रविवार, 2 अगस्त 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (११)

नोट - आज से रविवार सुबह की कॉफी में आपकी होस्ट होंगी - दीपाली तिवारी "दिशा"

रविवार सुबह की कॉफी का एक और नया अंक लेकर आज हम उपस्तिथ हुए हैं. वैसे तो मन था कि आपकी पसंद के रक्षा बंधन गीत और उनसे जुडी आपकी यादों को ही आज के अंक में संगृहीत करें पर पिछले सप्ताह हुई एक दुखद घटना ने हमें मजबूर किया कि हम शुरुआत करें उस दिवंगत अभिनेत्री की कुछ बातें आपके साथ बांटकर.

फिल्म जगत में अपने अभिनय और सौन्दर्य का जादू बिखेर एक मुकाम बनाने वाली अभिनेत्री लीला नायडू को कौन नहीं जानता. उनका फिल्मी सफर बहुत लम्बा तो नहीं था लेकिन उनके अभिनय की धार को "गागर में सागर" की तरह सराहा गया. लीला नायडू ने सन १९५४ में फेमिना मिस इंडिया का खिताब जीता था और "वोग" मैग्जीन ने उन्हें विश्व की सर्वश्रेष्ठ दस सुन्दरियों में स्थान दिया था.

लीला नायडू ने अपना फिल्मी सफर मशहूर फिल्मकार ह्रशिकेश मुखर्जी की फिल्म "अनुराधा" से शुरु किया. इस फिल्म में उन्होंने अभिनेता बलराज साहनी की पत्नि की भूमिका निभायी थी. अनुराधा फिल्म के द्वारा लीला नायडू के अभिनय को सराहा गया और फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिये राष्ट्रीय पुरुस्कार भी मिला. अपने छोटे से फिल्मी सफर में लीला नायडू ने उम्मींद, ये रास्ते हैं प्यार के, द गुरु, बागी और त्रिकाल जैसी फिल्मों में अभिनय किया. सन १९६३ में प्रदर्शित फिल्म "ये रास्ते हैं प्यार के" ने लीला नायडू को एक अलग पहचान दी. इस फिल्म में अभिनय के बाद वो नारी स्वतंत्रता की प्रतीक बन गयीं. सन १९६३ में ही उन्होंने आइवरी प्रोडक्शन की फिल्म "हाउसहोल्डर" में भी काम किया.

उनके व्यक्तिगत जीवन पर नजर डालें तो कहा जाता है कि वह अपने निजी जीवन में भी उन्मुक्त विचारों की थी. उनके पिता रमैया नायडू आन्ध्रप्रदेश के थे और न्यूक्लियर विभाग में फिजिसिस्ट थे. उनकी माँ फ्रांसिसी मूल की थीं. अपने फिल्मी कैरियर के दौरान ही लीला नायडू ने ओबेरॉय होटल के मालिक मोहन सिंह के बेटे विक्की ओबेरॉय से विवाह कर लिया. उनसे उनकी दो बेटियाँ हैं. बाद में विक्की ओबेरॉय से तलाक हो जाने के बाद लीला नायडू ने अंग्रेजी कवि डॉम मॉरेस से विवाह किया और उनके साथ लगभग दस वर्ष फ्रांस में रहीं. जब कोर्ट ने उनकी दोनों बेटियों का जिम्मा उनसे लेकर विक्की ओबेरॉय को दे दिया तो वह भारत चलीं आयीं. यहाँ लीला नायडू की मुलाकात दार्शनिक जे.कृष्णमूर्ति से हुई. उसके बाद वह आजीवन उन्हीं के साथ रहीं.

लंबे समय तक फिल्मों से दूर रहने के बाद सन १९८५ में श्याम बेनेगल की फिल्म "त्रिकाल" से उनकी बॉलीवुड में वापिसी हुई थी. इसके बाद सन १९९२ में वह निर्देशक प्रदीप कृष्ण की फिल्म "इलैक्ट्रिक मून" में नजर आयीं थीं. यह उनकी आंखिरी फिल्म थी.

कवि बिहारीलाल का एक दोहा है कि "सतसैया कए दोहरे ज्यों नाविक के तीर, देखन में छोटे लगें घाव करं गंभीर" यह दोहा लीला नायडू के छोटे फिल्मी सफर पर भी लागू होता है.लीला नायडू ने छोटे फिल्मी सफर में अपने अभिनय की जो छाप छोडी़ है वो न तो बॉलीवुड भुला सकता है और न ही उनके चाहने वाले. आइये हम सभी सौन्दर्य और अभिनय की देवी को श्रद्धांजंली दें.

