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Saturday, July 19, 2014

"मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों?" वाक़ई कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ हमारे आसपास है...


एक गीत सौ कहानियाँ - 36
 

‘तेरा हिज्र मेरा नसीब है...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी जिन्दगी से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 36वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' की ग़ज़ल "तेरा हिज्र मेरा नसीब है..." के बारे में



माल अमरोही निर्देशित 1983 की फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह से पिटी पर हेमा मालिनी-धर्मेन्द्र अभिनीत इस फ़िल्म को इसकी पटकथा, संवाद और निर्देशन के लिए आज भी याद किया जाता है और याद किया जाता है इस फ़िल्म के सुमधुर गीतों और ग़ज़लों को भी। ख़य्याम द्वारा स्वरबद्ध फ़िल्म के गीतों को लिखने का कार्यभार जाँनिसार अख़्तर को सौंपा गया था, पर सभी गीत पूरे होने से पहले ही वो चल बसे जिस वजह से फ़िल्म के शेष दो गीत शायर और गीतकार निदा फ़ाज़ली से लिखवाये गये। लता मंगेशकर का गाया "ऐ दिल-ए-नादान..." सर्वाधिक लोकप्रिय गीत रहा इस फ़िल्म का, जो कि ख़य्याम साहब की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक है और लता जी के पसन्दीदा गीतों में भी इसका शुमार होता है। लता की ही आवाज़ में "जलता है बदन..." भी काफ़ी सुना गया, पर "ख़्वाब बन कर कोई आयेगा..." ज़्यादा चर्चा में नहीं रहा। अन्य दो गीत "हरियाला बन्ना आया रे..." (आशा भोसले, जगजीत कौर) और "ऐ ख़ुदा शुक्र तेरा..." (महेन्द्र कपूर, भूपेन्द्र) भी ज़्यादा ध्यान आकर्षित नहीं कर पाए। पर इस फ़िल्म में दो ग़ज़लें ऐसी थीं जिनमें एक अलग ही बात थी। अलग बात इसलिए कि इनके गायक थे कब्बन मिर्ज़ा जिन्हें उस समय कोई नहीं जानता था और उनकी अलग हट कर आवाज़ ने इन दो ग़ज़लों को एक अलग ही जामा पहनाया। "आई ज़ंजीर की झनकार ख़ुदा ख़ैर करे..." और "तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा ग़म ही मेरी हयात है..." गाकर कब्बन मिर्ज़ा ने बहुत वाह-वाही लूटी। निदा फ़ाज़ली द्वारा लिखे फ़िल्म के दो गीत थे "हरियाला बन्ना आया रे..." और "तेरा हिज्र ही मेरा नसीब है..."। 

कब्बन मिर्ज़ा
अब आते हैं कब्बन मिर्ज़ा पर। आख़िर कौन थे ये जनाब? इनकी आवाज़ तो इससे पहले किसी ने नहीं सुनी। और न ही इसके बाद फिर कभी सुनाई दी। कहाँ से आये और कहाँ ग़ायब हो गये पता ही नहीं चला। इन्टरनेट पर इनके बारे में बस यही लिखा गया है कि ये 'विविधभारती' के उद्‍घोषक हुआ करते थे। इसलिए कब्बन मिर्ज़ा के जीवन से जुड़ी और भी कुछ बातें मालूम करने के लिए जब मैंने 'विविधभारती' के वर्तमान लोकप्रिय उद्‍घोषक यूनुस ख़ान का सहारा लिया तो कब्बन साहब के बारे में कुछ और बातें जानने को मिली। कब्‍बन मिर्जा का ताल्‍लुक लखनऊ से था। वो 'विविधभारती' में उदघोषक नहीं बल्कि 'प्रोग्राम असिस्‍टेन्‍ट' थे। और आवाज़ अच्छी होने की वजह से प्रोग्राम भी करते थे। 'संगीत सरिता' से वो शुरूआत से जुड़े रहे थे। मुहर्रम में मर्सिए वग़ैरह गाते थे। 'विविधभारती' में उनका सबसे अहम योगदान रहा 'संगीत सरिता' का शुरूआती स्‍वरूप और उसे लोकप्रियता देना, जिसमें पहले किसी राग के बारे में बताया जाता, फिर उसका चलन, और फिर उस पर आधारित शास्‍त्रीय और फिल्‍मी रचना। ये क्‍लासिकल स्‍वरूप उन्‍हीं ने बनाया। बाद में इसे इंटरव्‍यू बेस्‍ड कर दिया गया। वो अस्‍सी के दशक के दौरान विविधभारती से रिटायर हुए। और फिर मुंबई के उपनगर मुंब्रा में रहते रहे। उनके एक (या शायद दोनों) बेटे सऊदी अरब के एक मशहूर रेडियो स्‍टेशन से जुड़े हैं। इन्टरनेट पर उनका जन्म 1937-38 बताया गया है। उन्हें गले का कैन्सर हो गया था पर उनकी मृत्यु के बारे में ठीक-ठीक कहीं कुछ लिखा नहीं गया है, पर कुछ वेबसाइट में 'Late Kabban Mirza' कह कर उल्लेख है।

