शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

ये खेल होगा नहीं दुबारा...बड़ी हीं मासूमियत से समझा रहे हैं "निदा" और "जगजीत सिंह"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५०

हफ़िल-ए-गज़ल की जब हमने शुरूआत की थी, तब हमने सोचा भी नहीं था कि गज़लों का यह सफ़र ५०वीं कड़ी तक पहुँचेगा। लेकिन देखिए, देखते हीं देखते वह मुकाम भी हमने हासिल कर लिया। यह आप सबके प्यार और हौसला-आफ़ज़ाई के कारण हीं मुमकिन हो पाया है, नहीं तो हर बार कुछ नया लाना इतना आसान नहीं होता। उम्मीद है कि हम आपकी उम्मीदों पर खड़े उतर रहे हैं। हर बार आपके लिए कुछ नया लाने में हमारा भी बड़ा फ़ायदा है। न जाने ऐसे कितने नगीने हैं जो मिट्टी-तले दबे रहते हैं और उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए हम हर बार आपके सामने आते रहते हैं। आपने जिस तरह हमारा आज तक साथ दिया है, बस यही इल्तज़ा है कि आगे भी साथ बने रहिएगा। इसी दुआ के साथ पिछली कड़ी के अंकों का खुलासा करते हैं। तो हिसाब कुछ यूँ बनता है: सीमा जी: ४ अंक, शामिख जी: २ अंक और शरद जी: १ अंक। अब बारी है आज के प्रश्नों की| ये रहे प्रतियोगिता के नियम और उसके आगे दो प्रश्न: हम आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब आज के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। इन सवालों का सबसे पहले सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद २ अंक और उसके बाद हर किसी को १ अंक मिलेंगे। पिछली नौ कड़ियों और आज की कड़ी को मिलाकर जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की ५ गज़लों की फरमाईश कर सकता है, वहीं दूसरे स्थान पर आने वाला पाठक अपनी पसंद की ३ गज़लों को सुनने का हक़दार होगा। इस तरह चुनी गई आठ गज़लों को हम ५३वीं से ६०वीं कड़ी के बीच पेश करेंगे। और साथ हीं एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) गानों में सरगम तकनीक का इस्तेमाल करने वाले एक फ़नकार जिसे टाईम मैगजीन ने २००६ में "एशियन हीरोज़" की फ़ेहरिश्त में शुमार किया था। उस फ़नकार के नाम के साथ यह भी बताएँ कि हमने उनकी जो गज़ल सुनाई थी उसे वास्तव में किस रिकार्ड लेबल के लिए रिकार्ड किया गया था?
२) उस फ़नकारा का नाम बताएँ जो हिंदी के प्रख्यात समीक्षक की पौत्री और एक क्रिकेट कमेंटेटर की पुत्री हैं और जिनका संगीत की सभी विधिओं पर एकसमान अधिकार है। साथ हीं यह भी बताएँ कि हमने उस कड़ी में जिस समारोह की बातें की थी उस समारोह की शुरूआत का श्रेय किसे दिया जाता है?

महफ़िल-ए-गज़ल की स्वर्ण जयंती पर पेश है यह बोनस प्रश्न जिसका उत्तर देकर आप एक बार में ५ अंकों की बढोतरी ले सकते हैं। ध्यान रखिएगा कि जो भी इस प्रश्न का सबसे पहले सही उत्तर देगा बस उसी को ये अंक मिलेंगे यानि कि अंक बंटेंगे नहीं।

३) ४०-५० के दशक की जानीमानी संगीतकार-जोड़ी जिनके बड़े भाई की संगीतबद्ध एक गज़ल हमने आपको सुनवाई थी। उस कड़ी में हमने उस फ़नकार की भी बातें की थी जो महज़ १४ साल की उम्र में ५ जून १९४२ को सुपूर्द-ए-खाक हो गया। उन सबका नाम बताएँ जिनका ज़िक्र इस प्रश्न में आया है।