अब ऐसा कैसे हो सकता है कि हम आपको लीला जी पर फिमाये गए कुछ नायाब और कुछ दुर्लभ गीत ना सुनाएँ, फिल्म "अनुराधा" (इस फिल्म में बेमिसाल संगीत दिया था पंडित रवि शंकर ने ) और "ये राते हैं प्यार के", दो ऐसी फिल्में हैं जिसमें लीला जी पर फिल्माए गीतों को हम कभी नहीं भूल सकते. चलिए सुनते हैं इन्हीं दो फिल्मों से कुछ नायाब गीत -

जाने जाँ पास आओ न (सुनील दत्त, आशा भोंसले, ये रास्ते हैं प्यार के )


ये रास्ते हैं प्यार के (आशा भोंसले, शीर्षक)


आज ये मेरी जिन्दगी (आशा भोंसले, ये रास्ते हैं प्यार के)


ये खामोशियाँ (रफी- आशा, ये रास्ते हैं प्यार के, एक बेहद खूबसूरत प्रेम गीत)


सांवरे सांवरे (लता, अनुराधा)


कैसे दिन बीते (लता, अनुराधा)


और एक ये बेहद दुर्लभ सा गीत भी सुनिए -
गुनाहों का दिया हक (ये रास्ते हैं प्यार के)


रक्षा बंधन पर हमने चाहा था कि आप अपने कुछ संस्मरण बांटे पर अधिकतर श्रोता शायद इस परिस्तिथि के लिए तैयार नहीं लगे, स्वप्न जी ने कुछ लिखा तो नहीं पर अपने भाई जो अब इस दुनिया में नहीं हैं उन्हें याद करते हुए उनके सबसे पसंदीदा गीत को सुनवाने की फरमाईश की है. हमें यकीन है कि उनके आज जहाँ कहीं भी होंगे अपनी बहन की श्रद्धाजंली को ज़रूर स्वीकार करेंगें -

कोई होता जिसको अपना (किशोर कुमार, मेरे अपने)


हमलोग शुरु से ही संयुक्त परिवार में रहे. परिवार में सगे रिश्तों के अलावा ऐसे रिश्तों की भी भीड़ रही जिनसे हमारा सीधा-सीधा कोई नाता न था. यानी कि हमारा एक भरा-भरा परिवार था. हमारे यहाँ सभी तीज-त्यौहार बहुत ही विधि विधान से मनाये जाते थे. रक्षाबंधन भी इन्हीं में से एक है. मुझे आज भी याद है क मेरे ताऊजी, पापाजी तथा चाचाजी किस तरह सुबह से ही एक लम्बी पूजा में शामिल होते थे और उस दौरान नया जनेऊ पहनना आदि रस्में की जाती थीं. तरह-तरह के पकवान बनते थे. लेकिन हम बच्चे सिर्फ उनकी खुशबू से अपना काम चलाते थे क्योंकि माँ बार-बार यह कहकर टाल देती थी कि अभी पूजा खत्म नही हुई है. पूजा के बाद राखी बाँधकर खाना खाया जायेगा. उस समय तो अपने क्या दूर-दूर के रिश्तेदार भी राखी बँधवाने आते थे. आज बहुत कुछ बदल गया है. अब तो सगे भाई को भी राखी बाँधने का मौका नहीं मिलता है. खैर चलिए चलते चलते सुनते चलें रंजना भाटिया जी की पसंद का ये गीत जो इस रक्षा बंधन पर आप सब की नज़र है-

चंदा रे मेरे भैया से कहना (लता, चम्बल की कसम)


सभी भाई -बहनों के लिए ये रक्षा बंधन का पर्व मंगलमय हो इसी उम्मीद के साथ मैं दिशा आप सब से लेती हूँ इजाज़त.

