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Friday, June 26, 2009

इंशा जी उठो अब कूच करो....एक गज़ल जिसके कारण तीन फ़नकार कूच कर गए

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२४

ज की गज़ल को क्या कहूँ, कुछ ऐसी कहानी हीं इससे जुड़ी है कि अगर कुछ न भी हो तो बहुत कुछ कहा जा सकता है,फिर भी दिल है कि एक शब्द कहने या लिखने से पहले सौ बार सोचने की सलाह दे रहा है। यूँ तो मेरे पास लगभग २० गज़लें थीं,जिनमें से किसी पर भी मैं लिख सकता था,लेकिन न जाने क्यों फ़ेहरिश्त की आठवीं गज़ल मेरे मन को भा गई,बाकियों को सुना भी नहीं,इसके बोल पढे और इसे हीं सुनने लगा और यह देखिए कि लगातार तीन-चार दिनों से इसी गज़ल को सुनता आ रहा हूँ। इस गज़ल से जुड़ी जो कहानियाँ हैं, दिमाग उन्हें फ़ितूर साबित करने पर तुला है,लेकिन दिल है कि कभी-कभार उन कहानियों पर यकीं कर बैठता है। अब दिल तो दिल है, उसकी भी तो सुननी होगी। इसलिए सोचता हूँ कि एक बार सही से बैठूँ और दिल-दिमाग के बीच समझौता करा दूँ। इसमें आप मेरा साथ देंगे ना? तो पहले उन कहानियों का हीं ज़िक्र करता हूँ, फिर निर्णय करेंगे कि इनमें कितनी सच्चाई है। इस गज़ल के शायर के बारे में यह कहा जाता है कि यह गज़ल उनकी अंतिम गज़ल थी, मतलब कि इसे लिखने के बाद वो कुछ भी न लिख पाएँ और कुछ दिनों या महीनों के बाद सुपूर्द-ए-खाक़ हो गए। इस गज़ल को मक़बूल करने में शायर के बाद जिन फ़नकार का हाथ था, मतलब कि जिन्होंने इसे गाया था, उनके बारे में यह कहा जाता है कि जिस दिन उन्होंने पी०टी०वी० के लिए इस गज़ल की रिकार्डिंग की, उसके अगले हीं सुबह दिल का दौरा पड़ने से उनका स्वर्गवास हो गया। इतना हीं नहीं, इस गज़ल के गायक की १९७४ में मौत के बाद उनके साहबजादे ने इसे गाना शुरू किया। चूँकि पिता की याद इस गज़ल से जुड़ी थी,इसलिए इसे गाने के दौरान हमेशा हीं वे भावुक हो जाया करते थे और आँसूओं का सैलाब उमड़ पड़ता था। यही कारण था कि इस गज़ल को हर बार हीं वे मुशायरे के अंत में गाते थे, ताकि रूँधे गले के कारण दूसरे गज़लों पर कोई असर न हो। नियति का खेल देखिए कि उनकी मौत भी दिल का दौरा पड़ने से हुई। ८ अप्रैल २००७ को लंदन में उन्होंने अंतिम साँस ली और उनके बारे में भी यही कहा जाता है कि यह गज़ल उनकी अंतिम गज़ल थी। शायर ने ५१ साल की उम्र में दम तोड़ा, गुलूकार को महज़ ४२ सावन हीं नसीब हुए तो गुलूकार के सुपूत्र की किस्मत में ५२ वसंत हीं लिखे थे। अब इसे इत्तेफ़ाक कहें या कुछ और?

