रविवार, 20 मार्च 2011

अपने दिल में जगह दीजिए....गुजारिश की उषा खन्ना ने और उनके गीतों को सर आँखों पे बिठाया श्रोताओं ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 616/2010/316

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस नए सप्ताह में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। इन दिनों इस स्तंभ में जारी है ८ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को ध्यान में रखते हुए हमारी लघु शृंखला 'कोमल है कमज़ोर नहीं'। पिछले पाँच अंकों में हमनें पाँच ऐसे महिला कलाकारों से आपका परिचय करवाया जिन्होंने हिंदी सिनेमा के पहले दौर में अपनी महत्वपूर्ण योगदान से महिलाओं के लिए इन विधाओं में आने का रास्ता आसान बनाया था। जद्दनबाई, दुर्गा खोटे, देविका रानी, सरस्वती देवी और कानन देवी के बाद आज हम जिस महिला शिल्पी से आपका परिचय करवाने जा रहे हैं, वो एक ऐसी संगीतकार हैं जो महिला संगीतकारों में सब से ज़्यादा मशहूर हुईं और सब से ज़्यादा लोकप्रिय गीत जनता को दिए। हम बात कर रहे हैं उषा खन्ना की। और लोकप्रियता उषा जी ने अपनी पहली ही फ़िल्म से हासिल कर ली थी। एस. मुखर्जी ने उनके संगीत के प्रति लगाव को देख कर अपनी फ़िल्म 'दिल देके देखो' के संगीत का उत्तरदायित्व उन्हें दे दिया, और इस तरह से गायिका उषा खन्ना बन गईं संगीत निर्देशिका उषा खन्ना। पढ़िये उषा जी के शब्दों में उनके शुरुआती दिनों का हाल - "संगीत का शौक तो मुझे मेरे पिता से ही मिला। मेरे पिता किसी ज़माने में फ़िल्मों में गीत लिखा करते थे; वो शायर भी थे और शास्त्रीय संगीत भी अच्छा गाते थे। बचपन से मेरे गानों के प्रति शौक को देख कर मुझे उसी दिशा में आगे बढ़ने का मौका दिया। मैं आयी थी फ़िल्मों में गायिका बनने, और बहुत बड़ी इच्छा थी कि सिंगर बनूँ। मगर मुक़द्दर और वक़्त की बात बड़ी अजीब है, मैं बन गई संगीतकार, वैसे मैं गाती भी हूँ।" (सौजन्य: सरगम के सितारे, विविध भारती)

जिस तरह सुंदर बोलों को अगर मधुर धुनें मिल जाये तो उसे चार चाँद लग जाती है, वैसे ही निजी ज़िंदगी में भी ऐसा ही कुछ होता है। और उषा खन्ना की ज़िंदगी में आये गीतकार सावन कुमार। पढ़िये ख़ुद उषा जी के शब्दों में - "हम दोनों एक दूसरे को पसंद कर रहे थे, पर कभी किसी ने ज़ाहिर नहीं किया। सावन जी ने फ़िल्म 'हवस' के लिए मुझे संगीतकार चुना। वो उस फ़िल्म को डिरेक्ट भी कर रहे थे और उसके गानें भी लिख रहे थे। फिर क्या, रोज़ रोज़ बैठकें और मुलाक़ातें होने लगीं। आग दोनों तरफ़ बराबर लगी हुई थी। उसी फ़िल्म के एक गाने की रेकॊर्डिंग् के समय आशा जी ने मुझसे कहा कि 'उषा, तू मुझे बहुत प्यारी लगती है, अब मैं तुझे दुल्हन के रूप में देखना चाहती हूँ।' मैं तो डर गई, कहीं उनको कुछ पता तो नहीं चल गया! रेकॊर्डिंग् रूम के अंदर से वो गीत गा रही थीं और एक बार मेरी तरफ़ और एक बार सावन जी की तरफ़ शरारत भरी निगाहों से देख रही थीं। मैं समझ गई कि हमारी चोरी पकड़ी गई है।" और दोस्तों, पता है वह गीत कौन सा था? वह गीत था "अपने दिल में जगह दीजिए"। और सावन जी और उषा जी, दोनों नें एक दूसरे को अपने अपने दिलों में जगह दी और एक सुखी दम्पति के रूप में उनके जीवन निखरे। आइए उन दोनों को एक लम्बी और सुखी जीवन की शुभकामनाएँ देते हुए आज इसी गीत का हम सब आनंद उठायें।



