Showing posts with label sajjad ali. Show all posts
Showing posts with label sajjad ali. Show all posts

Thursday, November 17, 2016

मोहब्बत की कहानी आँसूओं में पल रही है.. सज्जाद अली ने शहद-घुली आवाज़ में थोड़ा-सा दर्द भी घोल दिया है

महफ़िल ए कहकशाँ 16




सज्जाद अली 
दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है पाकिस्तानी गायक सज्जाद अली की आवाज़ में एक नज़्म| 






मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 

स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी



Wednesday, November 24, 2010

मोहब्बत की कहानी आँसूओं में पल रही है.. सज्जाद अली ने शहद-घुली आवाज़ में थोड़ा-सा दर्द भी घोल दिया है

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०३

माफ़ी, माफ़ी और माफ़ी... भला कितनी माफ़ियाँ माँगूंगा मैं आप लोगों से। हर बार यही कोशिश करता हूँ कि महफ़िल-ए-ग़ज़ल की गाड़ी रूके नहीं, लेकिन कोई न कोई मजबूरी आ हीं जाती है। इस बार घर जाने से पहले यह मन बना लिया था कि आगे की दो-तीन महफ़िलें लिख कर जाऊँगा, लेकिन वक़्त ने हीं साथ नहीं दिया। घर पर अंतर्जाल की कोई व्यवस्था नहीं है, इसलिए वहाँ से महफ़िलों की मेजबानी करने का कोई प्रश्न हीं नहीं उठता था। अंत में मैं हार कर मन मसोस कर रह गया। तो इस तरह से पूरे तीन हफ़्ते बिना किसी महफ़िल के गुजरे। अब क्या करूँ!! फिर से माफ़ी माँगूं? मैं सोच रहा हूँ कि हर बार क्षमा-याचना करने से अच्छा है कि पहले हीं एक "सूचना-पत्र" महफ़िल-ए-ग़ज़ल के दरवाजे पर चिपका दूँ कि "मैं महफ़िल को नियमित रखने की यथा-संभव कोशिश करूँगा, लेकिन कभी-कभार अपरिहार्य कारणों से महफ़िल अनियमित हो सकती है। इसलिए किसी बुधवार को १०:३० तक आपको महफ़िल खाली दिखे या कोई रौनक न दिखे, तो मान लीजिएगा कि इसके मेजबान को ऐन मौके पर कोई बहुत हीं जरूरी काम निकल आया है। फिर उस बुधवार के लिए मुझे क्षमा करके अगले बुधवार को महफ़िल की राह जरूर ताकिएगा, क्योंकि महफ़िल आएगी तो बुधवार को हीं और ९:३० से १०:३० के बीच किसी भी वक़्त। अगर आप ऐसा करते हैं तो मैं आप सभी का आभारी रहूँगा। धन्यवाद!"

चलिए तो आज की महफ़िल में शमा जलाते हैं। आज की महफ़िल जिस नज़्म से सजने वाली है, जिस नज़्म के नाम है... उस नज़्म को अपनी आवाज़ से मक़बूल किया है पाकिस्तान के बहुत हीं जाने-माने सेमि-क्लासिकल एवं पॉप गायक, अभिनेता , निर्माता और निर्देशक सज्जाद अली ने। आपको शायद याद हो कि पिछले साल ९ दिसम्बर को हमने "शामिख फ़राज़" जी के आग्रह पर "अहमद फ़राज़" की ग़ज़ल "अब के बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिले" सुनवाई थी, जिसे इन्हीं सज्जाद साहब ने गाया था। उस वक़्त हमने इनका छोटा-सा परिचय दिया था। तो पहले उसी परिचय से शुरूआत करते हैं:

सज्जाद अली के अब्बाजान साजन(वास्तविक नाम: शफ़क़त हुसैन) नाम से मलयालम फिल्में निर्देशित किया करते हैं। ७० के दशक से अबतक उन्होंने लगभग ३० फिल्में निर्देशित की हैं। मज़े की बात यह है कि खुद तो वे हिन्दुस्तान में रह गए लेकिन उनके दोनों बेटों ने पाकिस्तान में खासा नाम कमाया। जैसे कि आज की गज़ल के गायक सज्जाद अली पाकिस्तान के जानेमाने पॉप गायक हैं, वहीं वक़ार अली एक जानेमाने संगीतकार। सज्जाद अली का जन्म १९६६ में कराची के एक शिया मुस्लिम परिवार में हुआ था। बचपन से हीं इन्हें संगीत की शिक्षा दी गई। शास्त्रीय संगीत में इन्हें खासी रूचि थी। उस्ताद बड़े गुलाम अली खान, उस्ताद बरकत अली खान, उस्ताद मुबारक अली खान, मेहदी हसन खान, गुलाम अली, अमानत अली खान जैसे धुरंधरों के संगीत और गायिकी को सुनकर हीं इन्होंने खुद को तैयार किया। इनका पहला एलबम १९७९ में रीलिज हुआ था, जिसमें इन्होंने बड़े-बड़े फ़नकारों की गायिकी को दुहराया। उस एलबम के ज्यादातर गाने "हसरत मोहानी" और "मोमिन खां मोमिन" के लिखे हुए थे। यूँ तो इस एलबम ने इन्हें नाम दिया लेकिन इन्हें असली पहचान मिली पीटीवी की २५वीं सालगिरह पर आयोजित किए गए कार्यक्रम "सिलवर जुब्ली" में। दिन था २६ नवंबर १९८३. "लगी रे लगी लगन" और "बावरी चकोरी" ने रातों-रात इन्हें फर्श से अर्श पर पहुँचा दिया। एक वो दिन था और एक आज का दिन है...सज्जाद अली ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। अप्रेल २००८ में "चहार बलिश" नाम से इन्होंने अपना एलबम रीलिज किया, जिसमें "चल रैन दे"(यह गाना वास्तव में जुलाई २००६ में मार्केट में आया था और इस गाने ने उस समय खासा धूम मचाया था) भी शामिल है। इनके बारे में इससे ज्यादा क्या कहा जाए कि खुद ए०आर०रहमान इन्हें "ओरिजिनल क्रोसओवर" मानते हैं।

रहमान इन्हें "ओरिजिनल क्रोसओवर" मानते हैं और कहते हैं कि: "From the realm of the classical, he metamorphosed into one of the brightest lights of Pakistani pop.Always striking the right note, and never missing a beat, even the most hardened purist has to give Sajjad his due. This man can breathe life in a Ghazal even as he puts the V back into verve. He is one of the very few singers in Pakistan who seems a complete singer. As far as skill is concerned I feel nobody compares to Sajjad Ali. He is simply too good at everything he chooses to create." यानि कि "शास्त्रीय संगीत के साम्राज्य से चलकर सज्जाद ने पाकिस्तानी पॉप की चमकती-धमकती दुनिया में भी अपनी पकड़ बना ली है। ये हमेशा सही नोट लगाते हैं और एक भी बीट इधर-उधर नहीं करते, इसलिए जो "प्युरिस्ट" हैं उन्हें भी सज्जाद का महत्व जानना चाहिए। ये ग़ज़लों में जान फूँक देते हैं और गानों में जोश का संचार करते हैं। ये पाकिस्तान के उन चुनिंदे गायकों में से हैं जिन्हें एक सम्पूर्ण गायक कहा जा सकता है। जहाँ तक योग्यता की बात है तो मेरे हिसाब से सज्जाद अली की कोई बराबरी नहीं कर सकता। ये जो भी करते हैं, उसमें शिखर तक पहुँच जाते हैं।"

सज्जाद अली के बारे में हंस राज हंस कहते हैं कि "अगर मेरा पुनर्जन्म हो तो मैं सज्जाद अली के रूप में जन्म लेना चाहूँगा।" तो इतनी काबिलियत है इस एक अदने से इंसान में।

"विकिपीडिया" पर अगर देखा जाए तो इनके एलबमों की फेहरिश्त इतनी लंबी है कि किसे चुनकर यहाँ पेश करूँ और किसे नहीं, यह समझ नहीं आता। फिर भी मैं कुछ हिट सिंगल्स की लिस्ट दिए देता हूँ:

बाबिया, चल उड़ जा, कुछ लड़कियाँ मुझे, चीफ़ साब, माहिवाल, तस्वीरें, जादू, झूले लाल, चल झूठी, दुआ करो, प्यार है, पानियों में, सोहनी लग दी, सिन्ड्रेला, तेरी याद, ऐसा लगा, कोई नहीं, ना बोलूँगी (रंगीन), चल रैन दे (जिसका ज़िक्र हमने पहले भी किया है), पेकर (२००८)

कुछ सालों से सज्जाद गायकी की दुनिया में नज़र नहीं आ रहे थे, लेकिन अच्छी खबर ये है कि अभी हाल में हीं इन्होंने "शोएब मंसूर" की आने वाली फिल्म "बोल" के लिए एक गाना रिकार्ड किया है। इसी अच्छी खबर के साथ चलिए हम अब आज की नज़्म की ओर रूख करते हैं।

हम अभी जो नज़्म सुनवाने जा रहे हैं उसे हमने "सिन्ड्रेला" एल्बम से लिया है, जो २००३ में रीलिज हुई थी। इस नज़्म में सज्जाद अली की आवाज़ की मिठास आपको बाँधे रखेगी, इसका मुझे पूरा यकीन है। नज़्म का उनवान है "पानियों में"..

पानियो में चल रही हैं,
कश्तियाँ भी जल रही हैं,
हम किनारे पे नहीं हैं.. हो..

ज़िंदगी की _______,
है मोहब्बत की कहानी,
आँसूओं में पल रही है... हो..

जो कभी मिलते नहीं हैं,
मिल भी जाते हैं कहीं पर,
ना मिलें तो ग़म नहीं है.. हो..

दूर होते जा रहे हैं,
ये किनारे, वो किनारे,
ना तुम्हारे, ना हमारे... हो..




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "बिछड़" और शेर कुछ यूँ था-

ईंज मैं रोई, जी मैं बिछड़ के खोई,
कूंज (गूंज) तड़प दीदार बिना

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

मुझसे बिछड़ के ख़ुश रहते हो
मेरी तरह तुम भी झूठे हो (बशीर बद्र)

बिछड़ कर हम से कहाँ जाओगे
तासीर हमारी वापिस ले आएगी (मंजु जी)

शायद कोई रोयेगा अपनी कब्र पर भी
बिछड़ जाने की रस्म निभानी ही होगी (शन्नो जी)

बिछड़ के भी वो मुझसे दूर रह न सका
आंख से बिछड़ा और दामन मैं रह गया (अवनींद्र जी)

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों मैं मिले
जैसे सूखे हुए कुछ फूल किताबों मैं मिले (अहमद फ़राज़)

हर बार की तरह पिछली महफ़िल में भी मैं शब्द गायब करना भूल गया। सजीव जी ने इस बात की जानकारी दी। सजीव जी, आपका धन्यवाद! वैसे उस महफ़िल की शोभा बनीं पूजा जी (शायद पहली बार :) ).. पूजा जी, इस उपलब्धि के लिए आपको ढेरों बधाईयाँ। मंजु जी, जन्मदिवस की बधाईयों को स्वीकार करते हुए मैं आपको तह-ए-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। आपने मेरे लिए जो पंक्तियाँ लिखीं, जो दुआएँ दीं (जीवेत शरद: शतम) उसकी प्रशंसा के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। ताज मैंने नहीं पहनाया, ताज आपने मुझे पहनाया है। शन्नो जी, आप सबसे थोड़ा-बहुत मजाक कर लूँ, इतना हक़ तो मुझे है हीं। है ना? :) पंजाबी तो मुझे भी नहीं आती (आ जाती, अगर कोई पंजाबन मिल जाती मुझे.. लेकिन मिली हीं नहीं :) ) , इसलिए तो आप सबसे कहा था कि रिक्त स्थानों की पूर्ति कर दें। लेकिन यह नज़्म भी "तन्हा" हीं रह गई, किसी ने भी इसे पूरा करके इसका साथ नहीं दिया। खैर, लगता है कि अब किसी पंजाबन को हीं ढूँढ कर कहना होगा कि बताओ हमारे "राहत" भाईसाब क्या कह रहे हैं और उन पंक्तियों का अर्थ क्या निकलता है। हा हा.. अवनींद्र जी, आप देर आए, लेकिन आए तो सही.. आपके बिना महफ़िल में कमी-सी रह जाती। ये क्या, आपको अहमद फ़राज़ साहब का नाम नहीं याद आ रहा था। कोई बात नहीं, आप हीं के लिए हमने आज के पोस्ट में अहमद साहब की उसी ग़ज़ल का लिंक दिया है, वहाँ जाकर ग़ज़ल पढ लें, सुन लें और उनके बारे में जान भी लें। यह आपके लिए गृह-कार्य है। करेंगे ना? :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, December 9, 2009

