रविवार, 17 जुलाई 2011

बरसो रे कारे बादरवा...कारे-कजरारे मेघों का भावपूर्ण आह्वान

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 701/2011/141

"ओल्ड इज गोल्ड" पर आज से आरम्भ हो रही नई श्रृंखला में अपने पाठकों-श्रोताओं का मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार फिर स्वागत करता हूँ| दोस्तों; आज का यह अंक हम सब के लिए विशेष महत्त्वपूर्ण है| पिछली श्रृंखला के समापन अंक से "ओल्ड इज गोल्ड" ने सात सौ अंकों का आँकड़ा पार कर लिया है| आज हम सब आठवें शतक के पहले अंक में प्रवेश कर रहें हैं| "ओल्ड इज गोल्ड" की श्रृंखलाओं को यह ऐतिहासिक उपलब्धि दिलाने में आप सभी पाठकों-श्रोताओं का ही योगदान है| "आवाज़" के सम्पादक सजीव सारथी तथा "ओल्ड इज गोल्ड" श्रृंखलाओं के संवाहक सुजॉय चटर्जी ने एक बार पुनः मुझे एक नई श्रृंखला का दायित्व दिया, इसके लिए मैं इनके साथ-साथ अपने पाठकों-श्रोताओं के प्रति भी आभार प्रकट करता हूँ|

दोस्तों; इन दिनों आप प्रकृति के अद्भुत वरदान- वर्षा ऋतु का आनन्द ले रहें हैं| आपके चारो ओर परिवेश ने हरियाली की चादर ओढ़ रखी है| तप्त-शुष्क मिट्टी पर वर्षा की फुहारें पड़ने पर जो सुगन्ध फैलती है वह अवर्णनीय है| ऐसे ही मनभावन परिवेश में आपके उल्लास और उमंग को द्विगुणित करने के लिए हम लेकर आए हैं यह नई श्रृंखला -"उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा" | इस शीर्षक से यह अनुमान आपको हो ही गया होगा कि श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस-गन्ध से पगे गीतों की है| भारतीय साहित्य और संगीत को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली दो ऋतुएँ हैं- बसन्त और पावस; इस श्रृंखला में हम आपको वर्षा ऋतु के रागों का संक्षिप्त परिचय देते हुए उसी राग पर आधारित फिल्म-गीत भी प्रस्तुत करेंगे| इसके साथ ही भारतीय साहित्य में पावस ऋतु के कुछ अनूठे उद्धरण भी आपके साथ बाँटेंगे| संगीत शास्त्र के अनुसार मल्हार के सभी प्रकार पावस ऋतु की अनुभूति कराने में समर्थ हैं| इसके साथ ही कुछ सार्वकालिक राग- वृन्दावनी सारंग, देस और जयजयवन्ती भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं|

वर्षाकालीन सभी रागों में सबसे प्राचीन राग मेघ मल्हार माना जाता है| आज के अंक में हम राग मेघ अथवा मेघ मल्हार की ही चर्चा करेंगे| काफी थाट का यह राग औडव-औडव जाति का है; अर्थात आरोह-अवरोह में 5-5 स्वरों का प्रयोग होता है| गन्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता| समर्थ कलासाधक कभी-कभी परिवर्तन के रूप में अवरोह में गन्धार का प्रयोग भी करते हैं| ऋषभ का आन्दोलन राग मेघ का प्रमुख गुण होता है| यह पूर्वांग प्रधान राग है| इस राग के माध्यम से आषाढ़ मास के मेघों की प्रतीक्षा, काले मेघों का आकाश पर छा जाने और उमड़-घुमड़ कर वर्षा के प्रारम्भ होने के परिवेश का सजीव चित्रण किया जाता है| वर्षा ऋतु के आगमन की आहट देने वाले राग मेघ की प्रवृत्ति को महाकवि कालिदास ने "मेघदूत" के प्रारम्भिक श्लोकों में बड़े यथार्थ रूप में चित्रित किया है-

आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्टसानुं
वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श ||

