Monday, May 2, 2011

ऋतु आये ऋतु जाए...अनिल दा का एक पसंदीदा गीत जिसमें मन्ना और लता ने सांसें फूंकी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 647/2010/347

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के कल के अंक में हमने भारतीय फिल्म संगीत जगत की ऐतिहासिक फिल्म 'बसन्त बहार' और उस फिल्म में स्वर शिल्पी मन्ना डे द्वारा गाये गए गीतों की चर्चा की थी। आज के अंक में हम मन्ना डे के शास्त्रीय संगीत के प्रति अनुराग की चर्चा को ही आगे बढ़ाते हैं। पहली कड़ी में इस बात पर चर्चा हो चुकी है कि मन्ना डे को प्रारम्भिक संगीत शिक्षा उनके चाचा कृष्णचन्द्र डे से प्राप्त हुई थी। मुम्बई आने से पहले उस्ताद दबीर खां से भी उन्होंने ख़याल गायकी सीखी थी। मुम्बई आकर भी उनकी संगीत सीखने की पिपासा शान्त नहीं हुई, उन्होंने उस्ताद अमान अली खां और उस्ताद रहमान अली खां से संगीत सीखना जारी रखा। अपने संगीतबद्ध किए गीतों में रागों का हल्का-फुल्का प्रयोग तो वो करते ही आ रहे थे, फिल्म 'बसन्त बहार' में राग आधारित गीतों के गायन से उनकी छवि ऐसी बन गई कि जब भी कोई संगीतकार राग आधारित गीत तैयार करता था, उसे गाने के लिए सबसे पहले मन्ना डे का नाम ही सामने आता था। शास्त्रीय संगीत आधारित गीतों के लिए मन्ना डे हर संगीतकार की पहली पसन्द बन गए थे।

संगीतकार अनिल विश्वास मन्ना डे की प्रतिभा को बहुत अच्छी तरह पहचानते थे। 1953 में फिल्म 'हमदर्द' के लिए उन्होंने संगीत रचनाएँ की थी। इस फिल्म का एक गीत उन्होंने 'रागमाला' में तैयार किया था। "रागमाला' संगीत का वह प्रकार होता है, जब किसी गीत में एक से अधिक रागों का प्रयोग हो और सभी राग स्वतंत्र रूप से रचना में उपस्थित हों। अनिल विश्वास ने गीत के चार अन्तरों को चार अलग- अलग रागों में संगीतबद्ध किया था। उन दिनों का चलन यह था कि ऐसे गीतों को गाने के लिए फिल्म जगत के बाहर के विशेषज्ञों को बुलाया जाता था। परन्तु अनिल विश्वास ने ऐसा नहीं किया। यह एक युगल गीत था, जिसे गाने के लिए उन्होंने पुरुष स्वर के लिए मन्ना डे को और नारी स्वर के लिए लता मंगेशकर का चयन किया। अनिल दा से अपने मधुर सम्बन्धों के बारे में चर्चा करते हुए मन्ना डे नें डा. मन्दार से कहा भी था -"अनिल दा अच्छे इन्सान, मधुर गायक और अद्भुत संगीतकार थे। उन्हें उर्दू शेर-ओ-शायरी का बेहद शौक था। वे प्रायः मुझे 'लॉन्ग ड्राइव' पर लिवा ले जाते थे। मैं कुछ समय तक उनका सहायक रहा और उस दौर मे मैनें उनसे बहुत कुछ सीखा। वह निर्विवाद रूप से कुशल संगीत सर्जक थे।" मन्ना डे की क्षमता पर अनिल विश्वास को भरोसा था और इसीलिए यह महत्वाकांक्षी गीत उन्हें दिया भी गया था।

