Saturday, April 18, 2009

दो दिल टूटे दो दिल हारे...जब लता ने पिया हीर का दर्द

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 55

हीर-रांझा पंजाब के चार प्रसिद्ध दुखद प्रेम कहानियों में से एक है। बाक़ी के तीन हैं मिर्ज़ा साहिबा, सस्सि पुन्नू और सोहनी महिवाल। युँ तो हीर-रांझा को कई काव्य रूपों में प्रस्तुत किया गया है लेकिन १७६६ में वारिस शाह का लिखा हीर-रांझा सब से ज़्यादा चर्चित हुआ। हीर एक बेहद ख़ूबसूरत अमीर परिवार की लड़की है, और रांझा अपने चार भाइयों में सब से छोटा होने की वजह से अपने पिता का चहेता। वह बहुत अच्छी बांसुरी बजाता है। अपने लालची भाइयों और भाभियों से तंग आकर रांझा घर छोड़ देता है और भटकते हुए हीर के गाँव आ पहुँचता है। दोनों की मुलाक़ात होती है और एक दूसरे से प्यार हो जाता है। रांझा को हीर के घर मवेशियों की देख-रेख करने की नौकरी भी मिल जाती है। हीर उसके बांसुरी की मधुर तानों से सम्मोहित सी हो जाती है और उससे बेहद प्यार करने लगती है। जब उनके प्यार की भनक हीर के लालची चाचा को लगती है तो वह जबरदस्ती हीर की शादी किसी और से करवा देते हैं। रांझा का दिल टूट कर रह जाता है और वह एक जोगी बन जाता है। घूमते घामते एक रोज़ रांझा उसी गाँव आ पहुँचता हैं जहाँ पर हीर रहती है। दोनो एक बार फिर से मिल जाते हैं और वापस हीर के गाँव चले आते हैं। हीर के माता-पिता उनकी शादी को रज़ामन्दी दे देते हैं। लेकिन उनके शादी के दिन हीर का वही लालची चाचा हीर को ज़हर भरा लड्डू दे देता है, जिसे खा कर हीर मर जती है। इस सदमे को रांझा बरदाश्त नहीं कर पाता और ख़ुद भी वही लड्डू खा कर हीर के बगल में दम तोड़ देता है। और इस तरह से हीर और रांझा मर तो जाते हैं लेकिन उनकी प्रेम-कहानी अमर हो जाती है। हीर और रांझा पंजाब के झंग नामक शहर में दफ़्न हैं, जो अब पाकिस्तान में पड़ता है।

दोस्तों, हीर और रांझा की कहानी हमने आज आपको इसलिए सुनाई क्युंकि इसी मशहूर प्रेम-कहानी पर बनी १९७० की फ़िल्म हीर रांझा का एक गीत आज हम आप को सुनवा रहे हैं। चेतन आनन्द निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे राज कुमार और प्रिया राजवंश। शायद हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास की यह एकमात्र फ़िल्म है जिसका पूरा संवाद काव्य पर आधारित है। यानी पूरी फ़िल्म को एक कविता की तरह पेश किया गया है और इसके सारे संवाद काव्य और तुकबंदी में लिखा गया है। सेलुलायड पर लिखी हुई इस कविता के लिये श्रेय जाता है इस फ़िल्म के संवाद लेखक और गीतकार कैफ़ी आज़मी को। संगीतकार मदन मोहन के संगीत का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है इस फ़िल्म की सफलता के पीछे। सुनिये इस फ़िल्म से लताजी का गाया यह गाना और उपर सुनाई गयी हीर रांझा की कहानी को पढ़ कर ख़ुद अन्दाज़ा लगाइये कि इस गीत को फ़िल्म में किस 'सिचुयशन' में रखा गया होगा! पेश है "दो दिल टूटे दो दिल हारे"। महसूस कीजिये लताजी की दर्दभरी आवाज़ में हीर के टूटे दिल की पुकार को!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. महेंद्र कपूर और आशा के स्वर.
२. रवि का संगीत था यश चोपडा निर्देशित इस बेहद कामियाब फिल्म में.
३. मुखड़े में शब्द है -"ख्वाब".