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें...सज्जाद अली ने कुछ यूँ उम्मीद जगाई, साथ हैं फ़राज़ के शब्द

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६१

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं शामिख जी की पसंद की पहली गज़ल लेकर। आज की गज़ल की बात करें, उससे पहले मैं दो सप्ताह की अपनी गैर-हाज़िरी के लिए आप सबसे माफ़ी माँगना चाहूँगा। कुछ ऐसी वज़ह हीं आन पड़ी थी कि मुझे गज़लों की इस शानदार और जानदार महफ़िल को कुछ दिनों के लिए बंद करना पड़ा। लेकिन कोई बात नहीं, गज़लों की रूकी हुई यह गाड़ी दो सप्ताह के बाद फिर से पटरी पर आ गई है और निकट भविष्य में इसकी गति कम होने की मुझे कोई संभावना नज़र नहीं आ रही। तो चलिए आज की महफ़िल की शुरूआत कर हीं देते हैं। तो आज जो गज़ल हम आपको सुनवाने जा रहे हैं वह यूँ तो मेहदी हसन साहब की आवाज़ में भी उपलब्ध थी, लेकिन हमने जान-बूझकर एक कम-चर्चित गायक की गाई हुई गज़ल को चुना। वैसे इस गायक को कम-चर्चित भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि पाकिस्तानी फिल्मों में इन्होंने बहुत सारे गाने गाए हैं। इस फ़नकार के अब्बाजान साजन(वास्तविक नाम: शफ़क़त हुसैन) नाम से मलयालम फिल्में निर्देशित किया करते हैं। ७० के दशक से अबतक उन्होंने लगभग ३० फिल्में निर्देशित की हैं। मज़े की बात यह है कि खुद तो वे हिन्दुस्तान में रह गए लेकिन उनके दोनों बेटों ने पाकिस्तान में खासा नाम कमाया। जैसे कि आज की गज़ल के गायक सज्जाद अली पाकिस्तान के जानेमाने पॉप गायक हैं, वहीं वक़ार अली एक जानेमाने संगीतकार। सज्जाद अली का जन्म १९६६ में कराची के एक शिया मुस्लिम परिवार में हुआ था। बचपन से हीं इन्हें संगीत की शिक्षा दी गई। शास्त्रीय संगीत में इन्हें खासी रूचि थी। उस्ताद बड़े गुलाम अली खान, उस्ताद बरकत अली खान, उस्ताद मुबारक अली खान, मेहदी हसन खान, गुलाम अली, अमानत अली खान जैसे धुरंधरों के संगीत और गायिकी को सुनकर हीं इन्होंने खुद को तैयार किया। इनका पहला एलबम १९७९ में रीलिज हुआ था, जिसमें इन्होंने बड़े-बड़े फ़नकारों की गायिकी को दुहराया। उस एलबम के ज्यादातर गाने "हसरत मोहानी" और "मोमिन खां मोमिन" के लिखे हुए थे। यूँ तो इस एलबम ने इन्हें नाम दिया लेकिन इन्हें असली पहचान मिली पीटीवी की २५वीं सालगिरह पर आयोजित किए गए कार्यक्रम "सिलवर जुब्ली" में। दिन था २६ नवंबर १९८३. "लगी रे लगी लगन" और "बावरी चकोरी" ने रातों-रात इन्हें फर्श से अर्श पर पहुँचा दिया। एक वो दिन था और एक आज का दिन है...सज्जाद अली ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। अप्रेल २००८ में "चहार बलिश" नाम से इन्होंने अपना एलबम रीलिज किया, जिसमें "चल रैन दे"(यह गाना वास्तव में जुलाई २००६ में मार्केट में आया था और इस गाने ने उस समय खासा धूम मचाया था) भी शामिल है। इनके बारे में इससे ज्यादा क्या कहा जाए कि खुद ए०आर०रहमान इन्हें "ओरिजिनल क्रोसओवर" मानते हैं। वैसे कहने को और भी बहुत कुछ है, लेकिन बाकी बातें कभी अगली कड़ी में। अब हम रूख करते हैं इस गज़ल के गज़लगो "अहमद फ़राज़" साहब की ओर।