फिल्म 'हमदर्द' के इस प्रसंग में अभिनेता शेखर एक अन्ध-गायक की भूमिका में हैं, जो निम्मी को संगीत की शिक्षा दे रहे हैं। गीत के बोल हैं -"ऋतु आए ऋतु जाए सखी री, मन के मीत न आए...."। गीत की स्थायी की पंक्ति -"ऋतु आए ऋतु जाए...." से लेकर पहले अन्तरे के अन्त ".......करूँ मैं कौन उपाय" तक ज्येष्ठ मास के सूर्य की तपिश और विरह से व्याकुल नायिका का चित्रण करने के लिए राग 'गौड़ सारंग', दूसरे अन्तरे में -"बरखा ऋतु बैरी हमार....." से लेकर "....बिंदिया करे पुकार" तक राग 'गौड़ मल्हार', तीसरे अन्तरे में "पी बिन सूना री....." से लेकर "....मेरा दिल भी अँधेरा" तक प्रातःकालीन राग 'जोगिया' तथा चौथे अन्तरे में -"आई मधु ऋतु..." से लेकर "....कब लग करूँ सिंगार" तक राग 'बहार' में पूरे गीत को पिरोया गया है। इस प्रकार मन्ना डे और लता मंगेशकर ने रागानुकूल स्वरों की शुद्धता बनाए रखते हुए इस अनूठे गीत को गाया है। गीतकार प्रेम धवन हैं। इस गीत को ऐतिहासिक बनाने में वाद्य संगीत के श्रेष्ठतम कलाकारों का योगदान भी रहा। गीत में सुप्रसिद्ध बांसुरी वादक पन्नालाल घोष और सारंगी वादक पं. रामनारायण ने संगति की थी। रिकार्डिंग पूरी हो जाने के बाद जाने-माने सितार-नवाज उस्ताद विलायत खां ने कहा था -' फिल्म संगीत जगत में आज एक श्रेष्ठतम गीत रिकार्ड हुआ है'।| स्वयं मन्ना डे भी इस गीत को अपने श्रेष्ठ गीतों की श्रेणी में शीर्ष पर मानते हैं। आइए आज हम प्रेम धवन के लिखे, अनिल विश्वास द्वारा संगीतबद्ध किये तथा मन्ना डे व लता मंगेशकर के स्वरों में 'हमदर्द' फिल्म का यह 'रागमाला' गीत सुनते हैं -

संस्करण ०१

संस्करण २


(हमदर्द के क्लिप १ में गीत का पहला, दूसरा और तीसरा अन्तरा है किन्तु चौथा अन्तरा नहीं है | क्लिप २ में केवल तीसरा और चौथा अन्तरा ही है | तीसरा अन्तरा दोनों क्लिप में शामिल है।)

एक मशहूर रेडिओ ब्रॉडकास्टर को दिये साक्षात्कार में मन्ना डे नें इस गीत के बारे में कुछ इन शब्दों में कहा था - "लता जी और मैंने, हमलोग बहुत मेहनत करके यह गाना गाये थे, बहुत मुश्किल था गाना, और चार रागों में गाना था, और मेरे ख़याल से कुछ ६-७ घंटों में हम रेकॉर्ड कर डाले। उसके बाद जो गाना जब सुनाया गया और अनिल दा को अच्छा लगा तो ऐसा नाचा, ऐसा नाचा, मैं, अनिल दा। अनिल दा बहुत वर्सेटाइल, नाच भी सकते हैं, बहुत अच्छी तरह नाच सकते हैं।" और फिर अनिल दा नें भी तो इस गीत से जुड़ा प्रसंग बताया था उसी मशहूर रेडिओ ब्रॉडकास्टर को - "आजकल के गायकों और संगीतकारों के पास रिहर्सल के लिए वक़्त नहीं है। और हमारे साथ तो ऐसी बात हुई कि लता दीदी नें ही, उनके पास भी समय हुआ करता था रिहर्सल देने के लिए, और एक गाना शायद आपको याद होगा, जो चार ख़याल मैंने पेश किया था फ़िल्म 'हमदर्द' में, १५ दिन बैठके लत दीदी और मन्ना दा, १५ दिन बैठके उसका प्रैक्टिस किया था।" और दोस्तों, पता है संगीतकार अनिल विश्वास की आत्मकथा ग्रन्थ का शीर्षक भी है "ऋतु आए ऋतु जाए"। अनिल दा की संगीत यात्रा में फिल्म 'हमदर्द' के इस गीत का क्या महत्त्व था, यह पुस्तक के शीर्षक से स्वतः सिद्ध हो जाता है। 'आवाज़' मंच पर भी इस गीत का ज़िक्र इससे पहले दो बार आ चुका है। पहली बार संगीतकार तुषार भाटिया के साक्षात्कार में उन्होंने इस गीत की चर्चा की थी, और अनिल दा की सुपुत्री शिखा विश्वास वोहरा के साक्षात्कार में भी उन्होंने अपनी पसंदीदा गीतों में इसका शुमार किया था। तो इन्हीं बातों पर आज का यह अंक सम्पन्न करने की कृष्णमोहन मिश्र को दीजिए अनुमति, नमस्कार!