तुम्हारी कब्र पर मैं
फ़ातेहा पढ़ने नही आया,

मुझे मालूम था, तुम मर नही सकते
तुम्हारी मौत की सच्ची खबर
जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था,
वो तुम कब थे?
कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा मे गिर के टूटा था।

मेरी आँखे
तुम्हारी मंज़रो मे कैद है अब तक
मैं जो भी देखता हूँ, सोचता हूँ
वो, वही है
जो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी।

कहीं कुछ भी नहीं बदला,
तुम्हारे हाथ मेरी उंगलियों में सांस लेते हैं,
मैं लिखने के लिये जब भी कागज कलम उठाता हूं,
तुम्हे बैठा हुआ मैं अपनी कुर्सी में पाता हूं|

बदन में मेरे जितना भी लहू है,
वो तुम्हारी लगजिशों नाकामियों के साथ बहता है,
मेरी आवाज में छुपकर तुम्हारा जेहन रहता है,
मेरी बीमारियों में तुम मेरी लाचारियों में तुम|

तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है,
वो झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है,
तुम्हारी कब्र में मैं दफन तुम मुझमें जिन्दा हो,
कभी फुरसत मिले तो फातहा पढनें चले आना|

आज हम जिस शायर की नज़्म सुनने और सुनाने जा रहे हैं, ये पंक्तियाँ उन्होंने हीं लिखी थी और वो भी अपने अब्बा की मौत पर। किसी कारणवश वे अपने अब्बा की मैय्यत में शरीक़ नहीं हो पाए थे। अब्बा उनके दिल के कितने करीब थे, यह तो नहीं पता, लेकिन इतना पता है कि जो किसी अपने की मौत में अपनी मौत को देख लेता है, उससे फिर कोई भी भावना अछूती नहीं रह जाती। वह शायर वह सबकुछ लिख सकता है, जिसे लिखने में बाकी लोग कतराते हैं। वही शायर जब बच्चों की मार्फ़त यह कहता है तो बवाल खड़े हो जाते हैं:

बच्चा बोला देख के मस्जिद आलीशान
मालिक तेरे एक को इतना बड़ा मकान।

वह शायर,जिसे लोग "निदा फ़ाज़ली" कहते हैं और जिसका असल नाम "मुक़तदा हसन" है, हिन्दुस्तानियों के लिए "बर्तोल्त ब्रेख्त" हो जाता है। जानकारी के लिए बता दें कि ब्रेख्त हिटलर के समकालीन थे। हिटलर ने जब बहुत से तत्कालीन लेखकों की किताबों को अपने खिलाफ पाकर बैन किया तो पता नहीं कैसे ब्रेख्त की किताब छूट गई। ब्रेख्त ने हिटलर को खत लिखा और कहा कि मैं भी आपके बहुत खिलाफ हूँ, मेरी भी किताबें आप बैन कीजिए, वरना इतिहास यही समझेगा कि मैं या तो आपके पक्ष में था या इतना महत्वपूर्ण नहीं था कि आप मेरी किताबें बैन करें। अपने विचारों, अपनी नज्मों के कारण निदा ने भी बहुत दिन तक बाल ठाकरे का अघोषित प्रतिबंध झेला है। ब्रेख्त की तरह निदा भी अपने मन के शायर हैं, गजलें उन्होंने कही जरूर हैं, पर जिन विषयों पर वो शायरी करते हैं, वो विषय गजल का नहीं है। (सौजन्य: वेबदुनिया) निदा साहब से जब यह पूछा गया कि उनकी शायरी की शुरूआत कैसे हुई तो उनका जवाब कुछ यूँ था: मेरे वालिद अपने ज़माने के अच्छे शायर थे। नाम था 'दुआ डबाइवी'। उनके अशआर मुझे ज़ुबानी याद थे। यही अशआर सुना-सुनाकर मैं क़ॉलेज में अपने दोस्तों से चाय पिया करता था। कभी-कभी तो नाश्ते का इंतिज़ाम भी हो जाया करता था। उनके अशआर सुनाते-सुनाते ख़ुद भी शे'र कहने लगा।

