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Saturday, July 31, 2010

'ओल्ड इज़ गोल्ड' - ई-मेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें - ०१

नमस्कार दोस्तों! आज आप मुझे यहाँ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के स्तंभ में देख कर हैरान ज़रूर हो रहे होंगे कि भई शनिवार को तो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल नहीं सजती है, तो फिर यह व्यतिक्रम कैसा! है न? दरअसल बात कुछ ऐसी है कि जब से हमने 'ओल इज़ गोल्ड' को दैनिक स्तंभ से बदल कर सप्ताह में पाँच दिन कर दिए हैं, हम से कई लोगों ने समय समय पर इसे फिर से दैनिक कर देने का अनुरोध किया है। हमारे लिए यह आसान तो नहीं था, क्योंकि अपनी रोज़-मर्रा की व्यस्त ज़िंदगी से समय निकाल कर ऐसा करना ज़रा मुश्किल सा हो रहा था, लेकिन आप सब के आग्रह और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आपकी दिलचस्पी को हम नज़रंदाज़ भी तो नहीं कर सकते थे। इसलिए हमें एक नई बात सूझी। और वह यह कि कम से कम शनिवार को हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल सजाएँगे ज़रूर, लेकिन उस स्वरूप में नहीं जिस स्वरूप में रविवार से गुरुवार तक सजाते हैं। बल्कि क्यों ना कुछ अलग हट के किया जाए इसमें। नतीजा यह निकला कि आज से सम्भवत: हर शनिवार की शाम यह ख़ास महफ़िल सजेगी, जो कहलाएगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें'।

'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' एक तरह से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का साप्ताहिक विशेषांक होगा जिसमें बातें होंगी आपकी, आपके मनपसंद गीतों की, उनसे जुड़ी हुई आपकी यादों की। इसके अलावा आप पुराने फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों के बारे में जो भी विचार रखना चाहें इस विशेषांक के लिए भेज सकते हैं। इस स्तंभ में आगे चलकर हम पुराने फ़िल्मी गीतों से जुड़े पहलुयों पर बहस भी करेंगे जैसे कि डिबेट में होता है, और भी कई नई चीज़ें शामिल होंगी इन विशेषांकों में। तो आपको बस इतना करना होगा कि अपने विचार, अपने पसंद के गानें और उनसे जुड़ी बातें और यादें, या फिर फ़िल्म-संगीत से जुड़ी आपका कोई भी अनुभव या संस्मरण या फ़ोटो हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर लिख भेजना होगा, और हम उन्हे पेश करेंगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के इस ख़ास अलबेले, सजीले, सुरीले विशेषांक में जिसका नाम है 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें'।

यह तो थी इस विशेषांक के स्वरूप और नियमों की जानकारी। तो आइए अब शुरु किया जाए 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' की पहली कड़ी। आज का यह अंक रोशन है हमारे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के एक वरिष्ठ श्रोता व पाठिका की यादों के उजालों से। आप हैं हम सब की प्यारी गुड्डो दादी, जो रहती हैं अमरीका के शिकागो शहर में। गुड्डो दादी ने समय समय पर हमें टेलीफ़ोन कर और ईमेल के ज़रिए हमारा हौसला बढ़ाया है, हमारी तारीफ़ें की हैं, और अपनी स्नेहाशीष दी है। दादी से हमें पता चला कि गुज़रे ज़माने के कई फ़िल्मी कलाकारों से उनके परिवार का संबंध रहा है। उनके और उनके परिवार की कई तस्वीरें भी हैं जिनमें फ़िल्म जगत के नामचीन हस्तियों के चेहरे नज़र आ जाते हैं। ऐसी ही एक तस्वीर उन्होने हमें भेजी हैं जिसमें वो नज़र आ रही हैं गायिका सुरिंदर कौर के एक कार्यक्रम का आनंद उठाते हुए.


