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Sunday, December 6, 2015

मोहनवीणा और विश्वमोहन भट्ट : SWARGOSHTHI – 247 : MOHAN VEENA & VISHWAMOHAN BHATT




स्वरगोष्ठी – 247 में आज

संगीत के शिखर पर – 8 : पण्डित विश्वमोहन भट्ट

मोहनवीणा के अन्वेषक और वादक पण्डित विश्वमोहन भट्ट



रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की आठवीं कड़ी में हम पश्चिम के लोकप्रिय तंत्रवाद्य हवाइयन गिटार या स्लाइड गिटार के परिवर्तित भारतीय रूप ‘मोहनवीणा’ के अन्वेषक और विश्वविख्यात वादक पण्डित विश्वमोहन भट्ट के व्यक्तित्व और कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही इस वाद्य के मूल उद्गम पर भी चर्चा करेंगे। आज हम आपको पण्डित विश्वमोहन भट्ट द्वारा मोहनवीणा पर बजाया राग हंसध्वनि और राग किरवानी की रचनाएँ सुनवाएँगे। 



भारतीय संगीत के कई वाद्ययंत्र ऐसे हैं, जिनका उद्गम वैदिककालीन माना जाता है। एक ऐसा ही तंत्रवाद्य है “मोहनवीणा”। आज के अंक में हम तंत्रवाद्य मोहनवीणा के अन्वेषक और वादक के व्यक्तित्व पर चर्चा कर रहे हैं। यह वाद्य विश्व-संगीत-जगत की लम्बी यात्रा कर आज पुनः भारतीय संगीत का हिस्सा बन चुका है। वर्तमान में “मोहनवीणा” नाम से हम जिस वाद्ययंत्र को पहचानते हैं, वह पश्चिम के 'हवाइयन गिटार' या 'स्लाइड गिटार' का संशोधित रूप है। इस वाद्य के प्रवर्तक हैं, सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित विश्वमोहन भट्ट, जिन्होंने अपने इस अनूठे वाद्य से समूचे विश्व को सम्मोहित किया है। श्री भट्ट इस वाद्य के सर्जक ही नहीं, बल्कि उच्चकोटि के वादक भी हैं। सुप्रसिद्ध सितार वादक पण्डित रविशंकर के शिष्य विश्वमोहन भट्ट का परिवार मुग़ल सम्राट अक़बर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन और उनके गुरु स्वामी हरिदास से सम्बन्धित है। प्रारम्भ में उन्होंने सितार वादन की शिक्षा प्राप्त की, किन्तु 1966 की एक रोचक घटना ने उन्हें एक नये वाद्य के सृजन की ओर प्रेरित कर दिया। एक बातचीत में श्री भट्ट ने बताया था – ‘1966 के आसपास एक जर्मन हिप्पी लड़की अपना गिटार लेकर मेरे पास आई और मुझसे आग्रह करने लगी कि मैं उसे उसके गिटार पर ही सितार बजाना सिखा दूँ। उस लड़की के इस आग्रह पर मैं गिटार को इस योग्य बनाने में जुट गया कि इसमें सितार के गुण आ जाएँ।‘ श्री भट्ट के वर्तमान 'मोहनवीणा' में केवल सितार और गिटार के ही नहीं बल्कि प्राचीन वैदिककालीन तंत्रवाद्य विचित्रवीणा और सरोद के गुण भी हैं। मोहनवीणा का मूल उद्‍गम 'विचित्रवीणा' ही है। श्री भट्ट मोहनवीणा पर सभी भारतीय संगीत शैलियों – ध्रुपद, धमार, ठुमरी आदि का वादन करने में समर्थ हैं। आइए, पहले पण्डित विश्वमोहन भट्ट से मोहनवीणा पर राग 'हंसध्वनि' की एक मोहक रचना सुनते हैं। यह रचना तीनताल में निबद्ध है। तबला-संगति पण्डित रामकुमार मिश्र ने की है।


