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Sunday, April 28, 2019

राग शंकरा : SWARGOSHTHI – 417 : RAG SHANKARA






स्वरगोष्ठी – 417 में आज

बिलावल थाट के राग – 5 : राग शंकरा

उस्ताद विलायत खाँ से राग शंकरा की रचना और मुबारक बेगम से फिल्मी गीत सुनिए




उस्ताद विलायत खां
मुबारक बेगम
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला “बिलावल थाट के राग” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से दूसरा थाट बिलावल है। इस श्रृंखला में हम बिलावल थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में बिलावल थाट के जन्य राग “शंकरा” पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपको विश्वविख्यात सितार वादक उस्ताद विलायत खाँ का का बजाया राग शंकरा में एक आकर्षक गत सुनवाएँगे। साथ ही 1966 की फिल्म ‘सुशीला’ का राग शंकरा पर आधारित एक सदाबहार गीत सुनवाएँगे और इसके संगीतकार सी. अर्जुन के बारे में आपको कुछ जानकारी देंगे।



राग शंकरा भारतीय संगीत का एक गम्भीर प्रकृति का राग है। मयूर वीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार, यह राग मानव की अन्तर्व्यथा को आध्यात्म से जोड़ने वाले भावों की अभिव्यक्ति के लिए समर्थ होता है। औड़व-षाड़व जाति के राग शंकरा के आरोह में ऋषभ और मध्यम तथा अवरोह में मध्यम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। उत्तरांग प्रधान इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी तार सप्तक का षडज स्वर होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर में यह राग गाने-बजाने की परम्परा है। इस राग के स्वरूप के बारे में विद्वानो में कुछ मत-भिन्नता भी है। कुछ विद्वान इस राग को औड़व-औड़व जाति का मानते हैं, अर्थात आरोह और अवरोह, दोनों में ऋषभ और मध्यम स्वर का प्रयोग नहीं करते। एक अन्य मतानुसार केवल मध्यम स्वर ही वर्जित होता है। वर्तमान में राग शंकरा का औड़व-षाड़व जाति ही अधिक प्रचलित है। आइए, अब हम आपको तंत्रवाद्य सितार पर एक मोहक गत सुनवा रहे हैं। विश्वविख्यात सितार-वादक उस्ताद विलायत खाँ से सभी संगीत-प्रेमी परिचित हैं। राग शंकरा की तीनताल में निबद्ध यह रचना उन्हीं की कृति है। आप इस आकर्षक सितार-वादन की रसानुभूति कीजिए।

