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Wednesday, September 8, 2010

राज़ की बात कह दूं तो जाने महफ़िल में फिर क्या हो....अजी महफ़िल में तो धूम ही मचेगी जब जन्मदिन हो आशा जी का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 479/2010/179

दोस्तों नमस्कार! रमज़ान का पाक़ महीना चल रहा है और हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों पेश कर रहे हैं कुछ शानदार फ़िल्मी क़व्वालियों से सजी लघु शृंखला 'मजलिस-ए-क़व्वाली'। कल की क़व्वाली में यह कहा गया था कि जीना उसी का जीना होता है जिसे यह राज़ मालूम हो कि औरों के काम आने में ही सच्चा सुख है। कल चलते चलते हमनें यह भी कहा था कि आज की कड़ी में भी हम किसी राज़ की बात बताने वाले हैं। तो लीजिए अब वह वक़्त आ गया है। लेकिन राज़ की बात हम बता तो देंगे, पर फिर महफ़िल में जाने क्या हो! राज़ की बात यह कि आज है आशा भोसले का जन्मदिन। तो 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से हम आशा जी को दे रहे हैं जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएँ। ईश्वर उन्हें दीर्घायु करें और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करें। उनकी संगीत साधना को सलाम करते हुए आज और कल, दोनों दिन हम उनकी गाई क़व्वाली का आनंद लेंगे। अब एक और राज़ की बात यह कि अब हम आपको क़व्वाली के इतिहास की कुछ और बातें बताने वाले हैं। जैसा कि दूसरी कड़ी में हमने बताया था कि क़व्वाली का जन्म करीब करीब उसी वक़्त से माना जाता है जब मुहम्मद का जन्म हुआ था। क़व्वाली के रूप-रंग का पहली बार व्याख्या १०-वीं और ११-वीं शताब्दी के दौरान हुआ था। क़व्वाली के विशेषताओं, या फिर युं कहिए कि नियमों को, क़व्वाली की परिभाषा के लिए जिन्हें श्रेय दिया जाता है वो हैं अल-ग़ज़ली। हालाँकि उनसे पहले भी दूसरे इस्लामी विशेषज्ञों ने इस तरह के संगीत के आध्यात्मिक पक्ष पर प्रकाश डाल चुके थे। भारत और पाक़िस्तान में क़व्वाली की लोकप्रियता और प्रचार-प्रसार में सूफ़ी के चिश्ती स्कूल का बड़ा हाथ है। ऐसी मान्यता है कि इस स्कूल की स्थापना ख़्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती (११४३ - १२३४) ने की थी, लेकिन इसका कोई प्रमाण नहीं है। एक और संत जिन्होंने क़व्वालियों के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण कार्य किया, वो हैं शेख़ निज़ामुदीन औलिया (१२३६ - १३२५)। वो एक महात्मा संत थे जो क़व्वालियों के ज़रिए शिक्षा देते थे और अल्लाह का गुणगान करते थे। चिश्ती और निज़ामुद्दीन औलिया, दोनों ही अपने अपने जगह प्रेरणा स्रोत रहे और हर साल लाखों की संख्या में लोग उनके मज़ार पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने पहुँचते हैं। लेकिन एक नाम जो सब से उपर आता है जब क़व्वालियों के प्रचार प्रसार की बात चलती है, वो नाम है अमीर ख़ुसरौ (१२५४ - १३२४) का। उनका परिचय एक दार्शनिक और संगीतज्ञ के रूप में मिलता है। उन्होंने क़व्वाली के विकास में बहुत से अलग अलग साज़ों का मिश्रण करवाया जो अलग अलग संस्कृति से उन्होंने बटोरे थे, और इस तरह से क़व्वाली में भारत, परशिया (इरान) और तुर्की के संगीत को मिलाया और आज जो क़व्वाली का रूप हम पाते हैं, उनमें भी वही बात सामने आती है।

