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Tuesday, June 15, 2010

कहीं "मादनो" की मिठास से तो कहीं "मैं कौन हूँ" के मर्मभेदी सवालों से भरा है "मिथुन" के "लम्हा" का संगीत

ताज़ा सुर ताल २२/२०१०

विश्व दीपक - ’ताज़ा सुर ताल' में हम सभी का स्वागत करते हैं। तो सुजॊय जी, पिछले हफ़्ते कोई फ़िल्म देखी आपने?

सुजॊय - हाँ, 'राजनीति' देखी, लेकिन सच पूछिए तो निराशा ही हाथ लगी। कुछ लोगों को यह फ़िल्म पसंद आई, लेकिन मुझे तो फ़िल्म बहुत ही अवास्तविक लगी। सिर्फ़ बड़ी स्टारकास्ट के अलावा कुछ भी ख़ास बात नहीं थी। कहानी भी बेहद साधारण। ख़ैर, पसंद अपनी अपनी, ख़याल अपना अपना।

विश्व दीपक - पसंद की अगर बात है तो आज हम 'टी.एस.टी' में जिस फ़िल्म के गानें लेकर हाज़िर हुए हैं, मुझे ऐसा लगता है कि इस फ़िल्म के गानें लोगों को पसंद आने वाले हैं। आज ज़िक्र फ़िल्म 'लम्हा' के गीतों का।

सुजॊय - 'लम्हा' बण्टी वालिया व जसप्रीत सिंह वालिया की फ़िल्म है जिसमें मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं संजय दत्त, बिपाशा बासु, कुणाल कपूर, अनुपम खेर ने। निर्देशक हैं राहुल ढोलकिया। संगीत दिया है मिथुन ने, और यह फ़िल्म परदर्शित होने वाली है १६ जुलाई के दिन, यानी कि ठीक एक महीने बाद। जैसा समझ में आ रहा है कि कश्मीर के पार्श्व पर यह फ़िल्म आधारित है। इस फ़िल्म का म्युज़िक लौम्च किया गया है मुंबई के ओबेरॊय मॊल में।

विश्व दीपक - तो चलिए पहला गीत सुना जाए, और शायद यही गीत फ़िल्म का सब से पसंदीदा गीत बनने वाला है, "मादनो", यह गीत जिसे क्षितिज तारे और चिनमयी ने गाया है। बहुत ही ख़ूबसूरत गीत है, सुनते हैं। और हाँ, इस गीत की अवधि है ८ मिनट २६ सेकण्ड्स। वैसे आजकल गीतों की अवधि ५ मिनट से कम ही हो गई है, लेकिन इस फ़िल्म के अधिकतर गीत ६ मिनट से उपर की अवधि के हैं।

गीत: मादनो


सुजॊय - सच में, बेहद सुकूनदायक गीत था, जिसे दूसरे शब्दों में सॊफ़्ट रोमांटिक गीत कहते हैं। कम शब्दों में बस इतना ही कहेंगे कि ऐल्बम की एक अच्छी शुरुआत हुई है इस गीत से। मिथुन सच में एक रिफ़्रेशिंग अंदाज़ में वापस आए हैं। आपको यह भी बता दूँ कि "मादनो" एक कश्मीरी लफ़्ज़ है, जिसका अर्थ होता है "प्रिय"/"प्रेयसी"। इस शब्द को सबसे ज्यादा प्रसिद्धि मिली थी महजूर के लिखे गाने "रोज़ रोज़ बोज़ में ज़ार मादनो" से , जिसे गाया था "ग़ुलाम हसन सोफ़ी" ने।

विश्व दीपक - क्योंकि मिथुन ने बहुत ज़्यादा काम नहीं किया है, इसलिए ज़ाहिर है कि लोगों को उनके बनाए गीतों की याद कम ही रहती है। तो जिन लोगों को मिथुन के गानें इस वक़्त याद नहीं आ रहे हैं, उनके लिए हम बता दे कि मिथुन की शुरुआत महेश भट्ट कैम्प में हुई थी फ़िल्म 'ज़हर' में जिसमें उन्होने "वो लम्हे, वो बातें कोई ना जाने" गीत आतिफ़ असलम से गवाया था। उसके बाद महेश भट्ट की ही एक और चर्चित फ़िल्म 'कलयुग' में भी उन्होने आतिफ़ की आवाज़ का इस्तेमाल किया था "अब तो आदत सी है मुझको जीने में" गीत में। इस तरह से 'बस एक पल' और 'अनवर' जैसी फ़िल्मों में भी उन्होने अतिथि संगीतकार की हैसीयत से एक आध गानें काम्पोज़ किए। इन फ़िल्मों ने भले हीं बहुत ज़्यादा व्यापार ना किया हो, लेकिन मिथुन का स्वरबद्ध हर एक गीत लोगों को पसंद आया, और मिथुन की प्रतिभा को हर किसी ने सराहा।

