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Monday, February 15, 2010

उन सगीत प्रेमियों के लिए जिन्हें आज का संगीत शोर शराबा लगता है उनके लिए है "रोड टू संगम" का संगीत

ताज़ा सुर ताल ०७/ 2010

सुजॊय - सजीव, बहुत ही अफ़सोस की यह बात है कि आजकल कला को लेकर भी हमरे देश में राजनीति और साम्प्रदायिक मनमुटाव हो रही है। मेरा इशारा मुंबई में 'माइ नेम इज़ ख़ान' के प्रदर्शन के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध की तरफ़ है। क्या आपको नहीं लगता कि फ़िल्म निर्माण एक कला है और किसी भी कला को इस तरफ़ की चीज़ों से दूर रखी जानी चाहिए?

सजीव - बिल्कुल! अगर किसी को किसी के ख़िलाफ़ जाना हो तो न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जा सकता है, ना कि उसके फ़िल्म के प्रदर्शन को रोक कर अपनी शक्ति का परिचय देनी चाहिए। ख़ैर, यह सब तो चलता ही रहेगा। अच्छा सुजॊय, हम अफ़सोस की बात कर रहे हैं तो एक अफ़सोस यह भी रहा है कि बहुत सी फ़िल्में हैं जो बेहद उत्कृष्ट होते हुए भी आम जनता तक सही रूप से नहीं पहुँच पाती है, क्योंकि फ़िल्म के निर्माता के पास उतना आर्थिक ज़ोर नहीं होता है कि अपनी फ़िल्म का ढोल पीट पीट कर प्रचार करें। कई फ़िल्में तो किसी थिएटर पर भी नहीं लगती, बल्कि सिर्फ़ फ़िल्म महोत्सवों में ही दिखाई जाती है। ऐसे में फ़िल्म लोगों तक नहीं पहुँचती है और उनका संगीत भी गुमनामी के अंधेरे में खो जाता है।

सुजॊय - ठीक कहा आपने और यह आज की बात नहीं है, यह परंपरा हमारे देश में सालों से चली आ रही है। एक कलाकार के लिए ज़ाहिर है कि यह दुख की बात होती है कि जब उसकी कला का सही सही मूल्यांकन ना हो, उसकी प्रतिभा का सही मूल्यांकन ना हो। लेकिन जैसा कि आज हम यह चलन देखते हैं कि वह चीज़ जो ज़्यादा चलती है बाज़ार में, या लोकप्रियता में, वही उसकी श्रेष्ठता का आधार बन जाती है।

सजीव - हालाँकि सब का अपना अपना नज़रिया होता है चीज़ों को देखने का, उनकी मूल्यांकन करने का, उनकी कसौटी का; लेकिन एक चीज़ ज़रूर है कि लोगों का प्यार, अच्छे फ़िल्म और अच्छे संगीत के जो क़द्रदान हैं, उनके प्यार से बढ़कर पुरस्कार कुछ हो नहीं सकता। 'ताज़ा सुर ताल' एक ऐसा ही मंच है कि जिसमें हम लोकप्रिय फ़िल्मों के साथ साथ ऐसी फ़िल्मों और कलाकारों को भी बराबर की जगह देते हैं जिनका काम उत्कृष्ट तो रहा लेकिन व्यावसायिक्ता की दृष्टि से जिन्होने बहुत ऊँचा मुक़ाम नहीं बनाया। हाल में एक ऐसी ही फ़िल्म आई थी 'रोड टू संगम'। आप में से बहुत से लोगों ने इस फ़िल्म के बारे में सुना भी नहीं होगा, जब कि इस फ़िल्म ने विदेशों में कई कई पुरस्कार जीता है। आज इसी फ़िल्म और इसके गीत संगीत की बातें।

सुजॊय - सजीव, इससे पहले कि इस फ़िल्म की बातें शुरु की जाएँ, आइए इस फ़िल्म का पहला गीत सुन लेते हैं।

गीत - अवल अल्लाह...awwal allah (road to sangam)


सजीव - कैलाश खेर और साथियों की आवाज़ों में यह सुफ़ियाना नग़मा आपने सुना। चार चार संगीतकारों ने इस गीत की धुन बनाई। ये हैं संदेश शांडिल्य, विजय मिश्र, नितिन कुमार हरिया और प्रेम हरिया। कैलाश ने इसमें वही अंदाज़ का परिचय दिया जिस अंदाज़ के लिए वो जाने जाते हैं।