पहेली 08/शृंखला 15
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - किस संगीतकार के लिए था मन्ना का ये क्लास्सिक गीत - २ अंक
सवाल २ - कौन थी नायिका इस फिल्म की - ३ अंक
सवाल ३ - गीतकार का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
प्रतीक जी और अमित जी ३ शानदार अंकों की बधाई. अनजाना जी और हिन्दुस्तानी जी भी आये सही जवाब के साथ. अवध जी आपकी बात से कौन नहीं सहमत होगा

खोज व आलेख- कृष्णमोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, May 1, 2011

भय भंजना वंदना सुन हमारी.....इस भजन के साथ जन्मदिन की शुभकामनाएँ प्रिय मन्ना दा को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 646/2010/346

'ओल्ड इज गोल्ड' के इस नये सप्ताह में सभी संगीतप्रेमी पाठकों-श्रोताओं का एक बार फिर स्वागत है। इन दिनों हमारी श्रृंखला 'अपने सुरों में मेरे सुरों को बसा लो' जारी है। आज के शुभ दिन को ही ध्यान में रख कर बहुआयामी प्रतिभा के धनी गायक-संगीतकार पद्मभूषण मन्ना डे के व्यक्तित्व और कृतित्व पर हमने यह श्रृंखला आरम्भ की थी। भारतीय फिल्म संगीत जगत के जीवित इतिहास मन्ना डे का आज 93 वाँ जन्मदिन है, इस शुभ अवसर पर हम 'ओल्ड इज गोल्ड' परिवार और सभी संगीत प्रेमियों की ओर से मन्ना डे को हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं और उनके उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु होने की कामना करते हैं।

पिछले अंक में हमने 'आर.के. कैम्प' में मन्ना डे के प्रवेश की चर्चा की थी। राज कपूर की फिल्मों के संगीतकार शंकर-जयकिशन का भी वह शुरुआती दौर था। मन्ना डे की प्रतिभा से यह संगीतकार जोड़ी, विशेष रूप से शंकर, बहुत प्रभावित थे। 'बूट पालिश' के बाद शंकर-जयकिशन की जोड़ी के साथ मन्ना डे नें अनेक यादगार गाने गाये। 1953 में मन्ना डे नें शंकर-जयकिशन के संगीत निर्देशन में तीन फिल्मों- 'चित्रांगदा', 'घर-बार' और 'दर्द-ए-दिल' में गीत गाये। 1955 में मन्ना डे के गायन से सजी दो ऐसी फ़िल्में बनीं, जिन्होंने उनकी गायन प्रतिभा में चाँद-सितारे जड़ दिये। फिल्म 'सीमा' का गीत- "तू प्यार का सागर है, तेरी एक बूँद के प्यासे हम...." फ़िल्मी भक्ति-गीतों में आज भी सर्वश्रेष्ठ पद पर प्रतिष्ठित है। इसी वर्ष मन्ना डे को राज कपूर की आवाज़ बनने का एक और अवसर मिला, फिल्म 'श्री 420' के माध्यम से। इस फिल्म में उन्होंने तीन गाने गाये, जिनमें एक एकल -"दिल का हाल सुने दिलवाला..." दूसरा, आशा भोसले के साथ युगल गीत -"मुड़ मुड़ के ना देख मुड़ मुड़ के...." और तीसरा लता मंगेशकर के साथ गाया युगल गीत -"प्यार हुआ, इकरार हुआ...."। फिल्म 'श्री 420' के गीत उन दिनों जबरदस्त हिट हुए थे और आज भी वही आलम बरकरार है। बच्चे-बच्चे की जबान पर ये गीत चढ़े हुए थे और विवाह के अवसर पर बजने वाले बैंड बाजे से इन्ही गानों की धुन बजती थी। मन्ना डे के स्वर में एकल गीत -"दिल का हाल सुने दिलवाला....." में लोक संगीत का पुट है। इस गीत के एक अन्तरे -"बूढ़े दरोगा ने चश्मे से देखा..." में तो मन्ना डे अपने स्वरों से शब्दों का ऐसा अभिनय कराते हैं कि परदे का दृश्य देखे बिना ही जीवन्त हो उठता है। गाने के इस अंश में परदे पर राज कपूर नें मन्ना डे के गले की हरकतों के अनुरूप अभिनय किया है। इसी प्रकार लता मंगेशकर के साथ गाया युगल गीत -"प्यार हुआ इकरार हुआ..." प्रेम की अभिव्यक्ति में बेजोड़ है। इस फिल्म के गानों को गाकर मन्ना डे नें संगीतकार द्वय में से शंकर को इतना प्रभावित कर दिया कि आगे चल कर शंकर उनके सबसे बड़े शुभचिन्तक बन गए।

