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Saturday, May 21, 2016

"तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ अपनी प्रेम कहानी...", दो दोस्तों के इस गीत के बहाने ज़िक्र आनन्द बक्शी और यश चोपड़ा के दोस्ती की


एक गीत सौ कहानियाँ - 82
 

'तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ अपनी प्रेम कहानी...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 82-वीं कड़ी में आज जानिए 1989 की मशहूर फ़िल्म ’चाँदनी’ के गीत "तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ अपनी प्रेम कहानी..." के बारे में जिसे सुरेश वाडकर और नितिन मुकेश ने गाया था। बोल आनन्द बक्शी के और संगीत शिव-हरि का। 

  
फ़िल्म-संगीत में दोस्ती के गानें 70 के दशक में काफ़ी लोकप्रिय हुए थे। "यारी है इमान मेरा...", "ये दोस्ती
सुरेश वाडकर और नितिन मुकेश
हम नहीं तोड़ेंगे...", "तेरे जैसा यार कहाँ, कहाँ ऐसा याराना...", "बने चाहे दुश्मन ज़माना हमारा, सलामत रहे दोस्ताना हमारा...", "दीये जलते हैं, फूल खिलते हैं...", "सात अजूबे इस दुनिया में आठवीं अपनी जोड़ी...", "एक रास्ता दो राही..." जैसे गाने अपने ज़माने के मशहूर गीत रहे हैं। 80 के दशक में भी दोस्ती भरे गीतों का सिलसिला जारी रहा। किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी, मुकेश और मन्ना डे ने रिले-रेस का बैटन अगली पीढ़ी के गायकों को सौंप दिया। मोहम्मद अज़ीज़, शब्बीर कुमार, सुरेश वाडकर, नितिन मुकेश, सूदेश भोसले जैसे गायक अब दोस्ती के गीत गाने लगे। "कुछ भी नहीं रहता दुनिया में लोगों रह जाती है दोस्ती" (ख़ुदगर्ज़), "तेरी मेरी यारी दोस्ती हमारी भगवान को पसन्द है अल्लाह को है प्यारी" (दाता), "इमली का बूटा बेरी का पेड़..." (सौदागर) आदि गीत भी ख़ूब चले थे। यश चोपड़ा की 1989 की फ़िल्म ’चाँदनी’ में भी दो दोस्तों पर एक गीत फ़िल्माया गया था, गीत दोस्ती पर तो नहीं था पर दो दोस्त एक दूसरे से अपनी अपनी प्रेम कहानी सुनाने का अनुरोध कर रहे हैं। गीत का महत्व है क्योंकि दोनों एक ही लड़की से प्यार कर रहे हैं पर इस बात से दोनों अनजान हैं। आनन्द बक्शी का लिखा हुआ नितिन मुकेश (ॠषी कपूर) और सुरेश वाडकर (विनोद खन्ना) का गाया यह गीत है "तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ अपनी प्रेम कहानी, कौन है वो, कैसी है वो तेरे सपनों की रानी?" यह आश्चर्य की बात है कि सुरेश वाडकर कभी ॠषी कपूर का स्क्रीन वॉयस हुआ करते थे, इस हिसाब से सुरेश की आवाज़ ॠषी पर सजने चाहिए थे, पर इस गीत में ऐसा नहीं किया गया।


दोस्ती के इस गीत के बहाने आज चर्चा करने जा रहे हैं यश चोपड़ा और आनन्द बक्शी के दोस्ती की। बक्शी
साहिर लुधियानवी और यश चोपड़ा
साहब के पुत्र राकेश बक्शी के एक अंग्रेज़ी में लिखे लेख से इस दोस्ती का ख़ुलासा हुआ था। भले यश जी और बक्शी साहब ने साथ में 1989 में ही पहली बार काम किया ’चाँदनी’ में, पर दोनों एक दूसरे को बहुत पहले से ही जानते थे। अक्सर फ़िल्मी फ़ंक्शन और पार्टियों में दोनों की मुलाक़ातें होती थीं। उस समय दोनों स्थापित हो चुके थे। यश चोपड़ा का परिचय आनन्द बक्शी से एक नए अन्दाज़ में उस दिन हुआ जिस दिन यश जी के गीतकार साहिर लुधियानवी ने उनसे कहा कि कभी आप आनन्द बक्शी से भी गाने लिखवाइए, वो भी अच्छा लिखते हैं! यश साहब को हैरानी हुई कि साहिर साहब उनके चहेते गीतकार होते हुए भी वो बक्शी साहब का नाम सुझा रहे हैं उनकी फ़िल्मों के लिए। यश जी ने कभी उनसे किसी अन्य गीतकार की परामर्श नहीं माँगी थी और वो साहिर साहब के गीतों से बहुत संतुष्ट थे। और तो और बक्शी साहब ने भी कभी भी यश जी से उन्हें अपनी फ़िल्म में गीत लिखने का मौका देने के लिए कभी भी नहीं कहा। शायद बक्शी साहब यह जानते थे कि साहिर साहब यश जी के पसन्दीदा गीतकार हैं और दोस्त भी, और बक्शी साहब इस बात का सम्मान करते थे। यश चोपड़ा के शब्दों में "बक्शी जी एक बहुत नेक इंसान थे और सर्वोपरि गीतकार भी। बहुत अच्छे अच्छे कवि, शायर और गीतकार आए हैं, पर केवल एक फ़िल्मी गीतकार जो एक बेहतरीन शायर भी हैं, वो हैं सिर्फ़ आनन्द बक्शी!"