सुजॊय - हाँ, वही उनकी ऊँची आवाज़ और सुफ़ी रंग में रंगा हुआ। "अवल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे, एक नूर ते सब जग उपजया, कौन भले कौन मंदे", कबीरदास के ये बोल, जो गुरु ग्रंथ साहिब में भी पाया जाता है, बहुत ही अच्छे बोल हैं इस पूरे गीत में, और इस ऐल्बम का मेरा तो यही सब से फ़ेवरीट गीत है। वैसे इस गीत का क्रेडिट फ़िल्म के औपचरिक गीतकार सुधीर नेमा को ही दिया गया है।

सजीव - अब दूसरा गीत सुना जाए "वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ पराई जाने रे"।

सुजॊय - सजीव, क्या यह फ़िल्म गांधी जी से संबंधित है? इसलिए पूछ रहा हूँ क्योंकि गांधी जी के इस मनपसंद भजन को शामिल किया गया है।

सजीव - बिल्कुल सही अनुमान लगाया है तुमने। इस फ़िल्म की भूमिका मैं बताउँगा, लेकिन पहले यह भजन सुन लिया जाए। एक अलग ही शैली में इसे कॊम्पोज़ किया है संगीतकार नितिन कुमार हरिया और प्रेम हरिया ने। गाया है कीर्ति सगठिया ने। इस भजन को आम तौर पर जिस रफ़्तार में गाई जाती है, उससे काफ़ी तेज़ गति में गाया गया है। इस भजन के मूल शब्दों के साथ कोई छेड़ छाड़ नहीं की गई है और इसका जो एक पारम्परिक फ़ील है, उसे बरकरार रखा गया है। अनावश्यक साज़ों और बीट्स से फ़्युज़न नहीं किया गया है बल्कि जो भी साज़ या रीदम का इस्तेमाल हुआ है, उससे इस भजन का जो एक नया स्वरूप जन्मा है, वह सुनने में अच्छा लगता है। सुनते हैं।

सुजॊय - सजीव, हो सकता है कि आज की पीढ़ी को इस भजन के शब्दों का अर्थ पता ना हो, इसलिए कम से कम इस गुजराती भजन के मुखड़े का अनुवाद मैं यहाँ करना चाहूँगा। "वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ पराई जाने रे", यानी कि वही सच्चा वैष्णव उसी को कहते हैं जो दूसरों के दुख तक़लीफ़ों को महसूस कर सकता है। "पर दुक्खे उपकार करे तोये, मन अभिमान ना आणे रे" यानी जो अपने सारे मान अभिमान को त्याग कर दुखी लोगों की सहायता करे।

गीत - वैष्णव जन तो तेने कहिए...vaishanav jan to (road to sangam)


सजीव - जैसा कि मैंने वादा किया था कि इस फ़िल्म के बारे में बताउँगा, तो इस फ़िल्म की कहानी का पार्श्व महात्मा गांधी से संबंध रखती है। कहानी शुरु होती है महात्मा गांधी के पोते तुषार गांधी से जिन्हे एक बक्सा मिलता है अपने दादा की अस्थियों का जो कि एक स्थानीय डाक घर में सालों से रखा हुआ था। तुषार निश्चय करता है कि उन अस्थियों को वो गंगा के पवित्र संगम पर प्रवाहित कर देगा। उधर हश्मतुल्लाह (परेश रावल) एक सीधा सादा धर्म भीरु मुसलमान है जो पेशे से एक मेकैनिक है और जो किसी भी किस्म का मशीन ठीक कर सकता है। उसका सम्मान स्थानीय धार्मिक गुटें भी करती हैं और उनके सब से ऊँचे पद के लिए वो एक मज़बूत दावेदार भी हैं। उनका मुख्य प्रतिद्वंदी हैं मोहम्मद अली कसूरी (ओम पुरी)। स्थानीय मौलवी मौलाना क़ुरेशी (पवन मल्होत्रा) भी उनके ख़िलाफ़ हैं। हश्मत के दोस्तों में हैं डॊ. बैनर्जी (जावेद शेख़)। एक दिन हश्मत के पास एक पुरानी वी-८ फ़ोर्ड गाड़ी रिपेयरिंग् के लिए आती है, यह जाने बग़ैर कि उस गाड़ी की कितनी ऐतिहासिक मूल्य है। दरसल किसी ज़माने में उसी गाड़ी में चलकर महात्मा गांधी के अस्थियों को संगम में प्रवाहित किया गया था। अब फिर एक बार उसी गाड़ी का इस्तेमाल होना था। लेकिन हश्मत के शहर में एक बम विस्फ़ोर्ट हो जाती है जिसकी वजह से बहुत से मुसलमान युवकों को पुलिस हिरासत में ले लेती है और उन पर अत्याचार चलाती है। इसके विरोध में वहाँ के मुसलमान लीडर्स, जिनमें शामिल हैं कसूरी और मौलाना क़ुरेशी, स्ट्राइक की घोषणा करते हैं जिसके तहत किसी को भी काम करने से मनाई है। हश्मत भी उनके साथ ही थे लेकिन जैसे ही उनको पता चला कि इस गाड़ी का इस्तेमाल गांधी जी के अस्थियों के विसर्जन की शोभा यात्रा में की जानी है, वो यह निर्णय लेता है कि वो स्ट्राइक में शमिल नहीं होगा और उस गाड़ी को रिपेयर करेगा। इससे उसे काफ़ी विरोध का सामना करना पड़ता है, लेकिन आख़िरकार वो अपने मिशन में सफल हो जाता है।