निदा साहब यूँ तो क्रांतिकारी विचारों के शायर थे और हैं भी लेकिन आज हम उनसे वह किस्सा सुनना चाहेंगे जिसके कारण उनका फिल्मों में आना हुआ। आप सब सुजाय जी को तो ज़रूर हीं जानते होंगे(आवाज़ पर प्रसारित होने वाले "ओल्ड इज गोल्ड" के मेजबान)। उन्हीं की बदौलत हमें रेडियो पर आने वाले "आज के मेहमान" कार्यक्रम की वह रिकार्डिंग हासिल हुई है, जिसमें निदा साहब मौजूद थे। उस मज़ेदार घटना को याद करते हुए वे कहते हैं: जब मैं मुंबई आया तो मैने धर्मवीर भारती के "धर्मयुग" में लिखना शुरू कर दिया, उसके बाद मै "ब्लिट्ज़" में लिखने लगा। उसी दौरान कभी "धर्मयुग" में तो कभी "ब्लिट्ज़" में तो कभी किसी रेडियो स्टेशन में मुझे मैसेज़ मिलने लगे कि "मैं आप से मिलना चाहता हूँ- कमाल अमरोही"। मैंने सोचा कि मेरा कमाल अमरोही से क्या काम हो सकता है। मैं कमाल अमरोही से मिलने चला गया। कमाल साहब मिले करीब २ बजे, वो स्टाईलिश आदमी थे, वो एक लफ़्ज़ भी अंग्रेजी का बोलते नहीं थे और वो भाषा बोलते थे जो आज से ५० साल पहले अमरोहा में बोली जाती थी। मैं वो भाषा बंबई आकर भूल गया था। मैंने कहा "कमाल साहब, आदाब अर्ज़ है, मेरा नाम निदा फ़ाज़ली है"। तो वो बोले- "तशरीफ़ रखिए, मैंने आपको इसलिए याद फ़रमाया है"- ये उनका स्टाईल था, "मैंने आपको इसलिए याद फ़रमाया है कि मुझे एक मुक़म्मल शायर की ज़रूरत है", मैंने कहा कि मैं हाज़िर हूँ और इस इज़्ज़त आफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया कि आप मुझे मुक़म्मल शायर समझ रहे हैं। बोले- "जी, मुझे आपसे कुछ नगमात तहरीर करवाने हैं"। मैने कहा कि मैं हाज़िर हूँ साहब, आप बताईये कि कैसा गाना है, क्या लिखना है, तो वो बोले कि "इससे पहले कि आप गाना लिखें, एक बात मैं ज़ाहिर कर देना चाहता हूँ कि इल्मी शायरी और फिल्मी शायर अलग होती है। इल्मी शायरी लिखने के लिए आपको मेरे मिज़ाज़ की शिनाख्त बहुत ज़रूरी है, जाँ निसार अख्तर मेरे मिज़ाज को पहचान गए थे, लेकिन वो अल्लाह को प्यार हो गए। इतना कहने के बाद उन्होंने सिचुएशन सुनाई- "हमारी दास्तान उस मुकाम पर आ गई जहाँ मल्लिका-ए-आलिया रज़िया सुल्तान, यानि हमारी हेमा मालिनी, सियाहा लिबास में खरामा-खरामा चली आ रही है, जिसे देखकर हमारा आलया कासी खैरमक़दम के लिए आगे बढता है।" मेरे कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा, मैं कुछ देर बैठा रहा, फिर उनके असिस्टेंट ने कहा कि इसका मतलब है कि हेमा मालिनी सफ़ेद घोड़े पर काले लिबास पहने आ रही हैं और आलया कासी मतलब कैमरा उनकी तरफ़ बढ रहा है। इसके बाद मैंने उस फिल्म के आखिरी दो गाने लिखे। लेकिन उस फिल्म के बनने में इतना वक्त लगा कि कमाल साहब के गुडविल ने फिल्म-इंडस्ट्री में मुझे मशहूर कर दिया कि कोई ऐसा है जिससे कमाल अमरोही गाने लिखवा रहे हैं।