पिछली पहेली का परिणाम -
मनु जी वाह क्या सही जवाब दिया है आपने..बधाई...नीलम जी आपकी फरमाईश दर्ज हो गयी है जल्द ही पूरी करने का प्रयास रहेगा...बने रहिये ओल्ड इस गोल्ड पर.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -


खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


सुनो कहानी: प्रेमचंद की 'स्‍वामिनी'

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'स्‍वामिनी'

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने शन्नो अग्रवाल की आवाज़ में मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'मंदिर और मस्जिद' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रेमचंद की अमर कहानी 'स्‍वामिनी', जिसको स्वर दिया है शन्नो अग्रवाल ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 37 मिनट और 0 सेकंड।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए प्रेमचंद की एक नयी कहानी

जरा देर के लिए पति-वियोग का दु:ख उसे भूल गया। उसकी छोटी बहन और देवर दोनों काम करने गये हुए थे। शिवदास बाहर था। घर बिलकुल खाली था।
(प्रेमचंद की 'स्‍वामिनी' से एक अंश)


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अगले शनिवार (२५ अप्रैल २००९) का आकर्षण - मुंशी प्रेमचंद की "आत्म-संगीत"
अगले रविवार (२६ अप्रैल २००९) का आकर्षण - पॉडकास्ट कवि सम्मलेन

#Sevententh Story, Swamini: Munsi Premchand/Hindi Audio Book/2009/12. Voice: Shanno Aggarwal

Friday, April 17, 2009

बेईमान बालमा मान भी जा...आशा की इस गुहार से बचकर कहाँ जायेंगे...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 54

.पी. नय्यर के गानों में एक अलग ही चमक हुआ करती थी। चाहे गाना ख़ुशरंग हो या फिर ग़मज़दा, नय्यर साहब का हर एक गीत रंगीन है, चमकदार है। उनका संगीत संयोजन कुछ इस तरह होता था कि उनके गीतों में हर एक साज़ बहुत ही साफ़ साफ़ सुनाई पड़ता था। दूसरे संगीतकारों की तरह उन्होने कभी 'वायलिन' से 'हार्मोनी' पैदा करने की कोशिश नहीं की, बल्कि हर साज़ को एकल तरीके से गीतों में पेश किया। फिर चाहे वह सारंगी हो या सितार, 'सैक्सोफ़ोन' हो या फिर बांसुरी। मूड, पात्र और स्थान - काल के आधार पर साज़ों का चुनाव किया जाता था, और इन साज़ों के हर एक पीस को बहुत ही निराले ढंग से पेश किया जाता था। इन साज़ों को बजाने के लिए भी नय्यर साहब ने हमेशा बड़े बड़े साज़िंदों और फ़नकारों को ही नियुक्त किया। इन फ़नकारों के बारे में विस्तार से हम फिर कभी बात करेंगे, चलिये अब आ जाते हैं आज के गीत पर। आज का गीत है फ़िल्म 'हम सब चोर हैं' से, नय्यर साहब का संगीत, मजरूह साहब के बोल, और आशाजी की आवाज़।

शम्मी कपूर, नलिनी जयवन्त और अमीता अभिनीत फ़िल्म 'हम सब चोर हैं' आयी थी सन १९५६ में, जो बनी थी फ़िल्मिस्तान के बैनर तले। फ़िल्मिस्तान सन १९४४ से फ़िल्में बना रही थी और तब से लेकर 'हम सब चोर हैं' के बनने तक, यानी कि १९५६ तक कई संगीतकारों को मौका दिया जैसे कि मास्टर ग़ुलाम हैदर, हरि-प्रसन्न दास, सी. रामचन्द्र, सचिन देव बर्मन, विनोद, श्यामसुंदर, हेमन्त कुमार, मदन मोहन, बसंतप्रकाश, एस. मोहिन्दर, रवि और सरदार मलिक। १९५६ में इस बैनर ने अपने नाम दो और संगीतकार जोड़ लिए- फ़िल्म 'हीर' में अनिल बिश्वास और 'हम सब चोर हैं' में ओ. पी. नय्यर। आइ. एस. जोहर निर्देशित इस फ़िल्म को बहुत ज़्यादा ख्याति तो नहीं मिली, लेकिन नय्यर साहब अपने गीत संगीत के ज़रिये लोगों के दिलों में अपनी जगह बरक़रार रखने में जरूर कामियाब रहे । प्रस्तुत गीत में आशा भोंसले की आवाज़ के उछाल में बह जाइए दोस्तों, और साथ ही महसूस कीजिए नय्यर साहब की वह ख़ास अंदाज़ जो वो उत्पन्न करते थे 'चेलो' (cello) और सारंगी के मिश्रण से। 'हम सब चोर हैं' फ़िल्म से पेश है "बेइमान बालमा मान भी जा, बेजान ज़ालमा मान भी जा"।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. कैफी आज़मी के बोल और मदन मोहन का संगीत.
२. राजकुमार और प्रिय राजवंश हैं इस फिल्म में.
३. मुखड़े में शब्द है- "सदके"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी के लिए जोरदार तालियाँ, एक मुश्किल गीत का संकेत पकडा है आपने. शन्नो जी जब दिल से दिल जुड़ जाते हैं तो "telepathy" काम करती है. इन गीतों के माध्यम से हम सब के दिल जुड़ जो गए हैं, तो कोई आश्चर्य नहीं कि आप गीत सोचें और हम प्रस्तुत करें. वैसे मनु जी ने भी कुछ हद तक सही कहा है, कहीं प्याज काटते वक़्त तो ये गीत याद नहीं आया न...हा हा हा..


खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


किन्नी बीती ते किन्नी बाकी ऐ..मैनू ऐ हो हिसाब ले बैठा....

पंजाबी शायर और कवि शिव कुमार बटालवी पर विशेष. दीप जगदीप बाँट रहे है अपने अनुभव बटाला शहर के

यौवन की ऋतु में जो भी मरता है,
वह या तो फूल बन जाता है या तारा।
यौवन की ऋतु में आशिक़ मरता है
या फिर करमों वाला।

- शिव बटालवी

हमारे यहां बहुत उम्‍दा कवि हुए हैं, लेकिन ऐसे कम ही हैं, जिन्‍हें लोगों का इतना प्यार मिला हो। हिंदी में बच्चन को मिला, उर्दू में ग़ालिब और फ़ैज़ को. अंग्रेज़ी में कीट्स को. स्पैनिश में नेरूदा को. पंजाबी में इतना ही प्यार शिव को मिला. शिव कुमार बटालवी. शिव हिंदी में कितना आया, यह अंदाज़ नहीं है. पंजाब आने से पहले मैंने सिर्फ़ शिव का नाम पढ़ा था. इतना जानता था कि कोई मंचलूटू गीतकार था. पर शिव सिर्फ़ मंच नहीं लूटता. उसकी साहित्यिक महत्ता भी है. उसे पढ़ने, सुनने के बाद यह महसूस होता है. वह अकेला कवि है, जिसकी कविता मैंने अतिबौद्धिक अभिजात अफ़सरों के मुंह से भी सुनी है और साइकिल रिक्शा खींचने वाले मज़दूर के मुंह से भी. ऐसी करिश्माई बातें हम नेरूदा के बारे में पढ़ते हैं. पंजाब में वैसा शिव है.

1973 में जब शिव की मौत हुई, तो उसकी उम्र महज़ 36 साल थी। उसने सक्रियता से सिर्फ़ दस साल कविताएं लिखीं. इन्हीं बरसों में उसकी कविता हर ज़बान तक पहुंच गई. 28 की उम्र में तो उसे साहित्य अकादमी मिल गया था. प्रेम और विरह उसकी कविता के मूल स्वर हैं. वह कविता में क्रांति नहीं करता. मनुष्य की आदत, स्वभाव, प्रेम, विरह और उसकी बुनियादी मनुष्यता की बात करता है. वह लोककथाओं से अपनी बात उठाता है और लोक को भी कठघरे में खड़ा करता है. जिस दौर में लगभग सारी भारतीय भाषाओं में कविता नक्‍सलबाड़ी आंदोलन से प्रभावित थी, शिव बिना किसी वाद में प्रवेश किए एक मेहनतकश आदमी की संवेदनाओं और भावनात्मक विश्वासों की बात कर रहा था. इसीलिए पंजाबी कविता के प्रगतिशील तबक़े ने शिव को सिरे से ख़ारिज कर दिया. हालांकि उसकी कविता इतनी ताक़तवर है कि अब तक लोकगीतों की तरह सुनी-गाई जाती है.