राग हंसध्वनि : मोहन वीणा पर तीनताल में निबद्ध रचना : विश्वमोहन भट्ट




प्राचीन काल से प्रचलित वाद्य 'विचित्रवीणा' के स्वरूप में समय चक्र के अनुसार बदलाव आते रहे। पाश्चात्य संगीत का हवाइयन गिटार वैदिककालीन विचित्रवीणा का ही सरलीकृत रूप है। वीणा के तुम्बे से ध्वनि में जो गमक उत्पन्न होती है, पाश्चात्य संगीत में उसकी बहुत अधिक उपयोगिता नहीं होती। यूरोप और अमेरिका के संगीत विद्वानों ने अपनी संगीत पद्यति के अनुकूल इस वाद्य में परिवर्तन किया। विचित्रवीणा में स्वर के तारों पर काँच का एक बट्टा फेर (Slide) कर स्वर का परिवर्तन किया जाता है। तारों पर एक ही आघात से श्रुतियों के साथ स्वर परिवर्तन होने से यह वाद्य गायकी अंग में वादन के लिए उपयोगी होता है। प्राचीन ग्रन्थों में गायन के साथ वीणा की संगति का उल्लेख मिलता है। हवाइयन गिटार बन जाने के बाद भी यह गुण बरकरार रहा, इसीलिए पश्चिमी संगीत के गायक कलाकारों का भी यह प्रिय वाद्य रहा। पं. विश्वमोहन भट्ट ने गिटार के इस स्वरुप में परिवर्तन कर इसे भारतीय संगीत वादन के अनुकूल बनाया। उन्होंने एक सामान्य गिटार में 6 तारों के स्थान पर 19 तारों का प्रयोग किया। यह अतिरिक्त तार 'तरब' और 'चिकारी' के हैं जिनका उपयोग स्वरों में अनुगूँज के लिए किया जाता है। श्री भट्ट ने इसकी बनावट में भी आंशिक परिवर्तन किया है। मोहनवीणा के वर्तमान स्वरूप में भारतीय संगीत के रागों को 'गायकी' और 'तंत्रकारी' दोनों अंगों में बजाया जा सकता है। अपने आकार-प्रकार और वादन शैली के बल पर यह वाद्य पूरे विश्व में चर्चित हो चुका है। अब हम आपको मोहनवीणा पर राग किरवानी का रसास्वादन कराते हैं। राग हंसध्वनि की भाँति राग किरवानी भी मूलतः दक्षिण भारतीय राग है, जो उत्तर भारतीय संगीत में समान रूप से प्रचलित है। राग किरवानी की इस रचना में तबला संगति सुखाविन्दर सिंह नामधारी ने की है। आप पण्डित विश्वमोहन भट्ट का बजाया राग किरवानी सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग किरवानी : कहरवा ताल में रचना : विश्वमोहन भट्ट




संगीत पहेली


 ‘स्वरगोष्ठी’ के 247वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक स्वर-वाद्य पर संगीत रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेताओं के साथ ही वार्षिक विजेताओं की घोषणा ‘स्वरगोष्ठी’ के 252वें अंक में की जाएगी।



1 – वाद्ययंत्र पर कौन सा राग बजाया जा रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस वाद्ययंत्र की आवाज़ है? वाद्य का नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 12 दिसम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 249वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 245वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको रुद्रवीणा के सुविख्यात वादक उस्ताद असद अली खाँ द्वारा प्रस्तुत वादन का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – आसावरी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – चौताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य – रुद्रवीणा

इस बार की पहेली के प्रश्नों का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपको पाश्चात्य वाद्य हवाइयन गिटार के भारतीय रूपान्तरण, मोहनवीणा पर दो दक्षिण भारतीय राग सुनवाया। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




 


Sunday, April 13, 2014

अनूठा घन-वाद्य जलतरंग




स्वरगोष्ठी – 163 में आज

संगीत वाद्य श्रृंखला - 1

जल भरे प्यालों से उपजे स्वर-तरंग अर्थात मनोहर संगीत वाद्य जलतरंग



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज एक नवीन श्रृंखला के प्रथम अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ अनूठे वाद्यों की चर्चा करेंगे। वर्तमान में प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का उल्लेख करेंगे। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम आपसे एक प्राचीन वाद्य ‘जलतरंग’ की चर्चा करेंगे। जल से भरे विभिन्न स्वरों के छोटे-बड़े प्यालों पर आघात कर संगीत उत्पन्न करने वाले इस वाद्य के आज देश में कुछ गिने-चुने वादक ही हैं। आज के अंक में आपको इस वाद्य के दो प्रतिभाशाली साधकों की प्रस्तुतियाँ भी सुनवाएँगे। 