राग शंकरा : सितार पर तीनताल की गत : वादक उस्ताद विलायत खाँ


वर्ष 1966 में श्री विनायक चित्र द्वारा निर्मित और महेन्द्र प्राण द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सुशीला’ प्रदर्शित हुई थी। मधुर गीतों के कारण यह फिल्म अत्यन्त सफल हुई थी। फिल्म के संगीतकार थे सी. अर्जुन, जिनकी प्रतिभा का उचित मूल्यांकन फिल्म संगीत के क्षेत्र में नहीं हुआ। 1 सितम्बर, 1933 को सिन्ध (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्में सी. अर्जुन को संगीत अपने गायक पिता से विरासत में प्राप्त हुआ था। विभाजन के समय यह परिवार बड़ौदा आकर बस गया। सी. अर्जुन ने आरम्भ में कुछ समय तक रेलवे की नौकरी भी की, लेकिन संगीत के क्षेत्र में कुछ कर गुजरने के उद्देश्य से नौकरी छोड़ कर तत्कालीन बम्बई का रुख किया और यहाँ आकर संगीतकार बुलों सी. रानी के सहायक बन गए। उन दिनों गजलों के संगीत संयोजन में बुलों सी. रानी बड़े माहिर माने जाते थे। सी. अर्जुन ने गजल-संयोजन की कला उन्हीं से सीखी थी। स्वतंत्र संगीतकार के रूप में सी. अर्जुन की 1960 में प्रदर्शित प्रथम हिन्दी फिल्म ‘रोड नम्बर 303’ थी। इस फिल्म के गीत बेहद मोहक सिद्ध हुए। 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘मैं और मेरा भाई’ में सी. अर्जुन अपनी गजल-संयोजन की प्रतिभा को रेखांकित करने में सफल हुए। इस फिल्म के गीतकार जाँनिसार अख्तर थे। गीतकार और संगीतकार की इस जोड़ी ने इसके बाद कई फिल्मों में आकर्षक और लोकप्रिय गज़लों से फिल्म संगीत को समृद्ध किया। फिल्म ‘मैं और मेरा भाई’ में जाँनिसार अख्तर की लिखी, आशा भोसले और मुकेश के स्वरों में गायी सदाबहार गजल - ‘मैं अभी गैर हूँ मुझको अभी अपना न कहो...’ ने सी. अर्जुन को अमर बना दिया। इस फिल्म के बाद उन्होने अपनी फिल्मों में स्तरीय गज़लों का सिलसिला जारी रखा। 1964 की फिल्म ‘पुनर्मिलन’ में- ‘पास बैठो तबीयत बहल जाएगी...’, 1965 की फिल्म ‘एक साल पहले’ में - ‘नज़र उठा कि ये रंगीं समाँ रहे न रहे...’ और 1966 में ‘चले हैं ससुराल’ जैसी कम बजट की फिल्म को भी उन्होने - ‘हमने तेरी वफ़ा का जफ़ा नाम रख दिया...’ जैसी लोकप्रिय गजल से सँवार कर अपनी प्रतिभा का रेखांकन किया। गज़लों के श्रेष्ठ संगीतकार के रूप में सी. अर्जुन की सबसे सफल और लोकप्रिय 1966 की ही फिल्म थी ‘सुशीला’। इस फिल्म में उन्हें एक बार फिर जाँनिसार अख्तर का साथ मिला। इस फिल्म के सभी गीतों को अपार ख्याति मिली। गायिका मुबारक बेगम की आवाज़ में फिल्म की एक गजल - ‘बेमुरव्वत बेवफा बेगाना-ए-दिल आप हैं...’ तो आज भी सदाबहार है। राग शंकरा पर आधारित यह गजल जाँनिसार अख्तर की शायरी और सी. अर्जुन के उत्कृष्ट संगीत के लिए सदा याद रखा जाएगा। इस लघु श्रृंखला के आज के अंक के लिए हमने राग शंकरा पर आधारित यही गीत चुना है। लीजिए, आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग शंकरा : ‘बेमुरव्वत बेवफा बेगाना-ए-दिल आप हैं...’ : मुबारक बेगम : फिल्म - सुशीला




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 417वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1956 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 420वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किन युगल-गायकों के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 4 मई, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 419 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 415वें अंक की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म “बंजारन” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – दुर्गा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर और मुकेश

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर श्रृंखला “बिलावल थाट के राग” की चौथी कड़ी में आज आपने बिलावल थाट के राग “शंकरा” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात सितार-वादक उस्ताद विलायत खाँ का बजाया तीनताल में एक रचना का रसास्वादन किया। इसके बाद इसी राग पर आधारित एक गीत फिल्म “सुशीला” से मुबारक बेगम के स्वर में प्रस्तुत किया गया। संगीतकार सी. अर्जुन ने इस गीत को राग शंकरा के स्वरों का आधार दिया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग शंकरा : SWARGOSHTHI – 417 : RAG SHANKARA : 28 अप्रैल, 2019

Sunday, May 7, 2017

राग भैरव : SWARGOSHTHI – 316 : RAG BHAIRAV




स्वरगोष्ठी – 316 में आज


संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 2 : राग भैरव में लोरी


राग भैरव में निबद्ध प्रभा अत्रे से शिव-स्तुति और लता मंगेशकर से लोरी सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की नई श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की दूसरी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के घर में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज हमने 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘संस्कार’ का एक गीत चुना है, जिसे रोशन ने राग भैरव के स्वरों में पिरोया है। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही इसी राग की एक रचना सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका डॉ. प्रभा अत्रे के स्वरों में हम प्रस्तुत कर रहे हैं।