क्या आप जानते हैं...
कि उषा खन्ना ने कई नवोदित आवाज़ों को उनके शुरुआती करीयर में फ़िल्मी गीत गाने का मौका दिया, जिनमें शामिल हैं जसपाल सिंह, पंकज उधास, हेमलता, शब्बीर कुमार, रूप कुमार राठौड़, और सोनू निगम।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 07/शृंखला 12
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - आवाज़ है लता की.

सवाल १ - जिस फिल्म का ये गीत है उसकी कहानी लिखने वाली लेखिका है हमारी अगली शख्सियत, कौन हैं ये - ३ अंक
सवाल २ - गीतकार और संगीतकार दोनों बताएं इस प्रस्तुत होने वाले गीत के - २ अंक
सवाल ३ - इस अजीम फनकारा की पहली निर्देशित फिल्म कौन सी थी - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
बाज़ी तो अंजाना जी के हाथ रही मगर याद रहे अभी भी अमित जी २ अंकों से आगे हैं....आधी शृंखला बाकी है देखते हैं, क्या होगा अंजाम :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

सुर संगम में आज - होरी की उमंग और ठुमरी के लोक रंग से सजाएँ इस होली को

सुर संगम - 12 - शास्त्रिय और लोक संगीत की होली

फाल्गुन के महीने में पिचकारियों से निकले रंग मानो मुर्झाने वाली, शीतकालीन हवाओं को बहाकर पृथ्वी की छवि में बसंत ऋतु के जीवंत दृश्य भर देते हैं। तो आइये सुनते हैं ऐसे ही दृश्य को दर्शाती इस ठुमरी को, शोभा गुर्टू जी की आवाज़ में।


"आज बिरज में होरी रे रसिया
आज बिरज में होरी रे रसिया
अबीर गुलाल के बादल छाए
अबीर गुलाल के बादल छाए
आज बिरज में होरी रे रसिया

आज बिरज में होरी रे रसिया"


सुप्रभात! रविवार की इस रंगीन सुबह में सुर-संगम की १२वीं कड़ी लिए मैं सुमित चक्रवर्ती पुन: उपस्थित हूँ। दोस्तों क्या कभी आपने महसूस किया है कि होली के आते ही समां में कैसी मस्ती सी घुल जाती है. इससे पहले कि आप बाहर निकल कर रंग और गुलाल से जम कर होली खेलें जरा संगीत के माध्यम से अपना मूड तो सेट कर लीजिए. आज की हमारी कड़ी भी रंगों के त्योहार - होली पर ही आधारित है जिसमें हमने पारंपरिक लोक व शास्त्रीय संगीत की होली रचने की एक कोशिश की है। भारतीय त्योहारों में होली को शास्त्रीय व लोक संगीत का एक महत्त्वपूर्ण घटक माना गया है। रंगों का यह उत्सव हमारे जीवन को हर्षोल्लास व संगीत से भर देता है। फाल्गुन के महीने में पिचकारियों से निकले रंग मानो मुर्झाने वाली, शीतकालीन हवाओं को बहाकर पृथ्वी की छवि में बसंत ऋतु के जीवंत दृश्य भर देते हैं। तो आइये सुनते हैं ऐसे ही दृश्य को दर्शाती इस ठुमरी को, शोभा गुर्टू जी की आवाज़ में।

