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Sunday, February 5, 2012

५ फरवरी - आज का गाना


गाना: है अपना दिल तो आवारा




चित्रपट:सोलवाँ साल
संगीतकार:सचिन देव बर्मन
गीतकार:मजरूह सुलतान पुरी
गायक:हेमंत कुमार






है अपना दिल तो आवारा
न जाने किस पे आयेगा

हसीनों ने बुलाया, गले से भी लगाया
बहुत समझाया, यही न समझा
बहुत भोला है बेचारा, न जाने किस पे आयेगा
है अपना दिल तो आवारा ...

अजब है दीवाना, न घर ना ठिकाना
ज़मीं से बेगाना, फलक से जुदा
ये एक टूटा हुआ तारा, न जाने किस पे आयेगा
है अपना दिल तो आवारा ...

ज़माना देखा सारा, है सब का सहारा
ये दिल ही हमारा, हुआ न किसी का
सफ़र में है ये बंजारा, न जाने किस पे आयेगा
है अपना दिल तो आवारा ...

हुआ जो कभी राज़ी, तो मिला नहीं काज़ी
जहाँ पे लगी बाज़ी, वहीं पे हारा
ज़माने भर का नाकारा, न जाने किस पे आयेगा
है अपना दिल तो आवारा ...

है अपना दिल तो आवारा
न जाने किस पे आएगा ...


Wednesday, July 15, 2009

है अपना दिल तो आवारा, न जाने किस पे आएगा....हेमंत दा ने ऐसी मस्ती भरी है इस गीत कि क्या कहने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 142

से बहुत से गानें हैं जिनमें किसी एक ख़ास साज़ का बहुत प्रौमिनेंट इस्तेमाल हुआ है, यानी कि पूरा का पूरा गीत एक विशेष साज़ पर आधारित है। 'माउथ ऒर्गन' की बात करें तो सब से पहले जो गीत ज़हन में आता है वह है हेमन्त कुमार का गाया 'सोलवां साल' फ़िल्म का "है अपना दिल तो आवारा, न जाने किस पे आयेगा"। अभी कुछ ही दिन पहले हम ने आप को फ़िल्म 'दोस्ती' के दो गीत सुनवाये थे, "गुड़िया हम से रूठी रहोगी" और "चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे"। फ़िल्म 'दोस्ती' में संगीतकार थे लक्ष्मीकांत प्यरेलाल और ख़ास बात यह थी कि इस फ़िल्म के कई गीतों व पार्श्व संगीत में राहुल देव बर्मन ने 'माउथ ओर्गन' बजाया था। इनमें से एक गीत है "राही मनवा दुख की चिंता क्यों सताती है". 'दोस्ती' १९६४ की फ़िल्म थी। इस फ़िल्म से ६ साल पहले, यानी कि १९५८ में एक फ़िल्म आयी थी 'सोलवां साल', और इस फ़िल्म में भी राहुल देव बर्मन ने 'माउथ ओर्गन' के कुछ ऐसे जलवे दिखाये कि हेमन्त दा का गाया यह गाना तो मशहूर हुआ ही, साथ ही 'माउथ ओर्गन' के इस्तेमाल का सब से बड़ा और सार्थक मिसाल बन गया यह गीत। जी हाँ, पंचम ने ही बजाया था अपने पिता सचिन देव बर्मन के संगीत निर्देशन में और हेमन्त कुमार के गाये इस कालजयी गीत में 'माउथ ओर्गन' । आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में आ गयी है इसी कालजयी गीत की बारी।

'सोलवां साल' चन्द्रकांत देसाई की फ़िल्म थी। राज खोसला निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे देव आनंद और वहीदा रहमान। मजरूह साहब ने गानें लिखे और संगीतकार का नाम तो हम बता ही चुके हैं। आज इस फ़िल्म के बने ५० साल से उपर हो चुके हैं, और आज अगर यह फ़िल्म याद की जाती है तो केवल फ़िल्म के प्रस्तुत गीत की वजह से। माउथ ओर्गन सीखने वाले विद्यार्थियों के लिए यह गीत किसी बाइबल से कम नहीं। इस गीत का फ़िल्मांकन भी बहुत सुंदर हुआ है। ट्रेन में सफ़र करते हुए देव आनंद इस गीत को गा रहे हैं और 'माउथ ओर्गन' पर उन्हे संगत कर रहे हैं उनके दोस्त (दोस्त की भूमिका में थे हास्य अभिनेता सुंदर)। इस गीत का एक सेड वर्ज़न भी है जिसमें बाँसुरी और वायलिन की धुन प्राधान्य रखती है। यूं तो इस फ़िल्म के कई और भी गानें ख़ूबसूरत हैं जैसे कि आशा-रफ़ी-सुधा मल्होत्रा का गाया फ़िल्म का शीर्षक गीत "देखो मोहे लगा सोलवां साल" और आशा की एकल आवाज़ में "यह भी कोई रूठने का मौसम है"; लेकिन कुल मिलाकर यह कहने में कोई हर्ज़ नहीं है कि हेमन्त दा का गाया "है अपना दिल तो आवारा" दूसरे सभी गीतों पर बहुत ज़्यादा भारी पड़ा और आज इस फ़िल्म के साथ बस इसी गीत को यकायक जोड़ा जाता है। और सब से बड़ी बात यह कि इस गीत को उस साल के अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत 'बिनाका गीतमाला' के वार्षिक कार्यक्रम में सरताज गीत के रूप में चुना गया था, यानी कि सन् १९५८ का यह सब से लोकप्रिय गीत रहा। आज भी जब अंताक्षरी खेलते हैं तो जैसे ही 'ह' से शुरु होने वाले गीत की बारी आती है तो सब से पहले लोग इसी गीत को गाते हैं, यह मैने कई कई बार ग़ौर किया है। क्या आप को भी ऐसा महसूस हुआ है कभी?



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. संगीतकार चित्रगुप्त का एक बेहद मधुर गीत.
2. मजरूह साहब ने लिखा है इस गीत को.
3. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"तन्हाई".

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी बस एक और सही जवाब और आप बन जायेंगें हमारे पहले को-होस्ट और आपकी पसंद के ५ गीत बजेंगें ओल्ड इस गोल्ड पर. वाकई लगता है बाकी सब ने पहले से ही हार मान ली है.:) मनु जी, रचना जी, शमिख फ़राज़ जी, और निर्मला कपिला जी आप सब का भी आभार.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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