यश चोपड़ा के शब्दों में, "एक दिन मेरे पास एक गुल्शन राय आए जो मुझसे अपनी फ़िल्म निर्देशित करवाना
आनन्द बक्शी
चाहते थे। उसमें संगीत आर. डी. बर्मन का था। गुल्शन जी या फिर पंचम, मुझे अभी ठीक से याद नहीं, ने मुझे सुझाव दिया कि गाने लिखवाने के लिए आनन्द बक्शी साहब को साइन करवाया जाए। मुझे ख़ुशी हुई और मैं बक्शी साहब से मिल कर उन्हे इस फ़िल्म में गीत लिखवाने का न्योता दे आया। वो राज़ी भी हो गए बिना कोई सवाल पूछे। लेकिन जैसे ही मैं घर लौटा, मुझे अपराध बोध हुआ और साहिर साहब के लिए बुरा लगा। आख़िर साहिर साहब लम्बे समय से मेरे लिए गीत लिखते चले आ रहे थे और वो मेरे पुराने दोस्त भी थे। इसलिए मुझे उनके साथ ही काम करना चाहिए, ऐसा मुझे लगा, बावजूद इसके कि एक बार साहिर साहब ने ही मुझे बक्शी साहब से गीत लिखवाने के बारे में ज़िक्र किया था। मैं निर्णय ले लिया कि मैं बक्शी साहब के पास जाकर माफ़ी माँग लूँगा। शर्मिन्दा चेहरा लिए मैं बक्शी साहब के पास पहुँचा और माफ़ी माँगते हुए पूरी बात बताई। बक्शी साहब इतने अच्छे स्वभाव के थे कि वो ख़ुश होते हुए कहा कि मैं चाहता था कि आप साहिर साहब के साथ ही काम करें। मुझे लगता है कि साहिर साहब ने कभी बक्शी जी को गीत लेखन के बारे में बारीक़ियाँ बताई थी और उन्हें निर्माता-निर्देशकों से मिलवाया था 1956 से 1964 के दौरान जब बक्शी साहब संघर्षरत थे। बक्शी साहब ने आगे यह भी कहा कि भले हम साथ काम ना करें पर इससे हमारी दोस्ती में कोई असर नहीं पड़नी चाहिए, हम दोस्त बने रहेंगे। मैं तो यही कहूँगा कि मैंने आनन्द बक्शी जैसा आदमी अपनी ज़िन्दगी में नहीं देखा। उन्होंने कभी राजनीति नहीं की, कभी किसी के बारे में ख़राब बातें नहीं की, कभी दूसरे गीतकारों की आलोचना नहीं की। वो बस अपना गाना लिखते और चले जाते बिना इधर उधर की बातें किए। उपरवाले ने जब साहिर साहब को हमसे छीन लिया, तभी मैं दोबारा बक्शी साहब के दरवाज़े जा पहुँचा अपनी फ़िल्म में गीत लिखवाने के लिए। उनके साथ ’चाँदनी’ मेरी पहली फ़िल्म थी। और क्या गाने उन्होंने मुझे दिए इस फ़िल्म में! अविस्मरणीय! उन्होंने आगे चलकर मेरे कई फ़िल्मों में गाने लिखे, और मेरे बेटे आदित्य की पहली और दूसरी निर्देशित फ़िल्मों में भी। हमने साथ में ’चाँदनी’ (1989), 'लम्हे’ (1991), 'परम्परा’ (1992), ’डर’ (1993), ’दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’ (1995), 'दिल तो पागल है’ (1997), 'मोहब्बतें’ (2000), और ’मुझसे दोस्ती करोगे!’ (2002) में काम किया। 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Tuesday, December 16, 2008

तेरे बिना आग ये चांदनी तू आजा...