निदा साहब के बारे में और भी बहुत कुछ है कहने को, लेकिन आज बस इतना हीं। वैसे हीं स्वर्ण जयंती के कारण आज हमारी मुलाकात का दौर कुछ ज्यादा हीं चला। इसलिए वक्त है अब आज की नज़्म सुनवाने का। यह नज़्म मेरी पसंदीदा नज़्मों में से एक है। जहाँ एक तरह निदा साहब के मासूम अल्फ़ाज़ हैं तो वही दूसरी तरह जगजीत सिंह जी की मखमली आवाज़। आप खुद देखिए:

ये ज़िन्दगी,
आज जो तुम्हारे
बदन की छोटी-बड़ी नसों में
मचल रही है
तुम्हारे पैरों से चल रही है
तुम्हारी आवाज़ में ग़ले से निकल रही है
तुम्हारे लफ़्ज़ों में ढल रही है।

ये ज़िन्दगी
जाने कितनी सदियों से
यूँ ही शक्लें
बदल रही है।

बदलती शक्लों
बदलते जिस्मों में
चलता-फिरता ये इक शरारा
जो इस घड़ी
नाम है तुम्हारा
इसी से सारी चहल-पहल है
इसी से रोशन है हर नज़ारा।

सितारे तोड़ो या घर बसाओ
क़लम उठाओ या सर झुकाओ,
तुम्हारी आँखों की रोशनी तक
है खेल सारा,
ये खेल होगा नहीं दुबारा।

ये खेल होगा नहीं दुबारा॥




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

इतना ___ न हो ख़िलवतेग़म से अपनी
तू कभी खुद को भी देखेगा तो ड़र जायेगा


आपके विकल्प हैं -
a) मायूस, b) मानूस, c) हैरान, d) बेज़ार

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "ख़ुदकुशी" और शेर कुछ यूं था -

ख़ुदकुशी करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन यूँ ही औरों को सताया जाये

एक बार फिर से महफ़िल में पहली हाज़िरी लगी सीमा जी की। कमाल देखिए कि पिछली महफ़िल का शेर निदा फ़ाज़ली साहब का था और आज की महफ़िल हमने पूरी की पूरी उन्हीं के सुपूर्द कर दी। निदा साहब का यह शेर जिस गज़ल से है, उसमें एक ऐसा शेर भी है जो बच्चे-बच्चे की जुबान पर मौजूद रहता है और हो भी क्यों न, जबकि उसमें बच्चे का हीं ज़िक्र किया गया है। इस शेर को सुनकर और पढकर "तमन्ना" फिल्म का वह गाना याद आ जाता है जिसकी शुरूआत इसी शेर के साथ होती है। आप भी देखिए:

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये।

पूरी गज़ल मुहैय्या कराने के लिए सीमा जी का शुक्रिया। "ख़ुदकुशी" शब्द पर आपने कुछ शेर भी कहे:

मेरी गुड़िया-सी बहन को ख़ुदकुशी करनी पड़ी
क्या ख़बर थी दोस्त मेरा इस क़दर गिर जाएगा। (मुनव्वर राना)

ग़म-ए-हयात से बेशक़ है ख़ुदकुशी आसाँ
मगर जो मौत भी शर्मा गई तो क्या होगा। (अहसान बिन 'दानिश')

