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Saturday, March 12, 2016

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 10: दुर्गा खोटे


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 10
 
दुर्गा खोटे 




’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है भारतीय सिनेमा में महिलाओं की मार्ग निर्माता व सशक्त अभिनेत्री दुर्गा खोटे पर।

  

भारतीय सिनेमा में महिलाओं में अग्रदूत, अभिनेत्री दुर्गा खोटे, जो मराठी और हिन्दी फ़िल्मों में जानदार अभिनय के लिए प्रसिद्ध रहीं, 22 सितंबर 1991 को 86 वर्ष की आयु में इस दुनिया से चल बसी थीं। 50 वर्षों से भी अधिक समय तक का उनका शानदार फ़िल्मी सफ़र रहा जिसमें थिएटर के साथ-साथ लगभग 200 फ़िल्मों में अभिनय किया। उनका जीवन बहुतों के लिए प्रेरणा-स्रोत बना, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि उन्होंने सिनेमा में महिलाओं का मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि इसलिए भी कि उन्होंने अपने जीवन को दृढ़ता से आगे बढ़ाया, अपने उसूलों पर चल कर, समाज की परवाह किए बग़ैर। 14 जनवरी 1905 को मुंबई के एक महाराष्ट्रीय परिवार में जन्मी दुर्गा खोटे की शिक्षा-दीक्षा कैथेड्रल हाइ स्कूल और सेन्ट ज़ेवियस कॉलेज में हुई जहाँ से उन्होंने बी.ए. में स्नातक की। अच्छे खाते-पीते बड़े संयुक्त परिवार में उनकी परवरिश हुई। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही उनका विवाह एक बहुत अच्छे करोड़पति व्यापारी परिवार में कर दिया गया। मकेनिकल इन्जिनीयर विश्वनाथ खोटे के साथ दुर्गा का विवाह सम्पूर्ण हुआ। जल्दी ही दुर्गा खोटे ने एक के बाद एक दो बेटों को जन्म दिया, बकुल और हरिन। हँसता-खेलता सुखी परिवार, कहीं किसी चीज़ की कमी नहीं। पर सुख-शान्ति को नज़र लगते देर नहीं लगती। और दुर्गा खोटे के साथ भी यही हुआ। मात्र 26 वर्ष की आयु में दुर्गा विधवा हो गईं। विश्वनाथ खोटे की असामयिक मृत्यु होने के बाद ससुराल में दुर्गा के प्रति रिश्तेदारों का रवैया बदल गया। पर दुर्गा उन लड़कियों में शामिल नहीं थीं जो घर बैठे चुपचाप अत्याचार सहे। वो तो दुर्गा थी। वो अपने दोनों बेटों की परवरिश के लिए किसी के उपर निर्भर नहीं रहना चाहती थीं। इसलिए वो काम की तलाश में निकल पड़ीं।


दुर्गा खोटे को मराठी थिएटर जगत के बारे में मालूमात थी, और इस क्षेत्र में उनके कुछ जानकार मित्र भी थे, जिनकी सहायता से उन्होंने इस अभिनय के क्षेत्र में क़दम रखने का फ़ैसला लिया। यहाँ यह बताना अत्यन्त आवश्यक है कि यह वह दौर था 30 के दशक का जब अच्छे घर की महिलाओं का फ़िल्मों से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था। फ़िल्म तो क्या संगीत और नृत्य सीखना भी कोठेवालियों का काम समझा जाता था। फ़िल्मों और नाटकों में महिलाओं के चरित्र या तो पुरुष कलाकार निभाते या फिर कोठों से महिलाओं को बुलाया जाता। ऐसे में दुर्गा खोटे का इस अभिनय क्षेत्र में क़दम रखने के निर्णय से उनके परिवार और समाज में क्या प्रतिक्रिया हुई होगी इसका अनुमान लगाना ज़्यादा मुश्किल काम नहीं है। समाज और "लोग क्या कहेंगे" की परवाह किए बग़ैर दुर्गा खोटे उतर गईं अभिनय जगत में, सिने-संसार में, और पहली बार वो नज़र आईं 1931 की ’प्रभात फ़िल्म कंपनी’ की मूक फ़िल्म ’फ़रेबी जाल’ में। उसके बाद 1932 में ’माया मछिन्द्र’ में अभिनय करने के बाद उसी साल उन्हें मुख्य नायिका का किरदार निभाने के लिए फ़िल्म ’अयोध्या च राजा’ (मराठी व हिन्दी में निर्मित) में लिया गया। इस फ़िल्म में उनके अभिनय की इतनी तारीफ़ें हुईं कि फिर इसके बाद कभी उन्हें फ़िल्म अभिनय के क्षेत्र में पीछे मुड़ कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। इस फ़िल्म में उनके द्वारा निभाए गए रानी तारामती के रोल को आज तक याद किया जाता है।


