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Saturday, November 29, 2014

"दग़ा देके चले गए..." - सितारा देवी को श्रद्धा-सुमन, उन्हीं के गाये इस गीत के ज़रिए



एक गीत सौ कहानियाँ - 46
 
सितारा देवी का स्मरण करती एक विशेष प्रस्तुति 

दग़ा देके चले गए...



 
 
'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 46-वीं कड़ी में आज हम श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं कथक दिवा सितारा देवी को उन्हीं के गाये और उन्हीं पर फ़िल्माए गए फिल्म 'आज का हिन्दुस्तान' के गीत "दग़ा देकर चले गए..." के माध्यम से। 



25 नवंबर 2014 को कथक नृत्य के आकाश का सबसे रोशन 'सितारा' हमेशा हमेशा के लिए अस्त हो गया। कथक नृत्यांगना सितारा देवी नहीं रहीं। कुछ कलाकार ऐसे हुए हैं जिनके नाम के साथ कोई कलाविधा ऐसी घुल-मिल गई कि वे एक दूसरे का पर्याय ही बन गए। सितारा देवी और कथक नृत्य का कुछ ऐसा ही रिश्ता रहा। निस्संदेह सितारा देवी का कथक में जो योगदान है, वह अविस्मरणीय है, अद्वितीय है, तभी तो उन्होंने पद्मविभूषण स्वीकार करने से मना कर दिया था क्योंकि उनके हिसाब से वो भारतरत्न की हक़दार रही हैं। यह तो सभी जानते हैं कि सितारा देवी का कथक नृत्य जगत में किस तरह का योगदान रहा है, पर शायद कम ही लोग जानते होंगे कि सितारा देवी ने बहुत सारी हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय भी किया है, नृत्य भी किए हैं, और यही नहीं अपने उपर फ़िल्माए गीतों को ख़ुद गाया भी है। यह 30 और 40 के दशकों का दौर था। उस समय सितारा देवी अपनी दो बड़ी बहनों - अलकनन्दा और तारा देवी - की तरह स्टेज पर नृत्य करने लगी थीं और मशहूर भी हो गई थीं। एक बार फ़िल्म निर्देशक निरंजन शर्मा 'उषा हरण' नामक फ़िल्म बना रहे थे जिसमें सुल्ताना नायिका थीं और एक अन्य चरित्र के लिए वो एक ऐसी नई लड़की की तलाश कर रहे थे जिसे शास्त्रीय नृत्य का ज्ञान हो। यह तलाश उन्हें बनारस खींच लाया। सितारा देवी के नृत्य को देखते ही निरंजन शर्मा को वो पसन्द आ गईं और 'उषा हरण' में अभिनय करने हेतु सितारा देवी आ गईं बम्बई नगरी, और इस तरह से वर्ष 1933 से शुरू हुआ उनका फ़िल्मी सफ़र। फिर इसके बाद अगले दो दशकों तक इन्होंने जम कर फ़िल्मों में अभिनय किया, गीत गाये और नृत्य तो किए ही। 40 के दशक की बहुत सी फ़िल्मों में वो मुख्य नायिका भी बनीं। 50 के दशक में उन्होंने चरित्र अभिनेत्री के रूप में फ़िल्मों में नृत्य करती नज़र आईं। महबूब ख़ान की महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'मदर इण्डिया' में मशहूर गीत "होली आई रे कन्हाई..." में उनका नृत्य सभी ने देखा। पर अफ़सोस कि यही उनकी अभिनीत आख़िरी फ़िल्म रही। इसके बाद उन्होंने फ़िल्म जगत से किनारा कर लिया और कथक नृत्य की सेवा में ही अपना पूरा ध्यान लगा दिया।