मेरा मकान शायद है ज़लज़लों का दफ़्तर
दीवारें मुतमइन हैं हर वक़्त ख़ुदकुशी को। (ज्ञान प्रकाश विवेक)

मंजु जी, आपकी बात सही है,लेकिन मुझे "चिन्नी" का अर्थ समझ नहीं आ रहा था,इसलिए मुझे अपना दिमाग लगाना पड़ा। आईंदा ऐसा नहीं होगा....ये खेल होगा नहीं दुबारा :) । ये रहा आपका आज का शेर:

ए मेरे रुस्तम! कैसे बयाँ करूं हाल दिल
खुदकुशी करने को जी चाहता है।

शामिख जी ने कई शेरों के बीच गुलज़ार साहब की एक त्रिवेणी भी पेश की। बानगी देखिए:

कैसे लोग हैं क्या खूब मुन्सुफी की है,
हमारे क़त्ल को कहते हैं खुदखुशी की है. (प्रकाश अर्श)

कितने तारो ने यहाँ टूटकर ख़ुदकाशी की है
कब से बोझ से हाँफ़ रहा था बेचारा।

चलो आसमान को कुछ मुक्ति तो मिली (गुलज़ार)

निर्मला जी, महफ़िल में आपका स्वागत है। आप अगर कोई शेर भी साथ ले आएँ तो महफ़िल में चार चाँद लग जाए।
शरद जी, कोई बात नहीं, देर आए दुरूस्त आए...पर आए तो सही :)। आपका स्वरचित शेर कमाल का है:

दर्द के साथ दोस्ती कर ली
इसलिए मैने खुदकुशी कर ली
ज़िन्दगी को सवांरने के लिए
हमने बरबाद ज़िन्दगी कर ली।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

दर्द-ए-उल्फ़त छुपाऊँ कहाँ....लता ने किया एक मासूम सवाल शंकर जयकिशन के संगीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 219

गीतकार शैलेन्द्र, संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन और गायिका लता मंगेशकर की जब एक साथ बात चलती है तो इतने सारे मशहूर, हिट और शानदार गीत एक के बाद एक ज़हन में आते जाते हैं कि जिनका कोई अंत नहीं। चाहे राज कपूर की फ़िल्मों के गानें हों या किसी और फ़िल्मकार के, इस टीम ने 'बरसात' से जो सुरीली बरसात शुरु की थी उसकी मोतियों जैसी बूँदें हमें आज तक भीगो रही है। लेकिन ऐसे बेशुमार हिट गीतों के बीच बहुत से ऐसे गीत भी समय समय पर बने हैं जो उतनी ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हुए और इन हिट गीतों की चमक धमक में इनकी मंद ज्योति कहीं गुम हो गई, खो गई, लोगों ने भुला दिया, समय ने उन पर पर्दा डाल दिया। ऐसा ही एक गीत आज के अंक में सुनिए। फ़िल्म 'औरत' का यह गीत है "दर्द-ए-उल्फ़त छुपाऊँ कहाँ, दिल की दुनिया बसाऊँ कहाँ"। बड़ा ही ख़ुशरंग और ख़ुशमिज़ाज गीत है यह जिसमें है पहले पहले प्यार की बचैनी और मीठे मीठे दर्द का ज़िक्र है। मज़ेदार बात यह है कि बिल्कुल इसी तरह का गीत शंकर जयकिशन ने अपनी पहली ही फ़िल्म 'बरसात' में लता जी से गवाया था। याद है न आपको हसरत साहब का लिखा "मुझे किसी से प्यार हो गया"? बस, बिल्कुल उसी अंदाज़ का गीत है, फ़र्क बस इतना कि इस बार शैलेन्द्र साहब है यहाँ गीतकार. एक और मज़ेदार बात यह कि इसी फ़िल्म 'औरत' में हसरत जयपुरी साहब ने भी लता जी से पहले प्यार पर आधारित एक गीत गवाया था "नैनों से नैन हुए चार आज मेरा दिल आ गया, अरमान पे छायी है बहार आज मेरा दिल आ गया"। इसी साल १९५३ में फ़िल्म 'आस' में एक बार फिर शैलेन्द्र और शंकर जयकिशन ने लता जी से गवाया "मैं हूँ तेरे सपनों की रानी तूने मुझे पहचाना ना, हरदम तेरे दिल में रही मैं फिर भी रहा तू अंजाना"। फ़िल्म 'औरत' बनी थी सन् १९५३ में 'वर्मा फ़िल्म्स' के बैनर तले। बी. वर्मा निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे बीना राय और प्रेमनाथ। लता जी के गाए कुछ गीतों का ज़िक्र हमने अभी किया, लेकिन एक और ज़रूरी बात यह भी कि फ़िल्म 'औरत' का शीर्षक गीत लता जी से नहीं बल्कि आशा जी से गवाया गया था, जिसके बोल थे "लोग औरत को फोकट जिस्म समझते हैं"। महबूब ख़ान ने 'औरत' शीर्षक से सन् १९४० में एक फ़िल्म बनाई और उसी का रीमेक बनाया 'मदर इंडिया' के नाम से जिसे हिंदी सिनेमा का एक मील का पत्थर माना जाता है।