ख़य्याम
अब सवाल यह है कि फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' के इन दोनो ग़ज़लों को गाने के लिए कब्बन मिर्ज़ा कैसे चुने गये। 'रज़िया सुल्तान' फ़िल्म दिल्ली की एकमात्र महिला सुल्तान रज़िया सुल्तान (1205-1240) के जीवन पर आधारित थी और इसमें शामिल है उनके ऐबिसिनियन ग़ुलाम जमाल-उद्दीन याकुत (धर्मेन्द्र द्वारा निभाया चरित्र) के साथ प्रेम-सम्बन्ध भी। जमाल एक बहुत बड़ा सिपहसालार है, जो जब भी कभी वक़्त मिलता है, थोड़ा गा लेता है अपनी मस्ती में, पर वो कोई गायक नहीं है। ऐसे किरदार के पार्श्वगायन के लिए कमाल अमरोही ने ख़य्याम के सामने अपनी फ़रमाइश रख दी कि उन्हें ये दो ग़ज़लें किसी ऐसे गायक से गवानी है जो गायक नहीं है पर थोड़ा बहुत गा लेता है। ऐसे में ख़य्याम साहब के लिए बड़ी कठिनाई हो गई कि उन्हें कोई इस तरह का गायक न मिले। अब यह हुआ कि पूरे हिन्दुस्तान से 50 से भी ज़्यादा लोग आये और सब आवाज़ों में यह हुआ कि लगा कि वो सब मंझे हुए गायक हैं। किसी की भी आवाज़ में वह बात नज़र नहीं आयी जिसकी कमाल अमरोही को तलाश थी। ऐसे ही कब्बन मिर्ज़ा भी आये अपनी आवाज़ को आज़माने। ख़य्याम, उनकी पत्नी और गायिका जगजीत कौर और कमाल अमरोही, तीनो ने उन्हें सुना। जब कब्बन मिर्ज़ा से यह पूछा गया कि उन्होंने कहाँ से गायन सीखा, तो उनका जवाब था कि उन्होंने कहीं से नहीं सीखा। किस तरह के गाने आप गा सकते हैं, पूछने पर कब्बन साहब लोकगीत सुनाते चले जा रहे थे। वो तीनों मुश्किल में पड़ गये क्योंकि उनकी ज़रूरत थी एक ऐसे शख्स की जो गायक न हो पर ग़ज़ल गा सके! अत: कब्बन मिर्ज़ा भी रिजेक्ट हो गये। पर अगली सुबह कमाल साहब का ख़य्याम साहब को टेलीफ़ोन आया कि आप फ़्री हैं तो अभी आप तशरीफ़ लायें। नाश्ता उनके साथ हुआ। नाश्ता हुआ तो कमाल साहब कहने लगे कि रात भर मुझे नींद नहीं आई, यह जो आवाज़ है जो हमने कल सुनी कब्बन मिर्ज़ा की, यही वह आवाज़ है जिसकी तलाश मैं कर रहा था। ख़य्याम चौंक कर बोले, "कमाल साहब, लेकिन उनको गाना तो आता नहीं!" तो कमाल अमरोही ने ख़य्याम का हाथ पकड़ कर बोले, "ख़य्याम साहब, आप मेरे केवल मौसीकार ही नहीं हैं, आप तो मेरे दोस्त भी हैं। प्लीज़ आपको मेरे लिए यह करना है, मुझे इन्ही की आवाज़ चाहिये।" फिर क्या था, शुरू हुई कब्बन मिर्ज़ा की संगीत शिक्षा। ख़य्याम साहब ने उन्हे तीन-चार महीने स्वर और ताल का ज्ञान दिलवाया और उसके बाद गाने की रेकॉर्डिंग शुरू हुई। अक्सर यह होता है कि रेकॉर्डिंग के वक़्त म्युज़िक डिरेक्टर रेकॉर्डिंग करवाता है अपने रेकॉर्डिस्ट से, और असिस्टैण्ट जो होते हैं वो ऑरकेस्ट्रा संभालते हैं। पर उस दिन क्योंकि कब्बन मिर्ज़ा नये थे, गा नहीं पा रहे थे, इसलिए ख़य्याम साहब ने जगजीत कौर को भेजा रेकॉर्डिंग पर, असिस्टैण्ट को भी अन्दर भेजा, और ख़ुद कंडक्ट किया। इस तरह से रेकॉर्ड हुआ कब्बन मिर्ज़ा का गाया "तेरा हिज्र मेरा नसीब है..."।