ठुमरी - आज बिरज में होरी रे रसिया


होली भारत के सबसे जीवंत व उल्लास भरे त्योहारों में से एक है। इसे देश के हर कोने में अलग-अलग और अनूठी शैलियों में मनाया जाता है जिसकी झलक मूलत: इन प्रांतों के संगीत में पाई जाती है। होली के साथ जुड़ी संगीत शैलियाँ भिन्न होते हुए भी मुख्यतः पौराणिक संदर्भ और लोककथाओं पर आधारित होती हैं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत शैली के मूल १० निम्नलिखित रूप हैं - ध्रुपद, धामर, होरी, ख़याल, टप्पा, चतुरांग, राग अगर, तराना, सरगम और ठुमरी। इनमें से ध्रुपद शैली को सबसे प्राचीन माना जाता है तथा बाकी सभी शैलियों का जन्म भी इसी से हुआ। 'होरी' ध्रुपद का ही सबसे लोकप्रिय रूप है जिसे होली के त्योहार पर गाया जाता है। ये रचनाएँ मुख्यतः राधा-कृष्ण के प्रेम-प्रसंग और बसंत ऋतु पर आधारित होती हैं। दिलचस्प बात यह है कि इसे शास्त्रीय व अर्धशास्त्रीय दोनों रूपों में प्रस्तुत किया जाता है। होरी को साधारणतः बसंत, काफी व खमाज आदि रागों और दीपचंदी ताल में गाया जाता है। तो चलिए क्यों न हम भी एक बार फिर से रंग जाएँ गिरिजा देवी द्वारा प्रस्तुत इस 'होरी' के रंग में।

उड़त अबीर गुलाल - गिरिजा देवी


भारतीय संगीत में जब हम होली की बात कर ही रहे हैं तो फ़िल्मी गीतों का उल्लेख करना भी अनिवार्य बन जाता है। हमारी हिन्दी फ़िल्मों में भी अक्सर होली पर आधारित गीतों को दर्शाया जाता है जो किसी न किसी राग या ठुमरी पर ही आधारित होते है। होली पर आधारित फ़िल्मी गीतों में मैं जिस गीत को नींव का पत्थर मानता हूँ वह है फ़िल्म 'नवरंग' का अत्यंत लोकप्रिय गीत - 'अरे जारे हट नटखट ना छेड़ मेरा घूँघट'। यह गीत संगीतकार सी. रामचन्द्र ने राग पहाड़ी पर रचा और इसके बोल लिखे भरत व्यास ने। इस गीत को गाया था स्वयं सी. रामचन्द्र, आशा भोंसले और महेन्द्र कपूर ने तथा गीत में दर्शाया गया था अभिनेत्री सन्ध्या को राधा-कृष्ण की अट्खेलियों को नृत्य के रूप में प्रस्तुत करते हुए। आइये आनंद लेते हैं इस रंगारंग गीत का।

अरे जा रे हट नटखट - नवरंग


और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। 'सुर-संगम' के ५०-वे अंक तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से ज़्यादा अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुनिए इस टुकड़े को और पहचानिए कि यह कौन सा वाद्‍य है।



पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित तिवारी जी ने गीत को और उसके राग को बिलकुल सही पहचाना और ५ अंक अर्जित कर लिए हैं। बधाई व शुभकामनाएँ!

तो लीजिए, हम आ पहुँचे हैं 'सुर-संगम' की आज की कड़ी की समाप्ति पर। आशा है आपको यह कड़ी पसन्द आई। सच मानिए तो मुझे भी बहुत आनन्द आया इस कड़ी को लिखने में। आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। हमारे और भी श्रोता व पाठक आने वाली कड़ियों को सुनें, पढ़ें तथा पहेलियों में भाग लें, इसी आशा के साथ आगामी रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी लेकर, तब तक के लिए अपने मित्र सुमित चक्रवर्ती को आज्ञा दीजिए, आप सभी को होली की पुनः ढेरों शुभकामनाएँ, नमस्कार!