"दग़ा देके चले गए बलमवा जमुना के पुल पार..." 1940 की फ़िल्म 'आज का हिन्दुस्तान' का गीत है जिसे सितारा देवी ने कान्तिलाल के साथ मिल कर गाया था और इन्हीं दोनों पर यह फ़िल्माया भी गया था। दीनानाथ मधोक का लिखा यह गीत है, जिसके संगीतकार थे खेमचन्द्र प्रकाश। इस गीत को तो लोगों ने याद नहीं रखा, पर कुछ हद तक यह गीत सितारा देवी के जीवन के एक पहलू की तरफ़ इशारा ज़रूर करता है। 1944 में सितारा देवी ने फ़िल्मकार के. आसिफ़ से प्रेम-विवाह किया, पर कुछ ही सालों में दोनों के बीच मतभेद उत्पन्न होने लगा। 'मदर इण्डिया' के बाद फ़िल्म-लाइन को त्यागने का विचार भी इसी मतभेद के कारण उत्पन्न हुआ था। सितारा देवी के जीवनकाल में सुप्रसिद्ध फिल्म इतिहासकार शिशिर कृष्ण शर्मा को दिए एक साक्षात्कार में सितारा देवी ने बताया था- "वैसे देखा जाए तो के. आसिफ़ हर तरफ़ से एक शरीफ़, होनहार और तरक्कीपसन्द इंसान थे और मेरी बहुत अच्छी तरह से देखभाल भी करते थे, पर उनकी एक बात जो मुझे अच्छी नहीं लगती थी, वह था उनका रंगीला मिज़ाज। हमारी शादी के दो-तीन साल बाद ही उन्होने लाहौर जाकर दूसरी शादी कर ली। 1950 में उन्होंने 'मुग़ल-ए-आज़म' की नीव रखी और उस फ़िल्म में अभिनय कर रही निगार सुल्ताना से शादी कर ली; यह उनकी तीसरी शादी थी। और मैं, जो उनकी कानूनी पत्नी थी, मुझे उनसे अलग होना पड़ा। 1958 में मैं ईस्ट अफ़्रीका गई प्रोग्राम करने के लिए। वहाँ हम जिस गुजराती परिवार के यहाँ ठहरे हुए थे, उसी परिवार के प्रताप बारोट से हमारी दोस्ती हुई जो बाद में विवाह में बदल गई। प्रताप बारोट गायिका कमल बारोट और निर्देशक चन्द्रा बारोट के भाई थे। 1970 में मेरा और प्रताप का तलाक़ हो गया। हमारा एकलौता बेटा रणजीत बारोट मुम्बई में रहता है और संगीत जगत में एक जाना-माना नाम है। ख़ैर, के. आसिफ़ अपनी तीसरी शादी से भी सन्तुष्ट नहीं हुए और 1960 में गुरुदत्त को लेकर 'लव ऐण्ड गॉड' फ़िल्म के निर्माण के दौरान दिलीप कुमार की छोटी बहन अख्तर से शादी कर डाली जो उनकी चौथी शादी थी। 9 मार्च 1971 के दिन बम्बई के शनमुखानन्द हॉल में प्रोग्राम करने के बाद जब रात को 2 बजे घर पहुँची तो ख़बर मिली कि के. आसिफ़ अब इस दुनिया में नहीं रहे। उस वक़्त वो सिर्फ़ 48 साल के थे। उनकी मौत के बाद उनकी कानूनी पत्नी होने की हैसियत से मैंने ही हिन्दू परम्परा के अनुसार शय्यादान आदि शेष कार्य सम्पन्न किए।" इस तरह से दग़ा देके चले जाने वाले के. आसिफ़ को सितारा देवी ने अपने दिल से कभी नहीं दूर किया और एक पत्नी का फ़र्ज़ अन्तिम समय तक निभाया। और आज सितारा देवी भी इस दुनिया को दग़ा देकर हमेशा-हमेशा के लिए चली गईं, और अपने पीछे छोड़ गईं एक पूरा का पूरा एक कला संस्थान जो आने वाली कई पीढ़ियों को नृत्य सिखाता रहेगा। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से सितारा देवी को नमन।

फिल्म - आज का हिन्दुस्तान : 'दगा देके चले गए हो जमुना के उस पार...' : स्वर- सितारा देवी और कान्तिलाल : संगीत - खेमचन्द्र प्रकाश : गीत - दीनानाथ मधोक 



'एक गीत सौ कहानियाँ' के इस अंक में ब्लॉग, 'बीते हुए दिन' से सन्दर्भ लिया है। इसके लिए हम इस ब्लॉग और 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के मित्र शिशिर कृष्ण शर्मा के प्रति आभार प्रकट करते हैं। अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें।  


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र




Sunday, July 6, 2014

‘बरखा ऋतु आई...’ : राग मेघ मल्हार





स्वरगोष्ठी – 175 में आज

वर्षा ऋतु के राग और रंग – 1 : राग मेघ मल्हार


‘गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई, दुल्हन मन भावे...’







‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, आज से हम एक नई लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के राग और रंग’ का शुभारम्भ कर रहे हैं। इस शीर्षक से यह अनुमान आपको हो ही गया होगा कि यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में हम राग मेघ मल्हार की चर्चा करेंगे। राग मेघ मल्हार एक प्राचीन राग है, जिसके गायन-वादन से संगीतज्ञ वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सृजन करते हैं। इस राग में आज हम आपको सुप्रसिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती द्वारा प्रस्तुत मध्यलय झपताल की एक खयाल रचना और इसी राग के स्वरों पर आधारित 1942 में प्रदर्शित फिल्म ‘तानसेन’ में खुर्शीद बेगम का गाया गीत भी सुनवा रहे हैं।




स वर्ष कुछ विलम्ब से ही सही आजकल हम सब प्रकृति के अद्भुत वरदान पावस ऋतु का आनन्द ले रहे हैं। हमारे चारो ओर के परिवेश ने हरियाली की चादर ओढ़ने की पूरी तैयारी कर ली है। तप्त-शुष्क भूमि पर वर्षा की फुहारें पड़ने पर चारो ओर जो सुगन्ध फैलती है वह अवर्णनीय है। ऐसे ही मनभावन परिवेश का सृजन करने के लिए और और हमारे उल्लास और उमंग को द्विगुणित करने के लिए आकाश में कारे-कजरारे मेघ उमड़-घुमड़ रहे हैं। भारतीय साहित्य और संगीत को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली दो ऋतुएँ, बसन्त और पावस हैं। पावस ऋतु में मल्हार अंग के रागों का गायन-वादन अत्यन्त सुखदायी होता है। वर्षाकालीन सभी रागों में सबसे प्राचीन राग मेघ मल्हार माना जाता है। काफी थाट का यह राग औड़व-औड़व जाति का होता है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में 5-5 स्वरों का प्रयोग होता है। गान्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। समर्थ कलासाधक कभी-कभी परिवर्तन के तौर पर गान्धार स्वर का प्रयोग करते है। भातखण्डे जी ने अपने ‘संगीत-शास्त्र’ ग्रन्थ में भी यह उल्लेख किया है कि कोई-कोई कोमल गान्धार का प्रयोग भी करते हैं। लखनऊ के वरिष्ठ संगीत-शिक्षक और शास्त्र-अध्येता पण्डित मिलन देवनाथ के अनुसार लगभग एक शताब्दी पूर्व राग मेघ में कोमल गान्धार का प्रयोग होता था। आज भी कुछ घरानों की गायकी में यह प्रयोग मिलता है। रामपुर, सहसवान घराने के जाने-माने गायक उस्ताद राशिद खाँ जब राग मेघ गाते हैं तो कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं। ऋषभ का आन्दोलन राग मेघ का प्रमुख गुण होता है। यह पूर्वांग प्रधान राग है। इस राग के माध्यम से आषाढ़ मास के मेघों की प्रतीक्षा, उमड़-घुमड़ कर आकाश पर छा जाने वाले काले मेघों और वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक परिवेश का सजीव चित्रण किया जाता है। आइए, अब हम राग मेघ मल्हार में एक भावपूर्ण खयाल सुनते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे है, पटियाला (कसूर) गायकी में सिद्ध गायक पण्डित अजय चक्रवर्ती। यह मध्यलय झपताल की रचना है, जिसके बोल हैं- ‘गरजे घटा घन कारे कारे पावस रुत आई...’।


राग मेघ मल्हार : ‘गरजे घटा घन कारे कारे, पावस रुत आई, दुल्हन मन भावे...’ : गायक - पण्डित अजय चक्रवर्ती 





भारतीय साहित्य में भी राग मेघ मल्हार के परिवेश का भावपूर्ण चित्रण मिलता है। वर्षा ऋतु के आगमन की आहट देने वाले राग मेघ की प्रवृत्ति को महाकवि कालिदास ने ‘मेघदूत’ के प्रारम्भिक श्लोकों में अत्यन्त यथार्थ रूप में किया है-

आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्टसानुं वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श।

अर्थात; रामगिरि पर्वत पर शापित यक्ष विरह-ताप से पीड़ित है। तभी आषाढ़ मास के पहले दिन आकाश में काले-काले मेघ मँडराने लगे। ऐसा प्रतीत होने लगा मानो मदमस्त हाथियों का झुण्ड पर्वत की श्रृंखलाओं के साथ अटखेलियाँ कर रहे हों। ‘मेघदूत’ का यक्ष अपनी प्रियतमा तक सन्देश भेजने के लिए आषाढ़ मास के मेघों को ही अपना दूत बनाता है। इससे थोड़ा भिन्न परिवेश पाँचवें दशक की एक फिल्म से हमने लिया है। आज का गीत हमने 1942 में रणजीत स्टूडियो द्वारा निर्मित और जयन्त देसाई द्वारा निर्देशित फिल्म ‘तानसेन’ से चुना है। फिल्म के प्रसंग के अनुसार अकबर के आग्रह पर तानसेन ने राग ‘दीपक’ गाया, जिसके प्रभाव से उनका शरीर जलने लगा। कोई उपचार काम में नहीं आने पर उनकी शिष्या ने राग ‘मेघ मल्हार’ का आह्वान किया, जिसके प्रभाव से आकाश मेघाच्छन्न हो गया और बरखा की बूँदों ने तानसेन के तप्त शरीर का उपचार किया। इस प्रसंग में राग ‘मेघ मल्हार’ की अवतारणा करने वाली तरुणी को कुछ इतिहासकारों ने तानसेन की प्रेमिका कहा है तो कुछ ने उसे तानसेन की पुत्री तानी बताया है। बहरहाल, इस प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाता है कि राग ‘मेघ मल्हार’ मेघों का आह्वान करने में सक्षम है। दूसरे रूप में हम यह भी कह सकते हैं कि इस राग में मेघाच्छन्न आकाश, उमड़ते-घुमड़ते बादलों की गर्जना और वर्षा के प्रारम्भ की अनुभूति कराने की क्षमता है। फिल्म ‘तानसेन’ के संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश और गीतकार पण्डित इन्द्र थे। फिल्म में तानसेन की प्रमुख भूमिका में कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल थे। फिल्म के लगभग सभी गीत विभिन्न रागों पर आधारित थे। फिल्म ‘तानसेन’ में राग मेघ मल्हार पर आधारित गीत है- ‘बरसो रे कारे बादरवा हिया में बरसो...’, जिसे उस समय की विख्यात गायिका-अभिनेत्री खुर्शीद बेगम ने गाया और अभिनय भी किया था। तीनताल में निबद्ध इस गीत में पखावज की संगति की गई है। आइए, सुनते हैं वर्षा ऋतु का आह्वान करते राग ‘मेघ मल्हार’ पर आधारित यह गीत। आप इस गीत के माध्यम से पावस का आनन्द लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मेघ मल्हार : ‘बरसो रे कारे बादरवा हिया में बरसो...’ फिल्म – तानसेन : स्वर – खुर्शीद बेगम : संगीत – खेमचन्द्र प्रकाश 






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 175वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको नारी-कण्ठ-स्वर में एक खयाल रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 180वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1- खयाल के इस अंश को सुन कर गायिका की आवाज़ को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

2 – यह संगीत रचना किस राग में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 177वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 173वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया द्वारा प्रस्तुत बाँसुरी वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग हंसध्वनि और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल सितारखानी अथवा पंजाबी ठेका अथवा अद्धा त्रिताल। इस अंक की पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इस अंक से हमने ऋतु के अनुकूल रागों अर्थात वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों पर यह लघु श्रृंखला आरम्भ किया है। अगले अंक में एक और वर्षाकालीन राग पर आपसे चर्चा करेंगे। आप भी यदि भारतीय संगीत के किसी विषय में कोई जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Sunday, February 9, 2014