सबको मालूम है कि फ़राज़ साहब का इंतकाल पिछले साल २५ अगस्त को हुआ था। सबको मालूम है कि उन्हें २००४ में हिलाल-ए-इम्तियाज़ से नवाज़ा गया था और उन्होंने यह कहकर यह सम्मान लौटा दिया था कि "मेरा ईमान मुझे माफ़ नहीं करेगा अगर मैं पाकिस्तान में हो रही इन घटनाओं का मूक दर्शक बना रहूँ। कम से कम मैं इतना तो कर हीं सकता हूँ कि मैं इस तानाशाही सरकार को यह दिखा दूँ कि मौलिक अधिकारों को छीनने वाली यह सरकार लोगों के दिलों में कैसा मकाम रखती है। इसलिए मैं हिलाल-ए-इम्तियाज़ को लौटा रहा हूँ और अपने आप को इस हुकूमत से हमेशा के लिए अलग करता हूँ।" लेकिन कुछ बाते हैं जो सबको मालूम नहीं। और वे हैं फ़राज़ साहब का चुटकीला अंदाज़, हर बात को हँसी में उड़ा जाने की अदा। जैसे कि यूँ तो उन्हें हिलाल-ए-इम्तियाज़ २००४ में मिला, लेकिन उन्होंने इसे लौटाया २००६ में। तो इस मामले में किसी ने उनसे पूछा कि "दो साल की देरी क्यों?" तो उनका जवाब था कि "आपको क्या लगता है कि इन दो सालों में इसने कुछ अंडे दे दिए हैं क्या..यह आज भी वही है।" कहते हैं कि एक बार कुछ लोग फ़राज़ साहब के दरवाजे पर आए और उनसे कहने लगे कि "क्या तुम कलमा सुना सकते हो?" फ़राज़ साहब ने तपाक से जवाब दिया "क्यों? पुराने कलमे में कोई बदलाव आ गया है क्या?" फ़राज़ साहब से एक बार पूछा गया कि १९४७ के पाकिस्तान और आज के पाकिस्तान में क्या फ़र्क महसूस करते हैं। उनका जवाब था: "१९४७ में मुस्लिम लीग के प्रेसीडेंट का नाम मुहम्मद अली जिन्ना था और आज चौधरी गुजरात हुसैन है"। यह तो हुआ उनका मज़ाकिया लहज़ा। लेकिन असल में फ़राज़ साहब ४७ के पाकिस्तान और आज के पाकिस्तान में कोई फ़र्क नहीं महसूस करते थे। उनसे जब पूछा गया कि आजकल वे जोश-औ-जुनूं वाली क्रातिकारी कविताएँ क्यों नहीं लिखते। तो उनका जवाब था:"क्योंकि मैं एक हीं चीज हर बार नहीं लिखना चाहता। पाकिस्तान में चीजें नहीं बदलतीं और इसीलिए मेरी लिखी हुई पुरानी कविताएँ भी पुरानी नहीं होती..उनका आज भी उतना हीं महत्व है, जितना पहले था।" फ़राज़ हमेशा हीं सैनिक शासन के खिलाफ़ रहे थे, तब भी जब उनके बाकी साथियों ने सरकार का साथ देना मुनासिब समझा था। इस मामले में फ़राज़ दृढ-संकल्प थे। उनका कहना था कि "मैं निरंकुशता के खिलाफ़ था, हूँ और रहूँगा। माना कि वक्त बुरा है लेकिन ऐसा वक्त भी नहीं आया कि मुझे किसी के डर से देश छोड़ना पड़े। मैं घर पर हीं रहकर उनका विरोध करूँगा।" लेकिन ज़िया के शासनकाल में उन्हें भी देशनिकाला सहना पड़ा। छ: साल तक वे देश से बाहर रहे। इस मामले में वे "फ़ैज़" के उत्तराधिकारी साबित हुए। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो उन्हें फ़ैज़ के पास ला खड़ा करते हैं। इसलिए कई लोगों का यह मानना है कि सही मायने में फ़ैज़ की परछाई किसी में नज़र आती थी तो वे फ़राज़ हीं थे। फ़राज़ न सिर्फ़ क्रांति के कवि थे बल्कि प्रेम के मामले में भी उनका कोई सानी न था। कहते हैं कि ऐसा कोई प्रेम-पत्र नहीं जिसमें फ़राज़ का शेर शामिल न हो। १९५४ की बात है, जब फ़राज़ पेशावर के इस्लामिया कौलेज़ में पढा करते थे। तब अपने दोस्तों को घेर कर रोमांटिक कविताएँ सुनाना उनकी दैनिक आदत थी। उस समय लड़के-लड़कियाँ खुलेआम आपस में बात नहीं किया करते थे। फिर भी फ़राज़ को लड़कियों की चिट्ठियाँ आती थीं, वो भी न सिर्फ़ अपने कौलेज से, बल्कि शहर के दूसरे कौलेजों से भी। ऐसा असर था फ़राज़ की लेखनी में...