प्रस्तुति - दीपाली तिवारी "दिशा"


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

शनिवार, 1 अगस्त 2009

रहा गर्दिशों में हरदम मेरा इश्क का सितारा...मनोज कुमार की पीडा और रफी साहब की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 158

"याद न जाये बीते दिनों की, जाके न आए जो दिन, दिल क्यों बुलाए उन्हे दिल क्यों बुलाए"। दोस्तों, फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की यादें इतनी पुरअसर हैं, इतने सुरीले हैं, कि उन्हे भुला पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। भले ही वो दिन फिर वापस नहीं आ सकते, लेकिन ग्रामोफ़ोन रिकार्ड्स, कैसेट्स और सीडीज़ के माध्यम से उन सुरीले दिनों की यादों को क़ैद कर लिया गया है जो सदियों तक उन सुरीले ज़माने की और उस दौर से गुज़रे कलाकारों की सुर साधना से दुनिया की फिजाओं को महकाती रहेंगी। इन सुर साधकों में से एक नाम मोहम्मद रफ़ी साहब का है, जिनकी कल पुण्य तिथि थी। आज ही के दिन सन् १९८० में वो हम से बिछड़ गये थे। जब भी रफ़ी साहब के गाये गीतों की महफ़िल सजती है तो यह दिल ग़मगीन हो जाता है यह सोचकर कि उपरवाले ने इतनी जल्दी क्यों उन्हे हम से अलग कर दिया! अभी तो मानो बस महफ़िल शुरु ही हुई थी, ३० साल पूरे होने जा रहे हैं उनके गये हुए, पर दिल तो आज भी बस यही कहता है उन्ही के गाये 'साज़ और आवाज़' फ़िल्म के उस गीत के बोलों में ढलकर कि "दिल की महफ़िल सजी है चले आइए, आप की बस कमी है चले आइए"। रफ़ी साहब की कमी न आज तक पूरी हो सकी है और लगता नहीं कि आगे भी हो पायेगी। ख़ैर, इन दिनों आप सुन रहे हैं लघु शृंखला 'दस चेहरे एक आवाज़ - मोहम्मद रफ़ी' के अंतर्गत रफ़ी साहब के गाये गानें अलग अलग अभिनेताओं पर फ़िल्माये हुए। आज बारी है अभिनेता मनोज कुमार की। मनोज कुमार के लिए मुकेश और महेन्द्र कपूर ने काफ़ी प्लेबैक किया है, लेकिन रफ़ी साहब के भी कई शानदार गानें हैं जिन पर मनोज साहब ने अभिनय किया है। ऐसी ही एक फ़िल्म है 'दो बदन' जिसके गानें सदाबहार नग़मों में स्थान पाते है। इसी फ़िल्म से आज सुनिये "रहा गर्दिशों में हर दम मेरे इश्क़ का सितारा, कभी डगमागायी कश्ती कभी खो गया किनारा"। रफ़ी साहब ने दो और मशहूर गीत इस फ़िल्म में गाये थे "भरी दुनिया में आख़िर दिल को समझाने कहाँ जायें" और "नसीब में जिसके जो लिखा था", जिन्हे हम फिर कभी आप को सुनवाने की कोशिश करेंगे।

फ़िल्म 'दो बदन' आयी थी सन् १९६६ में जिसका निर्माण किया था शमसुल हुदा बिहारी ने। जी हाँ, ये वही गीतकार एस. एच. बिहारी साहब ही हैं। बिहारी साहब ने बतौर फ़िल्म निर्देशक भी अपना हाथ आज़माया था, फ़िल्म थी 'जोगी'। राज खोसला के निर्देशन में मनोज कुमार के साथ आशा पारेख 'दो बदन' में नायिका के रूप में और सिमि गरेवाल सह-नायिका के रूप में नज़र आयीं थीं। सिमि गरेवाल को इस फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार भी मिला था। इस फ़िल्म के गीत संगीत के लिए संगीतकार रवि, गीतकार शक़ील बदायूनी ("नसीब में जिसके जो लिखा था") और गायिका लता मंगेशकर ("लो आ गयी उनके याद") भी फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार के लिए मनोनीत हुए थे। दोस्तों, आज का यह गीत सुनने से पहले जान लेते हैं संगीतकार रवि साहब की बातें रफ़ी साहब के बारे में, जो उन्होने कहे थे विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' शृंखला में - "यह १९४७ की बात है। मैं दिल्ली में था, जश्न-ए-जमुरीयत के मौक़े पर दो कलाकारों को बुलाया गया था - मोहम्मद रफ़ी और मुकेश। मैने पता किया कि वो कहाँ पर ठहरे हुए हैं। पता चला कि फ़तेहपुरी में 'कोरोनेशन होटल' में ठहरे हैं। मैं उनसे मिलने जा रहा था कि किसी ने कहा कि जब वे सुनेंगे कि मैं भी गायक बनने के ख़्वाब से उनसे मिलने गया हूँ तो कहेंगे कि 'हमारे ही पेट पर लात मारने आये हो?' मैने कहा कि 'मैं कहूँगा उनसे कि मैं 'म्युज़िक डिरेक्टर' बनना चाहता हूँ'। तो उसने कहा कि वो पूछेंगे कि ''नोटेशन' आता है क्या?', 'पहले सहायक बनना पड़ेगा', वगेरह वगेरह। ख़ैर, मेरी पहली ही फ़िल्म 'वचन' में उन्होने गाना गाया था "एक पैसा दे दो बाबू"। मैने सोचा कि उनको बता दूँ कि एक बार मैं उनसे दिल्ली में मिलने गया था, लेकिन फिर नहीं बताया। बहुत अच्छे आदमी थी। उस ज़माने में लता का 'रेट' था ५००० रूपए प्रति गीत। एक बार मैं उनके पास गया गाना लेकर और कहा कि 'रफ़ी साहब, गाना अच्छा है पर पैसे नहीं हैं'। उन्होने ज़हीर को बुलाया और कहा कि 'ये जो भी देंगे ले लेना'। एक बार अमरिका से वापस आकर कहने लगे कि 'अमरिका में मैने तुम्हारा फ़लाना गाना गाया, बहुत पसंद किया लोगों ने, मुझे भी अच्छा लगा'।" तो लीजिए दोस्तों, रफ़ी और रवि के संगम से उत्पन्न फ़िल्म 'दो बदन' का नग़मा सुनिये जो फ़िल्माया गया था मनोज कुमार पर। कल रफी साहब की पुण्यतिथि पर रफी साहब के लिए कुछ कहना चाहता था कह न पाया, आज कहता हूँ नौशाद साहब के शब्द उधार लेकर -

