गीत बेहद मधुर है. सुरीली आवाजों और नशीली धुन के साथ साथ दो बातें और हैं जो इस गीत को पहले गीत की तरह से कमियाबी दे सकता है. एक तो समीर के शब्द सुन्दर और मिटटी से जुड़े हुए हैं और दूसरा साजिद वाजिद का संगीत संयोजन कमाल का है. पहले और दूसरे अंतरे के दरमियाँ सितार और हारमोनियम के मधुर पीस रचे गए हैं, जो लाईव साजिंदों ने बजाये हैं. बहुत दिनों बाद ऐसा संयोजन सुनने को मिला है.

पहले संस्करण में नायक जिनका नाम इन्स्पेक्टर चुलबुल पांडे था उनके थाने में एक गीत फिल्माया गया था ‘हमको पीनी है’, उसी तर्ज पर यहाँ है ‘पाण्डेय जी सीटी’. इस गीत में मलाईका के दिखने की सम्भावना है. गीत की धुन पारंपरिक (पिंजड़े वाली मुनिया) से ली गयी है. मस्ती से सराबोर ये गीत भी श्रोताओं को खूब भाएगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है. 

अब दबंग के ‘मुन्नी बदनाम’ को भला कौन भूल सकता है. यहाँ मलाईका की जगह नज़र आयेगीं करीना कपूर. जहाँ उस गीत में ‘झंडू बाम’ का प्रचार था यहाँ ये बन गया है ‘फेविकोल का मजबूत जोड़’. शब्दों में समीर ने खासी शरारत भरी है और ममता शर्मा ने जम कर मेहनत की है गीत को मजेदार बनाने में. लगता नहीं की ये गीत ‘मुन्नी’ जैसी कमियाबी उठा पायेगा पर अगर नृत्य संयोजन भी सटीक हुआ तो लोकप्रिय अवश्य ही होगा. ‘मुन्नी’ दबंग के पहले संस्करण के अतिथि संगीतकार ललित शर्मा की उपज थी तो यहाँ इस आईटम का जिम्मा भी आत्मविश्वास से भरे साजिद वाजिद ने ही उठाया है और कहना गलत नहीं होगा कि मुन्नी के पैमाने पर ये गीत कुछ कमजोर भी नहीं है. 

पहले संस्करण में सोनू निगम और श्रेया का गाया एक खूबसूरत युगल गीत भी था जिसकी टक्कर में यहाँ है ‘सांसों में’ जहाँ सोनू का साथ देनी उतरी है तुलसी कुमार. जाहिर है टी सीरीस का जोर है. हालाँकि तुलसी निराश नहीं करती. गीत मधुर है मगर धीरे धीरे ही इसका असर श्रोताओं के जेहन में उतरेगा. 

शीर्षक गीत में एक बार फिर मूल धुन को जैसा का जैसा ही रखा गया है बस फ्रेम में आवश्यक सुधार कर दिया गया है. गायक भी एक बार फिर सुखविंदर सिंह ही हैं. समीर ने यहाँ मौका देखकर हिंदी के कुछ अच्छे शब्द जैसे दुर्जन, दुष्कर्मी, आदि जड़ दिए हैं. दरअसल समीर ने इस पैटर्न नुमा संगीत में एक नयी लहर भरी है अपने अच्छे शब्द चयन से. 

कुल मिलाकर दबंग २ का संगीत अपेक्षा अनुरूप ही है. रेडियो प्लेबैक इण्डिया दे रहा है इसे ३.७ की रेटिंग.                


रविवार, 2 दिसंबर 2012

स्वरगोष्ठी में आज : ठुमरी- ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’


'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की पहली वर्षगाँठ पर सभी पाठकों-श्रोताओं का हार्दिक अभिनन्दन   


स्वरगोष्ठी-९८  में आज 

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी –९ 

श्रृंगार रस से परिपूर्ण ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’



फिल्मों में शामिल की गई पारम्परिक ठुमरियों पर केन्द्रित ‘स्वरगोष्ठी’ की लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के एक नए अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, आज का यह अंक जारी श्रृंखला की ९वीं कड़ी है और आज की इस कड़ी में हम आपको पहले राग पीलू की ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन, काजर बिन कारे... ’ का पारम्परिक स्वरूप, और फिर इसी ठुमरी का फिल्मी स्वरूप प्रस्तुत करेंगे। इसके अलावा इस अंक में एकल तथा युगल ठुमरी गायन की परम्परा के बारे में आपके साथ चर्चा करेंगे। 