दोस्तों, लता जी और ख़ास कर जयकिशन जी की आपस में अच्छी दोस्ती थी, और दोनों एक दूसरे से ख़ूब झगड़ते भी थे, नोक झोक चलती ही रहती थी। उन्ही दिनों को और जयकिशन जी को याद करते हुए लता जी ने अमीन सायानी साहब के उस इंटरव्यू में क्या कहा था, आइए आज के इस अंक में उसी पर नज़र डालते हैं। "जयकिशन और मैं, हम दोनो हम-उम्र थे। बस ६ महीनों का फ़र्क था हम दोनों में। 'बरसात' और 'नगिना' जैसी फ़िल्मों के बाद हम लोगों का एक बड़ा मज़ेदार ग्रूप बन गया था। हम लोग यानी शंकर साहब, शैलेन्द्र जी, हसरत साहब, मुकेश भ‍इया। हम सब एक साथ काम भी करते, घूमने भी जाते, तर्ज़ें भी डिस्कस करते, और कभी कभी बहुत झगड़े भी होते थे। बस छोटी छोटी बातों पर, ख़ास तौर पर जयकिशन के साथ। कभी मैं उनकी धुन की बुराई करती तो कभी वो मेरी आवाज़ पर कोई जुमला कर देते। और इस तरह जब ठनती तो दिनों तक ठनी रहती। मुझे याद है, मैने एक बार झुंझलाकर उससे कह दिया कि जाओ, अब मैं तुम्हारे लिए नहीं गाती, किसी और से गवा लेना, यह कह कर मैं चल दी अपने घर। घर पहुँचकर मैं भी पछताई और वो भी पछताए। लेकिन दोनों ही अड़े रहे। फिर शैलेन्द्र और शंकर भाई उन्हे पकड़कर मेरे घर ले आए। और बस फिर दोस्ती वैसी की वैसी।" तो दोस्तों, आइए सुनते हैं आज का यह गीत और एक बार फिर से शुक्रिया अदा करते हैं अजय देशपाण्डे जी का जिनके सहयोग से लता जी के गाए ये तमाम दुर्लभ नग़में हमें प्राप्त हुए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. अनिल बिस्वास के लिए गाया लता ने ये दुर्लभ गीत.
२. कैफ भोपाली के लिखे इस गीत को बूझ कर ३ अंक पाने के है आज आखिरी मौका.
३. मुखड़े में शब्द है -"कश्ती".