प्रस्तुति- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

शनिवार, 19 मार्च 2011

होली के हजारों रंग अपने गीतों में भरने वाले शकील बदायूनीं साहब को याद करें हम उनके बेटे जावेद बदायूनीं के मार्फ़त

होली है!!! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और आप सभी को रंगीन पर्व होली पर हमारी ढेर सारी शुभकामनाएँ। तो कैसा रहा होली से पहले का दिन? ख़ूब मस्ती की न? हमनें भी की। और 'आवाज़' की हमारी टोली दिन भर रंग उड़ेलते हुए, मौज मस्ती करते हुए, लोगों को शुभकामनाएँ देते हुए, अब दिन ढलने पर आ पहुँचे हैं एक मशहूर शायर व गीतकार के बेटे के दर पर। ये उस अज़ीम शायर के बेटे हैं, जिस शायर नें अदबी शायरी के साथ साथ फ़िल्म-संगीत में भी अपना अमूल्य योगदान दिया। हम आये हैं शक़ील बदायूनी के साहबज़ादे जावेद बदायूनी के पास उनके पिता के बारे में थोड़ा और क़रीब से जानने के लिए और साथ ही शक़ील साहब के लिखे कुछ बेमिसाल होली गीत भी आपको सुनवायेंगे।

सुजॊय - जावेद बदायूनी साहब, नमस्कार, और 'हिंद-युग्म' परिवार की तरफ़ से आपको और आपके परिवार को होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ!

जावेद बदायूनी - शुक्रिया बहुत बहुत, और आपको भी होली की शुभकामनाएँ!

सुजॊय - आज का दिन बड़ा ही रंगीन है, और हमें बेहद ख़ुशी है कि आज के दिन आप हमारे पाठकों से रु-ब-रु हो रहे हैं।

जावेद बदायूनी - मुझे भी बेहद ख़ुशी है अपने पिता के बारे में बताने का मौका पाकर।

सुजॊय - जावेद साहब, इससे पहले कि मैं आप से शक़ील साहब के बारे में कुछ पूछूँ, मैं यह बताना चाहूँगा कि उन्होंने कुछ शानदार होली गीत लिखे हैं, जिनका शुमार सर्वश्रेष्ठ होली गीतों में होता है। ऐसा ही एक होली गीत है फ़िल्म 'मदर इण्डिया' का, "होली आई रे कन्हाई, रंग छलके, सुना दे ज़रा बांसुरी"। शम्शाद बेगम की आवाज़ में इस गीत को आइए पहले सुनते हैं, फिर बातचीत आगे बढ़ाते हैं।

जावेद बदायूनी - ज़रूर साहब, सुनवाइए!

गीत - होली आई रे कन्हाई (मदर इण्डिया)


सुजॊय - जावेद साहब, यह बताइए कि जब आप छोटे थे, तब पिता के रूप में शक़ील साहब का बरताव कैसा हुआ करता था? घर परिवार का माहौल कैसा था?

जावेद बदायूनी - एक पिता के रूप में उनका व्यवहार दोस्ताना हुआ करता था, और सिर्फ़ मेरे साथ ही नहीं, अपने सभी बच्चों को बहुत प्यार करते थे और सब से हँस खेल कर बातें करते थे। यानी कि घर का माहौल बड़ा ही ख़ुशनुमा हुआ करता था।

सुजॊय - अच्छा जावेद जी, क्या घर पर शायरों का आना जाना लगा रहता था?

जावेद बदायूनी - जी हाँ जी हाँ, शक़ील साहब के दोस्त लोगों का आना जाना लगा ही रहता था जिनमें बहुत से शायर भी होते थे। घर पर ही शेर-ओ-शायरी की बैठकें हुआ करती थीं।

सुजॊय - जावेद साहब, शक़ील साहब के अपने एक पुराने इंटरव्यु में ऐसा कहा था कि उनके करीयर को चार पड़ावों में विभाजित किया जा सकता है। पहले भाग में १९१६ से १९३६ का समय जब वे बदायूँ में रहा करते थे। फिर १९३६ से १९४२ का समय अलीगढ़ का; १९४२ से १९४६ का दिल्ली का उनका समय, और १९४६ के बाद बम्बई का सफ़र। हमें उनकी फ़िल्मी करीयर, यानी कि बम्बई के जीवन के बारे में तो फिर भी पता है, क्या आप पहले तीन के बारे में कुछ बता सकते हैं?

