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Sunday, April 20, 2014

तंत्रवाद्य मोहन वीणा की विकास यात्रा



स्वरगोष्ठी – 164 में आज

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 2


पाश्चात्य और भारतीय संगीतकारों में समान रूप से लोकप्रिय है यह तंत्रवाद्य 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की दूसरी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का उल्लेख करेंगे। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे एक ऐसे अत्याधुनिक भारतीय तंत्रवाद्य की चर्चा करेंगे, जो पाश्चात्य हवाइयन गिटार जैसा दिखाई देता है, परन्तु इस पर भारतीय संगीत के रागों को बड़े ही प्रभावी ढंग से बजाया जा सकता है। यह वाद्य है, मोहन वीणा, जिसके प्रवर्तक और वादक विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित विश्वमोहन भट्ट हैं। आज के अंक में आपको इस वाद्य और इसके वादक के बारे में चर्चा करेंगे। 
 



ब हम भारतीय संगीत के जड़ों की तलाश करने का प्रयास करते हैं तो हमारी यह यात्रा वैदिक काल तक जा पहुँचती है। वैदिक काल से लेकर वर्तमान काल तक की इस संगीत यात्रा को अनेक कालखण्डों से गुजरना पड़ा। किसी कालखण्ड में भारतीय संगीत को अपार समृद्धि प्राप्त हुई तो किसी कालखण्ड में इसके अस्तित्व का संकट भी रहा। अनेक बार भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर की संगीत शैलियों का अतिक्रमण भी हुआ, परन्तु परिणाम यह हुआ कि वह सब शैलियाँ भारतीय संगीत की अजस्र धारा में विलीन हो गईं और यह संगीत और समृद्ध होकर आज भी मौजूद है। मध्यकाल में भारतीय और विदेशी व्यवसायियों द्वारा संगीत शैलियों और संगीत वाद्यों का परस्पर आदान-प्रदान भी खूब हुआ। इस काल में नई शैलियों का जन्म और परम्परागत शैलियों का क्रमबद्ध विकास भी हुआ। इसी काल में अनेक भारतीय वाद्ययंत्र भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर भी गए। इनमें से कुछ वाद्य तो ऐसे हैं जिनका अस्तित्व वैदिक काल में था, बाद में इसके स्वरुप में थोडा परिवर्तन कर ये पाश्चात्य संगीत का हिस्सा बने। पश्चिमी संगीत जगत में ऐसे वाद्यों ने सफलता के नए मानक गढ़े। एक ऐसा ही वाद्ययंत्र गिटार है। एक लम्बे समय से गिटार पाश्चात्य संगीत एक अविभाज्य हिस्सा रहा है और पिछली आधी शताब्दी से तो यह वाद्य भारतीय फिल्म और सुगम संगीत में भी प्रयोग किया जाता रहा है।

देश की आज़ादी के बाद गिटार फिल्म संगीत और सुगम संगीत का हिस्सा तो बन चुका था किन्तु अभी भी यह शास्त्रीय संगीत के मंच पर प्रतिष्ठित नहीं हुआ था। पश्चिम का हवाइयन गिटार रागों के वादन के लिए पूर्ण नहीं था। कुछ संगीतज्ञों ने गिटार वाद्य को रागदारी संगीत के अनुकूल बनाने का प्रयास किया जिनमें सर्वाधिक सफलता जयपुर के पण्डित विश्वमोहन भट्ट को मिली। आज हम ‘मोहन वीणा’ के नाम से जिस तंत्रवाद्य को पहचानते हैं, वह पश्चिम के हवाइयन गिटार या स्लाइड गिटार का संशोधित रूप है। पण्डित विश्वमोहन भट्ट इस वाद्य के प्रवर्तक और विश्वविख्यात वादक हैं। आगे बढ़ने से पहले आइए सुनते है, मोहन वीणा पर उनका बजाया राग हंसध्वनि। तबला संगति रामकुमार मिश्र ने की है।