1956 में शंकर-जयकिशन को फिल्म 'बसन्त बहार' में संगीत रचना का दायित्व मिला। इस फिल्म में उस समय के सर्वाधिक चर्चित और सफल अभिनेता भारत भूषण नायक थे और निर्माता थे आर चंद्रा। फिल्म के निर्देशक ए.वी. मयप्पन थे। संगीतकार शंकर-जयकिशन नें फिल्म के अधिकतर गीत शास्त्रीय रागों पर आधारित रखे थे। इससे पूर्व भारत भूषण की कई फिल्मों में मोहम्मद रफ़ी उनके लिए सफल गायन कर चुके थे। शशि भूषण इस फिल्म में मोहम्मद रफ़ी को ही लेने का आग्रह कर रहे थे, जबकि मयप्पन मुकेश से गवाना चाहते थे। यह बात जब शंकर जी को मालूम हुआ तो उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि राग आधारित इन गीतों को मन्ना डे के अलावा और कोई गा ही नहीं सकता। यह विवाद इतना बढ़ गया कि शंकर-जयकिशन को इस फिल्म से हटने की धमकी तक देनी पड़ी। अन्ततः मन्ना डे के नाम पर सहमति बनी। फिल्म 'बसन्त बहार' में मन्ना डे के गाये गीत 'मील के पत्थर' सिद्ध हुए। फिल्म के एक गीत -"केतकी गुलाब जूही चम्पक बन फूलें....." में तो मन्ना डे ने सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पं. भीमसेन जोशी के साथ गाया है | (यह गीत 'सुर संगम' के पांचवें अंक में पं. भीमसेन जोशी को श्रद्धांजलि स्वरुप प्रस्तुत किया गाया था, और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर भी बज चुका है) उपरोक्त प्रसंग मन्ना डे ने पत्रकार कविता छिब्बर से बातचीत में बताया था।

फिल्म 'बसन्त बहार' के अन्य गीत थे -"सुर ना सजे...." (एकल), "नैन मिले चैन कहाँ....." (लता मंगेशकर के साथ) तथा "भय भंजना वन्दना सुन हमारी...." (भजन)। आज आपको सुनवाने के लिए हमने 'बसन्त बहार' का भक्तिरस से ओत-प्रोत यही गीत चुना है। मन्ना डे के स्वरों में फिल्म 'बसन्त बहार' का यह गीत (भजन) गीतकार शैलेन्द्र ने लिखा है और यह राग "मियाँ की मल्हार" पर आधारित है और फ़िल्मी गीतों में बहुत कम प्रचलित दस मात्रा के ताल "झपताल" में है। राग "मियाँ की मल्हार" के स्वरों में अधिकतर रचनाएँ चंचल, श्रृंगार रस प्रधान और वर्षा ऋतु में नायिका की विरह व्यथा को व्यक्त करने वाली होती हैं, किन्तु यह गीत मन्ना डे के स्वरों में ढल कर भक्तिरस की अभिव्यक्ति करने में कितना सफल हुआ है, इसका निर्णय आप गीत सुन कर स्वयं करें -



पहेली 07/शृंखला 15
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - फिल्म संगीत खजाने का एक श्रेष्ठतम नगीना है ये गीत, ऐसा मान उस्ताद विलायत खान ने भी.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - किस बांसुरी वादक ने इस युगल गीत में संगति की थी - ३ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अनजाना जी, अमित जी और शरद जी को बधाई

खोज व आलेख- कृष्णमोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

सुर संगम में आज - सुनिए पं. विश्वमोहन भट्ट और उनकी मोहन वीणा के संस्पर्श में राग हंसध्वनी