और अब आज की क़व्वाली। राज़ की बात कह दूँ तो जाने महफ़िल में फिर क्या हो! जी नहीं, अब और किसी राज़ में हम आपको नहीं उलझा रहे हैं। फ़िल्म 'धर्मा' की यह क़व्वाली आज पेश-ए-ख़िदमत है आशा भोसले, मोहम्मद रफ़ी और साथियों की आवाज़ों में। १९७३ में बनी इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे नवीन निश्चल, रेखा और प्राण। फ़िल्म में गीत लिखे वर्मा मलिक ने तथा संगीत था सोनिक ओमी की जोड़ी का। इस क़व्वाली के बनने के पीछे एक मज़ेदार क़िस्सा है, पढ़िये ओमी जी की शब्दों में, जो उन्होंने कहे थे विविध भारती के किसी कार्यक्रम में। "बम्बई में क़व्वाल बहुत हैं और क़व्वाली के कॊम्पीटिशन्स भी होते रहते हैं। तो एक बार हमारे पास रिक्वेस्ट आया कि हम वहाँ किसी क़व्वाली कॊम्पीटिशन में जज बन कर जाएँ। हम उस कॊम्पीटिशन में गए, क़व्वाली शुरु हुई, पर देखते ही देखते उसमें गाली गलोच शुरु हो गई, और उसके क्लाइमैक्स में एक दूसरे ने चाकू तक निकाल लिए और लड़ाई शुरु हो गई। हम वहाँ से निकलने लगे तो ऒर्गेनाइज़र ने हमसे कहा कि आप जज हैं, अपना फ़ैसला तो सुनाते जाइए। हमने कहा कि उसके लिए किसी चाकूबाज़ को ही बुलाइए, यह हमारा काम नहीं। तो इस घटना के कुछ दिन बाद फ़िल्म 'धर्मा' के लिए एक ऐसा ही सिचुएशन आई जिसमें प्राण और बिंदु के बीच क़व्वाली की टक्कर होनी थी। तो वो घटना हमें याद आई और उससे हमें बहुत हेल्प मिली इस क़व्वाली को तैयार करने में। वर्मा मलिक ने इसके बोल लिखे थे" तो लीजिए, आप भी मज़ा लीजिए प्राण साहब और बिंदु जी के बीच की इस लड़ाई का रफ़ी साहब और आशा जी की आवाज़ों के साथ। आशा जी को जन्मदिन की एक बार फिर से हार्दिक बधाई।



क्या आप जानते हैं...
कि सोनिक ओमी की जोड़ी बनने से पहले सोनिक जी १९५२ में 'ममता' और 'ईश्वर भक्ति' तथा १९५९ में एक पंजाबी फ़िल्म में संगीत दे चुके थे।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. महेंद्र कपूर और आशा भोसले के साथ किस गायिका की आवाज़ सुनाई देती है इस कव्वाली में - ३ अंक.
२. संगीतकार बताएं - २ अंक.
३. मुखड़े में शब्द है -"आग", गीतकार बताएं - २ अंक.
४ डॊ. अचला नागर के लिखे एक नाटक पर आधारित थी ये क्लास्सिक सामाजिक फिल्म नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी फॉर्म में हैं, कनाडा टीम की वापसी सुखद लगी, महेंद्र जी को आनंद आया और हमें भी

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, March 31, 2009

आजा रे प्यार पुकारे, नैना तो रो रो हारे...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 38