ज पीलू की यह ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ हम आपको सबसे पहले गायिका इकबाल बानो की आवाज़ में सुनवाते हैं। इकबाल बनो का जन्म १९३५ में दिल्ली के एक सामान्य परिवार में हुआ था। बचपन में ही उनकी प्रतिभा को पहचान कर दिल्ली के उस्ताद चाँद खाँ ने उन्हें रागदारी संगीत का प्रशिक्षण देना आरम्भ किया। कुछ वर्षों की संगीत-शिक्षा के दौरान उस्ताद ने अनुभव किया कि इकबाल बानो के स्वरों में भाव और रस के अभिव्यक्ति की अनूठी क्षमता है। उस्ताद ने उन्हें ठुमरी, दादरा और गजल गायन की ओर प्रेरित और प्रशिक्षित किया। मात्र १४ वर्ष की आयु में इकबाल बानो ने दिल्ली रेडियो से शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय गायन आरम्भ कर दिया था। वर्ष १९५० में उन्हें देश की प्रख्यात गायिकाओं में शुमार कर लिया गया था। १९५२ में १७ वर्ष की आयु में उनका विवाह पाकिस्तान के एक समृद्ध परिवार में हुआ और उन्होने मुल्तान शहर को अपना नया ठिकाना बनाया। पाकिस्तान के संगीत-प्रेमियों ने इकबाल बानो को सर-आँखों पर बैठाया। शीघ्र ही वह रेडियो पाकिस्तान की नियमित गायिका बन गईं। यही नहीं उन्होने अनेक फिल्मों में पार्श्वगायन भी किया। १९८५ में उन्हें फैज अहमद ‘फैज’ की नज़मों पर विशेष शोध और गायन के लिए विश्वस्तर पर सम्मान प्राप्त हुआ था। २१ अप्रैल, २००९ को लाहौर में उनका निधन हो गया। इस अप्रतिम गायिका के स्वरों में ही है, आज की ठुमरी, लीजिए प्रस्तुत है।

पीलू ठुमरी : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ विदुषी इकबाल बानो



आम तौर पर मंच पर एकल ठुमरी गायन की ही परम्परा है। युगल ठुमरी गायन का उदाहरण कभी-कभी उस समय परिलक्षित होता है, जब युगल खयाल गायक खयाल के बाद अन्त में ठुमरी गाते है। इसके अलावा नृत्य के कार्यक्रम में भाव अंग के अन्तर्गत दो नर्तक या नृत्यांगना मंच पर जब भाव-प्रदर्शन करते हैं। बीसवीं शताब्दी के मध्यकाल में संगीत के मंच पर जिन युगल गायकों का वर्चस्व था उनमें शामचौरासी घराने के उस्ताद नज़ाकत अली (१९२०-१९८४) और सलामत अली (१९३४-२००१) बन्धुओं का नाम शीर्ष पर था। देश के विभाजन के बाद ये दोनों भाई पाकिस्तान के प्रमुख युगल गायक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। इन्हीं के दो छोटे भाई अख्तर अली और ज़ाकिर अली हैं, जिनका ठुमरी-दादरा गायन संगीत के मंचों पर बेहद लोकप्रिय हुआ। आइए, अब हम आपको उस्ताद अख्तर अली और ज़ाकिर अली खाँ की आवाज़ में राग पीलू की यही ठुमरी- 'गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...' सुनवाते हैं।

पीलू ठुमरी : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ उस्ताद अख्तर अली और ज़ाकिर अली खाँ