दरअसल हुआ युं था कि जब हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में 'दुर्लभ दस' के अंतर्गत सुरिंदर कौर का गाया फ़िल्म 'नदिया के पार' का गीत सुनवाया था "अखियाँ मिलाके अखियाँ", उसे सुन कर दादी की उस ज़माने की यादें ताज़ा हो गईं, और ईमेल के माध्यम से उन्होने अपने विचार कुछ इस तरह से व्यक्त किये - "आपके पास तो कुबेर का ख़ज़ाना है। सुरिंदर कौर जी का गीत सुनवाकर कहाँ पहुँचा दिया सितारों से आगे! सुरिंदर कौर जी का शो १९६७ में दिल्ली के रिज़र्व बैंक के आगे जिसका चित्र भी भेज रही हूँ। १९५२ से जानती हूँ सुरिंदर कौर जी को और उनकी बहन प्रकाश कौर जी को। इस चित्र में साथ में बेटी है और दूसरी ओर मुंह किये बेटा बैठा है।" दोस्तों, क्योंकि यह अंक यादों के ख़ज़ाने को और ज़्यादा समृद्ध करने का है, और गुड्डो दादी की यादें हम अनुभव कर रहे हैं जो रहती हैं अमरीका में, तो क्यों ना सुरिंदर कौर के गानें किस तरह से 'वॊयस ऒफ़ अमेरिका' पर बजाया गया था ३१ दिसंबर १९९२ को, उसका एक ज़िक्र यहाँ पेश किया जाए। यह जानकारी हमने प्राप्त की है 'लिस्नर्स बुलेटिन' के अंक-९१ से जो प्रकाशित हुआ था मार्च १९९३ में। रेडियो सीलोन पर १५-१६ वर्षों तक कार्य करने के बाद १९८४-८५ से Voice of America (VOA), वाशिंगटन में कार्यरत श्रीमती विजयलक्ष्मी डिसेरम एक अनोखी उद्‍घोषिका हैं। वे 'मनोरंजन' एवं 'संगीतकार' कार्यक्रमों में अक्सर हिंदी फ़िल्मों के गायकों, संगीतकारों, निर्माता-निर्देशकों, आदि पर प्रोग्राम पेश करती आईं हैं। ३१ दिसंबर १९९२ को इन्होंने गायिका सुरिंदर कौर के गाए हमेशा जवान गीतों को लेकर एक आकर्षक कार्यक्रम पेश किया था। गायिका के बारे में उन्होंने संगीतकार एस. मोहिंदर तथा 'हिंदी फ़िल्म गीत कोश' के संकलक हर मंदिर सिंह 'हमराज़' के विचार प्रस्तुत कर प्रोग्राम में चार चांद लगा दिए। गायिका सुरिंदर कौर के बारे में नई जानकारी देते हुए 'हमराज़' साहब ने बताया कि उनका गाया प्रथम गीत "इतने दूर है हुज़ूर, कैसे मुलाक़ात हो" (फ़िल्म- प्यार की जीत, '४९) था, न कि "बदनाम ना हो जाए मोहब्बत का फ़साना" (फ़िल्म- शहीद, '४९)। दरअसल 'प्यार की जीत' के लिए ही उन्होंने सब से पहले गीत गाए थे लेकिन उसी वर्ष निर्मित 'शहीद' (जिसमें उन्होंने बाद में गीत गाए) पहले रिलीज़ हो जाने के कारण यह भान्ति पैदा हो गई थी। तो दोस्तों, आइए आज के इस विशेषांक में सुना जाए सुरिंदर कौर की आवाज़ में फ़िल्म 'शहीद' के उसी हिट गीत को जिसके बोल हैं "बदनाम ना हो जाए मोहब्बत का फ़साना"।



तो ये था आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' जिसमें हमने गुड्डो दादी की यादों का सहारा लेकर गायिका सुरिंदर कौर को याद किया।

और अब एक सूचना: १४ अगस्त शनिवार को स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें' में हम चढ़ाएँगे देश भक्ति रंग। आपको इतना करना है कि इस ख़ास दिन से जुड़ी अपने बचपन की यादों को हमारे साथ बांटिए। कैसे मनाया करते थे इस पर्व को? बचपन में कौन कौन सी देश भक्ति और बच्चों की फ़िल्में देखी है आपने? कौन सा देश भक्ति गीत आपको सब से ज़्यादा पसंद है? देश भक्ति और देश भक्ति फ़िल्मों और गीतों से जुड़ी कोई भी याद, कोई भी संस्मरण आप हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिए अगले ७ दिनों के अंदर। आपकी यादों को हम पूरी दुनिया के साथ बांटेंगे १४ अगस्त की शाम।

अब आज के लिए इजाज़त दीजिए, कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमित अंक के साथ पुन: हाज़िर होंगे। मोहम्मद रफ़ी साहब को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धा सुमन अर्पित हुए और यह भी बताते हुए कि कल के अंक में आप रफ़ी साहब की ही आवाज़ सुनेंगे, आपसे आज विदा ले रहे हैं, नमस्कार!