सुजॊय - और यकीनन 'लम्हा' का संगीत भी लोग खुले दिल से स्वीकार करेंगे। बहरहाल हम आगे बढ़ते हैं और सुनते हैं इस फ़िल्म का दूसरा गीत जिसे गाया है अरुण दागा और मोहम्मद इरफ़ान ने। इस गीत की अवधि है ६ मिनट ५५ सेकण्ड्स।

गीत: सलाम ज़िंदगी


विश्व दीपक - पहले गीत से एक ख़ूबसूरत शुरुआत होने के बाद इस दूसरे गीत में भी एक नयापन है। बच्चों द्वारा गाए कश्मीरी बोलों को सुन कर एक तरफ़ फ़िल्म 'यहाँ' की याद आ जाती है तो कभी 'परिनीता' का "कस्तो मजा है" की भी झलक दिख जाती है।

सुजॊय - "जिस चीज़ को पाने की थी उम्मीद खो चुकी, उस चीज़ को पाकर बहुत दिल को ख़ुशी हुई, सलाम ज़िंदगी सलाम ज़िंदगी" - ये हैं गीत के बोल, और जैसा कि हम देख रहे है यह एक आशावादी गीत है और इस तरह के गानें बहुत बनें हैं, लेकिन इस गीत के अंदाज़ में नयापन है। पार्श्व में मोहम्मद इरफ़ान के शास्त्रीय अंदाज़ में गायन ने गीत को और ज़्यादा असरदार बनाया है। पहले गीत की तरफ़ हो सकता है कि यह गीत उतना अपील ना करे, लेकिन जो भी है, अच्छा गीत है।

विश्व दीपक - अब तीसरे गीत की बारी, और इस बार स्वर पलाश सेन का। बहुत दिनों से उनकी आवाज़ सुनाई नहीं दी थी। इस गीत के साथ वो वापस लौट रहे हैं। अमिताभ वर्मा के ख़ूबसूरत बोलों को पलाश ने असरदार तरीके से ही निभाया है। संगीत में सॊफ़्ट रॊक का इस्तेमाल हुआ है। यह गीत है "मैं कौन हूँ" और इस गीत का म्युज़िक भी रिफ़्रेशिंग है। इसमें कोई शक़ नहीं कि मिथुन अपनी अलग पहचान बनाने की राह पर चल पड़े हैं। अवधि ७ मिनट ११ सेकण्ड्स।

गीत: मैं कौन हूँ


सुजॊय - आजकल गायक मिका को कई हिट गीत गाने के मौके मिल रहे हैं। या फिर युं कहिए कि मिका के गाए गानें हिट हो रहे हैं। भले ही कुछ लोग उन्हे पसंद ना करें और विवादों से भी घिरे रहे कुछ समय के लिए, लेकिन यह ध्यान देने योग्य बात है कि मिका के गाए गानें हिट हो जाते हैं। "दिल में बजी गिटार", "गणपत चल दारू ला", "मौजा ही मौजा", "इबन-ए-बतुता", और भी कई गानें हैं मिका के जो ख़ूब चले। फ़िल्म 'लम्हा' में भी मिथुन ने मिका से एक गीत गवाया है। दरसल यह पहले गीत "मादनो" का ही दूसरा वर्ज़न है, और मिका के साथ चिनमयी की आवाज़ भी शामिल है।

