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Sunday, October 9, 2011

सुर संगम में आज - सरोद के पर्याय हैं- उस्ताद अमजद अली खाँ

सुर संगम- 38 – उस्ताद अमजद अली खान साहब को जन्मदिवस (9 अक्तूबर) की हार्दिक शुभकामनाएँ


आज ‘सुर संगम’ के इस नये अंक में, आप सब संगीत-रसिकों का, कृष्णमोहन मिश्र की ओर से हार्दिक स्वागत है। आज देश के जाने-माने संगीतज्ञ और सरोद-वादक उस्ताद अमजद अली खाँ का जन्मदिन है। इस अवसर पर हम 'सुर-संगम' परिवार और देश-विदेश के करोड़ों संगीत-प्रेमियों की ओर से उस्ताद का हार्दिक अभिनन्दन करते हैं। वर्तमान में उस्ताद अमजद अली खाँ सरोद-वादकों में शिखर पर हैं और ‘सरोद-सम्राट’ की उपाधि से विभूषित हैं।

९ अक्तूबर, १९४५ को ग्वालियर में संगीत के सेनिया बंगश घराने की छठी पीढ़ी में जन्म लेने वाले अमजद अली खाँ को संगीत विरासत में प्राप्त हुआ था। इनके पिता उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ग्वालियर राज-दरबार में प्रतिष्ठित संगीतज्ञ थे। इस घराने के संगीतज्ञों ने ही ईरान के लोकवाद्य ‘रबाब’ को भारतीय संगीत के अनुकूल परिवर्द्धित कर ‘सरोद’ नामकरण किया। अमजद अली अपने पिता हाफ़िज़ अली के सबसे छोटे पुत्र हैं। उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ ने परिवार के सबसे छोटे और सर्वप्रिय सन्तान को बहुत छोटी उम्र में ही संगीत-शिक्षा देना आरम्भ कर दिया था। मात्र बारह वर्ष की आयु में एकल सरोद-वादन का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। एक छोटे से बालक की सरोद पर अनूठी लयकारी और तंत्रकारी सुन कर दिग्गज संगीतज्ञ दंग रह गए। उस्ताद अमजद अली खाँ और उनके सरोद पर चर्चा जारी रखेंगे। यहाँ थोड़ा रुक कर आइए उस्ताद के सरोद-वादन का आनन्द लेते हैं।

उस्ताद अमजद अली खाँ : राग – श्याम कल्याण : तीनताल मध्य लय


अमजद अली खाँ को बचपन में ही सरोद से ऐसा लगाव हुआ कि युवावस्था तक आते-आते एक श्रेष्ठ सरोद-वादक के रूप में पहचाने जाने लगे। उन्होने सरोद-वादन की शैली में विकास के लिए कई प्रयोग किये। उनका एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग यह है कि सरोद के तारों को उँगलियों के सिरे से बजाने के स्थान पर नाखून से बजाना। सितार की भाँति सरोद में स्वरों के पर्दे नहीं होते, इसीलिए जब उँगलियों के सिरे के स्थान पर नाखूनों से इसे बजाया जाता है तब स्वरों की स्पष्टता और मधुरता बढ़ जाती है।

उस्ताद अमजद अली खाँ ने अनेक नये रागों की रचना भी की है। ये नवसृजित राग हैं- किरण रंजिनी, हरिप्रिया कान्हड़ा, शिवांजलि, श्यामश्री, सुहाग भैरव, ललितध्वनि, अमीरी तोड़ी, जवाहर मंजरी, और बापू कौंस। वर्तमान में उस्ताद अमजद अली खाँ संगीत जगत के सर्वश्रेष्ठ सरोद-वादक हैं। उनके वादन में इकहरी तानें, गमक, खयाल की बढ़त का काम अत्यंत आकर्षक होता है। आइए, यहाँ थोड़ा रुक कर सरोद पर खाँ साहब का बजाया एक और मोहक राग- कामोद का आनन्द लेते हैं। यह प्रस्तुति चौदह मात्रा की चाँचर ताल में है। तबला संगति उस्ताद शफ़ात अहमद खाँ ने की थी।