पिछली पहेली का परिणाम -

पूर्वी जी बधाई हो..३ अंक और आपके खाते में हैं.....आपका स्कोर है ३७, अब आप सबसे आगे हैं अंकों के मामले में ...बधाई...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

मेक ए विश...कह रहे हैं अमिताभ...इस दिवाली मांग ही डालिए कुछ अपने जिन्नी से

ताजा सुर ताल (26)

दोस्तों आज ताजा सुर ताल में मैं सजीव सारथी अकेला ही हूँ आपके स्वागत के लिए क्योंकि आपके प्रिय होस्ट सुजॉय दुर्गा पूजा की खुशियाँ अपने परिवार के साथ बांटने घर गए हुए है....खैर आज मैं जो गीत आपको सुनवाने जा रहा हूँ, वो एक "रैप" सोंग है, रैप यानी एक सधे हुए पेटर्न पर गीत की पंक्तियों को तेजी से बोलना, बरसों पहले अशोक कुमार ने फिल्म आशीर्वाद के लिए "रेलगाडी" गीत गाया था कुछ इसी अंदाज़ में, याद है न ?, पता नहीं उस ज़माने में इसे रैप ही कहते थे या कुछ और....पाश्चात्य संगीत की इस मशहूर संगीत परंपरा को हिन्दुस्तान में बाबा सहगल ने अपने "ठंडा ठंडा पानी" से लोकप्रिय बनाया..बाद में रहमान ने भी कुछ गीतों में रैप का इस्तेमाल किया....आजकल तो ये लगभग हर गीत का हिस्सा बन चूका है. आज कल लगभग हर दूसरे गीत हिप होप बनाने के लिए उसमें कुछ अंग्रेजी शब्दों का मायाजाल बुनकर उसे रैप शैली में गवा दिया जाता है. खैर हमने जो आज का गीत चुना है वो कोई मामूली रैप नहीं है..पूछिए क्यों ...

जी हाँ, ये रैप कोई इंसान नहीं बल्कि एक जिन्नी का है, "जिन्नी" ? अरे आप जिन्नी को भूल गए ? याद कीजिये बचपन में जब सुनते थे की अलादीन को जादूई चिराग मिला और उसमें से निकल एक जिन्न जो कहता है "क्या हुकम है मेरे आका"...सच बताइयेगा, क्या उस कहानी को सुनकर कभी आपने मन में नहीं आया कि काश हमें भी कोई जिन्नी मिलता... सच तो ये है कि हम सब पूरी जिंदगी असंभव से ख्वाब देखते है और सोचते हैं कि काश....और इस कोशिश कोशिश में एक दिन हम खुद ही एक जिन्नी बन जाते हैं, जो कभी अपने बच्चों की मुराद पूरी करता है कभी घर परिवार की.... हम सब में छुपा जिन्न हमारे अपनों को खुश देखने के लिए पूछता ही रहता है -."मेक ऐ विश...."

अलादीन और उसके जिन्नी की ये कहानी इस हद तक मशहूर है कि जब वाल्ट डिस्नी फिल्म्स ने जब इसका हिंदी संस्करण भारत में निकला तो बच्चों बड़ों ने इसे खूब सराहा, आपको याद होगा इस फिल्म में अलादीन की आवाज़ बने थे सोनू निगम, जिन्होंने अपनी भोली आवाज़ में संवाद बोलने के आलावा कुछ बढ़िया से गीत भी गाये थे, मगर वो एक एनीमेशन फिल्म थी, अब यही फिल्म वास्तविक कलाकारों को लेकर बनी है और जल्द ही प्रदर्शन में आने वाली है, इस दिवाली आप भी अपने बच्चों को खुश कर सकते हैं ये फिल्म दिखाकर...इस फिल्म में अलादीन बने हैं रितेश देशमुख. रितेश अलादीन के रूप में कितने जचते हैं ये तो मैं नहीं कह सकता, पर हाँ जो यहाँ जिन्न बने हैं उन पर मुझे पूरा भरोसा है कि उनका अभिनय और मात्र उनकी उपस्थिति ही काफी होगी फिल्म को दिलचस्प बनाने में. जी हाँ यहाँ आपके जिन्न हैं महा नायक अमिताभ बच्चन.