विश्व दीपक - ऐल्बम में इस गीत को "साजना" का शीर्षक दिया गया है। गीत को सुनने से पहले मिका का नाम देख कर मुझे लगा था कि कोई डान्स नंबर होगा, लेकिन काफ़ी आश्चर्य हुआ यह सुन कर कि मिका ने इस तरह का नर्मोनाज़ुक गीत गाया है। साधारणत: लोग मिका के जिस गायन शैली से वाक़ीफ़ हैं, उससे बिलकुल अलग हट के मिका लोगों को हैरत में डालने वाले हैं इस गीत के ज़रिए। यह तो भई वैसी ही बात है जैसी कि हाल ही में दलेर मेहन्दी ने फ़िल्म 'लाहौर' में "मुसाफ़िर" वाला गीत गाकर सब को चकित कर दिया था।

सुजॊय - इस पीढ़ी की अच्छी बात ही यह है कि वह प्रचलित धारा का रुख़ बदलने में विश्वास रखता है। पहले के ज़माने में जो गायक जिस तरह के गीत गाते थे, उनसे लगातार उसी तरह के गीत गवाए जाते थे। लेकिन आजकल कोशिश यही होती है हर कलाकार की कि कुछ नया किया जाए, नए प्रयोग किए जाएँ। चलिए यह गीत सुन लेते हैं। कुल ८ मिनट २५ सेकण्ड्स।

गीत: साजना


विश्व दीपक - अगला गीत क्षितिज तारे की आवाज़ मे है। कम से कम साज़ों का इस्तेमाल हुआ है। के.के के अंदाज़ का गाना है। वैसे क्षितिज ने कमाल का गाया है, लेकिन इसे के.के. की आवाज़ में सुन कर भी उतना ही अच्छा लगता ऐसा मेरा ख़याल है।

सुजॊय - विश्व दीपक जी, शायद आपने ध्यान न दिया हो कि क्षितिज मिथुन के पसंदीदा गायक हैं। मिथुन ने इनसे इस फिल्म से पहले भी कई सारे गीत गवाए हैं। मुझे "अनवर" का "तोसे नैना लागे" अभी भी याद है। क्या खूब गाया था "क्षितिज" और "शिल्पा राव" ने। जहाँ तक आज के इस गीत की बात है तो यह गीत पार्श्व संगीत की तरह प्रतीत होता है। सिचुएशनल गीत है और फ़िल्म को देखते हुए ही इस गीत का महत्व पता चल सकता है। ऒरकेस्ट्रेशन से एम.एम. क्रीम की याद भी आ जाती है, क्योंकि ग्रूप वायलिन्स का इस्तेमाल हुआ है।

गीत: ज़मीन-ओ-आसमान


विश्व दीपक - और अंतिम गीत में मिथुन ने अपनी गायकी का भी लोहा मनवाया है। आजकल 'पाक़ी-पॊप' संगीत का भी चलन है, और इस गीत में उसी की झलक है। याद है ना आपको मिथुन का गाया फ़िल्म 'दि ट्रेन' का गीत "वो अजनबी देखे जो दूर से"?

सुजॊय - अच्छा इसी फ़िल्म 'दि ट्रेन' में एक और गीत है "मौसम" जिसे लिखा है आतिफ़ असलम ने। तो ज़्यादातर लोग समझते हैं कि इस गीत को आतिफ़ ने ही गाया है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि इसे स्वरबद्ध किया और गाया मिथुन ने है। मिथुन ने फ़िल्म 'अगर' में गाया था "के बिन तेरे जीना नहीं" जिसे भी लोगों ने पसंद किया था। तो लीजिए आज एक लम्बे समय के बाद सुनिए मिथुन की आवाज़ और उनके साथ हैं मोहम्मद इरफ़ान।

गीत: रहमत ज़रा


"लम्हा" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****

मिथुन से हमेशा हीं उम्मीदें रहती है, और इस बार मिथुन उम्मीद पर खड़े उतरे हैं। चूँकि फिल्म कश्मीर पर आधारित है, इसलिए मिथुन को कहानी से भी सहायता मिली... अपनी तरह का संगीत देने में। फिल्म चाहे सफल या हो असफल , लेकिन हम लोगों से यही दरख्वास्त करेंगे कि गानों को नज़र-अंदाज़ न करें। एक बार जरूर सुनें, हमें यकीन है कि एक बार सुनने के बाद आप खुद-बखुद इन गानों से खुद को जुड़ा महसूस करेंगे। इन्हीं बातों के साथ अगली समीक्षा तक के लिए हम आपसे अलविदा कहते हैं।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ६४- संगीतकार व गायक मिथुन के पिता एक जाने माने बैकग्राउण्ड स्कोरर थे जिन्होने २०० से उपर फ़िल्मों का पार्श संगीत तय्यार किया है। बताइए उनका नाम।