शिव की दीवानगी का सिलसिला मेरी जवानी के साथ ही शुरू हुआ और कब ये इश्क पागलपन तक पहुंच गया,खुद मुझे मालूम नहीं। तीन साल पहले की बात है, पता चला कुछ साहित्यकार दोस्त बटाला जा रहे हैं। मैंने एक दम कह दिया मैं भी चलूंगा, वहां पर साहित्य समारोह था, सभी उसमें शिरकत करने जा रहे थे। मुझे कवि गुरभजन गिल ने कहा सुबह 6 बजे जाना होगा, तुम पंजाबी भवन पहुंच जाना। अगली सुबह मैं छह से पहले वहां पहुंच गया। इसे मेरी खुशनसिबी समिझए कि जिस होटल में ये कार्यक्रम था, उसके ठीक सामने शिव की याद में एक ऑडिटोरियम बन रहा था। दो बार नींव पत्थर रखे जाने के बावजूद उसकी हालत पखाने से बद्दतर थी। जंग लगे बड़े से गेट पर ताला लटक रहा था। डा.जगतार धीमान ने मुझे दीवार फांद अंदर जाने की सलाह दी, वो भी मेरे साथ हो लिए। बीस पच्चीस कदम दीवार पर चलने के बाद हम अंदर के दरवाजे के सामने पहुंच कर नीचे कूद गए। ऑडिटोरियम में अंधेरा था और बैठने वाली सीढि़यों के दायरे के रुप में सीमेंट ईंट का ढांचा खड़ा था। उसके बीच मिट्टी के ढेर पड़े थे। बीचों बीच दो ढेर बिल्कुल गोल पहाड़ी की तरह करीब 5 फुट उंचाई तक होंगे, मैं यूं ही मस्ती में उन पर कोहनी रख कर खड़ा हो गया। धीमान साहब फोटो खींचने में बिजी थे, अचानक उनकी नजर मुझ पर पड़ी तो चेताने वाले लहजे में बोले वहां से हट जा उसमें सांप हो सकता हैं। मैं हैरान था, मुझे पता चला ये सांप की बाम्बियां है। वहां से हटने से पहले ही मेरे दिमाग में बात गूंज गई कि शिव जिंदगी भर अपने गीतों में सांप और उनकी वर्मियों की बातें करता रहा और आज वह उसकी अधूरी खंडहर यादगार पर भी कुंडली मारे बैठे हैं, मैंने उन्हीं के साथ फोटो खिचवाई। अफसोस के वो फोटो आज तक नहीं मिल सके।

उसी दोपहर को बटाले वाले सुभाष कलाकार और रंधावा के साथ हम शिव का घर देखने गए। घर बंद पड़ा था,जो कोई वहां पर रहता था, मौजूद नहीं था। पड़ोसियों ने मेरी आंखों की अकांक्षा समझ ली शायद और उनके घर की सीढि़यां चढ़ कर दीवार फांद कर हम शिव के उस छोटे से चौबारे में पहुंचे, जहां पर कहते हैं शिव ने कई खूबसूरत शामें गुजारी हैं। बिल्कुल खाली पड़ा कमरा, गली को खुलती लोहे की सलाखों वाली खिड़की और ठंडा सीमेंट का फर्श। कुछ पल खिड़की के पार झांकते हुए मैंने सोचा शायद शिव भी यूं अपना शहर यहां से देखता होगा। फिर न जाने क्या सूझी के ठंडे फर्श पर मैं लेट गया। एक पल लगा मानों मैं हल्का पंख हो गया फर्श की ठंडक भरी गोद में यूं लगा शिव की गोद में सो रहा हूं। आवाज गूंजी "चलो चलें" तो मेरा ख्वाब टूटा भीगी पलकों के साथ खड़ा हुआ, तो दो बूंदें फर्श पर गिर पड़ी, मुझे याद आ गया शिव ने कहा था, "भट्ठी वालिए चम्बे दिए डालिए पीड़ां दा परागा भुन दे, तैनूं देआं हंझूआं दा भाड़ा...". अंदर से आवाज गूंजी शिव तेरे फर्श पर दो पल सकून के गुजारने का भाड़ा मेरे दो आसूं रख लेना शायद यही मेरे लिए तसल्ली की बात थी कि "पीड़ां दा परागा" भुनाने के बदले आंसूओं का भाड़ा देने वाले शिव को मैंने उसी का सरमाया लौटाया है।