अर्थात; रामगिरि पर्वत-श्रृंखला पर शापित यक्ष विरह-ताप से पीड़ित हो चुका था, ऐसे में आषाढ़ मास के पहले दिन आकाश में काले-काले मेघ मँडराने लगे| ऐसा प्रतीत होने लगा मानो मदमस्त हाथियों का झुण्ड पर्वत-श्रृंखलाओं के साथ अटखेलियाँ कर रहे हों|

इस परिवेश से मिलता-जुलता परिवेश हमारे आज के गीत का भी है| आज का गीत हमने 1942 में रणजीत स्टूडियो द्वारा निर्मित और जयन्त देसाई द्वारा निर्देशित फिल्म "तानसेन" से चुना है| फिल्म के प्रसंग के अनुसार अकबर के आग्रह पर तानसेन ने राग "दीपक" गाया, जिसके प्रभाव से उनका शरीर जलने लगा| कोई उपचार काम में नहीं आने पर उनकी शिष्या ने राग "मेघ मल्हार" की अवतारणा की जिसके प्रभाव से आकाश मेघाच्छन्न हो गया और बरखा की बूँदों ने तानसेन के तप्त शरीर का उपचार किया| इस प्रसंग में राग "मेघ मल्हार" गाकर मेघों का आह्वान करने वाली तरुणी को कुछ इतिहासकारों ने तानसेन की प्रेमिका कहा है तो कुछ ने उसे तानसेन की पुत्री तानी बताया है| बहरहाल, इस प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाता है कि राग "मेघ मल्हार" मेघों का आह्वान करने में सक्षम है| दूसरे रूप में हम यह भी कह सकते हैं कि इस राग में मेघाच्छन्न आकाश, उमड़ते-घुमड़ते बादलों की गर्जना और वर्षा के प्रारम्भ की अनुभूति कराने की क्षमता है| फिल्म "तानसेन" के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश थे| फिल्म में तानसेन की प्रमुख भूमिका में कुन्दनलाल सहगल ने राग आधारित कई गीत गाये थे; जिनमे "सप्त सुरन तीन ग्राम..." (राग कल्याण का ध्रुवपद), "रुनझुन रुनझुन चाल तिहारी..." (राग शंकरा), "काहे गुमान करे..." (राग पीलू) सहित खुर्शीद के साथ गाये सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे| राग "मेघ मल्हार" पर आधारित आज प्रस्तुत किया जाने वाला गीत अभिनेत्री-गायिका खुर्शीद के स्वरों में है| गीतकार हैं पं. इन्द्र| तीनताल में निबद्ध इस गीत में पखावज की संगति की गई है| एक स्थान पर ध्रुवपद की तरह दोगुन में भी गायन किया गया है| आइए सुनते हैं- वर्षा का आह्वान करते राग "मेघ मल्हार" पर आधारित यह गीत-



क्या आप जानते हैं...
कि 'रनजीत मूवीटोन' के प्रथम संगीतकार थे उस्ताद झंडे ख़ान, जिनकी इस बैनर के लिए पहली फ़िल्म थी 'देवी देवयानी'।

आज के अंक से पहली लौट रही है अपने सबसे पुराने रूप में, यानी अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - नायक नायिका अलग अलग है और बादलों को लक्ष्य कर अपने विरह की गाथा सुना रहे हैं.
सूत्र २ - संगीतकार हैं नौशाद.
सूत्र ३ - मुखड़े में शब्द है - "तकदीर"

अब बताएं -
किन युगल स्वरों में है ये गीत - २ अंक
गीतकार कौन हैं - २ अंक
किस राग पर आधारित है ये गीत - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी, अवध जी, शरद जी, अनजाना जी, इंदु जी और अन्य सभी श्रोताओं को जिनका स्नेह हमें निरंतर मिला है और जो हमारी चिर प्रेरणा है, उन सबको नमन

