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Tuesday, March 27, 2018

चित्रकथा - 61: अभिनेता नरेन्द्र झा को श्रद्धांजलि

अंक - 61

अभिनेता नरेन्द्र झा को श्रद्धांजलि

फ़िल्मी चरित्र अभिनेता के रूप में नरेन्द्र झा







14 मार्च 2018 को जाने-माने चरित्र अभिनेता नरेन्द्र झा का मात्र 55 वर्ष की आयु में निधन हो गया। SRCC से अभिनय का डिप्लोमा, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (JNU) से इतिहास में स्नातकोत्तर की डिग्री, और सुन्दर कदकाठी के नरेन्द्र झा जब मायानगरी बम्बई में क़दम रखे, तो विज्ञापन जगत ने उन्हें फ़ौरन गले लगा लिया। ’दूरदर्शन’ के पहले ’टेली-सोप’ धारावाहिक ’शान्ति’ से नरेन्द्र झा की पहचान बनी और बीसियों धारावाहिकों में उन्होंने आगे चल कर काम किया। इन दिनों जारी ’योग गुरु बाबा रामदेव’ में भी वो अभिनय कर रहे थे। करीब दस साल तक धारावाहिकों में अभिनय के बाद 2002 में उन्हें पहली बार किसी फ़िल्म में अभिनय का मौका मिला। नरेन्द्र झा के अभिनय क्षमता का लोहा दिग्गज फ़िल्मकार भी मानते थे। श्याम बेनेगल ने अपनी एकाधिक कृतियों में उन्हें कास्ट किया। आइए आज ’चित्रकथा’ के इस अंक में हम नज़र डालें कुछ ऐसी बड़ी फ़िल्मों पर जिनमें नरेन्द्र झा द्वारा निभाए हुए किरदार यादगार रहे हैं। आज का यह अंक समर्पित है स्वर्गीय नरेन्द्र झा की पुण्य स्मृति को!




रेन्द्र झा अभिनीत पहली फ़िल्म थी ’Fun2shh: Dudes in the 10th Century'। वर्ष 2003 की यह एक हास्य फ़िल्म थी जो एक कम बजट की फ़िल्म होने के बावजूद दर्शकों को ख़ूब गुदगुदाया। इस फ़िल्म में नरेन्द्र झा ने एक कमांडर का छोटा किरदार निभाया, लेकिन बड़ी बात यह कि इस फ़िल्म का वाचन अमिताभ बच्चन ने किया और अपनी पहली ही फ़िल्म में नरेन्द्र झा को फ़रीदा जलाल, गुल्शन ग्रोवर, परेश रावल, कादर ख़ान और आशिष विद्यार्थी जैसे अभिनेताओं के साथ काम करने का मौका मिला। नरेन्द्र झा के अभिनय क्षमता से महान फ़िल्मकार श्याम बेनेगल वाक़िफ़ थे। इसलिए अगले ही साल 2004 में बेनेगल ने अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’Bose - The Forgotten Hero' में नरेन्द्र झा को एक महत्वपूर्ण किरदार निभाने का मौका दिया। इस फ़िल्म में सचिन खेडेकर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की भूमिका निभा रहे थे। साथ में थे कुलभूषण खरबन्दा, रजित कपूर, दिव्या दत्ता, आरिफ़ ज़कारिया, इला अरुण, पंकज बेरी, सोनू सूद, राजेश्वरी सचदेव, राजपाल यादव तथा अन्य बड़े देश विदेश के कलाकार। अपनी दूसरी ही फ़िल्म में इतने विशाल आयाम के ऐतिहासिक फ़िल्म में अभिनय करने का मौका नरेन्द्र झा के लिए बहुत बड़ी बात थी। इस फ़िल्म में उनके द्वारा निभाए राजा हबीब-उर-रहमान ख़ान का किरदार आज भी याद है सब को। इस तरह का राष्ट्रवादी चरित्र नरेन्द्र झा पहली बार निभा रहे थे, और अपने अभिनय से इस किरदार को उन्होंने जीवन्त कर दिया। इन दो फ़िल्मों के अलावा वर्ष 2013 तक जिन फ़िल्मों में नरेन्द्र झा नज़र आए, वो हैं ’कच्ची सड़क’, ’एक दस्तक’ और ’चाँद पे तारे’। इसी दौरान दो तेलुगू फ़िल्मों में भी उन्होंने अभिनय किया - ’छत्रपति’ और ’यामाडोंगा’। इन तमाम फ़िल्मों में उन्हें बहुत ज़्यादा ख्याति नहीं मिली।