उस्ताद अमजद अली खाँ : राग – कामोद : चाँचर ताल


युवावस्था में ही उस्ताद अमजद अली खाँ ने सरोद-वादन में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर ली थी। १९७१ में उन्होने द्वितीय एशियाई अन्तर्राष्ट्रीय संगीत-सम्मेलन में भाग लेकर ‘रोस्टम पुरस्कार’ प्राप्त किया था। यह सम्मेलन यूनेस्को की ओर से पेरिस में आयोजित किया गया था, जिसमें उन्होने ‘आकाशवाणी’ के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया था। अमजद अली ने यह पुरस्कार मात्र २६ वर्ष की आयु में प्रपट किया था, जबकि इससे पूर्व १९६९ में यही ‘रोस्टम पुरस्कार’ उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ को शहनाई-वादन के लिए प्राप्त हो चुका था। १९६३ में मात्र १८ वर्ष की आयु में उन्होने पहली अमेरिका यात्रा की थी। इस यात्रा में पण्डित बिरजू महाराज के नृत्य-दल की प्रस्तुति के साथ अमजद अली खाँ का सरोद-वादन भी हुआ था। इस यात्रा का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह था कि खाँ साहब के सरोद-वादन में पण्डित बिरजू महाराज ने तबला संगति की थी और खाँ साहब ने कथक संरचनाओं में सरोद की संगति की थी।

उस्ताद अमजद अली खाँ ने देश-विदेश के अनेक महत्त्वपूर्ण संगीत केन्द्रों में प्रदर्शन कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया है। इनमें कुछ प्रमुख हैं- रायल अल्बर्ट हाल, रायल फेस्टिवल हाल, केनेडी सेंटर, हाउस ऑफ कामन्स, फ़्रंकफ़र्ट का मोजर्ट हाल, शिकागो सिंफनी सेंटर, आस्ट्रेलिया के सेंट जेम्स पैलेस और ओपेरा हाउस आदि। खाँ साहब अनेकानेक पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत किये जा चुके हैं। इनमें कुछ प्रमुख सम्मान हैं- भारत सरकार द्वारा प्रदत्त ‘पद्मश्री’ और ‘पद्मभूषण’ सम्मान, संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार, तानसेन सम्मान, यूनेस्को पुरस्कार, यूनिसेफ का राष्ट्रीय राजदूत सम्मान आदि। वर्तमान में उस्ताद अमजद अली खाँ के दो पुत्र- अमान और अयान सहित देश-विदेश के अनेक शिष्य सरोद वादन की पताका फहरा रहे हैं। ‘हिंदयुग्म’ और ‘सुर संगम’ की ओर से आज उस्ताद अमजद अली खाँ को जन्म-दिन के अवसर पर शत-शत बधाई अर्पित करते हुए अपने पाठकों को सुनवाते हैं, उस्ताद अमजद अली खाँ द्वारा सरोद पर प्रस्तुत राग ‘भैरवी’ में एक दादरा।

उस्ताद अमजद अली खाँ : राग – भैरवी : दादरा ताल


अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। अगले रविवार को हम एक और शास्त्रीय अथवा लोक कलासाधक के साथ पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Monday, June 29, 2009

रूप कुमार राठोड और साधना सरगम के युगल स्वरों का है ये -"वादा"

बात एक एल्बम की (10)
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - वादा
फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - उस्ताद अमजद अली खान, गुलज़ार, रूप कुमार राठोड, साधना सरगम.


बात एक एल्बम की में इस माह हम चर्चा कर रहे हैं चार बड़े फनकारों से सजी एल्बम "वादा' के बारे में. गीतकार गुलज़ार और संगीतकार उस्ताद अमजद अली खान साहब के बारे में हम बात कर चुके हैं, आज जिक्र करते हैं इस एल्बम के दो गायक कलाकारों का. इनमें से एक हैं शास्त्रीय संगीत के अहम् स्तम्भ माने जाने वाले पंडित चतुर्भुज राठोड के सुपुत्र और श्रवण राठोड (नदीम श्रवण वाले) और विनोद राठोड के भाई, जी हाँ हम बात कर रहे हैं गायक और संगीतकार रूप कुमार राठोड की. अपने पिता (जिन्हें इंडस्ट्री में कल्याणजी आनंदजी और गायक अनवर के गुरु भी कहा जाता है) के पदचिन्हों पर चलते हुए रूप ने तबला वादन सीखने से अपना संगीत सफ़र शुरू किया. पंकज उधास और अनूप जलोटा के साथ उन्होंने संगत की. श्याम बेनेगल की "भारत एक खोज" में भी उन्होंने तबला वादन किया. १९८४ में अपने इस जूनून को एक तरफ रख उन्होंने गायन की दुनिया में खुद को परखने का अहम् निर्णय लिया ये एक बड़ा "यु-टर्न" था उनके जीवन का. उस्ताद नियाज़ अहमद खान से तालीम लेकर उन्होंने ग़ज़ल गायन से शुरुआत की. पार्श्व गायन में उन्हें लाने का श्रेय जाता है संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को, जिन्होंने शशि लाल नायर की फिल्म "अंगार" में उन्हें गाने का मौका दिया. पर असली सफलता उन्हें मिली फिल्म "बॉर्डर" के साथ. अनु मालिक के संगीत निर्देशन में "तो चलूँ" और "संदेसे आते हैं" गीतों ने उन्हें कमियाबी का असली स्वाद चखाया, अनु के साथ उसके बाद भी उन्होंने बहुत बढ़िया और लोकप्रिय गीतों को अपनी आवाज़ से सजाया. "ले चले डोलियों में तुम्हें", "मौला मेरे" और "तुझमें रब दिखता है" उनकी आवाज़ में ढले कुछ ऐसे गीत हैं जिन्हें सुनकर लगता है कि इन्हें इतना सुंदर कोई और गायक गा ही नहीं सकता था. प्राइवेट अल्बम्स में भी उन्होंने जम कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है. हमारी फीचर्ड एल्बम "वादा" भी इसका अपवाद नहीं है. यकीन न हो तो सुनिए हलकी फुल्की शरारतों और छेड़ छाड़ से गुदगुदाता ये नगमा -

