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Tuesday, February 3, 2009

मैं शायर बदनाम, महफिल से नाकाम

(पिछली कड़ी से आगे...)
बक्षी साहब ने फ़िल्म मोम की 'गुड़िया(1972)' में गीत 'बाग़ों में बहार आयी' लता जी के साथ गाया था। इस पर लता जी बताती हैं कि 'मुझे याद है कि इस गीत की रिकार्डिंग से पहले आनन्द मुझसे मिलने आये और कहा कि मैं यह गीत तुम्हारे साथ गाने जा रहा हूँ 'इसकी सफलता तो सुनिश्चित है'। इसके अलावा 'शोले(1975)', 'महाचोर(1976)', 'चरस(1976)', 'विधाता(1982)' और 'जान(1996)' में भी पाश्र्व(प्लेबैक)गायक रहे। आनन्द साहब का फिल्म जगत में योगदान यहीं सीमित नहीं, 'शहंशाह(1988)', 'प्रेम प्रतिज्ञा(1989)', 'मैं खिलाड़ी तू आनाड़ी(1994)', और 'आरज़ू(1999)' में बतौर एक्शन डायरेक्टर भी काम किया, सिर्फ यही नहीं 'पिकनिक(1966)' में अदाकारी भी की।

लता की दिव्या आवाज़ में सुनिए फ़िल्म अमर प्रेम का ये अमर गीत -


बक्षी के गीतों की महानता इस बात में है कि वह जो गीत लिखते थे वह किसी गाँव के किसान और शहर में रहने वाले किसी बुद्धिजीवी और ऊँची सोच रखने वाले व्यक्तिव को समान रूप से समझ आते हैं। वह कुछ ऐसे चुनिंदा गीतकारों में से एक हैं जिनके गीत जैसे उन्होंने लिखकर दिये वह बिना किसी फेर-बदल या नुक्ताचीनी के रिकार्ड किये गये। आनन्द साहब कहते थे फिल्म के गीत उसकी कथा, पटकथा और परिस्थिति पर निर्भर करते हैं। गीत किसी भी मन: स्तिथि, परिवेश या उम्र के लिए हो सकता है सो कहानी चाहे 60,70 या आज के दशक की हो इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है।

उनका सबसे अधिक साथ संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ रहा, ढेरों फिल्में और ढेरों सुपर हिट गीतों का ये काफिला इतना लंबा है की इस पर बात करें तो पोस्ट पे पोस्ट लग जाएँगीं. फिलहाल सुनते हैं फ़िल्म सरगम का ये दर्द भरा नग्मा -


आनन्द साहब को बड़े-बड़े पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिसमें 'आदमी मुसाफ़िर है' [अपनापन(1977)], 'तेरे मेरे बीच कैसा है यह बन्धन' [ एक दूजे के लिए(1981)], 'तुझे देखा तो यह जाना सनम' [दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे (1995)] और 'इश्क़ बिना क्या जीना यारों' [ ताल(1999)] गीतों के लिए चार बार फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार भी सम्मिलित है।

ऐ आर रहमान का संगीतबद्ध किया फ़िल्म ताल का ये गीत साबित करता है हर पीढी के संगीतकारों के साथ पैठ बिठाने में बक्षी साहब को कभी परेशानी नही हुई -


बक्षी साहब का निर्वाण 30 मार्च 2002 को मुम्बई में हुआ। फेफड़े और दिल की बीमारी को लेकर नानावती हास्पिटल में उनका इलाज काफ़ी समय चला लेकिन बचाने की कोशिश नाकामयब रही। आनन्द बक्षी साहब आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी कमी सिर्फ़ हमें नहीं खलती बल्कि उन फिल्मकारों को भी खलती है जिनके लिए वह गीत लिखते रहे, आज अगर आप उनकी आने वाली फ़िल्मों के गीत सुने तो कहीं न कहीं उनमें प्यार की मासूमियत और सच्ची भावना की कमी झलकती है, या बनावटीपन है या उनके जैसा लिखने की कोशिश है। आनन्द साहब इस दुनिया से क्या रुख़्सत हुए जैसे शब्दों ने मौन धारण कर लिया, जाने यह चुप्पी कब टूटे कब कोई दूसरा उनके जैसा गीतकार जन्म ले!

