रविवार, 22 नवंबर 2009

रविवार सुबह की कॉफ़ी और कुछ दुर्लभ गीत (२२)

कुछ फ़िल्में अपने गीत-संगीत के लिए हमेशा याद की जाती है. कुछ फ़िल्में अपनी कहानी को ही बेहद काव्यात्मक रूप से पेश करती है, जैसे उस फिल्म से गुजरना एक अनुभव हो किसी कविता से गुजरने जैसा. कैफ़ी साहब (कैफ़ी आज़मी) और फिल्म "नसीम" में उनकी अदाकारी को भला कौन भूल सकता है, ७० के दशक की एक फिल्म याद आती है -"हँसते ज़ख्म", जिसमें एक अनूठी कहानी को बेहद शायराना /काव्यात्मक अंदाज़ में निर्देशक ने पेश किया था. इत्तेफक्कन यहाँ भी फिल्म के गीतकार कैफ़ी आज़मी थे. ये तो हम नहीं जानते कि फिल्म कामियाब हुई थी या नहीं पर फिल्म अभिनेत्री प्रिया राजवंश की संवाद अदायगी, नवीन निश्चल के बागी तेवर और बलराज सहानी के सशक्त अभिनय के लिए आज भी याद की जाती है, पर फिल्म का एक पक्ष ऐसा था जिसके बारे में निसंदेह कहा जा सकता है कि ये उस दौर में भी सफल था और आज तो इसे एक क्लासिक का दर्जा हासिल हो चुका है, जी हाँ हम बात कर रहे हैं मदन मोहन, कैफ़ी साहब, मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर के रचे उस सुरीले संसार की जिसका एक एक मोती सहेज कर रखने लायक है. चलिए इस रविवार इसी फिल्म के संगीत पर एक चर्चा हो जाए.

"तुम जो मिल गए हो, तो लगता है कि जहाँ मिल गया...." कैफ़ी साहब के इन बोलों पर रचा मदन मोहन साहब का संगीत उनके बेहतरीन कामों में से एक है.ये गीत फिल्म की कहानी में एक ख़ास मुकाम पर आता है, जाहिर है इसे भी कुछ ख़ास होना ही था. गीत बहुत ही नाज़ुक अंदाज़ से शुरू होता है, जहाँ पार्श्व वाध्य लगभग न के बराबर हैं, शुरूआती बोल सुनते ही रात की रूमानियत और सब कुछ पा लेने की ख़ुशी को अभिव्यक्त करते प्रेमी की तस्वीर सामने आ जाती है....हल्की हल्की बारिश की ध्वनियाँ और बिजली के कड़कने की आवाज़ मौहोल को और रंगीन बना देती है...जैसे जैसे अंतरे की तरफ हम बढ़ते हैं..."बैठो न दूर हमसे देखो खफा न हो....." श्रोता और भी गीत में डूब जाता है....और खुद को उस प्रेमी के रूप में पाता है, जो शुरुआत में उसकी कल्पना में था....जैसे ही ये रूमानियत और गहरी होने लगती है, मदन मोहन का संगीत संयोजन जैसे करवट बदलता है, जैसे उस पाए हुए जन्नत के परे कहीं ऐसे आसमान में जाकर बस जाना चाहता हो जहाँ से कभी लौटना न हो...फिर एक बार निशब्दता छा जाती है और लता की आवाज़ में भी वही शब्द आते हैं जो नायक के स्वरों में थे अब तक....बस फिर क्या...."एक नयी ज़िन्दगी का निशाँ मिल गया..." वाकई ये एक लाजवाब और अपने आप में एकलौता गीत है, जहाँ वाध्यों के हर बदलते पैंतरों पर श्रोता खुद को एक नयी मंजिल पर पाता है, रफ़ी साहब के क्या कहने.....उनकी अदायगी और गायिकी ने एक गीत श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम बना देती है, और ये गीत भी इस बात का अपवाद नहीं नहीं है

tum jo mil gaye ho....(hanste zakhm)



लता जी के बारे में यूं तो आवाज़ के सैकड़ों पोस्टों में बहुत कुछ लिखा/कहा जा चुका है, "हँसते ज़ख्म" में उनको दो सोलो हैं, और दोनों ही बेमिसाल हैं, "बेताब दिल की तम्मना यही है" में नायिका अपने समर्पण में प्रेमी की दी हुई तमाम खुशियों को प्यार भरी कृतज्ञता से बयां कर रही है, गीत का पहला ही शब्द "बेताब" जिस अंदाज़ में बोला जाता है, रोंगटे खड़े हो जाते हैं. "सारा गुलशन दे डाला, कलियाँ और खिलाओ न, हँसते हँसते रो दे हम, इतना भी तो हंसाओ न..." वाह कैफ़ी साहब, प्रेम के इतने रंगों को कैसे समेट लिया आपने एक गीत में, और लता जी की आवाज़ ने कितनी सरलता से, अंधेरों के बीच जगमगाते इन जुगनूओं जैसी खुशियों को स्वर दे दिए....यहाँ दुआ भी है, सब कुछ प्यार पे लुटा देने का समर्पण भी है, खुशियों को अंचल में न समेट पाने का आनंद भी और एक अनचाहा सा डर भी.....भावनाओं का समुन्दर है ये गीत.

