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Monday, July 4, 2011

जब साहित्यिक और पौराणिक किरदारों को अपना "रंग" दिया एफ टी एस के कलाकारों ने

पिछले दिनों हिंद युग्म के खबर पृष्ठ पर हमने रंग महोत्सव के बारे में जानकारी दी थी. फिल्म एंड थियटर सोसायटी द्वारा आयोजित यह पहला वार्षिक आर्ट फेस्टिवल् जिसे "रंग" नाम दिया गया था, दिल्ली के लोधी रोड स्तिथ अलायेंज फ्रंकाईस और इंडिया हेबिटाट सभागारों में धूम धाम से संपन्न हुआ. इसमें कुल ५ नाटकों का मंचन हुआ और एक शाम रही संगीत बैंड ब्रह्मनाद के सजीव परफोर्मेंस के नाम. काफी संख्या में दर्शकों ने इस अनूठे आयोजन का आनद लिया. ५ नाटकों में से एक "सिद्धार्थ" (जिसे अशोक छाबड़ा ने निर्देशित किया है) को छोड़कर अन्य सभी नाटक युवा निर्देशक अतुल सत्य कौशिक द्वारा निर्देशित हैं, और अधिकतर कलाकार भी अपेक्षाकृत नए ही हैं रंगमंच की दुनिया में मगर सबकी कर्मठता, जुझारूपन और खुद को साबित करने की लगन उनके अभिनय में साफ़ देखी जा सकती है. अधिकतर नाटक नामी साहित्यकारों की रचनाओं से प्रेरित हैं पर निर्देशक और उनकी टीम ने उसमें अपना 'रंग' भी भरा है. नाटकों को बेहद व्यवाहरिक और मनोरंजक अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया है ताकि दर्शक एक पल के लिए भी ऊब महसूस न करे. यानी किरदार और विषय गंभीर होने के बावजूद उनकी प्रस्तुति आम दर्शकों को भी भरपूर मनोरजन देने में सफल हुई है. चूँकि ये ऍफ़ टी एस का पहला वार्षिकोत्सव था, इस दृष्टि से देखा जाए तो इस आयोजन को बहुत हद तक एक सफल आयोजन माना जा सकता है. ये संस्था निश्चित ही उम्मीदें जगाती है कि भविष्य में हम इस टीम से और भी उत्कृष्ट मंचनों की अपेक्षाएं रख सकते हैं जिसके माध्यम से हमें भारतीय कला संस्कृति और साहित्य के अनेक नए आयाम देखने को मिल सकेंगें.

ऍफ़ टी एस के इन नाटकों में एक और दिलचस्प पहलु हैं इनका पार्श्व संगीत. दरअसल यहाँ संगीत पूरी तरह पार्श्व भी नहीं है. "ब्रह्मनाद" बैंड के सदस्य वहीँ मंच के एक कोने में बैठे दर्शकों को नज़र आते हैं जो दृश्य के भावानुसार उपयुक्त संगीत वहीँ लाईव बजाते हैं. बीच बीच में कुछ गीत भी आते हैं और वो भी वहीँ मंच के कोने से लाईव गाये जाते हैं. ये एक अनूठा अंदाज़ लगा जिसकी बेहद सराहना भी हुई. निलोय घोष दस्तीदार, प्रनोय रॉय, श्रेहंस खुराना और सार्थक पाहवा से मिलकर बनता है बैंड "ब्रह्मनाद" जो भारतीय लोक संगीत में अपनी पहचान ढूंढ रहे हैं. आपको इनके गीतों में एक अपनापन मिलेगा. आजकल सुनाई देने वाले संगीत से बेहद अलग मिलेगा आपको इनका मिजाज़. व्यक्तिगत तौर पर मैं जिस तरह के गुण एक भारतीय बैंड में देखना चाहता हूँ मुझे उस कसौटी पर काफी हद तक खरा मिला "ब्रह्मनाद".