चोरी चोरी की वो झाँखियाँ...


और ये सुनिए मखमली एहसासों से सजे गुलज़ार साहब के "ट्रेड मार्क" शब्दों में गुंथे इस गीत को -
ये सुबह साँस लेगी....


एल्बम वादा से रूप कुमार की आवाज़ में ये नायाब गीत भी हैं -

ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नहीं था...
डूब रहे हो और बहते हो...
रोजे-अव्वल से ही आवारा हूँ....

बढ़ते हैं इस एल्बम के चौथे फनकार की तरफ. इससे पहले की हम उनके बारे में कुछ कहें सुनिए इसी एल्बम से उनकी आवाज़ में ये दर्द भरी ग़ज़ल -

आँखों की हिचकी रूकती नहीं है,
रोने से कब गम हल्का हुआ है...

सीने में टूटी है चीज़ कोई,
खामोश सा एक खटका हुआ है....


वाह.... सुनिए आँखों में सावन अटका हुआ है.....


ये मधुर और चैन से भरी आवाज़ है साधना सरगम की. एक ऐसी गायिका जिनकी आवाज़ और कला का हमारी फिल्म इंडस्ट्री में कभी भी भरपूर इस्तेमाल नहीं हुआ. पंडित जसराज की इस शिष्या में गजब की प्रतिभा है और उनके कायल संगीतकार ए आर रहमान भी हैं. एक ताज़ा साक्षात्कार में रहमान में स्वीकार किया कि वही एकमात्र भारतीय गायिका हैं जो हमेशा उन्हें उम्मीद से बढ़कर परिणाम देती है अपने हर गीत में. इन पक्तियों के लेखक की राय में भी लता मंगेशकर की गायन विरासत को यदि कोई गायिका निभा पायी है तो वो साधना सरगम ही है. फिल्म "लगान" के गीत "ओ पालनहारे" एल्बम में लता की आवाज़ में है पर फिल्म के परदे पर नायिका के लिए साधना की आवाज़ का इस्तेमाल हुआ है, और देखिये लता जी गाये मुखड़े के बाद साधना की आवाज़ में अंतरा आता है और लगता है जैसे दोनों आवाजें एक दूजे में घुल-मिल ही गयी हों. रहमान ने उस साक्षात्कार में यह भी कहा कि वो हर बार अपनी गायिकी से मुझे चौका देती है. वो दिए हुए निर्देशों से भी बढ़कर हर गीत में कुछ ऐसा कर जाती है कि गीत एक स्तर और उपर हो जाता है. चलिए सुनते हैं साधना की आवाज़ में एक और गीत इसी एल्बम से -

सारा जहाँ चुप चाप है....


और अब सुनिए रूप कुमार और साधना सरगम की युगल आवाजों में ये शानदार गीत -
हर बात पे हैरान है....(उस्ताद अमजद अली खान साहब ने इस गीत में एक कश्मीरी लोक धुन का खूबसूरत सामंजस्य किया है)


एल्बम वादा के अन्य गीत यहाँ सुनें -

दिल का रसिया...
ऐसा कोई -(सरोद पर)



"बात एक एल्बम की" एक मासिक श्रृंखला है जहाँ हम बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की.यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.

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