आज हम आवाज़ के श्रोताओं के लिए लाये हैं शिव के गीत, जिन्हें अलग अलग फनकारों ने अपनी आवाजों से सजाया है. जिन्हें पंजाबी आती है उनके लिए तो ये संकलन एक शानदार तोहफा है ही, भाषा पर पकड़ न रखने वालों के लिए भी उन्हें सुनना एक यादगार अनुभव होगा, ऐसा हमारा दावा है. तो शुरू करते है "भट्ठी वालिए चम्बे दिए डालिए पीड़ां दा परागा भुन दे, तैनूं देआं हंझूआं दा भाड़ा..." से, फनकार है सतबीर कौर.


सुरिंदर कौर की आवाज़ में सुनिए - "गमां दी रात लम्बी ऐ..." और चित्र सिंह की आवाज़ में "गीतां वे चुंज भरी..."




जगजीत सिंह से सुनिए "एक शिकरा यार बनाया..." और "रोग बन के रह गया है इश्क तेरे शहर का..."




कुलदीप दीपक ने एक पूरी एल्बम उन्हें समर्पित किया है, जिसके कुछ हिस्से यहाँ पेश हैं -


और अब सुनिए खुद शिव की आवाज़ में ये गीत -
मैनू तेरा शबाब ले बैठा,
रंग गोरा गुलाब ले बैठा,
मैंनू जद वी तुसी हो याद आए,
दिन दिहाडे शराब ले बैठा,
किनी बीती ते किनी बाकी ऐ,
मैनू ऐ हो हिसाब ले बैठा.....




प्रस्तुति - गीत चतुर्वेदी के साथ जगदीप सिंह

Thursday, April 16, 2009

आंसू भरी है ये जीवन की राहें... कोई उनसे कह दे हमें भूल जाए...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 53

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में कल आपने जुदाई के दर्द में डूबा हुआ एक ख़ूबसूरत नग्मा सुना था, आज भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल कुछ ग़मज़दा सी ही है क्युंकि आज जो गीत हम लेकर आए हैं, वह बयां करती है दास्ताँ जीवन के रास्तों के साथ साथ बहनेवाली आंसूओं के नदियों की। और ये गीत है मुकेश की आवाज़ में राज कपूर और माला सिन्हा अभिनीत फ़िल्म परवरिश में हसरत जयपुरी का ही लिखा और दत्ताराम का स्वरबद्ध किया हुआ -"आँसू भरी हैं ये जीवन की राहें, कोई उनसे कहदे हमें भूल जाएं"। संगीतकार दत्ताराम शंकर जयकिशन के सहायक हुआ करते थे। कहा जाता है कि शंकर से जयकिशन को पहली बार मिलवाने में दत्तारामजी का ही हाथ था। १९४९ से लेकर १९५७ तक इस अज़ीम संगीतकार जोड़ी के साथ काम करने के बाद सन १९५७ में दत्ताराम बने स्वतंत्र संगीतकार, फ़िल्म थी 'अब दिल्ली दूर नहीं'। पहली फ़िल्म के संगीत में ही इन्होने चौका मार दिया और इसके अगले साल १९५८ में अपनी दूसरी फ़िल्म 'परवरिश' में सीधा छक्का। ख़ासकर राग कल्याण पर आधारित मुकेश का गाया हुआ यह गाना तो सीधे लोगों के ज़ुबां पर चढ़ गया।