(काकी की भूमिका में पारुल, "कूबड़ और काकी" से एक दृश्य)

अतुल सत्य कौशिक निर्देशित नाटक कूबड़ और काकी में दो कहानियों का फ्यूज़न है, और नयी बात ये है कि ये दोनों कहानियां दो अलग अलग साहित्यकारों की है. हिंदी कथा साहित्य के दो दिग्गज कथाकारों, प्रेमचंद और धरमवीर भारती के दो अलग अलग कहानियों को एक सूत्र में बाँध कर प्रस्तुत किया गया है "कूबड़ और काकी" में. परनिर्भर और बेसहारा हुई दो औरतों के प्रति समाज के नज़रिए को बेहद संवेदना के साथ प्रस्तुत किया है मंच पर कलाकारों ने. विशेषकर काकी की भूमिका में पारुल ने शानदार अभिनय किया है. दोनों ही किरदारों के माध्यम से बहुत सी सामाजिक कुरीतियों और गिरते मानवीय मूल्यों पर भी ख़ासा प्रहार किया गया है. इस नाटक के बाद हमनें बात की निर्देशक अतुल सत्य कौशिक, काकी की भूमिका जान फूंकने वाली पारुल और ब्रह्मनाद बैंड के सार्थक पाहवा से. हिंद युग्म की तरफ से मेरे यानी सजीव सारथी के साथ थे अतुल सक्सेना और तरुमिता. लीजिये सुनिए यही बातचीत



पहला नाटक देखने और इन सब कलाकारों से बात करने के बाद हमारी उत्सुकता और बढ गयी दिन का अगला नाटक "अर्जुन का बेटा" देखने की. इस नाटक को एक काव्यात्मक अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया है यानी पूरे नाटक के संवाद एक कवितामयी भाषा में दर्शकों तक पहुँचते है. जाहिर है ऐसे नाटकों में स्क्रिप्ट की उत्कृष्ठता सबसे अधिक अवश्य होती है, और यहाँ मैं कहूँगा की अतुल सत्य कौशिक पूरी तरह सफल हुए हैं. बेहद कसे हुए अंदाज़ में और भरपूर रचनात्मकता के साथ उन्होंने अभिमन्यु के वीरता, शौर्य और साहस का बखान किया है. हालाँकि यहाँ सभी कलाकार उस उत्कृष्टता तक नहीं पहुँच पाए हैं पर धर्मराज/अभिमन्यु की भूमिका में जिस कलाकार ने अभिनय किया उनका काम खासा सराहनीय है. यदि अन्य कलाकार भी उनका बेहतर साथ देते तो और प्रभावशाली होती ये प्रस्तुति. युद्ध के दृश्य सांस रोक देने वाले थे जो बेहद सफाई से मंचित हुए हैं. पार्श्व संगीत और लाईटिंग भी अपेक्षित प्रभाव देने में सफल हुए हैं.

(चक्रव्यूह में घिरा अभिमन्यु, "अर्जुन का बेटा" से एक दृश्य)

पर इस नाटक के वास्तविक हीरो तो खुद लेखक/निर्दशक अतुल ही हैं, कुछ संवादों की बानगी देखिये, स्वतः ही मुंह से वाह निकल पड़ती है.

गीता कहने सुनने के कुछ अवसर होते हैं अर्जुन,
प्रश्नों के उत्तर प्रश्नों पर ही निर्भर होते हैं अर्जुन...


(भीष्म पितामह अर्जुन और धर्म राज को समझाते हुए)

और जब अंत में आकर श्रीकृष्ण चक्रव्यूह का रहस्य खोलते हैं तो हर व्यक्ति जीवन के चक्रव्यूह में खुद को एक अभिमन्यु सा ही पाता है -

इस चक्रव्यूह से भला कौन निकल पाया है,
बस अंदर जाने का ही रास्ता सबने पाया है,


जो चक्रव्यूह को भेदकर पूरा वापस आ जायेगा,
वो जीवन मुक्ति पाकर अपने अंत को पा जायेगा...


ये जीवन ही एक चक्रव्यूह और हम सब हैं अभिमन्यु,
इसके भीतर लड़ते ही बीते ये जीवन आयु...