TST ट्रिविया # ६५- २००८ में मिथुन ने एक ऐसी फ़िल्म में संगीत दिया था जिस शीर्षक से एक हास्य फ़िल्म बनी थी जिसमें फ़ारूख़ शेख़ नायक थे और जिसमें येसुदास और हेमन्ती शुक्ला का गाया एक लोकप्रिय युगल गीत था।

TST ट्रिविया # ६६- आप एक मेडिकल डॊकटर हैं, और एक उम्दा गायक भी हैं, एक अभिनेता भी हैं। आपका जन्म बनारस में हुआ और पले बढ़े दिल्ली में। "फ़िल्हाल" दोस्तों, आप यह बताएँ कि हम किस शख़्स की बात कर र्हे हैं?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. हिमेश रेशम्मिया के पिता विपिन रेशम्मिया ने ख़य्याम साहब के ऒर्केस्ट्रा में काम करते हुए इस गीत की रिकार्डिंग में रीदम बॊक्स साज़ बजाया था।
२. 'दुल्हन हम ले जाएँगे' फ़िल्म का गीत "रात को आऊँगा मैं.... मुझसे शादी करोगी"।
३. सुधाकर शर्मा।

सीमा जी, इस बार आपने दो सवालों के जवाब दिए, जिनमें से एक हीं सही है। खैर.. इस बार के सवाल आपके सामने हैं।

Wednesday, April 22, 2009

एक मुलकात यूफोरिया के पलाश सेन से

हिंद युग्म की सबसे बड़ी सफलता रही है कि जब से ये सफ़र शुरू हुआ है, इसके बहाव में नयी प्रतिभाएं जुड़ती चली जा रही हैं, और हर आती हुई लहर बहाव को एक नए रंग से भर जाती है. हिंद युग्म के इस रंगीन परिवार में दो नए नाम और जुड़ गए हैं. दरअसल ये दो होते हुए भी एक हैं, एक सी कद काठी, चेहरा मोहरा, और व्यवसाय भी एक है इन जुड़वां भाईयों का. जामिया स्नातक अकबर और आज़म कादरी के रूप में हिंद युग्म को मिले हैं दो नए युवा निर्देशक. जालौन, बुदेलखंड जैसे छोटे क़स्बे में उनका बचपन बीता. बारहवीं पास कर, आँखों में आसमान छूने के सपने लेकर दोनों भाई दिल्ली आये. बचपन से ही थिएटर से जुडाव तो था ही, जामिया में मॉस मीडिया की पढाई के दौरान ये शौक और परवान चढा. २००५ में इनके द्वारा निर्देशित एक लघु फिल्म आई "मैसेल्फ़ संदीप" जिसमें संगीत था रॉक बैंड यूफोरिया का. किसानों की आत्महत्या विषय पर एक नाटक लिखा जिसका शीर्षक दिया गया "मौसम को जाने क्या हो गया है". जब इस नाटक का मंचन हुआ तो दर्शकों में शामिल थे ओक्सफेम इंडिया के कुछ सदस्य. चूँकि ओक्सफेम भारत में गरीबी उन्मूलन और जलवायु परिवर्तन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर पिछले कई सालों से कार्यरत है उन्हें अकबर और आज़म संभावनाएं नज़र आई.
पलाश के साथ अकबर कादरी और आज़म कादरी
अकबर और आज़म ने ने ओक्सफाम में एक प्रोजेक्ट पेश किया, आईडिया ये था कि किसी लोकप्रिय माध्यम से पर्यावरण सम्बंधित समस्याओं, खतरों और उनके निवारण में जन भागीदारी के सन्देश को आम से आम आदमी तक प्रेषित किया जाए. ताकि ये वातानुकूलित कमरों की चर्चा बन कर ही न रह जाए. जाहिर है संगीत से अधिक लोकप्रिय और सरल माध्यम और क्या हो सकता था, तो इस तरह शुरआत हुई एक सार्थक संगीत प्रोजेक्ट की. यूफोरिया के पलाश सेन आगे आये, और गीत बना "ज़मीन" (पायेंगें ऐसा जहाँ...), जिसे मुक्तलिफ़ लोकेशनों पर शूट किया अकबर और आज़म ने. ओक्सफेम ने निर्माण का जिम्मा उठाया और निर्मित हुआ एक सशक्त गीत और एक बेहद उत्कृष्ट विडियो, जो ५.३० मिनट की छोटी अवधि में वो सब कह देता है, जो कहा तो पिछले कई सालों से जा रहा है पर शायद अभी भी जन साधारण समस्या की गंभीरता से वाकिफ नहीं हो पाया है. मुझे लगता है कि ये प्रयास तो बस एक शुरुआत भर है, इस तरह के और भी आयोजन होने चाहिए और ओक्सफेम और उन जैसी अन्य संस्थाओं को जनप्रिय माध्यमों का सहारा लेकर अपने सन्देश लोगों तक पहुचने का बीडा उठाना चाहिए. बहरहाल हम बात कर रहे थे अकबर और आज़म की. "ज़मीन" गीत और उसके विडियो को ओक्सफेम एक भव्य समारोह में लॉन्च करने जा रहा था. इसी समारोह का निमत्रण लेकर अकबर और आज़म मेरे कार्यालय में आकर मुझसे मिले. उनसे मिलकर और उनके विचार जानकर मुझे लगा कि आने वाले समय में मीडिया जगत इस युवा लेखक-निर्देशक जोड़ी से बहुत सी उम्मीदें कर सकता है. हम अकबर और आज़म के बारे में आपको और जानकारी देंगें उनको आपके रूबरू भी लेकर आयेंगे बहुत जल्दी, साथ ही दिखायेंगे उनका नया विडियो भी. ओक्सफेम और उनके उद्देश्यों के बारे में भी विस्तार से चर्चा करेंगें, पर आज बात करते हैं उस "लौन्चिंग" समारोह की, पलाश की और यूफोरिया की.