बसन्त ऋतु और राग बहार SWARGOSHTHI – 154



स्वरगोष्ठी – 154 में आज

ऋतुराज बसन्त का अभिनन्दन राग बहार से


‘कलियन संग करता रंगरेलियाँ...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, पिछले अंक में हमने बसन्त पंचमी के उपलक्ष्य मे राग बसन्त के माध्यम से ऋतुराज का स्वागत किया था और भारतीय संगीत के महान रत्न पण्डित भीमसेन जोशी को उनके जन्मदिवस पर स्मरण किया था। आज संगीत-प्रेमियों की इस गोष्ठी में बसन्त ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले एक और राग, बहार की चर्चा होगी। साथ ही पण्डित भीमसेन जोशी को एक बार पुनः उन्हीं की कृति के माध्यम से स्मरण करेंगे। भारतीय संगीत के विश्वविख्यात कलासाधक और सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान ‘भारतरत्न’ से अलंकृत पण्डित भीमसेन जोशी का जन्म भी बसन्त ऋतु में 4 फरवरी, 1922 को हुआ था। बसन्त ऋतु में गाये-बजाये जाने वाले कुछ मुख्य रागों की चर्चा का यह सिलसिला हमने गत सप्ताह से आरम्भ किया है। इस श्रृंखला की अगली कड़ी में आज हम आपसे राग बहार पर चर्चा करेंगे।  

 



 पिछले अंक में हमने आपसे राग बसन्त के बारे में चर्चा की थी। ऋतुओं पर आधारित रागों की श्रृंखला में आज बारी है, राग बहार की। राग बहार एक प्राचीन राग है, जिसमें शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत की रचनाएँ भरपूर मिलतीं हैं। इस राग के स्वर समूह बासन्ती परिवेश रचने में पूर्ण समर्थ हैं। चूँकि राग बहार ऋतु प्रधान राग है, अतः बसन्त ऋतु में इसका गायन-वादन किसी भी समय किया जा सकता है। अन्य ऋतुओं में इसे रात्रि के प्रथम और द्वितीय प्रहर में ही गाने-बजाने की परम्परा है। काफी थाट के अन्तर्गत आने वाले इस राग की जाति षाड़व-सम्पूर्ण है, अर्थात आरोह में छः और अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। बहार में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है, आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग होता है। मध्यम स्वर वादी और षडज स्वर संवादी माना जाता है। इसके आरोह के स्वर हैं- सा म, प (कोमल) म, ध, नि सां तथा अवरोह के स्वर हैं- रें नि सां ध नि (कोमल) प, म प (कोमल) म, रे सा । कुछ विद्वान आरोह में ऋषभ और अवरोह में धैवत का प्रयोग नहीं करते। ऐसी स्थिति में यह राग षाड़व-षाड़व जाति का होता है। आइए अब हम आपको राग बहार की एक मनमोहक बन्दिश सुनवाते हैं। द्रुत तीनताल में निबद्ध इस रचना को महान गायक पण्डित भीमसेन जोशी ने स्वर प्रदान किया है। 