चलिए अब ऍफ़ टी एस को और इन सभी उत्साही और प्रतिभाशाली कलाकारों को शुभकामनाएं देते हुए आईये सुनें "अर्जुन का बेटा" का ये ऑडियो प्रसारण. इसमें हालांकि बहुत स्पष्टता नहीं है पर आपको खासकर जो दिल्ली से बाहर हैं उन्हें इस प्रस्तुति की एक झलक अवश्य मिल जायेगी. जल्द ही ऍफ़ टी एस अन्य शहरों में इन नाटकों का मंचन करेगा. जरूर देखियेगा इन्हें जब भी ये आपके शहर आयें.



प्रस्तुति - सजीव सारथी

Thursday, October 9, 2008

श्रोता भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है महफ़िल की सफ़लता का.

आवाज पर आने वाले नियमित पाठक/श्रोता संजय पटेल की क़लमनिगारी से वाक़िफ़ है.
संजय भाई अपने अलहदा अंदाज़ से हमेशा कोई नई बात कहते हैं.मंच और लेखन की दुनिया में सतत काम करने वाला यह शख्स निराभिमानी ही नहीं संगीत में आकंठ डूबा एक ज़िन्दादिल इंसान है. अभी हाल ही में संजय पटेल ने अपने ब्लॉग
जोगलिखी संजय पटेल की पर श्रोताओं के हवाले से एक बहुत सुन्दर आलेख पोस्ट किया था. हमें लगा कि आवाज़ पर इस लेख का जारी होना बहुत ज़रूरी है. संजय भाई ने हमेशा की तरह सह्र्दयता से इजाज़त दी इसके लिये. एक सच्चे संगीतप्रेमी के लिये ये लेख एक दस्तावेज़ है और गाइड लाइन भी. कैसे एक श्रोता एक रसपूर्ण कार्यक्रम या कंसर्ट को बिगाड़ सकता है आइये देखते हैं.


बात थोड़ी लम्बी कह गया हूँ ; यदि दस से पन्द्रह मिनट का समय दे सकते हैं तो ही इसे पढ़ें.हाँ इस पोस्ट में व्यक्त किये गए दर्द को समझने के लिये एक संगीतप्रेमी का दिल होना ख़ास क्वॉलिफ़िकेशन है.

बीते तीस बरसों से तो मंच पर बतौर एक एंकर पर्सन काम कर ही रहा हूँ और उसके पहले भी संगीत की महफ़िलों में जाने का जुनून रहा ही है. सौभाग्याशाली हूँ कि पिता और दादा की बदौलत संगीत का भरापूरा माहौल घर-आँगन में ही मिलता रहा.अब जब से मैं ख़ुद एंकर या सांस्कतिक पत्रकार के रूप में सक्रिय हुआ तब से भाँति भाँति के कलाकारों और उससे भी ज़्यादा सुनने वालों से मिलने,बतियाने और विभिन्न कलाकारों और गायन/वादन की कला के बारे में समझने का अवसर मिल रहा है.संगीत विषय पर पढ़ता भी रहता हूँ सो अच्छा ख़ासा समय संगीत के इर्द-गिर्द चला जाता है या यूँ कहना बेहतर होगा कि मेरे इर्द-गिर्द संगीत होता है.मंच से परे भी कार्य-स्थल और निवास पर भी तक़रीबन पूरे दिन संगीत का संगसाथ बना रहता है.देश के कई कलाकारों से भी लगातार संपर्क में रहता हूँ सो तब भी संगीत की ही चर्चा होती रहती है. यहाँ तक जो बात मैने कही है उसे पढ़कर आपको लग रहा होगा कि मैं आत्ममुग्ध हो अपने को ही महिमामंडित कर रहा है.जी नहीं हुज़ूर नाचीज़ को इस तरह की कोई ग़लतफ़हमी नहीं है कि मैं कोई बड़ा कारनामा कर रहा हूँ ;मामला इतना भर है संगीत मुझे ऑक्सीजन देता है और मुझे इंसान बनाए रखता है. दर असल में कहना कुछ और चाहता हूँ