दुर्गा खोटे ने न केवल सिनेमा में अभिनय के क्षेत्र में महिलाओं के लिए पथ-प्रशस्त किया, बल्कि फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भी वो प्रथम महिलाओं में से थीं। 1937 में उन्होंने फ़िल्म ’साथी’ का निर्माण किया और इसका निर्देशन भी उन्होंने ही किया। यही नहीं दुर्गा खोटे ने "स्टुडियो सिस्टम" की परम्परा को तोड़ कर "फ़्रीलान्सिंग्" पर उतर आईं। उनकी शख़्सीयत और प्रतिभा के आगे फ़िल्म कंपनियों और निर्माताओं को उनके सारे शर्तों को मानना पड़ा। प्रभात के साथ-साथ न्यु थिएटर्स, ईस्ट इण्डिया फ़िल्म कंपनी, और प्रकाश पिक्चर्स जैसे बड़े बैनरों की फ़िल्मों में काम किया। 40 के दशक में भी उनकी सफल फ़िल्मों का सिलसिला जारी रहा और कई पुरस्कारों से उन्हें नवाज़ा गया। उम्र के साथ-साथ दुर्गा खोटे माँ के चरित्र में बहुत सी फ़िल्मों में नज़र आईं और इस किरदार में भी वो उतना ही सफल रहीं। जोधाबाई के चरित्र में ’मुग़ल-ए-आज़म’ में उन्होंने अपने अभिनय का लोहा मनवाया। दुर्गा खोटे ने दूसरी शादी भी की थी मोहम्मद राशिद नामक व्यक्ति से, पर दुर्भाग्यवश यह शादी टिक नहीं सकी। उनके पुत्र हरिन के असामयिक मृत्यु से भी उन्हें ज़बरदस्त झटका लगा। लेकिन ज़िन्दगी के वारों का उन्होंने हर बार सामना किया और हर तूफ़ान से अपने आप को बाहर निकाला। भारत सरकार ने फ़िल्म क्षेत्र के सर्वोच्च सम्मान ’दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ से दुर्गा खोटे को सम्मानित किया। आज दुर्गा खोटे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वो हमे सिखा गईं हैं कि किस तरह से ज़िन्दगी को जीना चाहिए, किस तरह से ज़िन्दगी के लाख तूफ़ानों में भी डट कर खड़े रहना चाहिए। दुर्गा खोटे रूप है शक्ति का, दुर्गा का। ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से हम करते हैं उन्हें विनम्र नमन।



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



Tuesday, March 31, 2009

कहाँ हाथ से कुछ छूट गया याद नहीं - मीना कुमारी की याद में


मीना कुमारी ने 'हिन्दी सिनेमा' जगत में जिस मुकाम को हासिल किया वो आज भी अस्पर्शनीय है ।वे जितनी उच्चकोटि की अदाकारा थीं उतनी ही उच्चकोटि की शायरा भी । अपने दिली जज्बात को उन्होंने जिस तरह कलमबंद किया उन्हें पढ़ कर ऐसा लगता है कि मानो कोई नसों में चुपके -चुपके हजारों सुईयाँ चुभो रहा हो. गम के रिश्तों को उन्होंने जो जज्बाती शक्ल अपनी शायरी में दी, वह बहुत कम कलमकारों के बूते की बात होती है. गम का ये दामन शायद 'अल्लाह ताला' की वदीयत थी जैसे। तभी तो कहा उन्होंने -

कहाँ अब मैं इस गम से घबरा के जाऊँ
कि यह ग़म तुम्हारी वदीयत है मुझको

पैदा होते ही अब्बा अली बख्श ने रुपये के तंगी और पहले से दो बेटियों के बोझ से घबरा कर इन्हे एक मुस्लिम अनाथ आश्रम में छोड़ आए. अम्मी के काफी रोने -धोने पर वे इन्हे वापस ले आए ।परिवार हो या वैवाहिक जीवन मीना जो को तन्हाईयाँ हीं मिली

चाँद तन्हा है,आस्मां तन्हा
दिल मिला है कहाँ -कहाँ तन्हां

बुझ गई आस, छुप गया तारा
थात्थारता रहा धुआं तन्हां

जिंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हां है और जां तन्हां

हमसफ़र कोई गर मिले भी कहीं
दोनों चलते रहे यहाँ तन्हां

जलती -बुझती -सी रौशनी के परे
सिमटा -सिमटा -सा एक मकां तन्हां

राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जायेंगे ये मकां तन्हा

और जाते जाते सचमुच सरे जहाँ को तन्हां कर गयीं ।जब जिन्दा रहीं सरापा दिल की तरह जिन्दा रहीं ।दर्द चुनते रहीं संजोती रहीं और कहती रहीं -