सुजॊय - बहुत अच्छा प्लॊट है, और कलाकार भी तो एक से बढ़कर एक हैं, जो कलात्मक फ़िल्मों के मज़बूत स्तंभ भी माने जाते हैं। परेश रावल के वर्सेटिलिटी के बारे में तो हम सभी जानते हैं।

सजीव - और सुजॊय, यह फ़िल्म किसी भी तरह का उपदेश नहीं देता, गांधी जी के उसूलों की पाठ नहीं पढ़ाता, बल्कि यह सीधी सीधे पूछता है हम से कि क्या हम ऐसे भावों और विचारों से जगरूक हैं! नवोदित निर्देशक अमित राय की पहली फ़िल्म है और पहली फ़िल्म में उन्होने जो हुनर दिखाया है, ऐसा लगता है कि बहुत दूर तक जाएँगे वो अपने करीयर में। और इस फ़िल्म के निर्माता हैं अमित छेड़ा।

सुजॊय - चलिए अब एक और गीत की गुंजाइश यहाँ पर बनती है, तो सुनते हैं फ़िल्म का तीसरा गाना।

गीत - लब पे आती है दुआ...lab pe aati hai (road to sangam)


सुजॊय - हरीहरण की आवाज़ में यह नात आपने सुनी। सुधीर नेमा इकबाल के शब्दों में कुछ अपनी पंक्तियाँ पिरोई है जब कि हरिया भाइयों ने इसे सधार्नात नात से अलग ट्रीटमेंट देने की कोशिश की है। हम कह सकते हैं कि एक तरह की आशावादी रचना है।

सजीव - और साथ ही साथ देश भक्ति का एक अंग भी है इसमें। इस तरह के नर्मोनाज़ुक गीतों और ग़ज़लों के लिए हरीहरण हमेशा से ही जाने जाते हैं। फ़िल्मों के अलावा ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लें बेशुमार उन्होने गाए हैं, और यह भी यक़ीनन उनके यादगार रचनाओं में शुमार पाएगी।

सुजॊय - अब आगे बढ़ते हैं और सुनते हैं अगला गीत। गीत नहीं, दरअसल यह एक क़व्वाली है विजय मिश्र, ग़ुलाम क़ादिर ख़ान, ग़ुलाम मुर्तुज़ा ख़ान और साथियों की आवाज़ों में। ९ मिनट लम्बी यह क़व्वाली "हम सुबह के भूलों को पता घर का बता दे, ऐ शाह कलंदर हमें तू जीना सीखा दे" एक धार्मिक क़व्वली है, जिसे अगर आप पूरी तरह से ध्याम मग्न होकर सुनें तो एक अलग ही आध्यात्मिक दुनिया में पहुँच जाएँगे।

सजीव - साथ ही धर्म के नाम पर जो अशांति मची रहती है, उसए भी उजागर करते हुए सुधीर नेमा लिखते हैं कि "धर्म ख़तरे में है, उसको बचाने निकले हैं, मज़हबी लोग अब म़ज़हब जताने निकले हैं, लाल आँखें लिए ख़ंजर चलाने निकले हैं, नासमझ लोग अपना घर जलाने निकले हैं"। आइए सुनें।