बहुतेरे अवसरों पर जिन संगीतप्रेमियों से मुलाक़ात होती है उनमें कुछ विशिष्ट प्रजाति के होते हैं.हाँ यह साफ़ करता चलूँ और स्वीकार कर लूँ कि संगीत बहुत सब्जेक्टिव टर्म है यानी तरह –तरह के लोग और तरह तरह् की पसंद.लेकिन अपनी पसंद से भी जो लोग किसी महफ़िल में आते हैं तो वहाँ भी एक विशिष्ट क़िस्म की अतृप्तता महसूस करते हैं.कहने को म्युज़िक सर्कल्स में ये लोग अपने आप को सुर-सुजान कहलवाना पसंद करते हैं लेकिन तबियत में विशिष्ट खसलत लिये हुए होते हैं.उदाहरण के लिये एक सज्जन हैं जो चाहे शायरी की महफ़िल में हों या संगीत की;हमेशा अपनी फ़रमाइश लेकर खड़े हो जाते हैं....एक आयटम ख़त्म हुई; कहेंगे...गिरिजाजी (विदूषी गिरिजा देवी)आज भैरवी ठुमरी के पहले एक चैती ज़रूर होना चाहिये ! ग़ज़ल की महफ़िल है तो जगजीतजी (जगजीत सिंह) आविष्कार फ़िल्म का आपका और चित्राजी वाला बाबुल मोरा सुना दीजिये न प्लीज़....प्रहलादसिंह टिपानिया ने अच्छा-भला माहौल बना रखा है कबीरपंथी गीतों का और आप श्रीमान खड़े हो गए...पेलाद दादा हलके गाड़ी हाँको रे रामगाड़ीवाला सुना दीजिये न ! कलापिनी कोमकली गा रही है जैजैवंती से समाँ बंध गया है और उन्होनें तानपूरे के तार भैरवी के लिये मिलाना शुरू किया ही है और आप जनाब नमूदार हुए हैं महफ़िल में और कहेंगे ...मैडम ! कुमारजी का झीनी झीनी झीनी रे चदरिया तो हुआ ही नहीं......कई बार तो कलाकार सहज होकर उनकी बात सुन लेता है लेकिन कई बार कार्यक्रम ऐसा बेमज़ा होता है कि फ़िर उसके सुरीले होने की आस बाक़ी ही नहीं रहती. तो ये तो हुए मुफ़्त के फ़रमाइशीलाल.जैसे कलाकार सिर्फ़ और सिर्फ़ इन्हें ही अपनी रचनाएँ सुनाने यहाँ आया है.

अब एक दूसरी ब्रीड ऐसी है जो थोड़ी सी सुरीली खसलत वाली है. इनका मामला कुछ यूँ है कि ये श्रीमान गाते हैं...ठीक ठाक ही गाते हैं लेकिन किसी और का गाया पसंद नहीं करते.जैसे पुराने गीतों के किसी कार्यक्रम में बैठे हैं;समझ लीजिये मुकेश या रफ़ी साहब की याद में कोई कार्यक्रम चल रहा है तो ये सभागार में ही अच्छा भला गा रहे गायक की मज़म्मत कर देंगे.यार ! खोया खोया चाँद में रफ़ी साहब वाला फ़ील नहीं आ रहा,नहीं नहीं; मुकेशजी ने सारंगा तेरी याद में ... ऐसे नहीं गाया है अब साहब बताइये रफ़ी और मुकेश वाला ही फ़ील कहाँ से आयेगा,वह तो इन दो महान कलाकारों के साथ ही चला गया न .बात यहीं ख़त्म हो जाती तो ठीक , श्रीमान सभागार में ही पास वाली सीट पर बैठी अपनी श्रीमती को खोया खोया चाँद गाकर सुना रहे हैं;गोया याद दिलाना चाहते हों कि ऐसा था रफ़ी/मुकेश की गायकी का फ़ील (?)पास वाले भी झेल रहे हैं इस (बे)सुरीलेपन को.