टुकडे -टुकडे दिन बिता, धज्जी -धज्जी रात मिली
जितना -जितना आँचल था, उतनी हीं सौगात मिली

जब चाह दिल को समझे, हंसने की आवाज़ सुनी
जैसा कोई कहता हो, ले फ़िर तुझको मात मिली

होंठों तक आते -आते, जाने कितने रूप भरे
जलती -बुझती आंखों में, सदा-सी जो बात मिली

वह कोई साधारण अभिनेत्री नहीं थी, उनके जीवन की त्रासदी, पीडा, और वो रहस्य जो उनकी शायरी में अक्सर झाँका करता था, वो उन सभी किरदारों में जो उन्होंने निभाया बाखूबी झलकता रहा. फिल्म "साहब बीबी और गुलाम" में छोटी बहु के किरदार को भला कौन भूल सकता है. "न जाओ सैया छुडाके बैयाँ..." गाती उस नायिका की छवि कभी जेहन से उतरती ही नहीं. १९६२ में मीना कुमारी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए तीन नामांकन मिले एक साथ. "साहब बीबी और गुलाम", मैं चुप रहूंगी" और "आरती". यानी कि मीना कुमारी का मुकाबला सिर्फ मीना कुमारी ही कर सकी. सुंदर चाँद सा नूरानी चेहरा और उस पर आवाज़ में ऐसा मादक दर्द, सचमुच एक दुर्लभ उपलब्धि का नाम था मीना कुमारी. इन्हें ट्रेजेडी क्वीन यानी दर्द की देवी जैसे खिताब दिए गए. पर यदि उनके सपूर्ण अभिनय संसार की पड़ताल करें तो इस तरह की "छवि बंदी" उनके सिनेमाई व्यक्तित्व के साथ नाइंसाफी ही होगी.

एक बार गुलज़ार साहब ने उनको एक नज़्म दिया था. लिखा था :

शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना
बुनती है रेशम के धागे
लम्हा -लम्हा खोल रही है
पत्ता -पत्ता बीन रही है
एक एक सांस बजाकर सुनती है सौदायन
एक -एक सांस को खोल कर आपने तन पर लिपटाती जाती है
अपने ही तागों की कैदी
रेशम की यह शायरा एक दिन
अपने ही तागों में घुट कर मर जायेगी

पढ़ कर मीना जी हंस पड़ी । कहने लगी -"जानते हो न, वे तागे क्या हैं ?उन्हें प्यार कहते हैं । मुझे तो प्यार से प्यार है । प्यार के एहसास से प्यार है, प्यार के नाम से प्यार है । इतना प्यार कि कोई अपने तन से लिपट कर मर सके तो और क्या चाहिए?" महजबीं से मीना कुमारी बनने तक (निर्देशक विजय भट्ट ने उन्हें ये नाम दिया), और मीना कुमारी से मंजू (ये नामकरण कमाल अमरोही ने उनसे निकाह के बाद किया ) तक उनका व्यक्तिगत जीवन भी हजारों रंग समेटे एक ग़ज़ल की मानिंद ही रहा. "बैजू बावरा","परिणीता", "एक ही रास्ता", 'शारदा". "मिस मेरी", "चार दिल चार राहें", "दिल अपना और प्रीत पराई", "आरती", "भाभी की चूडियाँ", "मैं चुप रहूंगी", "साहब बीबी और गुलाम", "दिल एक मंदिर", "चित्रलेखा", "काजल", "फूल और पत्थर", "मँझली दीदी", 'मेरे अपने", "पाकीजा" जैसी फिल्में उनकी "लम्बी दर्द भरी कविता" सरीखे जीवन का एक विस्तार भर है जिसका एक सिरा उनकी कविताओं पर आके रुकता है -

थका थका सा बदन,
आह! रूह बोझिल बोझिल,
कहाँ पे हाथ से,
कुछ छूट गया याद नहीं....

३१ मार्च १९७२ को उनका निधन हुआ. आज उनकी ३७ वीं पुण्यतिथि पर उन्हें 'आवाज़' का सलाम. सुनते हैं उन्ही की आवाज़ में उन्हीं का कलाम. जिसे खय्याम साहब ने स्वरबद्ध किया है -

चाँद तन्हा...


मेरा माज़ी


ये नूर किसका है...


प्रस्तुति - उज्जवल कुमार

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