लता मंगेशकर
र्ष 1949 में रोशन के संगीत निर्देशन में बनी पहली फिल्म ‘नेकी और बदी’ प्रदर्शित हुई थी। फ़िल्मकार केदार शर्मा द्वारा निर्मित यह फिल्म व्यावसायिक दृष्टि से असफल थी। किन्तु अगले वर्ष प्रदर्शित केदार शर्मा की ही फिल्म ‘बावरे नैन’ के गीतों ने खूब सफलता अर्जित की। इस फिल्म के संगीत ने रोशन को फिल्म जगत में स्थापित कर दिया। वर्ष 1951 में रोशन के संगीत से सजी तीन फिल्में प्रदर्शित हुई थी। केदार शर्मा की ही फिल्म ‘बेदर्दी’ में एक बार फिर मुकेश के लुभावने गीत थे। इसी फिल्म में रोशन ने अभिनेत्री निम्मी से भी एक गीत –“ननदिया जाने ना दर्द...” गवाया था। इस वर्ष की दूसरी फिल्म ‘हमलोग’ थी। इस फिल्म में भी मुकेश की आवाज़ थी। फिल्म में मुकेश के अलावा लता मंगेशकर, शमशाद बेगम और दुर्रानी की आवाज़ों में आकर्षक गीत थे। इसी वर्ष रोशन के संगीत निर्देशन में मुकेश द्वारा निर्मित फिल्म ‘मल्हार’ भी प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के गीतों में रोशन ने रागों का सुखद स्पर्श दिया था। इसी फिल्म से राग ‘गौड़ मल्हार’ पर आधारित गीत पर हम पिछले अंक में चर्चा कर चुके है। अगले वर्ष अर्थात 1952 में रोशन की पाँच फिल्में प्रदर्शित हुई थी। फिल्म ‘अनहोनी’ ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म थी, जिसमे राज कपूर ने अभिनय किया था। इस फिल्म में रोशन ने राज कपूर के लिए तलत महमूद की आवाज़ का चयन किया और सफल भी हुए। इस वर्ष की दूसरी फिल्म ‘संस्कार’ थी। इस फिल्म में भी तलत महमूद के गाये गीत थे। फिल्म के गीतकार शैलेन्द्र थे, जिन्होने एक से बढ़ कर एक गीतों की रचना की थी। इन गीतों में रोशन के संगीत में भी भरपूर रचनात्मकता के दर्शन होते हैं। सितार, बाँसुरी और सारंगी के अभिनव प्रयोग से इन गीतों को सजाया गया था। अपने संगीत शिक्षा काल में इसराज रोशन का प्रिय वाद्य रहा। गज से बजने वाले एक प्रमुख वाद्य सारंगी की शिक्षा उन्होने उस्ताद बुन्दु खाँ से प्राप्त की थी। इसीलिए उनके गीतों में सारंगी का सार्थक प्रयोग मिलता है। फिल्म ‘संस्कार’ में रोशन ने तलत महमूद की आवाज़ में एक खूबसूरत गजल –“मुहब्बत के झूठे सहारों ने लूटा...” भी स्वरबद्ध किया था। फिल्म में लता मंगेशकर ने भी उल्लेखनीय गीत गाये थे, जिनमें –“दो नैनों ने जाल बिछाया...”, -“दो नैना उलझ गए...” तथा –“हँसे टिम टिम टिम छोटे छोटे तारे...” काफी लोकप्रिय हुए थे। लता मंगेशकर की आवाज़ में गायी लोरी –हँसे टिम टिम...” में राग भैरव का स्पर्श है। हमारा आज का यही गीत है। पहले आप रोशन का स्वरबद्ध किया गया फिल्म ‘संस्कार’ से राग भैरव पर आधारित गीत सुनिए। शैलेन्द्र के गीत को लता मंगेशकर ने स्वर दिया है।