दिल की इतनी दलीलों के बाद, जब भी मैं दिमाग की तरफ़ रूख करता हूँ तो इन कहानियों में कुछ अटपटा-सा महसूस होता है और वही अटपटापन है,जो मुझे डरने नहीं देता। जहाँ तक गुलूकार की बात है तो उनकी मौत से जुड़े कोई भी सुराग मेरे हाथ नहीं लगे इसलिए यह मानना पड़ेगा कि वे नितांत स्वस्थ थे और रिकार्डिंग के अगले दिन पड़ा दिल का दौरा हीं उनकी मौत का एकमात्र कारण था। लेकिन अगर हम शायर और दूसरे गुलूकार की तरफ़ देखें तो यह जान पड़ता है कि जहाँ पहले को "होज़किन्स लिम्फ़ोमा(एक प्रकार का कैंसर)" था तो वहीं दूसरे को "हाइपरट्रोपिक कार्डियोमायोपैथी(एक प्रकार की दिल की बीमारी" और ये बीमारियाँ हीं उनके मौत का सबब थीं। शायर के बारे में जो कहा गया है कि यह गज़ल उनकी अंतिम गज़ल थी, तो भाई अगर गुलूकार की मौत "१९७४" में हुई और शायर की "१९७८" में और यह भी मालूम है कि शायर ने बिस्तर-ए-मर्ग(मौत का बिछावन)से भी कई सारी रचनाएँ लिखीं थीं तो इस गज़ल का उनकी अंतिम गज़ल होने का सवाल हीं नहीं उठता है। अब अगर दूसरे गुलूकार की बात करें तो चूँकि हर मुशायरे के अंत में वे इसी गज़ल को गाते थे, तो लाजिमी है कि अंतिम मुशायरे के अंत में भी उन्होंने इसी को गाया होगा और इस तरह यह गज़ल उनकी अंतिम गज़ल हो गई। तो इस तरह मैं यह निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि भले हीं इन तीनों फ़नकारों की मौत बहुत हीं कम उम्र में हुई,लेकिन उन घटनाओं के पीछे इस गज़ल का कोई हाथ न था। वैसे इस गज़ल पर ऊँगली उठाए जाने का एक और कारण है और वह कारण बड़ा हीं पुख्ता है। अगर आप इस गज़ल के बोल पर ध्यान देंगे तो बोल से साफ़ ज़ाहिर है कि इसमें दुनिया से कूच करने की बात की जा रही है। "इंशा जी उठो अब कूच करो, इस शहर में जी को लगाना क्या"- जी हाँ हम इसी गज़ल की बात कर रहे थे, शायद आपने इसे पहले सुना हो और अगर सुना है तो फिर आपको इससे जुड़े उन तीनों फ़नकारों की जानकारी तो होगी हीं। नहीं है? कोई बात नहीं, हम किस दिन काम आएँगे।

जानकारियों का दौर हम "गज़लगो" से हीं शुरू करते हैं। जन्म से "शेर मुहम्मद खान" और शायरी से "इब्ने-इंशा" की पैदाईश जालंधर के फ़िल्लौर में हुई थी। दूसरे फ़नकारों की तरह हीं इन्हें भी बँटवारे के वक्त पाकिस्तान जाना पड़ा। पाकिस्तान में ये बहुत सारे सरकारी सेवाओं से जुड़े थे, जिनमें रेडियो पाकिस्तान, संस्कृति मंत्रालय और राष्ट्रीय पुस्तक केंद्र प्रमुख हैं। "संयुक्त राष्ट्र" का एक हिस्सा होने के कारण इन्हें कई देशों का दौरा करना पड़ा और उसी दौरान इनकी लेखनी ने एक नया मोड़ लिया। एक जाना-माना उर्दू कवि, विदूषक(ह्युमरिस्ट) और कार्टूनिस्ट "यात्रा-वृतांत लेखक" हो गया। इनकी यात्रा-वृतांत से जुड़ी कई सारी पुस्तकें हैं, जैसे कि "आवारागर्द की डायरी", "दुनिया गोल है", "इब्न-ए-बतूता के ताक़ुब में","चलते हो तो चीन को चलिए", "नगरी-नगरी फ़िरा मुसाफ़िर"। हास्य से लिपटी "उर्दू की आखिरी किताब" इतनी ज्यादा चर्चित हुई कि १९७१ से अब तक ३३ से भी ज्यादा बार यह प्रकाशित हो चुकी है। "इब्न-ए-इंशा" जी का "गज़लों" के क्षेत्र में भी कोई सानी नहीं है। "गुलाम अली" साहब की सबसे प्रसिद्ध प्रस्तुति "कल चौदहवीं की रात थी, शब भर रहा चर्चा तेरा" को इन्होंने हीं कलमबद्ध किया था। इन्होंने गज़लों के साथ कई सारे प्रयोग भी किए हैं। आब आज की हीं गज़ल को देखिए। अमूमन लोग मक़ते में अपना तखल्लुस इस्तेमाल करते हैं, या फिर वहाँ भी नहीं करते। लेकिन इन्होंने तो गज़ल की शुरूआत हीं तखल्लुस से कर दी है- "इंशा जी उठो...." । चलिए अब उठकर शायर से गुलूकार की तरफ़ चलते है। गायकी की बेमिसाल जोड़ी "अमानत अली-फ़तेह अली" (हम यहाँ नुसरत साहब की बात नहीं कर रहे) में अमानत अली बड़े थे और ज़्यादा मकबूल भी। इनके दादा "अली बख्श खान" पटियाला घराने के सह-संस्थापक थे और इनके पिता "अख्तर हुसैन खान" ने पटियाला घराने की उसी धरोहर को अपने बेटों तक सकुशल पहुँचाया था। "अमानत अली-फ़तेह अली" की जोड़ी खबरों में तब आई, जब १९४९ में आयोजित "आल बंगाल म्युज़िकल कांफ़रेंस" में इन्होंने अपनी गायकी से समां बाँध दिया था। उस समय "अमानत अली" १७ साल के थे और "फ़तेह अली" १४ के। उसके बाद तो इन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। पटियाला घराने में "खयाल" गाने वाले आगे चलकर दो खेमों में बँट गए। एक खेमे को इन दोनों भाईयों ने थामा था तो दूसरे खेमे की कमान संभाली थी बड़े गुलाम अली साहब,उनके भाई बरकत अली और खां साहब के बेटे मुनव्वर अली खान ने। अमानत अली खां साहब के गुजर जाने के बाद "असद अमानत अली खां" साहब मैदान में उतरे। यही वे तीसरे फ़नकार थे, जिनकी बात हमने शुरू में की थी। इनके बारे में कभी बाद में चर्चा करेंगे। वैसे आपको यह बता दें कि "अमानत अली खां" साहब के सबसे छोटे शाहबजादे "शफ़कत अमानत अली खान" ,जिन्हें लोग "रौक स्टार उस्ताद" भी कहते हैं, कभी पाकिस्तानी बैंड "फ़्युज़न" के मुख्य गायक हुआ करते थे और आजकल ये हिंदी फ़िल्मों के लिए गाते हैं। आपने "कभी अलविदा न कहना" का "मितवा" या फिर "डोर" का "ये हौसला" तो सुना हीं होगा। कभी इनके बारे में भी विस्तार से गुफ़्तगू करेंगे, अभी तो आज की गज़ल की ओर रूख करते हैं। उससे पहले:

कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएं मगर,
जंगल तेरे पर्बत तेरे बस्ती तेरी सहरा तेरा|


तो हाँ, मेहरबान, कद्रदान, साहिबान अपना दिल थाम लें,क्योंकि हम आपको वह गज़ल सुनाने जा रहे हैं, जो हर मायने में अलहदा है। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

इंशा जी उठो अब कूच करो,इस शहर में जी को लगाना क्या!
वहशी का सुकूं से क्या मतलब,जोगी का नगर में ठिकाना क्या!!

इस दिल के दरिदा दामन में,देखो तो सही सोचो तो सही,
जिस झोली में सौ छेद हुए,उस झोली का फ़ैलाना क्या!

शब बीती चाँद भी डूब चला, जंजीर पड़ी दरवाजे पे,
क्यूँ देर गए घर आए हो, सजनी से करोगे बहाना क्या?

जब शहर के लोग ना रस्ता दें,क्यों बन में न जा बिसराम करें,
(क्यों वन में न जा विश्राम करें)
दीवानों की-सी ना बात करें, तो और करे दीवाना क्या!


वैसे तो "अमानत अली" साहब के गाए इस गज़ल में इतने हीं अशआर हैं,लेकिन हम आपको बाकी के दो अशआर भी सुनाए देते हैं:

उस हुस्न के सच्चे मोती को हम देख सकें पर छू न सकें,
जिसे देख सकें पर छू न सकें,वो दौलत क्या,वो खज़ाना क्या!

उसको भी जला दुखते हुए मन,इक शोला लाल भभुका बन,
यूँ आँसू बन बह जाना क्या, यूँ माटी में मिल जाना क्या!




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

हंसते हुए चेहरों से है बाज़ार की ज़ीनत,
रोने को यहाँ वैसे भी ___ नहीं मिलती...

आपके विकल्प हैं -
a) सोहबत, b) कीमत, c) फुर्सत, d) कुर्बत

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-
पिछली महफिल का सही शब्द था -"चिराग" और शेर कुछ यूँ था -

वो फिराक हो या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन,
वो गुलाब बनके खिलेगा क्या, जो चिराग बनके जला न हो...

स्वप्न मंजूषा जी बधाई आपको. आपने फरमाया-

चिराग दिल का जलाओ बहुत अँधेरा है,
कहीं से लौट के आओ बहुत अँधेरा है...

दिशा जी स्वागत आपका, ये था आपका शेर -

वो चिराग ही तो है जो रोशन करे हर अँधेरे को
वरना जुगनू तो ना जाने कितने टिमटिमाते हैं

शरद जी भी आये इस शेर के साथ -

कहाँ तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए,
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए

भाई वाह बहुत खूब...सुमित जी ने याद दिलाया ये मशहूर शेर -

चिरागों ने जब अंधेरो से दोस्ती की है
जला कर अपना घर हमने रौशनी की है

दोस्तों जोरदार तालियाँ पूजा जी के लिए जिन्होंने पिछली ग़ज़ल के बोलों के अर्थ इतने विस्तार से सबके सामने रखा....बहुत बहुत आभार पूजा जी.

मनु जी लौटे बहुत दिनों के बाद और फरमाया-

आ ही जायेंगे वो चिराग ढले,
और उनके कहाँ ठिकाने हैं...

जी हाँ दोस्तों यही है आपका ठिकाना, स्नेह बनाये रखें....अगली महफिल तक खुदा हाफिज़...

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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