उस मशहूरो-बदनाम शायर की याद में ये नग्मा भी सुनते चलें -


प्रस्तुति - विनय प्रजापति "नज़र"



Monday, October 27, 2008

हम होंगे कामियाब

कभी कभी छोटी छोटी कोशिशें एक बड़ी सोच का रूप धारण कर लेती है. और फ़िर उस सोच का अंकुर पल्लवित होकर एक बड़ा वृक्ष बनने की दिशा में बढ़ने लगता है और उसकी शाखायें आसमान को छूने निकल पड़ती है. आज से ठीक एक साल पहले २७ अक्टूबर २००७ की शाम को हिंद युग्म ने अपना पहला संगीतबद्ध गीत जारी किया था. दिल्ली, हैदराबाद और नागपुर में बैठे एक गीतकार, एक संगीतकार और एक गायक ने ऑनलाइन बैठकों के माध्यम से तैयार किया था एक अनूठा गीत "सुबह की ताजगी". और इसी के साथ नींव पड़ी एक विचार की जो आज आपके सामने "आवाज़" के रूप में फल फूल रहा है. हिंद युग्म ने महसूस किया कि जिस तरह हमने उभरते हुए कवियों,कथाकारों और बाल साहित्य सृजकों को एक मंच दिया क्यों न इन नए गीतकारों,संगीतकारों और गायकों को भी हम एक ऐसा आधार दें जहाँ से ये बिना किसी बड़े निवेश के अपनी कला का नमूना दुनिया के सामने रख सकें.चूँकि इन्टनेट जुडाव का माध्यम था तो दूरियां कोई समस्या ही नही थी. कोई भी कहीं से भी एक दूसरे से जुड़ सकता था बस कड़ी जोड़नी थी हिंद युग्म के साथ. सिलसिला शुरू हुआ तो एक से बढ़कर एक कलाकार सामने आए. मात्र तीन महीने में युग्म ने १० गीत रच डाले, इन्हें १० कविताओं की चाशनी में डूबोकर हमने बनाया इन्टरनेट गठबन्धनों के माध्यम से तैयार पहला सुरीला एल्बम "पहला सुर".


इस एल्बम में युग्म परिवार के १० कवियों की शिरकत थी, तो ४ गीतकारों, ७ संगीतकारों और ९ गायकों ने अपनी प्रतिभा दुनिया के सामने रखी. हिन्दी ब्लॉग्गिंग जगत पहली बार किसी ब्लॉग ने अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले जैसे बड़े मंच पर अपनी प्रस्तुति का विमोचन किया. "पहला सुर" जिसके भी हाथ में गया उसने मुक्त कंठ से इस महाप्रयास की सराहना की. हिंद युग्म ने संगीत और पॉडकास्ट के लिए एक अलग शाखा के तौर पर "आवाज़" की शुरुआत की. आवाज़ ने अपने प्रयास और तेज़ किए, मुश्किल परिस्तिथियों से जूझते हुए भी हिंद युग्म के कर्णधारों ने अभूतपूर्व योजनाओं को अंजाम दिया. वो फ़िर कवियों और पाठकों को पुरस्कृत करने का अद्भुत विचार हो या फ़िर दूरभाष के माध्यम से हिन्दी टंकण की निशुल्क शिक्षा प्रदान करने का काम हो, पहल हमेशा हिंद युग्म ने की और औरों के लिए प्रेरणा बना. आवाज़ पर भी दूसरे संगीत सत्र की शुरुआत हुई जुलाई में, जिसके तहत हर शुक्रवार एक नए गीत को हम दुनिया के सामने रख रहे हैं, अब तक १७ गीत प्रकाशित हो चुके हैं और अब इस संगीत परिवार में ५० से अधिक नए कलाकार जुड़ चुके हैं. पॉडकास्ट कवि सम्मलेन का मासिक आयोजन आवाज़ पर हो रहा है ये भी अपने आप में एक नायाब प्रयास है. साहित्यिक रचनाओं को ऑडियो फॉर्मेट में उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से शुरू हुई योजना "सुनो कहानी" जिसके तहत हर शनिवार एक ताज़ा कहानी का पॉडकास्ट हम लोगों तक पहुंचा रहे हैं. हाल ही हुए ऑनलाइन पुस्तक विमोचन से "आवाज़" ने साबित किया है इन्टरनेट पर उपलब्ध इस ब्लॉग रुपी मंच का बहुयामी उपयोग सम्भव है. फिल्मकारों के लिए भी अब आवाज़ के दरवाज़े खुले हैं, अब तक दो लघु फिल्मों का प्रसारण हम कर चुके हैं. संगीत से जुड़ी तमाम तरह की जानकारियों को हिन्दी में उपलब्ध करवाने की आवाज़ की पहल में आज ब्लॉग्गिंग जगत से जुड़े भाषा और संगीत की सेवा में समर्पित कई बड़े नामी ब्लॉगर अपना अनमोल समय देकर हमारा साथ दे रहे हैं.
मीडिया बहुत कुछ लिख चुका है हिंद युग्म के बारे में, हमारे साथी ब्लोग्गेर्स भी इसे एक "फिनोमिना" मान चुके हैं. पर युग्म की असली ताक़त तो युग्म के जोशीले, कर्मठ, और समर्पित सदस्य हैं, जो दिन रात अपने इस खूबसूरत सपने को सजाने सँवारने की योजनाओं पर काम करते रहते हैं. इतने नाम हैं कि सब का जिक्र बेहद मुश्किल होगा, चूँकि आज हम अपने उस बीज रुपी गीत "सुबह की ताजगी" का ब्लॉग पर जन्मदिवस मना रहे हैं, तो बस संगीत से जुड़े कलाकारों पर बात करेंगे. शुरुआत इस ऑनलाइन पार्टी की होनी चहिये उसी शानदार गीत से. अनुरोध है सुबोध साठे से कि एक बार फ़िर अपनी मधुर आवाज़ में छेड़े "सुबह की ताजगी" का तराना.