जावेद बदायूनी - बदायूँ में जन्म और बचपन की दहलीज़ पार करने के बाद शक़ील साहब नें अलीगढ़ से अपनी ग्रैजुएशन पूरी की और दिल्ली चले गये, और वहाँ पर एक सरकारी नौकरी कर ली। साथ ही साथ अपने अंदर शेर-ओ-शायरी के जस्बे को क़ायम रखा और मुशायरों में भाग लेते रहे। ऐसे ही किसी एक मुशायरे में नौशाद साहब और ए. आर. कारदार साहब भी गये हुए थे और इन्होंने शक़ील साहब को नज़्म पढ़ते हुए सुना। उन पर शक़ील साहब की शायरी का इतना असर हुआ कि उसी वक़्त उन्हें फ़िल्म 'दर्द' के सभी गानें लिखने का ऒफ़र दे दिया।

सुजॊय - 'दर्द' का कौन सा गीत सब से पहले उन्होंने लिखा होगा, इसके बारे में कुछ बता सकते हैं?

जावेद बदायूनी - "हम दर्द का फ़साना" उनका लिखा पहला गीत था, और दूसरा गाना था "अफ़साना लिख रही हूँ", उमा देवी का गाया हुआ।

सुजॊय - इस दूसरे गीत को हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा चुके हैं। क्योंकि आज होली है, आइए यहाँ पर शक़ील साहब का लिखा हुआ एक और शानदार होली गीत सुनते हैं। फ़िल्म 'कोहिनूर' से "तन रंग लो जी आज मन रंग लो"। संगीत नौशाद साहब का।

जावेद बदायूनी - ज़रूर सुनवाइए।

गीत - तन रंग लो जी आज मन रंग लो (कोहिनूर)


सुजॊय - जावेद साहब, क्या शक़ील साहब कभी आप भाई बहनों को प्रोत्साहित किया करते थे लिखने के लिये?

जावेद बदायूनी - जी हाँ, वो प्रोत्साहित भी करते थे और जब हम कुछ लिख कर उन्हें दिखाते तो वो ग़लतियों को सुधार भी दिया करते थे।

सुजॊय - शक़ील बदायूनी और नौशाद अली, जैसे एक ही सिक्के के दो पहलू। ये दोनों एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त भी थे। क्या शक़ील साहब आप सब को नौशाद साहब और उस दोस्ती के बारे में बताया करते थे? या फिर इन दोनों से जुड़ी कोई यादगार घटना या वाकया ?

जावेद बदायूनी - शक़ील साहब और नौशाद साहब वर ग्रेटेस्ट फ़्रेण्ड्स! यह हक़ीक़त है कि शक़ील साहब नौशाद साहब के साथ अपने परिवार से भी ज़्यादा वक़्त बिताया करते थे। दोनों के आपस की ट्युनिंग् ग़ज़ब की थी और यह ट्युनिंग् इनके गीतों से साफ़ छलकती है। शक़ील साहब के गुज़र जाने के बाद भी नौशाद साहब हमारे घर आते रहते थे और हमारा हौसला अफ़ज़ाई करते थे। यहाँ तक कि नौशाद साहब हमें बताते थे कि ग़ज़ल और नज़्म किस तरह से पढ़ी जाती है और मैं जो कुछ भी लिखता था, वो उन्हें सुधार दिया करते थे।

सुजॊय - यानी कि शक़ील साहब एक पिता के रूप में जिस तरह से आपको गाइड करते थे, उनके जाने के बाद वही किरदार नौशाद साहब ने निभाया और आपको पिता समान स्नेह दिया।

जावेद बदायूनी - इसमें कोई शक़ नहीं!

सुजॊय - जावेद साहब, बचपन की कई यादें ऐसी होती हैं जो हमारे मन-मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ जाती हैं। शक़ील साहब से जुड़ी आप के मन में भी कई स्मृतियाँ होंगी। उन स्मृतियों में से कुछ आप हमारे साथ बाँटना चाहेंगे?