"दुखी थे लाख पर तेरी सूरत से हर मुसीबत टल जाता था,
तेरी आवाज़ के शबनम से ग़म का हर धूल धुल जाता था,
तू ही था प्यार का एक साज़ इस नफ़रत की दुनिया में,
गनीमत थी कि एक प्यार का साज़ तो था इस नफ़रत की दुनिया में!"




और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. एक मस्ती भरा गीत रफी साहब का गाया.
2. कलाकार हैं -सदाबहार "देवानंद".
3. मुखडा ख़तम होता है इस शब्द से -"दीवाना".

कौन सा है आपकी पसदं का गीत -
अगले रविवार सुबह की कॉफी के लिए लिख भेजिए (कम से कम ५० शब्दों में ) अपनी पसंद को कोई देशभक्ति गीत और उस ख़ास गीत से जुडी अपनी कोई याद का ब्यौरा. हम आपकी पसंद के गीत आपके संस्मरण के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगें.


पिछली पहेली का परिणाम -
आज फिर बिगुल बजाने का दिन है. ढोल नगाडे बज रहे हैं हमें मिल गयी है हमारी दूसरी विजेता स्वप्न मंजूषा जी के रूप में. बहुत बहुत बधाई आपको. वैसे ये तो लगभग तय ही था. मज़ा तो अब आएगा, ये देखना दिलचस्प होगा कि हमारे तीसरे विजेता पराग जी होंगे या फिर दिशा जी, मनु जी भी हो सकते हैं, एरोशिक (?) भी या फिर डार्क होर्स सुमित भी....स्वप्न जी आप अपनी पसंद के ५ गीत सोचिये और दूर से मज़ा लीजिये इस नए संग्राम का.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

प्रेमचंद के जन्मदिन पर विशेष "झाँकी"

सुनो कहानी: मुंशी प्रेमचंद की "झाँकी"

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अमिताभ मीत की आवाज़ में सआदत हसन मंटो की कहानी "आँखें" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द की कहानी "झांकी", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।
कहानी का कुल प्रसारण समय 15 मिनट 44 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)



मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिन ३१ जुलाई पर विशेष प्रस्तुति


सेठ घूरेलाल उन आदमियों में हैं, जिनका प्रात: को नाम ले लो, तो दिन-भर भोजन न मिले। उनके मक्खीचूसपने की सैकड़ों ही दंतकथाऍं नगर में प्रचलित हैं।
(प्रेमचंद की "झाँकी" से एक अंश)

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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से ऑडियो फ़ाइल डाऊनलोड कर लें
Jhanki MP3

#Thirty second Story, Jhanki: Munshi Premchand/Hindi Audio Book/2009/26. Voice: Anurag Sharma

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