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Monday, January 24, 2011

नैना बरसे रिमझिम रिमझिम.....मदन मोहन साहब का रूहानी संगीत और लता की दिव्य आवाज़ ...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 577/2010/277

हालाँकि हमने या आपने कभी भूत नहीं देखा है न महसूस किया है, लेकिन आये दिन अख़बारों में या किसी और सूत्र से सुनाई दे जाती है लोगों के भूत देखने की कहानियाँ। भूत-प्रेत की कहानियाँ सैंकड़ों सालों से चली आ रही है, लेकिन विज्ञान अभी तक इसके अस्तित्व की व्याख्या नहीं कर सका है। कई लोग अपने कैमरों में कुछ ऐसी तस्वीरें क़ैद कर ले आते हैं जिनमें कुछ अजीब बात होती है। वो लाख कोशिश करे उन तस्वीरों को भूत-प्रेत के साथ जोडने की, लेकिन हर बार यह साबित हुआ है कि उन तस्वीरों के साथ छेड़-छाड़ हुई है। अभिषेक अगरवाल एक ऐसे शोधकर्ता हैं जिन्होंने भूत-प्रेत के अस्तित्व संबंधी विषयों पर ना केवल शोध किया है, बल्कि एक पुस्तक भी प्रकाशित की है 'Astral Projection Underground' के शीर्षक से। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का इस अजीब-ओ-ग़रीब लघु शृंखला में जिसका नाम है 'मानो या ना मानो'। आज के अंक में हम अभिषेक अगरवाल के उसी शोध में से छाँट कर कुछ बातें आपके सम्मुख रखना चाहते हैं। अभिषेक के अनुसार अगर हम 'Law of Thermodynamics' को एक अन्य नज़रिये से देखें, तो शायद कुछ हद तक इस निश्कर्ष तक पहूँच सकें कि आत्मा का अस्तित्व संभव है। अगर पूरी तरह से निश्कर्ष ना भी निकाल सके, लेकिन कुछ नये प्रश्न ज़रूर सामने आ सकते हैं। और इन प्रश्नों के जवाबों को ढ़ूंढते हुए शायद हम यह साबित कर सकें कि आत्मा का अस्तित्व असंभव नहीं। अब पहला सवाल तो यही है कि आख़िर यह 'Law of Thermodynamics' है क्या चीज़? मध्याकर्षण के नियमों में यह सब से महत्वपूर्ण नियम है, और इस नियम को ध्यानपूर्वक अध्ययन किया जाये तो यह साबित हो जाता है कि आदमी के मरने के बाद उसकी आत्मा नहीं मरती। यह नियम कहती है कि ऊर्जा को ना तो पैदा की जा सकती है, और ना ही नष्ट किया जा सकता है, उसे बस एक स्थिति से दूसरी स्थिति में परिवर्तित किया जा सकता है (Energy can neither be created nor destroyed; it can only change form.) तो हमारी जो सांसें चलती हैं, हमारी जो आत्मा है, वह भी तो एक तरह का ऊर्जा ही है; तो फिर वो कैसे नष्ट हो सकती है! जीव-विज्ञान कहती है कि मृत्यु के बाद जीव देह सड़ जाती है क्योंकि अलग अलग तरह के जीवाणु उस देह को अपना भोजन बनाते है। और इस तरह से जीव-ऊर्जा एक स्थिति से दूसरी स्थिति में आ पहुँचता है। लेकिन उस मस्तिष्क की बुद्धि का क्या जो हमें हमारा परिचय देती है? क्या हर जीव के अंदर शारीरिक शक्ति के अलावा भी एक और शक्ति नहीं है? हमारी बुद्धि, हमारी आत्मा? क्या ये भी जीवाणुओं के पेट में चली जाती है या इनका कुछ और हश्र होता है? इस पैरनॊर्मल जगत को हम तभी गले लगा सकते हैं जब हम खुले दिमाग और मन से इस बारे में सोच विचार और मंथन करेंगे। दोस्तों, अभिषेक पिछले १५ सालों से पैरनॊर्मल गतिविधियों पर शोध कर रहे हैं। कुछ अन्य शोधकर्ताओं का यह कहना है कि वो लोग जो भूत देखने का दावा करते हैं, वो दरअसल मानसिक रूप से कमज़ोर होते हैं। वो बहुत ज़्यादा उस बारे में सोचते हैं जिसकी वजह से उन्हें कई बार भ्रम हो जाता है और उन्हें उनकी सोच हक़ीक़त में दिखाई देने लगती है। यानी कि भूत दिखाई देना एक तरह की मानसिक विकृति है। एक और दृष्टिकोण के अनुसार इस बिमारी को 'Sleep Paralysis' कहते हैं जिसमें आदमी नींद से जग तो जाता है लेकिन हिल नहीं सकता। तब उन्हें ऐसा लगता है कि उन्हें कोई ज़ोर से पकड़े हुए है या नीचे की तरफ़ खींच रहे हैं। और अगले दिन यह अफ़वाह उड़ाते हैं कि उसके घर में भूत है। ऐसे में हम इसी निश्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अगर भूत-प्रेत संबंधी कहानियों का वैज्ञानिक वर्णन कोई दे सकता है, तो वह है चिकित्सा विज्ञान।