जावेद बदायूनी - शक़ील साहब के साथ हम सब रेकॊर्डिंग् पर जाया करते थे और कभी कभी तो वो हमें शूटिंग् पर भी ले जाते। फ़िल्म 'राम और श्याम' के लिए वो हमें मद्रास ले गये थे। 'दो बदन', 'नूरजहाँ' और कुछ और फ़िल्मों की शूटिंग् पर सब गये थे। वो सब यादें अब भी हमारे मन में ताज़े हैं जो बहुत याद आते हैं।

सुजॊय - अब मैं आप से जानना चाहूँगा कि शक़ील साहब के लिखे कौन कौन से गीत आपको व्यक्तिगत तौर पे सब से ज़्यादा पसंद हैं?

जावेद बदायूनी - उनके लिखे सभी गीत अपने आप में मास्टरपीस हैं, चाहे किसी भी संगीतकार के लिये लिखे गये हों।

सुजॊय - निसंदेह!

जावेद बदायूनी - यह बताना नामुमकिन है कि कौन सा गीत सर्वोत्तम है। मैं कुछ फ़िल्मों के नाम ज़रूर ले सकता हूँ, जैसे कि 'मदर इण्डिया', 'गंगा जमुना', 'बैजु बावरा', 'चौदहवीं का चांद', 'साहब बीवी और ग़ुलाम', और 'मुग़ल-ए-आज़म'।

सुजॊय - वाह! आप ने 'मुग़ल-ए-आज़म' का ज़िक्र किया, और आज हम आप से शक़ील साहब के बारे में बातचीत करते हुए उनके लिखे कुछ होली गीत सुन रहे हैं, तो मुझे एकदम से याद आया कि इस फ़िल्म में भी एक ऐसा गीत है जिसे हम पूर्णत: होली गीत तो नहीं कह सकते, लेकिन क्योंकि उसमें राधा और कृष्ण के छेड़-छाड़ का वर्णन है, इसलिए इसे यहाँ पर बजाया जा सकता है।

जावेद बदायूनी - "मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे"।

सुजॊय - जी हाँ, आइए इस गीत को सुनते हैं, संगीत एक बार फिर नौशाद साहब का।

गीत - मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे (मुग़ल-ए-आज़म)


सुजॊय - अच्छा जावेद साहब, आप से अगला सवाल पूछने से पहले हम अपने श्रोता-पाठकों के लिए एक सवाल पूछना चाहेंगे। अभी जो हमनें गीत सुना "मोहे पनघट पे", इसी गीत का एक अन्य संस्करण भी हमारे हाथ लगा है। इस वर्ज़न को हम यहाँ पर सुनवा रहे हैं और हमारे श्रोताओं को हमें लिख भेजना है कि यह किनकी आवाज़ में है।

गीत - मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे - अन्य संस्करण (मुग़ल-ए-आज़म)


सुजॊय - जावेद साहब, हम शक़ील साहब के लिखे गीतों को हर रोज़ ही कहीं न कहीं से सुनते हैं, लेकिन उनके लिखे ग़ैर-फ़िल्मी नज़्मों और ग़ज़लों को कम ही सुना जाता है। इसलिए मैं आप से उनकी लिखी अदबी शायरी और प्रकाशनों के बारे में जानना चाहूँगा।

जावेद बदायूनी - मैं आपको बताऊँ कि भले ही वो फ़िल्मी गीतकार के रूप में ज़्यादा जाने जाते हैं, लेकिन हक़ीक़त में पहले वो एक लिटररी फ़िगर थे और बाद में फ़िल्मी गीतकार। फ़िल्मों में गीत लेखन वो अपने परिवार को चलाने के लिये किया करते थे। जहाँ तक ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं का सवाल है, उन्होंने ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लों के पाँच दीवान लिखे हैं, जिनका अब 'कुल्यात-ए-शक़ील' के नाम से संकलन प्रकाशित हुआ है। उन्होंने अपने जीवन काल में ५०० से ज़्यादा ग़ज़लें और नज़्में लिखे होंगे जिन्हें आज भारत, पाक़िस्तान और दुनिया भर के देशों के गायक गाते हैं।

सुजॊय - आपनें आंकड़ा बताया तो मुझे याद आया कि हमनें आप से शक़ील साहब के लिखे फ़िल्मी गीतों की संख्या नहीं पूछी। कोई अंदाज़ा आपको कि शक़ील साहब ने कुल कितने फ़िल्मी गीत लिखे होंगे?