गीत - हम सुबह के भूलों को पता घर का पता दे...ham subaha ke bhoolon ko (road to sangam)


सजीव - और अब आज का अंतिम गीत "रे मेरे मौला"। है तो इस्लामी रंग इस गीत में भी, लेकिन इसे कुछ मॊडर्ण लुक्स दिए गए हैं। पिछले चार गीतों में जिस तरह का पारंपरिक संगीत संयोजन सुनने को मिला था, उससे अलग रखते हुए इस गीत को थोड़ा सा वेस्टर्ण शैली में कॊम्पोज़ किया है नितिन और प्रेम हरिया ने। सुधीर नेमा के बोल इस गीत में भी सुंदर हैं, और गायक शदब फ़रीदी की आवाज़ भी ताज़े हवा के झोंके की तरह सुनाई देती है। पार्श्व में जो 'कोरल इफ़ेक्ट' डाला गया है, वह भी कुछ कुछ 'काउंटर मेलडी' की तरह प्रतीत होती है।

सुजॊय - तो कुल मिलाकर हम यही कह सकते हैं कि 'रोड टू संगम' का जो म्युज़िक है, उससे हमें दोस्ती करनी चाहिए और हो सके तो यह फ़िल्म भी देखनी चाहिए, क्यों?

सजीव - बिल्कुल देखनी चाहिए, और पता है इस फ़िल्म ने अभी हाल ही में लॊस ऐंजेलेस रील फ़िल्म फ़ेस्टिवल में तीन तीन पुरस्कार जीते हैं, बेस्ट फ़ॊरेन फ़िल्म, बेस्ट फ़ॊरेन फ़िल्म (ऒरिजिनल स्कोर) और बेस्ट फ़ॊरेन फ़िल्म (प्रोडक्शन डिज़ाइन) के कैटेगरीज़ में। एक और मज़ेदार बात बताऊँ इस फ़िल्म के बारे में? यह पहली भारतीय फ़िल्म है जिसके साथ भारतीय डाक विभाग जुड़ी हुई है। मार्केटिंग् और विज्ञापन क्षेत्र में डाक विभाग ने इस फ़िल्म की मदद की है। तभी इस फ़िल्म के पोस्टर में पोस्टकार्ड के उपर फ़िल्म का नाम लिखा गया है और तमाम पब्लिसिटी के माध्यमों में इसी का प्रयोग हो रहा है।

सुजॊय - तो चलिए सुनते हम आज का यह अंतिम गीत, और पाठकों व श्रोताओं से आग्रह करते हैं कि इस फ़िल्म के गीतों के बारे में अपनी राय यहाँ टिप्पणी में ज़रूर लिखें!

गीत - रे मेरे मौला...re mere maula (road to sangam)


"रोड टू संगम" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***
संगीत में बहुत अधिक विविधता न होते हुए भी शोर शराबे के बीच एक सकून भरी सदा है इस फिल्म का संगीत. "हम सुबह के भूलों को" एक मूल कव्वाली है जो यक़ीनन श्रोताओं को बहुत भाएगी. अन्य सभी पारंपरिक रचनाएं हैं, "लैब पे आती है दुआ" अपने वास्तविक रूप में इतनी सुन्दर है कि उसे किसी भी नए रूप में सुनना शायद कुछ लोगों को अटपटा लगे. कुल मिलाकार इस अल्बम को आप अपने कलेक्शन में स्थान दे सकते हैं.

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # १९- "वैष्णव जन तो तेने कहिये" भजन को किस संत कवि ने लिखा था और किस शताब्दी में?
TST ट्रिविया # २० लेज़ली लेविस के साथ मिलकर हरीहरण ने प्रसिद्ध ग्रूप 'कोलोनियल कज़िन्स' की शुरुआत की थी। बताइए वह साल कौन सा था?
TST ट्रिविया # २१ "अवल अल्लाह" गीत इससे पहले भी ८० के दशक की एक फ़िल्म में सुनाई दी थी। बताइए उस फ़िल्म का नाम।


TST ट्रिविया में अब तक -
आखिरकार सीमा जी और तन्हा जी के आलावा भी कोई मैदान में उतरा. रोहित जी स्वागत और बधाई, आपके दोनों जवाब सही हैं, तन्हा जी आपका भी जवाब सही है...आपको भी बधाई

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