नरेन्द्र झा का फ़िल्मों में सफलता का दौर शुरु हुआ वर्ष 2014 से जब उनकी फ़िल्म आई ’हैदर’। विशाल भारद्वाज द्वारा लिखे, और उनके ही द्वारा निर्मित व निर्देशित ’हैदर’ में शाहिद कपूर, तबु, श्रद्धा कपूर और के के मेनन ने मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। यह फ़िल्म असल में शेक्स्पीअर के ’हैमलेट’ और बशारत पीर के ’Curfewed Night' रचनाओं पर आधारित है, और विशाल ने इन दो रचनाओं को कश्मीर को पार्श्व में रख कर एक दूसरे से ऐसे जोड़ दिया है कि दर्शक मुग्ध हो गए। नरेन्द्र झा के निभाए हिलाल मीर के चरित्र की अगर बात करें तो 1995 में कश्मीरी विद्रोह के दौरान हिलाल मीर (नरेन्द्र झा) श्रीनगर स्थित एक डॉक्टर हैं जो अलगाववादी उग्रपंथी गुट के लीडर इख़लाक़ का उपांत्र-उच्छेदन करने के लिए तैयार हो जाते हैं। इस क्रिया को गुप्त रखने के लिए यह सर्जरी वो अपने घर पर ही करते हैं अपनी पत्नी ग़ज़ाला (तबु) की मर्ज़ी के ख़िलाफ़। लेकिन अगले ही दिन हिलाल उग्रवादियों को पनाह देने के जुर्म में पकड़ लिए जाते हैं और मुठभेड़ में इख़लाक़ मारा जाता है। हिलाल को पुलिस जिज्ञासावाद के लिए ले जाती है। हिलाल और ग़ज़ाला का बेटा हैदर (शाहिद कपूर) जब ’अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी’ से अपने पिता के ग़ायब होने की ख़बर पा कर घर लौटता है तो अपनी माँ ग़ज़ाला को हैदर के चाचा ख़ुर्रम (के के मेनन) के साथ हँसते-गाते देख कर हैरान रह जाता है। अपनी माँ के इस बरताव को समझ ना पा कर हैदर अपने पिता हिलाल की खोज शुरू कर देता है। इस खोजबीन के दौरान हैदर की मुलाक़ात रूहदार से होती है जो हैदर को बताता है कि वो हिलाल से एक ’डिटेन्शन कैम्प’ में मिला था। उसने आगे बताया कि हिलाल के भाई ख़ुर्रम ने ही हिलाल को बेरहमी से मार डाला। रूहदार ने हैदर को यह भी बताया कि उसके पिता हिलाल ने उसके लिए यह संदेश छोड़ा है कि हैदर ख़ुर्रम के विश्वासघात का बदला ले। यहाँ पर आकर हिलाल का किरदार ख़त्म होता है। इन फ़्लैशबैक दृश्यों में नरेन्द्र झा ने हिलाल के किरदार में बहुत ही सशक्त अभिनय किया है और सिद्ध किया है कि कहानी के इस महत्वपूर्ण किरदार के लिए विशाल भारद्वाज द्वारा उनका चयन बिल्कुल सटीक था। ’हैदर’ में नरेन्द्र झा के अभिनय ने उन्हें फ़िल्म जगत में एक सशक्त अभिनेता के रूप में स्थापित कर दिया।