सुबोध हमेशा की तरह हंसमुख है आज की पार्टी में, हमने जाना चाहा सुबोध से -
“सुबोध नए सत्र में बहुत से नए कलाकार आए हैं इनमें से अधिकतर आपको रोल मॉडल मानते हैं, आप बताएं इनमें से आपके पसंदीदा गायक और संगीतकार कौन कौन है ?”
सुबोध का जवाब था "सबसे पहले तो हिंद युग्म को बधाई, मुझे गायक के तौर पर कृष्ण कुमार बहुत पसंद आए, उनके गीत का संगीत पक्ष कुछ कमजोर था पर गायकी और आवाज़ बहुत जबरदस्त लगी. संगीतकारों में "संगीत दिलों का उत्सव है..." वाले निखिल बहुत प्रतिभाशाली लगे."सुबोध के आग्रह पर हम अनुरोध कर रहे हैं कृष्ण कुमार से वो सुनाएँ अपना गीत "राहतें सारी.."



वाकई कृष्ण कुमार का भविष्य काफी उज्जवल नज़र आ रहा है....इसी बीच हमने पकड़ा ज़रा से शर्मीले और ज़रा से एकांतप्रिये युग्म के पहले संगीतकार ऋषि एस को, दरअसल जहाँ तक आज हम पहुंचें हैं वह सम्भव नही होता अगर ऋषि एस का हमें साथ नही मिलता, ऋषि युग्म के वार्षिक अंशदाता भी हैं. यानी कि वो युग्म की सोच और योजनाओं से बेहद आत्मीयता से जुड़े हैं. ऋषि से भी हमने वही सवाल किया जो सुबोध से किया था. तो जवाब मिला -
"मेरा अब तक का सबसे पसंदीदा गीत है सुबोध का गाया "खुशमिजाज़ मिटटी". इसका मुखडा कमाल का है और जिस स्केल पर ये गाया गया है वो उसकी आवाज़ के लिए बिल्कुल परफेक्ट है. मुझे सुबोध की आवाज़ हमेशा से ही पसंद रही है और इस गीत में उनकी संगीत रचने की क्षमता भी बखूबी उभर कर सामने आई है. मेरे पहले ३ गीत सुबोध ने ही गाये थे, और उम्मीद करता हूँ कि आगे भी हम साथ काम करेंगे.
मैं हिन्दी साहित्य की बहुत अधिक जानकारी नही रखता तो किसी गीतकार की समीक्षा करना जरा मुश्किल काम है. पर व्यक्तिगत तौर पर मुझे सजीव का लिखा "जीत के गीत" बहुत पसंद है, सजीव शायद दिए हुए धुन पर बेहतर लिखते हैं, मेरे आखिरी दो गीत (जीत और मैं नदी ) के बोलों की बेहद तारीफ हुई है, बनिस्पत मेरे पिछले गीतों से जो पहले लिखे गए और बाद में स्वरबद्ध हुए. मैं सभी ग़ज़लकारों को भी बधाई देना चाहता हूँ, मैं ग़ज़लों का दीवाना हूँ, पर शायद ग़ज़ल को स्वरबद्ध करना अभी is not my cup of tea, i guess."
ऋषि ने बहुत इमानदारी से जो बात कही है वो हम सब जानते हैं. ग़ज़लों को स्वरबद्ध करना और गाना दोनों ही कलायें विलक्षण क्षमता की मांग करती है. युग्म पर अब तक बहुत सी बेमिसाल ग़ज़लें आई हैं और हमारे कलाकारों ने हमेशा ही श्रोताओं के दिलों को जीतने में कामयाबी हासिल की है. दोस्तों, तो क्यों न इन खूबसूरत ग़ज़लों का एक बार फ़िर से आनंद लिया जाए. स्वागत करें महफ़िल में, आभा मिश्रा, रुपेश ऋषि, प्रतिष्ठा, निशांत अक्षर, और रफीक शेख का.