शुक्रवार १७ अप्रैल दिल्ली के फिक्की सभगार में होना था ये कॉन्सर्ट. निखिल आनंद गिरी चुनावी व्यस्तताओं के चलते आने में असमर्थ थे (हालाँकि अकबर और आज़म को हिंद युग्म का परिचय इन्होने ही दिया था), तो मैं, शैलेश भारतवासी और छायाकार कवि (मैं इन्हें इसी तरह संबोधित करना पसंद करता हूँ) मनुज मेहता पहुंचे समारोह का आनंद लेने. इरादा ये भी था कि लगे हाथों पलाश से कुछ सवाल भी पूछ लिए जाएँ. मनुज ने कुछ सवाल तैयार कर रखे थे, आपसी सलाह से उसमें कुछ नए सवाल जोड़ दिए गए और कुछ हटा दिए गए और करीब १० सवालों की एक सूची तैयार हो गयी. हॉल लगभग पूरा भर चूका था, और जैसा कि उम्मीद थी युवाओं की संख्या इनमें ज्यादा थी. ओक्सफेम जिन ग्रामीण इलाकों में कार्यरत है वहां से भी कुछ किसान प्रतिनिधि आये थे जिन्होंने अपनी समस्याओं को रखा और उनके निवारण के लिए ओक्फेम द्वारा किये जा रहे प्रयत्नों का भी उन्होंने जिक्र किया. उसके बाद मंच पर आये ओक्सफेम के एम्बेसडर अभिनेता राहुल बोस. राहुल बोस की छवि एक बुद्धिजीवी ऐक्टर की है, और उन्होंने अपने छोटे मगर बेहद प्रभावशाली संवाद में चेताया कि जिस जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिन्ग का असर देश के ७० प्रतिशत लोगों पर होगा उससे बचे हुए ३० प्रतिशत भी भी अछूते नहीं रह पायेंगें. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अब समय महज बातों का नहीं काम का है और हम सब को वो सब कुछ करना चाहिए जो हम कर सकते हैं, जैसे उर्जा की खपत कम करना, छोटी दूरी के सफ़र के लिए पेट्रोल युक्त वाहन की उपेक्षा करना, पर्यावरण सहयोगी थैलों का इस्तेमाल करना, बारिश के पानी को सहेजना आदि.