एक और ज़ात है इन सुर-सुजानों की , हमेशा किसी आर्टिस्ट को किसी दूसरे से कम्पेयर करेंगे यानी उसकी दूसरे से तुलना करेंगे. जैसे अभी पं.जसराज मेरे शहर में आए थे , लाइव शो था और सुनने वाले थे तक़रीबन दस हज़ार.जैसे ही पहली रचना ख़त्म की श्रीमान मेरे पास आ गए ; यार तुम कैसे झेल पा रहे हो इस शोर शराबे में पंडितजी का गायन (जनाब को मेरी तासीर मालूम नहीं कि मैं तो पण्डितजी जैसे महान कलाकार को सुनने नहीं; देखने के लिये भी भरे बाज़ार में चला जाऊँ) मैंने कहा क्यों ? क्या हुआ ? नहीं यार अपने यहाँ दस साल पहले शरद पूर्णिमा पर भीमसेन जी आए थे; याद है ? मैने कहाँ हाँ ! आहा हा हा...क्या रंग जमा था भिया (मेरे शहर में भैया को भिया कहते हैं) वह बात नहीं बना पाए हैं जसराज आज . क्या लचर गा रहे हैं . मैने उनसे बहस करना ठीक नहीं समझा और मशवरा दिया कि ये तो आजकल ऐसा ही गा रहे हैं,शहर में विख्यात गायक शान का लाइव शो भी चल रहा है , सुना है वहाँ काफ़ी रंग जम रहा है. भाई साहब बोले क्या बात कर रहे हो..जगह मिल जाएगी, मैने कहा हाँ शायद मिल ही जाए,आप एक बार ट्राय तो कीजिये....सुर सुजान चलते बने और मैने राहत की साँस ली.अब आप बताइये कितना ग़लत है किसी कलाकार की गायकी की किसी और से तुलना करना.सबका अपना अपना रंग है,घराना है,गुरूजन अलग अलग हैं,परम्पराएँ भी अलग. पर नहीं उनको तो जसराज जी में भीमसेन जी का रंग चाहिये.मज़ा ये है कि भीमसेन जी से पूछिये तो वे जसराजजी की तारीफ़ करेंगे और जसराज जी के सामने भीमसेनजी की चर्चा चलाइये तो वे कहेंगे भीमसेनजी की क्या बात है.

इसी स्टाइल में एक और गौत्र वाले साह्ब भी हैं . वे क्या करते हैं कि जैसे आज प्रभा अत्रे को सुन रहे हैं तो कहेंगे भाई साहब पिछले साल पुणे के सवाई गंधर्व में जो इन्होंने बागेश्री सुनाई थी वह बात आज सुनाई नहीं दे रही है.मैं सोचता हूँ कि ये ऐसी बेवकूफ़ी की बात क्यों कर रहे हैं .हर दिन अलग होता है, मूड अलग होता है , आख़िर कलाकार भी तो इंसान है.याद आ गई उस्ताद बिसमिल्ला ख़ाँ साहब से बरसों पहले स्पिक मैके की वह महफ़िल जब ख़ाँ साहब बोले थे राग, रसोई , पागड़ी(पगड़ी) कभी-कभी बन जाए. बाद में समझ में आया कि श्रीमान आपको बताना चाहते हैं कि पिछले साल भी ये भी सवाई गंधर्व समारोह सुनने पुणे गए थे.


