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Monday, March 23, 2009

'स्माइल पिंकी' वाले डॉ॰ सुबोध सिंह का इंटरव्यू

सुनिए हज़ारों बाल-जीवन में स्माइल फूँकने वाले सुबोध का साक्षात्कार

वर्ष २००९ भारतीय फिल्म इतिहास के लिए बहुत गौरवशाली रहा। ऑस्कर की धूम इस बार जितनी भारत में मची, उतनी शायद ही किसी अन्य देश में मची हो। मुख्यधारा की फिल्म और वृत्तचित्र दोनों ही वर्गों में भारतीय पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों ने अपनी रौनक दिखाई। स्लमडॉग मिलिनेयर की जय हुई और स्माइल पिंकी भी मुस्कुराई। और उसकी इस मुस्कान को पूरी दुनिया ने महसूस किया।

मीडिया में 'जय हो' का बहुत शोर रहा। कलमवीरों ने अपनी-अपनी कलम की ताकत से इसके खिलाफ मोर्चा सम्हाला। हर तरफ यही गुहार थी कि 'स्माइल पिंकी' की मुस्कान की कीमत मोतियों से भी महँगी है। हमें अफसोस है कि यह सोना भारतीय नहीं सँजो पा रहे हैं। कलमकारों की यह चोट हमें भी लगातार मिलती रही। इसलिए हिन्द-युग्म की नीलम मिश्रा ने डॉ॰ सुबोध सिंह का टेलीफोनिक साक्षात्कार लिया और उनकी तपस्या की 'स्माइल' को mp3 में सदा के लिए कैद कर लिया।

ये वही डॉ॰ सुबोध हैं जो महज ४५ मिनट से दो घंटे के ऑपरेशन में 'जन्मजात कटे होंठ और तालु' (क्लेफ्ट लिप) से ग्रसित बच्चों की जिंदगियाँ बदलते हैं। 'स्माइल पिंकी' फिल्म ऐसे ही समस्या से पीड़ित, मिर्जापुर (उ॰प्र॰) के छोटे से गाँव की एक लड़की पिंकी कुमार की कहानी है, जिसके होंठ जन्म से कटे हैं, जिसके कारण वो अन्य बच्चों द्वारा तिरस्कृत होती है। अंतर्राष्ट्रीय संस्था 'स्माइल ट्रेन' के साथ मिलकर उ॰प्र॰ के लिए काम करने वाले डॉ॰ सिंह ने पिंकी का ऑपरेशन किया, जिससे उसकी पूरी दुनिया पलट गई। अब पिंकी भी बाकी बच्चों के साथ स्कूल जाती है, खेलती है। उसके लिए फ़ोन आते हैं तो आस-पास के सब लोग इकट्ठा हो जाते हैं। यह पिंकी अब तो अमेरिका भी घूम आई है।

क़रीब 39 मिनट के इस वृतचित्र में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि किस तरह एक छोटी सी समस्या से किसी बच्चे पर क्या असर पड़ता है और ऑपरेशन के बाद ठीक हो जाने पर बच्चे की मनोदशा कितनी बेहतरीन हो जाती है। पिंकी के घर के लोग बताते हैं कि होंठ कटा होने के कारण वो बाक़ी बच्चों से अलग दिखती थी और उससे बुरा बर्ताव किया जाता था। डॉ॰ सुबोध ने बताया कि उनकी संस्था ने अब तक कई हज़ार बच्चों का ऑपरेशन किया है और उनकी ज़िंदगियों में हँसी बिखेरी है।

आज हम डॉ॰ सुबोध का साक्षात्कार लेकर उपस्थित हैं।



(डॉ॰ सुबोध और पिंकी के साथ 'स्माइल पिंकी' फिल्म की निर्देशक मेगन मायलन)


Monday, October 20, 2008

पिया मेहंदी लियादा मोती झील से...जाके सायिकील से न...

मिट्टी के गीत में- कजली गीत

मिर्जापुर उत्तर प्रदेश में एक लोक कथा चलती है, कजली की कथा. ये कथा विस्थापन के दर्द की है. रोजगार की तलाश में शहर गए पति की याद में जल रही है कजली. सावन आया और विरह की पीडा असहनीय होती चली गयी. काले बादल उमड़ घुमड़ छाए. कजली के नैना भी बरसे. बिजली चमक चमक जाए तो जैसे कलेजे पर छुरी सी चले. जब सखी सहेलियां सवान में झूम झूम पिया संग झूले, कजली दूर परदेश में बसे अपने साजन को याद कर तड़प तड़प रह जाए. आह ने गीत का रूप लिया. काजमल माई के चरणों में सर रख जो गीत उसने बुने, उन्ही पीडा के तारों से बने कजरी के लोकप्रिय लोक गीत. सावन में गाये जाने वाले ये लोकगीत अमूमन औरतों द्वारा झुंड बना कर गाये जाते हैं (धुनमुनिया कजरी). कजरी गीत गावों देहातों में इतने लोकप्रिय हैं की हर बार सावन के दौरान क्षेत्रीय कलाकारों द्वारा गाये इन गीतों की cd बाज़ार में आती है और बेहद सुनी और सराही जाती है.

आसाम की वादियों और कश्मीर की घाटियों की सैर के बाद आईये चलते हैं विविधताओं से भरे पूरे प्रदेश, उत्तर प्रदेश की तरफ़. कण कण में संगीत समेटे उत्तर प्रदेश में गाये जाने वाले सावन के गीत कजरी का आनंद लीजिये आज मिटटी के गीत श्रंखला में -

बदरा घुमरी घुमरी घन गरजे... स्वर - रश्मि दत्त व् साथी



सोमा घोष कजरी की विख्यात गायिका हैं...उनकी आवाज़ में ये कजरी सुनें. जरूरी नही की सभी कजरी गीत विरहा के हों जैसे ये गीत,लौट आए पिया से की जानी वाली फरमाईशों का है - "पिया मेहंदी लियादा न मोती झील से जाके सायिकील से न...." यहाँ "सैकील" की घंटी का इस्तेमाल संगीतकार ने बहुत खूबी से किया है, सुनिए -



और अंत में सुनिए ये भोजपुरी कजरी भी "झुलाए गए झुलवा..."



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