राहुल बोस ने इस विषय पर एक हस्ताक्षर आन्दोलन का भी शुभारम्भ किया, जिसमें स्वस्थ मंत्री डाक्टर किरण वालिया ने भी अपने हस्ताक्षर कर मुद्दे की गंभीरता पर अपनी चिंता की मोहर लगायी. उसके बाद लोकार्पण हुआ उस शानदार विडियो का जिसका जिक्र हमने उपर किया. विडियो को जम कर सराहना मिली और तालियों की गडगडाहट के बीच मंच पर उतरे यूफोरिया के संगीत कर्मी. "वक्र्तुंडा महाकाय सूर्याकोटि समप्रभा.." की ध्वनि से सभागार गूँज उठा और अवतरित हुए पलाश सेन. उनके आते ही जैसे समां बदल गया, और अपने पहले ही गाने "रोक सको तो रोक लो" से ही उन्होंने श्रोताओं से खुद को जोड़ लिया, फिर "धूम पिचक" ने तो धूम ही मचा दी. आज लगभग १० साल बाद इस गाने की चमक फीकी नहीं हुई है. उसके बाद कुछ धीमे गीतों से दर्शकों का उत्साह कुछ ठंडा देखा तो पलाश ने फैका अपने तुरुप का इक्का- "मायी री.." इस गीत के बाद जो तूफ़ान उठा वो फिर थमा ही नहीं...एक के बाद एक फरमाईशें और उन फरमाईशों को पूरा करते उर्जा से भरे पलाश. बीच बीच में अपना जौहर दिखा रहे थे उनके बैंड के अन्य सितारे भी पर बागडोर पूरी तरह से पलाश के हाथों में ही थी.

१९९८ से अपना कारवाँ लेकर चले पेशे से डॉक्टर पलाश सेन ने यूफोरिया में बहुत कुछ बदलते देखा है, पर कुछ है जो नहीं बदला, वो था यूफोरिया का मूल मन्त्र -समय के साथ बदलकर कुछ अच्छा और नया करने की चाहत. यूफोरिया को हिदुस्तान में रॉक बैंड का अगुवा माना जा सकता है. दस साल तक कवर वर्ज़न करने के बाद पलाश ने महसूस किया कि जब तक हिंदुस्तान में रॉक को हिद्नुस्तानी भाषा में प्रस्तुत नहीं किया जायेगा तब तक कुछ भी विशेष हासिल नहीं किया जा सकेगा. और यूँ खुला रास्ता "धूम" का. धूम की धूम ने इंडी रॉक संगीत को एक नयी पहचान दी. हाल ही में आई फरहान अख्तर की "रॉक ऑन" की कमियाबी ने साबित कर दिया है कि अच्छे संगीत को हिन्दुस्तानी श्रोता सर आँखों पर बिठाएंगे ही. वैसे हिंदुस्तान के मुकाबले पाकिस्तान जैसे छोटे देश में रॉक बैंड अधिक है और उन्हें यहाँ भी खूब सराहा जाता है. दरअसल यूफोरिया वाला फार्मूला अभी यहाँ के अन्य रॉक बैंड शायद समझ नहीं पाए हैं. वापस आते हैं कॉन्सर्ट पर जहाँ पलाश जब अपने सभी हिट गीत गा चुके तो कुछ फ़िल्मी और कवर वर्ज़न भी सुनाने लगे थे, मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि अब पलाश और उनकी टीम को हर कॉन्सर्ट में केवल अपने ही गाने गाने चाहिए. खैर आयोजन का अंतिम गीत था -"ज़मीन". यूफोरिया के इस सबसे नए गाने को बहुत खूब लिखा और संगीत से संवारा गया है. इस इस गाने के बाद पलाश ने ओक्सफेम की सहयोगी टीम और विडियो निर्देशक अकबर-आज़म का मंच पर आमंत्रित किया साथ ही परिचय करवाया अपने उन साथियों का भी जिनसे मिलकर बनता है -"यूफोरिया".