प्रस्तुति: सुजॊय चटर्जी

Tuesday, June 15, 2010

"अखियाँ मिलाके अखियाँ" - गायिका सुरिंदर कौर की पुण्यतिथि पर 'आवाज़' की श्रद्धांजली

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 418/2010/118

भी कल यानी १४ तारीख़ को पुण्यतिथि थी इस गायिका की. ५ साल पहले, आज ही के दिन, सन् २००६ को पंजाब की कोकिला सुरिंदर कौर की आवाज़ हमेशा के लिए ख़ामोश हो गई थी। गायिका सुरिंदर कौर के गाए अनगिनत पंजाबी लोक गीतों को पंजाबी संगीत प्रेमी आज भी बड़े चाव से सुनते हैं और उनको याद करते हैं। सन् १९४७-४८ से लेकर १९५२-५३ के मध्य उन्होने हिंदी फ़िल्मों में पार्श्व गायन करके काफ़ी ख्याति प्राप्त की थी। ४० के दशक का वह ज़माना पंजाबी गायिकाओं का ज़माना था। ज़ोहराबाई, नूरजहाँ, शम्शाद बेग़म जैसी वज़नदार आवाज़ों के बीच सुरिंदर कौर ने भी अपनी पारी शुरु की। लेकिन जल्द ही पतली आवाज़ वाली गायिकाओं का दौर शुरु हो गया और ५० के दशक के शुरुआती सालों से ही इन वज़नदार और नैज़ल गायिकाएँ पीछे होती चली गईं। आज 'दुर्लभ दस' शृंखला के अंतर्गत हम लेकर आए हैं सुरिंदर कौर की आवाज़ में १९४८ की फ़िल्म 'नदिया के पार' का गीत "अखियाँ मिलाके अखियाँ"। यह 'आवाज़' की तरफ़ से इस सुरीली गायिका को श्रद्धांजली है उनके स्मृति दिवस पर। दोस्तों, इस आलेख के लिए खोज बीन करते वक़्त मुझे पता चला कि सुरिंदर कौर जी की बेटी डॊली गुलेरिया, जो ख़ुद भी एक गायिका हैं, पंचकुला (हरियाणा) में रहती हैं। और संयोग की बात देखिए कि मैं भी आजकल पंचकुला में ही स्थित हूँ। दोस्तों, मैं ज़रूर कोशिश करूँगा कि डॊली जी का पता लगा सकूँ और संभव हुआ तो उनसे मिलकर सुरिंदर कौर जी के बारे में और क़रीब से जान सकूँ, उनके जीवन के अनछुए पहलुओं से आपका परिचय करवा सकूँ।