‘संगीत रत्नाकर’ ग्रन्थ में यह उल्लेख है कि “गीत, वाद्य और नृत्य का समन्वित रूप ही संगीत है”। प्राचीन ग्रन्थकारों ने कण्ठ संगीत को सर्वश्रेष्ठ माना है। गायन के बाद वाद्य संगीत का स्थान माना गया है। भारतीय संगीत के जो वाद्य आज प्रचलित हैं उन्हें उपयोगिता के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। भारतीय संगीत में ताल एक अनिवार्य तत्त्व होता है। कण्ठ अथवा वाद्य संगीत के साथ ताल पक्ष को प्रदर्शित करने के लिए तबला, पखावज, ढोलक, मृदंगम् आदि वाद्यों का प्रयोग होता है। तानपूरा, स्वरपेटी, स्वरमण्डल आदि ऐसे वाद्य हैं जो संगीत के आधारभूत या रागानुकूल स्वरों का प्रदर्शन मात्र करते हैं। इन वाद्यों से राग या रागांश का वादन नहीं किया जा सकता। कुछ स्वर वाद्य ऐसे हैं जो गायन के साथ सहयोगी होते हैं और इनका स्वतंत्र रूप से वादन भी किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, सारंगी, हारमोनियम, वायलिन, बाँसुरी आदि। संगीत के अधिकतर स्वरवाद्य कण्ठ संगीत की अनुकृति करने का प्रयास करते हैं। संगीत वाद्यों की बनावट और वादन शैली की दृष्टि से समस्त वाद्यों को चार वर्गों- तंत्र, अवनद्ध, सुषिर और घन के रूप में बाँटा गया है। तंत्र अर्थात तार वाले वाद्य तत और वितत वाद्य के रूप में वर्गीकृत किए जाते हैं। इस श्रेणी के कुछ वाद्य तारों पर आघात कर बजाए जाते हैं, जैसे सितार, सरोद आदि। तंत्र वाद्यों के अन्तर्गत ही कुछ वाद्य तारों पर धनुषाकार गज से घर्षण कर बजाए जाते हैं। सारंगी, वायलिन आदि तंत्र वाद्य की श्रेणी में होते है और इन्हें वितत वाद्य कहा जाता है। दूसरी श्रेणी अवनद्ध वाद्यों की है, जिसके अन्तर्गत तबला, पखावज, ढोलक आदि वाद्य आते है। ये वाद्य संगीत के ताल पक्ष को प्रदर्शित करते हैं। तीसरी श्रेणी सुषिर वाद्यों अर्थात हवा के दबाव से या फूँक से बजने वाले वाद्यों की है। बाँसुरी, शहनाई, क्लेरेनेट आदि इसी श्रेणी के वाद्य हैं। वाद्यों की चौथी श्रेणी घन वाद्यों की है। इस श्रेणी में उन वाद्यों को रखा जाता है, जिनमें दो ठोस वस्तुओं को परस्पर टकराने से नाद की उत्पत्ति की जाती है, जैसे- मँजीरा, घण्टी, झाँझ आदि। इस श्रेणी के वाद्य अधिकतर गायन और वादन में लय के लिए प्रयोग किया जाता है।

जलतरंग एक ऐसा संगीत वाद्य है जो घन वाद्य की श्रेणी में माना जाता है, परन्तु यह स्वर वाद्य के रूप में प्रयोग किया जाता है अर्थात इस वाद्य पर धुन या राग बजाए जा सकते हैं। उच्चकोटि के चीनी मिट्टी से बने, पानी भरे, छोटे-बड़े प्यालों पर बाँस की पतली कमचियों से प्रहार कर जलतरंग बजाया जाता है। पानी भरे प्याले विभिन्न स्वरों में मिले होते हैं। जलतरंग वाद्य पर यह चर्चा जारी रहेगी, इससे पूर्व हम इस वाद्य के वादन का एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। हम यह उल्लेख पहले ही कर चुके हैं कि वर्तमान में लुप्तप्राय वाद्य जलतरंग के कुछ गिने-चुने वादक हैं। इन्हीं में एक प्रतिभावान जलतरंग वादक मिलिन्द तुलनकर हैं। सांगीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवार में जन्में मिलिन्द की संगीत शिक्षा जलतरंग के अलावा गायन, सितार और सन्तूर वादन के क्षेत्र में भी हुई। परन्तु उन्होने लुप्तप्राय जलतरंग वादन में दक्षता प्राप्त की। आइए, मिलिन्द तुलनकर का जलतरंग पर बजाया राग किरवानी सुनवाते हैं। यह रचना तीनताल में निबद्ध है।