जैसा कि पहले भी हमने कई बार इस बात का ज़िक्र किया है कि मुकेश नाम दर्द भरी आवाज़ का पर्याय है। अनिल बिश्वास के संगीत निर्देशन में अपने पहले गाने से ही मुकेश दर्दीले गीतों के राजा बन गये थे। यह गीत था फ़िल्म 'पहली नज़र' से "दिल जलता है तो जलने दे, आँसू ना बहा फरियाद ना कर"। इस गीत को उन्होने अपने गुरु सहगल साहब के अंदाज़ में कुछ इस तरह से गाया था कि ख़ुद सहगल साहब ने टिप्पणी की थी कि "मैने यह गीत कब गाया था?" उस समय फ़िल्मी दुनिया में नये नये क़दम रखनेवाले मुकेश के लिए सहगल साहब के ये चंद शब्द किसी अनमोल पुरस्कार से कम नहीं थे। फ़िल्म परवरिश के प्रस्तुत गीत में भी मुकेश के उसी अन्दाज़-ए-बयां को महसूस किया जा सकता है। एक अंतरे में हसरत साहब कहते हैं - "बरबादियों की अजब दास्ताँ हूँ, शबनम भी रोये मैं वह आसमां हूँ, तुम्हे घर मुबारक़ हमें अपनी आहें, कोई उनसे कहदे हमें भूल जायें", कितने सीधे सरल लेकिन असरदार शब्दों में किसी के दिल के दर्द का बयान किया गया है इस गीत में! उस पर दताराम के संगीत संयोजन ने बोलों को और भी ज़्यादा पुर-असर बना दिया है। केवल शहनाई,सारंगी, सितार और तबले के ख़ूबसूरत प्रयोग से गाना बेहद सुरीला बन पड़ा है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. ओपी नय्यर और आशा की सदाबहार टीम.
२. मजरूह साहब के बोल.
३. गीत शुरू होता है इस शब्द से -"बेईमान"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -


खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


सावन की रिमझिम में उमड़-घुमड़ बरसे पिया......महफ़िल-ए-गज़ल और मन्ना डे

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०५

गर आपसे कहूँ कि हमारे आज के फ़नकार "श्री प्रबोध चंद्र जी" हैं तो लगभग १ या २ फीसदी लोग हीं होंगे जो इन्हें जानने का दावा करेंगे या फिर उतने लोग भी न होंगे। लेकिन यह सच है । अरे-अरे डरिये मत..मैं किसी अजनबी की बात नहीं कर रहा ...जिनकी भी बात कर रहा हूँ उन्हें आप सब जानते हैं। जैसे श्री हरिहर जरिवाला को लोग संजीव कुमार कहते हैं, वैसे हीं हमारे प्रबोध चंद्र जी यानि कि प्रबोध चंद्र डे को लोग उनके उपनाम मन्ना डे के नाम से बेहतर जानते हैं। मन्ना दा ने फिल्म-संगीत को कई कालजयी गीत दिए हैं। चाहे "चोरी-चोरी" का लता के साथ "आजा सनम मधुर चाँदनी में हम" हो तो चाहे "उपकार" का कल्याण जी-आनंद जी की धुनों पर "कसमें-वादे प्यार वफ़ा" हो या फिर सलिल चौधरी के संगीत से सजी "आनंद" फिल्म की "ज़िंदगी कैसी है पहेली" हो, मन्ना दा ने हर एक गाने में हीं अपनी गलाकारी का अनूठा नमूना पेश किया है।

चलिये अब आज के गाने की ओर रूख करते हैं। २००५ में रीलिज हुई "सावन की रिमझिम मे" नाम के एक एलबम में मन्ना दा के लाजवाब पंद्रह गीतों को संजोया गया था। यह गाना भी उसी एलबम से है। वैसे मैने यह पता करने की बहुत कोशिश की कि यह गाना मूलत: किस फिल्म या किस गैर-फिल्मी एलबम से है ,लेकिन मैं इसमें सफल नहीं हो पाया। तो आज हम जिस गाने की बात कर रहे हैं उसे लिखा है योगेश ने और अपने सुरों से सजाया है श्याम शर्मा ने और वह गाना है: "ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया"। वैसे इस एलबम में इस तिकड़ी के एक और गाने को स्थान दिया गया था- "कुछ ऎसे भी पल होते हैं" । संयोग देखिए कि जिस तरह हिन्दी फिल्मों में मन्ना दा की प्रतिभा की सही कद्र नहीं हुई उसी तरह कुछ एक संगीतकारों को छोड़ दें तो बाकी संगीतकारों ने योगेश क्या हैं, यह नहीं समझा। भला कौन "जिंदगी कैसी है पहेली" या फिर "कहीं दूर जब दिन ढल जाए" में छिपी भावनाओं के सम्मोहन से बाहर आ सकता है।