मोहन वीणा वादन : राग हंसध्वनि : आलापचारी और तीनताल की गत : पण्डित विश्वमोहन भट्ट




आपने मोहन वीणा पर राग हंसध्वनि की मोहक गत का रसास्वादन किया। यह मूलतः दक्षिण भारतीय संगीत पद्यति का राग है, जो उत्तर भारतीय संगीत में भी बेहद लोकप्रिय है। मोहन वीणा के वादक पण्डित विश्वमोहन भट्ट, सर्वोच्च भारतीय सम्मान ‘भारतरत्न’ से विभूषित पण्डित रविशंकर के शिष्य हैं। विश्वमोहन भट्ट का परिवार अकबर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास से सम्बन्धित है। प्रारम्भ में उन्होंने सितार वादन की शिक्षा प्राप्त की, किन्तु 1966 की एक रोचक घटना ने उन्हें एक नये वाद्य के सृजन की ओर प्रेरित कर दिया। एक बातचीत में श्री भट्ट ने बताया था- ‘1966 के आसपास एक जर्मन हिप्पी लड़की अपना गिटार लेकर मेरे पास आई और मुझसे आग्रह करने लगी कि मैं उसे उसके गिटार पर ही सितार बजाना सिखा दूँ। उस लड़की के इस आग्रह पर मैं गिटार को इस योग्य बनाने में जुट गया कि इसमें सितार के गुण आ जाए’। श्री भट्ट के वर्तमान ‘मोहन वीणा’ में केवल सितार और गिटार का ही नहीं बल्कि प्राचीन वैदिककालीन तंत्र वाद्य विचित्र वीणा और सरोद के गुण भी हैं।

मोहन वीणा और विचित्र वीणा के बजाने के तरीके पर विचार करने पर हम पाते हैं कि पाश्चात्य संगीत का हवाइयन गिटार वैदिककालीन वाद्य विचित्र वीणा का सरलीकृत रूप है। वीणा के तुम्बे से ध्वनि में जो गमक उत्पन्न होता है, पाश्चात्य संगीत में उसका बहुत अधिक प्रयोग नहीं होता। यूरोप और अमेरिका के संगीत विद्वानों ने अपनी संगीत पद्यति के अनुकूल इस वाद्य में परिवर्तन किया। विचित्र वीणा में स्वर के तारों पर काँच का एक बट्टा फिरा कर स्वर परिवर्तन किया जाता है। तारों पर एक ही आघात से श्रुतियों के साथ स्वर परिवर्तन होने से यह वाद्य गायकी अंग में वादन के लिए उपयोगी होता है। प्राचीन ग्रन्थों में गायन के साथ वीणा की संगति का उल्लेख मिलता है। हवाइयन गिटार बन जाने के बाद भी यह गुण बरक़रार रहा, इसीलिए पश्चिमी संगीत के गायक कलाकारों का यह प्रिय वाद्य रहा। विश्वमोहन जी ने गिटार के इस स्वरूप में परिवर्तन कर रागदारी संगीत के वादन के अनुकूल बनाया। उन्होंने एक सामान्य गिटार में 6 तारों के स्थान पर 19 तारों का प्रयोग किया। यह अतिरिक्त तार 'तरब' और 'चिकारी' के हैं, जिनका उपयोग स्वरों में अनुगूँज के लिए किया जाता है। श्री भट्ट ने इसके बनावट में भी आंशिक परिवर्तन किया है। मोहन वीणा के वर्तमान स्वरूप में भारतीय संगीत के रागों को गायकी और तंत्रकारी दोनों अंगों में बजाया जा सकता है। अपने आकार-प्रकार और वादन शैली के कारण मोहन वीणा पूरे विश्व में चर्चित हो चुका है। अमेरिकी गिटार वादक रे कूडर और पण्डित विश्वमोहन भट्ट ने पाश्चात्य गिटार और मोहन वीणा की 1992 में जुगलबन्दी की थी। इस जुगलबन्दी के अल्बम 'ए मीटिंग बाई दि रीवर’ को वर्ष 1993-94 में विश्व संगीत जगत के सर्वोच्च ‘ग्रेमी अवार्ड’ के लिए नामित किया गया और इस अनूठी जुगलबन्दी के लिए दोनों कलाकारों को इस सम्मान से अलंकृत किया गया था। आइए इस पुरस्कृत अल्बम की एक जुगलबन्दी रचना सुनते हैं। आप इस जुगलबन्दी का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


मोहन वीणा और गिटार जुगलबन्दी : वादक – पण्डित विश्वमोहन भट्ट और रे कूडर






आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 164वें अंक की पहेली में आज हम आपको कम प्रचलित वाद्य पर एक रचना की प्रस्तुति का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 170वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत रचना इस अंश को सुन कर वाद्य को पहचानिए और बताइए कि यह कौन सा वाद्य है?