शो के समापन के बाद बधाईयों का सिलसिला शुरू हुआ, मैंने भी अकबर को गले लग कर बधाई दी, तो अकबर ने हिंद युग्म की टीम को ग्रीन रूम का दरवाज़ा दिखला दिया, जहाँ अपने "अति-उर्जामय" प्रदर्शन के बाद कुछ पल चैन की साँस ले रहे थे पलाश और यूफोरिया के अन्य सदस्य. शैलेश रिकॉर्डर साथ लाये ही थे, मनुज ने संभाला जिम्मा सवाल दागने का. तो लीजिये आप भी सुनिए, उस छोटी सी मुलाकात की ये रिकॉर्डिंग-




देखिए 17 अप्रैल 2009 को फिक्की सभागार में हुए यूफोरिया के जीवंत प्रदर्शन की स्लाइडशो




Friday, January 30, 2009

"केसरिया बालमा..", मांड एक - फनकार अनेक


राजस्थान के राजाओं की रूमानी कहानियों पर आधारित लोक गीत हैं जिन्हें मांड कहा जाता है. रेगिस्तान की मिटटी में रचे बसे इस राग पर जाने कितनी रचनाएँ बनी, जब भी किसी गायक/गायिका ने मांड को स्वर दिया सुनने वालों के जेहन में ऊंठों के गुजरते काफिलों पर गाते बंजारों की यायावरी जीवंत हो गई.

मांड ने हमेशा से संगीत प्रेमियों के के दिलों पर राज किया है. देशी- विदेशी सब पर इसने अपना जादू चलाया है. सही मायनों में मांड राजस्थानी लोक संस्कृति की सच्ची पहचान है. मांड के बारे में में संजय पटेल भाई ने हमें जानकारी दी कि पंडित अजय चक्रवर्ती के शोधों के अनुसार मांड के कई रंग होते है,और तक़रीबन सौ तरह की माँडें गाई बजाई जातीं रहीं हैं.

"केसरिया बालमा..." की धुन से हर संगीत प्रेमी परिचित है. ये लोक गीत मांड का एक शुद्धतम रूप है. बरसों बरस जाने कितने फनकारों ने इसे अपनी आवाज़ में तराशा. इसे गाने बजाने के मोह से शायद ही कोई बच पाया हो. यहाँ तक कि आज के पॉप गायक/ गायिकाएं भी इसके सम्मोहन में डूबे नज़र आए हैं. चलिए अब बातों को विराम देते हैं और आपको सुनवाते हैं मुक्तलिफ़ गायक /गायिकाओं की आवाज़ में "केसरिया" रंग रंगा राग मांड.

सबसे पहले सुनिए अल्लाह जिला बाई के कंठ स्वरों का नाद -


शुभा मुदगल के अंदाज़ का आनंद लें -


अकबर अली का निराला अंदाज़ -


ज़रीना बेगम -


लता मंगेशकर ने भी इसे गाया फ़िल्म "लेकिन" में -


पॉप/रॉक संगीत के अगुवा पलाश सेन भी पीछे नही रहे -


उम्मीद है कि "मिटटी के गीत" शृंखला की ये प्रस्तुति आपको पसंद आई होगी...जल्द ही मिलेंगें किसी अन्य प्रदेश के लोक संगीत का जायका लेकर.



Sunday, November 23, 2008

संगीत जगत की नई सुर्खियाँ

भारत-पाक रॉक बैंड समागम

हिंदुस्तान के हिन्दी रॉक बैंड "यूफोरिया" (धूम पिचक और माये री से मशहूर) ने पाकिस्तानी बैंड स्ट्रिंग्स के साथ जोड़ बनाने के बाद अब एक और पाकिस्तानी बैंड "नूरी" के साथ अपने नए एल्बम पर काम शुरू कर दिया है. पाकिस्तान में हुए एक सम्मान समारोह में यूफोरिया के सदस्य नूरी के अली नूर और अली हमजा बंधुओं से मिले थे. अगस्त में नूरी की टीम भारत दौरे पर भी आई थी. पाकिस्तान के इस बेहद मशहूर बैंड के साथ काम कर यूफोरिया के सदस्य काफ़ी उत्साहित हैं. एक गीत "वो क़समें" है जो आधा भारत और आधा पाकिस्तान में फिल्माया जाएगा. पहली बार पाकिस्तान की किसी बड़ी कंपनी द्वारा किसी हिन्दुस्तानी रॉक बैंड का एल्बम निकला जा रहा है, जो कि निश्चित ही एक अच्छी शुरुआत है.