राग भैरव : “हँसे टिम टिम टिम छोटे छोटे तारे...” : लता मंगेशकर : फिल्म – संस्कार


राग भैरव भारतीय संगीत का एक प्राचीन राग है। यह इसी नाम से प्रचलित थाट भैरव से सम्बद्ध माना जाता है। अर्थात राग भैरव, थाट भैरव का आश्रय राग होता है। आश्रय राग उसे कहते हैं जब किसी थाट का नामकरण किसी प्रचलित राग के नाम के अनुसार किया गया हो। इस दृष्टि से राग भैरव, थाट भैरव का आश्रय राग कहलाता है। राग भैरव में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत स्वरों का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। इस राग की जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। विद्वानों ने इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल के सन्धिप्रकाश बेला को माना है। इस नियम के अनुसार राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल 4 से सात बजे के बीच किया जाता है। इस राग में ऋषभ और धैवत स्वरों पर आन्दोलन किया जाता है। अब हम आपको इसी राग में निबद्ध एक शास्त्रीय रचना सुनवाते हैं।

डॉ.प्रभा अत्रे
पिछले छह दशक की अवधि में भारतीय संगीत जगत की किसी ऐसी कलासाधिका का नाम लेना हो, जिन्होने संगीत-चिन्तन, मंच-प्रस्तुतीकरण, शिक्षण, पुस्तक-लेखन, शोध आदि सभी क्षेत्रों में पूरी दक्षता के साथ संगीत के शिखर को स्पर्श किया है, तो वह एक नाम विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे का ही है। प्रभा जी किराना घराने की गायकी का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रभा जी का जन्म महाराष्ट्र के पुणे शहर में 13 सितम्बर, 1932 को हुआ था। उनकी माँ इन्दिराबाई और पिता आबासाहेब बालिकाओं को उच्च शिक्षा दिलाने के पक्षधर थे। पारिवारिक संस्कारों के कारण ही आगे चल कर प्रभा अत्रे ने पुणे विश्वविद्यालय से विज्ञान विषयों के साथ स्नातक और यहीं से कानून में स्नातक की पढ़ाई की। इसके अलावा गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत अलंकार (स्नातकोत्तर) और फिर ‘सरगम’ विषय पर शोध कर ‘डॉक्टर’ की उपाधि से अलंकृत हुईं। यही नहीं उन्होने लन्दन के ट्रिनिटी कालेज ऑफ म्युजिक से पाश्चात्य संगीत का भी अध्ययन किया। कुछ समय तक उन्होने कथक नृत्य की प्रारम्भिक शिक्षा भी ग्रहण की। प्रभा जी के लिए ज्ञानार्जन के इन सभी स्रोतों से बढ़ कर थी, प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत ग्रहण की गई व्यावहारिक शिक्षा। गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत प्रभा जी को किराना घराने के विद्वान सुरेशबाबू माने और विदुषी (पद्मभूषण) हीराबाई बरोडकर से संगीत-शिक्षा मिली। कठिन साधना के बल पर उन्होने खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा, गजल, भजन आदि शैलियों के गायन में दक्षता प्राप्त की। मंच-प्रदर्शन के क्षेत्र में अपार सफलता मिली ही, संगीत विषयक पुस्तकों के लेखन से भी उन्हें खूब यश प्राप्त हुआ। उनकी प्रथम प्रकाशित पुस्तक का शीर्षक था ‘स्वरमयी’। इससे पूर्व उनके शोधकार्य का विषय ‘सरगम’ था। डॉ. प्रभा अत्रे ने कई प्रतिष्ठित पदों पर कार्य किया। आकाशवाणी में प्रोड्यूसर, मुम्बई के एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और संगीत-विभागाध्यक्ष, रिकार्डिंग कम्पनी ‘स्वरश्री’ की निदेशक आदि कई प्रतिष्ठित पदों को उन्होने सुशोभित किया। संगीत के प्रदर्शन, शिक्षण-प्रशिक्षण और संगीत संस्थाओं के मार्गदर्शन में आज भी संलग्न हैं। आइए, प्रभा जी के स्वर में राग भैरव में निबद्ध एक रचना सुनते हैं। यह आदिदेव शिव की वन्दना करती एक मोहक रचना है, जो द्रुत तीनताल और एकताल में निबद्ध है।