निदा फ़ाज़ली
शायर और गीतकार निदा फ़ाज़ली के लिए भी यह ग़ज़ल उतनी ही महत्वपूर्ण थी। उन्हीं के शब्दों में - "देखिये, पटना, बिहार, अज़ीमाबाद के एक शायर हुए हैं शाद अज़ीमाबादी। उनकी एक लाइन है कि "मैं ख़ुद आया नहीं, लाया गया हूँ"। जैसा कि मैंने पहले कहा कि चॉयस का इख़्तियार ज़िन्दगी में होता नहीं है। जहाँ आप पैदा हुए, वह आपका परिवार, उस परिवार की जो भाषा वही आपकी भाषा, वह परिवार जिस मोहल्ले में, वही आपका मोहल्ला, वह मोहल्ला जिस नगर में, वह आपका नगर; मेरे साथ भी यही हुआ कि बिना पूछे पैदा कर दिया गया, और मैं ये तमाम बोझ लिए गधे की तरह ज़िन्दगी के सफ़र में घूमता रहा। जब घर छीना गया तो घर की तलाश में पूरे देश में भटकता रहा, यह भी बेवकूफ़ी थी। मालूम पड़ा एक पड़ाव बम्बई आया है, उस ज़माने में धरमवीर भारती एक यहाँ थे, उनके 'धर्मयुग' में लिखना शुरू कर दिया। फिर 'ब्लिट्ज़' में लिखना शुरू कर दिया। एक दिन बेघर एक शख़्स जिसका नाम निदा फ़ाज़ली था, उसके लिए मैसेज रखी हुई थी हर जगह, जहाँ वह काम कर रहा था थोड़ा-थोड़ा, कहीं 'धर्मयुग' में पड़ी हुई है, कहीं 'ब्लिट्ज़' में पड़ी हुई है, कहीं किसी रेडियो स्टेशन में पड़ी हुई है, और उस मैसेज में लिखा हुआ था "मैं आप से मिलना चाहता हूँ, आप मुझसे आ कर मिलिये, मुझे आप से कुछ काम लेना है - कमाल अमरोही"। मैंने सोचा कि मेरा कमाल अमरोही से क्या काम हो सकता है! मैं उनसे मिलने चला गया। कमाल साहब मिले करीब 2 बजे, वो स्टाइलिश आदमी थे कमाल साहब, वो एक लफ़्ज़ अंग्रेज़ी का नहीं बोलते थे, और वो भाषा बोलते थे जो आज से 50 साल पहले अमरोहा में बोली जाती थी। मैं वह भाषा बम्बई आकर भूल गया। मैंने कहा, "कमाल साहब, आदाब अर्ज़ है, मेरा नाम निदा फ़ाज़ली है"। बोले, "तशरीफ़ रखिये, मैंने आपको इसलिए याद फ़रमाया है कि मुझे एक मुकम्मल शायर की ज़रूरत है"। मैंने कहा कि मैं हाज़िर हूँ और इस इज़्ज़त-अफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया कि आप मुझे मुकम्मल शायर समझ रहे हैं। बोले, "जी, मुझे आप से कुछ नग़मात तहरीर करवाने है"। मैं कहा कि मैं हाज़िर हूँ साहब, आप बताइये कि कैसा गाना है, क्या लिखना है। बोले कि इससे पहले कि आप गाना लिखें, एक बात मैं जाहिर कर देना चाहता हूँ कि इल्मी शायरी अलग होती है और फ़िल्मी शायरी अलग होती है, और फ़िल्मी शायरी लिखने के लिए आपको मेरी मिज़ाज की शिनाख़्त बहुत ज़रूरी है; जाँ निसार अख़्तर मेरे मिज़ाज को पहचान गये थे, अल्लाह को प्यारे हो गये। मैंने कहा कि मैं यह शर्त तो पूरी नहीं करने वाला, कोशिश करूंगा कि आपके मिज़ाज का कुछ लिखूँ। तो उन्होंने सिचुएशन सुनाई, अपनी ज़ुबान में सुनाई तो थोड़ी देर के लिए मैं भी हिल गया। कहने लगे, "हमारी दास्तान उस मुकाम पर आ गई जहाँ मलिका-ए-आलिआ रज़िया सुल्तान, यानी हेमा मालिनी, सियाहा लिबास में ख़रामा-ख़रामा चली आ रही है, जिसे देख कर हमारा आलेया कासी ख़ैरमक़दम के लिए आगे बढ़ा। मैं थोड़ी देर बैठा रहा, फिर उनके असिस्टैन्ट ने कहा कि इसका मतलब यह है कि हेमा मालिनी सफ़ेद घोड़े पर काले लिबास पहने आ रही हैं, और आलेया कासी यानी कैमरा उनकी तरफ़ मूव हो रहा है। तो मैंने आख़िर के दो गीत उस फ़िल्म के लिए लिखे।" 