और दोस्तों, आज की ससपेन्स फ़िल्म जिसका सस्पेन्स भरा गीत हम सुनने जा रहे हैं, वह है मशहूर फ़िल्म 'वो कौन थी'। १९६४ में प्रदर्शित इस फ़िल्म ने काफ़ी लोकप्रियता हासिल की थी। इस फ़िल्म में लता जी ने वह हौन्टिंग नंबर गाया था "नैना बरसे रिमझिम रिमझिम, पिया तोरे आवन की आस"। मदन मोहन का संगीत और राजा मेहंदी अली ख़ान के बोल। लता जी के सुपरहिट हौंटिंग्मेलोडीज़ में इस गीत का शुमार होता है। दिलचस्प बात यह है कि लता जी इस गाने की रेकॊर्डिंग पर पहुँच नहीं पायी थीं और यह गाना अगले ही दिन फ़िल्माया जाना था। ऐसे में मदन मोहन ने ख़ुद इस गीत को अपनी आवाज़ में रेकॊर्ड करवाया और उसी पर साधना ने अपने होंठ हिलाकर फ़िल्मांकन पूरा किया। बाद में लता ने गीत को रेकॊर्ड किया। मदन मोहन का गाया वर्ज़न एच. एम. वी की सी.डी 'Legends' में शामिल किया गया है। और अब आपको बतायी जाये 'वो कौन थी' की रहस्यमय कहानी। एक तूफ़ानी रात में डॊ. आनंद (मनोज कुमार) घर लौट रहे होते हैं जब उन्हें सड़क पर सफ़ेद साड़ी पहने एक लड़की (साधना) दिखायी देता है, जो बहुत परेशानी में लग रही है। आनंद उसे अपनी गाड़ी में लिफ़्ट देने का न्योता देता है और वो गाड़ी में बैठ जाती है और अपना नाम संध्या बताती है। जैसे ही वो गाड़ी में बैठती है, सामने शीशे के वाइपर्स चलने बंद हो जाते हैं, और आनंद को आगे रास्ता दिखाई नहीं देता। आनंद कुछ डर सा जाता है यह देख कर कि संध्या उसे रास्ता बता रही है उस अंधेरे में भी। वो उसे एक कब्रिस्तान की तरफ़ ले जाती है। आनंद देखता है कि संध्या की एक हाथ से ख़ून बह रहा है। पूछने पर संध्या मुस्कुराती है और कहती है कि उसे ख़ून अच्छा लगता है। जल्द ही संध्या गायब हो जाती है। कुछ ही समय बाद एक परेशान पिता आनंद की गाड़ी को रोकता है और उसकी बेटी की ज़िंदगी को बचा लेने की प्रार्थना करता है। आनंद उस आदमी के पीछे जाता है और एक पुराने घर में प्रवेश करता है, लेकिन बदक़िस्मती से जिस लड़की को बचाने की बात हो रही थी, वह मर चुकी होती है। आनंद चौंक उठता है यह देख कर कि जिस लड़की का शव वहाँ पड़ा हुआ है, वह वही लड़की संध्या है जिसे उसने अभी थोड़ी देर पहले लिफ़्ट दी थी। वापस लौटते वक्त आनंद को कुछ पुलिसमेन मिलते हैं जो उन्हें बताते हैं कि उस जगह पर बहुत दिनों से कोई नहीं रहता। आनंद डर तो जाता है लेकिन इस रहस्य की तह तक जाने का साहस भी जुटा ही लेता है। जैसे जैसे वो रहस्य के करीब पहूँचने लगता है, उसे पता चलता है कि वो झूठ और फ़रेब के जालों में उलझता चला जा रहा है। हालात ऐसी हो जाती है कि आनंद की माँ उसकी शादी जिस लड़की से तय करती है, वह और कोई नहीं संध्या है। क्या है संध्या की सच्चाई? क्या है इस कहानी का अंजाम? यह तो आप ख़ुद ही कभी मौका मिले तो देख लीजिएगा अगर आपने यह फ़िल्म अभी तक नहीं देखी है तो! इस फ़िल्म का हर गीत सुपरडुपर हिट हुआ था। तो चलिए सुनते हैं लता जी की आवाज़ में यह हौंटिंग्नंबर, जिसमें रहस्य के साथ साथ जुदाई का दर्द भी समाया हुआ है।