"दिल ने फिर याद किया", 1966 की एक बेहद कामयाब फिल्म. इसी फिल्म से रातों रात मशहूर हुई थी संगीतकार जोडी सोनिक ओमी. सोनिक और ओमी रिश्ते में चाचा भतीजा हैं. सोनिक सन् 1952 में ममता, 1952 में ही ईश्वर भक्ति, और 1959 में एक पंजाबी फिल्म में संगीत दे चुके थे. सोनिक, जो ढाई साल की उम्र में अपनी ऑंखें खो चुके थे, उन्होने लाहौर और लखनऊ से पढाई पूरी की और फिर दिल्ली के आकाशवाणी से जुड गये और इस तरह से एक सुरीले सिलसिले की भूमिका बनती चली गयी. सोनिक और ओमी कई बार मुंबई आए लेकिन कोई ख़ास बात नहीं बन पाई. लेकिन वो अपने अपने तरीके से कोशिश करते रहे. इसी बीच सोनिक बने संगीतकार मदन मोहन के सहायक और ओमी रोशन के. इस तरह से फिल्म संगीत जगत में इन दोनो की पहचान बनी, नतीजा यह हुआ कि उन्हे "दिल ने फिर याद किया" जैसी फिल्म मिल गयी और दोनो ने पहली बार अपनी जोडी बनाई. और कहने की ज़रूरत नहीं, पहली फिल्म में ही इन दोनो ने कमाल कर दिया. दिल ने फिर याद किया के सभी गीत बेहद मक़बूल हुए, उन्हे बहुत बहुत सहारना मिली. इस फिल्म को बनाया था सी एल रावल ने, वही फिल्म के निर्देशक भी थे और गीतकार भी. धर्मेन्द्र, नूतन और रहमान के अभिनय से सुसज्जित यह फिल्म लोकप्रियता की कसौटी पर खरी उतरी, जिसका मुख्य श्रेय फिल्म के संगीत को जाता है.

दोस्तों, हम बड़ी दुविधा में पड गये थे इस बात को लेकर कि इस फिल्म का कौन सा गीत आपको सुनवाएँ 'ओल्ड इस गोल्ड' में, क्योंकि जैसा कि हमने कहा इस फिल्म का हर एक गीत अपने आप में लोकप्रियता की मिसाल है. आखिरकार हमने जो गीत चुना वो है "आजा रे प्यार पुकारे" जिसे लता मंगेशकर ने बडे ही दर्दीले अंदाज़ में गाया है. अब आप पूछेंगें कि हमने इस गीत को ही क्यूँ चुना. वो इसलिए कि एक 'इंटरव्यू' में जब ओमी-जी से यह पुछा गया था कि इस फिल्म का कौन सा गीत उन्हे सबसे ज़्यादा पसंद है, तो उन्होने इसी गीत का ज़िक्र किया था. और क्यूँ ना हो, यह गीत है ही दिल को छू जाने वाला. उसी 'इंटरव्यू' में ओमी-जी ने इस गीत से जुडा एक मज़ेदार किस्सा भी बताया था. हुया यूँ कि इस गाने में नायिका अपने प्रेमी का इंतज़ार करती है और अपने प्यार की दुहाई देकर वापस लौट्ने के लिए आवाज़ लगाती है. तो जब लता-जी गाने की 'रेकॉर्डिंग' के बाद 'रेकॉर्डिंग रूम' से बाहर आईं, तो सी एल रावल साहब ने सोनिक ओमी से कहा, "ओमी, यह गाना सुनने के बाद भी अगर 'हीरो' वापस ना आए तो भाड में जाए". यह सुनकर वहाँ मौजूद सभी ज़ोर से हंस पडे. आप भी सुनिए और सुनकर अपनी राय 'पोस्ट' करना मत भूलिएगा.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. इस गीत में दो गायकों ने जम कर एक दूजे का मुकाबला किया है, एक हैं मन्ना डे...
२. राजेंदर कृष्ण ने बोल लिखे हैं इस बेमिसाल गीत के जिसका वाकई कोई सानी नहीं है.
३. मुखड़े में दूसरे गायक ने जिसका नाम हमने आपको नहीं बताया जो पंक्तियाँ गाते हैं उसमें शब्द है -"जाल"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम-
नीरज जी, मनु जी और सलिल जी सही जवाब, हाँ सही है ये ग़ज़ल नहीं गीत है, अंतिम अंतरा भी बहुत सुना हुआ है सही है, पर रिकॉर्ड में जो हमारे पास उपलब्ध था उसमें नहीं मिला. यदि इस गीत का पूरा संस्करण किसी श्रोता के पास मौजूद हो तो हमें उपलब्ध करवायें. संगीता जी आपका भी आभार. शरद जी देर से आये लेकिन दुरुस्त आये


खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




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