आज ये आलेख लिखते लिखते मुझे मेहंदी हसन साहब की याद आ गई. बरसों पहले वे एक शो के लिये मेरे शहर में तशरीफ़ लाए थे .शो का समय था रात आठ बजे का. ख़ाँ साहब साढ़े छह बजे आ गए,साज़ मिलवा लिये यानी ट्यून करवा लिये,साउंड का बेलेंसिंग कर लिया और फ़ारिग़ हो गए तक़रीबन सात बजे.फ़िर मुझसे कहा कोई कमरा है ग्रीन रूम के पास ऐसा जो ख़ाली हो,मैने पूछा क्या थोड़ा आराम करेंगे ? बोले नहीं शो शुरू होने के पहले जब तक मुमकिन होगा ख़ामोश रहना चाहता हूँ.मैं उन्हें एक कमरे में ले गया.वहाँ दरवाज़ा भीतर से बंद कर बैठा ही था तो बाहर से किसी ने खटखट की.दरवाज़ा खोला तो सामने आयोजन से जुड़े एक शख़्स खड़े थे , बोले कमिश्नर साहब आए हैं मिलना चाहते हैं मेहंदी हसन साहब से.मैने कहा वे अब शो प्रारंभ होने तक बोलेंगे नहीं , आप उन्हें शो के बाद मिलवाने ले आइये मैं ज़िम्मेदारी लेता हूँ कि ख़ाँ साहब से मिलवा दूँगा.जनाब कहने लगे आप समझते नहीं हैं साहब उखड़ जाएंगे,मैने कहा कहाँ हैं साहब और कमिश्नर से मिलने चला. मैने उन्हें हक़ीक़त बताई; वे एक संजीदा इंसान थे,बोले नहीं मैं नहीं मिलना चाह रहा, मेरी बेटी को ऑटोग्राफ़ चाहिये था.मैने उनकी बेटी की ऑटोग्राफ़ बुक ली और आश्वस्त किया कि उनका काम हो जाएगा.वे तसल्ली से श्रोताओं में जाकर बैठ गये.कमरे में लौटा तो देखा उस्तादजी जैसे ध्यान मुद्रा में बैठे थे. आँखों से अश्रु बह रहे थे. ख़ाँ साहब की टाइमिंग देखिये ठीक पौने आठ बजे उन्होंने आँखें खोलीं और मेरी तरफ़ देख कर मुस्कुराए; कहने लगे चलें जनाब दुकान सजाएँ.मैंने कहा हाँ चलते हैं लेकिन ख़ाँ साहब ये पैतालिस मिनट की ये ख़ामोशी क्या थी. बोले भाई मेरे आज जो जो ग़ज़ले गाने का मन बनाया है उनके मुखड़ों से दुआ-सलाम कर रहा था.फ़िर मैने पूछा कि इस दौरान आँखें क्यों भींज गईं थी आपकी ?ख़ाँ साहब बोले हाँ भाई उस वक़्त ख़ुदा का शुक्रिया अदा कर रहा था कि परवरदिगार तू कितना रहमदिल है कि मुझ नाचीज़ से मौसीक़ी के ज़रिये अपनी ख़िदमत करवा रहा है.सोचिये मेहंदी हसन साहब जैसा बड़ा आर्टिस्ट भी अपने आप से गुफ़्तगू के रूप में थोड़ा सा होमवर्क करना चाहता है.ऐसे में कोई सिरफ़िरा श्रोता एक महान कलाकार का ये नाज़ुक वक़्त चुरा कर कितना बड़ा पाप कर सकता है.कहने की ज़रूरत नहीं कि वह रात मेहंदी हसन साहब की गायकी की एक आलातरीन रात थी.ऐसी जो कभी कभी गाई जाती है बड़े नसीब से सुनने को मिलती है.

मुझे लगता है कि श्रोता हर तरह से अपनी पसंद/नापसंद तय करने का अधिकार रखता है . बल्कि ये उसका हक़ है लेकिन सच्चा और खरा श्रोता सजग,संवेदनशील और सह्रदय होता है..वह जानता है न जाने कितने तप और रियाज़ के बाद कोई कलाकार अपनी प्रस्तुति को लेकर पूरी उम्मीद के साथ आपसे रूबरू होता है. आपकी थोड़ी सी भी नासमझी कलाकार के पूरे मूड को बिगाड़ सकती है. अब बताइये साहब कि संगीत की महफ़िल में कोई बड़बोला , फ़रमाइशीलाल अपनी कोई फ़रमाइश लेकर कलाकार को डिस्टर्ब कर दे तो क्या हो.या कोई फ़ैन ऑटोग्राफ़ लेने के लिये गायक को परेशान करे ये तो ठीक नहीं.ईमानदार श्रोता वह है जो रहमदिल होकर कलाकार की तपस्या का मान करे और सह्र्दय होकर उसकी कला को दाद देकर उसे नवाज़े; उसका हौसला बढ़ाए.

कभी ठंडे दिल से सोचियेगा कि क्या मै ठीक कह रहा हूँ.

संजय भाई के इस आलेख से प्रेरित होकर हमारे स्तंभकार दिलीप कवठेकर ने भी अपने ब्लॉग पर जो लिखा वह आप यहाँ पढ़ सकते हैं.

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