लोग माने या ना मानें लेकिन इस गाने और मन्ना दा के एक और गाने "लागा चुनरी में दाग" में गहरा साम्य है। साहिर का वह गाना या फिर योगेश का यह गाना निर्गुण की श्रेणी में आता है, जैसा कबीर लिखा करते थे, जैसे सूफियों के कलाम होते हैं। प्रेमिका जब खुदा या ईश्वर में तब्दील हो जाए या फिर जब खुदा या ईश्वर में आपको अपना पिया/अपनी प्रिया दिखने लगे, तब हीं ऎसे नज़्म सीने से निकलते हैं। मेरे मुताबिक इस गाने में भी वैसी हीं कुछ बातें कहीं गई है। और सच कहूँ तो कई बार सुनकर भी मैं इस गाने में छुपे गहरे भावों को पूरी तरह नहीं समझ पाया हूँ। राधा का नाम लेकर योगेश अगर सांसारिक प्रेम की बातें कर रहे हैं तो फिर मीरा या कबीर का नाम लेकर वो दिव्य/स्वर्गीय प्रेम की ओर इशारा कर रहे हैं। वैसे प्रेम सांसारिक हो या फिर दिव्य, प्रेम तो प्रेम है और प्रेम से बड़ा अनुभव कुछ भी नहीं।

हुलस हुलस हरसे हिया, हुलक हुलक हद खोए,
उमड़ घुमड़ बरसे पिया, सुघड़ सुघड़ मन होए।


दर-असल प्रेम वह कोहिनूर है ,जिसके सामने सारे नूर फीके हैं। प्रेम के बारे में कुछ कहने से अच्छा है कि हम खुद हीं प्रेम के रंग में रंग जाएँ। तो चलिए आप भी हमारे साथ रंगरेज के पास और गुहार लगाईये कि:

ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा....

पग-पग पर लाखों हीं ठग थे तन रंगने की धुन में,
सबसे सब दिन बच निकला मन पर बच ना सका फागुन में।
तो... जग में ये तन ये मेरा मन रह ना सका बैरागी,
कोरी-कोरी चुनरी मोरी हो गई हाय रे दागी।
अब जिया धड़के , अब जिया भड़के
इस चुनरी पे सबकी नज़रिया गड़े,
ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा.....

रंग वो जिस में रंगी थी राधा, रंगी थी जिसमें मीरा,
उसी रंग में सब रंग डूबे कह गए दास कबीरा।
तो... नीले पीले लाल सब्ज रंग तू ना मुझे दीखला रे,
मैं समझा दूँ भेद तुझे ये , तू ना मुझे समझा रे।
प्रेम है रंग वो , प्रेम है रंग वो,
चढ जाए तो रंग ना दूजा चढे,
ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा.....




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक ख़ास शब्द होगा जो मोटे अक्षर में छपा होगा. वही शब्द आपका सूत्र है. आपने याद करके बताना है हमें वो सभी शेर जो आपको याद आते हैं जिसके दो मिसरों में कहीं न कहीं वही शब्द आता हो. आप अपना खुद का लिखा हुआ कोई शेर भी पेश कर सकते हैं जिसमें आपने उस ख़ास शब्द का प्रयोग क्या हो. तो खंगालिए अपने जेहन को और अपने संग्रह में रखी शायरी की किताबों को. आज के लिए आपका शेर है - गौर से पढिये -

सब हवायें ले गया मेरे समुन्दर की कोई,
और मुझको एक कश्ती बादबानी दे गया...

इरशाद ....


पिछली महफ़िल के साथी-

पिछली महफिल में आपके लिए शब्द था -"खुदा" और सुजोई ने पेश की ये ग़ज़ल -

खुदा ने सोचा था कि रहेंगे सब इंसान प्यार से,
ज़मीन पे देखा तो अरमान लुटे नज़र आते हैं.
कुछ तो रहम किया होता खुदा पर इंसानों,
हाथ में तलवार लिए सरे-आम नज़र आते हैं.

नीलम जी भी उतर आई मैदान में इस शेर के साथ-

खुदा खुदी और तू,
सबमें शामिल है तेरी जुस्तजू,
वाह क्या बात है

और कमलप्रीत जी ने तो रंग ही जमा दिया ये कहकर कि -
उनकी आँखों में वो सुरूरे-इबादत है,
कि काफिर भी उठा ले अल्लाह का हलफ.