2 – इस रचना में आपको किस राग का आभास हो रहा है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 166वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 162वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको एक कम प्रचलित वाद्य जलतरंग वादन का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य जलतरंग और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग किरवानी। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हमने संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला के दूसरे अंक में एक विकसित तंत्रवाद्य मोहन वीणा पर चर्चा की। अगले अंक में हम एक लुप्तप्राय और संशोध्त किये वितत वाद्य पर चर्चा करेंगे। इस प्राचीन किन्तु कम प्रचलित वाद्य की बनावट और वादन शैली हमारी चर्चा के केन्द्र में होगा। आप भी अपनी पसन्द के गीत-संगीत की फरमाइश हमे भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे एक नए अंक के साथ हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Sunday, February 23, 2014

राग काफी गाने-बजाने का परिवेश

  

स्वरगोष्ठी – 156 में आज

फाल्गुन के रंग राग काफी के संग


‘कैसी करी बरजोरी श्याम, देखो बहियाँ मोरी मरोरी...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, पिछली तीन कड़ियों से हम आपसे बसन्त ऋतु के संगीत पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार बसन्त ऋतु की आहट माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही मिल जाती है। इसके उपरान्त रंग-रँगीले फाल्गुन मास का आगमन होता है। इस परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से हो के रस-रंग को अभिव्यक्त करने के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। आज के अंक में हम पहले इस राग में एक ठुमरी प्रस्तुत करेंगे, जिसे परवीन सुल्ताना ने स्वर दिया है। इसके साथ ही डॉ. कमला शंकर का गिटार पर बजाया राग काफी की ठुमरी भी सुनेगे। आज की तीसरी प्रस्तुति डॉ. सोमा घोष की आवाज़ में राग काफी का एक टप्पा है।  


राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात इस राग के आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर कोमल गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन मास में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है।

आज की पहली प्रस्तुति राग काफी की ठुमरी है। यह ठुमरी विख्यात गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना ने प्रस्तुत किया है। खयाल, ठुमरी और भजन गायन में सिद्ध विदुषी परवीन सुल्ताना का जन्म 14 जुलाई, 1950 असम के नौगांव जिलान्तर्गत डाकापट्टी नामक स्थान पर एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ था। संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा उन्हें अपने पिता इकरामुल मजीद और दादा मोहम्मद नजीब खाँ से प्राप्त हुई। बाद में 1973 से कोलकाता के सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित चिन्मय लाहिड़ी से उन्हें संगीत का विधिवत मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। पटियाला घराने के गायक उस्ताद दिलशाद खाँ से भी उन्हें संगीत की बारीकियाँ सीखने का अवसर मिला। आगे चल इन्हीं दिलशाद खाँ से उनका विवाह भी हुआ। परवीन सुल्ताना ने पहली मंच-प्रस्तुति 1962 में मात्र 12 वर्ष की आयु में दी थी। 1965 से ही उनके ग्रामोफोन रेकार्ड बनने लगे थे। उन्होने कई फिल्मों में पार्श्वगायन भी किया है। फिल्म दो बूँद पानी, पाकीजा, कुदरत और गदर के गाये गीत अत्यन्त लोकप्रिय हुए थे। 1976 में मात्र 25 वर्ष की आयु में उन्हें ‘पद्मश्री’ सम्मान से नवाजा गया। 1981 में फिल्म ‘कुदरत’ में गाये गीत के लिए परवीन जी को श्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1986 में उन्हें तानसेन सम्मान और 1999 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। इस वर्ष (2014) उन्हें ‘पद्मभूषण’सम्मान प्राप्त हुआ है। परवीन जी के गायन में उनकी तानें तीनों सप्तकों में फर्राटेदार चलती हैं। आइए इनकी आवाज़ में सुनते हैं राग मिश्र काफी की कृष्ण की छेड़छाड़ से युक्त, श्रृंगार रस प्रधान एक मोहक ठुमरी।


ठुमरी मिश्र काफी : ‘कैसी करी बरजोरी श्याम, देखो बहियाँ मोरी मरोरी...’ : विदुषी परवीन सुल्ताना