जलतरंग वादन : राग किरवानी : तीनताल : प्रस्तुति – मिलिन्द तुलनकर




संगीत के प्राचीन ग्रन्थों में यह उल्लेख मिलता है कि जलतरंग का विकास चौथी से छठीं शताब्दी के बीच हुआ था। ‘संगीत पारिजात’ नामक ग्रन्थ में इस वाद्य का उल्लेख है। अष्टछाप कवियों के साहित्य में भी जलतरंग एक मधुर स्वर वाद्य के रूप में वर्णित किया गया है। ‘संगीत सार’ नामक ग्रन्थ में 22 और 15 प्यालों के जलतरंग का विस्तृत वर्णन किया गया है। जलतरंग वादन के लिए अच्छे किस्म के अलग-अलग स्वरों के प्यालों का चुनाव कर उसमें पानी की मात्रा को घाटा-बढ़ा कर एक सप्तक के 12 स्वरों में मिलाना पड़ता है। एक सप्तक में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र स्वर प्रयोग होते हैं। रागों के अनुसार प्यालों की संख्या कम भी हो सकती है। जैसे- राग भूपाली बजाने के लिए शुद्ध व तीव्र मध्यम और शुद्ध व कोमल निषाद के प्याले एक सप्तक में कम किये जा सकते हैं। मध्य सप्तक के आवश्यक स्वरों के अलावा मन्द्र और तार सप्तक के कुछ स्वरों को भी शामिल करना होता है। उदाहरण के तौर पर राग दरबारी बजाने में मन्द्र सप्तक के स्वरों का और राग कामोद के लिए तार सप्तक के स्वरों का प्रयोग आवश्यक होता है। आम तौर पर 24 प्यालों का जलतरंग सभी रागों के लिए पर्याप्त होता है। जलतरंग के प्यालों को चन्द्राकार आकृति में सजाकर रखना चाहिए बड़ा प्याला बाईं ओर और फिर स्वरों के उतरते क्रम से दाहिनी ओर सजाना चाहिए। प्यालों को सही स्वर में मिलाने के लिए पानी की मात्रा को घटाना-बढ़ाना पड़ता है। प्यालों में अधिक पानी डालने पर स्वर नीचा और कम कर देने पर स्वर ऊँचा हो जाता है। जब सभी प्यालों के स्वर ठीक-ठीक मिल जाते हैं तब बाँस की दो दंडियों से इन पर प्रहार करने से वांछित राग अथवा धुन का वादन किया जा सकता है। जलतरंग पर सितार की भाँति गत बजाई जाती है। अब हम आपको वरिष्ठ कलासाधिका रंजना प्रधान द्वारा जलतरंग पर बजाया राग कलावती कल्याण सुनवाते हैं। इस राग में झपताल और तीनताल में दो रचनाएँ आप सुनेंगे। आप इस अनुपम वाद्य के वादन का रसास्वादन करें और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



जलतरंग वादन : राग कलावती कल्याण : झपताल और तीनताल : प्रस्तुति - रंजना प्रधान





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 163वें अंक की संगीत पहेली में आज आपको वाद्य संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 170वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर इस संगीत वाद्य को पहचानिए और हमें उसका नाम लिख भेजिए।

2 – वाद्य संगीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग की झलक मिलती है? हमें राग का नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 165वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 161वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको भोजपुरी क्षेत्र में प्रचलित चैती लोकगीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका शारदा सिन्हा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक से हमने कुछ कम प्रचलित और लुप्तप्राय वाद्यों पर नई लघु श्रृंखला की शुरुआत की है। अगले अंक में हम आपसे एक ऐसे वैदिक संगीत वाद्य की चर्चा करेंगे जो आज परिवर्तित रूप में हमारे सामने उपस्थित है। आप भी यदि ऐसे किसी संगीत वाद्य की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको / श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित / प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों के हमें प्रतीक्षा रहेगी।  


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

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