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

सुर संगम में आज - सुर बहार की स्वरलहरियाँ

सुर संगम - 29 - सुर-बहार

दुर्भाग्यपूर्वक, कई कारणों से सुर-बहार अन्य तंत्र वाद्यों की तरह लोकप्रिय नहीं हो सका। इसका सबसे प्रमुख कारण है इसकी विशाल बनावट जिसके कारण इसे संभालना व इसके यातायात में बाधा आती है।

शास्त्रीय तथा लोक संगीत को समर्पित साप्ताहिक स्तम्भ 'सुर-संगम' के सभी श्रोता- पाठकों का मैं, सुमित चक्रवर्ती हार्दिक स्वागत करता हूँ हमारे २९वें अंक में। हम सबने कहीं न कहीं, कभी न कभी, किसी न किसी को यह कहते अवश्य सुना होगा कि "परिवर्तन संसार का नियम है।" इस जगत में ईश्वर की शायद ही कोई ऐसी रचना हो जिसमें कभी परिवर्तन न आया हो। इसी प्रकार संगीत भी कई प्रकार के परिवर्तनों से होकर ग़ुज़रता रहा है तथा आज भी कहीं न कहीं किसी रूप में परिवर्तित किया जा रहा है तथा भारतीय शास्त्रीय संगीत भी इस परिवर्तन से अछूता नहीं रहा है। न केवल गायन में बल्कि शास्त्रीय वाद्यों में भी कई इम्प्रोवाइज़ेशन्स होते आए हैं। सुर-संगम के आज के अंक में हम चर्चा करेंगे ऐसे ही परिवर्तन की जिसने भारतीय वाद्यों में सबसे लोकप्रिय वाद्य 'सितार' से जन्म दिया 'सुर बहार' को।

यूँ तो माना जाता है कि सुर-बहार की रचना वर्ष १८२५ में सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद इम्दाद ख़ाँ के पिता उस्ताद साहेबदाद ख़ाँ ने की थी; परंतु कई जगहों पर इसके सृजक के रूप में लखनऊ के सितार वादक उस्ताद ग़ुलाम मुहम्मद का भी उल्लेख पाया जाता है। इसमें तथा सितार में मूल अंतर यह है कि सुर-बहार को नीचे के नोट्स पर बजाया जाता है। इसी कारण इसे 'बेस सितार' (bass sitar) भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त सितार के मुक़ाबले इसका तल भाग थोड़ा चपटा होता है तथा इसकी तारें भी सितार से भिन्न थोड़ी मोटी होती हैं। अपनी इसी बनावट के कारण इससे निकलने वाली ध्वनि का वज़न अधिक होता है। सुर-बहार की रचना के पीछे मूल लक्ष्य था पारंपरिक रूद्र-वीणा जैसी ध्रुपद शैली के आलाप को प्रस्तुत करना। चलिए सुर-बहार के बारे में जानकारी आगे बढ़ाने से पहले क्यों न इस प्रस्तुति को सुना जाए जिसमें आप सुनेंगे पं. रवि शंकर की प्रथम पत्नी अन्नपूर्णा देवी को सुर-बहार पर राग खमाज प्रस्तुत करते हुए|

अन्नपूर्णा देवी - सुर-बहार - राग खमाज


सुर-बहार को दो शैलियों में बजाया जाता है - पारंपरिक ध्रुपद शैली और, सितार शैली। पारंपरिक ध्रुपद शैली में सुर-बहार के सबसे उत्कृष्ट वादक माना जाता है सेनिया घराने के उस्ताद मुश्ताक़ ख़ाँ को। उनका सुर-बहार वादन सुनने वालों लगभग रूद्र-वीणा जैसा ही जान पड़ता है। सितार शैली में इसके दिग्गज माना जाता है उस्ताद इम्दाद ख़ाँ(१८४८-१९२०) को जो कि आज के दौर के सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद विलायत ख़ाँ के दादा थे। दुर्भाग्यपूर्वक, कई कारणों से सुर-बहार अन्य तंत्र वाद्यों की तरह लोकप्रिय नहीं हो सका। इसका सबसे प्रमुख कारण है इसकी विशाल बनावट जिसके कारण इसे संभालना व इसके यातायात में बाधा आती है। आइये आज की चर्चा को समाप्त करने से पहले हम सुनें एक और प्रस्तुति जिसमें सुर-बहार पर राग यमन प्रस्तुत कर रहे हैं इटावा घराने के सुप्रसिद्ध सितार एवं सुर-बहार वादक उस्ताद इमरात अली ख़ान साहब|