सुरिंदर कौर का जन्म २९ नवंबर १९२९ को लाहौर में एक सिख परिवार में हुआ था। लाहौर में रहते हुए उन्होने पढ़ाई के साथ साथ संगीत की शिक्षा भी ग्रहण की। कई दशक पूर्व अपनी बड़ी बहन प्रकाश कौर के साथ मिलकर गाया था एक पंजाबी युगल गीत - "मावां ते धीयां रल बैठियां नी माय", जो बहुत मशहूर हो गया था। भारत विभाजन के बाद उनका परिवार दिल्ली आ गया। अपनी बहन से मिलने जब वे बम्बई गईं तो संगीतकार ग़ुलाम हैदर, जो उनके परिवार को लाहौर के दिनों से जानते थे, ने उन्हे अपनी फ़िल्म 'शहीद' में गाने का निमंत्रण दिया। फ़िल्म 'शहीद' के प्रदर्शित होते ही उनके गीतों ने धूम मचा दी और वो एक गायिका के रूप में प्रसिद्ध हो गईं। 'शहीद' १९४८ की फ़िल्म थी। इस साल उन्होने जिन अन्य फ़िल्मों के लिए पार्श्वगायन किया, वे थीं - 'लाल दुपट्टा', 'नदिया के पार', 'नाव', एवं 'रूपरेखा'। तत्कालीन प्रतिष्ठित संगीतकार ज्ञान दत्त ने गायिका सुरिंदर कौर की आवाज़ से आकर्षित होकर उनसे अपनी दो फ़िल्मों 'लाल दुपट्टा' (५ गीत) और 'नाव' (६ गीत) में गीत गवाए। फ़िल्म 'रूपरेखा' में पं अमरनाथ ने भी उनके स्वर का उपयोग किया था "नैन मिलन की बात" गीत में, जिसमें सुरिंदर जी का साथ मुनव्वर सुल्ताना और विद्यानाथ सेठ ने भी दिया था। संगीतकार सी. रामचन्द्र ने सुरिंदर कौर से 'नदिया के पार' में एक एकल गीत गवाया था जिसे आज हम आपको सुनवा रहे हैं। दोस्तों, सुरिंदर कौर से संबंधित ये तमाम जानकारियाँ हमने बटोरी है हरमंदिर सिंह 'हमराज़' द्वारा प्रकाशित 'लिस्नर्स बुलेटिन' के अंक क्रमांक १३२ से जो कानपुर से प्रकाशित हुई थी अक्तुबर २००६ को। तो आइए कामिनी कौशल पर फ़िल्माया हुआ फ़िल्म 'नदिया के पार' का यह गीत सुनें और श्रद्धा सुमन अर्पित करें सुरिंदर कौर की संगीत साधना को।



क्या आप जानते हैं...
कि गायिका सुरिंदर कौर की बेटी डॊली गुलेरिया आज के दौर की एक मशहूर पंजाबी लोक गायिका हैं जिनके स्टेज शोज़ काफ़ी लोकप्रिय हुआ करते हैं।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस गीत की जो गायिका हैं उन्होने रफ़ी साहब के साथ १९७४ में एक फ़िल्म का शीर्षक गीत गाया था, जिस फ़िल्म के शीर्षक में चार शब्द हैं और जिसके दूसरे शब्द में किसी रंग का ज़िक्र है। गायिका का नाम बताएँ। ३ अंक।

२. इस फ़िल्म के शीर्षक में उस जंगली हीरो का नाम आता है जिन पर समय समय पर बहुत सी फ़िल्में बनीं हैं, और जिनमें से एक फ़िल्म में उनका किरदार हेमन्त बिरजे ने निभाया था। फ़िल्म का नाम बताएँ। २ अंक।

३. इस गीत के मुखड़े की पहली पंक्ति में ही दो ऐसे महत्वपूर्ण शब्द आते हैं जो शब्द आशा भोसले और दिलराज कौर की गाई राहुल देव बर्मन द्वारा स्वरबद्ध एक बेहद सुपर हिट फ़िल्म के सुपर हिट गीत में आते हैं। गीत के बोल बताएँ। ३ अंक।

४. इस गीत को लिखा है अज़ीज़ ग़ाज़ी ने। आप बताइए संगीतकार का नाम। ४ अंक।

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम -

वाह भाई मान गए आप तीनों को, इतने मुश्किल सवालों के जवाब दिए हैं कि क्या कहने....शरद जी, इंदु जी और अवध जी को बहुत बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, April 17, 2009

किन्नी बीती ते किन्नी बाकी ऐ..मैनू ऐ हो हिसाब ले बैठा....