जावेद बदायूनी - उन्होंने १०८ फ़िल्मों में लगभग ८०० गीत लिखे हैं, और इनमें ५ फ़िल्में अनरिलीज़्ड भी हैं।

सुजॊय - वाह! जावेद साहब, यहाँ पर हम शक़ील साहब का लिखा एक और बेहतरीन होली गीत सुनना और सुनवाना चाहेंगे। नौशाद साहब के अलावा जिन संगीतकारों के साथ उन्होंने काम किया, उनमें एक महत्वपूर्ण नाम है रवि साहब का। अभी कुछ देर पहले आपने 'दो बदन' और 'चौदहवीं का चाँद' फ़िल्मों का नाम लिया जिनमें रवि का संगीत था। तो रवि साहब के ही संगीत में शक़ील साहब नें फ़िल्म 'फूल और पत्थर' के भी गीत लिखे जिनमें एक होली गीत था "लायी है हज़ारों रंग होली, कोई तन के लिये, कोई मन के लिये"। सुनते हैं इस गीत को।

गीत - लायी है हज़ारों रंग होली (फूल और पत्थर)


सुजॊय - दोस्तों, आपने ग़ौर किया कि इस गीत में और 'कोहिनूर' के होली गीत में, दोनों में ही "तन" और "मन" शब्दों का शक़ील साहब ने इस्तमाल किया है। अच्छा जावेद साहब, अब एक आख़िरी सवाल आप से। शक़ील साहब नें जो मशाल जलाई है, क्या उस मशाल को आप या कोई और रिश्तेदार उसे आगे बढ़ाने में इच्छुक हैं?

जावेद बदायूनी - मेरी बड़ी बहन रज़ीज़ शक़ील को शक़ील साहब के गुण मिले हैं और वो बहुत ख़ूबसूरत शायरी लिखती हैं।

सुजॊय - आप किस क्षेत्र में कार्यरत है?

जावेद बदायूनी - मैं ३२ साल से SOTC Tour Operators के साथ था, और अब HDFC Standard Life में हूँ, मुंबई में स्थित हूँ।

सुजॊय - बहुत बहुत शुक्रिया जावेद साहब। होली के इस रंगीन पर्व को आप ने शक़ील साहब की यादों से और भी रंगीन किया, और साथ ही उनके लिखे होली गीतों को सुन कर मन ख़ुश हो गया। भविष्य में हम आप से शक़ील साहब की शख्सियत के कुछ अनछुये पहलुयों पर चर्चा करना चाहेंगे। आपको एक बार फिर होली की हार्दिक शुभकामना देते हुए अब विदा लेते हैं, नमस्कार!

जावेद बदायूनी - बहुत बहुत शुक्रिया आपका!

तो दोस्तों, होली पर ये थी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ख़ास प्रस्तुति जिसमें हमनें शक़ील बदायूनी के लिखे होली गीत सुनने के साथ साथ थोड़ी बहुत बातचीत की उन्हीं के बेटे जावेद बदायूनी से। आशा है आपको यह प्रस्तुति अच्छी लगी होगी। ज़रूर लिख भेजिएगा अपने विचार oig@hindyugm.com के पते पर। अब आज के लिए हमें इजाज़त दीजिए, 'आवाज़' पर 'सुर-संगम' लेकर सुमित हाज़िर होंगे कल सुबह ९ बजे, पधारिएगा ज़रूर। आप सभी को एक बार फिर होली की हार्दिक शुभकामनाएँ, नमस्कार!

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