उस्ताद इमरात अली ख़ान - राग यमन


और अब बारी है इस कड़ी की पहेली की जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

पहेली: सुनिए और पहचानिए इस आवाज़ को जो है एक सुप्रसिद्ध हिन्दुस्तानी शास्त्रीय शैली के दिग्गज की|



पिछ्ली पहेली का परिणाम: क्षिति जी को बधाई!

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तंभ को और रोचक बना सकते हैं!आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० बजे कृष्णमोहन जी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती


आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

शनिवार, 16 जुलाई 2011

अदभुत प्रतिभा की धनी गायिका मिलन सिंह से बातचीत

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 50

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का इस 'शनिवार विशेषांक' में। दोस्तों, यूं तो यह साप्ताहिक विशेषांक है, पर इस बार का यह अंक वाक़ई बहुत बहुत विशेष है। इसके दो कारण हैं - पहला यह कि आज यह स्तंभ अपना स्वर्ण जयंती मना रहा है, और दूसरा यह कि आज हम जिस कलाकार से आपको मिलवाने जा रहे हैं, वो एक अदभुत प्रतिभा की धनी हैं। इससे पहले कि हम आपका परिचय उनसे करवायें, हम चाहते हैं कि आप नीचे दी गई ऑडिओ को सुनें।

मेडली गीत


कभी मोहम्मद रफ़ी, कभी किशोर कुमार, कभी गीता दत्त, कभी शम्शाद बेगम, कभी तलत महमूद और कभी मन्ना डे के गाये हुए इन गीतों की झलकियों को सुन कर शायद आपको लगा हो कि चंद कवर वर्ज़न गायक गायिकाओं के गाये ये संसकरण हैं। अगर ऐसा ही सोच रहे हैं तो ज़रा ठहरिए। हाँ, यह ज़रूर है कि ये सब कवर वर्ज़न गीतों की ही झलकियाँ थीं, लेकिन ख़ास बात यह कि इन्हें गाने "वालीं" एक ही गायिका हैं। जी हाँ, यह सचमुच चौंकाने वाली ही बात है कि इस गायिका को पुरुष और स्त्री कंठों में बख़ूबी गा सकने की अदभुत शक्ति प्राप्त है। अपनी इस अनोखी प्रतिभा के माध्यम से देश-विदेश में प्रसिद्ध होने वालीं इस गायिका का नाम है मिलन सिंह।

पिछले दिनों जब मेरी मिलन जी से फ़ेसबूक पर मुलाक़ात हुई तो मैंने उनसे एक इंटरव्यू की गुज़ारिश कर बैठा। और मिलन जी बिना कोई सवाल पूछे साक्षात्कार के लिए तैयार भी हो गईं, लेकिन उस वक़्त वो बीमार थीं और उनका ऑपरेशन होने वाला था। इसलिए उन्होंने यह वादा किया कि ऑपरेशन के बाद वो ज़रूर मेरे सवालों के जवाब देंगी। मैंने इंतज़ार किया, और उनके ऑपरेशन के कुछ दिन बाद जब मैंने उनके वादे का उन्हें याद दिलाया तो वादे को अंजाम देते हुए उन्होंने मेरे सवालों का जवाब दिया, हालाँकि बातचीत बहुत लम्बी नहीं हो सकी उनकी अस्वस्थता के कारण। तो आइए 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में आज आपका परिचय करवाएँ दो आवाज़ों में गाने वाली गायिका मिलन सिंह से।

सुजॉय - मिलन जी, नमस्कार और बहुत बहुत स्वागत है आपका 'हिंद-युम' के 'आवाज़' मंच पर। हमें ख़ुशी है कि अब आप स्वस्थ हो रही हैं।

मिलन सिंह - बहुत बहुत शुक्रिया आपका।

सुजॉय - मिलन जी, आप कहाँ की रहनेवाली हैं? और आपने गाना कब से शुरु किया था?