क्या आप जानते हैं...
'वो कौन थी' फ़िल्म का १९६६ में तमिल में रेमेक हुआ था 'यार नी' शीर्षक से जिसका निर्माण किया था सत्यम ने। जयशंकर और जयललिता (जो बाद में तमिल नाडु की मुख्यमंत्री बनीं) ने इसमें मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। तेलुगु फ़िल्म 'आमे एवरु' भी 'वो कौन थी' का ही रीमेक था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 08
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान है.

सवाल १ - गीतकार बताएं - 2 अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - 1 अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं - 1 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी की बढ़त जारी है, शरद जी आपको बहुत हम मिस करेंगें पर आपकी यात्रा सफल हो, यही कामना रहेगी...अंजना जी कब तक अनजान रहेंगें....वैसे अमित जी इस गीत से जुडी एक और खास बात आप यहाँ पढ़ा सकते है http://podcast.hindyugm.com/2008/07/blog-post_14.html

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, June 11, 2009

सुजॉय की यह कोशिश वेब रेडियो की बेहतरीन कोशिश है

सुजॉय चटर्जी एक ऐसा नाम जिससे आवाज़ के सभी नियमित श्रोता अब तक पूरी तरह से परिचित हो चुके हैं. रोज शाम वो ओल्ड इस गोल्ड पर लेकर आते हैं एक सोने सा चमकता नगमा हम सब के लिए, और खोल देते हैं बातों का एक ऐसा झरोखा जहाँ से आती खुशबू घोल देती है सांसों में ढेरों खट्टी मीठी गुजरे दिनों की यादें. ओल्ड इस गोल्ड ने पूरे किये अपने १०० एपिसोड और इस एतिहासिक अवसर पर हमने सोचा कि क्यों न आपके रूबरू लेकर आया जाए आपके इतने प्यारे ओल्ड इस गोल्ड के होस्ट सुजॉय चटर्जी को, तो मिलिए आज सुजॉय से -

हिंद युग्म - सुजॉय स्वागत है आपका, हमारे श्रोता ओल्ड इस गोल्ड के माध्यम से आपको जानते हैं. इतने सारे पुराने गीतों के बारे में आपकी जानकारी देखकर कुछ लोग अंदाजा लगते हैं कि आपकी उम्र कोई ४०-५० साल की होगी. तो सबसे पहले तो श्रोताओं को अपनी उम्र ही बताईये. ?


सुजॉय - वैसे अविवाहित लड़कों से उनकी उम्र पूछनी तो नहीं चाहिए, चलिए फिर भी बता देता हूँ कि मैं ३१ साल का हूँ।

हिंद युग्म - अच्छा अब अपना परिचय भी दीजिये...