इन दिनों - आभा मिश्रा



ये ज़रूरी नही - रुपेश व् प्रतिष्ठा



चले जाना - रुपेश



तेरे चेहरे पे - निशांत अक्षर



सच बोलता है - रफ़ीक शेख



ग़ज़लों का दौर चला तो हमें झूमती हुई दिखी शिवानी जी, शिवानी का आवाज़ परिवार विशेष आभारी है. इनका सहयोग हर कदम पर हम सब के साथ रहा है. अब तक इनकी ३ ग़ज़लें आवाज़ पर आ चुकी हैं, शिवानी जी जाहिर है अपनी ग़ज़लें आपको प्रिय होंगी, पर उसके अलावा कोई और गीत जो आपको विशेष प्रिय हो बताएं. जवाब शिवानी जी अपनी मधुर आवाज़ में दिया "आवाज़ की पहली सालगिरह पर मैं हिंद युग्म और आवाज़ के सभी श्रोतागण को बधाई देना चाहती हूँ !हिंद युग्म और आवाज़ अपने श्रोताओं और पाठकों के सहयोग से ही अपनी बुलंदियों को छूने जा रहा है !आवाज़ पर आये सभी गीत ,ग़ज़ल और कवितायें भिन्न भिन्न प्रकार के फूलों के रूप में एकत्र हो कर एक महकता गुलदस्ता बन गए हैं !सभी की अपने बोल ,गीत और संगीत से अपनी अलग पहचान है !परन्तु यदि किसी एक को चुनना हो तो मेरे विचार से `मुझे दर्द दे ' मेरा पसंदीदा गीत है ! सजीव जी ने बहुत खूबसूरत गीत लिखा है ,बोल लाजवाब हैं हर कोई सूफी गीत नहीं लिख सकता !गीत में ठहराव है ! संगीत दिल को सुकून देता है !शुरुआत बहुत खूबसूरत है !अमनदीप और सुरेंदर जी की आवाज़ में गहराई और अमन कायम है !गीतकार, गायक और संगीतकार में बहुत अच्छा सामंजस्य है !मेरी नज़र में इन्ही सब खूबियों के कारण ये मेरा पसंदीदा गीत है ! इस गीत की पूरी टीम को एक बार फिर मेरी शुभकामनायें !धन्यवाद !"
अब जब शिवानी जी ने इतनी तारीफ की है तो क्यों न सुन लिया जाए उनका पसंदीदा गीत, स्वागत करें लुधिआना पंजाब के पेरुब और उनके साथ जोगी और अमनदीप का, साथ में आमंत्रित हैं बेहद प्रतिभाशाली कृष्णा पंडित और उनके साथी भी अपनी ताज़ा सूफी रचना के साथ. तो दोस्तों आनंद लें इस सूफी गुलदस्ते का.

मुझे दर्द दे - जोगी व् अमनदीप



डरना झुकना - जोगी व् अमनदीप



सूरज चाँद सितारे - कृष्णा पंडित



पार्टी में लेट लतीफ़ आए हैं परिवार के सबसे छोटे सदस्य मात्र १७ साल के नौजवान कोलकत्ता से सुभोजित. आते ही हमने घेर लिया उन्हें भी और किया वही सवाल. तो मिला बस एक लाइन का जवाब-
"हाँ मुझे पसंद है निखिल का गीत... मेरे ख्याल से “संगीत दिलों का उत्सव है” युग्म का अब तक का सर्वश्रेष्ट गीत है." तभी उनके पास चल कर आए UK से आए हमारे नए सनसनीखेज गायक बिस्वजीत भी, हमने पूछा कि क्या वो सहमत हैं सुभोजित से तो बिस्वजीत का जवाब था,"मुझे मानसी की आवाज़ बहुत पसंद आयी, “मैं नदी” गीत को उन्होंने बहुत खूब गया है, चूँकि संगीत सीखा हुआ होने के कारण वो हरकतें बहुत सहज रूप से ले लेती है और गाने में नई जान फूंक देती है"
अब बिस्वजीत सामने हो तो हम उन्हें ऐसे कैसे छोड़ सकते है. तो पहले सुन लेते हैं उनकी आवाज़, और फ़िर हम पेश करेंगे सुभोजित और बिस्वजीत के पसंदीदा गीत भी. स्वागत करें बिस्वजीत, मानसी, चार्ल्स और मिथिला का.