राग भैरव : ‘हे आदिदेव शिव शंकर, भोर भई जागो करुणाकर...’ : डॉ. प्रभा अत्रे



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 316वें अंक की पहेली में आज हम आपको छः दशक से भी अधिक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 320वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत में किस राग का आधार है? हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिखिए।

3 – यह किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 13 मई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 318वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 313वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको लगभग 66 वर्ष पूर्व की फिल्म ‘मल्हार’ के एक राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – गौड़ मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने प्रश्नों के सही उत्तर दिए हैं और इस सप्ताह के विजेता बने हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस अंक में हमने आपके लिए राग भैरव पर आधारित रोशन के एक गीत और राग भैरव की की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया। रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, May 1, 2016

राग रागेश्री : SWARGOSHTHI – 268 : RAG RAGESHRI





स्वरगोष्ठी – 268 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन -1 : मन्ना डे को जन्मदिन पर स्मरण

‘कौन आया मेरे मन के द्वारे पायल की झंकार लिये...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हमारी नई श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ का शुभारम्भ हो रहा है। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का भी सहयोग लिया है। आप सब संगीत-प्रेमियों का मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ श्रृंखला के प्रवेशांक में हार्दिक स्वागत करता हूँ। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर आधारित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की और फिर उस राग की जानकारी देंगे। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हमने राग रागेश्री में उनका स्वरबद्ध किया, फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ का एक गीत चुना है। इस गीत को पार्श्वगायक मन्ना डे ने स्वर दिया था। इस गीत को चुनने का एक कारण यह भी है कि आज के ही दिन वर्ष 1919 में मन्ना डे का जन्म हुआ था। आज मन्ना डे के 98वें जन्मदिन पर हम उन्हीं के गाये गीत से उनको स्वरांजलि अर्पित कर रहे हैं। राग रागेश्री पर आधारित फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ के गीत के साथ राग का स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम उस्ताद शाहिद परवेज का सितार पर बजाया राग रागेश्री भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 