पंजाबी शायर और कवि शिव कुमार बटालवी पर विशेष. दीप जगदीप बाँट रहे है अपने अनुभव बटाला शहर के

यौवन की ऋतु में जो भी मरता है,
वह या तो फूल बन जाता है या तारा।
यौवन की ऋतु में आशिक़ मरता है
या फिर करमों वाला।

- शिव बटालवी

हमारे यहां बहुत उम्‍दा कवि हुए हैं, लेकिन ऐसे कम ही हैं, जिन्‍हें लोगों का इतना प्यार मिला हो। हिंदी में बच्चन को मिला, उर्दू में ग़ालिब और फ़ैज़ को. अंग्रेज़ी में कीट्स को. स्पैनिश में नेरूदा को. पंजाबी में इतना ही प्यार शिव को मिला. शिव कुमार बटालवी. शिव हिंदी में कितना आया, यह अंदाज़ नहीं है. पंजाब आने से पहले मैंने सिर्फ़ शिव का नाम पढ़ा था. इतना जानता था कि कोई मंचलूटू गीतकार था. पर शिव सिर्फ़ मंच नहीं लूटता. उसकी साहित्यिक महत्ता भी है. उसे पढ़ने, सुनने के बाद यह महसूस होता है. वह अकेला कवि है, जिसकी कविता मैंने अतिबौद्धिक अभिजात अफ़सरों के मुंह से भी सुनी है और साइकिल रिक्शा खींचने वाले मज़दूर के मुंह से भी. ऐसी करिश्माई बातें हम नेरूदा के बारे में पढ़ते हैं. पंजाब में वैसा शिव है.

1973 में जब शिव की मौत हुई, तो उसकी उम्र महज़ 36 साल थी। उसने सक्रियता से सिर्फ़ दस साल कविताएं लिखीं. इन्हीं बरसों में उसकी कविता हर ज़बान तक पहुंच गई. 28 की उम्र में तो उसे साहित्य अकादमी मिल गया था. प्रेम और विरह उसकी कविता के मूल स्वर हैं. वह कविता में क्रांति नहीं करता. मनुष्य की आदत, स्वभाव, प्रेम, विरह और उसकी बुनियादी मनुष्यता की बात करता है. वह लोककथाओं से अपनी बात उठाता है और लोक को भी कठघरे में खड़ा करता है. जिस दौर में लगभग सारी भारतीय भाषाओं में कविता नक्‍सलबाड़ी आंदोलन से प्रभावित थी, शिव बिना किसी वाद में प्रवेश किए एक मेहनतकश आदमी की संवेदनाओं और भावनात्मक विश्वासों की बात कर रहा था. इसीलिए पंजाबी कविता के प्रगतिशील तबक़े ने शिव को सिरे से ख़ारिज कर दिया. हालांकि उसकी कविता इतनी ताक़तवर है कि अब तक लोकगीतों की तरह सुनी-गाई जाती है.

शिव की दीवानगी का सिलसिला मेरी जवानी के साथ ही शुरू हुआ और कब ये इश्क पागलपन तक पहुंच गया,खुद मुझे मालूम नहीं। तीन साल पहले की बात है, पता चला कुछ साहित्यकार दोस्त बटाला जा रहे हैं। मैंने एक दम कह दिया मैं भी चलूंगा, वहां पर साहित्य समारोह था, सभी उसमें शिरकत करने जा रहे थे। मुझे कवि गुरभजन गिल ने कहा सुबह 6 बजे जाना होगा, तुम पंजाबी भवन पहुंच जाना। अगली सुबह मैं छह से पहले वहां पहुंच गया। इसे मेरी खुशनसिबी समिझए कि जिस होटल में ये कार्यक्रम था, उसके ठीक सामने शिव की याद में एक ऑडिटोरियम बन रहा था। दो बार नींव पत्थर रखे जाने के बावजूद उसकी हालत पखाने से बद्दतर थी। जंग लगे बड़े से गेट पर ताला लटक रहा था। डा.जगतार धीमान ने मुझे दीवार फांद अंदर जाने की सलाह दी, वो भी मेरे साथ हो लिए। बीस पच्चीस कदम दीवार पर चलने के बाद हम अंदर के दरवाजे के सामने पहुंच कर नीचे कूद गए। ऑडिटोरियम में अंधेरा था और बैठने वाली सीढि़यों के दायरे के रुप में सीमेंट ईंट का ढांचा खड़ा था। उसके बीच मिट्टी के ढेर पड़े थे। बीचों बीच दो ढेर बिल्कुल गोल पहाड़ी की तरह करीब 5 फुट उंचाई तक होंगे, मैं यूं ही मस्ती में उन पर कोहनी रख कर खड़ा हो गया। धीमान साहब फोटो खींचने में बिजी थे, अचानक उनकी नजर मुझ पर पड़ी तो चेताने वाले लहजे में बोले वहां से हट जा उसमें सांप हो सकता हैं। मैं हैरान था, मुझे पता चला ये सांप की बाम्बियां है। वहां से हटने से पहले ही मेरे दिमाग में बात गूंज गई कि शिव जिंदगी भर अपने गीतों में सांप और उनकी वर्मियों की बातें करता रहा और आज वह उसकी अधूरी खंडहर यादगार पर भी कुंडली मारे बैठे हैं, मैंने उन्हीं के साथ फोटो खिचवाई। अफसोस के वो फोटो आज तक नहीं मिल सके।