सुजॉय - हम लोग बंगाल के रहनेवाले हैं, लेकिन मेरी पिताजी की नौकरी गुवाहाटी, असम में होने की वजह से मेरा जन्म और पूरी पढाई वहीं हुई। इसलिए मैं अपने आप को असम का ही रहनेवाला मानता हूँ। फ़िल्हाल मैं चण्डीगढ़ में नौकरी कर रहा हूँ। पेशे से मैं 'टेलीकाम इंजिनीयर' हूँ, और मेरी दिलचस्पी है हिंदी फ़िल्म संगीत में, फ़ोटोग्राफ़ी में, और खाना बनाने में।

हिंद युग्म - सुजॉय, ये ओल्ड इस गोल्ड का कॉन्सेप्ट कैसे बना ?

सुजॉय - सच पूछिए तो यह कॉन्सेप्ट सजीवजी का है, मैने तो बस उनके इस कॉन्सेप्ट को अंजाम दिया है। एक बात जो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के श्रोताओं को शायद ही मालूम हो कि जितने भी गाने आप इसमें सुनते हैं वे सभी सजीवजी के ही चुने हुए होते हैं। एक बार गीतों की लिस्ट मेरे हाथ लगी कि मैं अपना काम शुरु कर देता हूँ उनके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारियाँ इकट्ठा करने में। कभी कभी बहुत अच्छी बातें हाथ लगती हैं, और कभी कभी थोड़े में ही गुज़ारा करना पड़ता है। लेकिन जो भी है, मुझे बड़ा आनंद आता है इस सीरीज़ के लिए आलेख लिखने में। शायद इसी तरह का कुछ दबा हुआ था मेरे अंदर जो मैं हमेशा से करना चाहता था। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का मंच पाकर ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी उस पराधीन चाहत को आज़ाद कर दिया हो!

हिंद युग्म - ओल्ड इस गोल्ड को बहुत पसंद किया जा रहा है. एक श्रोता ने हिंद युग्म को लिखा कि ओल्ड इस गोल्ड पर आकर वो अपने बीते दिनों को जैसे फिर से जी रहे हैं. कैसा लगता है जब इस तरह के फीडबैक मिलते हैं ?

सुजॉय - बहुत अच्छा लगता है जानकर कि श्रोताओं और पाठकों को यह शृंखला पसंद आ रही है। उससे भी ज़्यादा अच्छा तब लगता है जब लोग आलेख में छुपी हुई ग़लतियों को ढूंढ निकालते हैं। इतने मनयोग से लोगों को पढ़ते हुए देखकर लगता है कि जैसे मेरी मेहनत सफल हुई। यह शृंखला लोगों को अपने बीते दिनों को याद करवाने में सहायक का काम कर रही है जानकर बहुत ख़ुशी हुई। आगे भी ऐसा ही प्रयास रहेगा।

हिंद युग्म - ओल्ड इस गोल्ड से पहले से ही आप इन्टरनेट पर विविध भारती समुदाय के माध्यम से बहुत लोकप्रिय थे, कैसे कर पाते हैं इतने सारे कार्यक्रमों को आप अपने जेहन में कैद ?

सुजॉय - शुरु शुरु में 'रेडियो' सुनते हुए ही इन कार्यक्रमों में बोली जा रही ज़रूरी बातों को 'शौर्ट हैंड' की तरह नोट कर लेता था, और फिर बाद में आलेख की शक्ल में लिख लेता था। बाद में जब मेरी 'मोबाइल फ़ोन' की पदोन्नती हुई तो उसमें रिकार्ड करने की क्षमता भी उत्पन्न हुई और तब से इन कार्यक्रमों को उस पर रिकार्ड करके बाद मे लिख लेता हूँ। इसे मेरी हॉबी ही समझिये या पागलपन! शायद ही दुनिया में कोई और इस तरह से रेडियो से रिकार्ड कर कम्प्युटर पर टाइप करता होगा!

हिंद युग्म - और फिर पूरे के पूरे कार्यक्रम को टाइप करना, क्या इन सब में बहुत समय नहीं लगता. ?

सुजॉय - समय तो लगता ही है, आख़िर मेरे भी दो हाथ हैं, और फिर औफ़िस भी जाता हूँ, खाना भी पकाता हूँ। मेरा ऐसा विचार है कि अगर आप किसी काम को शौकिया तौर पर करना चाहें तो आप उसके लिए अपनी व्यस्तता के बावजूद समय निकाल सकते हैं।

हिंद युग्म - ओल्ड इस गोल्ड में गीतों की प्रस्तुति में आपका विविध भारती का अनुभव कितना काम आता है ?