"बहारें हमको ढूंढेंगी न जाने हम कहाँ होंगे...", संगीतकार मदन मोहन द्वारा स्वरबद्ध इस गीत के बोल उन्हीं पर किस शिद्दत से लागू होती है, यह बताने की ज़रूरत नहीं। आज उनके गाये हुए इतने दशक बीत जाने के बाद भी उनके गीतों के ज़रिए उनके अफ़साने बयाँ होते रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। मदन मोहन के फ़िल्मी गीतों की ख़ासियत यह रही है कि फ़िल्म संगीत को शास्त्रीय संगीत के रंग से ऐसे सजाया है कि एक एक रचना को सुन कर जैसे आत्मा तृप्त हो जाती है। इसी उद्देश्य से हम ’स्वरगोष्ठी’ में आज से शुरु कर रहे हैं संगीतकार मदन मोहन द्वारा स्वरबद्ध शास्त्रीय संगीत आधारित गीतों की एक श्रृंखला। शुरुआत किस गीत से की जाए? आज 1 मई है, सुविख्यात गायक मन्ना डे का जन्मदिवस। तो क्यों ना मदन मोहन और मन्ना डे के सुरीले संगम से उत्पन्न एक अनमोल मोती प्रस्तुत किया जाए। हिन्दी फ़िल्मी गीतों में शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत गाने वाले पुरुष गायकों में मन्ना डे का कोई सानी नहीं। ना उस ज़माने में कोई था, और इस ज़माने में तो सवाल ही नहीं। जब भी कभी शास्त्रीय राग आधारित रचना की सिचुएशन किसी फ़िल्म में आती, तब मन्ना डे ही संगीतकारों की पहली पसन्द होते। मदन मोहन ने भी उनसे कई गीत गवाए हैं। 1957 में एक फ़िल्म बनी थी ’देख कबीरा रोया’ जिसमें लगभग सभी गीत शास्त्रीय रागों पर आधारित थे। तीन गीत तो एक के बाद एक फ़िल्म में आते हैं, पहला "मेरी वीणा तुम बिन रोये" (लता), दूसरा "अश्कों से तेरी हमने तसवीर बनायी है" (आशा) और तीसरा गीत है "तू प्यार करे या ठुकराये" (लता)। ये तीन गीत क्रम से राग अहीर भैरव, पहाड़ी और भैरवी पर आधारित थे, और ये फ़िल्माये गये, क्रम से, अमिता, अनीता गुहा और शुभा खोटे पर। लता की आवाज़ में फ़िल्म का एक अन्य गीत "लगन तोसे लगी बलमा" भी एक सुन्दर रचना थी राग तिलंग पर आधारित। मदन मोहन के शुरुआती सफ़र में उन पर यह आरोप लगा था कि वो हमेशा गायिका-प्रधान गीतों की रचना करते हैं। सारे इलज़ामों को शान्त करते हुए जब उन्होंने ’देख कबीरा रोया’ में "कौन आया मेरे मन के द्वारे" (मन्ना डे) और "हमसे आया ना गया" (तलत महमूद) जैसे गीतों की रचना की तब सभी आलोचकों ने चुप्पी साध ली।

"कौन आया मेरे मन के द्वारे" गीत तो बेहद लोकप्रिय हुआ था जिसे मन्ना डे के श्रेष्ठ गीतों में भी माना जाता है। एक साक्षात्कार में मन्ना दा ने राग रागेश्री पर आधारित इस गीत के बारे में कहा था कि मदन मोहन ने उनसे इस गीत को गाते समय विशेष ध्यान रखने को कहा था क्योंकि यह रचना उनके दिल के बहुत क़रीब थी। मन्ना डे की आवाज़ में इसी फ़िल्म में एक और उल्लेखनीय रचना थी "बैरन हो गई रैना" जो राग जयजयवन्ती का एक बहुत उत्कृष्ट उदाहरण है। इस गीत को सुनते हुए ऐसा लगता है कि यह कोई फ़िल्मी गीत ना होकर शास्त्रीय संगीत की कोई रचना हो। मदन मोहन की मृत्यु के बाद उनको समर्पित एक कार्यक्रम में उन्हें याद करते हुए मन्ना डे ने कहा था - एक महान संगीतकार, मदन साहब, मदन मोहन। मदन मोहन गाने तो लाजवाब बनाते ही थे, साथ ही साथ खाना भी बहुत अच्छा पका लेते थे। और ख़ास कर के एक चीज़ जो बनाते थे, लाजवाब, वह शायद आप भी खाये होंगे, वह है भिंडी-मटन। यानी कि भिंडी और मटन, दोनों को मिला कर मदन साहब बनाते थे। एक मरतबा मुझे टेलीफ़ोन करके कहा कि मन्ना, क्या कर रहा है? मैंने कहा कि कुछ भी नहीं कर रहा हूँ, बैठा हूँ। कहने लगे, क्या बैठा है, चल आजा मेरे घर। उन दिनों मैं रहता था बान्द्रे में, मदन मोहन साहब रहते थे पेडर रोड पे। तो गाड़ी निकाल कर मैं चला गया मदन साहब के पास। और मदन साहब बना रहे थे मटन के साथ भिंडी। मैंने बोला कि यह क्या कम्बिनेशन है भई, मटन के साथ भिंडी? कहा कि खा के तो देख, फिर मालूम पड़ेगा! वाक़ई, बहुत बहुत बढ़िया भिंडी-मटन खिलाया उन्होंने। साथ ही साथ उन्होंने कहा कि एक गाना है। और वह गाना था "कौन आया मेरे मन के द्वारे...”। मदन मोहन का भिंडी-मटन जितना स्वादिष्ट बना था, उतना ही मधुर बना था ’देख कबीरा रोया’ का यह गीत। लीजिए, अब आप यह गीत सुनिए।