शन्नो जी, सजीव जी और आचार्य जी का भी महफिल में आने का आभार.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -'शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, April 15, 2009

आजा रे अब मेरा दिल पुकारा...- लता-मुकेश का एक बेमिसाल युगल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 52

ले ही आज की फ़िल्मों में दर्द भरे गानें ज़्यादा सुनने को नहीं मिलते, लेकिन एक दौर ऐसा भी रहा है कि जब हर फ़िल्म में कम से कम एक ग़मज़दा नग्मा ज़रूरी हुआ करता था। दर्द भरे गीतों का एक अलग ही मुक़ाम हुआ करता था। ऐसे गीतों के साथ लोग अपना ग़म बांट लिया करते थे, जी हल्का कर लिया करते थे। युं तो ३० और ४० के दशकों में बहुत सारे दर्दीले नग्में बने और ख़ूब चले, ५० के दशक के आते आते जब नये नये संगीतकार फ़िल्म जगत में धूम मचा रहे थे, तब दूसरे गीतों के साथ साथ दुख भरे गीतों का भी मिज़ाज कुछ बदला। शंकर जयकिशन फ़िल्म संगीत में जो नई ताज़गी लेकर आए थे, वही ताज़गी उनके ग़मज़दा गीतों में भी बराबर दिखाई दी। १९५१ में राज कपूर और नरगिस की फ़िल्म 'आवारा' में हसरत जयपुरी का लिखा, शंकर जयकिशन क संगीतबद्ध किया, और लता मंगेशकर का गाया "आ जाओ तड़पते हैं अरमान अब रात गुज़रनेवाली है" बहुत बहुत लोकप्रिय हुआ था। "चांद की रंगत उड़ने लगी, वो तारों के दिल अब डूब गए, घबराके नज़र भी हार गई, तक़दीर को भी नींद आने लगी", अपने साथी के इंतज़ार की यह पीड़ा बिल्कुल जीवन्त हो उठी है हसरत साहब के इन शब्दों में। इस गीत का असर कुछ इस क़दर हुआ कि राज कपूर की अगली ही फ़िल्म 'आह' में भी उन्होने हसरत साहब से ऐसा ही एक गीत लिखवाया। इस बार गीत एकल नहीं बल्कि लताजी और मुकेश साहब की युगल आवाज़ों में था। और यही गीत आज पेश-ए-खिदमत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में।

१९५३ की फ़िल्म 'आह' में राज कपूर के साथ नरगिस की जोड़ी एक बार फिर नज़र आयीं। यह फ़िल्म 'आवारा' की तरह 'बॉक्स औफ़िस' पर कामयाबी के झंडे तो नहीं गाढ़े लेकिन जहाँ तक इसके संगीत का सवाल है, तो इसके गाने गली गली गूंजे, और आज भी कहीं ना कहीं से अक्सर सुनाई दे जाते हैं। प्रस्तुत गीत "आजा रे अब मेरा दिल पुकारा" फ़िल्मी गीतों के इतिहास का वह मोती है जिसको अच्छे संगीत के क़द्र्दानों ने आज भी अपने दिलों में बसा रखा है, और आज ५५ साल बाद भी इस मोती की वही चमक बरक़रार है। इस गीत की ख़ासीयत यह है कि बहुत कम साज़ों का इस्तेमाल किया है शंकर जयकिशन ने, मुख्य रूप से मटके का सुंदर प्रयोग हुआ है। लताजी के गाया अलाप इस गीत को और भी ज़्यादा असरदार बना देते हैं। और जुदाई के दर्द को बयां करते हसरत साहब के बोलों के तो क्या कहने, बस गीत सुनिये और ख़ुद ही महसूस कीजिये।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. दत्ता राम, हसरत जयपुरी और मुकेश की टीम.
२. १९५८ में आई इस फिल्म के नाम पर एक और फिल्म बनी जिसमें अमिताभ बच्चन थे.
३. पहला अंतरा इस शब्द से शुरू होता है -"वादे..."

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
पहेली कुछ आसान थी. इसी बहाने हमें मिला एक नया विजेता - सुमित भारद्वाज के रूप में. मनु जी, अविनाश जी, हेमंत दा के ये गीत आपका भी पसंदीदा है जानकार ख़ुशी हुई. नीरज जी व्यस्ततायें लाख हों पर संगीत से दूर न रहें. यही तो हमारी लाइफ लाइन है भाई :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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