जीत के गीत - बिस्वजीत



मेरे सरकार - बिस्वजीत



संगीत दिलों का उत्सव है - चार्ल्स व् मिथिला



मैं नदी - मानसी




दोस्तों महफिल शबाब पर है. आईये आवाज़ की अब तक की टीम का एक संक्षिप्त परिचय लिया जाए -
संगीत परिवार -

गीतकार के रूप में - अलोक शंकर, गौरव सोलंकी, मोईन नज़र, सजीव सारथी, विश्व दीपक "तन्हा", शिवानी सिंह, अज़ीम राही, निखिल आनंद गिरी, मोहिंदर कुमार, मनुज मेहता, और संजय द्विवेदी.

गीतकार संगीतकार और गायक के रूप में - सुनीता यादव, और सुदीप यशराज.

संगीतकार के रूप में - ऋषि एस, सुभोजित, चेतन्य भट्ट, अनुरूप, निखिल वर्गीस और पेरुब.

संगीतकार और गायक के रूप में - सुबोध साठे, रुपेश ऋषि, निरन कुमार, जे एम् सोरेन, कृष्ण राज, कृष्णा पंडित, रफ़ीक शेख, आभा मिश्रा और शिशिर पारखी.

गायक के रूप में - जोगी सुरेंदर, अमन दीप कौशल, प्रतिष्ठा, चार्ल्स, मिथिला, निशांत अक्षर, मानसी पिम्पले, जयेश शिम्पी, बिस्वजीत, अभिषेक, और रुद्र प्रताप.

आवाज़ की टीम - सजीव सारथी (संपादक), शैलेश भारतवासी, अनुराग शर्मा, और तपन शर्मा चिन्तक (सह-संपादक),प्रशेन , राहुल पाठक (डिजाईन व् साज सज्जा),संजय पटेल, अशोक पाण्डेय, मृदुल कीर्ति, पंकज सुबीर, युनुस खान, सागर नाहर, मनीष कुमार, सुरेश चिपनकुर, दिलीप कवठेकर, रंजना भाटिया, शोभा महेन्द्रू, शिवानी सिंह, अनीता कुमार, अमिताभ मीत, पारुल, विश्व दीपक तन्हा और अन्य साथी सहयोगी.

इससे पहले की हम आवाज़ रुपी इस सोच की शुरुआत के एक वर्ष मुक्कमल होने की खुशी में केक काटें, ईश्वर की स्तुति कर लें, याद करें उस परम पिता को जिसके आदेश के बिना एक पत्ता भी नही हिलता. हमारे संगीत समूह में सबसे अनुभवी शिशिर पारखी जी से अनुरोध है कि वो एक मन को छू लेने वाला भजन सुनाएँ -

भजन (अप्रकाशित) - शिशिर पारखी



चलिए दोस्तों अब पार्टी का आनंद लें -



मौका भी है और दस्तूर भी, कुछ झूम लिया जाए कुछ नाच लिया जाए, पेश है एक बार फ़िर सुबोध, अपने आवारा दिल के साथ -



सोरेन जो अब तक चुप चाप खड़े हैं अब आपको रॉक करने वाले हैं अपने दमदार "ओ मुनिया" गीत के साथ.



और अंत में आईये हम सब मिलकर दोहराएँ वो मूल मन्त्र जिसने हमें एक सूत्र में बांधा है -

हिन्दी है मेरे हिंद की धड़कन,
हिन्दी मेरी आवाज़ है.
बढे चलो....पेश है जयेश, मानसी और ऋषि की आवाजों में -



आशा है आप सब मेहमानों ने इस ऑनलाइन संगीत महफिल का जम कर आनंद लिया होगा. हिंद युग्म और आवाज़ के साथ आपकी दोस्ती, आपका प्यार और आप सब का सहयोग युहीं बना रहे यही दुआ है. धन्येवाद.

Friday, February 1, 2008

आवाज़ के वाहक

हिन्द-युग्म ने इंटरनेट की जुगलबंदी से दुनिया भर में फैले युवा संगीतकारों, गीतकारों, गायकों, संगीत आलेखकों, संगीत समीक्षकों और वाचकों इत्यादि को एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है। संगीत के हर पहलू का युग्म (जोड़) है हमारा यह प्रयास आवाज।

संगीतकार

हिन्द-युग्म ने १७ संगीतकारों की मदद से कुल ३७ गीत तैयार कर लिये हैं। वर्तमान में १५ संगीतकार अलग-अलग गीतों पर काम कर रहे हैं।

14. शिशिर पारखी,
15. कुमार आदित्य विक्रम


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