राग बहार : ‘कलियन संग करता रंगरेलियाँ...’ : पण्डित भीमसेन जोशी : द्रुत तीनताल



कुछ विद्वान मानते हैं कि राग बहार का सृजन राग बागेश्री और कान्हड़ा के मेल से हुआ है। राग बहार का अन्तरा राग मियाँ की मल्हार के काफी निकट प्रतीत होता है। राग बहार के गायन के बाद अब हम यही राग आपको वाद्य संगीत में सुनवाएँगे। विश्वविख्यात वायलिन वादक पण्डित वी.जी. जोग का एक ग्रामोफोन रिकार्ड है, जिसमें उन्होने राग बहार का अत्यन्त आकर्षक वादन प्रस्तुत किया है। पण्डित वी.जी. जोग का जन्म 22 फरवरी, 1922 को मुम्बई में हुआ था। संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा उन्हें पण्डित शंकरराव आठवले और पण्डित गणपतराव पुरोहित से मिली। बाद में उन्होने लखनऊ आकर मैरिस म्युजिक कालेज (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) के तत्कालीन प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातञ्जंकर से न केवल संगीत-शिक्षा प्राप्त की बल्कि 1952 तक इसी कालेज में वायलिन शिक्षक के रूप में कार्य भी किया। जोग साहब जुगलबन्दी के बादशाह थे। उन्होने देश-विदेश के अनेक ख्यातिप्राप्त कलासाधकों के साथ वायलिन की जुगलबन्दी की है, किन्तु जो प्रसिद्धि उन्हें उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई के साथ जुगलबन्दी करके मिली वह अन्यत्र दुर्लभ था। इन दोनों कलासाधकों ने प्रथम बार 1946 में कोलकाता के लाला बाबू संगीत सम्मेलन में जुगलबन्दी की थी। अपने समय के प्रायः सभी संगीतज्ञों के साथ पण्डित जी की जुगलबन्दी के रिकार्ड, संगीत-प्रेमी आज भी सुनते और सराहते हैं। उस्ताद इनायत खाँ (सितार), पण्डित रामनारायण (सारंगी), पण्डित रविशंकर (सितार), पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया (बाँसुरी), उस्ताद अमजद अली खाँ (सरोद), पण्डित शिवकुमार शर्मा (संतूर), पण्डित ब्रजभूषण काबरा (गिटार) और पण्डित ज्ञानप्रकाश घोष (हारमोनियम) के साथ जोग साहब की जुगलबन्दियाँ अविस्मरणीय रहीं हैं। उन्होने कई दक्षिण भारतीय वायलिन वादकों और पाश्चात्य संगीत के प्रसिद्ध पियानो वादकों के साथ भी अपनी वायलिन की जुगलबन्दी की है। अब आप पण्डित वी.जी. जोग का बजाया वायलिन पर राग बहार सुनिए। इस प्रस्तुति में द्रुत तीनताल की तबला संगति उस्ताद अहमदजान थिरकवा ने की है।


राग बहार : वायलिन वादन : पण्डित वी.जी. जोग : द्रुत तीनताल




 
हिन्दी फिल्मों में राग बहार का प्रयोग बहुत अधिक तो नहीं हुआ है किन्तु कुछेक फिल्मों में इस राग का बेहतर प्रयोग किया गया है। इन्हीं में से एक अतीत के सुनहरे दौर का एक फिल्मी गीत है। 1943 में रणजीत स्टुडियो द्वारा निर्मित उल्लेखनीय फिल्म ‘तानसेन’ का एक गीत है- ‘बाग लगा दूँ सजनी...’। इस फिल्म में गायक-अभिनेता कुन्दनलाल सहगल तानसेन की भूमिका में और गायिका-अभिनेत्री खुर्शीद, तानसेन की प्रेमिका की भूमिका में थीं। संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश थे। इस संगीतप्रधान फिल्म में उन्होने एक से बढ़ कर एक विभिन्न राग आधारित गीतों की रचना की थी। राग तिलक कामोद, मेघ मल्हार, शंकरा, पीलू और कथित दीपक राग पर आधारित गीतों के बीच एक गीत ‘बाग लगा दूँ सजनी...’ राग बहार पर भी आधारित था, जिसे सहगल ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में प्रस्तुत किया था। लीजिए, अब आप सहगल की आवाज़ में संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश के निर्देशन में राग बहार पर आधारित यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग बहार : ‘बाग लगा दूँ सजनी...’ : कुन्दनलाल सहगल : फिल्म तानसेन : संगीत खेमचन्द्र प्रकाश




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 154वें अंक की पहेली में आज हम आपको तंत्रवाद्य वादन का एक अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 160वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – तंत्रवाद्य वादन के इस अंश को सुन कर इस वाद्ययंत्र को पहचानिए और हमे उसका नाम लिख भेजिए।

2 – इस प्रस्तुति-अंश को सुन कर आपको किस राग का संकेत प्राप्त हो रहा है? राग का नाम लिखें।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 156वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 152वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में गायन का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित भीमसेन जोशी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग बसन्त। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और चण्डीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



 मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों बसन्त ऋतु में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा जारी है। अगले अंक में हम इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत एक और ऋतु प्रधान राग पर चर्चा करेंगे। इस लघु श्रृंखला के बाद हम शीघ्र ही एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे। इस बीच हम अपने पाठकों/श्रोताओं के अनुरोध पर कुछ अंक जारी रखेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

 

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