ग्रेट शो मैन राज कपूर की जयंती पर विशेष


१४ दिसम्बर को हमने गीतकार शैलेन्द्र को उनकी पुण्यतिथि पर याद किया था. गौरतलब ये है कि फ़िल्म जगत में उनके "मेंटर" कहे जाने वाले राज कपूर साहब की जयंती भी इसी दिन पड़ती है. पृथ्वी राज कपूर के एक्टर निर्माता और निर्देशक बेटे रणबीर राज कपूर को फ़िल्म जगत में "ग्रेट शो मैन" के नाम से भी जाना जाता है. हिन्दी फिल्मों के लिए उनका योगदान अमूल्य है. १९४८ में बतौर अदाकार शुरुआत करने वाले राज कपूर ने मात्र २४ साल की उम्र में मशहूर आर के स्टूडियो की स्थापना की और पहली फ़िल्म बनाई "आग" जिसमें अभिनय भी किया. फ़िल्म की नायिका थी अदाकारा नर्गिस. हालाँकि ये फ़िल्म असफल रही पर नायक के तौर पर उनके काम की तारीफ हुई. नर्गिस के साथ उनकी जोड़ी को प्रसिद्दि मिली १९४९ में आई महबूब खान की फ़िल्म "अंदाज़" से. निर्माता निर्देशक और अदाकार की तिहरी भूमिका में फ़िल्म "बरसात" को मिली जबरदस्त कमियाबी के बाद राज कपूर ने फ़िल्म जगत को एक से बढ़कर एक फिल्में दी और कमियाबी की अनोखी मिसालें कायम की. आईये आज उन्हें याद करें उनकी चंद फिल्मों का जिक्र कर.

शुरुआत करते हैं राज साहब की अमर कृति "आवारा" से. ये वो फ़िल्म है जिसने राज कपूर को देश विदेश में एक बड़े कलाकार के रूप में स्थापित किया. भारत में बेहद कामियाब हुई इस लाजवाब फ़िल्म को एशिया और रूस में भी जबरदस्त सराहना मिली. राज साहब की अपनी एक टीम हुआ करती थी जिन पर वो भरोसा करते थे. आर के स्टूडियो में बनी इस पहली फ़िल्म में भी सभी उनके चहेते साथी थे. अभिनेत्री नर्गिस थी जोडीदार तो संगीत का जिम्मा था शंकर जयकिशन शैलेन्द्र और हसरत की टीम पर, आवाजें थी मुकेश (राज कपूर) और लता (नर्गिस) की. इस फ़िल्म में ही पहली बार राज कपूर चैपलिन के भेष में दिखाई दिए थे. हालाँकि ये एक छोटा सा तोहफा था राज का अपने प्रिये अभिनेता के लिए (श्री ४२० में ये अधिक मुखर था),पर सिने प्रेमी इस लघु भूमिका को नही भूले. राज कपूर के प्रशंसकों को ये जानकर खुशी होगी ये परिधान आज भी आर के स्टूडियो ने जतन से सहेज कर रखा हुआ है. राज कपूर और नर्गिस कभी न बिछड़ने वाले प्रेमी युगल के रूप में परदे पर आए और छा गए. फ़िल्म का एक एक गीत एक शाहकार बना था. शीर्षक गीत 'आवारा हूँ' और 'दम भर जो उधर मुंह फेरे ..." के आलावा एक ९ मिनट का स्वप्न दृश्य गीत अपने बहतरीन सेट सज्जा के लिए आज भी जाना जाता है. घुमावदार सीढियों और उड़ते बादलों के बीच (स्वर्ग) में लय पर थिरकरी अप्सराएँ और सब से उपर की सीढ़ी पर खड़ी नायिका गा रही है "तेरे बिना आग ये चांदनी तू आजा ..." नायक काली टी शर्ट और पैंट पहने कहीं नर्क जैसी जगह में तड़प रहा है "ये नही ये नहीं जिन्दगी...." चारों तरफ़ आग है नाचते अस्थि पिंजर और शैतानी मुखौटों से मुक्त हो कर अंत में वह बादलों से निकलता है और ध्वनि होती है "ओम् नम शिवाय..." की. ब्रह्म विष्णु और महेश की त्रिमूर्ति है सीढियों की शुरुआत में नायिका नीचे उतरती है और नायक को ऊपर स्वर्ग की तरफ़ ले चलती है गाती हुई "घर आया मेरा परदेसी...". घुमावदार सीढ़ियों से नायिका के पीछे चलता नायक अंत में नटराज की मूर्ति के आगे पहंचता है. जहाँ से एक नई सड़क चलती है, यहीं खलनायक एक चाकू लिए प्रकट होता है. नायक नायिका का नाम पुकारता है पर जब तक नायिका उस तक पहुंचें नायक एक बार फ़िर गर्त में गिर कर ख़ाक हो जाता है. ये स्वप्न दृश्य एक "विसुअल ट्रीट" है अवश्य देखें -