राग रागेश्री : ‘कौन आया मेरे मन के द्वारे...’ : मन्ना डे : फिल्म – देख कबीरा रोया



फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ के इस गीत के बारे में सुप्रसिद्ध संगीत विदुषी अलका देव मारुलकर ने कहा था- ’देख कबीरा रोया’ में रागेश्री राग पर आधारित एक गीत है जिसमें switch-overs भी नाट्यपूर्ण तरीके से आया है। रागेश्री और बागेश्री दोनों बहने हैं, जिनमें थोड़ा फ़र्क है। फ़र्क यह है कि बागेश्री में कोमल गान्धार के साथ पंचम लगता है और रागेश्री में कोमल गान्धार तो होता है लेकिन पंचम वर्जित होता है, कोई कोई इसमें शुद्ध निषाद भी लगाते हैं। मन्ना डे के गाए इस गीत के दूसरे अन्तरे में तीव्र मध्यम का सुन्दर प्रयोग मन्ना दा ने किया है, जिसमें मिश्र गारा की छाया भी दिखाई पड़ती है।

यह गीत राग रागेश्री पर आधारित है। भारतीय संगीत में राग रागेश्री को खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। राग की जाति औड़व-षाड़व होती है, अर्थात, आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग में निषाद स्वर कोमल होता है। पंचम स्वर वर्जित होता है। आरोह में पंचम के साथ ऋषभ स्वर भी वर्जित होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इसमें गान्धार स्वर वादी और निषाद स्वर संवादी होता है। राग रागेश्री के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना गया है। राग रागेश्री का एक दूसरा प्रकार भी प्रचलित है। इस प्रकार के आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। परन्तु मन्द्र सप्तक में हमेशा कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। कोमल निषाद की रागेश्री अधिक प्रचलित है। अब हम आपको उस्ताद शाहिद परवेज़ से सितार पर राग रागेश्री की तीनताल में निबद्ध एक गत सुनवाते है। आप इसे सुनिए और फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ के गीत के स्वरों को इस सितार की रचना में पहचानने का प्रयास कीजिए। साथ ही इसी प्रस्तुति के साथ हमें आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


राग रागेश्री : सितार पर तीनताल में निबद्ध गत : उस्ताद शाहिद परवेज़




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 268वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको संगीतकार मदन मोहन के संगीत से सजे एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को ध्यान से सुनिए और बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका को पहचान सकते हैं? इस गायिका का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 7 मई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 266 की संगीत पहेली में हमने आपको 1964 में प्रदर्शित भोजपुरी फिल्म ‘बिदेशिया’ से चैती शैली पर आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दीपचन्दी और कहरवा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- मात्राएं – 14 और 8 या 4 तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका – सुमन कल्याणपुर

लगता है इस बार की पहेली हमारे प्रतिभागियों के लिए कुछ कठिन थी। इस बार मात्र तीन प्रतिभागियों ने उत्तर दिया है। इनमे से दो प्रतिभागियों ने केवल पहले और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर दिया है। तीसरी प्रतिभागी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने ही गायिका सुमन कल्याणपुर की आवाज़ को पहचाना है, किन्तु पहले और दूसरे प्रश्नों का अधूरा जवाब दिया है। इस प्रकार हरिणा जी को दो अंक दिये जाते हैं। दो अंक पाकर हमारे अन्य विजेता हैं- पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आज से हमारी नई श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ का शुभारम्भ हो रहा है। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। श्रृंखला के इस अंक में हमने आपसे राग रागेश्री पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को श्रृंखला के नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



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