दूसरा गीत जो मदन साहब ने लता से गवाया इस फिल्म में वो एक ग़ज़ल है, ग़ज़ल किंग से जाने जानेवाले मदन साहब ग़ज़लों को जिस खूबी से पेश करते थे उस का आज तक कोई सानी नहीं है...दर्द की कसक में डूबी इस ग़ज़ल को सुन कर ऑंखें बरबस भी भर आती है...ख़ास कर अंतिम शेर...."दिल की नाज़ुक रगें टूटती है....याद इतना भी कोई न आये..." सुनकर लगता है कि शायद खुद लता जी भी अब चाहें तो इसे दुबारा ऐसा नहीं गा पाएंगीं...इंटरलियूड में भारतीय और पाश्चात्य वाध्यों का अद्भुत मिश्रण नायिका के मन की हालत को बेहद सशक्त रूप में उभार कर सामने रख देती है....तो सुनिए ये दो गीत एक के बाद एक .

betaab dil kii tammanna yahi hai (hanste zakhm)



aaj socha to aansun bhar aaye (hanste zakhm)



मदन मोहन और कैफ़ी साहब ने इस फिल्म में एक कव्वाली भी रची है. कव्वाली के जो भी पेचो-ख़म संभव हो उसको बखूबी इसमें समेटा गया है, रफ़ी साहब के साथ बलबीर सिंह नामक एक गायक ने मिल कर गाया है इसे, बलबीर सिंह के बारे में अधिक जानकारी हमारे पास उपलब्ध नहीं है, पर उनका अंदाज़ कुछ कुछ मन्ना डे साहब से मिलता जुलता है. पंजाबी के एक लोक गायक बलबीर सिंह ने "जागते रहो" में भी रफ़ी साहब के साथ एक युगल गीत गाया था....बहरहाल....सुनिए ये कमाल की कव्वाली...और सलाम करें, मदन साहब, कैफ़ी साहब, रफ़ी साहब और लता जी के हुनर को जिसकी बदौलत हमें मिले ऐसे ऐसे दिलनशीं गीत....."ये माना मेरी जान मोहब्बत सजा है..मज़ा इसमें इतना मगर किसलिए है...." दोस्तों क्या ये वही सवाल नहीं जो आप कई कई बार खुद से पूछ चुके हैं....:)

ye maana meri jaan (hanste zakhm)



प्रस्तुति-सजीव सारथी


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

शनिवार, 21 नवंबर 2009

तेरी है ज़मीन तेरा आसमां...तू बड़ा मेहरबान....कहते हैं बच्चों की दुआएं खुदा अवश्य सुनता है...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 269

बी. आर. चोपड़ा कैम्प के गीत संगीत के मुख्य रूप से कर्णधार हुआ करते थे साहिर लुधियानवी और रवि। लेकिन १९८० में इस कैम्प की एक फ़िल्म आई जिसमें गानें तो लिखे साहिर साहब ने, लेकिन संगीत के लिए चुना गया राहुल देव बर्मन को। शायद एक बहुत ही अलग सबजेक्ट की फ़िल्म और फ़िल्म में नई पीढ़ियों के किरदारों की भरमार होने की वजह से बी. आर. चोपड़ा (निर्माता) और रवि चोपड़ा (निर्देशक) ने यह निर्णय लिया होगा। जिस फ़िल्म की हम बात कर रहे हैं वह है 'दि बर्निंग् ट्रेन'। जब यह फ़िल्म बनी थी तो लोगों में बहुत ज़्यादा कौतुहल था क्योंकि फ़िल्म का शीर्षक ही बता रहा था कि फ़िल्म की कहानी बहुत अलग होगी, और थी भी। एक बहुत बड़ी स्टार कास्ट नज़र आई इस फ़िल्म में। धर्मेन्द्र, हेमा मालिनी, जीतेन्द्र, नीतू सिंह, परवीन बाबी, विनोद खन्ना और विनोद मेहरा जैसे स्टार्स तो थे ही, साथ में बहुत से बड़े बड़े चरित्र अभिनेता भी इस फ़िल्म के तमाम किरदारों में नज़र आए। फ़िल्म की कहानी बताने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि यह एक ऐसी फ़िल्म है जिसे लगभग सभी ने देखी है और अब भी अक्सर टी.वी. पर दिखाई जाती है। इस फ़िल्म में बच्चों का एक बहुत ही ख़ूबसूरत 'प्रेयर सॊंग्' है जो बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हुआ था। उस जलते हुए ट्रेन में स्कूल टीचर बनी सिम्मी गरेवाल भी थीं जो स्कूली बच्चों की पूरे टीम को लेकर सफ़र कर रहीं थीं। ट्रेन में आग लग जाने और ब्रेक फ़ेल हो जाने के बाद जब दूसरे लोग ट्रेन को किसी भी तरीके से रुकवाने की कोशिश में जुटे हैं, वहीं उन बच्चों के साथ उनकी टीचर ईश्वर की प्रार्थना में जुटी हैं और तभी फ़िल्म में आता है यह गीत "तेरी है ज़मीं तेरा आसमाँ तू बड़ा मेहरबान तू बख़शीष कर, सभी का है तू सभी तेरे ख़ुदा मेरे तू बख़शीष कर"। आज सुनिए इसी प्रार्थना को।