सुर संगम - 18 - मोहन वीणा: एक तंत्र वाद्य की लम्बी यात्रा
1966 के आसपास एक जर्मन हिप्पी लड़की अपना गिटार लेकर मेरे पास आई और मुझसे आग्रह करने लगी कि मैं उसे उसके गिटार पर ही सितार बजाना सिखा दूँ| उस लड़की के इस आग्रह पर मैं गिटार को इस योग्य बनाने में जुट गया कि इसमें सितार के गुण आ जाएँ

सुप्रभात! सुर-संगम की एक और संगीतमयी कड़ी में मैं, सुमित चक्रवर्ती सभी श्रोताओं व पाठकों का स्वागत करता हूँ। आप सबको याद होगा कि सुर-संगम की १४वीं व १५वीं कड़ियों में हमने चैती पर लघु श्रंख्ला प्रस्तुत की थी जिसमें इस लोक शैली पर हमारा मार्गदर्शन किया था लखनऊ के हमारे साथी श्री कृष्णमोहन मिश्र जी ने। उनके लेख से हमें उनके वर्षों के अनुभव और भारतीय शास्त्रीय व लोक संगीत पर उनके ज्ञान की झलक मिली। अब इसे हमारा सौभाग्य ही समझिये कि कृष्णमोहन जी एक बार पुनः उपस्थित हैं सुर-संगम के अतिथि स्तंभ्कार बनकर, आइये एक बार फिर उनके ज्ञान रुपी सागर में गोते लगाएँ!

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सुर-संगम के सभी श्रोताओं व पाठकों को कृष्णमोहन मिश्र का प्यार भरा नमस्कार! बात जब भारतीय संगीत के जड़ों के तलाश की होती है तो हमारी यह यात्रा वैदिक काल के "सामवेद" तक जा पहुँचती है| वैदिक काल से लेकर वर्तमान आधुनिक काल तक की इस संगीत यात्रा को अनेक कालखण्डों से गुज़रना पड़ा| किसी कालखण्ड में भारतीय संगीत को अपार समृद्धि प्राप्त हुई तो किसी कालखण्ड में इसके अस्तित्व को संकट भी रहा| अनेक बार भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर की संगीत शैलियों ने इसे चुनौती भी दी, परन्तु परिणाम यह हुआ कि वह सब शैलियाँ भारतीय संगीत की अजस्र धारा में विलीन हो गईं और हमारा संगीत और अधिक समृद्ध होकर आज भी मौजूद है| परम्परागत विकास-यात्रा में नई-नई शैलियों का जन्म हुआ तो वैदिककालीन वाद्य-यंत्रों का क्रमबद्ध विकास भी हुआ| इनमें से कुछ वाद्य तो ऐसे हैं जिनका अस्तित्व वैदिक काल में था, बाद में इनके स्वरुप में थोडा परिवर्तन हुआ तो ये पाश्चात्य संगीत का हिस्सा बने| पश्चिमी संगीत जगत में ऐसे वाद्यों ने सफलता के नए मानक गढ़े| ऐसे वाद्यों की यात्रा यहीं नहीं रुकी, कई प्रयोगधर्मी संगीतज्ञों ने वाद्यों के इस पाश्चात्य स्वरूप में संशोधन किया और इन्हें भारतीय संगीत के अनुकूल स्वरुप दे दिया| अनेक पाश्चात्य वाद्य, जैसे- वायलिन, हारमोनियम, मेन्डोलीन, गिटार आदि आज शास्त्रीय संगीत के मंच पर सुशोभित हो रहें हैं|