उसी दोपहर को बटाले वाले सुभाष कलाकार और रंधावा के साथ हम शिव का घर देखने गए। घर बंद पड़ा था,जो कोई वहां पर रहता था, मौजूद नहीं था। पड़ोसियों ने मेरी आंखों की अकांक्षा समझ ली शायद और उनके घर की सीढि़यां चढ़ कर दीवार फांद कर हम शिव के उस छोटे से चौबारे में पहुंचे, जहां पर कहते हैं शिव ने कई खूबसूरत शामें गुजारी हैं। बिल्कुल खाली पड़ा कमरा, गली को खुलती लोहे की सलाखों वाली खिड़की और ठंडा सीमेंट का फर्श। कुछ पल खिड़की के पार झांकते हुए मैंने सोचा शायद शिव भी यूं अपना शहर यहां से देखता होगा। फिर न जाने क्या सूझी के ठंडे फर्श पर मैं लेट गया। एक पल लगा मानों मैं हल्का पंख हो गया फर्श की ठंडक भरी गोद में यूं लगा शिव की गोद में सो रहा हूं। आवाज गूंजी "चलो चलें" तो मेरा ख्वाब टूटा भीगी पलकों के साथ खड़ा हुआ, तो दो बूंदें फर्श पर गिर पड़ी, मुझे याद आ गया शिव ने कहा था, "भट्ठी वालिए चम्बे दिए डालिए पीड़ां दा परागा भुन दे, तैनूं देआं हंझूआं दा भाड़ा...". अंदर से आवाज गूंजी शिव तेरे फर्श पर दो पल सकून के गुजारने का भाड़ा मेरे दो आसूं रख लेना शायद यही मेरे लिए तसल्ली की बात थी कि "पीड़ां दा परागा" भुनाने के बदले आंसूओं का भाड़ा देने वाले शिव को मैंने उसी का सरमाया लौटाया है।

आज हम आवाज़ के श्रोताओं के लिए लाये हैं शिव के गीत, जिन्हें अलग अलग फनकारों ने अपनी आवाजों से सजाया है. जिन्हें पंजाबी आती है उनके लिए तो ये संकलन एक शानदार तोहफा है ही, भाषा पर पकड़ न रखने वालों के लिए भी उन्हें सुनना एक यादगार अनुभव होगा, ऐसा हमारा दावा है. तो शुरू करते है "भट्ठी वालिए चम्बे दिए डालिए पीड़ां दा परागा भुन दे, तैनूं देआं हंझूआं दा भाड़ा..." से, फनकार है सतबीर कौर.


सुरिंदर कौर की आवाज़ में सुनिए - "गमां दी रात लम्बी ऐ..." और चित्र सिंह की आवाज़ में "गीतां वे चुंज भरी..."




जगजीत सिंह से सुनिए "एक शिकरा यार बनाया..." और "रोग बन के रह गया है इश्क तेरे शहर का..."




कुलदीप दीपक ने एक पूरी एल्बम उन्हें समर्पित किया है, जिसके कुछ हिस्से यहाँ पेश हैं -


और अब सुनिए खुद शिव की आवाज़ में ये गीत -
मैनू तेरा शबाब ले बैठा,
रंग गोरा गुलाब ले बैठा,
मैंनू जद वी तुसी हो याद आए,
दिन दिहाडे शराब ले बैठा,
किनी बीती ते किनी बाकी ऐ,
मैनू ऐ हो हिसाब ले बैठा.....




प्रस्तुति - गीत चतुर्वेदी के साथ जगदीप सिंह

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