2015 की फ़िल्म ’हमारी अधूरी कहानी’ में नरेन्द्र झा पुलिस कमिशनर के रूप में नज़र आए। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि नरेन्द्र झा ने कई फ़िल्मों में पुलिस इन्स्पेक्टर या सरकारी अफ़सर की भूमिकाएँ निभाई हैं ठीक वैसे जैसे गुज़रे दौर में इफ़्तिख़ार निभाया करते थे। 2016 का वर्ष नरेन्द्र झा के फ़िल्मी करिअर का महत्वपूर्ण वर्ष माना जाएगा क्योंकि इसी साल एक ऐसी फ़िल्म आई थी जिसमें वो मुख्य नायक थे। परेश मेहता निर्मित तथा सुज़ाद इक़बाल ख़ान निर्देशित यह फ़िल्म थी ’My Father Iqbal’ जो जम्मु-कश्मीर के PWD विभाग के एक इंजिनीयर की सच्ची कहानी पर आधारित थी। ’हैदर’ में कश्मीरी की भूमिका अदा करने के बाद फिर एक बार उन्हें एक कश्मीरी चरित्र को निभाने का अवसर मिला इस फ़िल्म में। इक़बाल ख़ान के किरदार में नरेन्द्र झा ने अपने अभिनय का जादू चलाया, लेकिन कम बजट की फ़िल्म होने की वजह से यह फ़िल्म सही रूप में दर्शकों तक पहुँच नहीं सकी। ’यश राज फ़िल्म्स’ के बैनर तले निर्मित इस फ़िल्म की कहानी ’हैदर’ की ही तरह फिर एक बार कश्मीर के राजनैतिक और उग्रवादी पार्श्व पर आधारित होने की वजह से ही शायद लोगों ने इस फ़िल्म की ओर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। नरेन्द्र झा का किरदार कुछ इस तरह का है कि वो ना केवल एक ज़िम्मेदार पति और पिता है, बल्कि एक इमानदार नागरिक भी है। इक़बाल ख़ान का किरदार अपने बेटे के सपनों को पूरा करने के संघर्ष और अपने देश के प्रति कर्तव्यों का पालन करने की तड़प के इर्द-गिर्द घूमता है। एक आम देशभक्त नागरिक जो अपने देश के लिए लड़ता है, एक आम मध्यम-वर्गीय पति-पत्नी का रिश्ता और उस रिश्ते में प्यार और मनमुटाव, और अपने परिवार को हमेशा ख़ुश रखने का प्रयास, नरेन्द्र झा ने इक़बाल ख़ान के किरदार में इन सब आयामों का इस तरह से सजीव चित्रण किया है कि किरदार जैसे जी उठा हो।

साल 2016 में नरेन्द्र झा के अभिनय से सजी कुल छह फ़िल्में आईं। एक फ़िल्म की चर्चा हम कर चुके हैं, दूसरी फ़िल्म थी ’शोरगुल’। 2013 के मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों के पार्श्व पर बनी प्रणव कुमार सिंह निर्देशित इस फ़िल्म में जिम्मी शेरगिल, संजय सुरी, और आशुतोष राणा जैसे अभिनेताओं के साथ-साथ नरेन्द्र झा भी मुख्य किरदारों में शामिल थे। फ़िल्म को फ़िल्म-समीक्षकों के सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ मिली। गोधरा और गाय संबंधित शब्दों और संदर्भों को म्युट कर दिया गया था सेन्सर बोर्ड की ओर से। फ़िल्म के कई किरदार राजनेताओं से प्रेरित होने की वजह से फ़िल्म को लेकर विवाद भी खड़े हुए। नरेन्द्र झा द्वारा निभाया गया आलिम ख़ान का किरदार असल में आज़म ख़ान के किरदार से प्रेरित था जो उत्तर प्रदेश के एक जाने-माने राजनीतिज्ञ हैं। इस साल की नरेन्द्र झा की तीसरी फ़िल्म थी ’2016 The End’ जो जयदीप चोपड़ा की लिखी और निर्देशित फ़िल्म थी। फ़िल्म की कहानी कुछ दोस्तों की कहानी है जो सात दिनों के अन्दर दुनिया समाप्त हो जाने की ख़बर सुन कर बचे हुए सात दिन अपने अंदाज़ में जीने की कोशिशें करते हैं। इन दोस्तों की भूमिकाओं में जिन अभिनेताओं ने काम किया वो हैं दिव्येन्दु शर्मा, किकु शारदा, प्रिया बनर्जी, हर्शद चोपड़ा, राहुल रॉय और नरेन्द्र झा। यह फ़िल्म टॉम ऑल्टर के अभिनय से सजी आख़िरी फ़िल्म थी। इस फ़िल्म को भी समीक्षकों ने अच्छी प्रतिक्रियाएँ दी पर व्यावसायिक तौर से असफल रही। 2016 की जिन तीन बड़ी फ़िल्मों में नरेन्द्र झा ने अभिनय किया, वो फ़िल्में हैं ’Force 2', 'मोहेन्जो दारो’ और ’घायल - वन्स अगेन’। ’Force 2' एक action spy thriller फ़िल्म थी जिसमें जॉन एब्रहम और सोनाक्षी सिंहा मुख्य किरदारों में नज़र आए थे। नरेन्द्र झा ने फ़िल्म में RAW Head अंजन दास की भूमिका अदा की थी जो एक महत्वपूर्ण किरदार था। फिर एक बार नरेन्द्र झा ने यह सिद्ध किया कि वो इस दौर के ’इफ़्तिख़ार’ हैं। ’मोहेन्जो दारो’ में जखिरो का किरदार निभा कर नरेन्द्र झा ने अपनी बहुमुखी प्रतिभावान (versatile) होने का प्रमाण दिया। क्योंकि नरेन्द्र झा ख़ुद एक इतिहास के विद्यार्थी रह चुके हैं, इसलिए यह फ़िल्म उनके दिल के बहुत क़रीब था। उन्हीं के शब्दों में, "मुझे ख़ुशी है कि ’मोहेन्जो दारो’ बनी और मैं उसका हिस्सा बना। क्योंकि प्राचीन इतिहास का मेरा शैक्षिक पार्श्व है, मुझे दुख होता अगर मैं इस फ़िल्म का हिस्सा नहीं होता।" इस फ़िल्म की व्यावसायिक असफलता से थोड़े निराश वो ज़रूर हुए थे, लेकिन आशुतोष गोवारिकर जैसे फ़िल्मकार के साथ काम करने का मौका पाकर नरेन्द्र झा अपने आप को ख़ुशक़िस्मत मानते थे। 1990 की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म ’घायल’ की सीक्वील फ़िल्म ’घायल वन्स अगेन’ को धर्मेन्द्र ने फ़ाइनन्स किया और सनी देओल ने फ़िल्म लिखी और निर्देशित की। नरेन्द्र झा इस फ़िल्म में बिज़नेस टाइकून राज बंसल की भूमिका में नज़र आए थे। हालाँकि यह फ़िल्म व्यावसायिक रूप से चली नहीं, लेकिन एक खलनायक उद्योगपति के किरदार को नरेन्द्र झा ने बखूबी निभाया और दर्शकों व समीक्षकों की वाहवाही बटोरी।