१९६४ में अजीत और माला सिन्हा अभिनीत फिल्म ‘मैं सुहागन हूँ’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म का संगीत फिल्मों के एक कम चर्चित संगीतकार लच्छीराम तँवर ने तैयार किया था। लच्छीराम की स्वतंत्र रूप से प्रथम संगीत निर्देशित १९४७ की फिल्म थी ‘आरसी’। इस पहली फिल्म का संगीत अत्यन्त लोकप्रिय भी हुआ, किन्तु १९४७ से १९६४ के बीच उन्हें साधारण स्तर की फिल्मों के प्रस्ताव ही मिले। इसके बावजूद उनकी प्रत्येक फिल्मों के एक-दो गीतों ने लोकप्रियता के मानक गढ़े। १९६४ की फिल्म ‘मैं सुहागन हूँ’ उनकी अन्तिम फिल्म थी। इस फिल्म में लच्छीराम ने इस परम्परागत ठुमरी को आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी के स्वरों में प्रस्तुत किया। फिल्मों में प्रयोग की गई ठुमरियों में सम्भवतः पहली बार युगल स्वरों में किसी ठुमरी को शामिल किया गया था। फिल्म में नायक-नायिका अजीत और माला सिन्हा हैं, परन्तु इस ठुमरी को फिल्म के सह-कलाकारों, सम्भवतः केवल कुमार और निशी पर फिल्माया गया है। ठुमरी के अन्त में अभिनेत्री द्वारा तीनताल में कथक के तत्कार और टुकड़े भी प्रस्तुत किये गए हैं। मूलतः यह ठुमरी राग पीलू की है। परन्तु लच्छीराम ने इसे राग देस के स्वरों में बाँधा है। आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी ने गायन में राग देस के स्वरों को बड़े आकर्षक ढंग से निखारा है। रफ़ी ने इस गीत को सपाट स्वरों में गाया है किन्तु आशा भोसले ने स्वरों में मुरकियाँ देकर और बोलों में भाव उत्पन्न कर ठुमरी को आकर्षक रूप दे दिया है। आइए सुनते हैं, श्रृंगार रस से ओतप्रोत राग देस में यह फिल्मी ठुमरी। आप इस ठुमरी का रसास्वादन करें और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

फिल्म ‘मैं सुहागन हूँ’ : देस ठुमरी : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ : आशा भोसले और मोहम्मद रफी



आज की पहेली

आज की संगीत पहेली में हम आपको एक पंजाब अंग के सुविख्यात गायक के स्वर में एक पारम्परिक ठुमरी का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के सौवें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


१- यह ठुमरी किस विख्यात गायक की आवाज़ में है?

२- आपने अभी जिस पारम्परिक ठुमरी का अंश सुना है, इसी ठुमरी का प्रयोग आठवें दशक की एक फिल्म में किया गया था। क्या आप उस फिल्म में शामिल ठुमरी के राग का नाम हमें बता सकते हैं?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के १०० वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के ९६वें अंक की पहेली में हमने आपको रसूलन बाई के स्वरों में भैरवी की पारम्परिक ठुमरी ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ‘भैरवी’ और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- फिल्म ‘सौतेला भाई’। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, लखनऊ से प्रकाश गोविन्द और जौनपुर, उत्तर प्रदेश से डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का



मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ की शुरुआत हमने १९३६ की फिल्म ‘देवदास’ में शामिल पारम्परिक ठुमरी ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन....’ से किया था। अब हम आ पहुँचे हैं, इस श्रृंखला के समापन की दिशा में। अन्तिम दो अंकों में हम आठवें दशक की फिल्मों में शामिल ठुमरियों पर चर्चा करेंगे। अगले अंक में हम आपके लिए एक और मनमोहक पारम्परिक ठुमरी लेकर उपस्थित होंगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर हमारी इस सुरीली गोष्ठी में आप अपनी उपस्थिति अवश्य दर्ज़ कराइएगा। अब हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

कृष्णमोहन मिश्र


शनिवार, 1 दिसंबर 2012

'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की पहली वर्षगाँठ पर सुलझाइये कुछ नई आवाज़ों की 'सिने पहेली'


1 दिसम्बर, 2012
सिने-पहेली - 48  में आज

पहचानिए कुछ नये स्वरों को  


 
'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। आज का दिन 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' से जुड़े सभी प्रस्तुतकर्ताओं, पाठकों और श्रोताओं के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण दिन है क्योंकि पिछले साल आज ही के दिन इसकी नीव रखी गई थी। देखते ही देखते हमने तय कर लिए 365 दिन का सफ़र। गत एक साल में (इस पोस्ट के बनने तक) इस ब्लॉग पर कुल 2283 प्रस्तुतियाँ (पोस्ट) हुई हैं, और देश-विदेश मिलाकर कुल 82215 बार इस ब्लॉग पर लोगों की हाज़िरी लगी है। अर्थात 6.25 प्रस्तुति प्रतिदिन और 225.24 ब्लॉग-विज़िट प्रतिदिन, जिसे आप हमारी उपलब्धि भी कह सकते हैं। और यह सम्भव हुआ आप सबके प्यार से। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को धन्यवाद देते हुए आइए, आज की 'सिने पहेली' को आगे बढ़ाया जाए।