मिलन सिंह - मैं यू.पी से हूँ, ईटावा करके एक जगह है, वहाँ की मैं हूँ।

सुजॉय - आप जिस वजह से मशहूर हुईं हैं, वह है नर और नारी, दोनो कंठों में गा पाने की प्रतिभा की वजह से। तो यह बताइए कि किस उम्र में आपनें यह मह्सूस किया था कि आपके गले से दो तरह की आवाज़ें निकलती हैं?

मिलन सिंह - जब मैं ११ साल की थी, तब हालाँकि उम्र के हिसाब से बहुत छोटी थी और आवाज़ उतनी मच्योर नहीं हुई थी, पर कोई भी मेरी दोनो तरह की आवाज़ों में अंतर को स्पष्ट रूप से महसूस कर लेता था।

सुजॉय - आपके गाये गीतों को सुनते हैं तो सचमुच हैरानी होती है कि यह कैसे संभव है। हाल ही में आपके वेबसाइट पर आपके दो आवाज़ों में गाया हुआ लता-रफ़ी डुएट "यूंही तुम मुझसे बात करती हो" सुना और अपनी पत्नी को भी सुनवाया। वो तो मानने के लिए तैयार ही नहीं कि इसे किसी "एक गायिका" नें गाया है। तो बताइए कि किस तरह से आप इस असंभव को संभव करती हैं?

मिलन सिंह - इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है, यह ईश्वर की देन है बस! It is 100% God's gift to me.

सुजॉय - मुझे पता चला कि रफ़ी साहब आपकी पसंदीदा गायक रहे हैं, और आप उनके गीत ही ज़्यादा गाती आईं हैं और वो भी उनके अंदाज़ में। इस बारे में कुछ कहना चाहेंगी? सिर्फ़ रफ़ी साहब ही क्यों, आपनें सहगल, तलत महमूद, किशोर कुमार, हेमन्त कुमार आदि गायकों के स्टाइल को भी अपनाया है इनके गीतों को गाते वक़्त।

मिलन सिंह - इन कालजयी कलाकारों की नकल करने की जुर्रत कोई नहीं कर सकता, तो मैं क्या चीज़ हूँ? बस इतना है कि मैंने इन कलाकारों को गुरु समान माना है; इसलिए जब कभी इनके गीत गाती हूँ तो इन्हें ध्यान में रखते हुए इनके स्टाइल में गाने की कोशिश करती हूँ। मैं फिर से कहूंगी कि यह भी ईश्वर की देन है। ईश्वर मुझ पर काफ़ी महरबान रहे हैं।

सुजॉय - दो आवाज़ों में आपनें बहुत सारे लता जी और रफ़ी साहब के युगल गीतों को गाया है। आपका पसंदीदा लता-रफ़ी डुएट कौन सा है?

मिलन सिंह - लिस्ट इतनी लम्बी है कि उनमें से किसी एक गीत को चुनना बहुत मुश्किल है। फिर भी मैं चुनूंगी "कुहू कुहू बोले कोयलिया", "ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं", "पत्ता पत्ता बूटा बूटा", "वो हैं ज़रा ख़फ़ा ख़फ़ा" को।

सुजॉय - आप कभी लता जी और रफ़ी साहब से मिली हैं?

मिलन सिंह - जी हाँ, रफ़ी साहब से मैं मिली हूँ पर लता जी से मिलने का सौभाग्य अभी तक नहीं हुआ। पर मैं उन्हें लाइव कन्सर्ट में सुन चुकी हूँ।

सुजॉय - यहाँ पर हम अपने श्रोताओं को आपकी आवाज़ में रफ़ी साहब के लिए श्रद्धांजली स्वरूप एक गीत सुनवाना चाहेंगे।

गीत - रफ़ी साहब को मिलन सिंह की श्रद्धांजली


सुजॉय - मुझे याद है ८० के दशक में रेडियो में एक गीत आता था "रात के अंधेरे में, बाहों के घेरे में", और उस गीत के साथ गायिका का नाम मिलन सिंह बताया जाता था। क्या यह आप ही का गाया हुआ गीत है?