"तेरा हिज्र मेरा नसीब है..." ग़ज़ल में कुछ ऐसी बात है कि जिसे एक बार सुनने के बाद एक और बार सुनने का मन होता है। कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ में एक ऐसा आकर्षण है कि जो सीधे दिल में उतर जाता है। यह उपहास ही है कि ऐसी मोहक आवाज़ के धनी कब्बन मिर्ज़ा गले के कैन्सर से आक्रान्त हो कर इस दुनिया से चल बसे। पर जैसा कि इस ग़ज़ल की दूसरी लाइन में कहा गया है कि "मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों, तू कहीं भी हो मेरे साथ है", वैसे ही कब्बन मिर्ज़ा भले इस दुनिया में नहीं हैं, पर उनकी गायी हुई 'रज़िया सुल्तान' की इन दो ग़ज़लों ने उनकी आवाज़ को अमर कर दिया है, जो हमेशा हमारे साथ रहेगी। बस इतनी सी थी यह दास्तान। लीजिए, कब्बन मिर्जा की आवाज़ में वह गाना आप भी सुनिए।

फिल्म - राजिया सुल्तान : "तेरा हिज्र मेरा नसीब है..." : स्वर - कब्बन मिर्ज़ा : संगीत - खय्याम : गीतकार - निदा फाजली  





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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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