दोस्तों, आज से कुछ साल पहले तक फ़िल्म इंडस्ट्री में हर दौर की कुछ गिने-चुने पार्श्वगायक-गायिकाओं की आवाज़ें ही राज किया करती थीं। इन आवाज़ों को सुन कर पल में ही इनके नाम मस्तिष्क में आ जाया करता था। 2000 के दशक के मध्यकाल में गायिकाओं में सुनिधि चौहान और श्रेया घोषाल तथा गायकों में के.के, शान, कुणाल गाँजावाला, सोनू निगम जैसी आवाज़ें भी झट से पहचान ली जाती थी। पर उसके बाद जो दौर चल पड़ा, उसमें बहुत सी नई आवाज़ें एकदम से सिने-संगीत में आ गईं। कारण क्या था, यह तो वाद-विवाद का विषय है, पर जो भी है, इन नई आवाज़ों को अभी अपनी पहचान बनानी होगी ताकि दुनिया इन्हें सही मायने में पहचान सके। आप इन आवाज़ों को पहचान पाने में कितने सक्षम हैं? कितने अप-टू-डेट हैं आप, आज के फ़िल्म संगीत में? क्या नए फ़िल्मी गीतों के गायक-गायिकाओं के नाम आप याद रखते हैं? इसी की परीक्षा हम आज आपकी लेने जा रहे हैं। तैयार हैं न आप, आज की पहेली को सुलझाने के लिए? तो यह रही आज की 'सिने पहेली'।

आज की पहेली : नई तरंगें, नई आवाज़ें

नीचे दिये गये ऑडियो प्लेयर पर क्लिक करें और ध्यान से मेडली को सुनें। इसमें आपको दस अलग-अलग फ़िल्मी गीतों के अंश सुनने को मिलेंगे और हर अंश में एक गायक या गायिका की आवाज़ शामिल होगी। आपको इन दस गायक/ गायिकाओं को पहचानना है। फ़िल्म या गीत के बोल बताने की आवश्यक्ता नहीं है, बस गायक/गायिका के नाम लिख भेजिये उसी क्रम में जिस क्रम में ये गानें मेडली में दिये गए हैं।



ऑडियो का डाउन लोड लिंक
जवाब भेजने का तरीका

उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 48" अवश्य लिखें, और अन्त में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें गुरुवार, 6 दिसम्बर, शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।

नये प्रतियोगियों का आह्वान 
नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। दो सप्ताह बाद से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के साथी, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बताएँ और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम। अब महाविजेता कैसे बना जाये, आइए इस बारे में आपको बतायें।

कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता'

1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स। 
2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा। 
3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। चौथे सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...


4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

पिछली पहेली के सही जवाब

पिछले सप्ताह की पहेली का समाधान यह रहा...

1- Men's Health
2- TV Media
3- TULIP
4- Film Fare
5- GQ
6- Elle
7- Grazia Men
8- Harpers Bazaar
9- The Man
10- Marie Claire

पिछली पहेली के परिणाम

'सिने पहेली' की पिछली कड़ी में हमसे एक नई प्रतियोगी जुड़ी हैं, गुड़गाँव हरियाणा की सीमा गुप्ता। सीमा जी, आपका हार्दिक स्वागत है 'सिने पहेली' में। क्योंकि 'सिने पहेली' का वर्तमान सेगमेण्ट समाप्ति की ओर बढ़ा जा रहा है, इसलिए अगले सेगमेण्ट से नियमित भाग लेकर आप भी महाविजेता की लड़ाई में शामिल हो सकती हैं।

'सिने पहेली - 47' में कुल 10 प्रतियोगियों ने भाग लिया और सभी के 100% जवाब आये। सबसे पहले सही जवाब भेज कर इस सप्ताह के 'सरताज प्रतियोगी' बने हैं पिट्सबर्ग, अमरीका के महेश बसंतनी। महेश जी, बहुत-बहुत बधाई आपको।
और अब ये रहा 'सिने पहेली सेगमेण्ट-5' के अब तक का सम्मिलित स्कोरकार्ड...



'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, आज के लिए मुझे अनुमति दीजिए, अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी, नमस्कार। 




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