सुजॉय - बहुत ज़्यादा! बचपन से ही विविध भारती के अलग अलग कार्यक्रम और आकाशवाणी गुवाहाटी से प्रसारित होनेवाली फ़िल्म संगीत पर आधारित 'सैनिक भाइयों का कार्यक्रम' सुनते हुए ही बड़ा हुआ हूँ। लेकिन मैने अपनी तरफ़ से जो अच्छा काम किया वह यह था कि इन कार्यक्रमों को सुनने के साथ साथ इनमें दी जा रही जानकारियों को भी मैं अपनी डायरी में और बाद में अपने कम्प्युटर में संग्रहित करता चला गया। और अब हाल यह है कि ६०० से ज़्यादा रेडियो कार्यक्रमों का आलेख मेरे इस ख़ज़ाने मे क़ैद हो चुका है, जिनका मैं भरपूर इस्तेमाल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में बिना कंजूसी के कर रहा हूँ। उस वक्त मुझे यह पता भी नहीं था कि एक दिन इन सब का इस्तेमाल यूँ किया जाएगा। मेहनत से किया गया कोई भी काम कभी बेकार नहीं जाता, यह अब मैं मान गया हूँ।

हिंद युग्म - हर गीत की प्रस्तुति से पहले क्या तैयारियां करते हैं ?

सुजॉय - सबसे पहले तो दो चार दिन तक गीतों को मन ही मन मंथन करता हूँ, और उठते बैठते सोते जागते यह सोचता रहता हूँ कि फ़लाना गीत की क्या खासियत है। फिर उसके बाद 'रेडियो' प्रोग्रामों की लिस्ट पे नज़र दौड़ाता हूँ कि कहीं कुछ जानकारियाँ पहले से ही मेरे पास उपलब्ध है या नहीं। फिर उसके बाद इंटर्नेट पर जितना हो सके सर्च करता हूँ, और सारी बातों को आलेख की शक्ल में लिख डालता हूँ। यूँ समझ लीजिए कि १० गीतों का आलेख लिखने के लिए ७ से १० दिन लग ही जाते हैं।

हिंद युग्म - ओल्ड इस गोल्ड के शतक पूरे करने की एक बार फिर बधाई. आप यूहीं अच्छे अच्छे गीत हम सभी को सुनाते रहें. हिंद युग्म को उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि आप इस खोज और आलेख प्रस्तुतीकरण का भरपूर आनंद ले पा रहे हैं. जारी रहे ये सफ़र...सब श्रोताओं की तरफ से शुभकामनायें स्वीकार करें.

सुजॉय - बहुत धन्यवाद! वैसे शुक्रिया मुझे हिंद युग्म का अदा करनी चाहिए मुझे यह मंच देने के लिए। जो काम मैं हमेशा से करना चाहता था और नहीं कर पा रहा था, हिंद युग्म ने मुझे वह काम करने का मौका दिया, इससे ज़्यादा और मैं हिंद युग्म से क्या माँग सकता हूँ। चलते चलते वही लाइन फिर से कहूँगा जो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की हीरक जयंती अंक मे मैने कहा था कि "तुम अगर साथ देने का वादा करो, हम यूँही मस्त नग़में लुटाते रहें"। बहुत धन्यवाद!

ओल्ड इस गोल्ड के श्रोताओं में कुछ ऐसे नाम भी हैं जिन्होंने इस शृंखला के विषय में मीडिया के माध्यम से जानकारी देकर संगीत प्रेमियों को इससे जुड़ने के लिए प्रेरित किया है, मशहूर ब्लॉग "मोहल्ला" के संचालक अविनाश जी भी इन्हीं में से एक हैं जिन पर सुजॉय का जादू जम कर चला है. तभी तो मशहूर साहित्यिक पत्रिका "कथादेश" में उन्होंने अपने "ओल्ड इस गोल्ड" अनुभव को कुछ यूँ व्यक्त किया है. पढिये -

पूरा आलेख पढ़ने के लिए निम्न चित्र पर क्लिक करें


Listen Sadabahar Geetओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.



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