मिलन सिंह - जी हाँ, मैंने ही वह गीत गाया था।

सुजॉय - कैसे मिला था यह मौका फ़िल्म के लिए गाने का?

मिलन सिंह - दरअसल उस गीत को किसी और गायिका से गवाया जाना था, एक नामी गायिका जिनका नाम मैं नहीं लूंगी, पर फ़िल्म के निर्माता और उस गायिका के बीच में कुछ अनबन हो गई। तब फ़िल्म के संगीतकार सुरिंदर कोहली जी, जो मुझे पहले सुन चुके थे, उन्होंने मुझे इस गीत को गाने का मौका दिया।

सुजॉय - मिलन जी, 'रात के अंधेरे में' फ़िल्म के इस गीत को बहुत ज़्यादा नहीं सुना गया, इसलिए बहुत से लोगों नें इसे सुना नहीं होगा, तो क्यों न आगे बढ़ने से पहले आपके गाये इस फ़िल्मी गीत को सुन लिया जाए?

मिलन सिंह - जी ज़रूर!

गीत - रात के अंधेरे में (फ़िल्म- रात के अंधेरे में, १९८६)


सुजॉय - मिलन जी, 'रात के अंधेरे में' फ़िल्म का यह गीत तो रेडियो पर ख़ूब बजा था, पर इसके बाद फिर आपकी आवाज़ फ़िल्मी गीतों में सुनाई नहीं दी। इसका क्या कारण था?

मिलन सिंह - उसके बाद मैंने कुछ प्रादेशिक और कम बजट की हिंदी फ़िल्मों के लिए गानें गाए ज़रूर थे, लेकिन मेरे अंदर "कैम्प-कल्चर" का हुनर नहीं था, जिसकी वजह से मुझे कभी बड़ी बजट की फ़िल्मों में गाने का अवसर नहीं मिला। यह मेरी ख़ुशनसीबी थी कि टिप्स म्युज़िक कंपनी नें मेरे गीतों के कई ऐल्बम्स निकाले जो सुपर-हिट हुए और मुझे ख़ूब लोकप्रियता मिली। मेरा जितना नाम हुआ, मुझे जितनी शोहरत और सफलता मिली, वो इन सुपरहिट ऐल्बम की वजह से ही मिली।

सुजॉय - इन दिनों आप क्या कर रही हैं? क्या अब भी स्टेज शोज़ करती हैं?

मिलन सिंह - मैंने स्टेज शोज़ कभी नहीं छोड़ा, हाँ, एक ब्रेक ज़रूर लिया है अस्वस्थता के कारण। अभी अभी मैं संभली हूँ, तो इस साल बहुत कुछ करने का इरादा है, देश में भी और विदेश में भी।

सुजॉय - बहुत बहुत शुक्रिया मिलन जी! अस्वस्थता के बावजूद आपनें हमें समय दिया, बहुत अच्छा लगा। आपको हम सब की तरफ़ से एक उत्तम स्वास्थ्य की शुभकामनाएँ देते हुए आपसे विदा लेता हूँ, नमस्कार!

मिलन सिंह - बहुत बहुत शुक्रिया!

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तो दोस्तों, यह था नर और नारी, दोनों कंठों में गाने वाली प्रसिद्ध गायिका मिलन सिंह से बातचीत। मिलन जी के बारे में विस्तार से जानने के लिए आप उनकी वेबसाइट www.milansingh.com पर पधार सकते हैं।

और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

तो इसी के साथ अब आज का यह अंक समाप्त करने की अनुमति दीजिये। कल से शुरु होने वाली 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला में आपके साथी होंगे कृष्णमोहन मिश्र, और मैं आपसे फिर मिलूंगा अगले शनिवार के विशेषांक में। अब दीजिये अनुमति, नमस्कार!

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