2017 का साल भी नरेन्द्र झा के लिए बेहद कामयाब साल रहा। दो बड़ी फ़िल्मों में महत्वपूर्ण किरदारों में वो नज़र आए। इनमें पहली फ़िल्म शाहरुख़ ख़ान की ’रईस’ और दूसरी फ़िल्म हृतिक रोशन की ’काबिल’। ’रईस’ में नरेन्द्र झा और शाहरुख़ ख़ान ने स्क्रीन-स्पेस शेअर किया और मुसाभाई के किरदार में नरेन्द्र झा बिल्कुल छा गए। मुसाभाई मुंबई के एक स्मगलर है जो रईस (शाहरुख़) को अपनी ख़ुद की बिज़नेस स्थापित करने में मदद करते हैं। दोनों में अच्छी दोस्ती है, लेकिन बाद में जब रईस कंगाल हो जाता है तब मुसाभाई उसकी मदद करने के नाम पर उससे धोखे से RDX स्मगल करवा लेता है जिसका इस्तमाल देश भर में आतंकी हमलों में किया जाता है। इतनी बड़ी विश्वासघात को बर्दाश्त ना करते हुए रईस मुसाभाई को मार डालता है। रईस और मुसाभाई के चरित्रों में शाहरुख़ और नरेन्द्र झा ने एक दूसरे को ज़बरदस्त टक्कर दी है और दर्शकों के लिए यह कहना मुश्किल हो गया है कि किसने किससे बेहतर अभिनय किया है। ’रईस’ 25 जनवरी 2017 के दिन प्रदर्शित हुई थी। मज़ेदार बात यह है कि इसी दिन हृतिक रोशन की ’काबिल’ भी प्रदर्शित हुई और उसमें भी नरेन्द्र झा का महत्वपूर्ण किरदार था। फिर एक बार ’इफ़्तिख़ार’ की तरह वो पुलिस अफ़सर अमोल चौबे बने, जो एक रिश्वतखोर इन्स्पेक्टर हैं। नेत्रहीन दम्पति रोहन (हृतिक रोशन) और सुप्रिया (यामी गौतम) के साथ हुए अन्याय का बदला ही इस फ़िल्म की कहानी है। जब इन्स्पेक्टर चौबे सुप्रिया के बलात्कार के केस को रिश्वत लेकर नज़रंदाज़ कर देते हैं, तब रोहन उसे चुनौती देता है और कहता है कि क्योंकि चौबे ने उसके लिए कुछ नहीं किया, इसलिए वो ख़ुद अपनी पत्नी की बेइज़्ज़ती और मौत का बदला लेगा, और चौबे को पता तो चल जाएगा कि बदला उसी ने ली है लेकिन जान कर भी उसे पकड़ नहीं पाएगा, कोई सबूत नहीं मिल पाएगा। नरेन्द्र झा के इन्स्पेक्टर चौबे का यह किरदार मिश्रित चरित्र वाला है। एक बार लगता है कि उसे नायक रोहन के लिए सहानुभूति है, लेकिन अगले ही पल वो दबाव में आकर रिश्वत ले लेता है। नरेन्द्र झा ने इस किरदार को ऐसा उभारा है दर्शकों को समझते देर नहीं लगती कि भले चौबे रिश्वत लेता है लेकिन रोहन के लिए उसके दिल में थोड़ी बहुत हमदर्दी भी है। ’काबिल’ फ़िल्म का समापन नरेन्द्र झा के शॉट से ही होता है कि रोहन अपना बदला ले लेता है, और चौबे सोचता ही रह जाता है और रोहन की चुनौती को याद करता रह जाता है।