१९६४ में आई "संगम" राज की पहली रंगीन फ़िल्म थी और पहली ऐसी फ़िल्म जो उन्होंने विदेश में शूट की. दरअसल इसी फ़िल्म ने विदेश में शूट करने का ट्रेंड शुरू किया था. बाद में तो लगभग हर फ़िल्म में एक गीत स्विट्जरलैंड में शूट करना लाजमी हो गया चाहे उसका कहानी से कुछ लेना देना हो या नही. साधारण सी प्रेम त्रिकोण कहानी में भी उनका निर्देशन फ़िल्म की जान था. हालाँकि फ़िल्म कुछ जरुरत से ज्यादी लम्बी थी पर राज साहब हमेशा ही बड़े कैनवास के फिल्मकार थे. राज की हर फ़िल्म की तरह इस फ़िल्म के गीतों ने भी धूम मचायी. "बोल राधा बोल", "बुड्डा मिल गया", "ये मेरा प्रेम पत्र" जैसे लाजवाब गीतों के अलावा एक गीत और था "दोस्त दोस्त न रहा...". जिस खूबसूरती से राज ने इस गीत को फिल्माया फ़िल्म का एक एक किरदार और उसके मन के भावों जिस तरीके परदे पर उभारा गया इस गीत में, वो हिन्दी फ़िल्म क्राफ्ट में राज की दक्षता का जीवंत उदाहरण है.

कुछ साल और आगे बढ़ते हैं. शानदार अभिनय से सजी "तीसरी कसम" और उनकी बेहद महत्वकांक्षी फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" की नकामियाबी ने राज को बहुत बड़ा सदमा दिया. उन्होंने फैसला किया की अब वो अभिनय नही करेंगे. चुनांचे उन्होंने परदे पर उतरा अपने मंझले बेटे ऋषि कपूर को. ऋषि इससे पहले "मेरा नाम जोकर" राज के बचपन की भूमिका निभा चुके थे. साथ ही एक नई नायिका दी उन्होंने फ़िल्म जगत को डिम्पल कपाडिया के रूप में. दोनों ही कलाकार अपनी "टीनएज" अवस्था में थे जब ये फ़िल्म शुरू की. "बॉबी" को हम राज की पहली शो मैन सरीखी फ़िल्म मान सकते हैं जहाँ उन्होंने फ़िल्म को कामियाब बनाने के लिए सभी हथकंडे अपनाए और फ़िल्म को एक "लार्जर देन लाइफ" प्रस्तुति दी. के ऐ अब्बास की लिखी इस प्रेम कहानी में राज ने सब कुछ दिया दर्शकों को. सुखद अंत दिया कहानी को ताकि खतरा कम रहे असफलता का. सुपर हिट संगीत और नए परिधानों में सजा धजा एक प्रेमी युगल जिसने एक पूरी पीढी को प्रेरित किया दीवारों को तोड़ कर प्रेम करने के लिए. ऋषि कपूर अगले २० सालों तक कमोबेश इसी रोमांटिक इमेज में जीये. फ़िल्म का एक दृश्य विशेष ध्यान आकर्षित करता है. युवा नायक नायिका से मिलने उसके घर जाता है. पकौडे बना रही नायिका जब दरवाज़ा खोलती है तो अनजाने में हाथ में लगा आटा अपने बालों में लगा बैठती है. कहते हैं कि जब राज पहली बार नर्गिस के घर गए थे तब कुछ ऐसा ही हुआ था. नायक का नायिका से पूछना "मुझसे दोस्ती करोगी" एक ऐसा संवाद था जिसने आने वाली पीढी के फिल्मकारों को एक लड़का और लड़की की दोस्ती और प्रेम जैसे विषय पर फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया. सूरज बड़जात्या की "मैंने प्यार किया" और करण जौहर की "कुछ कुछ होता है" जैसी फिल्में इसका उदाहरण है. राज साहब की ८४ वीं जयंती पर उन्हें आवाज़ का सलाम.

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