Showing posts with label SWARGOSHTHI 324. Show all posts
Showing posts with label SWARGOSHTHI 324. Show all posts

Sunday, July 2, 2017

राग पीलू : SWARGOSHTHI – 324 : RAG PILU




स्वरगोष्ठी – 324 में आज

संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 10 : राग पीलू

रोशन की जन्मशती वर्ष में गिरिजा देवी, आशा और रफी से पीलू की रचनाएँ सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की जारी श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की दसवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हमने 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘नई उमर की नई फसल’ से एक युगलगीत चुना है, जिसे रोशन ने राग पीलू का आधार दिया है। यह गीत आशा भोसले और मुहम्मद रफी की आवाज़ में प्रस्तुत है। इसके साथ ही हम इसी राग में एक दादरा विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



आशा  भोसले  और  मुहम्मद  रफी 
गीतों में रागों का आधार हो, कव्वाली हो या गजल हो, रोशन ने इन सभी विधाओं में स्वयं को बेहतर सिद्ध किया। रोशन अंतर्मुखी और शान्त व्यक्तित्व के स्वामी थे। उनमे दम्भ बिल्कुल भी नहीं था। किसी भी महफिल में हारमोनियम उठा कर किसी भी गायक की संगति करने में वे संकोच नहीं करते थे। उनमें व्यावहारिकता की कमी थी। किसी निर्माता-निर्देशक के पास काम माँगने से वह कतराते थे। परन्तु शब्दों को स्वरों में ढालने में वह दक्ष थे। उनके रचे गीतों पर ध्यान देने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके गीत धुन के खाँचे में शब्दों को फिट नहीं किये गए प्रतीत होते, बल्कि गीत के हर शब्द स्वर, लय और ताल से गूँथे होते थे। उन्होने लगभग सभी तत्कालीन गीतकारों के साथ काम किया था। इस श्रृंखला में हमने आपको रोशन की संगीतबद्ध की हुई पारम्परिक बन्दिशों के अलावा शैलेन्द्र, साहिर लुधियानवी और मजरूह सुल्तानपुरी की कुछ श्रेष्ठ रचनाओं का रसास्वादन कराया है। आज के अंक में हम एक और भावपूर्ण गीतकार गोपाल दास ‘नीरज’ और रोशन के साथ का सुरीला प्रतिफल प्रस्तुत कर रहे हैं। आज का गीत हमने 1965 में प्रदर्शित फिल्म “नई उमर की नई फसल” से चुना है। सम्भवतः रोशन और नीरज के साथ की यह पहली फिल्म है। यह फिल्म व्यावसायिक दृष्टि से बहुत सफल नहीं थी, किन्तु इसके गीत सदाबहार हैं। आज भी रेडियो पर ‘सदाबहार गीत’ के रूप में बजाया जाता है। फिल्न “नई उमर की नई फसल” में नीरज का लिखा और रोशन का स्वरबद्ध किया गीत –“कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे...” आज छः दशक के बाद भी संगीत प्रेमियों को लुभाता है। यह गीत मोहम्मद रफी की आवाज़ में है। इसके अलावा फिल्म में सुमन कल्याणपुर और मीनू पुरूषोत्तम के स्वर में लोक संगीत पर आधारित एक लुभावना गीत –“मेरो सैयाँ गुलबिया के फूल, हमारों रंग केसरिया...” भी शामिल था। मुकेश के स्वर में प्रस्तुत प्रणय गीत –“देखती ही रहो आज दर्पण न तुम...” भी अपने विशिष्ट अंदाज़ में अभिव्यक्त हुआ। इसी प्रकार फिल्म में एक गीत ऐसा भी है जिसमें एक अन्तरे में नायिका का प्रणय निवेदन है तो दूसरे अन्तरे में सामाजिक सरोकारों के प्रति नायक की चिन्ता अभिव्यक्त की गई है। राग पीलू का आधार लिये हुए और आशा भोसले व मुहम्मद रफी के स्वरों से युक्त इस गीत के बोल हैं –“आज की रात बड़ी शोख बड़ी नटखट है, आज तो तेरे बिना नींद नहीं आएगी...”। यही गीत हमने आज की कड़ी के लिए चुना है। आप यह गीत सुनिए।

राग पीलू : “आज की रात बड़ी शोख बड़ी नटखट है...” : आशा भोसले और मुहम्मद रफी : फिल्म – नई उमर की नई फसल



गिरिजा देवी 
राग पीलू का सम्बन्ध काफी थाट से जोड़ा जाता है। आमतौर पर इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित किया जाता है। अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए राग की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग होते हैं। इस राग में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के कोमल और शुद्ध, दोनों रूप का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय दिन का तीसरा प्रहर माना गया है। इस राग के प्रयोग करते समय प्रायः अन्य कई रागों की छाया दिखाई देती है, इसीलिए राग पीलू को संकीर्ण जाति का राग कहा जाता है। यह चंचल प्रकृति का और श्रृंगार रस की सृष्टि करने वाला राग है। इस राग में अधिकतर ठुमरी, दादरा, टप्पा, गीत, भजन आदि का गायन बेहद लोकप्रिय है। फिल्मी गीतों में भी इस राग का प्रयोग अधिक किया गया है। इस राग में ध्रुपद और विलम्बित खयाल का प्रचलन नहीं है। राग पीलू पूर्वांग प्रधान राग है। इसमे पूर्वांग के स्वर इतने प्रमुख रहते हैं कि प्रायः गायक या वादक मध्यम स्वर को अपना षडज मान कर गाते-बजाते हैं, जिससे मंद्र सप्तक के स्वरों में सरलता से विचरण किया जा सके। राग पीलू के गायन-वादन का समय यद्यपि दिन का तीसरा प्रहर निर्धारित किया गया है, किन्तु परम्परागत रूप से यह सार्वकालिक राग हो गया है। ठुमरी अंग का राग होने से किसी गायन-वादन के अन्त में पीलू की ठुमरी, दादरा या सुगम संगीत से कार्यक्रम के समापन की परम्परा बन गई है। अब आप विश्वविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी के स्वर में राग पीलू में एक रसपूर्ण दादरा सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति प्रदान कीजिए।

राग पीलू : “साँवरिया प्यारा रे मोरी गुंइया...” : विदुषी गिरिजा देवी और साथी



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 324वें अंक की पहेली में आज हम आपको संगीतकार रोशन द्वारा स्वरबद्ध वर्ष 1966 में प्रदर्शित एक फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 330वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत में किस राग की छाया है? हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिखिए।

3 – यह गीत युगल स्वर में हैं। इस अंश में मुख्य स्वर किस पार्श्वगायक का है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 8 जुलाई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 326वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 322वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘आम्रपाली’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – सितारखानी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी ने प्रश्नों के सही उत्तर दिए हैं और इस सप्ताह के विजेता बने हैं। इस सप्ताह हमारी पहेली में एक नये संगीत-प्रेमी, छिन्दवाड़ा, मध्य प्रदेश से नन्दलाल सिंह रघुवंशी ने भाग लिया है और एक अंक अर्जित कर लिया है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार श्री रघुवंशी का हार्दिक स्वागत करता है और आशा है कि वह नियमित रूप से ‘स्वरगोष्ठी’ देखते रहेंगे और पहेली में भाग लेते रहेंगे। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर रोशन की जन्मशती पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस अंक में हमने आपके लिए राग पीलू में निबद्ध एक दादरा और राग पीलू की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक फिल्मी उदाहरण भी प्रस्तुत किया। रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