2017 में नरेन्द्र झा की एक और महत्वपूर्ण फ़िल्म आई थी ’विराम’। ’हैदर’, ’रईस’ और ’काबिल’ की कामयाबी के बाद नरेन्द्र झा एक चर्चित चरित्र फ़िल्म अभिनेता बन चुके थे। नवोदित निर्देशक ज़ियाउल्लाह ख़ान की परिपक्व प्रेम कहानी ’विराम’ में नरेन्द्र झा ने मुख्य नायक की भूमिका में अभिनय किया। इस फ़िल्म को केन फ़िल्म उत्सव में दिखाया गया था। यह एक बिल्कुल अलग ही तरह की प्रेम कहानी है जिसमें कई मोड़ और उतार-चढ़ाव हैं जिसे झा ने बहुत ही ख़ूबसूरती के साथ उभारा है। ’रईस’ और ’काबिल’ के बाद नरेन्द्र झा के पास बहुत सारी फ़िल्मों के ऑफ़र आए लेकिन उन्होंने बहुत कम ही फ़िल्मों को ग्रहण किया। एक साक्षात्कार में नरेन्द्र झा ने बताया, "मैं कभी भी एक ही झटके में किसी फ़िल्म को करने के लिए मान नहीं जाता। पहले सब्जेक्ट और कैरेक्टर का विस्तारित रूप से पता लगाता हूँ। जब तक मुझे सारी जानकारी नहीं मिलती, तब तक मैं राज़ी नहीं होता। मैंने बहुत सी फ़िल्में रिजेक्ट कर दी है। कई लोग हैं जो किरदार को सही रूप से नहीं बताते और बाद में पता चलता है कि बहुत मामूली सा रोल है। इस तरह के प्रोड्युसर से मैं हमेशा किनारा करता आया हूँ।" नरेन्द्र झा के लिए फ़िल्म चाहे बड़ी हो या छोटी, कुछ फ़र्क नहीं पड़ता, उन्हें फ़र्क पड़ता है इस बात से कि उनका किरदार किस तरह का है। फ़िल्म ’विराम’ की शूटिंग् के दौरान नरेन्द्र झा के पिता का निधन हो गया था पिछले वर्ष। नियति का खेल देखिए, एक ही वर्ष के अन्दर पिता ने पुत्र को भी अपने पास बुला लिया। इस तरह से फ़िल्म ’विराम’ से ही नरेन्द्र झा के जीवन में पूर्ण-विराम लग गया। 2018 की दो फ़िल्मों में नरेन्द्र झा अभिनय कर रहे थे - ’साहो’ और ’Race 3'। नरेन्द्र झा की असामयिक मृत्यु से अभिनय जगत को ज़बरदस्त धक्का लगा है और उनके जैसे दमदार अभिनय क्षमता वाले अभिनेता की कमी लम्बे समय तक खलती रहेगी। ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की ओर से स्वर्गीय नरेन्द्र झा को श्रद्धा सुमन!

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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