चलते-चलते फ़राज़ के बारे में कुछ शब्द "भारतीय साहित्य संग्रह" पर उपलब्ध फ़राज़ की पुस्तक "खानाबदोश" की समीक्षा से: अहमद फ़राज़ उर्दू के एक समर्थ, सजग और जीवन्त कवि हैं। उनकी कविता जितनी पाकिस्तानी है उतनी ही भारतीय। ऐसा इसलिए कि उर्दू में दोनों देशों के बीच बँटवारा नहीं साझा है। हम यहाँ यह याद कर सकते हैं कि पाकिस्तान बनने के बाद वहाँ के अब तक के सबसे बड़े कवि फ़ैज अहमद फ़ैज़ की भारत में लोकप्रियता और प्रतिष्ठा रही है। जैसे फ़ैज़ में वैसे ही अब अहमद फ़राज़ में यह साफ़ पहचाना जा सकता है कि सरहदों के पार और उनके बावजूद, हमारे समय में हम जिन प्रश्नों, अन्तर्विरोधों, तनावों, बेचैनियों और जिज्ञासाओं से घिरे हैं, उन्हें यह कविता सीधे और निहायत आत्मीय आवाज़ में सम्बोधित करती है। एक बार फिर यह कविता इस सच्चाई का इज़हार है और एसर्शन भी। फ़राज़ की कविता ज़िन्दादिल कविता है, उसमें हमेशा एक क़िस्म की स्फूर्ति है; तब भी वह किसी रूमानी अवसाद में डूबी है। वह ऐसी कविता भी है, जो आदमी और उसके बेशुमार रिश्तों की दुनिया को कविता के भूगोल में स्मरणीय ढंग से विन्यस्त करने की चेष्टा करती है। भले उतनी उदग्र न हो जितनी, मस्लन पाब्लो नेरुदा या कि फ़ैज़ की कविता रही है, वह इसी परंपरा में है जिसमें प्रेम और क्रान्ति में, रूमानी सच्चाई और सामाजिक सच्चाई में बुनियादी तौर पर कोई विरोध भाव नहीं है। उसकी आधुनिकता परम्परा का विस्तार है, उसका अवरोध नहीं। वह अपने समय से जो रिश्ता बनाती है वह सीधा-सादा न होकर ख़ासा जटिल है। वह समय को निरी समकालीनता के बाड़े से निकाल कर उसे थोड़ा पीछे और कुछ आगे ले जानी वाली कविता है। फ़राज़ की ज़ुबान में मिठास और अपनी दुनिया में रचे-बसे होने की अनुगूँजें हैं। ज़रूरी होने पर बेबाकी, तीखापन और तंज़ भी है। उसमें उर्दू की अपनी समृद्ध परम्परा की कृतज्ञ याद है। उसमें लयों, बहरों, छन्दों की आश्चर्यजनक विविधता और क्षमता है। सबसे बढ़कर उसमें खुलापन है, जो अहमद फ़राज़ के इन्सानी तौर पर भरे पूरे और चौकन्ने होने का सबूत है। वह मित्र-कविता है जो हमसे आत्मीयता और आत्मविश्वास के साथ बात करती है और हमारे विश्वास आसानी से जीत लेती है। चलिए आज की महफ़िल की समाप्ति अहमद फ़राज़ के इस शेर से करते हैं, जिसमें मोहब्बत की हद बताई गई है:

तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे|


इस शेर के बाद चलिए हम अब १९९५ में रीलिज हुई पाकिस्तानी फिल्म "चिफ़ साहब" से इस गज़ल को सुनते हैं, जिसका हर एक मिसरा न जाने कितनी दास्तान सुना जाता है। तो दिल पर हाथ रखकर इस गज़ल का आनंद लें:

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुये फूल किताबों में मिलें

ढूँढ उजड़े हुये लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें

तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इन्साँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें

अब न वो मैं हूँ न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़'
जैसे दो साये तमन्ना के _____ में मिलें




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "नसीब" और शेर कुछ यूं था -

हाँ नसीब अपने ही सो गए,
हाय हम क्या से क्या हो गए..

सही शब्द के साथ महफ़िल में सबसे पहली हाज़िरी लगाई "मुरारी पारीक" जी ने। मुरारी जी आपका महफ़िल-ए-गज़ल में हार्दिक स्वागत है। आप आगे भी महफ़िल की शोभा बढाते रहें, इसी कामना के साथ आपका यह शेर पेश-ए-खिदमत है:

जो खिल उठें गुलाब मेरे दिल के बाग़ में
रब्बा, मेरे "नसीब" में ऐसी बहार दे (चरागे-दिल वर्ल्ड प्रेस से)

सजीव जी, आगे से आपको शिकायत करने का मौका नहीं मिलेगा :) इस बार समय की कमी के कारण मैं ज्यादा शोध नहीं कर पाया।

शरद जी, तो कैसी लगी आपकी पसंदीदा नज़्मों पर हमारी यह पेशकश? अपनी राय जाहिर ज़रूर कीजिएगा। यह रहा "नसीब" शब्द पर आपका यह शेर:

नसीब आजमाने के दिन आ रहे है
क़रीब उनके आने के दिन आ रहे हैं। (फ़ैज़) क्या हुआ..आज कोई स्वरचित शेर नहीं!!

सीमा जी,आपने भी एक से बढकर एक शेर पेश किए। मसलन:

तेरा हिज्र मेरा नसीब है तेरा ग़म ही मेरी हयात है
मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों तू कहीं भी हो मेरे साथ है। (निदा फ़ाज़ली)

आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया (सुदर्शन फ़ाकिर)

कुलदीप जी, आपका पेश किया शेर भी कमाल का है:

बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार
लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे (राना सहरी)

आप सबके बाद महफ़िल को संभाला शामिख जी ने। शामिख जी, आज से तीन दिनों तक आपकी हीं पसंद की गज़लें पेश होने वाली हैं, इसलिए नदारद मत होईयेगा :) ये रहे आपके शेर:

वही सिपाह-ए-सितम ख़ेमाज़न है चारों तरफ़
जो मेरे बख़्त में था अब नसीब-ए-शहर भी है (अहमद फ़राज़)

नसीब फिर कोई तक़्रीब-ए-क़र्ब हो के न हो
जो दिल में हों वही बातें किया करो उससे (अहमद फ़राज़) संयोग देखिए कि आज हमने जो गज़ल पेश की है, वो भी फ़राज़ साहब की हीं है।

मंजु जी, हर बार की तरह इस बार भी स्वरचित शेर के साथ नज़र आईं:

ऐ मेरे मालिक ! जब -जब मेरा नसीब जगाया ,
तब -तब गम के रोड़े खुशियों के फूल बन महकने लगे .

अंत में महफ़िल सुमित जी के नाम हुई। ये रही आपकी पेशकश:

नसीब में जिसके जो लिखा था वो तेरी महफ़िल में काम आया,
किसी के हिस्से में प्यास आई किसी के हिस्से में जाम आया।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