इस गीत को गाया था सुषमा श्रेष्ठ, पद्मिनी कोल्हापुरी और साथियों ने। बाल गायिकाओं में सुषमा और पद्मिनी बहुत सक्रीय रहीं हैं। एक ज़माना था जब सुषमा श्रेष्ठ ने बहुत सारे बच्चों वाले गीत गाए थे। किशोर कुमार के साथ 'आ गले लग जा' फ़िल्म में "तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई", लता जी के साथ 'ज़ख़्मी' फ़िल्म में "आओ तुम्हे चाँद पे ले जाएँ", और रफ़ी साहब के साथ 'हम किसी से कम नहीं' फ़िल्म में "क्या हुआ तेरा वादा" और 'अंदाज़' में "है ना बोलो बोलो" जैसे हिट गानें सुषमा ने जब गाए तब उनकी उम्र बहुत कम थी। यह तो आप जानते ही हैं कि आगे चलकर पूर्णिमा के नाम से वो प्लेबैक सिंगर बनीं ताकि बाल-गायिका का टैग हट जाए। लेकिन फिर भी चंद गीतों को छोड़कर उन्हे बहुत ज़्यादा कामयाबी हासिल नहीं हुई। और दूसरी गायिका पद्मिनी कोल्हापुरी, जो आगे चलकर एक हीरोइन बनीं, इन्होने भी कई बच्चों वाले गीत गाए थे। एक तो इसी शृंखला में आप सुन चुके हैं। याद है ना "मास्टर जी की आ गई चिट्ठी"? लता जी के साथ फ़िल्म 'यादों की बारात' में पद्मिनी और उनकी बहन शिवांगी ने ही तो आवाज़ मिलाई थी "यादों की बारात निकली है आज दिल के द्वारे" गीत में, जिसमें पर्दे पर एक बच्चा आमिर ख़ान भी था। ख़ैर, देखिए ना हम कहाँ से किस बात पर आ गए! ज़िक्र हो रहा है "तेरी है ज़मीं" गीत का। एक क्रीश्चन मिशनरी स्कूल के बच्चे जिस तरह का भक्ति गीत गाएँगे, बिल्कुल वैसा ही मिज़ाज बरकरार रखा है साहिर साहब ने। दोस्तों, मै बचपन से रेडियो सुनता आया हूँ, तो शायद ही कोई ऐसा साल रहा होगा जिस बार २५ दिसंबर के दिन इस गीत को क्रिस्मस के विशेष कार्यक्रम में ना बजाया गया हो! पंचम ने जिस तरह का मीटर इस गीत में रखा है, सुन कर बिल्कुल ऐसा लगता है कि जैसे हम कोई 'क्रिस्मस कैरल' सुन रहें हों। तो दोस्तों, आइए आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर हम ईश्वर की आराधना में लीन हो जाते हैं और सुनते हैं इस पाक़ और मासूम गीत को!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस फिल्म में जिस नन्हें बालक ने प्रमुख भूमिका की थी, वह आगे चलकर एक एक्टर/निर्दशक बना.
२. एक चर्चित अभिनेत्री ने भी इसी फिल्म से बतौर बाल कलाकार शुरुआत की.
३. पार्श्व गायन करने वाली एक नन्ही गायिका ने भी आगे चलकर सेलिना जेठ्ली के लिए पार्श्वगायन किया.

पिछली पहेली का परिणाम -

रोहित जी, आपका जवाब हमने बाद में देखा पर आपके २ अंक सुरक्षित हैं और कल के जवाब को मिला कर आपका स्कोर हुआ ४१. बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

तोते की कहानी- रबिन्द्र नाथ टैगोर

सुनो कहानी: रबीन्द्र नाथ ठाकुर की "तोते की कहानी"
'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में हिंदी साहित्यकार गजानन माधव मुक्तिबोध की हृदयस्पर्शी कहानी "पक्षी और दीमक" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं रबीन्द्र नाथ ठाकुर की एक कहानी "तोते की कहानी", जिसको स्वर दिया है शरद तैलंग ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 8 मिनट 20 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।




पक्षी समझते हैं कि मछलियों को पानी से ऊपर उठाकर वे उनपर उपकार करते हैं।
~ रबीन्द्र नाथ ठाकुर (1861-1941)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

सुनार बुलाया गया। वह सोने का पिंजरा तैयार करने में जुट गया।
(रबीन्द्र नाथ ठाकुर की "तोते की कहानी" से एक अंश)


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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
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#Fourty Seventh Story, Tote Ki Kahani: Rabindra Nath Tagore/Hindi Audio Book/2009/41. Voice: Sharad Tailang

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