दोस्तों ये साल है २००९ और आपको बता दें की साल १९६९ में अमिताभ ने रुपहले परदे पर पहली बार अपने जलवे दिखाए थे फिल्म सात हिन्दुस्तानी में, यानी ये उनके करियर का ४० वां साल है, और आज ४० सालों के बाद भी हिंदी फिल्म जगत पर राज कर रहा है ये शहंशाह....वाह बच्चन साहब क्या कहने आपके. अक्सर उनके विशाल नायकीय व्यक्तित्व के आगे एक बात अक्सर हम भूल जाते हैं वो हैं उनकी दमदार आवाज़. "नीला आसमान सो गया..." जैसे दर्द से भरे गीत हों या, "मेरे अंगने में..." की अतिनाटकीयता या फिर "रंग बरसे" की मस्ती. अमिताभ की आवाज़ में वो जादू है कि उनके गाये मामूली से मामूली गीत को भी आप अनसुना नहीं कर सकते. ये भी एक अजीब इत्तेफाक है कि जब वो अपने चरम पर थे तब कुछ चुने हुए गीत कुछ चुने हुए संगीतकारों के लिए ही गाते थे. पर साठ पार करने के बाद तो उनके भीतर का गायक कुछ और जवान हो गया है, अब तो लगभग उनकी हर फिल्म में एक गीत अवश्य होता है उनकी अपनी आवाज़ में. इस नयी फिल्म अलादीन में गीत संगीत का जिम्मा संभाला है - विशाल शेखर और अन्विता दत्त गुप्तन ने और जाहिर है ये जिन्नी रैप है खुद अमिताभ बच्चन की दमदार आवाज़ में और उनका साथ दिया है अनुष्का मनचंदा ने.

इसी माह अमिताभ बच्चन अपना जन्मदिन भी मनाएंगे, तो हम उन्हें अभी से शुभकामनाएं दिए देते है, जन्मदिन की भी और इस फिल्म अलादीन के लिए भी, कुछ सालों पहले बच्चों के दिल में अमिताभ ने ख़ास जगह बनायीं थी फिल्म "भूतनाथ" में एक भले भूत की भूमिका निभाकर. ये फिल्म मुझे और मेरे बच्चों को बेहद पसंद है, तो जाहिर है अलादीन से भी मुझे तो अच्छी ही उम्मीदें है, स्पेशल एफ्फेक्ट्स आदि भी अनूठे ही लग रहे हैं प्रोमोस देखकर. जहाँ तक संगीत की बात है इसी तरह की फिल्मों में अधिकतर गीत परिस्थितिजन्य होते है जो सुनने में कम देखने में अधिक भाते हैं. ये रैप गीत भी कुछ उसी तरह का है. इसलिए आज हम इस गीत को २.५ की रेटिंग दे रहे हैं...बाकी आप सुनकर बतायें कि आपको कैसी लगी "एंग्री यंग (?) मैन" की कूल आवाज़ इस गीत में...



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 2.5 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

चलते चलते
चलिए अब आप ने गीत सुन ही लिया है तो एक सवाल का जवाब भी दें, शर्त ये है कि आपने ईमानदारी से मात्र दो मिनट का समय लेकर निचे दिए गए वाक्य को पूरा करना है, जो भी जेहन में आये झट से लिख डालिए...क्योंकि जिन्नी के पास बहुत अधिक समत नहीं है....कौन जाने आपकी कोई मुराद इस बार पूरी ही हो जाए....वाक्य है -

जिन्नी - क्या हुक्म है मेरे आका? कौन सी आपकी तीन ख्वाहिशें ?
आप - जिन्नी मेरी तीन ख्वाहिशें ये है ______________

शुभकामनाएँ....



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

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