अभी आपने राग काफी की ठुमरी का रसास्वादन किया। गायन में स्वर संयोजन के साथ ही गीत के शब्द भी रस उत्पत्ति में सहयोगी होते है। किन्तु वाद्य संगीत में शब्द नहीं होते। राग काफी श्रृंगार रस के परिवेश को रचने में पूर्ण समर्थ है, इसे प्रत्यक्ष अनुभव करने के लिए अब हम आपको राग मिश्र काफी की ठुमरी का वादन सुनवाते हैं, वह भी पाश्चात्य संगीत वाद्य हवाइयन गिटार पर। दरअसल आज का पाश्चात्य हवाइयन गिटार प्राचीन भारतीय तंत्रवाद्य विचित्र वीणा का परिवर्तित रूप है। पिछले कुछ दशकों से कई भारतीय संगीतज्ञों ने गिटार में संशोधन कर उसे भारतीय संगीत के अनुकूल बनाया है। सुपरिचित संगीत विदुषी डॉ. कमला शंकर ने भारतीय संगीत के रागों के अनुकूल गिटार वाद्य में कुछ संशोधन किए हैं। कमला जी का गिटार बिना जोड़ की लकड़ी का बना हुआ है। इसमें स्वर और चिकारी के चार-चार तार तथा तरब के बारह तार लगे हैं। डॉ. कमला शंकर का जन्म 1966 में तमिलनाडु के तंजौर नामक जनपद में हुआ था। संगीत की पहली गुरु स्वयं इनकी माँ थीं। बाद में वाराणसी के पण्डित छन्नूलाल मिश्र से खयाल और ठुमरी की शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध सितारवादक विमलेन्दु मुखर्जी से कमला जी ने तंत्रवाद्य की बारीकियाँ सीखी। कमला जी हैं पहली महिला कलाकार हैं जिन्हें भारतीय संगीत के सन्दर्भ में पीएच डी की उपाधि मिली है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और विचित्र वीणा वादक डॉ. गोपाल शंकर मिश्र के निर्देशन में उन्होने अपना शोधकार्य किया। गिटार वादन के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ की आज की कड़ी में हम उनका गिटार पर बजाया राग मिश्र काफी की ठुमरी प्रस्तुत कर रहे हैं।


ठुमरी मिश्र काफी : गिटार वादन : डॉ. कमला शंकर




भारतीय उपशास्त्रीय संगीत की एक शैली है, टप्पा। अब हम आपको राग काफी का एक टप्पा सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, पूरब अंग की सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. सोमा घोष। बनारस (वाराणसी) में जन्मी, पली-बढ़ी और अब मुम्बई में रह रही सोमा एक समय के महान फिल्मकार नवेन्दु घोष की पुत्रवधू है। संगीत की दुनिया में भी सोमा प्राचीन वाद्यों को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए संघर्षरत है। उन्हें आज जो प्रतिष्ठा मिली है, उसके लिए वह डॉ. राजेश्वर आचार्य से मिली प्रेरणा को बहुत महत्त्वपूर्ण मानती है, जिन्होने सोमा जी को नौकरी न करने का सुझाव दिया था। विश्वविख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने सोमा जी की प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें अपनी दत्तक पुत्री बना लिया था। वर्ष 2001 के एक सांगीतिक आयोजन में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने सोमा जी का गायन सुना और बड़े प्रभावित हुए। तभी उन्होंने कहा कि तुम मेरे साथ जुगलबन्दी करोगी। सोमा जी को बतौर बेटी अपनाने के पहले उन्होंने अपने पूरे परिवार को बताया और सबकी अनुमति ली। इसके बाद ही उन्होंने इसकी घोषणा की। खाँ साहब ने सोमा जी को अपनी कला विरासत का उत्तराधिकारी भी बनाया था। सोमा जी ने संगीत की शिक्षा सेनिया घराने के पण्डित नारायण चक्रवर्ती और बनारस घराने की विदुषी बागेश्वरी देवी जी से ली। वर्ष 2002 में मुंबई के एक समारोह में सोमा जी और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की ऐतिहासिक जुगलबन्दी हुई थी। उस आयोजन में अमिताभ बच्चन जी सपत्नीक टिकट लेकर आए थे। नौशाद साहब पहली पंक्ति के श्रोताओं में बैठे थे। सोमा जी ने खयाल गायकी को बिलकुल नई दिशा दी है और ठुमरी, होरी जैसी विधाओं को तो नई पीढ़ी के लिए नए ढंग से लोकप्रिय बनाया है। लीजिए, अब आप डॉ. सोमा घोष की आवाज़ में राग काफी का एक टप्पा सुनिए और स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश की सार्थक अनुभूति कीजिए। इसके साथ ही मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


टप्पा राग काफी : ‘वीरा दे जानियाँ रबी...’ : डॉ. सोमा घोष





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 156वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 160वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि यह संगीत की कौन सी शैली है? इस संगीत शैली का नाम बताइए।

2 – इस प्रस्तुति-अंश को सुन कर गायक को पहचानिए और उनका नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 158वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 154वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको पण्डित लालमणि मिश्र द्वारा प्रस्तुत तंत्रवाद्य पर एक रचना का अंश प्रस्तुत कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- विचित्र वीणा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग बसन्त बहार। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और चण्डीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों बसन्त ऋतु के फाल्गुनी परिवेश में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा जारी है। अगले अंक में हम इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत एक और ऋतु प्रधान राग पर चर्चा करेंगे। इस लघु श्रृंखला के बाद हम शीघ्र ही एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे। इस बीच हम अपने पाठकों/श्रोताओं के अनुरोध पर कुछ अंक जारी रखेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 
 

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