जेथ्रो तुल और अनुष्का की बेजोड़ जुगलबंदी

मशहूर ब्रिटिश रॉक समूह जेथ्रो तुल अपने एक सप्ताह के भारत दौरे पर हैं, ३० नवम्बर को दिल्ली के प्रगति मैदान में सितार वादिका अनुष्का शर्मा के साथ जुगलबंदी के बाद ये ६ सदस्यया समूह कोलकत्ता, मुंबई, बंगलोरु और हैदराबाद की यात्रा करेगा. १९६७-६८ में गठित हुए इस समूह की खासियत इनके गायन के अंदाज़ के साथ साथ टीम प्रमुख इआन एंडरसन का बांसुरी वादन भी है. हालाँकि एंडरसन का ये पांचवां भारत दौरा है पर ये पहली बार है जब वो पंडित रवि शंकर की सुपुत्री के साथ ताल मिला रहे हैं. इससे पहले वो पंडित हरी प्रसाद चौरसिया जी के साथ भी मंच बाँट चुके हैं. यदि आप उपरोक्त शहरों में हैं तो इस अवसर को जाया मत होने दें.


बॉलीवुड अभिनेत्रियों की नई आवाज़

बॉलीवुड के ताज़ा हिट्स "ठा करके" (गोलमाल रिटर्न), "मेरी एक अदा शोला सी" (किड्नाप) और जोनी गद्दार और वेल्कम के शीर्षक गीत को अपनी आवाज़ देने वाली पार्श्व गायन् की दुनिया की नई सनसनी हैं आकृति ककर. टेलीविजन के एक टेलेंट प्रतियोगिता में जीतने के बाद भी आकृति के लिए बॉलीवुड के दरवाज़े नही खुले, पर परिवार का सहयोग निरंतर बना रहा. दीपल शाह पर फिल्माए गए "रंगीला रे" के रीमिक्स ने आकृति को थोडी बहुत पहचान जरूर दी पर वो ख़ुद मानती हैं कि रीमिक्स गाकर कोई भी अपने हुनर को भरपूर तरीके से पेश नही कर सकता. शंकर एहसान और लोय के लिए गाये गीत "छम से " ने उन्हें सही मौका मिला. कैटरिना कैफ के लिए आदर्श आवाज़ मानी जा रही आकृति अपनी इस शुरूआती सफलता से बेहद खुश है, आने वाली बिल्लू बार्बर, तो बात पक्की और लव हुआ जैसी फिल्मों में हम आकृति की आवाज़ का लुत्फ़ उठा सकेंगें, साथ ही आकृति शंकर महादेवन के साथ एक एल्बम पर भी काम कर रही है. ख़ुद अपने दम पर इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में जुटी आकृति को हिंद युग्म आवाज़ की शुभकामनायें.


भव्य है युवराज का संगीत भी

देश भर में चुनावों की सरगर्मियाँ जोर पकड़ रही हैं. युवाओं को वोट डालने के लिए प्रेरित करने के लिए इन दिनों ए आर रहमान के मशहूर गीत "पप्पू कांट डांस" की तर्ज पर एक पैरोडी गीत बना कर हर जगह बजाया जा रहा है, साथ ही चुनाव आयोग ए आर को व्यक्तिगत तौर पर भी आकर इस मुहीम में शामिल होने की फरमाइश कर चुका है. यूँ भी इन दिनों ए आर की नई फ़िल्म युवराज का संगीत, संगीत प्रेमियों पर जादू चला रहा है. शो-मैन सुभाष घई की इस फ़िल्म का आधार ही संगीत है.फ़िल्म के सभी प्रमुख किरदार किसी न किसी रूप में संगीत से जुड़े हुए दिखाए गए हैं और रहमान ने अपने संगीत से इन सभी किरदारों को अलग अलग रंग दिए हैं. दिल से और साथिया जैसी फिल्मों के बाद गुलज़ार -रहमान एक बार फ़िर अपनी सफलता को दोहराने में कामियाब हुए हैं. अपनी भव्यता और संगीत की मधुरता के लिए ये फ़िल्म देखी जा सकती है.

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