सुर-संगम के आज के अंक में हम एक ऐसे ही तंत्र वाद्य- "मोहन वीणा" पर चर्चा करेंगे, जो विश्व-संगीत जगत की लम्बी यात्रा कर आज पुनः भारतीय संगीत का हिस्सा बन चुका है| वर्तमान में "मोहन वीणा" के नाम से जिस वाद्य यंत्र को हम पहचानते हैं, वह पश्चिम के 'हवाइयन गिटार' या 'साइड गिटार' का संशोधित रूप है| 'मोहन वीणा' के प्रवर्तक हैं, सुप्रसिद्ध संगीत-साधक पं. विश्वमोहन भट्ट, जिन्होंने अपने इस अनूठे वाद्य से समूचे विश्व को सम्मोहित किया है| श्री भट्ट इस वाद्य के सृजक ही नहीं, बल्कि उच्चकोटि के तंत्र-वाद्य-वादक भी हैं| सुप्रसिद्ध सितार वादक पं. रविशंकर के शिष्य विश्वमोहन भट्ट का परिवार मुग़ल सम्राट अक़बर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन और उनके गुरु स्वामी हरिदास से सम्बन्धित है| प्रारम्भ में उन्होंने सितार वादन की शिक्षा प्राप्त की, किन्तु 1966 की एक रोचक घटना ने उन्हें एक नये वाद्य के सृजन की ओर प्रेरित कर दिया| एक बातचीत में श्री भट्ट ने बताया था -"1966 के आसपास एक जर्मन हिप्पी लड़की अपना गिटार लेकर मेरे पास आई और मुझसे आग्रह करने लगी कि मैं उसे उसके गिटार पर ही सितार बजाना सिखा दूँ| उस लड़की के इस आग्रह पर मैं गिटार को इस योग्य बनाने में जुट गया कि इसमें सितार के गुण आ जाएँ|" श्री भट्ट के वर्तमान 'मोहन वीणा' में केवल सितार और गिटार के ही नहीं बल्कि प्राचीन वैदिककालीन तंत्र वाद्य विचित्र वीणा और सरोद के गुण भी हैं| मोहन वीणा का मूल उद्‍गम 'विचित्र वीणा' ही है| आइए हम आपको 'विचित्र वीणा' वादन का एक अंश सुनवाते हैं इस वीडियो के माध्यम से| राग 'रागेश्वरी' में यह एक ध्रुवपद है जो 12 मात्रा के 'चौताल' में निबद्ध है और इस रचना के विदेशी वादक हैं विदेशी मूल के गियान्नी रिक्कीज़ी जिन्हें वर्तमान का विचित्र वीणा दिग्गज माना जाता है।

राग - रागेश्वरी : विचित्र वीणा : वादक - गियान्नी रिक्कीज़ी

देखिये विडियो यहाँ
श्री विश्वमोहन भट्ट मोहन वीणा पर सभी भारतीय संगीत शैलियों- ध्रुवपद, धमार, ख़याल, ठुमरी आदि का वादन करने में समर्थ हैं| आइए यहाँ थोड़ा रुक कर एक और वीडियो द्वारा मोहन वीणा पर राग 'हंसध्वनि' में एक अनूठी रचना सुनते हैं जिसे प्रस्तुत कर रहे हैं स्वयं पं. विश्वमोहन भट्ट| रचना के पूर्वार्ध में धमार ताल, ध्रुवपद अंग में तथा उत्तरार्ध में कर्णाटक संगीत पद्यति में एक कृति "वातापि गणपतये भजेहम..." का वादन है| मोहन वीणा के बारे में हम और भी जानेंगे सुर-संगम की आगामी कड़ी में।

राग हंसध्वनि में धमार एवं कृति : मोहन वीणा : वादक - विश्वमोहन भट्ट



और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

हिंदी सिनेमा में हवायन गिटार का प्रयोग सबसे पहले संभवतः १९३७ की एक फ़िल्म के गीत में हुआ था जिसमें संगीतकार केशवराव भोले ने फ़िल्म की अभिनेत्री से एक अंग्रेज़ी गीत गवाया था। आपको बताना है उस अभिनेत्री - गायिका का नाम।

पिछ्ली पहेली का परिणाम: श्रीमति क्षिति तिवारी जी ने लगातार तीसरी बार सटीक उत्तर देकर ५ अंक और अपने खाते में जोड़ लिये हैं, बधाई! अमित जी, अवध जी, कहाँ ग़ायब हैं आप दोनों? देखिये कहीं बाज़ी हाथ से न निकल जाए!

सुर-संगम के आज के अंक को हम यहीं पर विराम देते हैं, परंतु 'मोहन वीणा' पर कई तथ्य एवं जानकारी अभी बाक़ी है जिनका उल्लेख हम करेंगे हमारी आगामी कड़ी में। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। आगामी रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी लेकर, तब तक के लिए कृष्णमोहन मिश्र को आज्ञा दीजिए| और हाँ! शाम ६:३० बजे हमारे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के प्यारे साथी सुजॉय चटर्जी के साथ पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

खोज व आलेख- कृष्णमोहन मिश्र
प्रस्तुति- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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